Saturday, September 3, 2011

The state cabinet has approved the draft bill to accord second language status to 11 tribal languages



The state cabinet has approved the draft bill to accord second language status to 11 tribal languages and Oriya and Bengla. the bill is likely to be tabled in the assembly on September 2 for its approval. these tribal languages are-Ho, santhali, Kharia, Mundari, Kuduk, Kurmali, Khortha, Nagpuri and Panchgania.

आठ औद्योगिक जोन में बंटेगा झारखंड खनिज उपलब्धता के आधार पर बंटा जोन

आठ औद्योगिक जोन में बंटेगा झारखंड
खनिज उपलब्धता के आधार पर बंटा जोन
फाइंस के इस्तेमाल करनेवाले उद्योगों को मिलेगा बढ़ावा
झारखण्ड राज्य को आठ औद्योगिक जोन में बांटा जायेगा। जोन का निर्धारण खनिज की उपलब्धता के आधार पर किया गया है। उद्योग विभाग द्वारा तैयार की नयी औद्योगिक नीति में वह प्रावधान किया गया है। इसके तहत जो खनिज जहां मिलते हैं, उसी से संबधित उद्वोग उस क्षेत्र में लगाये जायेगे। नयी औद्योगिक नीति के प्रस्ताव में फांइस के इसतेमाल करनेवाले उद्योगों को बढ़ावा देने की बात कही गयी है। प्रस्ताव में लिख गया है कि लंबे अंतराज से खनन कार्य के कारण आयरन ओर को फाएंस आयरन ओर खदान के इर्द-गिर्द भारी मात्रा में जमा हो गया है। वर्तमान में जितने फाएंस चालू हालत में हैं, इससे ऐसा लगता है कि फांइस की मात्रा ओर बढ़ेगीण् नीति में यह जिक्र किया गया है कि फाइंस की मात्रा को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि फाइंस को पिलेटस में बदलने वाले उद्योग लगे। मूल्य संवद्र्वन वाले उद्योग लगे। इसके लिए सरकार प्रसाय करेगी, ताकिछेत्रिय विषमता को दूर करते हुए समान रूप से राज्य में उद्योग लगा सके।
बांटे गये जोन
ऽ पलामू-गढ़वा-आयरन ओर, डोलोमाइट, कोयला, ग्रेफाइट, चाइना क्ले
ऽ लोहरदगा-औधोगिक क्षेत्र-बाॅक्साइट पर आधारित अल्युतिनिसम उद्योग
ऽ कोडरमा-हजारीबाग औद्योगिक क्षेत्र-माइका, बिजली, सीमेंट, ग्लास, एलाय स्टील, टेलीकाम व रिफ्रैक्टरी
ऽ रांची-औद्योगिक क्षेत्र-मध्यम व वृहत स्तर के उद्योग
ऽ धनबाद-बोकारो -कोयला और स्टील
ऽ सिंहभूम-औद्योगिक द्वोत्र-स्टील, आटो कंपोनेट, सीमेंट, यूरेनिययम, कापर ओर गोल्ड माइनिंग
ऽ घत्शीला औद्योगिक क्षेत्र-कापर तथा वन आधारित उद्योग
ऽ देवघर-जसीडीह-तेल मिल, ग्लास और स्टील

Monday, August 29, 2011

सांप्रदायिक शक्तियों एवं साम्राज्यवादी ग्लोबलाइजेशन का हमकदम बनाकर चल रही है। इन शक्तियों का एक मकसद हैः झारखंडी गौरवशाली सामाजिक, सांस्कृतिक विरासत क

झारखंडी संस्कृति का मूल्यबोध

by Pravin Kumar on Wednesday, August 17, 2011 at 10:46pm

झारखंडी समाज एवं संस्कृति का इतिहास अति प्राचीन है पर प्राचीनता के साथ-साथ इस समाज व संस्कृति में निरंतरता भी देखने को मिलती है इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि झारखंडी समाज व संस्कृति में गतिशीलता का अभाव है। यदि इस समाज व संस्कृति में निरंतरता है तो परिवर्तनशीलता या गतिशीलता भी है। बावजूद यह समाज आज भी मानव मूल्यों सामुदायिक संसाधनों पर सामूहिक हक, स्त्री-पुरूष समानता पर आधारित है एवं इसकी गौरवमय सांस्कृतिक व्यवस्था आसमान के समान विस्तृत, सागर के समान गंभीर, पहाड़ी झरनों के समान स्वच्छ एवं इंद्रधनुष के समान रंगीन है।

पर विडंबना यह है कि पिछले कुछ दशकों से इस गौरवशाली विरासत की परिवर्तनशीलता में तीव्रता नजर आ रही है, फिर भी इसकी समरसता, सामुहिक अभिव्यक्ति का स्वर सांस्कृतिक विरासत को अब तक धरोहर की तरह बचाये हुए हैं, लेकिन अब यह प्रश्न उठने लगा है कि वर्तमान युवा पीढ़ी अपनी गौरवमय सांस्कृतिक विरासत, सामूहिकता को आगे बढ़ा पायेगी, इस पर संदेह करना वर्तमान स्थिति को देखते हुए स्वाभाविक है, अगर हम वर्तमान पीढ़ी या युवा समूह की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं तो यह स्वतः दर्शाता (झलकता) है कि वे अपनी संस्कृति, विरासत, सामूहिकता रहन-सहन, बोली-भाषा से खुद को दूर करते जा रहे हैं इसका कारण जो भी हो पर कुछ बातें स्पष्ट नजर आने लगी है कि युवा वर्ग जहां अंग्रेजी एवं हिन्दी को अपने संवाद का माध्यम बना रहे हैं वहीं अपनी मातृभाषा, मुंडारी, कुड़ुख, संथाली, खोरठा, हो, कुरमाली जैसी भाषा को हाशिये पर धकेलते जा रहे हैं एक अनुमान एवं अनुभव के आधार पर 60 प्रतिशत बोलना नहीं चाहते हैं। इसमें से शेष 30 प्रतिशत युवाओं को अपनी बोली-भाषा के प्रयोग में हीन-भावना महसूस होती है।

इसी तरह जब पर्व त्योहार का समय आता है तो उत्सवों में आयोजित नाचगान में सभी लोग समान रूप से भाग लेते थे। लेकिन वर्तमान समय में कुछ एक त्योहारों के छोड़कर शेष में व्यक्तिवाद की बू आने लगी है। विडंबना तो यह है कि इससे निरजातिय समूह (आदिवासी वर्ग) भी अछूता नहीं रहा। मैं और मेरा परिधि सिमटता जा रहा है। जहां तक नृत्य का प्रश्न है तो इसकी खास शैलियां होती है चाहे वह छऊ नृत्य हो या पाइका, नटुआ, चौकारा, जमदा, हाटबार, सोहराय, सायरोंलरी, जफर, ये सभी शैलियां छोटे समूहों में ही सिमटती जा रही है। युवा वर्ग तो इनका नाम भी नहीं जानते हैं। पहले नाच-गान खुले आसमान के नीचे अखड़ा में होते थे। आज अखड़ा की जगह स्टेज एवं आरकेस्ट्रा लेते जा रहे हैं। बंद कमरे में, अब जमदा, नटुआ, पइका के जगह युवा वर्ग डिस्को डांस करने एवं सीखने में ध्यान देता है, उसी प्रकार हमारे वाद्य यंत्रों के जगह अब ध्वनि यंत्र (डेक, कैसेट) बाजे में झूमते नजर आते हैं। ध्वनि यंत्रों में बजने वाले गीत-संगीत लोगों को कर्णप्रिय लगने लगी। उन गीतों में भाषा को तोड़-मरोड़ दिया जाता है। मांदर, नगाड़ा, बांसुरी, ढोलकी के जगह पर आज गिटार बजने लगे हैं, मांदर को गले में टांगने में इन्हें पीड़ा होती है तो नगाड़ा क्या बजायेंगे। उन्हें अगर गिटार बजाना न भी आये तो कंधे पर लटकाये घूमना अपनी शान समझते हैं क्योंकि उसे मॉडल जो कहा जायेगा। नगाड़ा लटका कर उन्हें ठेठ देहाती जो थोड़े ही खुद को कहलाना है। नगाड़ा कैसे बजायेंगे, साथ में डर जो है कि कहीं आधुनिकता के दौड़ में पिछड़ न जायें। अगर पिछड़ गये तो उन्हें प्राणत्याग जैसी स्थिति जो लगेगी। यह तो स्पष्ट है कि बाजारवादी संस्कृति वर्तमान युवापीढ़ी को सांप्रदायिक शक्तियों एवं साम्राज्यवादी ग्लोबलाइजेशन का हमकदम बनाकर चल रही है। इन शक्तियों का एक मकसद हैः झारखंडी गौरवशाली सामाजिक, सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करना।

अब प्रश्न उठता है कि क्या झारखंडी गौरवशाली सामाजिक व्यवस्था एवं संस्कृति को इसी तरह हाशिये में आने दिया जाये या फिर साम्राज्यवादी एवं सांप्रदायिक शक्तियों के विकल्प को पुनः जोरदार रूप में देशज गणतंत्र में निर्मित जन भावनाओं से सराबोर, सामूहिकता की परिचायक गौरवमय झारखंडी संस्कृति को पुनः स्थापित कर जनहित के लिए आगे लाया जाये।

pravin kumar

Sunday, August 28, 2011

भूमि की प्रकृति बदल कर.नहीं बनेगी इमारतें..२४ जुलाई 2011


विदित हो की आज पूरे देश में बड़े उद्योग घरेने ..उद्योग लगाने के लिए ..किसानों, आदिवासियों, मूलवासियों, मछुवारो के hath से जंगल जमीन नदी पहाड़ छीने की कोशिश कर रही है..सभी उपजाऊ..खेती की जमीन है..कंही कंही तीन फसल भी होता है..लेकिन कंपनियों को जमीन देने के लिए..कृषि भूमि, जंगल, जल स्रोत का प्रकृति..बदल कर इसे बंजर ..वेस्ट लैंड करार दे रही है..और इसे जबरजस्त अधिग्रहण की कोशिश कर रही है..बन्दुक के नोक पर..

Adivaniyon की जमीन का कॉम्पनसेशन नहीं होगा.. २१ जुलाई 2011



भूमि अर्जन के लिए पेसा अपनाना जरुरी..मुख्या मंत्री श्री अर्जुन मुंडा...


राज में क्या हो रहा है..समझ में नहीं आता है..जब आदिवासी पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव करने की मांग कर रहे थे..तब इसको सरकार ऩे भी ख़ारिज किया..पेसा के तहत चुनव नहीं कराया गया..अब मुख्या मंत्री श्री अर्जुन मुन्दाही बयां दे रहे हैं की..पेसा कानून के तहत जमीन अधिग्रहण किया जाय..जब आप ऩे कानून अधिकार ही नहीं दिया..तब भूमि अर्जन के पेसा कानून अपनाना क्यों जरुरी होगा..सवाल के राज के आदिवासियों को सिर्फ ..मुर्ख बनाने की ही chaal है..