Tuesday, October 6, 2026

Bachpan me Gaonw ka Bajar --

 

 Bachpan me Gaonw ka Bajar ---


आज सोमवार है आज रंेडवा में

बाजार है, जो गांव से बहुत दूर है

लातरा जंगल, कोनसा जंगल 

पार करना होगा

कोनसा के बाद जंगल और

पहाड़ का चढ़ान केवल है

लगातार दो घंटा तक चलना

होगा रेंडवा घाट तक पहुंचने में

मामा घर रेंड़वा बडका टोली में है

कल मंगल है रायकेरा में

बड़ा बाजार लगता है

पूरा सप्ताह का सबसे बड़ा बाजार

हर चीज मिलता है

साग-सब्जी से लेकर कुदाल

गांईता-कपड़ा लता, सूई धागा

बाजार में इतना भीड़ रहता है

कि सोनमेर गांव से ही आवाज

सुनाई देता है

सूई-सलाई दिन में सिलाई

राईत में जलाई- सूई सलाई

सलाई डिबा में ही एक सूई

खोंपा रहता है एक धागा में

जिसको बेचने वाला पूरे

बाजार में घूम घूम कर आवाज देकर

बेचता है

लोगों में भी यह आवाज मन में

बैठ गया है सूई धागा और सलाई

एक साथ मिल जाता है लोग

खुष हैं आष्वकता है खरीदने

क तो किसी को दूकान खोजना

न्हीं पड़ता है सिर्फ आवाज सुनना

है वह इधर आ रहा है या नहीं

इसी तरह -लोगों को एक दूसरा

आवाज में भी अपना पन का अहसास

होता है-सिकु गोज रानू

हुनि गोज रानू......

इस तरह के समान बेचने में

मुसलिम समाज आगे है

मंगल बाजार में मुर्गी खरीदने

वाले, कपड़ा व्योपारी

अधिकांष मुसलिम समुदाय से ही हैं

ये मुंडारी में बात करते हैं

दा बड़ी दस टाका ते ऐमीमे

का रेदो तयोमते नेयाओ

का नमोआ-हिंन्दी

मुंडारी भाषा बंेचने और खरिदने वालों

के बीच आत्मयीयता का संबंध बना जाता है

मंगल को स्कूल मोरनिंग होता है

स्कूल से लौट कर मैं

क्रंज को एक छोटा टोकरी में

भर ली, साथ ही एक छोटा सिसि

मिटी तेल का

एक छोटा सिसि खाने वाला तेल का

डाल ली और बुधनी दीदी के साथ चल दी

अरहारा गांव और सोनमेर गांव 

के बीच छोटा गढ़ा है सूनसान

जगह है गर्मी के दिन में डर लगता है

बाजार पहुंचते सूरज सिर के उपर से

पार होकर ढ़ल रहा था

बाजार घुसने के पहले ही

तीन-चार ढ़ार करने वाले

बैठे हैं

सभी करंज, लाह, सुरगुजा

मंडुआ, कंगाई खरीद रहे हैं

व्योपारी गांव से आने वाले हर

व्यक्ति पर नजर रखे हुऐ हैं

बेचने के लिए कौन क्या ला रहा है

उस रास्ते से आने वाले हर

महिला के सिर से व्योपारी जब्रजस्त

टोकरी खिंज कर उतार रहे हैं

क हेके-बड़ी  धान, मंडुआ

लान-लान.....एक रूप्या पैला

महिला अपना सहमति देती

उसके पहले ही .....

उसके सिर से डालिया ख्ंिाज कर

जमीन पर रख दिया

डालिया में रखा सिसि-बोतल

गमछा को निकाल कर जमीन में

रख दिया

न तराजू का सही नाप दिखाया

ना ही पसंगा लगाना है या नहीं

इसका जांच करने दिया

बस धड़ाधड़ तैलना षुरू कर दिया

बेचने वाले सिंर देखते रह गये

इतना दाम में देगें-नहीं

देगें कुछ भी बोलने का मौका 

नहीं दिया

मेरा करंज कच्चा था

देखते ही व्योपारी बोला...

ई एकदम बेरेलगी-एकदम कच्चा

इसका क्या देगें-चार आना ते दा

चार आना में दे-मेरे हां-नहीं

कहने के पहले वह आंख झपकते

करंज तैल लिया-10 किलो होलक

आढ़ाई रूप्या हाथ में थमा दिया

चलो....जो भी हुआ

इसी से जितना भी, जो भी मिले

हॉं-मिटी तेल और कडुवा तेल

जरूरी है

नही ंतो अंधार में रहना होगा

जो भी साग-सब्जी मिलेगा

थोड़ा सा छोंक लगाने से

अच्छा लगता है...तो कुछ 

भी खाकर पेट भर सकते हैं

छठा क्लास में एडमिषन

भी लेना है


Sunday, October 4, 2026

6 दिसंबर 2005....Meri Dairy ...

 6 दिसंबर 2005


कर्रा


2 बजे हैं कर्रा प्रखंड कर्यालय में प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री अनिरूद सिन्हा के चैमबर में श्री अनिरूद सिन्हा के अलावे सीडीपीओ सबिता कुमारी बैठे हैं। इसी बीच हम भी एनडीटीबी के दो साथियों के साथ उनके कमरे में पहुंचे। श्री अनिरूद जी से मैं प्रखंड का विस्तृत जानकारी ले रही थी। इसी बीच एक महिला अपने हाथ में कागजों का बंच लिए कमरेे में घुसी और अपना कागज बीडीओ की तरफ बढ़ा दी। उस महिला के पीछे दो-तीन और महिलाएं हाथ में आवेदन कागज लिये खड़ी थी। सामने वाली महिला का कागज देखने के बाद बीडीओ साहब ने कागज वापस करते हुए उत्क महिला को सप्लाई विभाग मंे जाने को कहा। महिला बाहर निकली, उसके पीछे खड़ी अन्य मलिाएं भी उनके पीछे हो ली। पांच मिनट बाद उत्क महिलाएं लौट कर बीडीओ के कमरे में वापस आयी और बतायी की सप्लाई विभाग में कोई नहीं है, ताला लगा हुआ है। महिलाएं बीडीओ साहब से पुछने लगी-बनेगा कि नहीं, बनेगा-मिलेगा-मिलेगा बोलते हैं, कितना दिन से दौड़ रहे हैं, लेकिन मिल नहीं रहा है। उत्क महिला से पुछने पर कि क्या नहीं मिल रहा है, जवाब देती है-राशन कार्ड। बीडीओ उत्क महिलाओं से पुछते हैं सप्लाई विभाग में कोई नहीं हैं, महिलाएं-नहीं सर ताला लगा हुआ है। घबड़ाते हुए बीडीओ साहब रामदेव कुमार दलपति को बुलवाते हैं। रामदेव कुमारजी आते हैं, बीडीओं पुछते हैं सप्लाई इंन्सपेक्टर नहीं हैं। रामदेवजी जवाब देते हैं नहीं सर नहीं हैं। बीच में ही हमने पुछा-आज नहीं हैं या कितने दिन से नहीं आ रहे हैं। रामदेव जी कहते हैं एक सत्पाह से नहीं आ रहीं हैं। क्यों नहीं आ रही 

यह पुछने पर रामदेवजी ही बोलते है कि वह बीमार है। हम लोग जब बीडीओ साहब से पुछे कि आज तो मंगलवार है,-ब्लोक दिवस है, बीडीओ उत्तर में कहते हैं हां आज ब्लोक दिवस है। आज तो ब्लोक स्तर के सभी अधिकारियो-कर्मचारियों को ब्लोक में उपस्थित रहने का आदेश रहता है ताकि इस दिन पुरे क्षेत्र के ग्रामीणों के विभिन्न तरह के समस्याओं का निपटारा संबंधित अधिकारी कर सकें। हमने उत्क महिलाओं से पुछा-चलिए तो किधर है सप्लाई विभाग देखते हैं। इसी बीच एक व्यत्कि आता है बीडीओ के कमरे में और कहता है, सर चावल में आग लगा दिया। यह सुनते ही सबका ध्यान उस व्यत्कि की ओर जाता है। उससे पुछने पर कि कयों जला दिया-उत्क व्यत्कि कहता है सड़ गया था, पिलू लग गया था, फेंकने से बकरी सब खा जाता तो मर जाता क्योंकि वह तो पोयजन हो गया। अखबार वाले अधिकारियों से सवाल-जवाब कर रहे हैं-इस खबर से प्रखंड से अपना काम कराने आये गा्रमीणों के चेहरे में अजीब तरह का उत्साह का झलक रहा था। शायद इसलिए की पहली बार टीब्ी कैमरा वाले को लोग प्रखंड कर्यालय में देख रहे थे। जब हम बीडीओ के कमरे से उत्क महिला के पीछी-पीछे सप्लाई विभाग की ओर जाने के लिए निकले, बीडीओ के कमरा के बाहर लगी भीड़ जोे बार-बार अंदर झांकने की कोशिश कर रही थी, हम लोगो के पीछे सामने आंगन तक आ गयी। साथ में बीडीओ साहब भी बाहर निकले। भीड़ ने बीडीओ साहब के सामने ही कई शिकायत की।


मुख्य बिलड़िग से बाहर निकलते ही सामने मैदान के दुसरी छोर में सप्लाई विभाग का गोदाम है। इस गोदाम के दहिने कोने से घना धुंआं उठ रहा है, धुंआ के साथ किसी चीज के जलने की गंध आ रही हैं। भीड. से एक व्यत्कि बगल में आ कर धीमें आवाज में कहता है-उधर देखिए चावल जल रहा हैं। गोदाम के पास पहुंचने पर वस्तुस्थिति समझ में आती है। गोदाम का एक बड़ा शटर बंद है। बगल में एक छोटा शटर उठा हुआ है। उसके सामने चावल बोरी का ढेर है जो जलकर आंगारा का रूप लेता जा रहा है। कुछ तो जल कर राख हो चुका है, लेकिन अभी भी 20-25 बोरी दिखाई दे रहा है जिसको जलना बाकी है। जल रहे चावल के ढेर के बगल में कुछ चावल के दाने पड़े हैं उसे एक कुता खाने में लीन है। जिस कमरे में चावल रखा गया था, उसमें घुस कर देखने की कोशिश में सीढ़ी तक गयी। लेकिन अंदर नहीं घुस सकी-कारण की गोदाम के कमरा से लेकर जल रहे चावल के ढेर तक कानी अंगुली के एक चौथाई के बराबर मोटा-मोटा काला-काला पिलू पुरा बिछा हुआ रेंग रहा था। देखकर मन- बदन सिहर जा रहा था। पुरा कमरा में पीलू रेंग रहा था, र्फस गीला था। गोदाम के पास हम लोगों के साथ कर्रा प्रखंड के प्रभात खबर का संवाददाता साईद भी थे। इन्होने बताया की यह चावल दो साल से गोदाम में पड़ा हुआ था जिसका वितरण नहीं किया गया। बीडीओ साहब से पुछने पर कि यह किसका चावल था, क्यों नहीं बांटा गया, इसके उत्तर में बीडीओ बात को टालते हुए कहते हैं-हां-हां चलिए सीओ से पुछते हैं कहते हुए वे कर्यालय की ओर बढ गये।


सप्लाई इंन्सपेक्टर कौन है यह पुछने पर बीडीओ साहब रामकदेव कुमार की ओर इशारा करते हुए पुछते हैं-क्या नाम है जी उसका। रामदेव कहते है मंजु कुमारी, कब से नहीं आ रही हैं पुछने पर दलपति कहते हैं- आठ दिन से। क्यों नहीं आ रहे हैं पता है पुछने पर कहते हैं बीमार है। वहां मौजुद ग्रामीण कहने लगे-बहुत दिन से नहीं आ रहे हैं। एनडीटीबी के साथियों ने जब रामदेव से पुछा क्या पिछले ब्लोक दिवस के दिन इंन्सपेक्टर आयी थी, उत्तर मिलता है-नहीं, याने दो सप्ताह से नहीं आ रहे हैं। ये तमाम बातें बीडीओं के सामने ही होता रहा, जबकि बीडीओ साहब चुप थे। विदित हो कि इसके पहले ही जब हम बीडीओ के कमरे में बैठे प्रखंड़ में कितने बीपीएल परिवार है, इसमें अनतोदय-अन्नपुर्ण योजना में कितने लाभूक हैं। बीपीएल लाभूकों के लिए हर माह कितना राशन प्रखंड कर्यालय को मिलता है, इसकी जानकारी लेने की कोशिश करने पर बीडीओ साहब जवाब दिये-कि इसका डीटेल तो आप को प्रखंड के सप्लाई आफसर ही दे सकता है। ये तमााम घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि प्रखंड में ग्रामीणों की सेवा में पदास्थापित अधिकारी एक-दुसरे अधिकारी के बारे जानीकारी भी नहीं रखते हैं। जो भी हो-लेकिन सवाल बहुत ही गंभीर है-आखिर यह किसका चावल था, गरीबों का, बृधाओं का, या फिर महिलाओं या बच्चों का, जिनके नाम पर आता है, उन्हें तो नहीं मिला-जिससे कीड़ा खा गया, सड़ गया, जिससे गंदगी साफ करने के नाम पर जला दिया गया। दुखद बात तो यह है कि इसी अनाज को प्राप्त करने के लिए सुदूर गांवों से बुढा-बुढी लकडी टेकते-टेकते पैदल चल कर आते हैं-अंतोदय-अन्नपुर्ण सुविधा लेने के नाम पर। इससे प्राप्त करने के लिए लाभुकों की सुची में अपना नाम दर्ज करवाने, या फिर राशन कार्ड बनवाने के लिए गरीब कई दिनों से प्रखंड कर्यालय का चक्र काटते हैं। गरीबों के साथ हो रहे इस न इंनसाफी के लिए आखिर कौन जिम्मेवार है क्या प्रखंडों में बैठे पदाधिकारी, या यहां की भ्रष्ट कुप्रशानिक व्यवस्था या फिर ग्रामीण विकास विभाग। आखिर इसका जवाब कौन देगा। 

ग्रामीणों के समस्याओं का सही समय में हल करने के लिए हर सप्ताह में एक दिन प्रखंडों में पदास्थापित पधारिकारियों को एक दिन हर हाल में प्रखंड कर्यालय में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है। यह दिन मंगल के दिन को निस्चित किया गया हैं इस दिन को प्रखंड कर्यालय का मंगल दिवस कहा जाता है। इसी दिन ग्रामीण अपने-अपने सस्मयाओं को लेकर आते हैं क्योंकि इस दिन सभी विभागों के संबंधित अधिकारी मौजुद रहते हैं। ताकि गांव के साथ ग्रामीणों का सही विकास हो सके। मैं भी इस दिन का लाभ उठााना चाही। प्रखंड विकास पदाधिकारी से प्रखंड की जनसंख्या की स्थिति, ग्रामीणों में शिक्षा-स्वास्थ्य की स्थिति की जानकारी लेनी थी। अंचल पदाधिकारी से प्रखंड में कृर्षि भूमिं, वनभूमि, जलस्त्रोत, बंजर भूमि, चरागह भमि, तथा आदिवासियों के जमीन की स्थिति का विवरण एकत्र करना था। सप्लाई अधिकारी से प्रखड के बीपीएल ग्रामीणों की सख्या, ग्रामीणों के नाम आने वाला अंतोदय-अन्नपुर्णा योजना के तहत मिलने वाला राशन, किरोसिन तेल, डीलरों की संख्या आदि सुचनायें लेना था। लेबर आफिसर से प्रखंड से हो रहे मजदूरों के पलायन की स्थिति की जानकारी लेनी थी। इसी तरह सीडीपीओ से ग्रामीण महिलाओं-बच्चों के स्वास्थ्य आदि का जानकारी एकत्र करना था। इसी उद्वेश्य के साथ मंगलवार या मंगल दिवस को 11.30 में कर्रा प्रखंड कर्यालय पहुंचे। बाहर प्रगंन में ग्रामीणों की भीड़ लगी हुई थी। इस भीड़ में कुछ नेता टाइप के लोग भी दिख रहे थे। सबसे पहले बीडीओं में मिलना था, उसके चेम्बर तक गये, दरवाजा में ताला लटक रहा था।


बगल में ही सीओ का दरवाजा खुला हुआ पाकर सीओ के कमरे में गयी। सीओ नवीण सुवार्णाे बैठे हुए थे। बीडीओ से मिलना है लेकिन दरवाजा में तो ताला लगा है वो आएगें की नहीं-यह पुछने पर सीओ साहब एक कर्मचारी को बुलाकर, जाओ बीडीओ साहब को जल्दी आने के लिए कहो, बाहर से लोग आऐ हैं। 20 मिनट के  बाद बीडीओ साहब सीओ के चेम्बर में आए जहां हम लोग बैठे थे। सीओ ने सीआइ को बुला का प्रखंड के जमीन-जंगल का विवरण देने को कहा। इन दोनो अधिकारियों के अनुसार 178 रेवन्यू गांव हैं, जिसमें 1 गांव बंेचिरागी-आबादीविहीन है। कुल क्षेत्रफल-2001 के अनुसार-50745.24 हेक्टेयर है।

बीडीओ श्री अनिरूद्व सिन्हा के अनुसार प्रखंड की कुल जनसंख्या 90,836 है। जिसमें पुरूषों की संख्या 45,305 तथा महिलाओं की 45,331 है। इसमें अनुसूचित जनजाति 65,025 तथा जेनेरल की 25,811 है। यहां आदिम जनजाति नहीं हैं। इन्होंन बताया कि यहां 17,488 बीपीएल हैं। प्रखंड में शिक्षा का प्रतिशत 28 है। इसमें महिलाओं में शिक्षा का प्रतिशत 17 है जबकि पुरूषों में 36 है। यह पुछने पर कि क्या-राज्य सरकार या मितल समूह प्रखंड कर्यालय कोे किसी तरह का लिखित सूचना दिये हैं कि-मितल को उद्योग लगाने के लिए जमीन चाहिए। इसके जवाब में बीडीओ ने कहा-आज तक तो किसी तरह का लिखित सूचना नहीं मिला है। सिर्फ अखबारों में ही पढ़ रहे हैं।


सीडीपीओ साबिता कुमारी जो खूंटी में पदास्थापित हैं जो 11 जुलाई 05 से कर्रा प्रखंड  अतिरित्क इनचार्च के रूप में सीडीपीओं की भूमिका निभा रही थी। जो मंगल दिवस के दिन ही सीडीपीओ का चार्ज बीडीओ को सौंपी। साबिता कहती हैं-दो-दो प्रखंड का जिम्म्ेावारी संभालना बहुत कठिन होता है। इन्होंने बताया कि यहां 117 आंगनबाड़ी केंन्द्र हैं। इसके लिए 110 सेविकाएं हैं। तीन सेविकाएं मुखिया चुनाव लड़ने के लिए इसत्फिा दे दीं। प्रखंड में 23 पंचायत हैं जिसमें संशोधन के बाद 19 हो गया है। 117 आंगनबाड़ियों के लिए चार सुपरवाइजर हैं। ग्रामीण महिलाओं और बच्चों को पोषाहार के रूप में गुड-मुरही दिया जाता था। अब सुप्रिम कोर्ट का आदिश दिया है कि स्थानीय सेविकाएं ही इसकी व्यवस्था स्वंय करेगीं। इसी कारण सभी सेविकाओं के नाम से खाता खोलवाया गया है। हर सेविका को प्रतिमाह इसके लिए 4600 कुछ रूपया दिया जा रहा है। महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर आइसीडीएस की ओर से क्या व्यवस्था है-इसके जवाब में साबिताजी ने बतायी कि आइसीडीएस में कोइ्र सरकारी डाक्टर-नर्स नहीं है। प्राथमिक हेल्थ सेंटर के डाक्टर-नर्स से ताल-मेल कर काम चला रहे है।


लेबर अफिसर से मिलने की इच्छा जाहीर करने पर पता चला कि यहां लेबर अफिसर हैे ही नही। अपने समस्याओं को निपटाने आऐ ग्रामीणों ने शिकायत किया कि-यहां हर विभाग में काम मन-मना होता हैं परिवारिक लाभ योजना के तहत 10,000 तक की राशि देने का प्रावधान है, इसमें उन्हीं लागों को दिया जाता है जो कम्शिन देते हैं। कई आंगनबाड़ी सेविकाओं ने शिकायत की कि-सुपरवाईजर उन्हेंने मन-मना ढ़ंग से हटाने की कोश्शि कर उनके जगह दुसरों को घुसाते हैं। कई लोगों ने कहा कि यहां जिनका चलता है उसी का काम होता है, यदि आप अधिकारियों के खिलाफ मुंह खेलेगें तो आप पर झुठा केस थोप दिया जाएगा। विदित हो कि राज्य सरकार राज्य बनने के पांच साल हो गये लेकिन प्रखंड वासियों के विकास कार्य में कोई नयापन नहीं आया, वही भ्रष्टाचार, अधिकारियों की कमी, अनियामितता, घुसखोर-दलालों की दया पर टिकी है ग्रामीणों का विकास। यह भी सर्वविदित है अर्जुन मुंडा ने राज्य में देशी-विदेेशी पूुजीपतियो को उद्योग लगाने के लिए जमीन-जंगल-पानी देने के लिए पूुजीपतियों से 40 करार कर लिया है। इसी के तहत मितल समूह को इस्पात करखाना खोलने के लिए मुंडा सरकार मनोहरपुर क्षेत्र को दिखाया था। इसका विरोध मनोहरपुर क्षेत्र की जनता ने की। वहां विरोध के बाद राज्य सरकार और मितल समूह कर्रा प्रखंड में जमीन तलाशाने में लगे हैं। वहीं दूसरी ओर विस्थापन का भय लोगों को विस्थापन के खिलाफ अनआंदोलन करने को उद्वेलित कर रहा है और गांव-गांव में जनगोबंदी का बिंगुल फूंका जा रहा है। कर्रा प्रखंड में विस्थापन के खिलाफ उठे इस जनगोबंदी को विस्थापन के खिलाफ शहादती संघर्ष का परचम लहराने वाला कोयलकारो जनसंगठन का भी समर्थन है। 




                                   दयामनी बरला

Ramin Vikas Mantri Shree Jayram Ramesh Ge Ne Ghoshna Kiya Tha ..Nagdi ki Dairy ..




 

Saturday, October 3, 2026

2 मार्च 2012 की मेरी डायरी ---About Nagdi Movement

 2 मार्च 2012 की मेरी डायरी                 

महामहिम राज्यपाल महोदय                                          दिनांक-2 मार्च 2012

झारखंड

विषय- कांके नगड़ी के ग्राम सभा से बिना सहमती लिये ही, किसानों की कृर्षि भूंमि, जो इनका एक मात्र जीविका का साधन है-को सरकार आई आई एम और लॉ कालेज के नाम पर जबरन पुलिस बल के द्वारा जमीन कब्जा कर रही है-इसको रोकने के संबंध में।

महाषय,

इतिहास गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह-बिच्छु से लड़कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जंगल, पानी, जमीन पर हमारा परंपारिक अधिकार है। इस राज्य के जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सिद्वू-कान्हू, बिरसा मुंडा जैसे वीर आदिवासी  नायकों ने षहादत दी है। इन षहिदों के खून का कीमत है छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम 1908। इस कानून में आदिवासियों के जमीन की रक्षा का विषेष प्रावधान है। यह कानून कृर्षि भूंमि में किसी तरह के गैर कृर्षि निर्माण कार्य को भी इजाजत नहीं देता है। लेकिन राज्य सरकार नगड़ी ग्रामवासियों के हाथ से पुलिस के बल पर जमीन छीन कर किसानों-राईयतों भूंमिहीन, गरीब-कंगाल बनाने जा रही है। 

महामहिम का ध्यान इस ओर अक्रिष्ट करना चाहते हैं-कि राज्य पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में आता है और इस इलाके में पेसा कानून भी अस्तित्व में है। इस कानून के आलोक में कहना चाहते हैं-कि इस इलाके में जो भी विकास योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की जाएगी-इसकी इजाज ग्राम सभा से ली जाएगी। लेकिन सरकार आई आई एम और लॉ कॉलेज के नाम पर जमीन ग्रामीण देना चाहते हैं-यह नहीं, इस संबंध में ग्राम सभा से किसी तरह का राय-विचार-विमार्ष नहीं लिया गया। यह पांचवी अनूसूचि को दिये अधिकार ’’ग्राम सभा ’’ सहित पेसा कानून का घोर उल्लंघन है। यह हम आदिवासी मूलवासी किसानों के उपर राज्यकीय दमन है। 

हम नगड़ी ग्रामवासी आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि 57-58 में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय के लिए जमीन अधिग्रहण की बात सरकार कहती है-लेकिन तब भी हम ग्रामीण जमीन अधिग्रहण का विरोध किये-हम अपने पूर्वजों का जमीन नहीं देना चाहते हैं, यही कारण है कि-जमीन का पैसा सरकार देना चाही-तब भी हमलोगों ने पैसा नहीं लिया। (सलंग्न-29 फरवरी 2012-जिला भू-अर्जन पदाधिकारी रांची)। 

हम नगड़ीवासी महामहिम को यह भी बताना चाहते हैं-कि नगड़ी आदिवासी बहुल गांव है। यहां (57-58) 153 पंचाटियां थीं, (वर्तमान में कई और परिवार बढ़ गये हैं) यहां कुछ परिवार मुस्लिम भी हैं। इन 153 पंचाटियों में से 128 राईतों (पंचाटियों) ने जमीन का पैसा लेने से इन्कार किया, क्योंकि हम किसी भी कीमत में अपना जमीन देना नहीं चाहते हैं। करीब 25 मुष्लिम समुदाय के पंचाटियों नेे पैसा लिये। 

हम आप को यह भी कहना चाहते हैं-कि हम आदिवासी समाज का जीविका, अस्तित्व, भाषा-संस्कृति, इतिहास और पहचान जमीन-जंगल के साथ जुड़ा हुआ है। हम तब तक आदिवासी हैं-जबतक जमीन के साथ जुड़े हुए हैं। और इस पांचवी अनुसूचि एवं सीएनटी एक्ट क्षेत्र में हमारे अधिकारों की रक्षा एवं विकसीत करने की जिम्मेवारी राज्य के महामहिम राज्यपाल की है। 

हम महामहिम को यह भी बताना चाहते हैं कि-57-58 में सरकार द्वारा प्रयास किये गये जमीन अधिग्रहण का विरोध तब भी हम लोगों ने किया और जमीन हमारे पूर्वजों से लेकर आज भी हमारे ही हाथ में है। आज भी हम खेती कर रहे हैं और जमीन का मजगूजारी भी देते आ रहे हैं। लेकिन साजिष के तहत कुछ लोगों का मजगूजारी रसीद 2008 से काटना बंद कर दिया। लेकिन कुछ लोगों का मलगुजारी 2011 तक भुगतान किया गया है। 

यहां यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं-कि 57-58 में पूर्ववर्ती राज्य सरकार द्वारा राजेन्द्र कृर्षि विष्वविद्यालय वर्तमान में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके के लिए जिस जमीन को मात्र चिन्हित किया गया था-का मालिकाना हक बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके को है-सरकार यह मानती है। इसी आधार पर राज्य सरकार उक्त भूंमि का अपने विभिन्न योजनाओं में अलग-अलग उद्वेष्य में उपयोग करना चाह रही है और इस बावत बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके पर उक्त भूंमि पर अनापति प्रमाण पत्र जारी करने का दबाव डाला गया। ज्ञातव्य हो कि बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय और पथ निर्माण विभाग रांची के बीच प्रषनगत भूंमि पर रिंग रोड निर्माण हेतु कई पत्राचार हुआ। इसमें जमीन का मलिकाना हक बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय को नहीं है-क्योंकि जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया है-यह बात स्वंय अधीक्षण अभियंता पथ निर्माण विभाग, पथ अंचल रांची ने पत्रांक 1137 दिनांक 18.08.08 में स्पष्ट किया है। (छायाप्रति सलंग्न)।


हम आप को बताना चाहते हैं-कि जिस जमीन को 57-58 में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय द्वारा अधिग्रहीत मानती है-वह बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय द्वारा अधिग्रहीत नहीं है। इसकी पुष्टी स्वंय बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय ने (6375) दिनांक 17-12-2008 में की गयी है।(छायाप्रति सलंग्न) सरकार जमीन अधिग्रहण के नाम पर-कागज पर फरजी अधिग्रहण कर रखा है-और इसी फरजी अधिग्रहण के आधार पर जिला भू-अर्जन विभाग ने आई आई एम हेतु कुल 214.29 एकड़ जमीन राज्यअदेश संख्या-658/ रा0 दिनांक 07.03.2009 से मानव संसाधन विकास, झारखंड को निशुल्क हस्तानान्तरण कर दिया है। साथ ही 12.635 एकड़ भूंमि रिंग रोड़ निर्माण के लिए पथ निर्माण विभाग को हस्तानान्तरण कर दिया गया।  

 सरकार हमारे अधिकारों का हनन करते हुए जब्रजस्ती 9 जनवरी 2012 को पुलिस बलों के सहयोग से हमारे जमीन पर कब्जा कर लिया और गलत तरीके से घेराबंदी का काम किया जा रहा है। हमारी यह जमीन उपजाउ कृर्षि भूमिं है। यहां साल में तीन फसल उगाते हैं। धान का फसल काटने के बाद हमलोगों ने वहां चना, गेंहूं आदि फसल भी बो दिये थे-जिसको पुलिस वालों ने रौंद डाला। 

हम नगड़ीवासी आप से कहना चाहते हैं-हम विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन हम आदिवासी किसानों को उजाड़ कर नहीं। हम आई आई एम तथा लॉ कालेज का विरोध नहीं कर रहे हैं-लेकिन हमारे कृर्षि भूंमि में नहीं। 

हमारा संकल्प -हम अपने पूर्वजों की जमीन को एक इंच भी नहीं देगें, क्योंकि हमारे सामाजिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति, सरना-ससनदीरी, मसना, इतिहास और पहचान को किसी भी मुआवजा से नहीं भरा जा सकता है, ना ही उसको पूनार्वासित किया जा सकता है।

हमारा सुझााव-

1-चिन्हित किया गया जमीन कांके नगड़ी के किसानों की उपजाउ कृर्षि भूंमि है और यह जीविका का एक मात्र साधन है। इस पर किसी भी तरह का इमारत -बिल्डिंग नहीं बनाना चाहिए

2-आई आई एम एवं लॉ कालेज एक विषिष्ट षिक्षण संस्थान है, इसलिए यह ऐसी जगर पर बनायी जाए जो गांव से 30-35 किलो मीटर दूरी पर हो, ताकि षिक्षण कार्यक्रम में किसी तरह का बाधा नहीं पहुंचे।

3-आई आई एम एवं लॉ कालेज षिक्षण संस्थान ष्षहर -गांव की भीड़ भाड़ से दूर ष्षांत जगह में बनाया जाए

4-ऐसी जगह से संस्थान खड़ा किया जाए जो सरकारी जमीन हो, बंजर भूंमि और कृर्षि योग्य नहीं हो, सरकार ऐसी जगह चिन्हित करे

हमारी मांगें-

1-गा्रम सभा को दिये गये अधिकारों का सम्मान किया जाए तथा जिस जमीन को जबरन पुलिस बल द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा है-उसे यथाषीध्र रोका जाए

2-छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम 1908 के मूलधारा 46 में आदिवासियों को जो अधिकार दिये गये हैं-उसका सम्मान किया जाए।

3-हम आदिवासी-मूलवासी किसी भी कीमत में हमारी खेती की जमीन को आई आई एम एवं लॉ कालेज के लिए नहीं देगें

4-आदिवासी-मूलवासियों का विस्थापन रोका जाए।

                                          

                                                               आप के विष्वास्त 

                                                                  कांके -नगड़ी

                                                                  2 मार्च 2012

नोट-मैंने फरवरी 2012 में नगडी के 227 एकड जमीन से संबंधित आरटीआइ आवेदन रांची जिला भूअर्जन विभाग-रांची और बिरसा कृषिविश्वविद्यालय कांके को दी थी। जिसमें निम्नलिखत सवाल मैंने की थी-1- कांकें नगडी में आप ने कितना एकड़ जमीन अधिग्रहण किये हैं

2-किन-किन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-किसानों की सूची के साथ

3-जिन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-उन किसानों को जमीन का कीमत किस दर से भुगतान किये हैं-पावदी रसीद के साथ जानकारी

4-जिन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-उस जमीन का खाता सं0, और रकबा की जानकारी

5-अगर आप जमीन अधिग्रहण किेये हैं-तो उस जमीन का उपयोग किस रूप में आप कर रहे हैं

ठसी आरटीआई आवेदन में मिला जानकारी के आधार पर पहला आवेवदन राजपाल के नाम बना कर, जमीन वापसी की मांग के लिए 2 मार्च 2012 आवेदन दिये थे। इसके बाद ही 4 मार्च 2012 से नगडी चौंरा में धरना में बैठना शुरू किये। जो 3 जुलाई तक जारी रहा।  रिपोर्ट में दर्ज तथ्य, मेरे द्वारा आरटीआई द्वारा मांगी गयी आवेदन में मिली जानकारी में मौजुद है। आरटीआई में मिली सभी कॉपी मैंने नगडी आंदोलन 2012 में सभी को दे दी हुं। इसी जानकारी के तहत लड़ाई लड़ी गयी थी। दुखद बात है कि 2025 में रिम्स 2 के नाम पर फिर से जब जमीन पर सरकार काम करना शुरू किया, तब नगडी के किसानों को माले विधायक री अरूप चटर्जी, पूर्व विधायक श्री विनोद कुमार सिंह, माले के राज्य सचिव श्री मनोज भक्त जी, कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष-श्री केशव कमलेश जी, विधायक श्री राजेश कच्छप जी, राजस्व मंत्री श्री दीपक बीरआ जी, कल्याण मंत्री श्री चमरा लिंण्डा जी, झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव श्री सुप्रीयो भटार्चाजी,  स्वस्थ्य मंत्री श्री इरफान अंसारी जी सबके पास लेकर गयी। सभी ने पोजेटिव जवाब दिये। 

इसी बीच शिबुसोरेन जी का तबीयत खराब हो गया। हेमंत सोरेन और कल्पना दिल्ली में गुरूजी के इलाज में लगे थे। इस दौरान मैंने मुख्यमंत्री जी एवं विधायक कल्पना सोरेन के नाम पर सीएम आवासीय कालर्यालय में नगडाी का जमीन छोड़ कर दूसरे जगह रिम्स 2 बनाने की मांग को लेकर आवेदन दी। इसी बीच 4 अगस्त को निधन हो गया।  इसी बीच कुछ नहीं किया जा सकता था। 

मैं हैरान थी जब नगडी के लोगों को उपरोक्त सभी नेताओं के पास लेकर जा रही थी-मुझे पता भी नहीं चलता था, नगड़ी के रैयतों का एक ग्रुप पूर्व मुंख्यमंत्री श्री बाबूलाल के पास गये। श्री मारांडी जी ने राज्य सरकार से अग्राह किया कि खेती की जमीन में रिम्स 2 नहीं बनाया जाए। इन्होंने ज्यादा उल्टा-सिधा नहीं किया। इसके बाद लोग संसाद श्री संजय सेठ के पास गये। उन्होंने राज्यपाल से मिलाया। संसाद श्री सेठजी भी खेत में हल जोतने का घोषणा किये। लेकिन खेत में नहीं उतरे। इसके बाद जेएमएम कं पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व कल्याण मंत्री श्री चंपाई सोरेन ने खेत में हल चलाने-रोपा रोपने का घोषणा किया। 

तय दिन में पूरे राज्य के बीजेपी के साथी नगडी खेत में ट्रेक्टर लाकर हल जोता, धान रोपा। हैरानी की बात तो यह है कि -धान रोपने के बाद फसल का एक बाईल भी किसान नहीं काटंे। 

2012 में हमलोगों ने खेत जोता, धान रोपा और फसल भी काटा। 15 अगस्त 2012 को 40-45 हल-बैल के साथ पूरा गांव खेत जोता, धान रोपा, मैं साथ थी। कांके थाना में सीओ और थाना प्रभारी ने सिर्फ मेरे उपर नामित एफआईआर किया। दयामनी बरला करीब 100 से 150 लोगों के साथ दिवाल तोडी, खेत जोती और खेती बारी की। एफआईआर में कहा-बाकी लोगों का नाम -पता नहीं है। 7-8 साल तक केस डायरी पुलिस लिखते रही-बाकी लोगों को नाम, पता नहीं मिल रहा है। 2012 से 2023 तक कचहारी का चक्कर मैं लगाते रही। मेंरे उपर कुल 8 केस थे। 9 जून 2012 को नेगड़ी का जमीन बचाने के लिए जानी शिकार निकाले थे। नगड़ी चौंरा से राजभवन तक। 

इसकी तैयारी के लिए 35 गांवों में दिन-रात लोगों को आंदोलन में जोडने का काम किये। राज्य बनने के बाद 2001 में उसी इलाके में ग्रेटर रांची बनाने की योजना फाईनल थी। प्रथम मुख्यमंत्री ने इसका उदधाटन भी कर दिये थे। सरकारी सूची में 35 गांवों का नाम दर्ज था। सभी गांव विस्थापन को लेकर भयभीत था। सभी गांव के ग्रामीण नगड़ी आंदोलन के समर्थन में उतरे। तय कार्याक्रम के अनुसार 35 गांवों के समर्थक, माले के तत्कालन विधायक श्री विनोद सिंह, मासस के तत्कालीन विधायक ्रश्री अरूप चटर्जी हम लोगों के साथ नगडी चौंरा से पैदल भारी भीड के साथ राजभवन पहंुचे थे। उस दिन बडी घटना होते-होते बच गयी सिर्फ विनोद सिंह और अरूप जी के कारण। लोग इतना उग्र हो गये थे-कि किसी का बात ही मान रहे थे। लेकिन सब ठीक रहा। इस दिन हम लोगों के उपर दायर केस 15 सितंबर 2025 को खत्म हुआ है। 

आज दुख है कि राजनीति करके जमीन बचाने को आंदोलन को खत्म कर दिया गया। मैं नगडी के साथियों को बार-बार मना करते रही कि राजनीति मत कीजिए। गठबंधन की सरकार है-अग्राह करेगें, मनाएगें। लेकिन जो हुआ सबके सामने है। 2013 में तीन महीना जेल में रहने के बाद बाहर मैं निकली। जनवरी माह था। एक दिन तत्कालीन प्रखात खबर के प्रधान संपादक श्री हरिवंश जी फोन करके बोले-आज मैं केंन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रामेश जी को अपने दफदर में चाय-पानी के लिए बुलाया हुं। मैं चाहता हुं-तुम भी आओ। मैं सोच में पड़ गयी, जाना चाहिए या नहीं। फिर मन बनाया-नगडी खेत से संबंधित सभी दस्तावेजों को फाईल बनायी और गयी। याद है अंग्रेजी अखबार के 3-4 रिपोर्टर वहां थे। वहां मुझ को देखते ही एक ने कहा-आखिर तुम क्या चाहती हो, तुम्हारे हिसाब से राज्य चले, सब जगह विरोध करती हो जमीन नहीं देना है। इस समय हरिवंश जी और मंत्री नहीं पहुंचे थे। 

लोग बहुत कुछ बोलते गये, मैं चुप थी। हरिवंश जी और मुत्री अंदर प्रवेश किये। सभी ने अभिनंदन किया। बात शुरू हुई। प्रत्रकारों ने मंत्री जी को धन्यबाद और बधाई देने लगे कि आप ने नरेगा कानून बहुत अच््रछा लेकर आये हैं, गांव का बहुत विकास हो रहा है। गांव वाले बहुत खुश हैं। मैं चुप सुनते रही। मैं अपनी बात कहने का अवसर ढुंढ रही थी। मैं अपने को गाली देने लगी-दयामनी क्या तुम चुप रहने के लिए यहां आयी हो, या अपनी बात कहने के लिए। मैं चुपी तोडी-मंत्री साहब नरेगा बहुत अच्छा है लेकिन भ्रध्टाटाचर भी चरम पर है। मजदूरों का मज कर शोषण हो रहा हे। प्रभात खबर में मेरी बहुत सारी रिपोर्ट नरेगा में मजदूरों के शोषण पर छपी है। प्रधान संपादक जी ने कहा-हां दयामनी इस पर बहुत काम की है। सर एसी कमरा में योजनाएं बनती है और जब जमीन पर उतारा जाता है, तब गांव वाले और सरकार के बीच लड़ाई होता है। जैसे कि नगडी में अभी हो रहा है। तुरंत उठ कर मंत्री के पास फाइल लेकर पहुंची। एक-एक पेज पलट कर दिखायी, एक-एक कागजात। और अग्राह की, सर सुकुरहुटं में 2100 एकड तक बंजर भूमि है। आप को समय हो तो दिखा सकते हैं।

25-26 दिन के बाद ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रामेश जी झारखंड आ कर प्रोजक्ट भवन में प्रेस कांन्फ्रेस करके घोषणा किया-नगडी के किसानों का जमीन बहु फसली है किसन जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। मैं उनके साथ हुं। आइआइएम और ट्रीपल आइटी जैसे संस्थान सुकुरहुटु के बंजर भूमि पर बनेगा। इसी घोषणा के आधार पर 2012 के बाद नगडी का जमीन यथावत किसानों के हाथ था। जहां 2024 तक किसान खेती करते रहे। 

राजनीति में रहकर आदिवासी नेता भी आदिवासी समाज के समस्याओं को समझते नहीं है सिर्फ अपना कुर्सी की राजनीति करते हैं। 2012 में मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुण्डा जी थें। दो उपमुख्यमंत्री थे-एक सुदेश कुमार महतो और दूसरा हेमंत सोरेन। उस समय कल्याणमंत्री श्री चंपाई सोरेन जी थे। जिनको नगडी का जमीन के बारे जानकारी नहीं है-सबको है लेकिन पद में रहते नगडी के किसानों का जमीन जो 1957-58 में गलत तरीक से अधिग्रहण किया था। इमानदारी से रैयतों को वापस करना चाहिए था। नहीं करके राजनीति के आग में झोंक दिया। 

Friday, October 2, 2026

इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स लिमिटेड प्लांट के विस्थापितों और रैयतों को मुआवजा और नौकरी दिलाने के लिए मासास से पूर्व विधायक अरूप चटर्जी के नेतृत्व में 2014 में बडा आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन के समर्थन में मैं भी शामिल हुई थी।

 बोकारो जिला के चंदनकिसारी (सियालजोरी) में स्थित

इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स लिमिटेड प्लांट के विस्थापितों और रैयतों को मुआवजा और नौकरी दिलाने के लिए मासास से पूर्व विधायक अरूप चटर्जी के नेतृत्व में 2014 में बडा आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन के समर्थन में मैं भी शामिल हुई थी। 

धरना कार्यक्रम के दौरान स्टील प्लांट को भगाबांध गांव के रैयतों जमीन देने से इंकार कर दिया था। गांव वाले जमीन अधिग्रहण का जोरदार विरोध किया। परिणाम यह हुआ कि कंपनी ने गांव के चारों ओर का जमीन अधिग्रहण कर स्टील प्लांट खडा किया। बीच में गांव को छोड दिया गया। चारों ओर प्लांट का चालू हालात में। गांव वाले अपने गाय, बैल के साथ । इसे देखने समझने के लिए विस्थापित साथियों के साथ प्लांट के अंदर गांव गये थे। इस पर स्टील प्लांट के मालिक ने मेरे साथ 22 लोगों के उपर प्लांट में तोड फोड का केस दर्ज किया था। बोकारो कोर्ट मे कई साल तक केस चला था। 

Xtell Plant ke bhitar Bhagabandh Village


Plant ke main Gate per Dharna  

Lameen Malik, Displaced 


Plant ke Undar Bhagabandh Gaon



डायरी-21 जून 2001, रांची स्थित एचपीडीसी में राज्य के कई हिस्सों के जनआंदोलनों में संघर्षरत साथियों की जुबानी, जो आज इतिहास बन गया है।

 जनअधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष का सफर अभी जारी है...

डायरी-21 जून 2001, रांची स्थित एचपीडीसी में राज्य के कई हिस्सों के जनआंदोलनों में संघर्षरत साथियों की जुबानी, जो आज इतिहास बन गया है।

आजादी के बाद 60 वर्षों में करीब 60 लाख झारखंडी अपने जंगल-जमीन और विरासत से विस्थापित हो चुके है। झारखंड अलग राज्य की लड़लाई में हमलोगों ने नारा दिया था-कैसे लोगे झारखंड-लड़के लेगें झारखंड। अब नारा दे रहे हैं-कैसे लिया झारखंड-लड़के लिया झारखंड। जेकिन आज भी झारखंडी आदिवासी-मूलवासी, किसान, कहीं बड़े परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन के खिलाफ लड़ रहे हैं, तो कहीं, फील्ड फायरिंग रेंज के खिलाफ, तो कहीं उत्खनन -खदान के खिलाफ, तो कहीं शरही इलाके में झुगी-झोपड़ी उजाड़ने के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। 

राज्य में अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पूंजीवाद तथा नवसाम्रज्यवाद अपना पांव फैलाना शुरू कर दिया है। शहरीकरण, सुंदरीकरण, रोड़ चौड़ीकरण के लिए शहरी क्षेत्र के गरीबो की लाखों झोपडियां और दुकाने उजाड़ना शुरू कर दिया है। 

अलग राज्य बनने के पहले कोयलकरो परियाजना बनाने का जिम्मा एनएसपीसी को दिया गया था। कोइलकारो जनसंगठन 256 गांवों की र्ढाइ लाख आबादी, 55 हजार एकड़ खेती की जमीन, 27 हजार एकड़ जंगल के साथ अपना भाषा-सांस्कृति, पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहा था। 

राज्य बनने के बाद अब परियोजना का निर्माण के लिए एनएचपीसी को हटाकर एनरोन तथा फ्रांस की एक बड़ी कंपनी को जिम्मा दे रहा हैं अब हमारी लड़ाई सरकार से नहीं है, लड़ाई अब बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ होगी। 

जगत जी कुटकू डैम से होने वाल विस्थापन के खिलाफ चल रहे आंदोलन का सक्रिय लीडर है। आंदोलन पर चर्चा करते बताया-1984 में एक माह तीन दिन तक बांध को रोकने के लिए स्थानीय किसानों ने धरना दिया। जिस किसान का एक लाख की संपत्ति चली गयी-उसको मुआवजा के तौर पर केवल 15 हजार रूपया मिला। 1995 में फिर से धरना दिये । पहला फेज में 17 गांव डुब चुका है, अभी और 32 गांव डुबने वाला है। 1966-67 में सर्वे हुआ था, उस समय 600 घर था प्रभावित, इसमें 222 परिवार को नौकरी दिया। बाकी को कुछ नहीं मिला। बहुतों को रहने के लिए घर भी नहीं मिला। 

1992 से कुटकु डैम क्षेत्र में स्थानीय समुदाय ने विस्थापन रोकने के लिए संघर्ष समिति बना कर लड़ रहे हैं। जगत सिंह ने बताया-अभी भी संघर्ष जारी है। यहां के विस्थापित कुछ लोग छत्तीसगढ जा कर बसने लगे। जब बिहार था -तब विस्थापितों को वहां रहने दिया। छत्तीसगढ, झारखंड और उत्तरांचल ये तीनों राज्यों को पूर्नगठन 2000 में हुआ। छत्तीसगट नया राज्य बनने के बाद कुटकु डैम विस्थापितों को वहां से हटाया गया। घर बना कर रहने के लिए भी जमीन नहीं दिया जा रहा है।

 दामोदर घाटी-इस इलाके में पिपरवार कोयला खदान से बहुत अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। जिसके पास 2 एकड़ से कम जमीन था-उसको मुआवजा के नाप पर केवल 7 सौ दर पर मिला। इस इलाके में महुआ पेड की अधिकता थी जिससे काट दिया गया। हर साल प्रत्येक पेड करीब 3000 रू तक का पैदवार देता था। अब सब समाप्त हो गया। 

रजरप्प क्षेत्र-लोगों ने बताया 6 गांव पूरी तरह विस्थापित, 4 गांव आंशिक। 40 परिवार मछुवारों अधिक दिक्कत हो रहा है। विस्थापितों में से करीब 450 लोग छाई लोडिंग का काम कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि, खदान होगा तो नौकरी मिलेगा, लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल जाती है। 

उरीमरी कोलयारी, हेंन्देगीरी कोलयारी, गोविन्दपुर कोयलारी, बोकारो थार्मल पावर, गामिया, तेनुघाट डैम इन सभी परियोजनाओं से बडी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं। बोकारी जिला और हजारीबाग जिला में विस्थापितों की फौज खडी हो गयी। जो भूमिहीन हो गये हैं। रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। बोकारो की सामाजिक कार्यकर्ता तारा क्रांति कहती है-इलाके में पीने का पानी नहीं मिलता है। महिलाएं दो किलोमीटर तक पानी लाने जाती हैं। लडकियां 6-7 क्लास तक ही पढ़ पाती हैं गरीबी के कारण। महिलाओं की बडी आबादी महानगरों में पलायन कर रही है जहां उनका शरीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण होता है। 

गोला, पेटरवार इलाके में विस्थापन की लड़ाई नहीं लड़ी गयी। विस्थापित जमीन से उजड़ने के बाद जंगलों में जा कर बसने लगे। रोजगार के लिए केंउदु पता लोड कर जिंदगी बसर करने लगे, लेकिन वन विभाग ने उन लोगों पर केस ठोक दिया। 

पश्चिम सिंहभूम में 1980 में ईचा खरखाई डैम बनाने की योजना लायी गयी।  क्षेत्र के आदिवासी-मूलवासी किसान संगठित होकर विस्थापन के खिलाफ संघर्ष करना शुरू कर दिये। संगठन के नेता गंगाराम कलौंडिया की हत्या 1982 में कर दी गईं 

पोटका के सिद्वेश्वर सरकार और कुमार चंन्द्रमार्डी कहते हैं-जादूगोड़ा के यूसिएल खदान क्षेत्र में रह रहे लोग तावा में डाले गए मच्छली की तरह हैं। विस्थापितों को वहां नौकरी तो दिया जहां यूरेनियम रेडियेसन से हर तरह की बीमारी से लोग अंसमय काल के गाल में समा रहे हैं। बच्चे अपंग पैदा हो रहे हैं। महिलाएं बांझ की शिकार बनते जा रही है। 

कुमारी संजय-अपने जंगल-जमीन से लोग उजड जाने के बाद शहरों में आकर झुगी-झोपडियों में रहकर रोजी-रोटी कमाने लगते हैं। रांची शहरी ़क्षेत्र में बहुत बड़ी आबादी झुगी-झोपडियों में रहती है। 1994 में झुगी-झोपडियों में रहने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए झुगी-झोपडी संघर्ष मोर्चा बनाया गया। आरएमसीएच क्षेत्र में 35 वर्षो से लोग रह रहे थे। राज्य बनने के बाद इन्हें हटा दिया गया। झुगी-झोपडियों से विस्थापित आबादी कहां चली गई किसी को नहीं पता। रांची रेलवे स्टेशन के आस-पास 8 बस्तियां हैं। गांव से आकर लोग झुगी-झोपडियों में बस गये हैं। राज्य बनने के बाद इन्हें भी हटाने की योजना बनायी गई है। 

पुष्पा-कुटकू डैम विस्थापित

पुराना आंकड़ा के अनुसार 633 परिवार विस्थापित हुए। कुटकू भरना नदी त टपर कुरा, चापिया और पोलपोल गांव था। विस्थापितों के पास रोजगार का साधन अब बीडी पता ही रह गया है। सभी लोग बीडी पता तोडते हैं जो पैसा मिलता है उसी से गुजारा करते हैं। इन साल तो बीडी पता भी नहीं तोड़ पाये। जहां से बीडी पता तोडते थे उस क्षेत्र को सरकार टाईगर प्रोजेक्ट घोषित कर दिया है। हम लोगों को बता भी नहीं चला कि कब टाईगर प्रोजेक्ट घोषित किया गया। हम लोगों तब पता चला-जब बीडी पता तोड़ने आये, तो वन विभाग जंगल में घुसने नहीं दिया। 

विस्थापित परिवार-सामुएल कुजूर, गाब्रिएल कुजूर, मरियानुस कुजूर, अंतु किसान, पसकल खाखा सपरिवार छत्तीसगढ के महाराजगंज में जा कर बसे हैं। एगनेशिया कुजूर कहती है-मेरा परिवार छत्तीसगढ के विजयनगर में बसा है अब यहां भी कनहर डैम से विस्थापित होने वाला है। समझ में नहीं आता-अब हम लोग कहां जाएंगें। 

नोट-विकास के नाम पर राज्य बनने तक 60 लाख से ज्यादा आदिवासी-मूलवासी आबादी अपने जल-जंगल-जमीन से उजड़ चुकी है। राज्य बनने के बाद विस्थापन का दूसरा दौर शुरू हुआ। इस पीडा के शिकार विस्थापितों दर्द है यह। जिससे मैंने अपनी नोट बुक में 2001 में दर्ज की हुं। 

Sunday, September 27, 2026

मुझे एक डायरी मिला-----5 , 6, 7 October 2001

 जिंदगी की डायरी

मुझे एक डायरी मिला-

5 अक्टोबर 2001-

1 फरवरी 2001 को खूंटी जिलो के तपकारा ओपी क्षेत्र में कोइलकारो जनसंगठन ने डेरांग के पास नो-इंट्री गेट लगया था, ताकि कोई भी सरकारी आमदी परियोजना क्षेत्र में आ नहीं सके। इस नो-इ्रट्री गेट को रनिया पुलिस थाना और तपकारा ओपी के पुलिस लोहाजिमी जंगल की ओर गये थे। जाते समय गेट के किनारे से गाडी पार किया। वापसी के समय गेट को तोड़ कर पुलिस वाले अपने गाडी पर लाद कर ले जाने लगे। 

ठसी समय गुटुहाते का अमृत गुडिया डेरांग की ओर से आ रहा था, पुलिस वालों को पूछा-आप लोग क्यों गेट को तोड कर ले जा रहे हैं? लेने से मना करने पर पुलिस वालों ने उससे बंदुक के कुंदे से पीट कर घायल कर दिया। और गेट को अपने साथ तपकारा ओपो लेकर गये। 

यह खबर आग की तरह फैल गयी पूरे कोइल-कारो जनसंगठन के आंदोलन इलाके में। रात को जनसंगठन की बैठक हुई। निर्णय लिया गया-कल 2 फरवारी को तपकारा ओपी का घेराव करेगें। दूसरे दिन 11 बजे से चारों ओर से जनसंगठन के लोग तपकारा ओपी पहुंचें। जनसंगठन ने इस दौरान अपनी मांग रखी-

3-4 हजार लोग जमा थे। धेराव कार्यक्रम शांतिपूर्ण चल रहा थां। लोग मांग कर रहे थे-डीएसपी आए और हमारो मांगों को सुने। साथ ही लिखित मांग पत्र उन्हें सौंपना चाहते थे। 

छो-ढाई बजे तक लोग इंतजार करते रहे। इसी बीच तोरपा के तत्कालीन विधायक श्री कोचे मुंण्डा जी वहां आये। ओपी में गये। लोगों की उम्मीद जगी कि अब हमारी मांग सुनी जाएगी। थोडी देर बाद विधायक जी अंदर से बाहर आये । क्या बात हुआ-लोगों में जिज्ञसा बढी, लेकिन कोई सकारात्मक बात नहीं बनी। 

इसके 10-15 मिनट बाद ओपी की ओर से गोली चलने लगी। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है। वहां जवान से लेकर बुजुर्ग महिला-पुरूष हर उम्र के मौजूद थे। 

चारो तरफ अफरा-तफरा मची। जो भागने सका, वो भागा। पुलिस की गोली से आठ लोग मरे। करीब 25 लोग घायल हुए। देखते ही देखते ओपी के अगल-बगल खून से लाल हो गया। इस गोली कांड को लेकर सामाजिक संगठन इंसाफ ने तय किया जनसुवाई कार्यक्रम करने का। क्योंकि पुलिस का दबाव जनसंगठन पर बढ़ रहा था। लोगों की गिरफतारी के लिए।

इस गोली कांड में जनसंगठन के आठ साथि शहीद हुए। 25 घायल हुए-इस घटनो को लेकर कोइल-कारो जनसंगठन ने पुलिस पर केस किया। दूसरी तरफ पुलिस ने जनसंगठन के 13 साथियों को नमजद आरोपी बनाते हुए केस दर्ज किया। इस घटना का सचाई को सामने लाने और जनसंगठन का साथ देने के लिए इंसाफ ने जनसुनाई करने की योजना बनायी।

5 अक्टोबर 2001 को दिल्ली में एक बैठक बुलायी गयी थी। बैठक में सायलजी ने फोन पर जस्टिस साचर जी से बात की -नोवेबर 1-4 की बीच समय तय करने के लिए। बोम्बे इंसाफ के राजन सिंह से भी फोन पर समय तय करने के लिए बात किये। राजन ने कहा-ठीक है दिल्ली आकर जस्टिस साचर से फाइनल कर लेगें। 

जम्हार गांव से रंथु जी फोन कर बताये-गांव के समस्याओं को लेकर महिला समिति 19 अक्टोबर को कर्रा प्रखंड कार्यालय का घेराव करेगी, कार्यक्रम तय करने के लिए जयश्री 9-10 अक्टेबर को आप के पास रांची आएगी। 

7 अक्टेबर को मसीह दास गुडिय सदर कंन्डुना और विजय गुडिया को फोन कर जनसुनवाई की जानकारी दिये। इसके लिए रांची में 21 अक्टोबर को बैठक भी तय किया गया।

आज दक्षिण अफरिका यात्रा की डायरी निकाली। यात्रा के दौरान स्वेटो, जाहनसवर्ग, दक्षिण अफ्रिका में मिले -स्थानीय समुदाय-काले लोगों पर-चित्रण किये। एक रिपोर्ट तैयार की । अश्वेतों या काले लोगों की जनसंख्या कितनी है। विभिन्न टाउनशीप में रहने वाले 85 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी जी रहे हैं। 20 प्रतिशत घरों में ही बिजली था। यहां बिजली का नीजिकरण हो चुका था। प्रीपेड बिजली के बारे यहीं समझने का मौका मिला था। 

वहां काले लोगों का आंदोलन को समझने का मौका मिला। 1994 के बाद की स्थिति -काले लोगों की क्या थी है? प्रशासन की क्या भूमिका है-आम जनता के प्रति, जनता की क्या आशांए थी। द0 अफ्रीका का 87 प्रतिशत ़क्षेत्र श्वेतों के लिए सुरक्षित रखा गया। लगभग 13 प्रतिशत अश्वेतों के लिए। इस तरह देश के 10-13 प्रतिशत भाग में ही देश की 80 प्रतिशत अश्वेतों की आबादी रहती है। अश्वेतों को बाण्टूस्तान के घने और बंजर इलाकों में ही रहने का अधिकार दिया गया था।

21 अक्टोबर को रांची स्थित विकास मैत्री में जनसुवाई को लेकर बैठक हुई थी। मच पर श्री याकूब कांन्डुलना-बंडआ जयपुर, श्री इमानुएल डहंगा-बंडआ जयपुर, श्री सोमा गुडिया-कालेट थे। 

 जनसुनवाई में जजमेंट टीम में -सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस साचर जी,  सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता श्री संजय पारिख जी, अधिवक्ता सुश्री सुधा भरद्वाज, पीयूसीएल के श्री चितरंजन सिंह, और डॉ0 विनोद रैयना होगें इसकी जानकारी साझा की गयी। बैठक के दौरान जनसुनवाई क्यों जरूरी है इस पर रांची के अधिवक्ता श्री रश्मि कत्यायन जी ने कहा-एक इनक्वारी होता है आवाज को बंद करना,  दूसरा होता है आवाज को हमेशा उठाते रहना। जनता का आवाज को आवाज देने के लिए यह सुनवाई होगा। 

बैठक में जनसुनवाई के मुख्य ंिबन्दुओं का निर्धारित किया गया-1-कोयलकारो परियोजना पर 3-


2-कानूनी पक्ष परियोजना पर

3-सास्कृतिक पक्ष

4-स्वाशासन-पड़हा, पंचायत

5-झारखंड में कोयलकारो परियोजना जरूरी है क्या?

6-कोयलकारो परियोजना पर स्थानिय लोगों का क्या राय है?

7-ग्रामीणों को इससे क्या लाभ होगा

8-नया राज्य बनने के बाद पुलिस फायरिंग क्यों?

सुनवाई की तैसारी के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला का कॉपी निकालना है

2-रांची एक्सआईसेस से परियोजना से संबंधित कॉपी निकालना है-परियोजना पर पहला अध्यायन किया था।

3-मुख्य सचिव से मिलना है

4-सुधीर प्रसाद को बांध बनाने की जिम्मेवारी दी गई थी-उनसे बात करना

5- ग्रामीण एसपी से मिलना

6-रिपोर्ट-हिंन्दी और अंग्रेजी में बनाना

यह मैंने अपनी नोट बुक जो 2001 में लिखि थी, उसका रिपोर्ट है।

1995 से मैं सामाजिक काम में हुं। मेरी आदत थी प्रत्येक दिन का डायरी लिखना। आज मेंरे पास हजारों नोट बुक है। मैने अपना नोटबुक या डायरी कभी नहीं बेची या हटायी।

आज सुबह मेरा हाथ एक छोटा नोट बुक पर पडा। खोली -4-5 पेज पलटी। मन किया आप लोगों से साझा करने का। नोट बुक में नोट की गयी मुददे को गहराई से आज के संदर्भ में सोचने लगी, तो लगने लगा झारखंड राज्य बने 26 साल हो गये। लेकिन आदिवासी-मूवलवासी या मूल झारखंडी अब भी विस्थापन, जंगल, जमीन का लूट, बेरोजगारी, हर स्तर पर शोषण दमन का शिकार हो रहे हैं। फिर भी उम्मीद के साथ संघर्षरत हैं। 


Saturday, September 26, 2026

मोदी की चिंता अपने प्रिय मित्र अडानी अंबानी का केवल है


 केंद्र की मोदी सरकार इस देश की सारी संपत्तियों को अपने प्रिय मित्र अडानी और अंबानी जैसे अरबपतियों के हाथ में सौंप दिए.
 

भाजपा की सरकार चाहे वो राज्य में रही हो या केंन्द्र मे ंहमेशा अमीरों की चिंता करते रही है। झारखंड में 2014 से 2019 तक बीजेपी की सरकार थी। मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास थे । तब राज्य की महिलाओं को जो 50 लाख कीमत तक का जमीन खरीदी, जमीन का रजिस्ट्री मात्र एक रूपया कर दिया।

 भाजपा की सरकार चाहे वो राज्य में रही हो या केंन्द्र मे ंहमेशा अमीरों की चिंता करते रही है। झारखंड में 2014 से 2019 तक बीजेपी की सरकार थी। मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास थे । तब राज्य की महिलाओं को जो 50 लाख कीमत तक का जमीन खरीदी, जमीन का रजिस्ट्री मात्र एक रूपया कर दिया। 

ं 50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूपया मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास ने राज्य के सामृद्व महिलाओं को लाभ पहुुचाने के लिए भू-राजस्व एवं निबंधन विभाग के माध्यम से 50 लाख कीमत की जमीन खरीदने पर 1 रूप्या में जमीन की रजिस्ट्री करने की व्यवस्था लायी। 

इस व्यवस्था के बाद हर साल 70 महिलाएं इसका लाभ उठाते रहीं। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं एक रूप्या में जमीन, मकान, प्लैट का रजिस्ट्रेशन करायी। 2 लाख से अधिक रजिस्ट्री की गयी। इससे राज्य को 1296 करोड़ राजस्व का नुकासान भी उठाना पड़ा। 

कोरोना काल में वर्तमान हेमंत सरकार ने इस व्यवस्था फिर से वापस लिया। तर्क दिया गया कि इस व्यवस्था के तहत गरीब महिलाएं लाभ नहीं ले पा रही हैं साथ ही राज्य का राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। इसी को देखते हुए राज्य की गठबंधन सरकार ने इस व्यवस्था को वापस लिया। 

5 सितंबर 2019 का तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने टवीट किया था-झारखंड देश का पहला राज्य है जहां महिलाओं के लिए 50 लाख रूपया तक की जमीन , मकान की रजिस्ट्री सिर्फ एक रूपये में होती है। अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा महिलाएं बन चुकी हैं मकान मालकिन। 

जानकारी के लिए-देश के बाकी राज्यों में भी महिलाओं को रजिस्ट्री में कुछ प्रतिशत की छूट मिलती है-उदाहरण के तौर में-दिल्ली में 4 प्रतिशत स्टाम्प डयूटी देनी पड़ती है। यूपी में महिलाओं द्वारा जमीन खरीदने पर सिर्फ एक (1) प्रतिशत ही स्टाम्प डयूटी में छूट दी गयी है। 

23 मार्च 2021 को राज्य सरकार ने महिलाओं को 1 रूप्या में जमीन रजिस्ट्री में छूट देने से राज्य सरकार को 400 करोड़ का नुकसान बताया। राज्य के पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पिछली सरकार ने महिला के नाम से जमीन रजिस्ट्री कराने कर छूट दी थी, इससे राज्य को करीब 400 करोड़़ रूप्ये राजस्व का नुकसान हुआ था। वह रजिस्ट्री शुल्क भी देने में सक्षम होता है। यह सिर्फ जमीन लूटने की षडयंत्र के तहत किया गया था। 

जो भी नये-नये व्यवस्था जमीन संबंधित लाये गाये पिछली रघुवर दास की सरकार के द्वारा उसका समीक्षा होनी चाहिए कि आदिवासी, मूलवासी, दलित और मेहनत मजदूरी करने वाला परिवार को कितना लाभ मिला?। इसकी सूची सरकार को जारी करना चाहिए, तभी सामाजिक न्याय की बात हो सकती है। 

-23 मार्च का प्रभात खबर में विधायक सरयू ने बयान दिया था कहा था-कि राज्य में कई स्थानों पर सरकारी जमीन पर लोग वर्षों से रहते आ रहे हैं, उनकों सरकार से सुविधाएं भी मिल रही है। ऐसे जमीन को नियमित करना चाहिए। इनके अनुसार जमशेदपुर में कई इलाके ऐसे हैं नियमित करने का कोई नियम बना लेना चाहिए, इससे सरकार को बड़ी संख्या में राजस्व मिलेगा। 

2014 से 2019 के बीच राज्य की कल्याणकारी सरकार आखिर अमिरों को ही क्यों सस्ते दर में जमीन दी?

बाबा रामदेव को रघुवर सरकार ने 101 रूपये की टोकन मनी पर 15 एकड़ जमीन नमकोम प्रखंड के बरगांवा में दिया है। यह कहा गया कि यहां स्कूल खुलेगा, जहां गरीबों के बच्चे पढ़ेंगे। लेकिन सचाई को क्या है, यह जांचने की जरूरत है। 

Friday, September 25, 2026

झारखंड का मात्र 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रहा है। यह देश के लिए अच्छी नहीं हो सकती है लेकिन झारखंड के जनआंदोलनों की ताकत को दर्शाता है।

 23 सितंबर 2026 को प्रभात खबर में नीति आयोग की एक विशेष रिपोर्ट के बारे में छपा है जिसमें कहा गया है कि गैर-कोयला खनिज उत्पादन में झारखंड का मात्र 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रहा है। यह देश के लिए अच्छी नहीं हो सकती है लेकिन झारखंड के जनआंदोलनों की ताकत को दर्शाता है। 


यहां-नीति आयोग ने अपना विश्लेषण इस तरह दिया है-रिपोर्ट-धातु गैर-कोयला खनिज कारोबार का किया गया विश्लेषण-


नीति आयोग की सितंबर 2026 में प्रकाशित ट्रेड बाूच क्वार्टरली (अप्रैल से जून 2026) रिपोर्ट में भारत के धातु एव खनिज (गैर कोयला) अयस्क कारोबार का विश्लेषण कियागया है। रिपोर्ट में देश के कुल खनिज उत्पादन में झारखंड की हिस्सेदारी 3.6 प्रतिशत रही है। राज्य का प्रमुख योगदान बॉक्साइट, लौह अयस्क, तांबा, अयस्क और ग्रेफाइट के उत्पादन में दर्ज किया गया है। जबकि ओडिशा का सबसे अधिक योगदान 38.4 प्रकाशित है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का खनिज उत्पादन कुछ राज्यों में केंन्द्रित है। ओडिशा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और महाराष्ट्र मिलकर देश के कुल खनिज उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं। झारखंड का उल्लेख खनिज संपदा वाले राज्यों में किया गया है। 

खनन ़क्षेत्र में निवेश और उत्पादन बढ़ाने की चुनौती-रिपोर्ट में देश के खनन क्षेत्र के सामने र्प्यावरण और वन मंजुरी में देरी, भूमि अधिग्रहण की चुनौतियों तथा नीलाम किये गये खनिज ब्लॉकों को चालू करने में लगने वाले समय को संरचनात्मक बाधाओं के रूप में रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट में खनिज नीलामी प्रक्रिया को तर्कसंगत बनाने, खनन परियोजनाओं के संचालन में तेजी लाने और खनिज ब्लॉकों को निर्धारित समय सीमा में चालू करने जैसे उपाय बताये गये हैं। रिपोर्ट में खनिज उत्पादन बढ़ाने में आ रही बाधाओं का जिक्र किया गया है। जो झारखंड समेत अन्य राज्यों के लिए सुझाव दिये गये हैं। 

ये कारण बताये गये हैं-

1-पर्यावरण और वन मंजूरी में हो रहा है विलंब

2-भूमि अधिग्रहण की चुनौती

3-नीलाम खनिज ब्लॉकों को चालू करने में बिलंब

4‘-खनिज नीलामी प्रक्रिया में सुधार, तर्कसंगत बने संचालन में तेजी लावें

5-देश के खनिज कारोबार में बढ़ रही आयात निर्भरता। 


खनिजों के राष्ट्रीय उत्पादन में राज्यों का योगदान

राज्य देश में कुल खनिज उत्पादन में हिस्सेदारी खनिजों को योगदान-प्रतिशत में

ओडिशा---- 38.4 प्रतिशत क्रोमाइट-100, बॉक्साइट-72.5

                  लौह अयस्क-55.6

                  ग्रेफाइट-39.6

                   मैगनीज अयस्क-16.05

राजस्थान ---23.2 प्रतिशत सीसा-जस्ता-100

                 सेलेनाइट-100

                  गार्नेट-100

                  सिलिसियस अर्थ-100

छत्तीसगढ ---13.5 प्रतिशत टिन-100

                    लौह अयस्क-15.1

                   बॉक्साइट-4.3


कर्नाटक--- 10.1 प्रतिशत मैगनीज-16.1

                 लौह अयस्क-15.6

                  बॉक्साट-4.3

महाराष्ट्र--- 5.4 प्रतिशत कयनाइट-100

 ाि           लिमेनाइट-100

                फलोराइट-32.9

                मैंगनीज अयस्क-30.3

                  बॉक्साइट-4.6

झारखंड---- 3.6 प्रतिशत बॉक्साट-7.5

                         लौह अयस्क-6.6

                          तांबा अयस्क-3.2

                            ग्रेफाइट-0.4

मध्यप्रदेश --2.4 प्रतिशत तंबा अयस्क-76.6

                  मैगनीज अयस्क-26.1

                   फॉस्फोराइट-20.2

                     लौह अयस्क-2.3

आंध्र प्रदेश--- 1.0 प्रतिशत मैंगनीज अयस्क-11.3

                     लौह अयस्क-1.01

                     अन्य-2.4


इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड के आदिवासी -मूलवासी समुदाय अपने जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण के साथ अपने हक-अधिकारों की रक्षा के लिए अधिक सचेत और संर्घषशील हैं। इसका श्रेय झारखंड के सभी जनआंदोलन को जाता है।  

झारखड के तीन-चार जनआंदोलन हैं जो अपने जीत का संदेश विश्व तक पहुंचा दिये हैं। जनआंदोलनों के जीत का मूल मंत्र था आदिवासी-मूलवासी समुदाय की सामूहिक शक्ति जो जाति, धर्म और राजनीति से उपर उठकर खड़ी संगठित ताकत थी। इन जनआंदोलनो मे मूल रूप से कोइल-कारो जनसंगठन-गुमला, रांची-खूंटी। केंन्द्रीय जनसंघर्ष समिति-पलामू, गुमला। आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच-खूंटी, गुमला। भूमि रक्षा संघ-पूर्वी सिंहभूम, मानकी-मुण्डा संघ-पश्चिमी सिंहभूम,  भूमि सुरक्षा मच-संताल दिशुम, काठीकुड। इसके साथ ही गांव स्तर पर संताल परगना, कोल्हान, मुंण्डारी खूंटकटी क्षेत्र, ाहित पूरे राज्य में सक्रिय हैं। 

विकास के नाम पर राज्य में अब तक करोड़ो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय विस्तापित हो चुके हैं। 20 लाख जमीन विकास के नाम पर विभिन्न कंपनियों और परियोनाओं में जा चुकी है। इन विस्थापितों मे से 10-12 प्रतिशत ही किसी तरह से मुआवजा दिया गया है। बाकी विस्थापित आबादी रोजी रोटी के लिए दूसरे राज्यों में पलायन किया। कुछ राज्य में ही बेघर-बार होकर दर-दर में ठोंकरे खाने को मजबूर हैं। विकास और विस्थापन का सच को समझने के बाद आज झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान अपना विरासत की रक्षा जींदगी मूल लक्ष्य मानते हैं। 


Thursday, September 24, 2026

SIR आज की खबर


 

झारखंड में, SIR

जोहार 
SIR  आज के अखबार की रिपोर्ट

 

गांव में......

सभी Sathiyon ko Mera Jharkhandi Johar

इस पेड़ को आप लोग पहचाने है? अगर जानते है तो नाम बताइये 
गांव में ईमली 
के नीचे ही  बैठक होती है 




 

Wednesday, September 23, 2026

 Hamari Gramin arthvyavastha Jal Jungle Jameen per hi Tika Hua Hai Bachpan Se Hi Hamare bacche Hamare Arthik vyavastha ka hissa Ban Jaate Hain. jabki Bade amiron ke bacche acche Shiksha prapt karne ke liye school ke bad tution padhte Hain, aur Hamare bacche school se Laut Ke bajaron mein apna रोजी-रोटी ki vyavastha Karte Hain.






Tuesday, September 22, 2026

करम त्योहार को कई तरह से मना सकते हैं। मैंने करम त्योहार को अलग तरह से जीया हैं-इससे आप लोगों को साझा कर रही हुं।

 करम त्योहार को कई तरह से मना सकते हैं। मैंने करम त्योहार को अलग तरह से जीया हैं-इससे आप लोगों को साझा कर रही हुं। 

आदिवासी समाज आज कई तरह के सवालों के घेरे में स्वंय को खड़ा पा रहा है। हम कभी हम ही मना सकते हैं सरहूल तुम नहीं। तो कभी हम ही मना सकते हैं करम त्योहार तुम नहीं। हम असली आदिवासी-तुम नकली। यह मौसम करम त्योहार मनाने का है। हिन्दू धर्म की अस्था में सभी तरफ पुजा पंडालें सजने लगी है। भारत देश की संविधान सभी जाति-धर्म को अपना अस्था से किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता देता है। कमडारा अरहरा गांव आदिवासी भूईहरी ईलाका है। जो गुमला, पालकोट, बसिया, सिसई, सिसई से सटा क्षेत्र है। जो आदिवासी इतिहास में ढोंयसागढ क्षेत्र में था। यह ईलाका पालकोट राजा और जरिया राजा का प्रभाव क्षेत्र रहा है। जहां जमींदारों का बोल-बाला था। यही कारण है कि यहां सदरी भाषा /नागपुरी का जब्रजस्त प्रभाव रहा है।  मुंण्डा आदिवासी समाज कोई गांव राईज करम मनाते हैं, तो कोई गांव ढिढरा करम। करम के मौसम में गांव-गांव अखड़ा में करम की तैयारी में मांदर की आवाज से समूचा आदिवासी इलाका गुंज उठता था। दिनभर खेत में काम करने, गाय-बकरी चराने के बाद खाना खाने के बाद गांव के युवक मांदर लेकर अखडा पहुंचते थे। बस एक मांदर की आवास, देखते-देखते सभी टोला-महला से युवक मांदर के साथ अखडा में हाजिर। अब मांदर की गुंज सभी को अखडा में खिंच लाता।

याद है करम नाच के हर स्टेप के अपना गीत और लय होता है।  मांदर के हर थाप का अपना ताल, होता है। मांदर के हर थाप के साथ गीत के राग-लय अलग-अलग होता है। मांदर के ताल के साथ नाच रही महिलाओं के गीत लय में पूरा गांव सराबोर रहता है। सभी गीत व्यक्ति, समाज के साथ पूरी आदिवासी सामुदायिक जीवन शैली को संबोधन करता है। जो एक व्यक्ति को दूसरे जोड़ता है। गीत का हर शब्द -हर बोल और लय एक समाज को दूसरे से जोडता है। आदमी को पूरे प्रकृति और पर्यावरण से जोडता है। कोई उंच-नीच नहीं। सभी गीत अपने इतिहास, घटनाओं और प्रकृतिक जीवन मूल्यों को अभिव्यक्त करता है। जो आदिवासी समुदाय के जंगल-झाड़ी को साफ करने, गांव बसाने के साथ जंगल-जमीन पर अपना खूंटकटी हक का याद दिलाता है। 

करम गीतों में जीवंत आदिवासी जमीन शैली-

गुमला जिला के कमडारा प्रखंड के अरहरा गांव मुंडा आदिवासी बहुल गांव है। जो चटकपुर, करंजटोली, भादुल टोली, ठिकेदार टोली और बजार टोली और बड़का टोली इन 6 टोलों में फैला हुआ है। बडका टोली और करंज टोली के बीच से रांची-राउरकेला रेलवे लाईन गुजरती है। करम अखड़ा बडका टोली में है। मेरा जन्म बड़का टोली में हुआ। अरहरा गांव में पहले जमींनदारों का बोल-बाला था। उनके नाते-रिस्तेदारों में चीक-बडाईक परिवार को माना जाता था। इसी में चैकीदार और ओहदार भी होते थे। 

बाजार टोली में घांसी-बजनिया परिवार रहता था। यहीं एक लोहरा परिवार भी थां। दो-तीन परिवार झोरा -नाविक थे। बड़का टोली में एक परिवार हरियर का था। जिसके साथ गांव के सदान और मुंण्डा परिवार छुआछूत मानते थे। मुंण्डा आदिवासी समुदाय का करम अखड़ा से सटा हुआ उत्तर दिशा में हिरयर बुढा का घर था। अखडा से सटा पश्चिम दिशा में मोहन चीक बड़ाईक का घर था। अखडा से सटा -पश्चिम-दक्षिण कोणा में मेरा परिवार-बोयसा और जुरा बरला का घर। अखडा से सटा ठीक दक्षिण में लादूरा का घर। 

इन सभी परिवार का आंगन करम अखडा ही था। अखडा के किनारे एक हरियर बुढा के आंगन की सीमा पर बड़ा सा ईमली पेड़ अभी भी है। अखडा के पूरब-दक्षिण में डुगरू पाहन का घर सीमा पर दूसरा ब़डा ईमली पेड। दोनों पेड के नीचे एक-एक बड़ा पत्थर का बिछा बेंच था। जहां सभी आकर बैठते थे। करम के मौसम में पूरा अखडा बच्चे, युवक-युवातियो, महिला-पुरूष, बुढे-बुढियों से भरा होता। रात भर मांदर की गुज और गीत से पूरा गांव गुंज उठता था। 

मुझे याद है- मांदर बजाते आबा  गीत गाया करते थै-

1-बोने के बोने में 

झालि मिंजुरा...रे

 बोने के बोने में..2

झालि मिंजूरा रे 

बोने में झालिया मिंजूर रे 

सोभाय रे...

बोने में झालिया मिंजुर सोभाय....2

(जंगल-जंगल में मोरपंख फैलाया मोर पंक्षी

ज्ंागल मोर पक्षी से ही सोभायमान है )


मां हमेशा गुनगुनाती थी-करम गीत। निश्चित रूप आज मैं महसूस करती हुं मां मेरे लिए ही गाती थी। गांव के सीमा पर कारो नदी जब बरसात में भर जाता था-नदी पार करने के लिए झोरा -नाविक अपने नाव पर लोगों को पार करते थे। 

1-एके गोटन बेटी

कोईल पारे दियालों

गुनी...गुनी......

को0 -गुनी...गुनी निंदों नहीं आवाय...

हायरे दाईया.....गुनी गुनी निदों नहीं आवाय..

2-हारे पार काइर देरे रे 

झोरा रे भाईया ... गुनी...गुनी

गुनी  2

गुनी-बुझी निंदो नहीं आवै


2-हारे पार काईर देरे 

झोरा रे भाईया

डाली टाका -डाली टाका 

फिराईयो देबुं हारे दाईया...2

(सार है-एक ही मेरी प्यारी बेटी है। उसको कोईल नदी के उस पार शादी दिये हैं। बरसात में नदी भर गया है। बेटी का याद दिन-रात सता रहा है। हे नाविक भाई आप नदी पार कर दीजिए, आप को पार करने का कीमत चुका देगें)


करम मौसम मे दोपर को गाय-बकरी  चराने वाले और खेत में काम करने वाले युवक खाने के लिए घर लाने के बाद युवक मांदर बजा कर अपनी थकान मिटाते, मनोरंजन करते थे। मांदर की आवाज सुन सभी जान जाते थे कि फलाना आ गया है। ंहमेशा गीत सुनती थी-

1-मांदर जे किनाले लालू भैया रे...

 जानी किनाले के लगी...रे 

जानी किनाले के लागी...

2-से मांदर फंुटी गेलैंय लालू भाईया रे

जानी मोराले के लागी...रे 

जानी मोराले के लागी

गांव का जमीन साहुकारों द्वारा छीन लेने के बाद बाबा लापा गांव में धांगर-नौकर हो गया। मां और मझिला भाई रांची चले आये। मां पंजाबी परिवार में दाई का काम करने लगी। भाई रांची में कुली का काम करने लगा। मैं भी 8वी पास कर रांची आ गयी। संत मारग्र्रेट हाई स्कूल में नाम लिखायी। 10वी क्लास मेे छात्रवृति मिला था। बिजय दादा गांव में अकेले था। छात्रवृति के पैसा से मैंने दादा के लिए गुमला मांदर खरीद दी थी। वह उसे बजाया करता था। जब भी मैं गांव आती थी तो मांदर को खुद भी बजाती और बादा को भी बजवाती थी। 

सभी गांवों में अखडा ईमली पेड के पास ही होता था। अरहरा में अखडा के किनारे दो बडा-बडा ईमली का पुराना पेडं अभी भी है। करम मौसम में अकसर ही बारिश होता है । बारिश भी रिझवारों को रोक नहीं पाता है। मांदर की गुंज के साथ गीत .लोग झूमने लगते

1-..रिमिझिमि  तेतारी छाईयां....

ना हारे धिरे चालू ...

रासे चलो मदोना....ना हारे धिरे चालु

रासे चलु....

सार - रिमझिम बारिश हो रहा है...ईमली गाछ के नीचे अखडा में अस्तिे-झुमते हम नाचें।

 बहन-भाई का अटुट प्यार करम गीत में-

गोडे का झोटिया

गिर पार...लक 

दादा हेरालों-2

हाय-हाय खोईज लाइन दे दादा

बिझ-लाइन दे दादा हेरालों-2

सार-मेरा पैर का छुटिया-बिझिया कहीं गिर गया है, खो गया है। दादा-बडा भाई आप खोज कर ला दीजिए, मेरा बिझिया कहीं गिर गया हे। 

गांव के धान के खेतों में पहले खखडा और मच्छली बहुत होते थे। बारिश अच्छी होती थी। खेतों और नाला -डोफा में साफ पानी बहते रहता था। पानी में छोटी मच्छलियां झांड में इधर-उधर तैरते खेलते रहती थी। इससे करम गीत में गाते हैं--

1-बुदु रे बुदु मझाइर

बुदु मछाइर समधिन 

जेराय रे

बुदु मछाईर समधिन जोराय

--

ब्रसात दिनों में गांव में बहुत तरह का साग-पात स्वतः खेतों में उग आता है। कुछ गोडा-मडुआ खेत में लगाया जाता है-जो गांव के लोगों के लिए पौष्टिक आहार है-इसे भी करम गीत में गाते हैं-

साग तियन लुटुर पुटुर

बरी तियन छोरे छोरे रे

बरी तियन छोरे छोर

--

आदिवासी गांव जंगल-पहाडो की तराई में बसा हुआ है। इस प्रकृतिकमूलक जीवनशैली का अंग साथ रचंे-बसे सभी समुदाय हैं। जिनका रिस्ता करम गीत में भी गाते हैं-

1-कोईलो किनारे बसाले हो राजा

कोईलों किनारे बसाले हो राजा

कोईलो निरामाला सोभाए रे

कोईलो निरामाला सोभाए-2

2-काठ केरा डोंगा

बंांस केरा डांग रे-2

झोरा भाईया रिझे 

डोंगा चलाऐ रे झोरा भाईया

रिझे डोगा चलाए-2


जब मेरी मां रांची शहर आ कर रोटी के लिए पंजाबी परिवार में आया का काम करती थी। उनके मलकिन ने एक पुराना लाइलुन साडी दी थी मां को। जो एक-दो जगह थोडा फटा हुआ था।  मैं पहली बार करम के दिन उसी साडी को पहन कर अखडा में अपने साथियों के साथ करम नाची थी। साडी बार बार फिसल रहा था और पैर फंस जा रहा था। मन में खुशी था कि मैं भी साडी पहनी हुं। 

रात भर करम नाचने के बाद सुबह गांव की सभी महिलाएं अपने अपने घर से कांसा लोटा में पानी, साल का ताजा दतुवन, साल पत्ता पर मोड कर भांप में पकाया धान की रोटी, साल पाता में सिंदुर और धवन लेकर अखडा मे ंआयी। मां रांची में थी। मा के बदले मुझे ही करम राजा के लिए उपरोक्त सारा चीज लायी। महिलाएं जैसे जैसे कर रही थी मैं सेवा की। 


ग्लाॅशोप मेमोरियल उच्च विद्यालय कमडारा से आठवीं क्लास पास करने के बाद मैं रांची आ गयी। कारण की घर में बहुत दिक्कत था। मां ने मेरा एकमिशन नौंवीं क्लास में संत माग्रटेस बालिका विद्यालय में करा दी। आॅक्टोबर का महिना था।  स्कूल में नमाही परीक्षा चल रहा था। जिस दिन मेरा परीक्षा खत्म हुआ, उसी दिन मेरा गांव अरहरा में करम त्योहार था। 

4 बजे स्कूल से निकलने के बाद मैं सुशील दादा से जिद करने लगी-चलो गांव करम के लिए। मेरे जिद के सामने दादा मजबूर थे। हम दोनों गांव जाने के लिए खजूर तालाब के पास आए। पता चला सिमडेगा की ओर जाने वाली अभी कोई गाडी नहीं है। फिर भी मैं जिद कर रही थी -जाएगें ही। रांची से राउरकेला रेलवे लाईन से पासिंजर ट्रेन और मालगाडी आती-जाती है। हम लोग राउरकेला पेसेंजर गाडी से हमेशा बकसपुर स्टेशन पर चढ़ कर हदिया आते थे। हटिया से रांची बस से  आते थे। मैं कभी बस रोड़ से यात्रा नहीं की थी। यह भी पता नहीं था कि कितना -कितना बजे बस गाडी तोरपा की ओर जाती है। 

थोडी देर में एक टेकर आयी ।हम दोनों गाडी पर चढ कर खूंटी पहूंचे। हम दोनों शायद नीचे चैक में उतरे। वहां से आगे जाने के लिए कोई गाडी नहीं था। हम दोनों पैदल थोडा दूर गये ।अंधकार हो चुका था। खूंटी की ओर से गाडी आने की रोशनी दिखाई दी। हम दोनों रूक कर इंतजार करने लगे। गाडी सामने पहूंची। वह बडां बंद गाडी था। लिखा था-डेंजर। हाथ दिये-गाडी रूकी।

 हम दोनों को पूछा कहां जाओगे। बताये पोकला जाएंगें। बोला आओ कहते गाडी का दरवाजा खोल दिया। गाडी पर चढे सामने डाईभर के पास। गाडी में दो पुरूष थे, एक गाडी चला रहा था और एक उसके पीछे लंबा सीट पर बैठा थां। पीछे बैठा था वह कम उम्र का था।

गाडी अहिस्ते अहिस्ते चल रहा था। करीब आधी रात को पकना पहुंचे होगें। गाडी रूक गयी। वो लोग बोले हम लोग खाना खा लेगें। दोनो उत्तर गये ।हम दोनों गाडी में बैठे रहे। करीब एक-डेढ घंण्टा के बाद एक आदमी आया और बोला आप दोनों को खाने के लिए बुला रहे हैं। हम दोनों नहीं गये। थोडी देर बाद दो प्लेट में रोटी और मीट एक लडका लेकर आया। हम दोनों तय कर लिए थे कि कुछ नहीं खाना है। 

प्लेट हम दोनों नहीं लिए। थोडी देर बाद दोनों वापस आये। गाडी चलना शुरू हो गया। दस-बादह मिनट के बाद गाडी चला रहा व्यक्ति उसका साथी को बोला, लो अब तुम गाडी चलाओ। पीछे बैठा लडका आगे गया और चलाने लगा। पहले जो चला रहा था वह पीछे आ कर बैठ गया। अब मेरे बगल आकर बैठ गया। हम दोनों को अभास हो गया था। दादा किनारे दरवाजा के पास बैठा था मैं बगल में थी। 

हम दोनों उन लोगों का मानसिकता को समझ गये। दादा बोला मुंण्डारी -अपना भाषा में। तुम इधर घसको दरवाजा के तरफ, मैं उधर घसक गयी। दादा मेरे तरफ आ गया। वा आदमी दादा से बोलने लगा-तुम अपनी बहन के मेरे हवाले कर दो, नही ंतो ठीक नहीं होगा। मेरे के नीचे दो-तीन लोहा का तलवार की तरह हथियार था दिखाते हुए बोलने लगा जब जरूरत होता है तो इसका इस्तमाल करते हैं। 

पीछे बैठा आदमी बोला-गाडी रोको, गाडी आगे नहीं जाएगी। गाडी रूक गया। दादो एक हाथ से गाडी का दरवाजा खोल कर मुझको गाडी से नीचे ढकेल दिया। मैं नीचे उतरते ही आगे की ओर भागने लगी। मेरे पीछे दादो भाग रहा था। पूरा अंधकार था। रास्ता भी अनजान था। हम दोनों थोडी दूर भागे ही थे कि गाडी स्र्टाट कर लाईट मारते हम दोनों के पीछे आने लगा। हम दोनों को पकड लेगा यह दिमाग में आते ही दादा बोला-चलो धान खेत में घुसो।

रोड के दहिनी ओर धान का खेत था। रोड से ही धान खेत में कुद गये। खेत रोड के किनारे ही था लेकिन बहुत नीचे था। जैसे ही धान खेत में मैं छलांग लगायी, मेरा सिर नीचे ओर पैर उपर मेंड के सहारे खडा हो गया। गाडी करीब आ रहा था। मन में डर था मेरा पैर को देख लेगा। मैं धान का पौधा का मजबूती के साथ पकडी और नीचे कादो माटी में पैर जमा कर पानी खेत में खडी हो गयी। मेरा पैर का चप्पल पैर से अलग हो चुका था धान खेत में। 

धान के पौधा मेरे सिर से उंचा था। खेत के नाला से बहता पानी का आवाज आ रहा था। धान खेत के अंदर अंदर बढते हुए खेत के दूसरी छोर मेंड पर पहुंचे। दादा ने अहिस्ता से आवाज दिया-किधर हो रे। मैं जवाब दी-इधर हुं। रोड से दो -तीन खेत आगे निकलने के बाद हम दोनों मिले। मेंड के सहारे कई खेतों को पार कर टांड में पहुंचे जो रोड से आधा कोस दूर होगा। टांड में पहंुंचते ही पूरब दिशा में चांद पूरी रोशनी के साथ आकाश में दिखाई दिया। चांद की रोशनी मे ंहम दोनों रोड़ से दूर अनुमान से पोकला गांव की ओर बढ़े। 

हम दोनों एक छोटा नाला के पास पहुंचे। नाला में पानी बह रहा था। नाला के उस पार उंचा ढलान था। ढलान चढ़ते समय बार बार फिसकर नीचे चली जाती थी। लाल गुडगुड पत्थरीला ढलान था। खाली पैर पर गुडगुड कंकड के घर्षण से थोड़ा लहर महसुस होने गया था। बहुत प्रयास के बाद एक कांसी का पौधा पक डपायी। इसके सहारे उपर चढ गयी। थोडा दूर चलने के बाद लगा अब हम दोनों पोकला सीमान पहुंच गए हैं। अब खतरा से बाहर महसूस करने लगे। रेलवे स्टेशन के पास पुराना बाजार टांड पहुंचे ही थे कि मुंर्गा के बांक की आवाज सुनाई दी। अब सुरक्षित गांव पहुंच सकते हैं। 

पेकला से रेलवे लाईन के किनारे के रास्ते सोनमेर होते हुए बदु गढहा पहंुचे। सोनमेर से ही मेरे गांव के करम अखड़ा के मांदर की आवाज सुनते ही गांव की तरफ कदम और तेजी से बढ़ने लगा। गांव सीमा पहुंचते ही दूसरा मुर्गा की बांग सुनाई दी। हम दोनों लाईन किनारे बड़ा जीतिया पेड़ होते हुए अरहरा दोहर पार कर पाहन सबका आम -कटहल धाईर के रास्ते गांव पहुंचे। अखड़ा रास्ता से ही घर पहुंचे कारण कि यही एक रास्ता है घर तक आने के लिए। 

अखड़ा मे ंहम दोनों नहीं रूके, सीधे घर चले गये। घर का बाहर दरवाजा बांस का पटरा का था। हम दोनों उसे हटा कर अंदर गये। विजय दादा को आवाज दिये वह सोया नहीं था। उठ कर ढिबरी जलाया। बिजय दादा-अभी इतना रात को कहां से आ रहे हो। हम दोनों रांची से इतना ही बोल पाये। तीनों भाई-बहन बैठे। थोड़ी देर में जोलेन दादा जो अखड़ा में था, वह भी घर आ गया। हम दोनों कुछ नहीं बताये। थोडी देर बाद सभी अखड़ा चले गये। सुबह मैंने करम का सेवा में मां की भूमिका पूरी की।  

जब ये घटना का सामना किये, तब पता नहीं था कि वो जगह कहां था। किस जगह -किस धान के खेत में छलागं लगा कर भागे थे। किस रास्ता से पोकला तक पहुंचे थे। बाद में जब भी उस रोड से गुजरते म नही मन उस जगह की पहचान करने की कोशिश करते। लेकिन वो टांड का पेड़ अच्छी तरह याद था। 2008 में जब अर्सोलर मित्तल कंपनी कमडारा-तोरपा क्षेत्र में कारखाना लगाने के लिए करीब 40 गांवों को हटा कर स्टील कारखाना लगाना चाहता था। इसके विरोध में मैं गांव वालों की अगुवाई कर आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच का गठन कर गांव-गांव लोंगों को जागरूक करने घूम रही थी। तब उस जगह को पूरी तरह पहचानी। वो जगह है-टुरूंडु गांव। रोड के बांयी ओर बड़ा से तालाब हैं जिसका पानी दाहिनी ओर खेतों में बहते हुए आगे नाला में मिल जाता है। वहीं आगे टांड में एक बड़ा से बढ का पेड है जो आज भी खड़ा है। हमेशा मै उसे निहारते आती जाती हॅु। कंरम त्योहार मेरे जिंदगी में एक बड़ा यादगार छोड़ के गया हैं। प्रत्येक वर्ष करम के मौसम में अपने बड़े भाई सुशील, बिजय, जोलेन, बाबा-जूरा और मा हिसिया की याद में भावुक हो जाती हूं। 

 हजारों लोक गीत हैं-जो हम सबको एक दूसरे से जोड़ता है, जो प्रकृति और पर्यावरण की गोद में बांधे रहने का सुखद अनुभुति प्रदान करता है। आज विकास के नाम पर हमारे खेत में, जंगल, जमीन में यही नहीं पूरी जीवनशैली में पूंजीवाद, वैश्वीकरण हावी हो गया हैं। जो हमें एक दूसरे से अलग कर रहा है, प्रकृति और पर्यावरण से अलग कर रहा है। परिणाम सामने है-हम अपने इतिहास और सामुदायिकता के जीवनशैजी के मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। हमारीे संगठित ताकत विखरते जा रही है। इससे आदिवासी समुदाय के साथ सभी को नुकसान हो रहा है। जगल-जमीन से हमें बेदखल किया जा रहा है। जंगल-पहाड उजाडे जा रहे हैं। सरना, अखड़ा, ससनदीरी, जाहेरस्थान, देशावली सभी विकास के नाम पर उजाड दिये जा रहें हैं। इसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। मै मानती हुं-जल-जंगल-जमीन की रक्षा हम करेगें, तभी हमरा गांव-समाज बचेगा, हमारा इतिहास-भाषा-सास्कृति और करम त्योहार, सरहूल त्योहार भी बचेगा। 


Thursday, August 13, 2026

लोकसभा में बुधवार को विपक्ष के जोरदार हंगामें के बीच खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक 2026 पारित कर दिया गया।

 नई दिल्ली/रांची, हिन्दुस्तान टीम एवं प्रभात खबर की रिपोर्ट

देश में खनियों और खनिज युक्त भूमि पर राज्य सरकारें अब अतिरिक्त कर, उपकर-संस या किसी भी तरह का अन्य शुल्क नहीं लगा सकेगी। लोकसभा में बुधवार को विपक्ष के जोरदार हंगामें के बीच खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक 2026 पारित कर दिया गया। इस विधेयक के जरिये केंन्द्र सरकार ने राज्यों की शुल्क लगाने की शक्तियों को समाप्त कर दिया है। इसका व्यापक असर झारखं डमें भी पडेगा। 

बुधवार को लोकसभा में विपक्षी दलों को हंगामा जारी रहने से दोपहर दो बजे एफसी आरए विधेयक संयूक्त संसदीय समिति को भेजने का प्रस्ताव पारित करने के बाद पीठासीन सभापति जगदंकबका पाल ने दोपहर 02.27 बजे सदन की कार्यवाही तीन बजे तक के लिए स्थागति कर दी। कार्यवाही दोबारा शुरू होने पर केंन्द्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी किशन रेडी ने विपक्षी सदस्यों के भारी विरोध के बीच विधेयक को चर्चा एवं पारित करने के लिए सदन के पटल पर रखा। आरएसपी के एनके प्रेमचंन्दन समेत कुछ अन्य विपक्षी  सांसदों ने इस विधेयक का विरोध किया। कहा कि यह संविधान और संघीय ढांचे के खिलाफ है। 

हालांकि सदन ने बिना चर्चा के ही इस विधेयक को ध्वानिमत से पारित कर दिया। विधेयक के पारित होने के बाद विपक्ष के भारी हंगामें के कारण लोकसभा की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थागित कर दी गई।

भूमि का विनियमन भी कंेद्र करेगा-जानकारी के अनुसार, खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक में न सिर्फ राज्यों की शुल्क लागू करने की शक्तियाु समाप्त की गई हैं, बल्कि इसके लागू होने के बाद निर्धारित मानकों के अनुसार खनिज संपदा से जुडी भूमि का विनियमन भी केंन्द्र सरकार के नियंत्रण में आ जाएगा। Bidheyak--थ्वधेयक में प्रावधान किया गया है कि 2026 के संशोधन अधिनियम के लागू होने से पहले एैसा कोई कर, उपकर या अन्य शुल्क, जो राज्य सरकार के पास जमा नहीं किया गया हो या जिसकी वसूली उसके द्वारा नहीं की गयी हो, उसे हर लिहाज से अवैध माना जायेगा। ुक्

विधेयक में कहा गया है, हांलाकि , ऐसे लागू होने से पहले खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर लगाया गया कोई कर, उपकार या अन्य शुल्क, जो पहले ही राज्य सरकार के पास जमा किया जा चुका है या उसके द्वारा वसुल किया जा चुका है, उसे वापस नहीं किया जायेगा। पर जिन्होनें सेस या कर जमा ही नहीं किया है तो उन्हें आगे भी जमा नहीं करना होगा। 

सरकार ने बिल को विकास से जोड़ा-जी किशन रेडी ने कहा कि संशोधन का उद्वेश्य खनिज क्षेत्र में वित्तीय व्यवस्था को स्थिर, स्पष्ट और अनुमान योग्य बनाना है। उनके मुताबिक इससे राष्ट्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावउ मिलेगा और आत्मनिर्भर भारत तथा 2027 तक विकसित भारत के लक्ष्य में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि खनिजों पर अलग-अलग क्षेत्रों में आमरन कर व्यवस्था सार्वजनिक हित को प्रभावित करती है। अधिक टैक्स और शुल्क  से स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने, बाजार के विकास में कमी आने और परिवहन लागत अढ़ने की स्थिति पैदा हो सकती है। केंन्द्रीय मंत्री ने कहा कि खनिजों पर असमान कर व्यवस्था से घरेलू आपुर्ति मंहगी हो सकती है और पर्प्याप्त स्थाीनय संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद खनिजों के आयात का जोखिम बढ़ सकता है। इसका असर आम नागरिक के जीवन-यापन की लागत पर पड़ सकता है। 

झारखंड पर यह पड़ेगा असर

आठ से 10 हजार करोड़ का राजस्व प्रभावित हो सकता है-1.36 लाख करोड़ बकाये की मांग पर भी पड्रेगा असर। खनिज संपदा के मामले में झारखंड देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में है। इसलिए विधेयक असर यहां दूसरे राज्यों की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। झारखंड ने 2024 में झारखंड मिनरल बियरिंग लैंण्ड सेसे कानून बनाया था। इयके तहत खनिज-युक्त भूमि, जिसमें कोयला-युक्त भूमि भी शामिल है, पर खनिज के प्रेषण के आधार पर उनकर की व्यवस्था की गयी है। इससे पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार को लगभग आठ हजार करोड़ रूपये केवल झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस से मिले थे। इस वर्ष सरकार ने जेएमबीएल सेस से करीब 10 हजरी करोड़ से अधिक राजस्व का अनुमान लगाया है। झारखंड लंबे समय से केंन्द्र सरकार से 1.36 लाख करोड, अब बढ़कर 1.41 लाख करोड की मांग करता है। इसमें एक लाख करोड की मांग का मुआवजा है। जिसमें 41,142 करोड़ बकाया और 60 हजार करोड़ व्याज है। इस अधिनियम से इस पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ ाकतर है। हालांकि इस विधेयक से ढारखंड की रोयल्टी पर कोई असर नहीं पडेगा। 


Wednesday, August 12, 2026

झारखंड में एसआईआर के तहत 43.61987 मतदाता सूची संे बाहर

झारखंड में एसआईआर के तहत 43.61987 मतदाता सूची संे बाहर

रांची-भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर विशेष गहन पुनरीक्षण-2026 के तहत बुधवार को मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशित किया गया। प्रारूप मतदाता सूची के अनुसार राज्य में कुल 2,21,01,249 मतदाता शामिल किए गए हैं। इनमें 1,12,06,755 पुरूष, 1,08,94,234 महिला तथा 260 थर्ड जेंडर मतदाता है। एसआईआर से पहले झारखं डमें मतदाताओं की कुल संक्ष्या 2,64,63,234 थी। प्रारूप सूची के प्रकाशन के बाद 43,61,987 मतदाता सूची से बाहर हो गए है। इन नामों को कारणों, जैसे मरण, स्थायी रूप से अन्य स्थान पर स्थानांतरण, एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होना था। निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं होने पर आधार पर हटाया गया है। 

इधर उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने सभी मतदाताओं से अपील की है कि वे मतदाता सूची में अपना नाम, पता और अन्य विवरण का मिलान अवश्य कर हें। यदि नाम छूट गया हो तो किसी प्रकार की त्रुुटि हो तो निर्धारित अवधि में दावा एवं आपति इर्ज करांएं। 

मतदाता अपॉनलाइन भी सूची में अपना नाम देख सकते हैं। इसके अलावा संबंधित मतदान केंन्द्र पर भी सूची उपलब्ध रहेगी। 

ड्राफट वोटर लिस्ट के मुख्य आंकडे

श्रेणी-------------मतदाताओं की संख्या

एसआईआर के पहले----2,64,63,236

प्रारूप सूची में--------2,21,01,249

पुरूष मतदाता--------1,12,06,755

म्हिला मतदाता--------1,08,94,236

थर्ड जेंडर-----------260

हटाए गए कुल नाम-----43,61,987


क्यों कटे 43,61

4 सितंबर तक दावा--आपति दर्ज कराएं

ऽ छावा ओर आपति-4 सितंबर 2026 तक

ऽ फॉम -6ः नया नाम जोड़ने या छूटे हुए पात्र मतदाता फॉम-6 के साथ घोषणा पत्र भरकर बीएलओं या ऑनलाइन अवजमतेण्मबपण्हवअण्पदध्म्ब्प्छमज।चच.....जमा कर सकते हैं। 

ऽ युवा मतदाताओं के लिए विशेष कैंपः 1 अक्टूबर 2026 को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं के लिए 8, 9, 22 और 23 अगस्त 2026 को विशेष अभियान चलाए जाएंगे। 

ऽ अंतिम प्रकाशनः सभी दावों और आपतियों के निस्तारण के बाद अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 7 अक्टूबर को होगा। 


यहां करें जांच-मतदाता अपने नाम की जांच ऑनलाइन भी कर सकते हैं। इसके लिए निम्न लिंक का उपयोग किया जा सकता है-ीजजचेरूध्ध्ेींतमण्हववहसमधर््गत्मश्रथ्मकदचदठ68इत3



क्यों कटे 43,61 लाख वोटरों के नाम

ऽ 1,16,484 ऐसे विदेशी और अन्य अवैध मतदाता थे जिन्होंने गणना प्रपत्र पर हस्ताक्षर करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

ऽ 7,63,903 मृत मतदाताओं के नाम हटाये गये।

ऽ 15,92,194 मतदाता अपने स्थान से हमेशा के लिए स्थानांतरित हो चुके हैं।

ऽ 24,50,810 मतदाता अपने पते पर नहीं मिले या अनुास्थित पाए गए।

ऽ 4,38,596 मतदाता पहले से ही अन्य सूचियों में नामांकित थे। 


2,389 नए पोलिंग बूथ बने

मतदाताओ की सुविधा के लिए बूथों का युक्तिकरण किया गया है। किसी भी बूथ पर 1200 से अधिक मतदाता नहीं होगें और किसी मतदाता को 2 किमी से अधिक दूरी तय नहीं करनी पडेगी। राज्य के सभी 24 जिलों के 81 विधानसभा क्षेत्रों में 2,389 नए मतदान केंन्द्र बनाए गये हैं। इनमें से 1,248 वर्तमान स्थानों पर तथा 1,141 नए स्थानों पर बनाए गए हैं। 68 मतदान केंन्द्रों को मर्ज किया गया, जिसके बाद राज्य में कुल पोलिंग बूथों की संख्या 29,571 से बढ़कर 31,892 हो गई है। 


जामींदारी प्रथा ka उन्मुलन 1950 में हुआ, ं----आंज अडानी, अंबानी का नयी जमीनदारी शुरू

 जामींदारी प्रथा उन्मुलन 1950 में हुआ, ंआंज अडानी, अंबानी का नयी जमीनदारी शुरू

Ajadi  के बाद पहली बार 1950-1955 के बीच जमींदारी प्रथा  को समाप्त करने के लिए विधेयक लाये गए। और ये विधेयक अधिनियम बनकर लागू हो गये। जिनके परिणामस्वरूप जमीदारो प्रथा भारत में उन्मुलन हो गया और किसानों एवं राज्य के बीव पुनर सीधा संबंध स्थापित हो गया। भूमि अधिनियम कानून  बनने के बाद जमीन पर जोतने वाले का स्वामित्व हो गया। जमींदारों के खेत जोतकर उनके लिए पूंजि अर्जित करने वाले गरीब हलधर किसान जमींदारों के चंगुल से बाहर निकले गये।ं

अब ंअडानी, अमबानी की जमीनदारी प्रथा शुरू हो गयी है। जिसकी जागीरदारी का कमान मोदी सरकार संम्भाल रही है। लैंण्ड डिजिटालाईजेशन, वन नेशन वन लैंण्ड रिकाॅर्ड, स्मामित्व योजना, लेंण्ड बैंक इस प्रक्रिया का मूल हथियार है। 

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jal, jangal , jameen bachane ki Ladai ka yah ek drisye hai, jo mittal company dawara Jameen-

 

Tuesday, August 11, 2026

50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूप्या मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

 19 जून 2017

ं 50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूप्या मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास ने राज्य के सामृद्व महिलाओं को लाभ पहुुचाने के लिए भू-राजस्व एवं निबंधन विभाग के माध्यम से 50 लाख कीमत की जमीन खरीदने पर 1 रूप्या में जमीन की रजिस्ट्री करने की व्यवस्था लायी। 

इस व्यवस्था के बाद हर साल 70 महिलाएं इसका लाभ उठाते रहीं। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं एक रूप्या में जमीन, मकान, प्लैट का रजिस्ट्रेशन करायी। 2 लाख से अधिक रजिस्ट्री की गयी। इससे राज्य को 1296 करोड़ राजस्व का नुकासान भी उठाना पड़ा। 

कोरोना काल में वर्तमान हेमंत सरकार ने इस व्यवस्था फिर से वापस लिया। तर्क दिया गया कि इस व्यवस्था के तहत गरीब महिलाएं लाभ नहीं ले पा रही हैं साथ ही राज्य का राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। इसी को देखते हुए राज्य की गठबंधन सरकार ने इस व्यवस्था को वापस लिया। 

5 सितंबर 2019 का तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने टवीट किया था-झारखंड देश का पहला राज्य है जहां महिलाओं के लिए 50 लाख रूपया तक की जमीन , मकान की रजिस्ट्री सिर्फ एक रूपये में होती है। अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा महिलाएं बन चुकी हैं मकान मालकिन। 

जानकारी के लिए-देश के बाकी राज्यों में भी महिलाओं को रजिस्ट्री में कुछ प्रतिशत की छूट मिलती है-उदाहरण के तौर में-दिल्ली में 4 प्रतिशत स्टाम्प डयूटी देनी पड़ती है। यूपी में महिलाओं द्वारा जमीन खरीदने पर सिर्फ एक (1) प्रतिशत ही स्टाम्प डयूटी में छूट दी गयी है। 

23 मार्च 2021 को राज्य सरकार ने महिलाओं को 1 रूप्या में जमीन रजिस्ट्री में छूट देने से राज्य सरकार को 400 करोड़ का नुकसान बताया। राज्य के पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पिछली सरकार ने महिला के नाम से जमीन रजिस्ट्री कराने कर छूट दी थी, इससे राज्य को करीब 400 करोड़़ रूप्ये राजस्व का नुकसान हुआ था। वह रजिस्ट्री शुल्क भी देने में सक्षम होता है। यह सिर्फ जमीन लूटने की षडयंत्र के तहत किया गया था। 

जो भी नये-नये व्यवस्था जमीन संबंधित लाये गाये पिछली रघुवर दास की सरकार के द्वारा उसका समीक्षा होनी चाहिए कि आदिवासी, मूलवासी, दलित और मेहनत मजदूरी करने वाला परिवार को कितना लाभ मिला?। इसकी सूची सरकार को जारी करना चाहिए, तभी सामाजिक न्याय की बात हो सकती है। 

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23 मार्च का प्रभात खबर में विधायक सरयू ने बयान दिया था कहा था-कि राज्य में कई स्थानों पर सरकारी जमीन पर लोग वर्षों से रहते आ रहे हैं, उनकों सरकार से सुविधाएं भी मिल रही है। ऐसे जमीन को नियमित करना चाहिए। इनके अनुसार जमशेदपुर में कई इलाके ऐसे हैं नियमित करने का कोई नियम बना लेना चाहिए, इससे सरकार को बड़ी संख्या में राजस्व मिलेगा। 

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2014 से 2019 के बीच राज्य की कल्याणकारी सरकार आखिर अमिरों को ही क्यों सस्ते दर में जमीन दी?

बाबा रामदेव को रघुवर सरकार ने 101 रूपये की टोकन मनी पर 15 एकड़ जमीन नमकोम प्रखंड के बरगांवा में दिया है। यह कहा गया कि यहां स्कूल खुलेगा, जहां गरीबों के बच्चे पढ़ेंगे। लेकिन सचाई को क्या है, यह जांचने की जरूरत है। 

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Friday, August 7, 2026

thoda mood bana hai

 






























याचिकाकर्ता छात्रों का मुख्य आरोप हे कि परीक्षा के दौरान ओएमआर शीट में उनके द्वारा दर्ज किए गए उत्तर और एनटीए द्वारा पोर्टल पर अपलोड की गयी प्रतियों के बीच बड़ा अंतर है।

 नीटयूजी-काउंसिलिग से पहले सुनवाई की मांग, शीर्ष न्यायालय सहमत

प्रभात खबर-5 अगस्त 2026

सुप्रीम कोर्ट पहुंचे छल छात्रों ने कहा ओएमआर शीट में बदल गये उत्तर-

ऐजेसिंयां नयी दिल्ली

नीट-यूजी 2026 को लेकर विविाद थामने का नाम नहीं ले रहा हे। परीक्षा में शामिल छल अभ्यर्थियों ने एनटीए द्वारा जारी ओएमआर शीट में गंभीर गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्चकांत, न्यायमूर्ति जाॅयमाल्वा बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने आगामी काउंसिलिंग प्रक्रिया शुरू होने से पहले मामले पर त्वरित सुनवाई करने की मांग को स्वीकार कर लिया है। अधिवक्ता ने पीठ को बताया कि 600 से 650 से अधिक अंक पानेवाले इन मेघावी छात्रों का दावा हे कि एनटीए की वेबसाइट पर अपलोड हुई ओएमआर शीट की स्कैन काॅपी में उनके उत्तर वे नहीं हैं जो उन्होंने परीक्षा कंेन्द्र पर भरे थे। छात्रों का तर्क है कि यदि काउंसिलिंग से पहलं ओएमआर शीट में हुई इस कथित विसंगति का पारदर्शी समाधान नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर उनकी मैरिट रैंक और मेडिकल काॅलेज में दखिले की संभवनाओं पर पडेगा। 

आरोप-ओएमआर शीट में कई प्रश्नों के उत्तर गलत-

याचिकाकर्ता छात्रों का मुख्य आरोप हे कि परीक्षा के दौरान ओएमआर शीट में उनके द्वारा दर्ज किए गए उत्तर और एनटीए द्वारा पोर्टल पर अपलोड की गयी प्रतियों के बीच बड़ा अंतर है। कई प्रश्नों के उततर या तो बदले हुए दिख रहे हैं या गलत दर्ज हैं, जिससे उनके वास्तविक अंक प्रभावित हुए हैं। 

किए कई मेल, एनटीए ने नहीं दिया जवाब-

अदालत में दखिल याचिका के अनुसार, ओएमआर शीट में विसंगति सामने आने के बाद छात्रों ने तुरंत एनटीए को आधिकारिक ईमेल भेजे और व्यक्तिगत रूप से एजंेसी के कार्यालय भी पहुंचे, हालांकि, एनटीए की ओर से कोई संतोषजनक जवाब या समाधान न मिलने के बाद अभ्यर्थियों को न्याय के लिए शीर्ष अदालत का रूख करना पड़ा। 

पहली बार नहीं, जब छात्र ऐसे मामले ले पहुंचे-नीट-यूजी 2026 में ओएमआर शीट ओर अंक परिवर्तन को लेकर पहले भी कानूनी सवाल उठ चुके हैं। हाल ही में बाॅम्बे हाइकोर्टत्र झारखंड हाइकोर्ट और दिल्ली हाइकोर्ट में भी अभ्यर्थियों ने एनटीए पोर्टल पर अंक बदले जाने और घोषित स्कोर में अंतर को लेकर याचिकाएं दायर की और ऐसी गड़कडी पर न्याय की गुहार लगायींै। 

पेपर लीक के कारण रद परीक्षा दोबारा हुई-उल्लेखनीय है कि नीट-यूजी 2026 की परीक्षा शुरूआती तौर पर 3 मई को आयोजित की गयी थी। हालांकि, बड़े पैमाने पर प्रश्नपत्र लीक के आरोप साबित होने के बाद इसे रदद कर दिया गया था। इसके बाद एनटीए ने 21 जून को दोबारा परीक्षा कराई थी। जो अब ओएमआर विवाद के घेरे में है। 


जेपीएससी की विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में कथित अनियमितता की जांच कर रही सीआइडी ने सोमवार को पांच जिलों के 18 स्थानों पर छापेमारी में मिले दस्तावेजों के आधार पर पूछताछ तेज कर दी है।

 जेपीएससी अनयिमितता-प्रभात खबर 5 अगस्त 2026

सीआइडी ने तीन और आरोपियों को किया गिरफतार-छात्रों के दस्तावेज व चेक कोचिंग संचालकों पास कैसे पहुंचे, सीआडी कर रही जांच।

विशेष संवाददाता-रांची

जेपीएससी की विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में कथित अनियमितता की जांच कर रही सीआइडी ने सोमवार को पांच जिलों के 18 स्थानों पर छापेमारी में मिले दस्तावेजों के आधार पर पूछताछ तेज कर दी है। सीआइडी ने कथित रूप से कोचिंग संचालक आदित्व पांडेय को धनबाद तथा हजारीबाग से लालू यादव और प्रदीप यादव को पूछताछ के लिए पकड़ा है। 

इसके अलावा टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह, मार्केटिंग मैनेजर अभय वितारी और जेपीएससी के प्रोग्रामर उस्मान से भी पूछताछ की गयी। सूत्रों से मिली जानकारी के अनूसार, सीआइडी की टीम छापेमारी के दौरान बराबम ब्लैंक चेक और अभ्यार्थियों के दस्तावेजा के बारे में जानकारी ले रही है। पूछताछ में यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि ब्लैंक चेक किसके थे और इन्हें किन कारणों से लिया गया था। जांच टीम यह भी जानना चाहती है कि अथ्यार्थियों के एडमिट कार्ड, मार्कशीट ओएमआर शीट की कार्बन काॅपी और अन्य हस्तावेज आरोपियों के ठिकानों पर क्यों रखे गये थे। 

कोचिंग संस्थानों की भूमिका की जांच--

सीआइडी कोचिंग संस्थानों में होनेवाली गतिविधियों और टीडीपीएल कंपनी से जुडे लोगों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही है। अधिकारियों के स्तर पर यह जानकारी जुटायी जा रही है कि कोचिंग सेंटर में अभ्यर्थियों से किस तरह का काम कराया जाता था और परीक्षा प्रक्रिया से जुडे लोगों के साथ उनका संपर्क कैसे था। जांच टीम यह भी पता कर रही है कि किन अभ्यर्थियों ने आरोपियों को चेक दिया थे। 

नौकरी के बाद भुगतान की आशंका--

पूछताछ में इस बिंदू पर भी फोकस है कि क्या कुछ अभ्यर्थियों से नौकरी के बाद पैसे या जमीन देने का वादा लिया गया था। बराबम कागजात और बैंक रिकाॅर्ड के आधार पर लेन-देन की संभावित कडियों को जोडा जा रहा है। सीआइडी यह भी जांच रही है कि जमीन से जुडे़ दस्तावेज किन अभ्भ्यर्थियों के हैं और उनका इस्तेमाल किस उद्वेश्य से किया जाना था। सूत्रों के अनुसार कई ब्लैंक चेक सीआईडी को मिले हैं। इसकी जांच हो रही है। पर सीआइडी ने इस संबध में किसी भी जानकारी की पुष्टि नहीं की है। 

पूछताछ के बाद आगे बढ़ेगी जांच--

सीआइडी आधिकारियों के अनुसार पूछताछ के बाद जांच की दिशा और स्पष्ट होगी। बयानो का मिलान छापेमारी में बरामद चेक, बैंक दस्तावेज, इलेक्ट्रानिक उपकरण और अभ्यर्थियों के कागजात से किया जायेगा। इसके आधार पर सीआइडी आगे की कार्रवाई और अन्य संदिग्धों की भूमिका तय करेगी। छापेमारी, और पूछताछ को लेकर सीआइडी ने अब तक आधिकारिक रूप से विस्तृत जानकारी जारी नहीं की है। 

परीक्षा अनियमितता मामले में बड़ी कार्रवाई-

झारखंड अपराध अनुसंधान विभाग सीआइडी ने झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में अनियमितता से जुडे एक मामले में तीन लोगों को मंगलवार को गिरफतार किया। इनका नाम उमेश कुमार, बुद्वेश्वर भगत और रमेश कुमार है। सीआइडी ने बताया कि यह कार्रवाई कांड संख्या 16-26 के तहत प्रप्त लाक्ष्यों के आधार पर की गयी हे। जांच में डिजिटल साक्ष्य और अथिलेखीय साक्ष्य भी बरामद किये गये हैं।