Tuesday, November 19, 2013

इन १३ बर्षो में राज का मुखिया पद आदिवासियों के हाथ में रहा. राज में सैकड़ों आदिवासी मंत्री बने बिभिन बिभागों को संचालित-नियंत्रित करने कि जिम्मेवारी आदिवासियों में ही हाथ में रहा। आदिवासी कल्याण मंत्री भी आदिवासी ही रहे। फिर भी राज में आदिवासियों के हित में बने कानूनों का आदिवासी हित में न तो पालन-लागु किया गया न ही सुरक्छा किया गया.

राज बने  13 साल पुरे  हो गए इन १३ सालों  में ९ आदिवासी मुख्यमंत्री  बने।   इन १३ वर्षों  में नियम अनुसार टी ए सी कि  25 बैठकें होनी चहिये थी।  लेकिन २५ बैठकों  के बदले 12 बैठकें ही कि गयी।   नौ महीने से बैठक नहीं, प्रशासनिक नियंत्रण भी पूरी तरह शिथील है। 
82 सदस्यों वाली झारखंड विधान सभा में 28 विधायक आदिवासी, लेकिन टीएसी प्रभावी नहीं हो सकी। विदित हो की ये 28 विधायक आदिवासी आरक्षित सीट से चुन कर आते हैं। एसटी विधायक भी इसे साफ तौर पर महसूस करते हैं। जनजातीय अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसुचित जनजातियों के प्रशासन  और नियंत्रण में जनजातीय सलाहकार परिषद की भूमिंका सबसे महत्वपूर्ण होती है। लेकिन झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता ने टीएसी को लगभग अप्रभावी बना दिया है। कई बार ऐसा हुआ, जब छह महीने से अधिक समय तक टीएसी की बैठक नहीं हुई है। 
राष्ट्रपति शासन  में नये सिरे से टीएसी के गठन के लिए फाइल बढ़ायी गयी थी। लेकिन विधि परमार्श  लेने में ही मामला लटक गया। इससे पहले 2010 में राष्ट्रपति प्रशसान  के दरम्यान राज्यपाल ने डाॅ रामदयाल मुंडी को टीएसी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था। परिषद की नियमावली के अनुसार साल में कम से कम दो बार टीएसी की बैठक होनी चाहिए। 
टीएसी की जिम्मेदारी
परिषद का यह कर्तव्य होगा  िकवह उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और उन्नति से संबंधित ऐसे विषयों पर सलाह दे सकती है, जो उसको राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किये जायें। मुख्यमुत्री टीएसी के अध्यक्ष और कल्याण मंत्री उपाध्यक्ष होते हैं। इसमें आदिवासी विधायकों को ही सदस्य बनाया जाता है। 
हर माह बैठक का प्रस्ताव
15.07, 2010 को हुई बैठक में कुल 18 प्रस्ताव रखे गये थे। इनमें जनजातीय कमीशन यह तमाम बिकाश योजनाओं  पर बिमर्श , पाँचवी  अनुसूचित क्षेत्र में प्रशासन  को बेहतर बनाने के उपाय तथा टीएसी की बैठक हर महीने हो, इस पर विचार किया  जाना शामिल है , लेकिन यह नहीं हो सका। 
इन १३ बर्षो में राज का मुखिया पद आदिवासियों के हाथ में रहा. राज में सैकड़ों आदिवासी मंत्री बने बिभिन बिभागों को संचालित-नियंत्रित करने कि जिम्मेवारी आदिवासियों में ही हाथ में रहा।  आदिवासी कल्याण मंत्री भी आदिवासी ही रहे।  फिर भी राज में आदिवासियों के हित में बने कानूनों का आदिवासी हित में न तो पालन-लागु किया गया न ही  सुरक्छा किया गया. न ही राज में आदिवासी-मूलवासी-दलित-मेहनतकशों के अधिकारिओं कि गारेंटी के लिए स्थानीय निति बनाये।  झारखण्ड अलग राज कि लड़ाई झारखण्ड के आदिवासी-मूलवासी- के किसानों कि सामाजिक सांस्कृतिक -भाषा-इतिहाश -जल -जंगल-जमीन- कि सुरक्छा और बिकास के लिए लड़ी गयी थी साथ ही किसान -मजदूरों -मेहनतकशों-शोषितों  को न्याय देना ही राज का सपना था ---तब हैम किसको दोस देंगे ? 
स्मीक्षा में दिलचस्पी नहीं
15.07, 2010 को टीएसी की बैठक में आठ विधायकों को विभिन्न जिलों में विकास योजनाओं की समीक्षा कर रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन अधिकतर विधायकों ने समीक्षा कर रिपोर्ट सौंपने में दिलचस्पी नही नहीं दिखायी। टीएसी की अब तक हुई बैठकों में जितने प्रस्वाव पारित हुए या अफसरों को निर्दे’ा दिये वे सभी हवा होते चले गये। 
आज तक हुई बैठक
पहली बैठक 14.02.02 अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी
दूसरी बैठक 24.03.03 व 19.11.03 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
तीसरी बैठक 22.04.05 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
चैथी बैठक 28.01.06 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
पांचवी बैठक 16.01.07 अध्यक्ष मधु कोडा
छठी बैठक 15.03.08 अध्यक्ष मधु कोडा
सतवीं बैठक 15.07.10 कार्य0 अ0 डा. रामदयाल मुंडा
आठवीं बैठक 21.08.10 कार्य0 अ0 डा. रामदयाल मुंडा
नौवीं बैठक 19.04.2.11 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
दसवीं बैठक 16.06.11 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
11वी बैठक 30 01.12 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
12 वीं बैठक 9.11.12 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
 (यह  रिपोर्ट 9 अगस्त 2013 तक कि है )
 

Wednesday, November 13, 2013

जिंदगी में पहली बार गुलाब का फूल लगायी हूँ .

maine 
मैंने २०१३ में अपने घर के पास फूल लगायी -इस फूल का पौधा को मैं पड़ोस के आँगन से उतर कर लायी थी। '
 जुलाई २०१३  को मैं नगड़ी  के  केस की  तारीख  में  उपास्थित होने सिबिल कोर्ट गयी थीं -कोर्ट के बाद मैं बाहर फूल बेचने वालों के पास फूल का गाछी खरीदने जगन के साथ गयी-मैं गुलाब का गाछी देखने लगी।  दुकानदार बोले -दीदी आप पसंद कीजिये।  मैं पूछी इसको कितना में बेचेंगे? दुकानदार बोला -आप पसंद तो कीजिए -मैं बोली आप दम बताएँगे, तब तो मई तय करुँगी-कि किस को कितना ले जाना है। दुकानदार बोले-आप जब हैम लोगों के लिए लड़ रही हैं- तो हम आप से  फूल पैसा क्यों लेंगे।  मैं दुकानदार को सिर्फ देख रही थी-कुछ नहीं बोल प् रही थी।  आगे बोला - आप तो हमको नहीं पहचानेगे -लेकिन मई आप को पहचानता हूँ जिस दिन आप जेल से निकली- मैं  वंही गेट पर था। मैंने तीन गुलाब चुनी- आज तीन में से दो बड़ा हो मैं जिंदगी में पहली बार गुलाब का फूल लगायी हूँ .-
इसको मैं अपने बड़े भाई शुसील के आँगन से पौधा को उखड कर लायी थी --जो निचे है 

Monday, November 11, 2013

jingadi ek bagiya hai--aap sabhi muskurate rahiye--jagat ko apni sugandh se mahkate rahiye-

jindagi  bhi  ek  pulwari  hai----iski  sugandh  sabhi  tak  pahunche---sabhi  nigahon  ko  moh  paye--yahi  jindagi  ka maksad hai 





Monday, November 4, 2013

अगर ऐसा ही करत्ते आ रहे हैं - तब लोकतंत्र कि रक्छा में हम अपना ईमानदारी योगदान नहीं कर रहे हैं।

समाज , राज्य और पूरे  देश में अभी एक ही चर्चा है कि -देश से किस तरह भ्रस्टाचार को जड़ से उखाड़  फेंका जा सकता है - इसके लिए सभी चिंता जाहिर करते हैं -लेकिन सच तो यही है कि -जो राज्य और देश कि बागडोर सँभालने वाले कतई  नहीं चाहत्ते हैं कि -देश से भ्रस्टाचार और भ्रस्टाचरी ख़तम हो जाएँ।  जब चुनाव सामने आता है -तो राजनेतिक पार्टीं उन्ही आदमी को अपना उमीदवार बनाएगा - जो कितना बड़ा गुंडा होगा, कितना हत्या किया है, कितना डाका डालने में बड़ा रेकॉर्ड बना पाया है , कितना छल -बल, छूट -फाँस माँ मास्टर डिग्री हासिल किया है। .आप जनता को कितना ठग सकता है ---यही है उमीदवारों कि - योग्यता।  हाँ हमें भी इस चुनाव में अपने भूमिका तलाशनी चाहिए कि - हम क्या करते हैं ? 
मुझे लगता है कि हैम लोगों को भी अपनी भूमिका - जो अभी तक निभाते आये हैं -उससे ईमानदारी से स्वीकार कर लेना चाहिए।  कि हमने क्या नेताओं के -कहने पर उनके दवारा खड़ा किये - भ्रस्ट , लुटेरे , कातिल, खुनी , डकैत उमीदवारों को ही अपना जनप्रतिनिधि बनाने के लिए -अपना योगदान-किये हैं ???????
अगर ऐसा ही करत्ते आ रहे हैं - तब लोकतंत्र कि रक्छा में हम अपना ईमानदारी योगदान नहीं कर रहे हैं। 

पर्यावरण का विकास- हमारा विकास , प्रकृति का विकाश -देश का विकाश।

प्रकृति - 
आज जब भी विकास कि बात आती है -सभी एक ही बात करते है -कि देश में उद्योग -कल-कारखाना -खदान चलेगा -तभी देश विकाश कर सकता है। . अगर यही बिकाश का पैमान है तब तो हमारे राज्य  और देश में गरीब-बेघर-लचर-बेवस - अन्याय -भ्रस्टाचार कि आग में हम और हमारा राज्य और देश नहीं जलता। …हम जिसको विकाश का  पैमाना मन ले रहे हैं -वाली विनाश का रास्ता है -जिस पर हम जा रहे हैं। ।हमरा मन्ना है - पर्यावरण का विकास- हमारा विकास , प्रकृति का विकाश -देश का विकाश।  मैं  जल -जंगल -जमीन -नदी -नाला सहित प्रकृति में जितने भी हैं - सबको जीवित रहने कि बात करती हूँ -सुरक्षि रखने कि बात करती हूँ -तो लोग मुझे विकाश बिरोधी मानते हैं -

Monday, October 21, 2013

कंपनी ने मासस विधायक श्री अरूप चटर्जी के साथ मेरे उपर और साथ में 26 साथियों पर करखाना में तोड़-फोड़ करने, गाली-गलौज करने, मार-पीट करने का अरोप लगा कर सियालजोरी थाना में केस कर दिया

झारखंड के औद्योगिक जिला बोकारो में इलेक्ट्रो स्टील लिमिटेड ने तीन एमटी क्षमता के स्टील प्लांट स्थापित करने के लिए चंदनक्यारी प्रखंड के 10 गांवों का 2400 एकड़ जमीन रैयतों को अंधकार में रख कर ले लिया है। कंपनी ने सीधे रैयतों से जमीन खरीदने का एग्रीमेंट नहीं किया। कंपनी के दलालों ने अपने नाम से रैयतों से जमीन सस्तें दाम पर लिया और उत्क जमीन को कंपनी को बेच दिया। रैयतों के अनुसार कंपनी के दलालों के नाम से कुछ जमीन खरीदा गया और कुछ रैयतों को जमीन जबरजस्त कंपनी ने कब्जा कर लिया। रैयतों ने बताया-जो जमीन देना नहीं चाहता है-उसको हर तरह की धमकियां दी जाती है। यदि धमकी से भी रैयत नहीं डर रहा है और जमीन देना नहीं चाह रहा है-तब कंपनी और पुलिस वाले मिल कर जमीन मालिक पर फरजी मुकदमा दायर कर रहे हैं। रैयतों ने बताया-जितने भी लोग कंपनी को जमीन देना नहीं चाहे और कंपनी द्वारा जबरन जमीन कब्जा का विरोध किये-सभी पर फरजी मुकदमा किया गया है। पीडित बताते हैं-कई लोगों पर 10-10 फरजी मुकदमा किया गया है। कपनी 2007 से लगातार रैयतों पर केस थोपते आ रही है, ताकि रैयत भय से कुछ भी आवाज न उठायें। 
जमीन लेते समय स्थानीय लोगों को बताया नहीं गया कि उत्क जमीन पर स्टील प्लांट बैठाया जाएगा। जब कंपनी यहां स्टील प्लांट बैठाना शुरु  किया तब रैयतों ने कंपनी से नौकरी की मांग करने लगे। साथ ही जमीन का उचित कीमत की भी मांग करने लगे। जमीन देने के बाद रैयत ठका सा महसूस कर रहे हैं। भगाबांध गांव के किसानों का 450 एकड़ जमीन कंपनी लेना चाहती थी। लेकिन कंपनी 407 एकड़ जमीन ही ले पायी। यह जमीन भी धोखे में रख कर कंपनी के सीएमडी (मालिक ) उमंग केजरीवाल के भाई बांके बिहारी केजरीवाल के बेटे श्रीश  कुमार केजरीवाल के नाम से जमीन लिया गया। रैयतों ने बताये जमीन का रजिस्ट्री, रजिस्टी्र कार्यालय में नहीं हुआ था। रजिस्टारर खुद ही रजिस्टर लेकर गांव आकर जमीन का रजिस्ट्री किया था। रैयतों ने बताये-कुछ जमीन का एग्रीमेंट रैयतों के साथ सादे कागज में किया गया। कुछ एग्रीमेंट पेपर पर केंन्द्र सरकार का मोनोग्राम बना हुआ था। दिलीप कुमार महतो, नाईम अंसारी, निताई महतो ने बताये-कुछ लोगों के साथ इलेक्ट्रो स्टील कास्टिंग लिमिडेट, कुछ के साथ इलेक्ट्रो स्टील लिमिडेट इंटिग्रेटेड, कुछ के साथ इलेक्ट्रो स्टील लिमिटेड के नाम पर एग्रीमेंट किया। 
रैयतों ने बताये-जब रैयतों ने नौकरी की मांग को लेकर कंपनी को घेरने लगे-तो इलेक्ट्रो स्टील इंनटिग्रेटेड लिमिटेड के पैड पर श्री श्रीश कुमार पिता श्री बांके बिहारी केजरीवाल, बोकारो स्टील सिटी ने रैयतों के साथ एग्रीमेंट किया है। इस एग्रीमेंट में कहा गया है-1-इलेक्ट्रो स्टील कल कारखाने लगाने की स्थिति में जो लाभ अन्य रैयतों को देगी वे लाभ आपलोगों को भी दिया जायेगा। 
2-कल कारखाना लगाने के दौरान कंपनी तकनीकी एवं शारिरिक  रूप से दक्ष एवं सक्षम लोगों जो कि जमीन देने वाले परिवार से संबंधित होगें उन्हें नौकरी एवं अन्य कार्यों में प्रथमिकता दी जायेगी।
3-कल कारखाना निर्माण के दौरान गैर तकनीकी निर्माण कार्यों में जमीन देने वाले रैयतों को कंपनी के नियमानुसार प्राथमिकता दी जायेगी। रैयत बताते हैं इस की प्रति को कंपनी के कार्यालय में जाते हैं तो कंपनी के कर्मचारी कागाज सही नहीं है कहते हुए भगा देते हैं । दूसरी ओर कंपनी अखबारों में प्रचार कर दावा कर रही है कि-20,000 लोगों को नौकरी देगी।
रैयतों के अनुसार जमीन दलालों के माध्यम से लिया गया।
अपनी माँगों को ल्रकर सभा करते रैयत-जमीन मालिक 

 जमीन का कीमत किसी को 500 रू0 डिसमिल, किसी को 800 रू0, किसी को 1200रू डिसमिल के हिसाब से भुगतान किया गया। रैयतों ने बताये-दलालों ने दो तरह के कागजात बनाये हैं-एक कागजात में जिस जमीन का कीमत 500 रू भुगतान किया है-उसक राशि  के स्थान में 8000 रू लिखा गया है और इसी कागजात को दिखाया जाता है और पुष्टी किया जाता है कि किसानों को उचित कीमत भुगतान किया गया है। नौकरी देने के नाम पर रैयतों को गुमराह किया जा रहा है। रैयतों के साथ अलग अलग कंपनी का नाम अंकित लेटर पैड पर रैयतों को नौकरी देने का एग्रीमेंट किया जा रहा है। कुछ तो सादा कागाज पर एग्रीमेंट किया जा रहा है। तीस सितंबर को सीएम श्री हेमंत सोरेन, सरकार के प्रधान सचिव, ग्रह सचिव, लेबर कमिशनर, उद्योग सचिव, कंपनी के एसडीएम, श्री मोदी सहित कंपनी के अन्य अधिकारी एवं रैयतों की ओर से 
रैयतों की सभा को संबोधित करते बिधायक श्री अरूप जी 

विस्थापित नेता निताई महतो, मासास के विधायक श्री अरूप चटर्जी, मैं तथा रैयतों के वकील वर्ता में शामिल थे। हम लोगों ने रैयतों के साथ सादे कागाज पर नौकरी देने के लिए किये गये एग्रीमेंट पेपर को सीएम के हाथ थमा दिये। सीएम एक एक करके करब 15-20 पेपर को देख कर भड़क गये, बोले-ये क्या माजाक बना कर रखे हैं? ये क्या है? ये एग्रीमेंट है? बोले आप लोग रैयतों के साथ धोखा कर रहे हैं। जमीन मालिकोंको अंधकार में रख कर काम कर रहे हैं। आप लोगों इसी तरह करते रहियेगा-तो हमेशा  आप को विरोध का सामना करना ही पडेगा। सीएम ने आदेश  दिया-आप लोगों को रैयतों के सामने अपना स्वेत पत्र जारी कीजिए-आप का क्या निती है। विस्थापितों को जमीन के बदले क्या मिलेगा, नौकरी मिलेगा और क्या-क्या। क्या व्यवस्था है। 
सीएम ने पूछा-कितना जमीन लिये हैं-एसडीएम ने जवाब दिया-2400 एकड़। उद्योग सचिव ने बतायी-इसमें से 417 एकड़ वन भूमिं है। इसमें से 139 एकड़ जंगल-झाड़ी भूंमि है-सरकारी जमीन है । दूसरे अधिकारियों ने कहा-जंगल-झाड़ी सरकारी भूंमि पर इंडस्ट्री नहीं लग सकता है। उद्योग सचिव ने कहा-139 एकड़ वन भूंमि पर वन विभाग एनओसी नहीं दे रहा है-इसको लेकर कंपनी कोर्ट में पीआईएल कर दिया है। सीएम कंपनी वालों से-अच्छा एनओसी नहीं मिला है? जी नहीं सर। सीएम अधिकारियों से बोले-देख लीजिएगा-कहां तक पहुंचा है। 
वर्ता के दौरान मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने पूछा-आप के आर एण्ड आर पोलेसी है कि नहीं? इसके उत्तर में सीएमडी श्री उमंग केजरीवाल ने जवाब दिया-जी नहीं है सर। सीएम पुनः सवाल किये-कितनों नौकरी दिये? जवाब में सीएमडी- ने कहा-517 लोगों को। सीएम ने यह भी पूछा-कोयला ब्लोक आप को मिल गया है? जवाब में सीएमडी ने कहा-जी हां मिला है। इसी बीच उद्योग सचिव और प्रधान सचिव ने कहा-आप का कोयला ब्लाॅक का लीज क्लोयर हुआ? जवाब में कंपनी के प्रतिनिधि-ने कहा-जी क्लीयर नहीं हुआ है। यह सुन कर श्री हेमंत सोरेन ने पूछा -आप कोयला निकाल रहे हैं? जवाब में कंपनी के लोग-जी निकाल रहे हैं। इस पर मुख्यमंत्री मुस्कुराते हुए-सरकारी अधिकारीयों से-आप लोग पता कीजिए-इनका कोयला कहां बिकता है! 
मसस विधायक श्री अरूप चटर्जी के नेतृत्व में 25 सितंबर से शुरू विस्थापितों के धरना कार्यक्रम में शामिल होने पहुंची टीक के सदस्यों ने फोन से सीएमडी से नौकरी देने के लिए किये गये एग्रीमेंट के बारे पूछा तो-जवाब में कहा, कंपनी बार-बार एग्रीमेंट बदल नहीं सकती है-एक बार एग्रीमेंट हुआ तो हुआ। 
विकास के नाम पर जमीन देने वाले रैयत प्लांट में दिहाड़ी मजदूर बन गये। प्लांट में काम करने वाले मजदूरों को प्रति दिन 140 रू मजदूरी दिया जाता है। जबकि सरकारी मजदूरी दर 180 रू है। 
स्टील प्लांट के सियालजोरी, योगिडीह, चन्दाहा, बुढी बिनोर, बिनोर, भागाबांध, मोदीडीह, आसन सोल, तेतुलिया और बाबुग्राम गांवों के रैयतों का जमीन लिया है। भागाबांध के तीन टोला है-अंसारी टोला, रजवार टोला और महता टोला। इन टोलों में करीब 500 लोग हैं। यहां के 20 प्रतिशत लोगों ने अब तक जमीन कंपनी को नहीं बेचे हैं। प्लांट के गेट ना0 1 और गेट ना0 2 के बीच 8-10 आदिवासी परिवारों की जमीन है-जिन्होंने अपनी जमीन अभी तब कंपनी को नहीं बेची है। जिनकी जमीन गेट ना0 1 और 2 के बीच है-कंपनी ने जबरजस्त जमीन कब्जा कर लिया है। ये तीनों टोला कारखाना के भीतर है। ग्रामीण बताते हैं-इन तीनों टोली के लोगों से मिलने कोई भी रिस्तेदार नहीं जा सकता है। गांव वाले भी बाहर निकलते हैं तब-कंपनी के सिक्यूरीटी उनकी तलाशी  लेते हैं-जांच करते हैं। बिना जांच किये गांव वाला भी गांव के भीतर घुस नहीं सकता है। गांव के भीतर एक स्कूल भी है। यहां 54 बच्चें हैं। शिक्षक श्री बनर्जी रजवार कहते हैं-स्कूल का मरम्मती होना है। इसके लिए सामान बाहर से लाना है लेकिन कंपनी के सिक्यूरीटी लाने नहीं देते हैं। स्कूल आने-जाने वाले बच्चों की भी तलीशी  सिक्यूरीटी वाले लेते हैं।

कारखाना के भीतर -भागाबंद गाँव के रजवार टोली का स्कूल -साथ में मास्टरजी 
भगाबांध गांव के किसान बाजार से एक साथ 50 किलो चावल खरीद कर घर नहीं ला सकते हैं। इलेक्ट्रो स्टील कंपनी ने इस पर रोक लगा दी है।  सिक्यूरिटी सिनियर श्री बंजारा कहते हैं-क्या पता चावल के भीतर कोई हथियार तो छिपा कर नहीं लाए। श्री बंजारा कहते हैं सुरक्षा का सवाल है। करखाना के भीतर कैद महाता टोली के श्री संतोषजी कागजात दिखाते हुए कहते हैं-इनके परिवार ने कंपनी को 15 एकड़ जमीन दिया। अपने पास 80 डिसमिल जमीन रखे । इस 80 डिसमिल जमीन को छोड़ने के लिए कंपनी से बार बार धमकी मिल रही है। जमीन नहीं छोड़ने पर संतोष जी के बेटे पर गांजा बेचने का अरोप लगाकर उसे गिरत्फार किया सियालजोरी पुलिस ने। जब संतोष जी बेटा को छुड़ाने गये तो संतोष जी पर भी केस ठोंक कर जेल भेज दिया गया। 

कारखाना के भीतर कैद भागाबंद गाँव का  महता टोला 
इलेक्टो स्टील ने भगाबांध गांव के जमीन को भी कब्जा कर लिया है। रजवार टोला, महाता टोला, अंसारी टाली पूरी तरह से करखाना के भीतर कैद है। अंसारी टोला के लोग जहां से बाहर-अंदर आते -जाते थे, उनका रास्ता को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। रास्ता को मोटा लोहा का गेट से बंद कर बाहर से बिजलीचलित कांटानुमा तार लगा दिया गया है। जब कोई भी व्यत्कि उस गेट के पास पहुंचता है-आंदर कैद ग्रामीण दौड़ कर गेंट के पास आते हैं और अपनी पीड़ा का बयान करने लगते हैं। उनके आंखों में न्याय की गुहार करते नजरें और उनके दर्द भर दस्तान दिल को झकझोरने लगता है। 25 सितंबर को जब हमारी टीम गांव देखने पहुची-ग्रामीणों ने अपने खेत से होते हुए उस गेट में ले गये-जहां ग्रामीणों ने कंपनी को भागाबांध के ग्रामीणों के अंदर-बहर आने जाने के लिए खुला रखने के लिए अग्राह कर रास्ता छोड़वाया है। मुझ से आगे उसी बस्ती के लड़के करखाना के उस गेट तक पहुंचे। 5-6 की संख्या में लड़के थे। सिक्यूरिटी वालों ने उन लड़कों को अंदर जाने से रोकने लगे। तब सिक्यूरिटी और युवकों में तू-तू मैं-मैं होने लगी। मैं गेट पर पहुंची। मुझे देखते ही एक अधिकारी ने कहा-मैडम आइये। यह कहते उत्क अधिकारी  मेंरे साथ साथ चलने लगे। मुझ से आगे आगे दा हिंन्दु के रिपोटर तथा फोटोग्राफर दो-तीन लड़को के साथ जा रहे थे। अंसारी टोला के बंद गेट के पास पहुंचते ही रिपोटर और फोटोग्राफर अंदर बस्ती से भागे भागे गेट में पहुंचे ग्रामीणों से बातें करने लगे। फोटोग्राफर फोटो खिंचने लगा। इसको देखते ही साथ चल रहे अधिकारी मुझ को छोड़ कर उस गेट के पास दौड़ते पहुंच गये और सामने तार से सट कर खड़ा हो कर फोटो नहीं खिंचने के लिए। अधिकारी के मना करने पर फोटो खिंचना छोड़ कर सभी लोग आगे बढ़ गये। लेकिन उत्क अधिकारी अभी भी उस गेट में लगा बिजलीचलित कांटानुमा तार के सामने खड़ा है। जब सभी वहां से आगे बढ़ गये, अब यहां कोई नहीं है। मैं उत्क अधिकारी के सामने खड़ी उनको अग्राह करने लगी-चलिए सभी आगे जा रहे हैं। मैं हैरान थी-उसने अपना दोनों हाथ पीछे बढ़ते जा रहा है। दोनों हाथ -भुजा को कांटानुमा तार तक पहुंचाने की कोशीश  में है। उसका हाथ उस तार तक पहुंच कर उसमें सट रहा है। उनका पैर भी अहिस्ते अहिस्ते पीछे एंड़ी घिसक रहा है-मुझे समझ में आने लगा-कि ये अपना हाथ को तार के कांटो से सटा कर घायल करना चाह रहा है, एंड़ी पिछे घिसकाते जा रहा है-याने कांटा में अपना पैर का चोट करने की कोशिश  में है। मेरी निगाह उनके दोनों हाथ के भुजाओं और पैर था। इसी बीच कोई एक व्यत्कि आया उनके हाथ को चलिए कहते हुए पकड़ा और ले गया। जब तक मैं वहां से अपना पैर उठा कर आगे उस ओर बढ़ायी जिधर बाकी लोग जा रहे हैं-मैं आंख उठा कर आगे देखी-श्री तब तक मैं इस अधिकारी का नाम से अनजान थी-बाद में वहां मौजूद स्थानीय लोगों से इनका नाम पूछी-लोगों ने बताया-सिक्यूरिटी इंचार्ज बंजारा है।  मेरा मन उस साजिश  को समझ चुका था-मन मेरा भयभीत हो रहा था इस साजिश से। अभी भी यह दृ’य आंख के सामने झलकने लगता है, और मन सिहर उठता है। 

यह है कारखाना के भीतर कैद -अंसारी टोला 
अंसारी टोला से आगे बढ़+े-थोड़ा आगे कुछ गार्ड लोग थे। थोड़ा आगे दहिनी ओर चैडा सा लोहा का गेट के भीतर गिटी आदि का ढ़ेर दिख रहा था। उसे आगे बढ़े बांयी ओर करखाना का दिवार और दहिनी ओर चहरदीवारी था। जो रोड़ रजवार टोली और तक जाती है-10-12 फीट तक का होगा। ग्रामीणों ने बताया यह रोड़ गांव का ही है। रजवार टोली पहुंचते हल्का अंधेरा होने लगा था। पानी भी बरसने लगा था। छाता लगा कर ही हम लोग रजवार टोली और महाता टोली में घुम। लोगों से बात किये। संतोषजी के घर बैठे कागजातों को देखे। कई रैयतों से बातें हुई । अब तक अंधकार छा गया है। रैयतों के घरों के चारों ओर विशाल  करखाना है। घर के अंदर ललटेन के प्रकाश  में रैयतों ने हमलोगों ने कागजा दिखाये। घर से निकलते समय पैर संभाल कर निकल रहे थे। जैसे ही बाहर निकले महज 100 गज में विशाल ल करखाना जगमगा रहा है। टोली के पीछे उत्तर दिशा , पूरब दिशा  में भी करखाना में बिजली जगमगा रहा है। महाता टोली से पचीचम रजवार टोली है। तभी तो घर सब दिख रहा था लेकिन अब अंधकार में डुब गया। हमलोग मुबाईल के ट्रोचलाईट से रास्ता खोजते हुए बाहर निकलें। इधर तो करखाना का लाईट जगमागा रहा था। हम लोगों के साथ सियालजोरी थाना की पुलिस और श्री बंजारा साथ साथ थे और हमलोग उनके सामने ही बाहर निकले।

यह है कारखाना के भीतर - महता टोला 
8 अक्टोबर 13 के प्रभात खबर के अनुसार कंपनी द्वारा चंदनकियारी में तीन एमटी क्षमता के स्टील प्लांट का निर्माण हो गया है। कंपनी को पर्वतपुर कोल ब्लाक आवंटित किया गया है। पर आयरन ओर के लिए आवंटित कोदलीबांद माइंस के लिए दी गयी क्षतिपूर्ति वन भूमिं पिछले एक वर्ष से लंबित है। उत्पादन आरंभ करने के लिए 9-9-2011 करे ही कसेट टू आॅपरेट का आवेदन झारंखड राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद के पास लंबित है। कंपनी द्वारा 10 हजार करोड़ रूपये का निवेश  किया जा चुका है। 
कंपनी को अभी तक-1-कोयला माइंस का क्लीयरेंस नहीं मिला है
                  2-प्लांट लगाने के लिए 2400 एकड़ जमीन कंपनी ने गैर कानूनी तरीके से कब्जा किया है, इसमें 139 एकड़ वन भूमिं  है-वन विभाग ने इसका एनओसी अभी तक नहीं दिया है
                3-आयरन ओर के लिए आवंटित कोदलीबाद माइंस के लिए दी गयी क्षतिपूर्ति वन भूंमि पिछले एक साल से लंबित है। 
                  4-उत्पादन आरंभ करने के लिए 9.9.2011 को ही कंसेट टू आॅपरेट का आवेदन झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद के पास लंबित है। 
दूसरी ओर इलेक्ट्रो स्टील कंपनी 2006 से ही कोयला माइंस भी चला रही है और 6 एमटी वाला स्टील करखाना भी 2007 से निर्माण कार्य शुरु  किया जो 2012 से उत्पादन भी प्ररंभ कर दिया ।
झारखंड राज्य का मालिक अब राज्य सरकार नहीं है-राज्य का मालिक देशी -विदेशी  कंपनियां हैं, जो राज्य सरकार को चला रही है। कंपनियों के आगे सरकार का नियम-कानूनी कुछ भी नहीं चलता है -कंपनियां सरकार के नियम कानून का धलियां उड़ा रही हैं-लेकिन सरकार लाचार है, बेचारी है-कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है। 
यह सर्वविदित है कि-जो लोग सरकार को यह बताने की कोशिश  करते हैं-कि कंपनी वाले, पूजिपति संवैधानिक कानूनों को तोड़ कर जबरन आदिवासीयों-मूलवासियों, किसानों का जल-जंगल-जमीन कब्जा कर रहे हैं-इसंसे  रोका जाए, इस तरह के सवाल उठाने वालों को सरकार, कंपनी और जमीन दलाल-माफिया मिल कर उग्रवादी, उपद्रावी, राजद्रोही, विकास विरोधी कराक दे कर फर्जी मुकदामा लगा कर जेल में बंद कर देते हैं। 
आप लोगों को बता दें-25 सितंबर 2013 को रैयतों ने अपनी मांगों को लेकर काम रोड जाम आंदोलन किये थे। इस आंदोलन को समर्थन देने रांची से तीन साथी गये थे, साथ में मीडिया के साथी भी थे। 2 बजे पहुंचे। सभा स्थल में भाषण दिये। इसके बाद खिचड़ी खाने के बाद भागाबांध गांव गये। कंपनी ने मासस विधायक श्री अरूप चटर्जी के साथ मेरे उपर और साथ में 26 साथियों पर करखाना में तोड़-फोड़ करने, गाली-गलौज करने, मार-पीट करने का अरोप लगा कर सियालजोरी थाना में केस कर दिया 

Sunday, October 20, 2013

अंग्रेजों के समय से भी ज्यादा दमन कर रहा है इलेक्ट्रो स्टील कंपनी ---मिलिए भागाबंध गाँव के अंसारी टोला के ग्रामीणों से


अंग्रेजों के समय से भी ज्यादा दमन कर रहा है इलेक्ट्रो स्टील कंपनी ---मिलिए भागाबंध गाँव के अंसारी टोला के ग्रामीणों से 


इलेक्टो स्टील ने भगाबांध गांव के जमीन को भी कब्जा कर लिया है। रजवार टोला, महाता टोला, अंसारी टाली पूरी तरह से करखाना के भीतर कैद है। अंसारी टोला के लोग जहां से बाहर-अंदर आते -जाते थे, उनका रास्ता को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। रास्ता को मोटा लोहा का गेट से बंद कर बाहर से बिजलीचलित कांटानुमा तार लगा दिया गया है। जब कोई भी व्यत्कि उस गेट के पास पहुंचता है-आंदर कैद ग्रामीण दौड़ कर गेंट के पास आते हैं और अपनी पीड़ा का बयान करने लगते हैं। उनके आंखों में न्याय की गुहार करते नजरें और उनके दर्द भर दस्तान दिल को झकझोरने लगता है। 25 सितंबर को जब हमारी टीम गांव देखने पहंुची-ग्रामीणों ने अपने खेत से होते हुए उस गेट में ले गये-जहां ग्रामीणों ने कंपनी को भागाबांध के ग्रामीणों के अंदर-बहर आने जाने के लिए खुला रखने के लिए अग्राह कर रास्ता छोड़वाया है। मुझ से आगे उसी बस्ती के लड़के करखाना के उस गेट तक पहुंचे। 5-6 की संख्या में लड़के थे। सिक्यूरिटी वालों ने उन लड़कों को अंदर जाने से रोकने लगे। तब सिक्यूरिटी और युवकों में तू-तू मैं-मैं होने लगी। मैं गेट पर पहुंची। मुझे देखते ही एक अधिकारी ने कहा-मैडम आइये। यह कहते उत्क अधिकारी  मेंरे साथ साथ चलने लगे। मुझ से आगे आगे दा हिंन्दु के रिपोटर तथा फोटोग्राफर दो-तीन लड़को के साथ जा रहे थे। अंसारी टोला के बंद गेट के पास पहुंचते ही रिपोटर और फोटोग्राफर अंदर बस्ती से भागे भागे गेट में पहुंचे ग्रामीणों से बातें करने लगे। फोटोग्राफर फोटो खिंचने लगा। इसको देखते ही साथ चल रहे अधिकारी मुझ को छोड़ कर उस गेट के पास दौड़ते पहुंच गये और सामने तार से सट कर खड़ा हो कर फोटो नहीं खिंचने के लिए। अधिकारी के मना करने पर फोटो खिंचना छोड़ कर सभी लोग आगे बढ़ गये। लेकिन उत्क अधिकारी अभी भी उस गेट में लगा बिजलीचलित कांटानुमा तार के सामने खड़ा है। जब सभी वहां से आगे बढ़ गये, अब यहां कोई नहीं है। मैं उत्क अधिकारी के सामने खड़ी उनको अग्राह करने लगी-चलिए सभी आगे जा रहे हैं। मैं हैरान थी-उसने अपना दोनों हाथ पीछे बढ़ते जा रहा है। दोनों हाथ -भुजा को कांटानुमा तार तक पहुंचाने की कोशिश में है। उसका हाथ उस तार तक पहुंच कर उसमें सट रहा है। उनका पैर भी अहिस्ते अहिस्ते पीछे एंड़ी घिसक रहा है-मुझे समझ में आने लगा-कि ये अपना हाथ को तार के कांटो से सटा कर घायल करना चाह रहा है, एंड़ी पिछे घिसकाते जा रहा है-याने कांटा में अपना पैर का चोट करने की कोशिश में है। मेरी निगाह उनके दोनों हाथ के भुजाओं और पैर था। इसी बीच कोई एक व्यत्कि आया उनके हाथ को चलिए कहते हुए पकड़ा और ले गया। जब तक मैं वहां से अपना पैर उठा कर आगे उस ओर बढ़ायी जिधर बाकी लोग जा रहे हैं-मैं आंख उठा कर आगे देखी-श्री तब तक मैं इस अधिकारी का नाम से अनजान थी-बाद में वहां मौजूद स्थानीय लोगों से इनका नाम पूछी-लोगों ने बताया-सिक्यूरिटी इंचार्ज बंजारा है।  मेरा मन उस साजिश  को समझ चुका था-मन मेरा भयभीत हो रहा था इस साजिश  से। अभी भी यह दृष्य  आंख के सामने झलकने लगता है, और मन सिहर उठता है। 

झारखण्ड में कम्पनी राज --जरा यंहा देखिये -क्या हो रहा है-आप के राज में




झारखण्ड में कम्पनी राज --जरा यंहा देखिये -क्या हो रहा है-आप के राज में 

झारखंड राज्य का मालिक अब राज्य सरकार नहीं है-राज्य का मालिक देशी -बिदेशी  कंपनियां हैं, जो राज्य सरकार को चला रही है। कंपनियों के आगे सरकार का नियम-कानूनी कुछ भी नहीं चलता है -कंपनियां सरकार के नियम कानून का धजियाँ  उड़ा रही हैं-लेकिन सरकार लाचार है, बेचारी है-कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है। 
यह सर्वविदित है कि-जो लोग सरकार को यह बताने की कोशिश  करते हैं-कि कंपनी वाले, पूजिपति संवैधानिक कानूनों को तोड़ कर जबरन आदिवासीयों-मूलवासियों, किसानों को जल-जंगल-जमीन कब्जा कर रहे हैं-इसे  रोका जाए, इस तरह के सवाल उठाने वालों को सरकार, कंपनी और जमीन दलाल-माफिया मिल कर उग्रवादी, उपद्रावी, राजद्रोही, विकास विरोधी कराक दे कर फर्जी मुकदामा लगा कर जेल में बंद कर देते हैं। 

कंपनी को अभी तक-1-कोयला माइंस का क्लीयरेंस नहीं मिला है

                2-प्लांट लगाने के लिए 2400 एकड़ जमीन कंपनी ने गैर कानूनी तरीके से कब्जा किया है, इसमें 139 एकड़ वन भूमिं  है-वन विभाग ने इसका एनओसी अभी तक नहीं दिया है
                3-आयरन ओर के लिए आवंटित कोदलीबाद माइंस के लिए दी गयी क्षतिपूर्ति वन भूंमि पिछले एक साल से लंबित है। 
                  4-उत्पादन आरंभ करने के लिए 9.9.2011 को ही कंसेट टू आपरेट  का आवेदन झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद के पास लंबित है। 
छूसरी ओर इलेक्ट्रो स्टील कंपनी 2006 से ही कोयला माइंस भी चला रही है और 6 एमटी वाला स्टील करखाना भी 2007 से निर्माण कार्य शुरु  किया जो 2012 से उत्पादन भी प्ररंभ कर दिया ।

यह है भागाबंध गाव का अंसारी टोली -जिसको इस तरह से कैद कर रखा है -अंग्रेजों से भी ज्यादा जुल्म कंपनी कर रहा है - इसकी जानकारी मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन को ३० सितम्बर को वार्ता के समय दिया गया-इस पर कंपनी के सी एम डी और कंपनी के दूसरे अधिकारीयों ने इंकार किया -की अंसारी टोला के साथ ऐसा कुछ भी नहीं किया गया है




यह है इलेक्ट्रो स्टील प्लांट -- कंपनी ने २४०० एकड़ जमीन   क़ानूनी तरीके से रैयतों से ले लिया है 





यह है भागाबंध गाव का अंसारी टोली -जिसको इस तरह से कैद कर रखा है -अंग्रेजों से भी ज्यादा जुल्म कंपनी कर रहा है - इसकी जानकारी मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन को ३० सितम्बर को वार्ता के समय दिया गया-इस पर कंपनी के सी एम डी और कंपनी के दूसरे अधिकारीयों ने इंकार किया -की अंसारी टोला के साथ ऐसा कुछ भी नहीं किया गया है 

इलेक्टो स्टील ने भगाबांध गांव के जमीन को भी कब्जा कर लिया है। रजवार टोला, महाता टोला, अंसारी टाली पूरी तरह से करखाना के भीतर कैद है। अंसारी टोला के लोग जहां से बाहर-अंदर आते -जाते थे, उनका रास्ता को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। रास्ता को मोटा लोहा का गेट से बंद कर बाहर से बिजलीचलित कांटानुमा तार लगा दिया गया है। जब कोई भी व्यत्कि उस गेट के पास पहुंचता है-आंदर कैद ग्रामीण दौड़ कर गेंट के पास आते हैं और अपनी पीड़ा का बयान करने लगते हैं। उनके आंखों में न्याय की गुहार करते नजरें और उनके दर्द भर दस्तान दिल को झकझोरने लगता है। 25 सितंबर को जब हमारी टीम गांव देखने पहंुची-ग्रामीणों ने अपने खेत से होते हुए उस गेट में ले गये-जहां ग्रामीणों ने कंपनी को भागाबांध के ग्रामीणों के अंदर-बहर आने जाने के लिए खुला रखने के लिए अग्राह कर रास्ता छोड़वाया है। मुझ से आगे उसी बस्ती के लड़के करखाना के उस गेट तक पहुंचे। 5-6 की संख्या में लड़के थे। सिक्यूरिटी वालों ने उन लड़कों को अंदर जाने से रोकने लगे। तब सिक्यूरिटी और युवकों में तू-तू मैं-मैं होने लगी। मैं गेट पर पहुंची। मुझे देखते ही एक अधिकारी ने कहा-मैडम आइये। यह कहते उत्क अधिकारी  मेंरे साथ साथ चलने लगे। मुझ से आगे आगे दा हिंन्दु के रिपोटर तथा फोटोग्राफर दो-तीन लड़को के साथ जा रहे थे। अंसारी टोला के बंद गेट के पास पहुंचते ही रिपोटर और फोटोग्राफर अंदर बस्ती से भागे भागे गेट में पहुंचे ग्रामीणों से बातें करने लगे। फोटोग्राफर फोटो खिंचने लगा। इसको देखते ही साथ चल रहे अधिकारी मुझ को छोड़ कर उस गेट के पास दौड़ते पहुंच गये और सामने तार से सट कर खड़ा हो कर फोटो नहीं खिंचने के लिए। अधिकारी के मना करने पर फोटो खिंचना छोड़ कर सभी लोग आगे बढ़ गये। लेकिन उत्क अधिकारी अभी भी उस गेट में लगा बिजलीचलित कांटानुमा तार के सामने खड़ा है। जब सभी वहां से आगे बढ़ गये, अब यहां कोई नहीं है। मैं उत्क अधिकारी के सामने खड़ी उनको अग्राह करने लगी-चलिए सभी आगे जा रहे हैं। मैं हैरान थी-उसने अपना दोनों हाथ पीछे बढ़ते जा रहा है। दोनों हाथ -भुजा को कांटानुमा तार तक पहुंचाने की कोशिश में है। उसका हाथ उस तार तक पहुंच कर उसमें सट रहा है। उनका पैर भी अहिस्ते अहिस्ते पीछे एंड़ी घिसक रहा है-मुझे समझ में आने लगा-कि ये अपना हाथ को तार के कांटो से सटा कर घायल करना चाह रहा है, एंड़ी पिछे घिसकाते जा रहा है-याने कांटा में अपना पैर का चोट करने की कोशिश में है। मेरी निगाह उनके दोनों हाथ के भुजाओं और पैर था। इसी बीच कोई एक व्यत्कि आया उनके हाथ को चलिए कहते हुए पकड़ा और ले गया। जब तक मैं वहां से अपना पैर उठा कर आगे उस ओर बढ़ायी जिधर बाकी लोग जा रहे हैं-मैं आंख उठा कर आगे देखी-श्री तब तक मैं इस अधिकारी का नाम से अनजान थी-बाद में वहां मौजूद स्थानीय लोगों से इनका नाम पूछी-लोगों ने बताया-सिक्यूरिटी इंचार्ज बंजारा है।  मेरा मन उस साजिश  को समझ चुका था-मन मेरा भयभीत हो रहा था इस साजिश  से। अभी भी यह दृष्य  आंख के सामने झलकने लगता है, और मन सिहर उठता है

Saturday, October 5, 2013

CM SHREE HEMANT SOREN SE ELECTRO STELL KE DAWARA RAYATON PAR HO RAHA ANEYAY PAR VARTA..

तीस सितंबर सरकार से वर्ता
स्थान-प्रोजक्ट भवन
समय-5 बजे
उपस्थित-मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन
मुख्य सचिव-श्री सुखदेव सिंह
ग्रह सचिव-श्री जेबी तुबिद
उद्योग निदे’ाक-श्रीमति बंदना दादेल
लेबर कमि’नर-
श्री बसंत
इलोक्ट्रो स्टील-सीएमडी-श्री उमंग केजरीवाल
श्री सत्येंद्र
श्री मोटी
विस्थापितों की ओर से-श्री अरूप चटर्जी विधायक-निरसा
                   -निताई महतो-रैयत
                   -वाकिल-रैयतों का
                   -दयामनी बरला
बैठक में मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन जी ने कहा-आज यहां बोकारों में इल्केट्रोस्टील द्वारा कंपनी के लिए जमीन अधिग्रहण किया है साथ में कोयला माइंस भी चला रहा है। इसमें रैयतों के साथ जो दिक्कतें आ रही हैं-उसके संबंध में हम लोग बैठे हैं। समस्यों को रखेंगे -समझेगें और उसका हल किस तरह निकाला जाए -इस पर बिचार किया जाएगा। 
श्री अरूप चटर्जी ने रैयतों की बातें रखना शुरू किये। बोलें-उद्योंग निशचित रूप से लगे ताकि विकास हो। इलेक्ट्रो स्टील  कंपनी प्लांट के लिए 2200 एकड़ जमीन ले ली है। इसमें काफी रैयती जमीन है, कुछ सरकारी जमीन है, कुछ वन विभाग का जमीन है। 
रैयती जमीन-को कंपनी ने अपने नाम से नहीं खरीदा, एक्स, वाई, जेड के नाम से जमीन रजिस्ट्री करवा लिया और बाद में इस जमीन को उत्क खरीददारों ने कंपनी को बेच दिया। जब रैयतों से जमीन लिया गया-तब रैयतों को बताया भी नहीं गया कि यहां करखाना बनाया जाएगा। यह इस जमीन को स्टील प्लांट बैठाने के लिए लिया जा रहा है। 
जमीन खरीदने वाले दलालों ने रैयतों से जो जैसा सका जमीन का कीमत भुगतान किया। कुछ रैयतों को जमीन का कीमत 500, कुछ को 800 रू, कुछ को 1200 रू प्रति डिसमिल भुगतान किया गया, 2005-5-6 में। जबकि उस समय जमीन का सरकारी दर 8000 रू डिसमिल तक था। 
विधायक-रैयतों को बेवकुफ बना कर जमीन लिया गया। कुछ लोगों का जमीन वैसे ही कब्जा कर लिया-जब कि जमीन मालिक जमीन देना नहीं चाह रहा था-फिर भी जबरन जमीन कब्जा कर लिया, इस जमीन का अब तब एक पैसा भी नहीं दिया रैयतों को। 
भगाबांध गांव फैक्ट्री के भीतर है। गांव वालों को बाहर आने-जाने में बहुत कठिनाई हो रही है। इन लोगों के साथ बहुत अनावीय व्योहार किया जा रहा है। एक टोला को पूरी तरह से बंद करके रखा है।
रैयतों को नौकरी देने की बात की थी-नही ंदे रहा है। जिन लोगों को नौकरी में रखा है बहुत कम मजदूरी दिया जा रहा है। 5000 तक दे रहा है। जो काम कर रहे हैं-उनको बीएसएल का वेतनमान दिया जाना चाहिए।
जिन  रैयतों  का जमीन ५००० रूपया , 800  रूपया।  1200  रूपया  डिसमिल लिया गया है -रैयतों को बर्तमान सरकारी रेट में -18ooo -20000 रूपया डिसमिल के रेट से जमीन का कीमत दिया जाय 
हम लोगों ने बात रखी-जिन लोगों ने जमीन देना नहीं चाहा-उन लोगों को फरजी मुकदमा में फंसा दिया गया है। रैयत जितने बार अपने खेत में जाते हैं-उतना बार केस कर दे रहे हैं। यहां इन बातों को भी देखना होगा-कि जिनके पास मात्र 10 डिसमिल था वहीं उनका सब कुछ था, उनकों भी नौकरी देना होगा-इसलिए कि वही उनका जिंदगी था। दूसरी बात है-रैयतों का मांग है-कि जिन रैयतों को जमीन गया उनको नौकरी में पहला प्रथमिकता, दूसरा-जिनका बहुत कम जमीन गया-उनको भी नौकरी मिले, तीसरा-जिनका जमीन नहीं गया है-लेकिन वह कंपनी स्थापित हुआ है-उस इलाके को तो उनको भी नौकरी देना है।  उसके बाद बाहर के लोगों को देना है। 
इन बातों को विधायकजी के रखने के बाद-मुख्यमंत्री श्री हेमंत जी इन्हीं बिंन्दुओं पर अपनी बात रखे। 
इन्होंने इल्केट्रस्टील के प्रतिनिधियों से पूछा-कितना जमीन अधिग्रहण किये हैं?
कंपनी के लोंग-2400 एकड़ लिये हैं
सीएम-जमीन कंपनी के नाम से रजिस्ट्री किये हैं? या व्यक्ति के नाम पर?
कंपनी -सर कंपनी के नाम पर
अरूप और मैं - नहीं कंपनी के नाम पर नहीं किये हैं-व्यक्ति के नाम पर किये हैंं 
कंपनी-नहीं सर कुछ कागजात दिखाते हुए-कंपनी के नाम से
हम दोनों-नहीं व्यत्कि के नाम से किये हैं-हम लोगों के पास व्यत्कि के नाम प्लेन पेपर पर किया हुआ विक्री डीड है
सीएम-अधिकारियों को-आप इसका सत्यपन कराइ्रये, जिनता जमीन लिया है सबका
बंदना दादेल-इसमें से एक सौ उनचालीस एकड़ वन भूमिं है-इसका केस अभी हाई कोर्ट में है। 
कंपनी-सर हम लोगों के उपर तो तीन-चार केस कर दिया गया है
बंदना दादेल-हां आप लोगों को तो अभी प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड से एनओसी भी शायद यद नहीं हुआ है
सीएम-हां प्रदुषण बोर्ड को एनओसी नहीं मिला है?
कंपनी-जी सर अभी प्रोसेस में है
सीएम-अधिकारियों को-देख लीजिएगा कंहा तक पहुंचा है
सीएम-सीसीएल का मामला तो बहुत पुराना है-लेकिन यह मामला तो अभी का है। गैर मजरूआ जमीन रजिस्टड ही नहीं होता है
जे0बी0 तुबिद-जंगल-झाड़ी जीमन पर जो एक सौ उनचालीस एकड़ है, उस पर हाई कोर्ट में केस है। वन भूंमि 477 एकड़ है। बाकी रैयती जमीन है। 
सीएम-इसको चेक कर लीजिएगा
सीएम-कितने इमप्लोयी हैं-?
कंपनी- 1170 हैं
तीन एकड़ वाले रैयत 517 हैं। तीन एकड़ से कम जमीन वाले कितने हैं? इसका का जवाब किसी ने नहीं दिया
सीएम-2007 से आप लोग वहीं काम कर रहें हैं, पहले तो लोकल समस्य को हल करना चाहिए था। आप लोगों ने मिडिल मैन के नाम पर जमीन रखीदे, कोई अनडस्टेंडिंग नहीं हैं। रैयतों को अंधेरे में रख कर जमीन लिये आप लोग। 
कंपनी-2011 में शुरू करने वाले थे-लेकिन नहीं हुआ-कारण कि चैना के लेबर हैं, बीच में वापस चले गये थे और समय पर वापस नहीं आये। दूसरा समस्या फाईनान्स का भी है। 
सीएम-आप लोगों को प्रदूषण बोर्ड से एनओसी भी नहीं मिला है
कंपनी-जी सर नहीं मिला है, इसके लिए हम लोग कोर्ट गये हैं लेकिन अभी तक नहीं हुआ हआ
अधिकारी-वन विभाग का कहना है कि वन भूमिं है तो इसमें इंडस्ट्री नहीं लगा सकते हैं। प्रधान सचिव को पूछा गया है-यह वन भूमिं है यह नहीं स्पष्ट करें। अधिकारियों ने बताया-वन विभाग इस मामले को लेकर सुपी्रम कोर्ट गये हैं। 
सीएम-आप को कोयला मांइस चल रहा है? लीज हुआ है?
कंपनी के अधिकारी-लीज क्लीयर नहीं हुआ है। इसके लिए भी कोर्ट गये है-अभी तक क्लीयर नहीं हुआ है, अभी मामला सुप्रीम कोर्ट में है। 
सीएम-अभी माइ्रनिगं चल रहा है?
कंपनी-जी हां चल रहा है, यदि लीच नहीं देगें तो दिक्कत होगा
सीएम-भगाबांध गांव फैक्ट्री के भीतर है?
कंपनी नहीं फैक्ट्री के कोरनर में है
हम दोनों-नहीं नहीं कोरनर में नहीं है-फैक्ट्री के भीतर ही है
सीएम-अधिकारियों को आप इसका जाच कीजिए
सीएम-आप लोगों का पूनर्वास और पूर्नास्थापन नीति है?
कंपनी-जी नहीं है
सीएम-ये कैसे होगा! आप अपना पूनर्वास और पूर्नास्थापन नीति बना लीजिए। आप को क्या नियम-कानून है, क्या पाॅलेसी है विस्थापितों के सामने अपना स्वेत पत्र जारी कीजिए। आप यह काम शुरू में ही करना था। इसी लिए दिक्कत हो रहा है। और आप एैसा नहीं कीजिएगा तो हमेशा  आप को इस तरह के समस्याओं को फेस करना होगां । 
अरूपजी-देखिये इन लोगों ने हमारे उपर केस कर दिया हें, दयामनी जी के उपर भी केस किये है। कंपनी वालों से पूछा-आप बताइये कि दयामनी जी कहां तोड़-फोड़ की हैं । दयामनी जी तो सिर्फ 2 घंण्टा वहां था-भाषण देकर चली आयी, और आप लोग इन तोड़ फोड़ को अरोप लगाये हैं। 
सीएम-ये बहुत बड़ा गलत काम आप लोग कर रहे हैं(कंपनी वालों से), मतलब सरकार के लोगों को भी आप मिला लिये हैं-तब ही आप के कहने पर पुलिस प्राशासन  इन लोगों पर एफ0 आई0 आर कर रहा है। एैसा नहीं चलेगा
सुखदेव सिंह-आप लोगों ने तो अपने लिए थाना भी बैठा लिये हैं! (कंपनी वालों से)
सीएम-हां अपने लिये थाना बैठा लिए हैं? अधिकारी हाॅं इन लोगों ने अपने फैक्ट्री के गेट में सियालजोरी थाना को बैठा दिये हैं। 
सीएम ने आदेश  दिये-
1-2007 से आज तक रैयतों पर जो भी केस किया गया है -उसका सूची मंगवाइये
2-लेबर कमि’नर को आदेश -सरकार दर क्या है-सूची तैयार करो
-रैयतों का जमीन -जो कंपनी ली है-उसका सूची, रजिस्ट्री कागजात सहित एकत्र करो
4-कंपनी को-आप का आर0 आर0 पोलेसि क्या है-नियम-कानून क्या बनाये हैं-रैयतों के सामने स्वेत पत्र जारी कीजिए
5-कंपनी कोयला कहां बेच रहा है-पता कीजिए
6-भगाबांध गांव का जायजा लिया जाए
नोट-फिर से रिवियू करेगें
बहर निकल कर-रैयतों को सीएम श्रे हेमंत जी ने कहा-आप लोगों के समस्याओं पर लंबी बता-चीत हुए। मैं आप लोगों के साथ हूुं, आप लोगों के सारी समस्योओं को हल किया जाएगा। 

Tuesday, August 13, 2013

तब हर हाल में आदिवासी मूलवासी सामाजिक एकता-समुहिकता की ताकत को फिर से पूनसंगठित करने की जरूरत है।

आज पूरे  झारखंड के ग्रामीण-किसानों के उपर विस्थापन का तलवार लटक रहा है। इसे न सिर्फ किसानों का अस्तित्व संटक में है बाल्कि झारखंड का पर्यावरण, जैविक-विधिता, सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना, भौगोलिक संरचना सभी के उपर विनाश का बादल मंडरा रहा है। राज्य में 13 साल के भीतर करीब 104 देशी और विदेशी कंपनियों के साथ यहां उद्वोग लगाने के लिए राज्य सरकार ने एकरारनामा किया। इन कंपनियों में से 98 प्रति’ात कंपनियां सिर्फ स्टील उत्पदाक हैं। सभी कंपनियों को अपना व्यवसाय को बढ़ाने के लिए सैंकड़ो एकड़ जमीन चाहिए। नदियों, का झरनों का और धरती के नीचे का पानी भी कंपनियों को चाहिए। जंगल-झाड सभी उन्हें चाहिए। तब यहां सवाल उठता है-क्या झारखंड का अस्तिव्त बच पाएगा? आदिवासी-मूलवासी किसान बच पाऐगें? क्या आदिवासी सामाज की संस्कृतिक विरासत बच पाऐगी? यहां का पर्यावरण बच पाऐगा? क्या यहां की कृर्षि भूंमि रहेगी? यह एक अहम सवाल है                        

आजादी के बाद गुजरे इन 65 सालों में विकास के नाम पर स्थापित विभिन्न परियोजनाओं की वजह से 2 करोड़ से अधिक झारखंडी आदिवासी-मूलवासी विस्थापित हो चुके हैं। इन विस्थापितों में से मात्र 5 से 6 प्रतिशत को ही किसी तरह पूनर्वासित किया जा सका है। शेष विस्थापित आज अपनी भूमि से बेदखल होकर एक बेला की रोटी के लिए दर-दर भटक रहे हैं। इनके पेट में आनाज नहीं है। इनके सर के उपर छत नहीं है। इसके बदन पर कपड़े नहीं हैं। इलाज के अभाव में बेमौत मर रहे हैं। कभी जमीन के खूंटकटीदार रहे विस्थापित, अब कुली-रेजा और बंधुआ मजदूर बन गये हैं। खेत-खलिहान से उजड़ने के बाद बहु-बेटियां महानगरों में जूठन धोने को मजबूर हैं। पहले जहां आदिवासियों की संख्या 70 प्रतिशत थी, 2001 की जनगणना में मात्र 26 प्रतिशत में सिमट गये। इन विस्थापितों में आज 80 प्रतिशत आदिवासी-दलित महिलाएं ऐेनेमिया (खून की कमी) की शिकार हैं। 85 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। आखिर विस्थापित आदिवासीं-मूलवासियों को क्या मिला। 80 प्रतिशत विस्थापित युवावर्ग बेरोजगार हैं-आखिर क्यों। 

विकास के नाम पर उजड़े विस्थापितों के पीड़ा ने राज्य और देश के सामने कई अहम सवाल खड़ा किये हैं। यह सर्वविदित है कि इन सवालों के प्रति राजनेताएं, सरकारी तंत्र, राजकीय व्यवस्था तथा देश की कानून व्यवस्था भी र्निउतर है। विकास में योगदान देने के लिए झारखंड के किसानों-आदिवासियों-मूलवासियों ने अपने पूर्वजों द्वारा आबाद जल-जंगल-जमीन, घर-द्वार, खेत -खलिहान सभी न्योछावर किया। इनकी जमीन पर एचईसी, बोकारो थर्मल पावर, तेनुघाट, चंद्र्रपुरा, ललपानिया डैम, सीसीएल, बीसीएल, इसीएल, चांडिल डैम, टाटा स्टील प्लांट, यूसीएल यूरेनियम माइंस, चिडिया माइंस, बोक्साइड खदान, चांडिल डैम, पतरातु थर्मल पावर प्लांट, टाटा स्टील, कोहिनूर स्टील, वर्मा माइंस, राखा माइंस, करमपदा, किरीबुरू, बदुहुरांग, महुलडीह जैसे सौकडा+ें खदान और कारखाना बैठाया गया। सवाल है इससे किसका विकास हुआ?। यहां के विस्थापितयों के जिंदगी को जरूर नजदीक से देखना चाहिए। पिछलेे सप्ताह चांडिल के विस्थापितों को मुआवजा देने की मांग पर की गई पीआइएल का सुनवाई करते हुए हाईकोट ने कहा कि विस्थापन के 35 वर्ष भी आज तक विस्थापितों को मुआवजा नहीं मिला है यह टिप्पणी करते हुए सरकार को एक माह के भीतर मुआवजा भूगतान करने की बात कही। 

2005 में वि’व बैंक ने केंन्द्र सरकार के पास प्रस्ताव दिया था शहरी विकास, योजना का। इसके तहत यह समझौता किया गया कि-शहरी विकास के लिए ‘शहर, में बड़े पूंजिपतियों को जगह देना होगा। शहर का अकार्षक बनाना होगा। इसके लिए छोटे मकानों, झुगी-झोपडियों को साफ करना होगा। शहर, को साथ-सुथरा रखने में, नागरिकों को बुनियादी सुविधाऐं देने में सरकार विफल है-इस लिए यह काम प्राईवेट पर्टनरशिप  -पीपीपी को दिया जाए। गैरतलब है कि-इसके लिए भी जमीन चाहिए। हर कमद में जमीन चाहिए। सरकार अपने को प्राईवेट कंपनियों के  हाथों सौंप दे रही है। 

2005 के जनेेराशन मिशन के तहत शहरों में अतिक्रमन, हटाने के नाम पर शहरों, के गरीबों को साफ किया। इस कानून के एक्सटेंशन-2011 सुप्रीम कोट का फैसला है। इसी के तहत देश  के सभी राज्य के हाईकोट ने आदेश  दिया है-कि ग्रामीण इलाकों में पंचायत स्तर पर जितने भी गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, परती जमीन, समुदायिक जमीन, बंजर भूमि आदि को पंचायत के अधिकार में करने का निर्देश  दिया है। इसी के आधार पर पूरे झारखंड के जिला प्रशासनों , अंचलों अधिकारियों को नोटिश  जारी कर दिया है। इसकी कारईवाई भी शुरू  की दी गयी । गांव किसानों को पत्ता भी नहीं हैकि उनके जमीन पर सरकारी अधिकारी क्यों घेरा बंदी कर रहे हैं। जिस जमीन पर किसान सदियों से खेती-बारी करते आ रहे थे-आज उस जमीन पर मलगुजारी किसानों को मलगुलारी देने पर रोक लगाया जा रहा हैं।

एक तरफ सरकार की जनविरोधी नीति, कारपोरेट घराना, जमीन माफिया- ठेकेदार, पुलिस माफियाओं के गंठजोड़ की बंदूक, आदिवासी-मूलवासी किसानों के जल-जंगल-जमीन छीनने के लिए गरज रहा हैं-वहीं दूसरी ओर अपना वर्चस्वा कायम  करने में लगे उग्रवादीवाद गतिविधियों ने भी गा्रमीण सामाज बहुत हद तक प्रभावित कर दिया हे। दोनों ताकतें मिल कर गा्रमीण समाज को आतंक में कैद कर ले रहा है। जंगल-झाड़, नदी-झरना, खेत-खलिहान पहले, गाय, भैंस बकरी चराने वाले युवकों के बंसुरी की तान और गीतों से रसमय और रोमंचित हो उठता था। खेत-खलीहान, जंगल-झाड़ में काम कर रहे लोगों को पता चला जाता था कि-फंला आदमी कहां है। गीत और बंसुरी की मधुर धुन से ही व्यक्ति की पहचान करते थे कि उस दि’ाा में कौन भैंस, गाय चराने गया है। साथी अपने मावेशियों  को उसी ओर ले जाता था और सभी साथी साथ चरवाही करते थे। अब समूचा ग्रामीण इलाका बंदूक और अधुनिका हथियारों के गोलियों के आवाज से थररा रहा है। मंदर और नागाड़ा भय से चुप हो गया। वर्चास्व स्थापित करने के लिए उग्रवादी संगठनों के संघर्ष से लाल होती धरती के आतांक से अखड़ा भी अब सनाटा में तब्दील हो गया। खेत-खलिहान में दिन भर मेहनत करने के बाद शाम को निशचिंत  गली-कोचा में झुंण्ड बना कर गांव के समस्याओं पर युवक चर्चा करते थे, यह मनोरंजर करते थे। गांव के बुजूर्गों की टोली एक अलग जगह में बैठता था। परिवार और सामाजिक दुख-दर्द एक दूसरे से बांटते थे। अब सभी जगह भय के आंतांक में तब्दील हो गया। अब सूरज की रोशनी हल्का अंधकार में बदलते ही कोई भी आदमी घर से बाहर नहीं रहता है। हल्का अंधकार होते ही-घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। सभी कोशिश करते हैं-जितना जल्दी हो -खाना खा कर डिबरी-लालटेन बुझा कर  लेदरा-पटिया में चले जाएं। 
बरसात के दिनों में कादो खेत रोपा-डोभा, गाय, भैंस, बकरी से काम निपटा कर घर वापस आते थे। महिलाएं चुल्हा-चैका, लकड़ी-झूरी में जुट जाती थीं। पुरूष यह युवा वर्ग घर के भीतर ही मंदर टंगा कर बजाने लगते थे। बंसुरी में माहीर लोग बंसुरी बजाते थे। मंदर और बंसुरी सुन कर गांव के सभी लोगों का थकान दूर होने लगता था। सप्ताह के एक-एक दिन का महत्व होता था। पूरा सप्ताह एक दिन इस गांव में, एक दिन कहीं दूसरे गांव में बाजार लगता है। सप्ताह के दो-तीन दिन अपने नजदीकी गांवों में लगता है। लोग गांव की सामाजिक कार्यों को इसी के आधार पर निस्चित  करते थे। 
आदिवासी सामाज का जीवन शैली -भाषा-संस्कृति, आर्थिक-सामाजिक अस्तित्व पूरी तरह से प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है। हर मौसम में सामाज ने धार्मिक-संस्कृतिक मूल्यों को कई रीति-रिवाजों में संपन करता है। सामाजिक, आर्थिक, संस्कृतिक, भाषाई और इतिहासिक शक्ति  को मजबूत करने के लिए मौसम आधारित परब-त्योहार, जतरा आदि लगाते थे। जतरा-गर्मी के शुरुआत  आत में और अगहन महिना में कहीं डाईर जतरा, बुरू जतरा के रूप में संपन करते थे। वहीं अगहन महिना में दसांइ और डाईर जतरा होता था। सरहूल-करमा सहित दर्जनों प्रकृतिक त्योहारों का संपन होता था। कोई एैसा गांव नहीं था-जिस गांव में दर्जनों मंदर, बंसुरी, नागाड़ा, ढोल नहीं हो। परब-त्योहार को छोड़ सप्ताह में दो-तीन रात फिक्स होता था-जिस रात को पूरा गांव नाचते थे। गांव गांव मंदर-नगाडा के आवाज से गुंज उठता था। 
आदिवासी सामाज में सेन गी सुसुन-कजी गी दुरंग, दुखः में भी गाते-नाचते हैं-यही जीवंत संस्कृति आदिवासी सामाजिक एकता-समुहिकता की ताकत है। यह सच है जब तक आदिवासी समाज गाते-राचते रहेगा-उनकी समुदायिक ताकत को कोई तोड़ नहीं सकता । लेकिन विकास का बवंडर ने आदिवासी समाज की इस संस्कृतिक विरासत को छकछोर कर रख दिया है। आज हमें अपनी संस्कृतिक विरासत कमजोर लगने लगी है-प’िचमी सभ्यता-संस्कृति हमें ताकतवर सहमूस होने लगा है। हमारी इस मनसिक कमजोरी की देन है-कि आज हम अपनी समुहिक ताकत को तोड़ कर व्यत्किवादी ताकत को मजबूत करने में लगे हैंं। आज हमारे बीच घरेलू हिंसा जब्रजस्त घर करता जा रहा है। धर्म के नाम पर ईसाई और सरना की राजनीति हो रही है। एक समुदाय दूसरे समुदाय के खिलाफ सोच रहा है। एक सामाजिक अगुवा दूसरे अगुवे को खिंच रहा है। हर कोई एक दुसरे को नीचा दिखाने में पूरी ताकत लगा दे रहे हैं। तब हम आदिवासी सामाज को पूरी इमानदारी के साथ अपना भी अत्मसात करने की जरूरत है। तब आदिवासी समाज बच पाएगा। जब आप के दु’मन चारों ओर से घेरे हुए हैं, राजतंत्र, पुलिसतंत्र, माफियातत्रं, पूंजिपति और बाजारवाद, आप पर हावी होते जा रहे हैं। तब हर हाल में आदिवासी मूलवासी सामाजिक एकता-समुहिकता की ताकत को फिर से पूनसंगठित करने की जरूरत है।  

Sunday, July 14, 2013

हम लोगों ने संकल्प लिया हैं --अपनी कृषि भूमि -खेत -खलिहान -जंगल -झाड़ किसी भी कीमत में डैम बंधने के लिए नहीं देंगे ---जतना डैम प्रभावित जनसंगठन -शिलादोन -गुट्जोरा -खूंटी

 हम लोगों ने संकल्प लिया हैं --अपनी कृषि भूमि -खेत -खलिहान -जंगल -झाड़ किसी भी कीमत में डैम बंधने के लिए नहीं देंगे ---जतना डैम प्रभावित जनसंगठन -शिलादोन -गुट्जोरा  -खूंटी
 प्रकृति ने हमें बहुत धनी बनाया है -आप देख रहे हैं नदी में गाड़ी चल रही है --आप नदी में गाड़ी देख कर सोच रहे होंगे -की गाड़ी नदी में गिर गयी है ---लेकिन नहीं -गाड़ी नदी के सोने निकलने के लिए नदी में उतरी है। भर गाड़ी रूपया निकल कर लाएगी ....यही है हमारी मट्टी -हमारी धरती -हमारी -माँ , हमारा इतिहास ......
 बिकास का मतलब -कृषि का बिकास -पर्यावरण का बिकास , पेड़ -पैधों का बिकास -हमारा भाषा -संस्कृति और इतिहाश -पहचान का बिकास
 हम अपनी कृषि भूमि को डैम के पानी में किसी भी कीमत में डूबने नहीं देंगे -हम बिकास चाह्ते हैं -लेकिन बिना बिस्थापन  किये  ही

Saturday, June 22, 2013



KENAOUR  ME  BAH  RAHI  SATLUJ  NADI  KE  KINARE  PAHAD  KO  KAT  KAR  ROAD  BANA  DIYA  GAYA  HAI...
SATLUJ  NADI  ME  JAGAH  JAGAH  DAM  BANA  DIYA  GAYA  HAI...DAM  KA  PANI  KO 25-30 KILOMITAR  LAMBI  SURANGON  SE  BIJLI  PLANT  TAK  LE  JAYA  JATA  HAI...IS  DAM  BE  AAP  SURANG  KO  DEKH  SAKTE  HAIN..

MAI  2010 KO  BISWA PARYAWARAN  DIWAS  ME  GAYI  THI...WANHA  SE  WAPAS  LAOUT  KAR  YE  REPORT  LIKHI HUN..

सतलुज नदी के दोनों किनारों की तीब्र ढलानों पर स्थित है। यह हिमाचल के उतरपूर्व में स्थित चटटानी ढ़लान वाला क्षेत्र है। इस का कुल क्षेत्रफल 6401 वर्ग किलोमीटर है। इस क्षेत्र के गांवों की उंचाई समुद्रतल से 7000 सें 12000 फुट तक है। वांगतु से उपर वर्षा बहुत कम होती है। मौनसून हवाएं यहां तक नहीं पहंच पाती है। वर्षा न होने के कारण यहां पर वनसपतिक आवरण न के बराबर है। इसलिए वांगतु से उपर के क्षेत्र को शीत मरूस्थल कहा जाता है। पहाड़ी मरूस्थल कितना नाजुक होता है इस का अंदाजा यहां के हर कदम पर भूस्खलन बिंन्दुओं से लगाया जा सकता है। एक ओर तो किनौर का समूचा क्षेत्र पहले से ही अत्यत संवेदनशील है वहीं दूसरी ओर 21वीं सदी के पदार्पण के साथ ही इस जिले के सामने अनेक प्राकृतिक संसांधनों के अंधाधुध दोहन से यहां का पर्यावरण खतरे में है। किनौर जिल में एक के बाद एक लगातार कई निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं के कारण इस क्षेत्र का अस्तित्व संकट में हैं। किनौर में स्थित सतलुज जल संग्रहण क्षेत्र इस इलाके की पर्यावरणीय जीवनशैली के लिए अभिशाप बन चुका है। सतलुज जल संग्रहण क्षेत्र में नाथपा-झाखडी-15 मेगावाट, संजय परियोजना-120 मेगावाट, बास्पा-2-300 मेगावाट, रूकती-1-5 मेगावाट पहले से ही क्रियान्वित है और करछम-वांगतु-1000 मेगावाट, काशा ग-1, 66 मेगावाट, शोंरांग 100 मेगावाट, ओर टिडोंग-100 मेगावाट परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। चांगो-यंगथंग-140 मेगावाट, यंगािंग-खाब 261 मेगावाट, खाब-’यासो 1020 मेगावाट, जंगी-ठोपन 480 मेगावाट, ठोपन-पवारी-480, कगठोंग-करछम 402 मेगावाट तथा टिडोंग 2-60 मेगावाट  शुरू होने को है।  इस के अतिरिक्त ‘’यासो-स्पिलो 500 मेगावाट, काशाग 2-48 मेगावाट, काशाग 3-130 मेगावाट, बासपा 1-128 मेगावाट, रोपा 60 मेगावाट प्रस्तावित है।  12 हाईड्रो प्रोजक्ट प्रस्तावित -पाईपलाइन में है, जिससे लगभग 4000 मेगावाट बिजली पैदा करने की योजना है। इसके साथ ही कई अन्य कंपानियां परियाजना के लिए जमीन सर्वे का काम रही हैं।
 
जलस्त्रोत, जंगल-पहाड़, पर्यावरण पर उद्वोगपतियों का कब्जा बढ़ता जा रहा है। जनता के समुदायिक-बुनियदी आधिकार पर चैरफा हमला हो रहा है। 
250 किमी तक हिमाचल की वादियों में किलकारियां भरते हुए भारत की भूमिं को सिंच रही है। लगभग 150किमी किनौर की धरती को सिंचते हुए बखड़ा डैम तक पहुंच रही है। दुखद बात यह है कि इस नदी पर सौकड़ों परियाजनाएं प्रस्तावित हैं। कई दर्जन तैयार हो चुके है। नदी का पानी सुरंगों से दूसरी ओर बहा कर ले जाया जर रहा है। नदी  में  हजारों सुरंग बने  हैं इसी  सुरंगों  से  बिजली  कारखानों  तक  पानी  पहुँचाया  जाता  है, इसे पूरा पहाड़ खोखला हो चुका है . वह दिन दूर नहीं जब बहता सतलुज पूरी तरह से गायब हो जाएगा। सतलुज नदी शिमला, कुल्लू, मांडी और बिलाशपुर जिले में बहते हुए बखड़ा डैम तक पहुंचती है। यहां से करीब 100 किमी दूर तय कर केनल-नहर से पानी, पंजाब, हिरयाणा, चांडिगढ़, राजस्थान और दिल्ली भेजी जाती है। बखडा डैम बनने के बाद नदी अपना स्वाभाविक बहाव खो चुका है। साठ के दशक में बखड़ा डैम बना-जिसमें 20,290 एकड़ वनभूमिं, 23,863 एकड़ कृर्षि भूमिं जलमग्न हो गया। इस परियोजना से उन्ना तथा मांड़ी जिला की जमीन भी डूब गयी। 371 गांव जलमग्न हुए। बिलासपुर शहर जहां 7,206 परिवारों की 36,000 आबादी भूमिहीन हो गयी। इसी तरह बासी परियोजना से भी लोग विस्थापित हुए। साठ साल के बाद भी इन विस्थापितों का पूनर्वास और पर्नास्थापन नहीं किया गया है। दूसरी ओर बखड़ा परियोजना से 2,850 मेगावाट, तथा बासी परियोजना से 960 मेगावाट बिजली उत्पादित कर सरकार देश  को विकसित देश  होने का परिचय दे रहा है। सतलुज में और भी परियोजनाओं को उतारा जा रहा है। एक बृहद परियोजना बखड़ा के उतरी भाग पर निर्माणधीन है। एनटीपीसी हाईड्रो प्रोजेक्ट, काॅल डैम 1000 मेगावाट जल्दी ही शुरू होने वाला है। रामपुर में हाईड्रो प्रोजेक्ट 800 मेगावाट एसजेवीएन भी निर्माणधीन है। वहीं लाहिरी हाईड्रो परियाजना भी शुरूआती दौर में है। 
इन परियोजनाओं के कारण किनौर में सतलुज व बासपा नदी पूर्ण रूप से भूमिगत हो जाएगी। भूमिगत सुरंगों के  उपर स्थित सम्पूर्ण क्षेत्र जर्जर हो जाएगा जिस से यहां का पर्यावरण संतुलन डगमगा जाएगा। सतलुज जल संग्रहण क्षेत्र का 90 फीसदी भाग ’ाीत मरूस्थलीय होने के कारण यह जल संग्रहण क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील व जोखिम भरा है। पूजिपतियों तथा कारपोरेट घरानों ने  किनौरवासियों से सतलुज के पानी का अधिकार छीना चुका है। जिनती परियोजनाएं इस जलसंग्रहण +क्षेत्र में बनाये जा रहे हैं नदियों के बुंद-बंुद पानी कंपानियों के कब्जे में होता जा रहा है।
 पहाड़ पर रोड़ बनाने की प्रक्रिया जारी है-पहाड़ पर अब जंगल-झाड़, पर्यावरण नहीं, अब यहां कंपनियों की गाडि़यां दौडेगीं 

Thursday, June 13, 2013

आप ने मुझे पुरस्कृति किया है इससे में संघर्षसील आदिवासी -मूलवासी किसान समुदाय को समार्पित करती हुं जिसका हिस्सा बनने का गैरव मुझे प्राप्त है। जिनके स्नेह और वि’वास ने मुझे जिंदगी के हर कठीन मोंड पर रास्ता दिखाया है।




आप लोगों ने मुझे पुरस्कार से सम्मानित किया इसके लिए मैं आप लोगों को धन्यवाद देना चाहती हु। खास करके इंडिजिनस राईट -कलचरल सरवाइबल को।  आज जब देsh  ही नहीं दुनिया के हर कोने में एक तरफ जल-जंगल-जमीन -नदी-झरनों और पहाड़ों पर जो जनता के समुदायिक धरोहर है-पर ग्लोबल पूंजिवादी अर्थव्यस्था कब्जा जमाने की हर कोशिश  में जुटी है। वहीं दूसरी ओर अपने धरोहर-जंल-जंगल-पानी की रक्षा में देश  के एक एक गांव संकल्प के साथ -हम अपने पूर्वजों का एक इंच जमीन नहीं देगें-का नारा के साथ संर्घषरत है। देश  की ग्लोबल अर्थव्यस्था ने पूरी दुनिया में जिस फासिवाद को जन्म दिया है-इससे पूरी दुनिया सामाजिक, आर्थिक, संस्कृतिक संकट से गुजर रहा है, इस संकट में एक ओर जहां विकाससिल  एंव गरीब तथा यहां तक कि विकसीत दुनिया में भी सामाजिक आर्थिक और संस्कृतिक विषमता बढती जा रही है, और इसे एक जनाक्रोश  पूरी दुनिया में दिखाई दे रही है। वहीं दुसरी ओर बंचित जन समूदाय अपनी अधिकारों प्रकृति...एवं प्रर्यावरण के संरक्षण, प्रकृतिक संसाधनों पर अपना निर्णनायक अधिकार और सत्ता के लोकतंत्रिक प्रकिया में अपना दावा पूरी ताकत के साथ पेश  कर रहा है। दुनिया एक ओर जहां हिंसा और आंतक, धार्मिक नसीलिए , भेद-भाव से ग्रास्त दिख रही है। वहीं इन स्थितियों को बदलने और सामानतामूलक सामाज के निर्माण के लिए दुनिया भर के जनसमूदाय खास तौर पर आदिवासी समूदाय अपनी विभिन्न तौर-तरीकों से लोकतंत्रिक प्रतिरोध का स्वर बुलंद कर रहे हैंं। संकट को एकांगी होकर नहीं समझा जा सकता है, ना ही विकास के मौजूदा ढांचे में वह ताकत है , कि वह बंचित जन समूदायों की आकाक्षाओं को पूरा कर सके। ‘खास तौर पर एशिया , अफ्रिका और अरब के अनेक देशों  में लोंकतंत्र जनसंघर्ष का एक कारगार अभिव्यक्ति उभर रहा है।
यूरोप के युवा वर्ग, मजदूर-किसान विकास के वर्तमान ढांचा के बदहाली के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। मेरी दृष्टिटी में हमारा यह काल खंड परिर्वतन, आकांचा , और जनता की बंचित जनता की सशक्त एकजुटता के माध्यम से लैस है। अब हमें तय करना है कि दुनिया में बढ़ती , ’भेदभाव, सामानता, सहयोग, सहकार-सहभागिता जैसे उच्चतम मानवीय मूल्यों जो आदिवासी समाज की विरासत भी है उसकी भविष्य की गारंटी कैसे किया जाए यह चिंता का विषय है। आज अकसर पूछा जाता है कि तकनीक संचालित दुनिया में आदिवासी समाज उसके मूल्य, संस्कृति और उनके विषेशताओं का कोई भविष्य  बचा हुआ हैं यह नहीं। यह भी कहा जाता है कि दुनिया की जो मुख्य धारा है और उनका उपक्र्रम है, में आदिवासियों को शामिल हो जाना चाहिए और और संस्कृति को इतिहास का विषय बना देना चाहिए। लेकिन मै यहां पूरी दृढता से जनता के अनुभवों की, और अपनी सीख के आधार पर कहना चाहती हुं कि आदिवासी जन समूदाय के साथ साथ सभी बंचित जन समूदायों की एकजुटता से जारी संघर्ष का भविष्य है और वह निकट भविष्य में प्रकृतिक संसाधनों और आर्थिक असामानता के मौजूदा ढांचे को वास्तविक लोकतंत्रिक सामाज में बदल देगा। जिसमें हर समुदाय की अपनी विधिता, बहुलता और संस्कृतिक अस्तित्वा की गारंटी होगी । मेरे विचार में  आदिवासी जन समूदायों का भविष्य इसलिए भी है कि उनकी मौलिक दर्निक सामाजिक और सकृतिक, प्रकृति और चेतना वैज्ञानीक और निरंतर नये की तालाश  के साथ जूटी रही है। यही कारण है कि हजारों सालों के संस्कृतिक अतिक्रण और आक्रमण के बावजूद आदिवासी जन समूदाय अपने संघषों से इसकी हिफाजत और विकसित करते रहे हैंं। मेरी मातृ भाषा मुंडारी में कहा जाता है-सेनगी सुसुन-काजीगी दुरंग,(बोलना ही गीत-संगीत और चलना ही नृत्य है) यही आदिवासियों की ताकत है। इसी में हमारा सामाजिक अंतवि’वास(इनर विलिभ) निहित है। यही हमारे संघर्षों के प्रेरणा का स्त्रोत है। हमारे महान नायक बिरसा मुंडा के उलगुलान के जमाने का गीत मैं यहां आप को एक उदाहरण में देना चाहती हुं कि किस तरह हम नृत्य, संगीत और जीवन के तौर तरीकों को अपना संघर्ष का प्रयाय मानते हैं-
डुम्बारी बुरू चेतन रे....ओकोय दुमंग रूताना को- सुसुनेतना
ओकोय दुमंग रूताना को -सुसुनेतना
डुम्बरी बुरू चेतन रे बिरसा दुमंग -रूताना को सुसुनतना
बिरसा दुमंग रूताना को सुसुनतना
(डुम्बरी पहाड़ पर कौन मंदर बजा रहा है -लोग नाच रहे हैं। डुम्बरी पहाड़ पर बिरसा मंदर बजा रहे हैं-लोग नाच रहे हैं)
बिरसा मुंडा ने जो राह दिखाई उसी रास्ते पर चलते हुए हम आदिवासी मूल्यों की हिफाजत के लिए आज विस्थापन के खिलाफ-जंल-जंगल-जमीन, समाज-भाषा-संस्कृतिक, इतिहास और पहचान को संरक्षित करने का नया उलगुलान(रिवोले’ान) चल रहा है। आदिवासी चेतना वा संस्कृति को इन विन्दुओं में रखना चाहती हुं
1-समुदायिक जीवन सैली
2-प्रकृतिक संपति पर समुदायिक अधिकार
3-सहकार की चेतना(कोओपरे’ान) 
4-स्त्री-पुरूष सामानता
5-जनतंत्र में सर्वानुमति मूलक निर्णायक चेतना(कोलोकटिव डि’िाजन एंड इमप्लिमेंटे’ान) 
यही हमारा मूल विचार है, जिस पर जहां से मैं आती हुं वहां के आदिवासियों ने लगभग 300 सालों से संघष किया और हजारों की संख्या में बलीदान दिया और आज भी संघर्ष कर रहे हैं और बलीदान दे रहे हैं। मैं भी इस सघर्ष की विनम्र हिस्सेदार हुं और इस बात की मुझे बेहद खुशी  है। 
बाबा तिलका मांझी, बिंदराय-सिंदाय, सिद्वु-कान्हू, चांद-भैरव, फुला-झानों, बिरसा मुंडा, गाया मुंडा, माकी मुंडा जैसे महान क्रांतिकारी उपरोक्त मुल्यों के लिए ही शहिद हुए। और हमारे समय में भी उन्हीं की प्रंेरणा से हम प्रकृतिक संसाधन, समाज, भाषा, संस्कृति को न केवल बचाने बल्कि एक नया समाज बनाने के लिए संघर्षरत हैं। 
झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, दलित, मेहनतकश  समूदाय का प्रकृति के साथ पिता और पुत्र का रिस्ता रहा है। इन समुदयों का सामाजिक, भाषा-संस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, और इतिहासिक अस्तित्व जल-जंगल-जमीन, नदी-पहाड़ में ही जीवित है और रहेगा। यह समुदाय तब तक ही जीवित रहेगा-जब तक जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा हुआ है। जब आदिवासी -इंडिजिनस सोसाईटी अपने जल-जंगल-जमीन-नदी-पहाड-से उजड़ता है, तो वह सिर्फ अपने जीविका यह घर से नहीं उजड़ता है लेकिन वह अपने माजाजिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति, आर्थिक और इतिहास से उजड़ता है। विशव में आदिवासी इतिहास को देखेगें-तो यह साफ हो जाता है कि आदिवासी समूदाय वहीं जीवित रहते जहां जंगल -जमीन-नदी-पहाड-झरना है। इंडिजिनस सोसाईटी प्रकृति के हिसा हैं। एक दूसरे से अलग होकर न तो हम आदिवासी -इंडिजिनस सोसाईटी की कल्पना कर सकते हैं न जंगल-नदी झरना और पहाड़ की। जिस तरह पानी के बिना मच्छली जिंदा नहीं रह सकता है-उसी तरह प्रकृतिक धरोहर के बिना इंडिजिनस सोसाईटी जीवित नहीं रह सकता है। 
इस सच्चाई को देखते हुए ही देश  के आजादी के बाद भारत देश  में अपने नागरिकों के अधिकारों को कानूनी रूप भारतीय संविधान में दर्ज कर रहे थे-तब देश के आदिवासी-मूलवासी बहुल क्षेत्रों को भारतीय संविधान में 5वीं और 6वी अनुसूचि क्षेत्र के रूप में विशेष दर्जा दिया गया। इस कानून में 5वीं अनुसूचि क्षेत्र को अधिकार दिया गया कि-हर गांव -ग्राम सभाएं अपने सीमा क्षेत्र के प्रकृतिक संसाधनों को अपने परंपरागत समुदायिक अधिकार क्षेत्र के तहत जंगल-पानी, जमीन आदि को नियंत्रित और संचालित करेगें। जब भी देश  की सरकार को या किसी भी एजेंन्सी को विकास कार्यो के लिए जमीन अधिग्रहण की जरूरत होगी-तब स्थानीय गांव सभा(ग्राम सभा) के सहमति के बिना जमीन अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है। 
झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है। इतिहास गवाह है-यह इलाका बीहड़ जंगलों से पटा हुआ था। आदिवासी-मूलवासी किसान समुदाय ने बाध-भालू, सांप -बिच्छु से लड़कर इस राज्य को आबाद किया। यही कारण है कि-झारखंड के आदिवासी समुदाय को अपने आबाद किये इस जमीन-जंगल पर सीएनटी एक्ट 1908 और संताल परगना क’तकारी अधिनियम के   तहत जमीन-जंगल रक्षा संबंधित विशेष अधिकार मिला हुआ है। छोटानागपुर कश तकारी अधिनिय और छोटानागपुर क’तकारी अधिनियम में अदिवासियों का जमीन कोई भी बाहरी व्यक्ति यह संस्था अधिग्रहण नहीं कर सकता है। लेकिन आज सरकार, कारपोरेट घराने, लैंड माफिया, सरकार की आदिवासी किसान विरोधी नीतियां और पुलिस-प्रशासन मिल कर इस कानून का वयलेशन कर पूरे राज्य के अदिवासी-मूलवासी किसानों को जमीन विहीन और बेघरबार के दिया जा रहा है। 
भूअर्जन कानून 1894 के तहत सरकार जहां चाहती है-मनमानी ढंग से जमीन अधिग्रहण करते आ रही है। इस कानून में प्रावधान धाराएं जो जनहित में है-उसे भी पालन नहीं करती है। आदिवासी -मूलवासी किसानों के हित में दिये प्रावधानों का संशोधण धन कर उसे कंपानियों के लिए के लिए परिर्वतित किया जाता रहा है। इस कारण आजादी के बाद आज तक में झारखं ड में 2 करोड़ से ज्यादा आदिवासी-मूलवासी किसान विस्थापित हो चुके हैं। आज ये विस्थापित कहां हैं? किस हालात में हैं? सरकार या कोई राजनीतिक दल को इसकी कोई चिंता नहीं है। विस्थापित आदिवासी समुदाय आज अपना पहचान खो चूका है। सामाजिक मूल्य और उनकी सामूहिकता पूरी तरह तार तार हो गयी है। आज न तो उनकी भाषा है न ही संस्कृति ही है। 
झारखंड राज्य में छोटानागपूर का’तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना का’तकारी अधिनिय, पांवची अनूसूचि और छठवीं अनूसूचि जैसे कानूनों के प्रावधान होते हुए भी राज्य सरकार इन कानूनों का हनन वयलेशन करके आदिवासी-मूलवासी -इंडिजिनस सोसाईटी तथा किसानों का जमीन, जंगल, नदी-पहाड़ को गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर रही है। साथ ही कारपोरेट घराने के हवाले भी कर रही है।  सरकार गैर-कानूनी तरीके से किसानों के जंगलों -खेती की उपजाउ जमीन, जलस्त्रोतों को माइनिंग कंपानियों के साथ एमओयू करके हड़प रही है। जहां भी सरकार विकास के नाम पर या कंपानियों के कारखाना या माइंनिग के लिए जमीन अधिग्रहण कर रही है वहां  न तो जमीन मालिक से-गांव वालों से या गांव सभा से ने तो पूछ रही है और न ही गांव वालों की सहमति ले रही है। जहां जमीन लेना चाह रही है-पुलिस के बल पर हिंसा और आतंक के सहारे जमीन कब्जा कर रही है। 
राज्य बनने के बाद 12 सालों के भीतर राज्य सरकार ने 104 औधोगिक घरानों के साथ एमओयू कर चुकी है। इसमें से 98 प्रतिशत कंपानियां माइनिंग कंपानियां हैं। एक-एक कंपानी को कोयला माइंस, अयरन ओर माइंस, बोक्साइड मांइस, अबरख माइंस, माईका माइंस, पानी के लिए डैम, प्लांट के लिए जमीन, यतायात के लिए जमीन, शहरीकरण के लिए, बाजार के लिए जमीन चाहिए। 
यदि सभी कंपानियों को सरकार माइंस के लिए जमीन देती है-तब झारखंड पूरी तरह से पर्यारणविहीन और बंजर भूमिं में तब्दील हो जाएगा। आजादी के बाद आज तक जितना आबादी विस्थापित नहीं हुआ है- उसे चैगुणा आबादी सिर्फ दस वर्षों के भीतर अपने रहवास और जीविका से उजड़ जाएगें। 
मानव अधिकार पर चैतरफा हमला हो रहा है। पूरे झारखंड में जल-जंगल-जमीन-पर्यावरण संरक्षण के लिए जनआंदोलन चल रहा है। पूरे देश  के किसान आज विस्थापन के आतंक के साये में जी रहे हैं। देश  की कल्याणकारी सरकार सरकार उन्हें असामाजिक तत्व, उग्रवादी तथा माओवादी घोषित कर उन पर दर्जनों फाॅल्स केस डाल दिया जा रहा है। केस में फंसा कर उन्हें जेल में डाल दिया जाता हैै।
 हमारे पूरखों ने वर्चास्व की संस्कृति को हमेशा  से चुनौती दी है क्योंकि आदिवासियों का विशवास कलचरल डायवर्रसिटी एंड पुलुरलिजम में है। हम सभी संस्कृतियों के साम्मान के साथ नया सामाज चाहते हैंं। हमारे देश  में इस समय एक संस्कृतिक वर्चस्व का राजनैतिक अभियान जोरो से जारी है। जो एकत्म संस्कृतिक राष्टवाद के नाम पर र्धािर्मक एवं संस्कृतिक अल्पसंख्याकों को खतरे में डाल दिया है। पिछले 20 सालों में भारत का लोकतंत्र बंचित जन समूदायों की हिस्सेदारी का जितना गवाह है -उतना ही वह संस्कृतिक राष्टवाद के अक्रमाण का शिकार है। आइसे से महौल में सेकूलर इंडिया को बचाने में आदिवासी समाज की संस्कृतिक बहुलतावादी दृष्टिटीकोण की अहमियत बढ़ जाती है। हमारा पूरा भारतीय उपमहाद्वीप कटटरता और उदारता के बीच एक निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है चुकी यह वही दौर है, जिसमें पूराने समांती मूल्य नव उदारवाद के प्रचार-प्रसार के आधार बनाये जा रहे हेैं यह अजीब बिडंमना है। हमने पिछले दो दशकों में अपने जंगल-जमीन-पानी -समुद्र और नदियों पर बड़े बड़े कारपोरेट घरानों का कब्जा देख रहे हैं। हम यह भी देख रहे हैं कि साप्रदायिक उन्नमाद को इस्तेमाल किस तरह नयी आर्थिक संरचाना को मजबूत बनाने में किया जा रहा है, लेकिन मैं उन सबके प्रति कृतज्ञ हुं जो इस परिघटना के खिलाफ निरंतर संघार्ष कर रहे हैं और इस बात को दस्तक भी दे रहे हैं कि आदिवासी पुरखों ने और बाद में स्वंतत्र संग्राम सेनानीयियों  ने जो सपने दिखाये थे। उसके अनुकूल एक नये समाज का निर्माण संभव है। एक ऐसा  समाज जहां कोई गैर बरा -बरी और किसी भी तरह के वर्चस्व के लिए जगह नहीं है। 
जल-लंगल‘-जमीन की हिफाजत और प्रकृतिक संसाधनों पर जनसमुदाय के समूहिक अधिकार की लड़ाईयां इसी से प्रेरित है। पिछले 20 सालों में कारपोरेट लूट और उसकी हिफाजत के लिए जितनी कार्रवाइयां की गयी है-उससे आंदोलन कमचोर नहीं हुए हैं-बाल्कि और मजबूती से सभी बंचित जन समुदायों को एक साथ एक मंच पर ला रहे  हैं।  लगभग 100 सालों के संघर्ष के बाद हमारा झारखंड एक प्रात के रूप्प में अस्तित्व में आया तो जंगल झुम उठे थे और मांदर गुंज उठा था। लेकिन हमारो खुशी  छनिक साबित हुई। राज्य गठन के मात्र ढंड महिना के बाद ही 30 सालों से जो आंदोलन शांति  से कोयल और कारो नदियों के प्रवाह को बचाये रखने की लिए संघर्षरत थां उससे प्रसशनिक आधिकारियों के गोलियों से छलनी कर दिया गया थाा।
कोयल कारो आदिवासियों के लिए केवल नदियां नहीं है-एक संस्कृतिक पहचान है। साथ ही हमारे आजीविका का मूल आधार है। 2 फरवारी 2001 को जब तपकारा में आठ आदिवासी ओर एक मूलवासी को शहित हुए तब हमें एहसास हुआ कि 15 नोवेम्बर 2000 को जिस झारखंड राज्य की नींव डाली गयी है वह हमारे लिए नहीं है। और हमने देखा कि हमारे प्रकृतिक संसाधनों के दोहन और लूट के लिए किस तरह हमारे अस्तित्व के साथ खिलवाड करते हुए हमें चुनौती दी गयी। मैं कहना चाहती हुं कि झारखंड के आदिवासी और मूलवासियों ने सरकार और कारपोरेट की चुनौती को स्वीकार किया और एक इंच भी जमीन नहीं देगें का नारा झारखंड के 33 हजार गांवों में गूंजने  लगा। इस आवाज को विभिन्न जनसंगठनों और आदिवासी मूलवासी संगठन ने बुलंद किया। 
कोयल कारो परियोजना के तहत डैम बनने से लगभग ढाई लाख आदिवासी-मूलवासी किसान विस्थापित हो जाती। 55 हजार एकड़ कृर्षि भूंमि पानी में डूब जाता। 27 हजार एकड़ जंगल पानी में डूब जाती। 80 से ज्यादा आदिवासी समुदाय के धार्मिक स्थल सरना ससनदीरी जलमग्न हो जाता। 
राज्य के दुमका जिला के काठीकुड़ प्रखंड में आरपीजी ग्रुप ने कोयला माइंस के लिए जमीन कब्जा करना शुरू कर दिया। कोयला माइंस के लिए गांव वाले जमीन नहीं देना चाहते हैं-गांव वाले जमीन-जंगल बचाने के लिए कई षर्वों से संघर्षरत हैं। कंपानी कोयला माइंस के साथ ही वहां बिजली उत्पादन के लिए प्लांट बनाना चाहती है। ग्रंामीणों ने कंपानी द्वारा जबरन जमीन अधिग्रहण का विरोध में रैली निकाले। इस रैली पर पुलिस वालों ने फायरिंग किया। घटनास्व्थल पर ही एक साथी मारा गया। दर्जनों घायल हो गये। बाद में एक घायल 
साथी मर गया। एक ने पूरी तरह से बिलंग हो गया, एक के दोनों आंख की रोशनी हमेशा  के लिए छिन लिया गया। 
सरकार ने इस आंदोलन के अगुवा मुनी हांसदा और उनके साथियों पर उग्रवादी होने को झूठा मुकदमा डाल दिया। मुनी हांसदा और उनके साथी 7 महिने तक जेल में रहंंे
2003-4 में साहेबगंज जिलो के पचुवाड़ क्षेत्र में पेेनम कोल माइंस ने कई गांवों को हटा कर किसानों की जमीन जबरन कज्बा करना प्ररंभ कर दिया। गांव वाले विरोध करते रहे। बाद में कंपनी के दलाल, लमीन माफिया, कंपानी वाले पुलिस-प्र’ाासन के सहयोग से गांव की जनता को जबरन उजाड़ फेंका। यही नहीं आंदोलन की अगुवा सिस्टर बालस की हत्या भी कर दी गयी। 
राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिला के पोटका प्रखंड में भूसन स्टील प्लांट बैठाने के लिए जबरन गांव वालों का जमीन कब्जा करना प्ररंभ्म किया। गांव वाले शुरू से ही इसका विरोध करते आ रहे हैं। यहां भी आंदोलन का अगुवाई कर रहे दर्जनों माहिला-पुरूषों कई फालस केस कर दिये। कुछ साथी 3 महिनों तक जेल के अंदर बंद रहे। 
जिन जिन इलाकों में कंपानियों को सरकार अयरन ओर माइंस के लिए जमीन देने की तैयारी कर रही है-उन इलाके को सरकार माओविस्ट प्रभावित एरिया घोषित कर बेकसूर ग्रामीणों को उग्रवादी होने के जुल्म में जेल में डाल रही है। इन इलाकों में ग्रीणहंट चला कर गांव में सीआरपीफ भर दे रही है। महिलाएं और बचियां बलात्कार की शिकार हो रही हैंं । एक ओर प्रशासन और दूसरी ओर उग्रवादी संगठनों के बीच ग्रामीण पीस रही है। 
विकास के नाम पर विस्थापित लगभग 2 करोड़ की आबादी में आधी आबादी महिलाओं की है। आज ये विस्थापित महिलाएं यह तो राज्य से पलायन कर दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी के लिए चली गयी हैं, यह फिर महानगरों में आया-जुठन धोनी वाली नौकरानी बन गयी है। कुछ घांस बेच कर एक बेला की रोटी जुगाड़ी में रहती हैं। बच्चियां-युवातियां शिक्षा से पूरी तरह बंचित हैं। 98 प्रतिशत विस्थापित बच्चियां और युवातियां अशिक्षित हैं। 95 महिलाएं एनेमिक की शिकार हैं। 95 प्रतिशत महिलाएं घर विहीन हैं। जानवरों की तरह शहर के गली-कुचे की गंदी नलीयों के किनारे झोपडि़यों में जीवन बसर करने को विवश  हैं।
सरकार अपने नागरिकों के प्रती जो संविधानिक जिम्मेवारी था-को पूरी तरह खारिज कर दे रहा है। अब कारपोरेट घरानों को जमीन उपलब्ध कराने के लिए संविधान प्रदत जमीन अधिग्रहण कानून को भी खारिज करके कंपानियों को सीधे तौर पर जमीन बेचने का रास्ता खोल दिया जा रहा है। सभी कंपानियों को साम-दाम-दंड-भेद अपना कर किसानों से जमीन लेने की छूट दी जा रही है। कंपानियां जहां चाह रही हैं-वहां अपना दलाल बैठा कर जमीन लूट रहा है। गांव वाले-जमीन मालिकों के विरोध करने पर उन्हें किसी न किसी फोल्स केस में फंसा कर जेल में डाल दिया जा रहा है। 
बोकारो जिला के चंदन क्यारी प्रखंड में हजारों एकड़ जमीन एलेक्ट्रो स्टील ने स्टील प्लांट लगाने के लिए ग्रामीणों को आतंक में रख कर खरीदा। कुछ जमीन मालिकों को जमीन का कीमत मिला, कुछ जमीन मालिकों को कुछ भी नहीं मिला। कंपानी ने हजारों एकड़ जमीन कोयला माइंस के लिए हड़प लिया। जमीन मालिकों से कंपानी के दलालों ने वादा किया कि जमीन का किमत भी देगें और मुवाअजा भी देगें। मुवाअजा में नौकरी भी देगें। कोयला माइंस के लिए कंपनी ने 2005 में जमीन लिया। लेकिन आज तक कंपनी ने किसानों को न तो जमीन का पूरा कीमत ही दिया ना ही नौकरी ही। 
खूंटी जिला और गुमला जिला के तोरपा ब्लोक, कमडारा ब्लोक, कर्रा ब्लोक, रनिया ब्लोक के करीब 40 गांवों को उजाड़ कर वि’व का स्टील जैंट आर्सेलर मित्तल 12 मिलियन टन का स्टीन प्लांट लगाना चाहता था। कंपनी ने जमीन लेने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना कर गांव वालों का जमीन कब्जा करना चाहता था। मित्तल कंपनी द्वारा जबरन जमीन अधिग्रहण के खिलाफ में हम लोगों 2006 से लोगों को गोलबंद कर आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच के बैनर से आंदोलन करना शुरू कर दिये। 2006 से लगातार दिन-रात अभी तक लंबा  संर्घष के बाद हमारा संगठन ने इस इलाके के लाखों आबादी के भविष्य के साथ पर्यावरण को उजड़ने-विस्थापित होने के बचा सके। मित्तल कंपनी के साथ इस इलाके में इस्पात इंडस्टी्र्र भी 8000 एकड़ जमीन स्टील प्लांट के लिए अधिग्रधण करने वाला था। इसके अलावे दर्जनों छोटे औद्योगिक घराने भी इस इलाके में जमीन-जंगल पर कब्जा करने आते। 
इन कंपनियों और औद्योगिक घरानों को पानी उपलब्ध कराने के लिए करो नदी में रेहड़गडा गांव के पास एक डैम बनाने का प्रस्ताव था। एक दूसरा डैम कर्रा प्रखंड के छाता नदी में बनाने का प्रस्ताव था। इन डैमों से भी कई दर्जन गांव विस्थापित हो जाते। इस तरह से खूुटी जिला के आदिवासी मूलवासी समुदाय की आधी आबादी विस्थापित हो जाती। रांची के कांके स्थित नगड़ी में सरकार ने फरर्जी तरीके से 227 एकड़ जमीन अधिग्रहण के कागजात तैयार किये। इसी कागजात के आधार पर जमीन अधिग्रहण किये जाने का दावा करती है। लेकिन मैंने जिला भुअर्जन विभाग से आरटीआई से जानकारी मांगी-उसमें साफ लिखा हुआ है कि-1957-58 में नगडी में 153 जमीन मालिक थे। इसमें से 128 किसानों ने जमीन का पैसा लेने से इंकार किया। 
सरकार कहती है-रांची बिरसा एग्रीकलचर यूनिर्वसिटी के लिए उत्क जमीन को अधिग्रहण किया गया है। मैने बिरसा एग्रीकलचर यूनिर्वसिटी से इस संबंध में जनकारी मांगी -तो इन्होंने कहा-हमारे पास जमीन अधिग्रहण संबंधी कोई भी जानकारी नहीं है। दूसरी ओर उत्क कृर्षि भूमिं पर सदियों से खेती करते आ रहे हैं-आज भी खेती कर रहे हैं। साथ ही जमीन का जामाबंदी भी सरकार को 2012 तक भुगतान किये हैं। किसाना जमीन नहीं देने का विरोध 1957-58 से ही करते आ रहे हैं। मैं बताना चाहती हुं-हमलोग किसी भी ’िाक्षण संस्थान के विरोध में नहीं हैं सभी संस्थान बने, लेकिन हमारी उपजाउ कृर्षि भूंमि पर नहीं, बंजर भूंमि पर बने ।
आज सरकार जब्रजस्त इस जमीन को पुलिस के बल पर छीन रही है। किसान विरोध कर रहे हैं-तब हम लोगों पर दर्जनों फोलस केस थोपा गया। चार साथियों जुलाई 2012 में जेल में डाला। इसमें दो महिला साथी हैं। इसके बाद मुझे ढाई माह तक फोलस केस में जेल में रखा। गांव की दर्जनों महिलाओं पर दर्जनों फोलस केस है। 
सरकार कहती है-विस्थापित होने वालों को मुआवजा दिया जाएगा और साथ ही पूर्नस्थापित एवं पूनर्वासित किया जाएगा। लेकिन सवाल है-कंपनी और सरकार किसका मुआवजा देगें? क्या हमारा शुद्व हवा-शुद्व पानी, शुद्व भोजन, नदी-झरनों, हमारे भाषा-संस्कृति, धर्मिक स्थल सरना-ससन दीरी, हमारा पहचान और इतिहास को पूनस्थापित और पूनर्वासित कर सकता है? नहीं कतई संभाव नहीं हैं। हम आदिवासी समूदाय मानते हैं-हमारा इतिहास, भाषा-संस्कृति, धर्मिक स्थल सरना-ससन दीरी, हमारा पहचान और इतिहास को किसी भी कीमत पर पूनर्वासित नहीं किया जा सकता है-न ही किसी मुआवाजा से भरा जा सकता है। 
हम विकास विरोधी नहीं हैं-हम विकास चाहते हैं, लेकिन हमारे कीमत पर नहीं। हम चाहते हैं-हमारे नदी-झरनों का विकास हो। हम चाहते हैं-जंगल-पहाड़, पर्यावरण और कृर्षि का विकास हो। हम चाहते हैं-सामाजिक मूल्यों का विकास, भाषा-संस्कृति का विकास हो। हम चाहते हैं-हमारी पहचान और इतिहास का विकास, चाहते हैं-हर व्यक्ति को सामान शिक्षा और स्वस्थ्य जिंदगी मिले। हम चाहते हैं-प्रदुषित नदियों को प्रदूषण मुक्त हो। बंजर भूमिं को हरियाली में तब्दील करना। हम चाहते हैं-सबको शुद्व हवा, पानी, भोजन मिले। यही है हमारा जनविकास का मोडल।
जिस झारखंडी अवधारना की बात की जा रही थी उसे सत्ता में गये राजनेता तो भूल गये, लकिन जनसंघर्षो ने नया आयाम दिया। तेरह साल के झारखंड में जितने कंपनियों को लाने के लिए प्रयास किये गये हैं उसी तरह प्रकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए उसी तरह से मजबूत और विस्तारित हुई जनता की लड़ाईयों ने झारंखडी आवधारणा को नया प्रोसपेकटिव दिया है। यह प्रोसपेकटिव है आजीविका की आदिवासी जन संस्कृति को प्रगति का नया आधार बनाना। एक एैसे विकास मोडल को गढ़ना जिसमें आदिवासी जीवन सैली की तरह का वैज्ञानिक सोच हो और तकनीक प्रकृति के अनुकूल समन्वाय और सहकार को महत्व दे। इसमें केवल सिर्फ प्रकृति से लेने का सोच न हो और इसमें सर्वाधिक महत्व लोगों विचार के अनुकूल योजनाओं का चयन एवं क्रियान्वयण हो । एैसे समुचित तकनीक का विकास हो जा सहअस्तित्व के सर्वाकालिक मूल्य को गतीशील बनाये। हमारे आदिवासी नृत्य की सैलियां, और गीतों के स्वर-राग-लय और उसकी ध्वानियां इस बात के गवाह है कि सहअस्तित्व के विचार से हमारा गहरा रिस्ता है। हमारे गांव में अब भी जब जंगल से कोई शिकार का कोई उत्सव होता है, और उसमें प्रप्त समग्री केवल आदमी के बीच नहीं लेकिन इंसान और जनवारों के बीच किया जाता है। हम अर्थतंत्र में इस उत्साव के मूल भावना को जीवंत देखना चाहते हैं। यानी वर्तमान अर्थ तंत्र के तौर तरीके को बदल कर एक मानवीय विकास का मोडल खड़ा करना चाहते हैं।
हम जानते हैं कि यह चुनौती मामूली नहीं है, यह हमारे चाह लेने भर से हमारी यह आकांक्षा साकार हो जाएगी एैसा नहीं है, इसलिए हम संस्कृतिक आंदोलन को सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों के लहर(वेभ) के रूप में वि’व व्यापी परिघटना(मुवमेंट-ईभेंट) के बतौर देखते हैं। हमारा दृढ़ वि’वास है कि हमारे सपनों की यह दुनिया अब ज्यादा दूर नहीं है। 
आप ने मुझे पुरस्कृति किया है इससे में संघर्षसील आदिवासी -मूलवासी किसान समुदाय को समार्पित करती हुं जिसका हिस्सा बनने का गैरव मुझे प्राप्त है। जिनके स्नेह और वि’वास ने मुझे जिंदगी के हर कठीन मोंड पर रास्ता दिखाया है। मैं यहां फिर कहना चाहती हुं-उनके वि’वास और स्नेह को और अधिक पाने की कोशिश  करूगीं और जनतंत्रिक लड़ाईयों में गांव-शहर के गरीब-गुरबो-शोषित-बंचितों-मेहनतकशों   के साथ कमद से कदम मिला कर आगे बढ़ती रहुंगी। 
विशव के तमाम संघर्षसील साथियों को मेरा जोहार 

दयामनी बरला