Saturday, June 22, 2013



KENAOUR  ME  BAH  RAHI  SATLUJ  NADI  KE  KINARE  PAHAD  KO  KAT  KAR  ROAD  BANA  DIYA  GAYA  HAI...
SATLUJ  NADI  ME  JAGAH  JAGAH  DAM  BANA  DIYA  GAYA  HAI...DAM  KA  PANI  KO 25-30 KILOMITAR  LAMBI  SURANGON  SE  BIJLI  PLANT  TAK  LE  JAYA  JATA  HAI...IS  DAM  BE  AAP  SURANG  KO  DEKH  SAKTE  HAIN..

MAI  2010 KO  BISWA PARYAWARAN  DIWAS  ME  GAYI  THI...WANHA  SE  WAPAS  LAOUT  KAR  YE  REPORT  LIKHI HUN..

सतलुज नदी के दोनों किनारों की तीब्र ढलानों पर स्थित है। यह हिमाचल के उतरपूर्व में स्थित चटटानी ढ़लान वाला क्षेत्र है। इस का कुल क्षेत्रफल 6401 वर्ग किलोमीटर है। इस क्षेत्र के गांवों की उंचाई समुद्रतल से 7000 सें 12000 फुट तक है। वांगतु से उपर वर्षा बहुत कम होती है। मौनसून हवाएं यहां तक नहीं पहंच पाती है। वर्षा न होने के कारण यहां पर वनसपतिक आवरण न के बराबर है। इसलिए वांगतु से उपर के क्षेत्र को शीत मरूस्थल कहा जाता है। पहाड़ी मरूस्थल कितना नाजुक होता है इस का अंदाजा यहां के हर कदम पर भूस्खलन बिंन्दुओं से लगाया जा सकता है। एक ओर तो किनौर का समूचा क्षेत्र पहले से ही अत्यत संवेदनशील है वहीं दूसरी ओर 21वीं सदी के पदार्पण के साथ ही इस जिले के सामने अनेक प्राकृतिक संसांधनों के अंधाधुध दोहन से यहां का पर्यावरण खतरे में है। किनौर जिल में एक के बाद एक लगातार कई निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं के कारण इस क्षेत्र का अस्तित्व संकट में हैं। किनौर में स्थित सतलुज जल संग्रहण क्षेत्र इस इलाके की पर्यावरणीय जीवनशैली के लिए अभिशाप बन चुका है। सतलुज जल संग्रहण क्षेत्र में नाथपा-झाखडी-15 मेगावाट, संजय परियोजना-120 मेगावाट, बास्पा-2-300 मेगावाट, रूकती-1-5 मेगावाट पहले से ही क्रियान्वित है और करछम-वांगतु-1000 मेगावाट, काशा ग-1, 66 मेगावाट, शोंरांग 100 मेगावाट, ओर टिडोंग-100 मेगावाट परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। चांगो-यंगथंग-140 मेगावाट, यंगािंग-खाब 261 मेगावाट, खाब-’यासो 1020 मेगावाट, जंगी-ठोपन 480 मेगावाट, ठोपन-पवारी-480, कगठोंग-करछम 402 मेगावाट तथा टिडोंग 2-60 मेगावाट  शुरू होने को है।  इस के अतिरिक्त ‘’यासो-स्पिलो 500 मेगावाट, काशाग 2-48 मेगावाट, काशाग 3-130 मेगावाट, बासपा 1-128 मेगावाट, रोपा 60 मेगावाट प्रस्तावित है।  12 हाईड्रो प्रोजक्ट प्रस्तावित -पाईपलाइन में है, जिससे लगभग 4000 मेगावाट बिजली पैदा करने की योजना है। इसके साथ ही कई अन्य कंपानियां परियाजना के लिए जमीन सर्वे का काम रही हैं।
 
जलस्त्रोत, जंगल-पहाड़, पर्यावरण पर उद्वोगपतियों का कब्जा बढ़ता जा रहा है। जनता के समुदायिक-बुनियदी आधिकार पर चैरफा हमला हो रहा है। 
250 किमी तक हिमाचल की वादियों में किलकारियां भरते हुए भारत की भूमिं को सिंच रही है। लगभग 150किमी किनौर की धरती को सिंचते हुए बखड़ा डैम तक पहुंच रही है। दुखद बात यह है कि इस नदी पर सौकड़ों परियाजनाएं प्रस्तावित हैं। कई दर्जन तैयार हो चुके है। नदी का पानी सुरंगों से दूसरी ओर बहा कर ले जाया जर रहा है। नदी  में  हजारों सुरंग बने  हैं इसी  सुरंगों  से  बिजली  कारखानों  तक  पानी  पहुँचाया  जाता  है, इसे पूरा पहाड़ खोखला हो चुका है . वह दिन दूर नहीं जब बहता सतलुज पूरी तरह से गायब हो जाएगा। सतलुज नदी शिमला, कुल्लू, मांडी और बिलाशपुर जिले में बहते हुए बखड़ा डैम तक पहुंचती है। यहां से करीब 100 किमी दूर तय कर केनल-नहर से पानी, पंजाब, हिरयाणा, चांडिगढ़, राजस्थान और दिल्ली भेजी जाती है। बखडा डैम बनने के बाद नदी अपना स्वाभाविक बहाव खो चुका है। साठ के दशक में बखड़ा डैम बना-जिसमें 20,290 एकड़ वनभूमिं, 23,863 एकड़ कृर्षि भूमिं जलमग्न हो गया। इस परियोजना से उन्ना तथा मांड़ी जिला की जमीन भी डूब गयी। 371 गांव जलमग्न हुए। बिलासपुर शहर जहां 7,206 परिवारों की 36,000 आबादी भूमिहीन हो गयी। इसी तरह बासी परियोजना से भी लोग विस्थापित हुए। साठ साल के बाद भी इन विस्थापितों का पूनर्वास और पर्नास्थापन नहीं किया गया है। दूसरी ओर बखड़ा परियोजना से 2,850 मेगावाट, तथा बासी परियोजना से 960 मेगावाट बिजली उत्पादित कर सरकार देश  को विकसित देश  होने का परिचय दे रहा है। सतलुज में और भी परियोजनाओं को उतारा जा रहा है। एक बृहद परियोजना बखड़ा के उतरी भाग पर निर्माणधीन है। एनटीपीसी हाईड्रो प्रोजेक्ट, काॅल डैम 1000 मेगावाट जल्दी ही शुरू होने वाला है। रामपुर में हाईड्रो प्रोजेक्ट 800 मेगावाट एसजेवीएन भी निर्माणधीन है। वहीं लाहिरी हाईड्रो परियाजना भी शुरूआती दौर में है। 
इन परियोजनाओं के कारण किनौर में सतलुज व बासपा नदी पूर्ण रूप से भूमिगत हो जाएगी। भूमिगत सुरंगों के  उपर स्थित सम्पूर्ण क्षेत्र जर्जर हो जाएगा जिस से यहां का पर्यावरण संतुलन डगमगा जाएगा। सतलुज जल संग्रहण क्षेत्र का 90 फीसदी भाग ’ाीत मरूस्थलीय होने के कारण यह जल संग्रहण क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील व जोखिम भरा है। पूजिपतियों तथा कारपोरेट घरानों ने  किनौरवासियों से सतलुज के पानी का अधिकार छीना चुका है। जिनती परियोजनाएं इस जलसंग्रहण +क्षेत्र में बनाये जा रहे हैं नदियों के बुंद-बंुद पानी कंपानियों के कब्जे में होता जा रहा है।
 पहाड़ पर रोड़ बनाने की प्रक्रिया जारी है-पहाड़ पर अब जंगल-झाड़, पर्यावरण नहीं, अब यहां कंपनियों की गाडि़यां दौडेगीं 

Thursday, June 13, 2013

आप ने मुझे पुरस्कृति किया है इससे में संघर्षसील आदिवासी -मूलवासी किसान समुदाय को समार्पित करती हुं जिसका हिस्सा बनने का गैरव मुझे प्राप्त है। जिनके स्नेह और वि’वास ने मुझे जिंदगी के हर कठीन मोंड पर रास्ता दिखाया है।




आप लोगों ने मुझे पुरस्कार से सम्मानित किया इसके लिए मैं आप लोगों को धन्यवाद देना चाहती हु। खास करके इंडिजिनस राईट -कलचरल सरवाइबल को।  आज जब देsh  ही नहीं दुनिया के हर कोने में एक तरफ जल-जंगल-जमीन -नदी-झरनों और पहाड़ों पर जो जनता के समुदायिक धरोहर है-पर ग्लोबल पूंजिवादी अर्थव्यस्था कब्जा जमाने की हर कोशिश  में जुटी है। वहीं दूसरी ओर अपने धरोहर-जंल-जंगल-पानी की रक्षा में देश  के एक एक गांव संकल्प के साथ -हम अपने पूर्वजों का एक इंच जमीन नहीं देगें-का नारा के साथ संर्घषरत है। देश  की ग्लोबल अर्थव्यस्था ने पूरी दुनिया में जिस फासिवाद को जन्म दिया है-इससे पूरी दुनिया सामाजिक, आर्थिक, संस्कृतिक संकट से गुजर रहा है, इस संकट में एक ओर जहां विकाससिल  एंव गरीब तथा यहां तक कि विकसीत दुनिया में भी सामाजिक आर्थिक और संस्कृतिक विषमता बढती जा रही है, और इसे एक जनाक्रोश  पूरी दुनिया में दिखाई दे रही है। वहीं दुसरी ओर बंचित जन समूदाय अपनी अधिकारों प्रकृति...एवं प्रर्यावरण के संरक्षण, प्रकृतिक संसाधनों पर अपना निर्णनायक अधिकार और सत्ता के लोकतंत्रिक प्रकिया में अपना दावा पूरी ताकत के साथ पेश  कर रहा है। दुनिया एक ओर जहां हिंसा और आंतक, धार्मिक नसीलिए , भेद-भाव से ग्रास्त दिख रही है। वहीं इन स्थितियों को बदलने और सामानतामूलक सामाज के निर्माण के लिए दुनिया भर के जनसमूदाय खास तौर पर आदिवासी समूदाय अपनी विभिन्न तौर-तरीकों से लोकतंत्रिक प्रतिरोध का स्वर बुलंद कर रहे हैंं। संकट को एकांगी होकर नहीं समझा जा सकता है, ना ही विकास के मौजूदा ढांचे में वह ताकत है , कि वह बंचित जन समूदायों की आकाक्षाओं को पूरा कर सके। ‘खास तौर पर एशिया , अफ्रिका और अरब के अनेक देशों  में लोंकतंत्र जनसंघर्ष का एक कारगार अभिव्यक्ति उभर रहा है।
यूरोप के युवा वर्ग, मजदूर-किसान विकास के वर्तमान ढांचा के बदहाली के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। मेरी दृष्टिटी में हमारा यह काल खंड परिर्वतन, आकांचा , और जनता की बंचित जनता की सशक्त एकजुटता के माध्यम से लैस है। अब हमें तय करना है कि दुनिया में बढ़ती , ’भेदभाव, सामानता, सहयोग, सहकार-सहभागिता जैसे उच्चतम मानवीय मूल्यों जो आदिवासी समाज की विरासत भी है उसकी भविष्य की गारंटी कैसे किया जाए यह चिंता का विषय है। आज अकसर पूछा जाता है कि तकनीक संचालित दुनिया में आदिवासी समाज उसके मूल्य, संस्कृति और उनके विषेशताओं का कोई भविष्य  बचा हुआ हैं यह नहीं। यह भी कहा जाता है कि दुनिया की जो मुख्य धारा है और उनका उपक्र्रम है, में आदिवासियों को शामिल हो जाना चाहिए और और संस्कृति को इतिहास का विषय बना देना चाहिए। लेकिन मै यहां पूरी दृढता से जनता के अनुभवों की, और अपनी सीख के आधार पर कहना चाहती हुं कि आदिवासी जन समूदाय के साथ साथ सभी बंचित जन समूदायों की एकजुटता से जारी संघर्ष का भविष्य है और वह निकट भविष्य में प्रकृतिक संसाधनों और आर्थिक असामानता के मौजूदा ढांचे को वास्तविक लोकतंत्रिक सामाज में बदल देगा। जिसमें हर समुदाय की अपनी विधिता, बहुलता और संस्कृतिक अस्तित्वा की गारंटी होगी । मेरे विचार में  आदिवासी जन समूदायों का भविष्य इसलिए भी है कि उनकी मौलिक दर्निक सामाजिक और सकृतिक, प्रकृति और चेतना वैज्ञानीक और निरंतर नये की तालाश  के साथ जूटी रही है। यही कारण है कि हजारों सालों के संस्कृतिक अतिक्रण और आक्रमण के बावजूद आदिवासी जन समूदाय अपने संघषों से इसकी हिफाजत और विकसित करते रहे हैंं। मेरी मातृ भाषा मुंडारी में कहा जाता है-सेनगी सुसुन-काजीगी दुरंग,(बोलना ही गीत-संगीत और चलना ही नृत्य है) यही आदिवासियों की ताकत है। इसी में हमारा सामाजिक अंतवि’वास(इनर विलिभ) निहित है। यही हमारे संघर्षों के प्रेरणा का स्त्रोत है। हमारे महान नायक बिरसा मुंडा के उलगुलान के जमाने का गीत मैं यहां आप को एक उदाहरण में देना चाहती हुं कि किस तरह हम नृत्य, संगीत और जीवन के तौर तरीकों को अपना संघर्ष का प्रयाय मानते हैं-
डुम्बारी बुरू चेतन रे....ओकोय दुमंग रूताना को- सुसुनेतना
ओकोय दुमंग रूताना को -सुसुनेतना
डुम्बरी बुरू चेतन रे बिरसा दुमंग -रूताना को सुसुनतना
बिरसा दुमंग रूताना को सुसुनतना
(डुम्बरी पहाड़ पर कौन मंदर बजा रहा है -लोग नाच रहे हैं। डुम्बरी पहाड़ पर बिरसा मंदर बजा रहे हैं-लोग नाच रहे हैं)
बिरसा मुंडा ने जो राह दिखाई उसी रास्ते पर चलते हुए हम आदिवासी मूल्यों की हिफाजत के लिए आज विस्थापन के खिलाफ-जंल-जंगल-जमीन, समाज-भाषा-संस्कृतिक, इतिहास और पहचान को संरक्षित करने का नया उलगुलान(रिवोले’ान) चल रहा है। आदिवासी चेतना वा संस्कृति को इन विन्दुओं में रखना चाहती हुं
1-समुदायिक जीवन सैली
2-प्रकृतिक संपति पर समुदायिक अधिकार
3-सहकार की चेतना(कोओपरे’ान) 
4-स्त्री-पुरूष सामानता
5-जनतंत्र में सर्वानुमति मूलक निर्णायक चेतना(कोलोकटिव डि’िाजन एंड इमप्लिमेंटे’ान) 
यही हमारा मूल विचार है, जिस पर जहां से मैं आती हुं वहां के आदिवासियों ने लगभग 300 सालों से संघष किया और हजारों की संख्या में बलीदान दिया और आज भी संघर्ष कर रहे हैं और बलीदान दे रहे हैं। मैं भी इस सघर्ष की विनम्र हिस्सेदार हुं और इस बात की मुझे बेहद खुशी  है। 
बाबा तिलका मांझी, बिंदराय-सिंदाय, सिद्वु-कान्हू, चांद-भैरव, फुला-झानों, बिरसा मुंडा, गाया मुंडा, माकी मुंडा जैसे महान क्रांतिकारी उपरोक्त मुल्यों के लिए ही शहिद हुए। और हमारे समय में भी उन्हीं की प्रंेरणा से हम प्रकृतिक संसाधन, समाज, भाषा, संस्कृति को न केवल बचाने बल्कि एक नया समाज बनाने के लिए संघर्षरत हैं। 
झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, दलित, मेहनतकश  समूदाय का प्रकृति के साथ पिता और पुत्र का रिस्ता रहा है। इन समुदयों का सामाजिक, भाषा-संस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, और इतिहासिक अस्तित्व जल-जंगल-जमीन, नदी-पहाड़ में ही जीवित है और रहेगा। यह समुदाय तब तक ही जीवित रहेगा-जब तक जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा हुआ है। जब आदिवासी -इंडिजिनस सोसाईटी अपने जल-जंगल-जमीन-नदी-पहाड-से उजड़ता है, तो वह सिर्फ अपने जीविका यह घर से नहीं उजड़ता है लेकिन वह अपने माजाजिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति, आर्थिक और इतिहास से उजड़ता है। विशव में आदिवासी इतिहास को देखेगें-तो यह साफ हो जाता है कि आदिवासी समूदाय वहीं जीवित रहते जहां जंगल -जमीन-नदी-पहाड-झरना है। इंडिजिनस सोसाईटी प्रकृति के हिसा हैं। एक दूसरे से अलग होकर न तो हम आदिवासी -इंडिजिनस सोसाईटी की कल्पना कर सकते हैं न जंगल-नदी झरना और पहाड़ की। जिस तरह पानी के बिना मच्छली जिंदा नहीं रह सकता है-उसी तरह प्रकृतिक धरोहर के बिना इंडिजिनस सोसाईटी जीवित नहीं रह सकता है। 
इस सच्चाई को देखते हुए ही देश  के आजादी के बाद भारत देश  में अपने नागरिकों के अधिकारों को कानूनी रूप भारतीय संविधान में दर्ज कर रहे थे-तब देश के आदिवासी-मूलवासी बहुल क्षेत्रों को भारतीय संविधान में 5वीं और 6वी अनुसूचि क्षेत्र के रूप में विशेष दर्जा दिया गया। इस कानून में 5वीं अनुसूचि क्षेत्र को अधिकार दिया गया कि-हर गांव -ग्राम सभाएं अपने सीमा क्षेत्र के प्रकृतिक संसाधनों को अपने परंपरागत समुदायिक अधिकार क्षेत्र के तहत जंगल-पानी, जमीन आदि को नियंत्रित और संचालित करेगें। जब भी देश  की सरकार को या किसी भी एजेंन्सी को विकास कार्यो के लिए जमीन अधिग्रहण की जरूरत होगी-तब स्थानीय गांव सभा(ग्राम सभा) के सहमति के बिना जमीन अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है। 
झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है। इतिहास गवाह है-यह इलाका बीहड़ जंगलों से पटा हुआ था। आदिवासी-मूलवासी किसान समुदाय ने बाध-भालू, सांप -बिच्छु से लड़कर इस राज्य को आबाद किया। यही कारण है कि-झारखंड के आदिवासी समुदाय को अपने आबाद किये इस जमीन-जंगल पर सीएनटी एक्ट 1908 और संताल परगना क’तकारी अधिनियम के   तहत जमीन-जंगल रक्षा संबंधित विशेष अधिकार मिला हुआ है। छोटानागपुर कश तकारी अधिनिय और छोटानागपुर क’तकारी अधिनियम में अदिवासियों का जमीन कोई भी बाहरी व्यक्ति यह संस्था अधिग्रहण नहीं कर सकता है। लेकिन आज सरकार, कारपोरेट घराने, लैंड माफिया, सरकार की आदिवासी किसान विरोधी नीतियां और पुलिस-प्रशासन मिल कर इस कानून का वयलेशन कर पूरे राज्य के अदिवासी-मूलवासी किसानों को जमीन विहीन और बेघरबार के दिया जा रहा है। 
भूअर्जन कानून 1894 के तहत सरकार जहां चाहती है-मनमानी ढंग से जमीन अधिग्रहण करते आ रही है। इस कानून में प्रावधान धाराएं जो जनहित में है-उसे भी पालन नहीं करती है। आदिवासी -मूलवासी किसानों के हित में दिये प्रावधानों का संशोधण धन कर उसे कंपानियों के लिए के लिए परिर्वतित किया जाता रहा है। इस कारण आजादी के बाद आज तक में झारखं ड में 2 करोड़ से ज्यादा आदिवासी-मूलवासी किसान विस्थापित हो चुके हैं। आज ये विस्थापित कहां हैं? किस हालात में हैं? सरकार या कोई राजनीतिक दल को इसकी कोई चिंता नहीं है। विस्थापित आदिवासी समुदाय आज अपना पहचान खो चूका है। सामाजिक मूल्य और उनकी सामूहिकता पूरी तरह तार तार हो गयी है। आज न तो उनकी भाषा है न ही संस्कृति ही है। 
झारखंड राज्य में छोटानागपूर का’तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना का’तकारी अधिनिय, पांवची अनूसूचि और छठवीं अनूसूचि जैसे कानूनों के प्रावधान होते हुए भी राज्य सरकार इन कानूनों का हनन वयलेशन करके आदिवासी-मूलवासी -इंडिजिनस सोसाईटी तथा किसानों का जमीन, जंगल, नदी-पहाड़ को गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर रही है। साथ ही कारपोरेट घराने के हवाले भी कर रही है।  सरकार गैर-कानूनी तरीके से किसानों के जंगलों -खेती की उपजाउ जमीन, जलस्त्रोतों को माइनिंग कंपानियों के साथ एमओयू करके हड़प रही है। जहां भी सरकार विकास के नाम पर या कंपानियों के कारखाना या माइंनिग के लिए जमीन अधिग्रहण कर रही है वहां  न तो जमीन मालिक से-गांव वालों से या गांव सभा से ने तो पूछ रही है और न ही गांव वालों की सहमति ले रही है। जहां जमीन लेना चाह रही है-पुलिस के बल पर हिंसा और आतंक के सहारे जमीन कब्जा कर रही है। 
राज्य बनने के बाद 12 सालों के भीतर राज्य सरकार ने 104 औधोगिक घरानों के साथ एमओयू कर चुकी है। इसमें से 98 प्रतिशत कंपानियां माइनिंग कंपानियां हैं। एक-एक कंपानी को कोयला माइंस, अयरन ओर माइंस, बोक्साइड मांइस, अबरख माइंस, माईका माइंस, पानी के लिए डैम, प्लांट के लिए जमीन, यतायात के लिए जमीन, शहरीकरण के लिए, बाजार के लिए जमीन चाहिए। 
यदि सभी कंपानियों को सरकार माइंस के लिए जमीन देती है-तब झारखंड पूरी तरह से पर्यारणविहीन और बंजर भूमिं में तब्दील हो जाएगा। आजादी के बाद आज तक जितना आबादी विस्थापित नहीं हुआ है- उसे चैगुणा आबादी सिर्फ दस वर्षों के भीतर अपने रहवास और जीविका से उजड़ जाएगें। 
मानव अधिकार पर चैतरफा हमला हो रहा है। पूरे झारखंड में जल-जंगल-जमीन-पर्यावरण संरक्षण के लिए जनआंदोलन चल रहा है। पूरे देश  के किसान आज विस्थापन के आतंक के साये में जी रहे हैं। देश  की कल्याणकारी सरकार सरकार उन्हें असामाजिक तत्व, उग्रवादी तथा माओवादी घोषित कर उन पर दर्जनों फाॅल्स केस डाल दिया जा रहा है। केस में फंसा कर उन्हें जेल में डाल दिया जाता हैै।
 हमारे पूरखों ने वर्चास्व की संस्कृति को हमेशा  से चुनौती दी है क्योंकि आदिवासियों का विशवास कलचरल डायवर्रसिटी एंड पुलुरलिजम में है। हम सभी संस्कृतियों के साम्मान के साथ नया सामाज चाहते हैंं। हमारे देश  में इस समय एक संस्कृतिक वर्चस्व का राजनैतिक अभियान जोरो से जारी है। जो एकत्म संस्कृतिक राष्टवाद के नाम पर र्धािर्मक एवं संस्कृतिक अल्पसंख्याकों को खतरे में डाल दिया है। पिछले 20 सालों में भारत का लोकतंत्र बंचित जन समूदायों की हिस्सेदारी का जितना गवाह है -उतना ही वह संस्कृतिक राष्टवाद के अक्रमाण का शिकार है। आइसे से महौल में सेकूलर इंडिया को बचाने में आदिवासी समाज की संस्कृतिक बहुलतावादी दृष्टिटीकोण की अहमियत बढ़ जाती है। हमारा पूरा भारतीय उपमहाद्वीप कटटरता और उदारता के बीच एक निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है चुकी यह वही दौर है, जिसमें पूराने समांती मूल्य नव उदारवाद के प्रचार-प्रसार के आधार बनाये जा रहे हेैं यह अजीब बिडंमना है। हमने पिछले दो दशकों में अपने जंगल-जमीन-पानी -समुद्र और नदियों पर बड़े बड़े कारपोरेट घरानों का कब्जा देख रहे हैं। हम यह भी देख रहे हैं कि साप्रदायिक उन्नमाद को इस्तेमाल किस तरह नयी आर्थिक संरचाना को मजबूत बनाने में किया जा रहा है, लेकिन मैं उन सबके प्रति कृतज्ञ हुं जो इस परिघटना के खिलाफ निरंतर संघार्ष कर रहे हैं और इस बात को दस्तक भी दे रहे हैं कि आदिवासी पुरखों ने और बाद में स्वंतत्र संग्राम सेनानीयियों  ने जो सपने दिखाये थे। उसके अनुकूल एक नये समाज का निर्माण संभव है। एक ऐसा  समाज जहां कोई गैर बरा -बरी और किसी भी तरह के वर्चस्व के लिए जगह नहीं है। 
जल-लंगल‘-जमीन की हिफाजत और प्रकृतिक संसाधनों पर जनसमुदाय के समूहिक अधिकार की लड़ाईयां इसी से प्रेरित है। पिछले 20 सालों में कारपोरेट लूट और उसकी हिफाजत के लिए जितनी कार्रवाइयां की गयी है-उससे आंदोलन कमचोर नहीं हुए हैं-बाल्कि और मजबूती से सभी बंचित जन समुदायों को एक साथ एक मंच पर ला रहे  हैं।  लगभग 100 सालों के संघर्ष के बाद हमारा झारखंड एक प्रात के रूप्प में अस्तित्व में आया तो जंगल झुम उठे थे और मांदर गुंज उठा था। लेकिन हमारो खुशी  छनिक साबित हुई। राज्य गठन के मात्र ढंड महिना के बाद ही 30 सालों से जो आंदोलन शांति  से कोयल और कारो नदियों के प्रवाह को बचाये रखने की लिए संघर्षरत थां उससे प्रसशनिक आधिकारियों के गोलियों से छलनी कर दिया गया थाा।
कोयल कारो आदिवासियों के लिए केवल नदियां नहीं है-एक संस्कृतिक पहचान है। साथ ही हमारे आजीविका का मूल आधार है। 2 फरवारी 2001 को जब तपकारा में आठ आदिवासी ओर एक मूलवासी को शहित हुए तब हमें एहसास हुआ कि 15 नोवेम्बर 2000 को जिस झारखंड राज्य की नींव डाली गयी है वह हमारे लिए नहीं है। और हमने देखा कि हमारे प्रकृतिक संसाधनों के दोहन और लूट के लिए किस तरह हमारे अस्तित्व के साथ खिलवाड करते हुए हमें चुनौती दी गयी। मैं कहना चाहती हुं कि झारखंड के आदिवासी और मूलवासियों ने सरकार और कारपोरेट की चुनौती को स्वीकार किया और एक इंच भी जमीन नहीं देगें का नारा झारखंड के 33 हजार गांवों में गूंजने  लगा। इस आवाज को विभिन्न जनसंगठनों और आदिवासी मूलवासी संगठन ने बुलंद किया। 
कोयल कारो परियोजना के तहत डैम बनने से लगभग ढाई लाख आदिवासी-मूलवासी किसान विस्थापित हो जाती। 55 हजार एकड़ कृर्षि भूंमि पानी में डूब जाता। 27 हजार एकड़ जंगल पानी में डूब जाती। 80 से ज्यादा आदिवासी समुदाय के धार्मिक स्थल सरना ससनदीरी जलमग्न हो जाता। 
राज्य के दुमका जिला के काठीकुड़ प्रखंड में आरपीजी ग्रुप ने कोयला माइंस के लिए जमीन कब्जा करना शुरू कर दिया। कोयला माइंस के लिए गांव वाले जमीन नहीं देना चाहते हैं-गांव वाले जमीन-जंगल बचाने के लिए कई षर्वों से संघर्षरत हैं। कंपानी कोयला माइंस के साथ ही वहां बिजली उत्पादन के लिए प्लांट बनाना चाहती है। ग्रंामीणों ने कंपानी द्वारा जबरन जमीन अधिग्रहण का विरोध में रैली निकाले। इस रैली पर पुलिस वालों ने फायरिंग किया। घटनास्व्थल पर ही एक साथी मारा गया। दर्जनों घायल हो गये। बाद में एक घायल 
साथी मर गया। एक ने पूरी तरह से बिलंग हो गया, एक के दोनों आंख की रोशनी हमेशा  के लिए छिन लिया गया। 
सरकार ने इस आंदोलन के अगुवा मुनी हांसदा और उनके साथियों पर उग्रवादी होने को झूठा मुकदमा डाल दिया। मुनी हांसदा और उनके साथी 7 महिने तक जेल में रहंंे
2003-4 में साहेबगंज जिलो के पचुवाड़ क्षेत्र में पेेनम कोल माइंस ने कई गांवों को हटा कर किसानों की जमीन जबरन कज्बा करना प्ररंभ कर दिया। गांव वाले विरोध करते रहे। बाद में कंपनी के दलाल, लमीन माफिया, कंपानी वाले पुलिस-प्र’ाासन के सहयोग से गांव की जनता को जबरन उजाड़ फेंका। यही नहीं आंदोलन की अगुवा सिस्टर बालस की हत्या भी कर दी गयी। 
राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिला के पोटका प्रखंड में भूसन स्टील प्लांट बैठाने के लिए जबरन गांव वालों का जमीन कब्जा करना प्ररंभ्म किया। गांव वाले शुरू से ही इसका विरोध करते आ रहे हैं। यहां भी आंदोलन का अगुवाई कर रहे दर्जनों माहिला-पुरूषों कई फालस केस कर दिये। कुछ साथी 3 महिनों तक जेल के अंदर बंद रहे। 
जिन जिन इलाकों में कंपानियों को सरकार अयरन ओर माइंस के लिए जमीन देने की तैयारी कर रही है-उन इलाके को सरकार माओविस्ट प्रभावित एरिया घोषित कर बेकसूर ग्रामीणों को उग्रवादी होने के जुल्म में जेल में डाल रही है। इन इलाकों में ग्रीणहंट चला कर गांव में सीआरपीफ भर दे रही है। महिलाएं और बचियां बलात्कार की शिकार हो रही हैंं । एक ओर प्रशासन और दूसरी ओर उग्रवादी संगठनों के बीच ग्रामीण पीस रही है। 
विकास के नाम पर विस्थापित लगभग 2 करोड़ की आबादी में आधी आबादी महिलाओं की है। आज ये विस्थापित महिलाएं यह तो राज्य से पलायन कर दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी के लिए चली गयी हैं, यह फिर महानगरों में आया-जुठन धोनी वाली नौकरानी बन गयी है। कुछ घांस बेच कर एक बेला की रोटी जुगाड़ी में रहती हैं। बच्चियां-युवातियां शिक्षा से पूरी तरह बंचित हैं। 98 प्रतिशत विस्थापित बच्चियां और युवातियां अशिक्षित हैं। 95 महिलाएं एनेमिक की शिकार हैं। 95 प्रतिशत महिलाएं घर विहीन हैं। जानवरों की तरह शहर के गली-कुचे की गंदी नलीयों के किनारे झोपडि़यों में जीवन बसर करने को विवश  हैं।
सरकार अपने नागरिकों के प्रती जो संविधानिक जिम्मेवारी था-को पूरी तरह खारिज कर दे रहा है। अब कारपोरेट घरानों को जमीन उपलब्ध कराने के लिए संविधान प्रदत जमीन अधिग्रहण कानून को भी खारिज करके कंपानियों को सीधे तौर पर जमीन बेचने का रास्ता खोल दिया जा रहा है। सभी कंपानियों को साम-दाम-दंड-भेद अपना कर किसानों से जमीन लेने की छूट दी जा रही है। कंपानियां जहां चाह रही हैं-वहां अपना दलाल बैठा कर जमीन लूट रहा है। गांव वाले-जमीन मालिकों के विरोध करने पर उन्हें किसी न किसी फोल्स केस में फंसा कर जेल में डाल दिया जा रहा है। 
बोकारो जिला के चंदन क्यारी प्रखंड में हजारों एकड़ जमीन एलेक्ट्रो स्टील ने स्टील प्लांट लगाने के लिए ग्रामीणों को आतंक में रख कर खरीदा। कुछ जमीन मालिकों को जमीन का कीमत मिला, कुछ जमीन मालिकों को कुछ भी नहीं मिला। कंपानी ने हजारों एकड़ जमीन कोयला माइंस के लिए हड़प लिया। जमीन मालिकों से कंपानी के दलालों ने वादा किया कि जमीन का किमत भी देगें और मुवाअजा भी देगें। मुवाअजा में नौकरी भी देगें। कोयला माइंस के लिए कंपनी ने 2005 में जमीन लिया। लेकिन आज तक कंपनी ने किसानों को न तो जमीन का पूरा कीमत ही दिया ना ही नौकरी ही। 
खूंटी जिला और गुमला जिला के तोरपा ब्लोक, कमडारा ब्लोक, कर्रा ब्लोक, रनिया ब्लोक के करीब 40 गांवों को उजाड़ कर वि’व का स्टील जैंट आर्सेलर मित्तल 12 मिलियन टन का स्टीन प्लांट लगाना चाहता था। कंपनी ने जमीन लेने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना कर गांव वालों का जमीन कब्जा करना चाहता था। मित्तल कंपनी द्वारा जबरन जमीन अधिग्रहण के खिलाफ में हम लोगों 2006 से लोगों को गोलबंद कर आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच के बैनर से आंदोलन करना शुरू कर दिये। 2006 से लगातार दिन-रात अभी तक लंबा  संर्घष के बाद हमारा संगठन ने इस इलाके के लाखों आबादी के भविष्य के साथ पर्यावरण को उजड़ने-विस्थापित होने के बचा सके। मित्तल कंपनी के साथ इस इलाके में इस्पात इंडस्टी्र्र भी 8000 एकड़ जमीन स्टील प्लांट के लिए अधिग्रधण करने वाला था। इसके अलावे दर्जनों छोटे औद्योगिक घराने भी इस इलाके में जमीन-जंगल पर कब्जा करने आते। 
इन कंपनियों और औद्योगिक घरानों को पानी उपलब्ध कराने के लिए करो नदी में रेहड़गडा गांव के पास एक डैम बनाने का प्रस्ताव था। एक दूसरा डैम कर्रा प्रखंड के छाता नदी में बनाने का प्रस्ताव था। इन डैमों से भी कई दर्जन गांव विस्थापित हो जाते। इस तरह से खूुटी जिला के आदिवासी मूलवासी समुदाय की आधी आबादी विस्थापित हो जाती। रांची के कांके स्थित नगड़ी में सरकार ने फरर्जी तरीके से 227 एकड़ जमीन अधिग्रहण के कागजात तैयार किये। इसी कागजात के आधार पर जमीन अधिग्रहण किये जाने का दावा करती है। लेकिन मैंने जिला भुअर्जन विभाग से आरटीआई से जानकारी मांगी-उसमें साफ लिखा हुआ है कि-1957-58 में नगडी में 153 जमीन मालिक थे। इसमें से 128 किसानों ने जमीन का पैसा लेने से इंकार किया। 
सरकार कहती है-रांची बिरसा एग्रीकलचर यूनिर्वसिटी के लिए उत्क जमीन को अधिग्रहण किया गया है। मैने बिरसा एग्रीकलचर यूनिर्वसिटी से इस संबंध में जनकारी मांगी -तो इन्होंने कहा-हमारे पास जमीन अधिग्रहण संबंधी कोई भी जानकारी नहीं है। दूसरी ओर उत्क कृर्षि भूमिं पर सदियों से खेती करते आ रहे हैं-आज भी खेती कर रहे हैं। साथ ही जमीन का जामाबंदी भी सरकार को 2012 तक भुगतान किये हैं। किसाना जमीन नहीं देने का विरोध 1957-58 से ही करते आ रहे हैं। मैं बताना चाहती हुं-हमलोग किसी भी ’िाक्षण संस्थान के विरोध में नहीं हैं सभी संस्थान बने, लेकिन हमारी उपजाउ कृर्षि भूंमि पर नहीं, बंजर भूंमि पर बने ।
आज सरकार जब्रजस्त इस जमीन को पुलिस के बल पर छीन रही है। किसान विरोध कर रहे हैं-तब हम लोगों पर दर्जनों फोलस केस थोपा गया। चार साथियों जुलाई 2012 में जेल में डाला। इसमें दो महिला साथी हैं। इसके बाद मुझे ढाई माह तक फोलस केस में जेल में रखा। गांव की दर्जनों महिलाओं पर दर्जनों फोलस केस है। 
सरकार कहती है-विस्थापित होने वालों को मुआवजा दिया जाएगा और साथ ही पूर्नस्थापित एवं पूनर्वासित किया जाएगा। लेकिन सवाल है-कंपनी और सरकार किसका मुआवजा देगें? क्या हमारा शुद्व हवा-शुद्व पानी, शुद्व भोजन, नदी-झरनों, हमारे भाषा-संस्कृति, धर्मिक स्थल सरना-ससन दीरी, हमारा पहचान और इतिहास को पूनस्थापित और पूनर्वासित कर सकता है? नहीं कतई संभाव नहीं हैं। हम आदिवासी समूदाय मानते हैं-हमारा इतिहास, भाषा-संस्कृति, धर्मिक स्थल सरना-ससन दीरी, हमारा पहचान और इतिहास को किसी भी कीमत पर पूनर्वासित नहीं किया जा सकता है-न ही किसी मुआवाजा से भरा जा सकता है। 
हम विकास विरोधी नहीं हैं-हम विकास चाहते हैं, लेकिन हमारे कीमत पर नहीं। हम चाहते हैं-हमारे नदी-झरनों का विकास हो। हम चाहते हैं-जंगल-पहाड़, पर्यावरण और कृर्षि का विकास हो। हम चाहते हैं-सामाजिक मूल्यों का विकास, भाषा-संस्कृति का विकास हो। हम चाहते हैं-हमारी पहचान और इतिहास का विकास, चाहते हैं-हर व्यक्ति को सामान शिक्षा और स्वस्थ्य जिंदगी मिले। हम चाहते हैं-प्रदुषित नदियों को प्रदूषण मुक्त हो। बंजर भूमिं को हरियाली में तब्दील करना। हम चाहते हैं-सबको शुद्व हवा, पानी, भोजन मिले। यही है हमारा जनविकास का मोडल।
जिस झारखंडी अवधारना की बात की जा रही थी उसे सत्ता में गये राजनेता तो भूल गये, लकिन जनसंघर्षो ने नया आयाम दिया। तेरह साल के झारखंड में जितने कंपनियों को लाने के लिए प्रयास किये गये हैं उसी तरह प्रकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए उसी तरह से मजबूत और विस्तारित हुई जनता की लड़ाईयों ने झारंखडी आवधारणा को नया प्रोसपेकटिव दिया है। यह प्रोसपेकटिव है आजीविका की आदिवासी जन संस्कृति को प्रगति का नया आधार बनाना। एक एैसे विकास मोडल को गढ़ना जिसमें आदिवासी जीवन सैली की तरह का वैज्ञानिक सोच हो और तकनीक प्रकृति के अनुकूल समन्वाय और सहकार को महत्व दे। इसमें केवल सिर्फ प्रकृति से लेने का सोच न हो और इसमें सर्वाधिक महत्व लोगों विचार के अनुकूल योजनाओं का चयन एवं क्रियान्वयण हो । एैसे समुचित तकनीक का विकास हो जा सहअस्तित्व के सर्वाकालिक मूल्य को गतीशील बनाये। हमारे आदिवासी नृत्य की सैलियां, और गीतों के स्वर-राग-लय और उसकी ध्वानियां इस बात के गवाह है कि सहअस्तित्व के विचार से हमारा गहरा रिस्ता है। हमारे गांव में अब भी जब जंगल से कोई शिकार का कोई उत्सव होता है, और उसमें प्रप्त समग्री केवल आदमी के बीच नहीं लेकिन इंसान और जनवारों के बीच किया जाता है। हम अर्थतंत्र में इस उत्साव के मूल भावना को जीवंत देखना चाहते हैं। यानी वर्तमान अर्थ तंत्र के तौर तरीके को बदल कर एक मानवीय विकास का मोडल खड़ा करना चाहते हैं।
हम जानते हैं कि यह चुनौती मामूली नहीं है, यह हमारे चाह लेने भर से हमारी यह आकांक्षा साकार हो जाएगी एैसा नहीं है, इसलिए हम संस्कृतिक आंदोलन को सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों के लहर(वेभ) के रूप में वि’व व्यापी परिघटना(मुवमेंट-ईभेंट) के बतौर देखते हैं। हमारा दृढ़ वि’वास है कि हमारे सपनों की यह दुनिया अब ज्यादा दूर नहीं है। 
आप ने मुझे पुरस्कृति किया है इससे में संघर्षसील आदिवासी -मूलवासी किसान समुदाय को समार्पित करती हुं जिसका हिस्सा बनने का गैरव मुझे प्राप्त है। जिनके स्नेह और वि’वास ने मुझे जिंदगी के हर कठीन मोंड पर रास्ता दिखाया है। मैं यहां फिर कहना चाहती हुं-उनके वि’वास और स्नेह को और अधिक पाने की कोशिश  करूगीं और जनतंत्रिक लड़ाईयों में गांव-शहर के गरीब-गुरबो-शोषित-बंचितों-मेहनतकशों   के साथ कमद से कदम मिला कर आगे बढ़ती रहुंगी। 
विशव के तमाम संघर्षसील साथियों को मेरा जोहार 

दयामनी बरला

Thursday, June 6, 2013

THIS IS MY MESSAGE TO WORLD ....IN AWARD CEREMONY 23 MAY 2013 NEW YORK

First of all I want to thank you – especially Cultural Survival – for honoring me with Ellen L Lutz Indigenous Rights Award. In every nook and corner of this world – not just in India - global capitalism today is engaged in every possible effort to grab water, forests, land and  rivers, which are actually a collective legacy of mankind.  On the other hand, in order to protect our precious heritage of water, forests and land - we are involved in a struggle with a pledge from every single village of our land that we will not let go of even an inch of our ancestors’ land.
Globalization has, in fact, given rise to a kind of fascism. The entire world is passing through a social, economic and cultural crisis. Consequently, why just in poor and developing world - even in the developed world - social, economic and cultural inequalities are rising. And we are witnessing expression of people’s resistance and anger all over the world. On the other hand, the have-nots are demanding their rights - for preservation of nature and environment, for their decisive rights over natural resources and for their say in the power equation in the democratic process.
The world seems afflicted with violence and terror, religious and racial discrimination. At the same time, the crescendo of democratic resistance by people all over the world, especially the indigenous and tribal communities, for changing these conditions in various ways and to usher in an egalitarian society, is ever rising.  This crisis cannot be understood in isolation. Neither does the current model of development have the power to fulfill the aspirations of the have-nots. In many countries of Asia, Africa and the Arab world, democracy is emerging as an effective expression of people’s struggle.
Workers, peasants and the youth in Europe are conducting movements against the current distorted development paradigm. In my view, our era is armed with the medium of change, hope and forceful unity of have-nots.  Now we have to decide how to guarantee the future of highest human values such as peace, goodwill, equality, cooperation and unity  - which are also a legacy of the tribal societies. This is an issue of concern. It is often asked these days that in this technology driven age, is anything left of the future of indigenous societies, their values, their culture and special gifts? It is also suggested that the indigenous and tribal communities should get assimilated in the global mainstream and its technology - while their culture should be left to history. But I want to say it emphatically on the basis of my own learning and people’s life experiences that the future lies with the united ongoing struggles being conducted by all the have-nots along with the indigenous and tribal communities. In the near future, this struggle will transform the current structure of natural resource ownership and economic inequality into a real democratic society which will guarantee diversity, multiplicity and cultural existence of every community. In my view, Adivasi indigenous communities have a future also because their basic social and cultural philosophy, nature and consciousness has always been linked with the quest for scientific and new ideas.  It is for this very reason that despite thousands of years of cultural invasion and attacks,  Adivasi communities have been defending and developing these values with their struggles.
In my mother tongue Mundari, it is said : ‘Sengi Susun, kajigi durung’ which means, ‘speaking is song and music itself and walking is a dance’. This is the strength of Adivasis. This incorporates our social inner beliefs. This is the source of inspirations of our struggles. I want to give you an example from a song from the time of revolt of our great hero Birsa Munda to explain as to how we consider dance music and our lifestyle to be synonymous with our struggles:
Dumbari buru chetan re…okoy dumung rustana ko susunetna
Okoy dumung ristana ko – susunetna
Dumbri buru chetan re Birsa dumung – rutana ko susunatna
Birsa dumung rutana ko susunatna
(Who is playing Mandar (instrument) on the hill? People are dancing.
Birsa is playing Mandar on Dumbri Hill – People are dancing)

Following the path shown by our great hero Birsa Munda, another revolt is shaping today to defend adivasi values, against displacement and to protect our  water, forest, land, socio- linguistic and historical identity. I want to place Adivasi consciousness and culture within the periphery of these points:
1.       Collective lifestyle
2.       Communal ownership of natural resources
3.       Cooperative spirit
4.       Gender equality
5.       Collective decision and implementation in democracy

This is our core thinking. The place where I come from , Adivasis have struggled there for nearly 300 years and sacrificed their lives in thousands. Even today they are struggling and sacrificing their lives. I am also a humble part of this struggle and I am immensely happy for that.
Great revolutionaries such as Baba Tilka Manjhi, Binray- Sindray, Sidhu-Kanhu, Chand – Bhairav, Phula- Jhano, Birsa Munda, Gaya Munda became martyrs for these very values I described above. And in our times, inspired by these great revolutionaries, we are struggling again not only to save nature and its resources, our society, language and culture but also to create a new society.

The indigenous people of Jharkhand, dalits and working masses have a father-son relationship with nature. Their social, linguistic, cultural, religious, economic and historical existence continues to live in water, forest and land. These communities will exist so long as they are linked with water, forest and land. When adivasis and indigenous society get displaced from their land, forests and water, they not only get displaced from their dwellings and livelihood but also from their social values, language & culture, economy and history. If we look at the global history of indigenous people, it becomes clear that indigenous communities remain alive only in those places where there is water, forest and land, mountains and waterfalls. Indigenous society is a part and parcel of nature. By separating them, we can neither conceive of adivasi-indigenous society nor of forests, rivers, waterfalls and mountains. Just as a fish cannot remain without water, likewise, indigenous society cannot live without its natural heritage.
Taking cognizance of this truth, after India’s independence, when the authors of the Constitution were giving legal framework to the rights of its peoples, adivasi dominated areas were given a special status in the 5th and 6th Schedule of the Constitution.  In the 5th Schedule, a legal right has been granted that every Village Council (gram sabha)  in a village will control and utilize natural resources, forests, water and land falling within their jurisdiction according to their traditional communal rights. Whenever the government or any agency wants to acquire any land for developmental purposes, it cannot be acquired without the assent of the local Gram Sabha or Village Council.
Jharkhand is a tribal dominated state. History is a witness that this area was replete with pristine forests. Indigenous communities fought with tigers and bears, snakes and scorpions to make it habitable. It is for this reason that the indigenous tribal communities were given a special right  related to land-forest protection for inhabiting this land under Chhota Nagpur Tenancy (CNT) Act 1908 and Santhal Pargana Tenancy Act. Under CNT Act, no outside agency can acquire indigenous communities’ land. But today, the government, corporate entities, land-mafias in collusion with government’s anti adivasi and anti- farmer policies and police-bureaucratic nexus are violating this law and indigenous adivasi farmers are being evicted and rendered landless.
The government has been acquiring land arbitrarily wherever it fancies under the Land Acquisition Act 1894.  It does not respect even those provisions of the law which are in public interest. The provisions which were in the interest of indigenous tribal communities are being amended to benefit private companies. For this very reason, in post-independence period, more than 20 million indigenous tribals have been displaced from Jharkhand state. Where are these displaced persons? In what condition are they? The government or the political parties do not care two hoots. The displaced adivasi communities have today lost their identity. Their social values and collective existence stands shattered. Today, neither do they have a language nor a culture.
Despite legal protection such as CNT Act 1908 and Santhal Pargana Tenancy Act, 5th Schedule and 6th Schedule provisions in the Constitution, the state government is violating them with impunity and illegally acquiring the lands, forests, rivers, mountains of indigenous tribal communities. At the same time, it is handing them over to corporate entities. The government is illegally snatching the forests, fertile agricultural lands and water sources of indigenous farmers after signing Memorandums of Understanding (MOU) with mining companies. Wherever the government is acquiring land in the name of development or for companies or factories or for mining, it is not seeking permission of either the owner or the villagers or the Village Councils . Neither is it seeking assent of the villagers. Wherever it feels like acquiring land, it is doing so using violence and terror using the police.
After the formation of the Jharkhand state, within 12 years, the state government has signed MOU’s with 104 Corporates. Out of these, 98% are mining companies. Each and every company wants dam for water, land for plant, land for transportation, urbanization and market for their coal,  iron ore, bauxite and mica mines.
If the government gives land for mining to all companies, Jharkhand will lose its environment and the land will become infertile. In ten years, four times more population will get displaced from its habitat and livelihood than the entire displaced populations since independence.
Human rights are being attacked left, right and center. In the entire Jharkhand state, mass movements are going on for protection of water, forests, land and environment. All through the country, farmers are today living under the shadow of terror of displacement. The welfare state is dubbing them as anti-social elements, extremists and Maoists and implicating them in dozens of false cases and packing them off to jails.
Our ancestors had always challenged the culture of domination since the indigenous people believe in cultural diversity and pluralism. We want a new society which respects all cultures. These days, in our country, a political campaign is going on for cultural supremacy at full speed. It has threatened religious and cultural minorities in the name of holistic unitary cultural nationalism. In past 20 years, Indian democracy has witnessed participation of have-nots as much as attacks by cultural nationalists. In such an atmosphere, so as to save secular India, the importance of pluralistic adivasi cultural viewpoint increases significantly. Our entire Indian sub-continent is waging a decisive battle between liberalism and fanaticism. Since this is the same era in which old feudal values are being made the basis for promoting neo-liberalism. This is a strange irony. In past two decades, we have witnessed big corporate control over our forests, land, water, rivers and seas. We are also witnessing how religious-communal passions are being abused to strengthen the new economic paradigm. But I am grateful to all those who are struggling incessantly against this phenomenon and giving a voice to the dreams sowed by indigenous ancestors and the freedom fighters. It is possible to create a society in harmony with these dreams – a society which has no place for anyone’s domination.
The struggles for preservation of water-forests-land and collective ownership of communities over natural resources are inspired by these very dreams. In last 20 years, mass movements have not been weakened by the corporate loot and acts in their defence. On the contrary, the have-nots are coming together in strength on a common platform. When our state of Jharkhand came into existence after a hundred year struggle, the forests danced in joy and the sound of Mander musical instrument reverberated the air. But our happiness proved to be a momentary one.  Barely within a few months of our state’s formation, the peaceful movement which was struggling to keep the flow of Koel and Karo rivers for 30 years, was now riddled with bullets ordered by the official bureaucracy.
Koel and Karo are not just rivers – they are a cultural identity. They are also a fundamental basis of our livelihoods. When eight adivasis and one indigenous person were martyred on 2 Feb 2001, we realized that the state whose foundation stone was laid on 15 November 2000 is not for us. And we saw how we were challenged while playing with our existence and for exploitation and loot of our natural resources. Let me say that the tribals and indigenous people of Jharkhand fully accepted the challenge put forth by the government and the corporates;  and the slogan of ‘We will not give an inch of our land’ started reverberating the 33,000 villages of Jharkhand. This voice was eloquently raised by various mass organizations and Adivasi indigenous organizations.
With the commissioning of Koel-Karo project, nearly 2,50,000 indigenous people and tribals would have got displaced. 55,000 acres of agricultural land would have got submerged. 27,000 acres of forests too would have submerged. A sacred religious site Sarna Sasan Diri worshipped by some 80 tribal communities would have gone under water.
In Kathikud block of Dumka district of Jharkhand, RPG Group started seizing land for coal mines. The villagers did not want to give land for coal mining. For years, the villagers have been on the path of struggle to save their lands and forests. Apart from coal mining, the company wanted to set up a plant for producing electricity. The villagers organized rallies against forcible acquiring of their lands. The police fired on the rally – one comrade died on the spot and dozens were injured. Later another injured comrade died. Yet another became disabled and one comrade lost both of his eyes permanently. 
The government implicated the leader of this movement Muni Hansda and his comrades for being extremists. Muni Hansda and his comrades were thrown in jail for 7 months.
In 2003-04, in Pachuwad block of Sahebganj district, Penam Coal Mines started clearing villages and forcibly acquiring farmer’s lands. The villagers kept resisting. Later on, the with the help of touts, land Mafiosi and police-administration, the company forcibly evicted the villagers. Not just this, the leader of the movement, Sister Balas was killed.
In the Potka Block of eastern Singhbhum district, forcible eviction started for setting up Bhushan Steel Plant. The villagers have been resisting this from the beginning. Here also, false cases were lodged against dozens of men and women leading the movement. Several comrades remained in jail for 3 months.
All those areas where the government is preparing to give land to companies for iron ore mines, are being declaring as Maoist affected areas and innocent villagers are being thrown in jails calling them extremists. In these areas, the government is launching Operation Greenhunt and flooding  them up with the Central Reserve Police Force. Women and young girls are becoming victims of rape. They are getting battered, sandwiched between the establishment and the extremist organizations.
Of the 20 million displaced in the name of development, nearly half are women. These displaced women have migrated to other states to earn their living. Or else they have become maid servants in metropolis. Some sell grass to fend one meal in a day. Young girls and kids have absolutely no access to education. 98% displaced young girls and kids are illiterate. 95% are anaemic. 95% women have no house. They are forced to spend their lives like animals living near dirty drains in slums in cities.
The government has abdicated all constitutional responsibilities it had towards its citizens. Now, in order to arrange land for corporates, constitutionally stipulated Land Acquisition Act too has been thrown out of the window and attempts are being made to pave the way for direct sale of land to the companies. All the companies are being allowed to acquire land from the villagers by hook or by crook. The companies are sending their touts and looting the land wherever they like. If any villager or land-owner tries to resist, s/he is implicated in false cases and packed off to prison.
In Chandan Kyari Block of Bokaro district, Electro Steel Company bought land by terrorizing the villagers for setting up a steel plant. Some landowners got some compensation, some got nothing. The company grabbed thousands of acres land for its coal mines. The company owners promised the touts that they will give the price of land as well as compensation money. In compensation, they will give jobs also. Land was acquired in 2005 for coal mines but till this date neither have the villagers been paid the full price nor given any jobs.
In Torpa , Kamdora, Karra , and Rania blocks of Khoonti and Gumla districts, global steel giant Arcelor Mittal wanted to set up a 12 million ton steel plant by razing to ground 40 villages. The company wanted to acquire the village lands by hook or crook. In 2006 we started mobilizing the public against the forcible land acquisition under the banner of Adivasi Moolwasi Astitva Raksha Manch (Adivasi Indigenous People Existence Defence Forum).  After a protracted struggle lasting days and nights since 2006, our organization was able to save the future of hundreds of thousands from displacement as well as the environment. Along with Mittal, Ispat Industry too was looking to acquire 8000 acres of land for a steel plant. Apart from these, dozens of small industrial families too would have landed up to grab our land and forests.
There was a proposal to construct a dam near Rehadgada village on Karo river to make water available to companies and industrial magnates. Another dam was to be constructed at Karra block on Chhata river. Several dozen villages would have got displaced due to these dams. Similarly, half the population of indigenous adivasi community would have got displaced in Khoonti district. At Nagdi, Kanke in Ranchi, the government prepared papers for fraudulently acquiring 227 acres of land. On the basis of such papers it claimed to acquire the land. However, I asked for information under the Right to Information Act from the Land Acqusition Department. Their reply clearly stated that in 1957-58, there were 153 owners of land in Nagdi. Of these 128 refused to take any money in exchange for land.
The government says that the said land has been acquired for Ranchi Birsa Agricultural University. When I asked the Birsa Agricultural University for information in this connection, they said that they had no information regarding land acquisition. On the other hand, indigenous landowners have been cultivating the said land for ages - and are doing so even today. They have also been paying taxes to the government till 2012. Peasants have been resisting selling land since 1957-58. I want to tell you that we are not against educational institutions. We want institutions to come up - not on our fertile lands but on infertile wastelands.
These days, the government is snatching these lands forcibly. Villagers are resisting all this. Then dozens of false cases were foisted on us. Four comrades were imprisoned in July 2012. This includes two female comrades. Thereafter, I was imprisoned for two and a half months under a false case. Dozens of village women have false police cases against them.
The government says that those getting displaced will be compensated. At the same time they will also be rehabilitated and given alternative housing. But the question is – what will the government and the companies compensate for? Can they re-establish and rehabilitate our pure air, pure food, rivers, waterfalls, our language and culture, our sacred religious site Saran-Sasan Diri, our identity and our history? No, that is absolutely impossible. We indigenous communities believe that our history, language, culture, sacred religious sites like Saran Sasan Diri, our identity and history cannot ever be rehabilitated. Nor can it be ever compensated for.
We are not anti-development. We want development but not at our cost. We want development of our rivers and waterfalls. We want development of our forests, mountains, ecology and agriculture. We want development of social values, language and culture. We want development of our identity and our history. We want that every person should get equal education and healthy life. We want polluted rivers to be pollution free. We want wastelands to be turned green. We want that everyone should get pure air, water and food. This is our model of development.
The concept of Jharkhand that was being talked about in the past, was simply forgotten by our politicians in power. But the people’s struggles have given it a new dimension. In thirteen years, the way all the steps were taken to attract the companies, in the same way, strong and expanding people’s struggles have given a new perspective to the concept of Jharkhand. 
This perspective is to make livelihood as the basis of indigenous people’s culture.  This is to sculpt a new model of development which has a scientific thinking like the indigenous lifestyle and the technology should work in harmony and cooperation with nature. The thinking should not be just to take away from nature.  The greatest emphasis should be on selection and implementation of plans in tune with people’s thinking. There should be such technological development which makes the eternal value of coexistence dynamic. Our tribal dance forms, notes, tunes and harmony of our songs and all the sounds are evidence enough that we have a strong relationship with the idea of coexistence. Even now whenever there is any celebration of a hunt from the forest, the material is shared not just between humans but also between humans and animals. We want to see alive the fundamental spirit of this celebration in our economic system. In other words, we want to change the ways and means of the current economic model with a model of humane development.
We know that this challenge is not a small one. Just by our wishful thinking, this desire will not get fulfilled. That’s why we see the cultural movement as a socio-economic wave, as a global movement event. We strongly believe that the world of our dreams is not far off.
You have honored me with this prize which I dedicate to the struggling Adivasi tribal and indigenous farming communities whose part I am proud to be. Their affection and conviction has showed me the right path at every difficult turning. I want to reiterate that I will try to get their affection and faith more and more and join hands with the poor, exploited , the marginalized working masses of cities and villages in their democratic struggles and keep marching forward in unison with them.
My Johar (traditional greeting) to all the struggling comrades all over the world.
Dayamani Barla
Freelance Journalist/ Social Activist
(Adivasi Mulvasi Astitva Raksha Manch, Jharkhand)
New Garden Sirom Toil Club Road
Ranchi-843001. Jharkhand, India
Mob: +91 9431104386 & 8969825729