Tuesday, September 22, 2026

करम त्योहार को कई तरह से मना सकते हैं। मैंने करम त्योहार को अलग तरह से जीया हैं-इससे आप लोगों को साझा कर रही हुं।

 करम त्योहार को कई तरह से मना सकते हैं। मैंने करम त्योहार को अलग तरह से जीया हैं-इससे आप लोगों को साझा कर रही हुं। 

आदिवासी समाज आज कई तरह के सवालों के घेरे में स्वंय को खड़ा पा रहा है। हम कभी हम ही मना सकते हैं सरहूल तुम नहीं। तो कभी हम ही मना सकते हैं करम त्योहार तुम नहीं। हम असली आदिवासी-तुम नकली। यह मौसम करम त्योहार मनाने का है। हिन्दू धर्म की अस्था में सभी तरफ पुजा पंडालें सजने लगी है। भारत देश की संविधान सभी जाति-धर्म को अपना अस्था से किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता देता है। कमडारा अरहरा गांव आदिवासी भूईहरी ईलाका है। जो गुमला, पालकोट, बसिया, सिसई, सिसई से सटा क्षेत्र है। जो आदिवासी इतिहास में ढोंयसागढ क्षेत्र में था। यह ईलाका पालकोट राजा और जरिया राजा का प्रभाव क्षेत्र रहा है। जहां जमींदारों का बोल-बाला था। यही कारण है कि यहां सदरी भाषा /नागपुरी का जब्रजस्त प्रभाव रहा है।  मुंण्डा आदिवासी समाज कोई गांव राईज करम मनाते हैं, तो कोई गांव ढिढरा करम। करम के मौसम में गांव-गांव अखड़ा में करम की तैयारी में मांदर की आवाज से समूचा आदिवासी इलाका गुंज उठता था। दिनभर खेत में काम करने, गाय-बकरी चराने के बाद खाना खाने के बाद गांव के युवक मांदर लेकर अखडा पहुंचते थे। बस एक मांदर की आवास, देखते-देखते सभी टोला-महला से युवक मांदर के साथ अखडा में हाजिर। अब मांदर की गुंज सभी को अखडा में खिंच लाता।

याद है करम नाच के हर स्टेप के अपना गीत और लय होता है।  मांदर के हर थाप का अपना ताल, होता है। मांदर के हर थाप के साथ गीत के राग-लय अलग-अलग होता है। मांदर के ताल के साथ नाच रही महिलाओं के गीत लय में पूरा गांव सराबोर रहता है। सभी गीत व्यक्ति, समाज के साथ पूरी आदिवासी सामुदायिक जीवन शैली को संबोधन करता है। जो एक व्यक्ति को दूसरे जोड़ता है। गीत का हर शब्द -हर बोल और लय एक समाज को दूसरे से जोडता है। आदमी को पूरे प्रकृति और पर्यावरण से जोडता है। कोई उंच-नीच नहीं। सभी गीत अपने इतिहास, घटनाओं और प्रकृतिक जीवन मूल्यों को अभिव्यक्त करता है। जो आदिवासी समुदाय के जंगल-झाड़ी को साफ करने, गांव बसाने के साथ जंगल-जमीन पर अपना खूंटकटी हक का याद दिलाता है। 

करम गीतों में जीवंत आदिवासी जमीन शैली-

गुमला जिला के कमडारा प्रखंड के अरहरा गांव मुंडा आदिवासी बहुल गांव है। जो चटकपुर, करंजटोली, भादुल टोली, ठिकेदार टोली और बजार टोली और बड़का टोली इन 6 टोलों में फैला हुआ है। बडका टोली और करंज टोली के बीच से रांची-राउरकेला रेलवे लाईन गुजरती है। करम अखड़ा बडका टोली में है। मेरा जन्म बड़का टोली में हुआ। अरहरा गांव में पहले जमींनदारों का बोल-बाला था। उनके नाते-रिस्तेदारों में चीक-बडाईक परिवार को माना जाता था। इसी में चैकीदार और ओहदार भी होते थे। 

बाजार टोली में घांसी-बजनिया परिवार रहता था। यहीं एक लोहरा परिवार भी थां। दो-तीन परिवार झोरा -नाविक थे। बड़का टोली में एक परिवार हरियर का था। जिसके साथ गांव के सदान और मुंण्डा परिवार छुआछूत मानते थे। मुंण्डा आदिवासी समुदाय का करम अखड़ा से सटा हुआ उत्तर दिशा में हिरयर बुढा का घर था। अखडा से सटा पश्चिम दिशा में मोहन चीक बड़ाईक का घर था। अखडा से सटा -पश्चिम-दक्षिण कोणा में मेरा परिवार-बोयसा और जुरा बरला का घर। अखडा से सटा ठीक दक्षिण में लादूरा का घर। 

इन सभी परिवार का आंगन करम अखडा ही था। अखडा के किनारे एक हरियर बुढा के आंगन की सीमा पर बड़ा सा ईमली पेड़ अभी भी है। अखडा के पूरब-दक्षिण में डुगरू पाहन का घर सीमा पर दूसरा ब़डा ईमली पेड। दोनों पेड के नीचे एक-एक बड़ा पत्थर का बिछा बेंच था। जहां सभी आकर बैठते थे। करम के मौसम में पूरा अखडा बच्चे, युवक-युवातियो, महिला-पुरूष, बुढे-बुढियों से भरा होता। रात भर मांदर की गुज और गीत से पूरा गांव गुंज उठता था। 

मुझे याद है- मांदर बजाते आबा  गीत गाया करते थै-

1-बोने के बोने में 

झालि मिंजुरा...रे

 बोने के बोने में..2

झालि मिंजूरा रे 

बोने में झालिया मिंजूर रे 

सोभाय रे...

बोने में झालिया मिंजुर सोभाय....2

(जंगल-जंगल में मोरपंख फैलाया मोर पंक्षी

ज्ंागल मोर पक्षी से ही सोभायमान है )


मां हमेशा गुनगुनाती थी-करम गीत। निश्चित रूप आज मैं महसूस करती हुं मां मेरे लिए ही गाती थी। गांव के सीमा पर कारो नदी जब बरसात में भर जाता था-नदी पार करने के लिए झोरा -नाविक अपने नाव पर लोगों को पार करते थे। 

1-एके गोटन बेटी

कोईल पारे दियालों

गुनी...गुनी......

को0 -गुनी...गुनी निंदों नहीं आवाय...

हायरे दाईया.....गुनी गुनी निदों नहीं आवाय..

2-हारे पार काइर देरे रे 

झोरा रे भाईया ... गुनी...गुनी

गुनी  2

गुनी-बुझी निंदो नहीं आवै


2-हारे पार काईर देरे 

झोरा रे भाईया

डाली टाका -डाली टाका 

फिराईयो देबुं हारे दाईया...2

(सार है-एक ही मेरी प्यारी बेटी है। उसको कोईल नदी के उस पार शादी दिये हैं। बरसात में नदी भर गया है। बेटी का याद दिन-रात सता रहा है। हे नाविक भाई आप नदी पार कर दीजिए, आप को पार करने का कीमत चुका देगें)


करम मौसम मे दोपर को गाय-बकरी  चराने वाले और खेत में काम करने वाले युवक खाने के लिए घर लाने के बाद युवक मांदर बजा कर अपनी थकान मिटाते, मनोरंजन करते थे। मांदर की आवाज सुन सभी जान जाते थे कि फलाना आ गया है। ंहमेशा गीत सुनती थी-

1-मांदर जे किनाले लालू भैया रे...

 जानी किनाले के लगी...रे 

जानी किनाले के लागी...

2-से मांदर फंुटी गेलैंय लालू भाईया रे

जानी मोराले के लागी...रे 

जानी मोराले के लागी

गांव का जमीन साहुकारों द्वारा छीन लेने के बाद बाबा लापा गांव में धांगर-नौकर हो गया। मां और मझिला भाई रांची चले आये। मां पंजाबी परिवार में दाई का काम करने लगी। भाई रांची में कुली का काम करने लगा। मैं भी 8वी पास कर रांची आ गयी। संत मारग्र्रेट हाई स्कूल में नाम लिखायी। 10वी क्लास मेे छात्रवृति मिला था। बिजय दादा गांव में अकेले था। छात्रवृति के पैसा से मैंने दादा के लिए गुमला मांदर खरीद दी थी। वह उसे बजाया करता था। जब भी मैं गांव आती थी तो मांदर को खुद भी बजाती और बादा को भी बजवाती थी। 

सभी गांवों में अखडा ईमली पेड के पास ही होता था। अरहरा में अखडा के किनारे दो बडा-बडा ईमली का पुराना पेडं अभी भी है। करम मौसम में अकसर ही बारिश होता है । बारिश भी रिझवारों को रोक नहीं पाता है। मांदर की गुंज के साथ गीत .लोग झूमने लगते

1-..रिमिझिमि  तेतारी छाईयां....

ना हारे धिरे चालू ...

रासे चलो मदोना....ना हारे धिरे चालु

रासे चलु....

सार - रिमझिम बारिश हो रहा है...ईमली गाछ के नीचे अखडा में अस्तिे-झुमते हम नाचें।

 बहन-भाई का अटुट प्यार करम गीत में-

गोडे का झोटिया

गिर पार...लक 

दादा हेरालों-2

हाय-हाय खोईज लाइन दे दादा

बिझ-लाइन दे दादा हेरालों-2

सार-मेरा पैर का छुटिया-बिझिया कहीं गिर गया है, खो गया है। दादा-बडा भाई आप खोज कर ला दीजिए, मेरा बिझिया कहीं गिर गया हे। 

गांव के धान के खेतों में पहले खखडा और मच्छली बहुत होते थे। बारिश अच्छी होती थी। खेतों और नाला -डोफा में साफ पानी बहते रहता था। पानी में छोटी मच्छलियां झांड में इधर-उधर तैरते खेलते रहती थी। इससे करम गीत में गाते हैं--

1-बुदु रे बुदु मझाइर

बुदु मछाइर समधिन 

जेराय रे

बुदु मछाईर समधिन जोराय

--

ब्रसात दिनों में गांव में बहुत तरह का साग-पात स्वतः खेतों में उग आता है। कुछ गोडा-मडुआ खेत में लगाया जाता है-जो गांव के लोगों के लिए पौष्टिक आहार है-इसे भी करम गीत में गाते हैं-

साग तियन लुटुर पुटुर

बरी तियन छोरे छोरे रे

बरी तियन छोरे छोर

--

आदिवासी गांव जंगल-पहाडो की तराई में बसा हुआ है। इस प्रकृतिकमूलक जीवनशैली का अंग साथ रचंे-बसे सभी समुदाय हैं। जिनका रिस्ता करम गीत में भी गाते हैं-

1-कोईलो किनारे बसाले हो राजा

कोईलों किनारे बसाले हो राजा

कोईलो निरामाला सोभाए रे

कोईलो निरामाला सोभाए-2

2-काठ केरा डोंगा

बंांस केरा डांग रे-2

झोरा भाईया रिझे 

डोंगा चलाऐ रे झोरा भाईया

रिझे डोगा चलाए-2


जब मेरी मां रांची शहर आ कर रोटी के लिए पंजाबी परिवार में आया का काम करती थी। उनके मलकिन ने एक पुराना लाइलुन साडी दी थी मां को। जो एक-दो जगह थोडा फटा हुआ था।  मैं पहली बार करम के दिन उसी साडी को पहन कर अखडा में अपने साथियों के साथ करम नाची थी। साडी बार बार फिसल रहा था और पैर फंस जा रहा था। मन में खुशी था कि मैं भी साडी पहनी हुं। 

रात भर करम नाचने के बाद सुबह गांव की सभी महिलाएं अपने अपने घर से कांसा लोटा में पानी, साल का ताजा दतुवन, साल पत्ता पर मोड कर भांप में पकाया धान की रोटी, साल पाता में सिंदुर और धवन लेकर अखडा मे ंआयी। मां रांची में थी। मा के बदले मुझे ही करम राजा के लिए उपरोक्त सारा चीज लायी। महिलाएं जैसे जैसे कर रही थी मैं सेवा की। 


ग्लाॅशोप मेमोरियल उच्च विद्यालय कमडारा से आठवीं क्लास पास करने के बाद मैं रांची आ गयी। कारण की घर में बहुत दिक्कत था। मां ने मेरा एकमिशन नौंवीं क्लास में संत माग्रटेस बालिका विद्यालय में करा दी। आॅक्टोबर का महिना था।  स्कूल में नमाही परीक्षा चल रहा था। जिस दिन मेरा परीक्षा खत्म हुआ, उसी दिन मेरा गांव अरहरा में करम त्योहार था। 

4 बजे स्कूल से निकलने के बाद मैं सुशील दादा से जिद करने लगी-चलो गांव करम के लिए। मेरे जिद के सामने दादा मजबूर थे। हम दोनों गांव जाने के लिए खजूर तालाब के पास आए। पता चला सिमडेगा की ओर जाने वाली अभी कोई गाडी नहीं है। फिर भी मैं जिद कर रही थी -जाएगें ही। रांची से राउरकेला रेलवे लाईन से पासिंजर ट्रेन और मालगाडी आती-जाती है। हम लोग राउरकेला पेसेंजर गाडी से हमेशा बकसपुर स्टेशन पर चढ़ कर हदिया आते थे। हटिया से रांची बस से  आते थे। मैं कभी बस रोड़ से यात्रा नहीं की थी। यह भी पता नहीं था कि कितना -कितना बजे बस गाडी तोरपा की ओर जाती है। 

थोडी देर में एक टेकर आयी ।हम दोनों गाडी पर चढ कर खूंटी पहूंचे। हम दोनों शायद नीचे चैक में उतरे। वहां से आगे जाने के लिए कोई गाडी नहीं था। हम दोनों पैदल थोडा दूर गये ।अंधकार हो चुका था। खूंटी की ओर से गाडी आने की रोशनी दिखाई दी। हम दोनों रूक कर इंतजार करने लगे। गाडी सामने पहूंची। वह बडां बंद गाडी था। लिखा था-डेंजर। हाथ दिये-गाडी रूकी।

 हम दोनों को पूछा कहां जाओगे। बताये पोकला जाएंगें। बोला आओ कहते गाडी का दरवाजा खोल दिया। गाडी पर चढे सामने डाईभर के पास। गाडी में दो पुरूष थे, एक गाडी चला रहा था और एक उसके पीछे लंबा सीट पर बैठा थां। पीछे बैठा था वह कम उम्र का था।

गाडी अहिस्ते अहिस्ते चल रहा था। करीब आधी रात को पकना पहुंचे होगें। गाडी रूक गयी। वो लोग बोले हम लोग खाना खा लेगें। दोनो उत्तर गये ।हम दोनों गाडी में बैठे रहे। करीब एक-डेढ घंण्टा के बाद एक आदमी आया और बोला आप दोनों को खाने के लिए बुला रहे हैं। हम दोनों नहीं गये। थोडी देर बाद दो प्लेट में रोटी और मीट एक लडका लेकर आया। हम दोनों तय कर लिए थे कि कुछ नहीं खाना है। 

प्लेट हम दोनों नहीं लिए। थोडी देर बाद दोनों वापस आये। गाडी चलना शुरू हो गया। दस-बादह मिनट के बाद गाडी चला रहा व्यक्ति उसका साथी को बोला, लो अब तुम गाडी चलाओ। पीछे बैठा लडका आगे गया और चलाने लगा। पहले जो चला रहा था वह पीछे आ कर बैठ गया। अब मेरे बगल आकर बैठ गया। हम दोनों को अभास हो गया था। दादा किनारे दरवाजा के पास बैठा था मैं बगल में थी। 

हम दोनों उन लोगों का मानसिकता को समझ गये। दादा बोला मुंण्डारी -अपना भाषा में। तुम इधर घसको दरवाजा के तरफ, मैं उधर घसक गयी। दादा मेरे तरफ आ गया। वा आदमी दादा से बोलने लगा-तुम अपनी बहन के मेरे हवाले कर दो, नही ंतो ठीक नहीं होगा। मेरे के नीचे दो-तीन लोहा का तलवार की तरह हथियार था दिखाते हुए बोलने लगा जब जरूरत होता है तो इसका इस्तमाल करते हैं। 

पीछे बैठा आदमी बोला-गाडी रोको, गाडी आगे नहीं जाएगी। गाडी रूक गया। दादो एक हाथ से गाडी का दरवाजा खोल कर मुझको गाडी से नीचे ढकेल दिया। मैं नीचे उतरते ही आगे की ओर भागने लगी। मेरे पीछे दादो भाग रहा था। पूरा अंधकार था। रास्ता भी अनजान था। हम दोनों थोडी दूर भागे ही थे कि गाडी स्र्टाट कर लाईट मारते हम दोनों के पीछे आने लगा। हम दोनों को पकड लेगा यह दिमाग में आते ही दादा बोला-चलो धान खेत में घुसो।

रोड के दहिनी ओर धान का खेत था। रोड से ही धान खेत में कुद गये। खेत रोड के किनारे ही था लेकिन बहुत नीचे था। जैसे ही धान खेत में मैं छलांग लगायी, मेरा सिर नीचे ओर पैर उपर मेंड के सहारे खडा हो गया। गाडी करीब आ रहा था। मन में डर था मेरा पैर को देख लेगा। मैं धान का पौधा का मजबूती के साथ पकडी और नीचे कादो माटी में पैर जमा कर पानी खेत में खडी हो गयी। मेरा पैर का चप्पल पैर से अलग हो चुका था धान खेत में। 

धान के पौधा मेरे सिर से उंचा था। खेत के नाला से बहता पानी का आवाज आ रहा था। धान खेत के अंदर अंदर बढते हुए खेत के दूसरी छोर मेंड पर पहुंचे। दादा ने अहिस्ता से आवाज दिया-किधर हो रे। मैं जवाब दी-इधर हुं। रोड से दो -तीन खेत आगे निकलने के बाद हम दोनों मिले। मेंड के सहारे कई खेतों को पार कर टांड में पहुंचे जो रोड से आधा कोस दूर होगा। टांड में पहंुंचते ही पूरब दिशा में चांद पूरी रोशनी के साथ आकाश में दिखाई दिया। चांद की रोशनी मे ंहम दोनों रोड़ से दूर अनुमान से पोकला गांव की ओर बढ़े। 

हम दोनों एक छोटा नाला के पास पहुंचे। नाला में पानी बह रहा था। नाला के उस पार उंचा ढलान था। ढलान चढ़ते समय बार बार फिसकर नीचे चली जाती थी। लाल गुडगुड पत्थरीला ढलान था। खाली पैर पर गुडगुड कंकड के घर्षण से थोड़ा लहर महसुस होने गया था। बहुत प्रयास के बाद एक कांसी का पौधा पक डपायी। इसके सहारे उपर चढ गयी। थोडा दूर चलने के बाद लगा अब हम दोनों पोकला सीमान पहुंच गए हैं। अब खतरा से बाहर महसूस करने लगे। रेलवे स्टेशन के पास पुराना बाजार टांड पहुंचे ही थे कि मुंर्गा के बांक की आवाज सुनाई दी। अब सुरक्षित गांव पहुंच सकते हैं। 

पेकला से रेलवे लाईन के किनारे के रास्ते सोनमेर होते हुए बदु गढहा पहंुचे। सोनमेर से ही मेरे गांव के करम अखड़ा के मांदर की आवाज सुनते ही गांव की तरफ कदम और तेजी से बढ़ने लगा। गांव सीमा पहुंचते ही दूसरा मुर्गा की बांग सुनाई दी। हम दोनों लाईन किनारे बड़ा जीतिया पेड़ होते हुए अरहरा दोहर पार कर पाहन सबका आम -कटहल धाईर के रास्ते गांव पहुंचे। अखड़ा रास्ता से ही घर पहुंचे कारण कि यही एक रास्ता है घर तक आने के लिए। 

अखड़ा मे ंहम दोनों नहीं रूके, सीधे घर चले गये। घर का बाहर दरवाजा बांस का पटरा का था। हम दोनों उसे हटा कर अंदर गये। विजय दादा को आवाज दिये वह सोया नहीं था। उठ कर ढिबरी जलाया। बिजय दादा-अभी इतना रात को कहां से आ रहे हो। हम दोनों रांची से इतना ही बोल पाये। तीनों भाई-बहन बैठे। थोड़ी देर में जोलेन दादा जो अखड़ा में था, वह भी घर आ गया। हम दोनों कुछ नहीं बताये। थोडी देर बाद सभी अखड़ा चले गये। सुबह मैंने करम का सेवा में मां की भूमिका पूरी की।  

जब ये घटना का सामना किये, तब पता नहीं था कि वो जगह कहां था। किस जगह -किस धान के खेत में छलागं लगा कर भागे थे। किस रास्ता से पोकला तक पहुंचे थे। बाद में जब भी उस रोड से गुजरते म नही मन उस जगह की पहचान करने की कोशिश करते। लेकिन वो टांड का पेड़ अच्छी तरह याद था। 2008 में जब अर्सोलर मित्तल कंपनी कमडारा-तोरपा क्षेत्र में कारखाना लगाने के लिए करीब 40 गांवों को हटा कर स्टील कारखाना लगाना चाहता था। इसके विरोध में मैं गांव वालों की अगुवाई कर आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच का गठन कर गांव-गांव लोंगों को जागरूक करने घूम रही थी। तब उस जगह को पूरी तरह पहचानी। वो जगह है-टुरूंडु गांव। रोड के बांयी ओर बड़ा से तालाब हैं जिसका पानी दाहिनी ओर खेतों में बहते हुए आगे नाला में मिल जाता है। वहीं आगे टांड में एक बड़ा से बढ का पेड है जो आज भी खड़ा है। हमेशा मै उसे निहारते आती जाती हॅु। कंरम त्योहार मेरे जिंदगी में एक बड़ा यादगार छोड़ के गया हैं। प्रत्येक वर्ष करम के मौसम में अपने बड़े भाई सुशील, बिजय, जोलेन, बाबा-जूरा और मा हिसिया की याद में भावुक हो जाती हूं। 

 हजारों लोक गीत हैं-जो हम सबको एक दूसरे से जोड़ता है, जो प्रकृति और पर्यावरण की गोद में बांधे रहने का सुखद अनुभुति प्रदान करता है। आज विकास के नाम पर हमारे खेत में, जंगल, जमीन में यही नहीं पूरी जीवनशैली में पूंजीवाद, वैश्वीकरण हावी हो गया हैं। जो हमें एक दूसरे से अलग कर रहा है, प्रकृति और पर्यावरण से अलग कर रहा है। परिणाम सामने है-हम अपने इतिहास और सामुदायिकता के जीवनशैजी के मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। हमारीे संगठित ताकत विखरते जा रही है। इससे आदिवासी समुदाय के साथ सभी को नुकसान हो रहा है। जगल-जमीन से हमें बेदखल किया जा रहा है। जंगल-पहाड उजाडे जा रहे हैं। सरना, अखड़ा, ससनदीरी, जाहेरस्थान, देशावली सभी विकास के नाम पर उजाड दिये जा रहें हैं। इसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। मै मानती हुं-जल-जंगल-जमीन की रक्षा हम करेगें, तभी हमरा गांव-समाज बचेगा, हमारा इतिहास-भाषा-सास्कृति और करम त्योहार, सरहूल त्योहार भी बचेगा। 


Thursday, August 13, 2026

लोकसभा में बुधवार को विपक्ष के जोरदार हंगामें के बीच खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक 2026 पारित कर दिया गया।

 नई दिल्ली/रांची, हिन्दुस्तान टीम एवं प्रभात खबर की रिपोर्ट

देश में खनियों और खनिज युक्त भूमि पर राज्य सरकारें अब अतिरिक्त कर, उपकर-संस या किसी भी तरह का अन्य शुल्क नहीं लगा सकेगी। लोकसभा में बुधवार को विपक्ष के जोरदार हंगामें के बीच खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक 2026 पारित कर दिया गया। इस विधेयक के जरिये केंन्द्र सरकार ने राज्यों की शुल्क लगाने की शक्तियों को समाप्त कर दिया है। इसका व्यापक असर झारखं डमें भी पडेगा। 

बुधवार को लोकसभा में विपक्षी दलों को हंगामा जारी रहने से दोपहर दो बजे एफसी आरए विधेयक संयूक्त संसदीय समिति को भेजने का प्रस्ताव पारित करने के बाद पीठासीन सभापति जगदंकबका पाल ने दोपहर 02.27 बजे सदन की कार्यवाही तीन बजे तक के लिए स्थागति कर दी। कार्यवाही दोबारा शुरू होने पर केंन्द्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी किशन रेडी ने विपक्षी सदस्यों के भारी विरोध के बीच विधेयक को चर्चा एवं पारित करने के लिए सदन के पटल पर रखा। आरएसपी के एनके प्रेमचंन्दन समेत कुछ अन्य विपक्षी  सांसदों ने इस विधेयक का विरोध किया। कहा कि यह संविधान और संघीय ढांचे के खिलाफ है। 

हालांकि सदन ने बिना चर्चा के ही इस विधेयक को ध्वानिमत से पारित कर दिया। विधेयक के पारित होने के बाद विपक्ष के भारी हंगामें के कारण लोकसभा की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थागित कर दी गई।

भूमि का विनियमन भी कंेद्र करेगा-जानकारी के अनुसार, खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक में न सिर्फ राज्यों की शुल्क लागू करने की शक्तियाु समाप्त की गई हैं, बल्कि इसके लागू होने के बाद निर्धारित मानकों के अनुसार खनिज संपदा से जुडी भूमि का विनियमन भी केंन्द्र सरकार के नियंत्रण में आ जाएगा। Bidheyak--थ्वधेयक में प्रावधान किया गया है कि 2026 के संशोधन अधिनियम के लागू होने से पहले एैसा कोई कर, उपकर या अन्य शुल्क, जो राज्य सरकार के पास जमा नहीं किया गया हो या जिसकी वसूली उसके द्वारा नहीं की गयी हो, उसे हर लिहाज से अवैध माना जायेगा। ुक्

विधेयक में कहा गया है, हांलाकि , ऐसे लागू होने से पहले खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर लगाया गया कोई कर, उपकार या अन्य शुल्क, जो पहले ही राज्य सरकार के पास जमा किया जा चुका है या उसके द्वारा वसुल किया जा चुका है, उसे वापस नहीं किया जायेगा। पर जिन्होनें सेस या कर जमा ही नहीं किया है तो उन्हें आगे भी जमा नहीं करना होगा। 

सरकार ने बिल को विकास से जोड़ा-जी किशन रेडी ने कहा कि संशोधन का उद्वेश्य खनिज क्षेत्र में वित्तीय व्यवस्था को स्थिर, स्पष्ट और अनुमान योग्य बनाना है। उनके मुताबिक इससे राष्ट्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावउ मिलेगा और आत्मनिर्भर भारत तथा 2027 तक विकसित भारत के लक्ष्य में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि खनिजों पर अलग-अलग क्षेत्रों में आमरन कर व्यवस्था सार्वजनिक हित को प्रभावित करती है। अधिक टैक्स और शुल्क  से स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने, बाजार के विकास में कमी आने और परिवहन लागत अढ़ने की स्थिति पैदा हो सकती है। केंन्द्रीय मंत्री ने कहा कि खनिजों पर असमान कर व्यवस्था से घरेलू आपुर्ति मंहगी हो सकती है और पर्प्याप्त स्थाीनय संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद खनिजों के आयात का जोखिम बढ़ सकता है। इसका असर आम नागरिक के जीवन-यापन की लागत पर पड़ सकता है। 

झारखंड पर यह पड़ेगा असर

आठ से 10 हजार करोड़ का राजस्व प्रभावित हो सकता है-1.36 लाख करोड़ बकाये की मांग पर भी पड्रेगा असर। खनिज संपदा के मामले में झारखंड देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में है। इसलिए विधेयक असर यहां दूसरे राज्यों की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। झारखंड ने 2024 में झारखंड मिनरल बियरिंग लैंण्ड सेसे कानून बनाया था। इयके तहत खनिज-युक्त भूमि, जिसमें कोयला-युक्त भूमि भी शामिल है, पर खनिज के प्रेषण के आधार पर उनकर की व्यवस्था की गयी है। इससे पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार को लगभग आठ हजार करोड़ रूपये केवल झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस से मिले थे। इस वर्ष सरकार ने जेएमबीएल सेस से करीब 10 हजरी करोड़ से अधिक राजस्व का अनुमान लगाया है। झारखंड लंबे समय से केंन्द्र सरकार से 1.36 लाख करोड, अब बढ़कर 1.41 लाख करोड की मांग करता है। इसमें एक लाख करोड की मांग का मुआवजा है। जिसमें 41,142 करोड़ बकाया और 60 हजार करोड़ व्याज है। इस अधिनियम से इस पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ ाकतर है। हालांकि इस विधेयक से ढारखंड की रोयल्टी पर कोई असर नहीं पडेगा। 


Wednesday, August 12, 2026

झारखंड में एसआईआर के तहत 43.61987 मतदाता सूची संे बाहर

झारखंड में एसआईआर के तहत 43.61987 मतदाता सूची संे बाहर

रांची-भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर विशेष गहन पुनरीक्षण-2026 के तहत बुधवार को मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशित किया गया। प्रारूप मतदाता सूची के अनुसार राज्य में कुल 2,21,01,249 मतदाता शामिल किए गए हैं। इनमें 1,12,06,755 पुरूष, 1,08,94,234 महिला तथा 260 थर्ड जेंडर मतदाता है। एसआईआर से पहले झारखं डमें मतदाताओं की कुल संक्ष्या 2,64,63,234 थी। प्रारूप सूची के प्रकाशन के बाद 43,61,987 मतदाता सूची से बाहर हो गए है। इन नामों को कारणों, जैसे मरण, स्थायी रूप से अन्य स्थान पर स्थानांतरण, एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होना था। निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं होने पर आधार पर हटाया गया है। 

इधर उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने सभी मतदाताओं से अपील की है कि वे मतदाता सूची में अपना नाम, पता और अन्य विवरण का मिलान अवश्य कर हें। यदि नाम छूट गया हो तो किसी प्रकार की त्रुुटि हो तो निर्धारित अवधि में दावा एवं आपति इर्ज करांएं। 

मतदाता अपॉनलाइन भी सूची में अपना नाम देख सकते हैं। इसके अलावा संबंधित मतदान केंन्द्र पर भी सूची उपलब्ध रहेगी। 

ड्राफट वोटर लिस्ट के मुख्य आंकडे

श्रेणी-------------मतदाताओं की संख्या

एसआईआर के पहले----2,64,63,236

प्रारूप सूची में--------2,21,01,249

पुरूष मतदाता--------1,12,06,755

म्हिला मतदाता--------1,08,94,236

थर्ड जेंडर-----------260

हटाए गए कुल नाम-----43,61,987


क्यों कटे 43,61

4 सितंबर तक दावा--आपति दर्ज कराएं

छावा ओर आपति-4 सितंबर 2026 तक

फॉम -6ः नया नाम जोड़ने या छूटे हुए पात्र मतदाता फॉम-6 के साथ घोषणा पत्र भरकर बीएलओं या ऑनलाइन अवजमतेण्मबपण्हवअण्पदध्म्ब्प्छमज।चच.....जमा कर सकते हैं। 

युवा मतदाताओं के लिए विशेष कैंपः 1 अक्टूबर 2026 को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं के लिए 8, 9, 22 और 23 अगस्त 2026 को विशेष अभियान चलाए जाएंगे। 

अंतिम प्रकाशनः सभी दावों और आपतियों के निस्तारण के बाद अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 7 अक्टूबर को होगा। 


यहां करें जांच-मतदाता अपने नाम की जांच ऑनलाइन भी कर सकते हैं। इसके लिए निम्न लिंक का उपयोग किया जा सकता है-ीजजचेरूध्ध्ेींतमण्हववहसमधर््गत्मश्रथ्मकदचदठ68इत3



क्यों कटे 43,61 लाख वोटरों के नाम

1,16,484 ऐसे विदेशी और अन्य अवैध मतदाता थे जिन्होंने गणना प्रपत्र पर हस्ताक्षर करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

7,63,903 मृत मतदाताओं के नाम हटाये गये।

15,92,194 मतदाता अपने स्थान से हमेशा के लिए स्थानांतरित हो चुके हैं।

24,50,810 मतदाता अपने पते पर नहीं मिले या अनुास्थित पाए गए।

4,38,596 मतदाता पहले से ही अन्य सूचियों में नामांकित थे। 


2,389 नए पोलिंग बूथ बने

मतदाताओ की सुविधा के लिए बूथों का युक्तिकरण किया गया है। किसी भी बूथ पर 1200 से अधिक मतदाता नहीं होगें और किसी मतदाता को 2 किमी से अधिक दूरी तय नहीं करनी पडेगी। राज्य के सभी 24 जिलों के 81 विधानसभा क्षेत्रों में 2,389 नए मतदान केंन्द्र बनाए गये हैं। इनमें से 1,248 वर्तमान स्थानों पर तथा 1,141 नए स्थानों पर बनाए गए हैं। 68 मतदान केंन्द्रों को मर्ज किया गया, जिसके बाद राज्य में कुल पोलिंग बूथों की संख्या 29,571 से बढ़कर 31,892 हो गई है। 


जामींदारी प्रथा ka उन्मुलन 1950 में हुआ, ं----आंज अडानी, अंबानी का नयी जमीनदारी शुरू

 जामींदारी प्रथा उन्मुलन 1950 में हुआ, ंआंज अडानी, अंबानी का नयी जमीनदारी शुरू

Ajadi  के बाद पहली बार 1950-1955 के बीच जमींदारी प्रथा  को समाप्त करने के लिए विधेयक लाये गए। और ये विधेयक अधिनियम बनकर लागू हो गये। जिनके परिणामस्वरूप जमीदारो प्रथा भारत में उन्मुलन हो गया और किसानों एवं राज्य के बीव पुनर सीधा संबंध स्थापित हो गया। भूमि अधिनियम कानून  बनने के बाद जमीन पर जोतने वाले का स्वामित्व हो गया। जमींदारों के खेत जोतकर उनके लिए पूंजि अर्जित करने वाले गरीब हलधर किसान जमींदारों के चंगुल से बाहर निकले गये।ं

अब ंअडानी, अमबानी की जमीनदारी प्रथा शुरू हो गयी है। जिसकी जागीरदारी का कमान मोदी सरकार संम्भाल रही है। लैंण्ड डिजिटालाईजेशन, वन नेशन वन लैंण्ड रिकाॅर्ड, स्मामित्व योजना, लेंण्ड बैंक इस प्रक्रिया का मूल हथियार है। 


jal, jangal , jameen bachane ki Ladai ka yah ek drisye hai, jo mittal company dawara Jameen-

 

Tuesday, August 11, 2026

50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूप्या मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

 19 जून 2017

ं 50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूप्या मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास ने राज्य के सामृद्व महिलाओं को लाभ पहुुचाने के लिए भू-राजस्व एवं निबंधन विभाग के माध्यम से 50 लाख कीमत की जमीन खरीदने पर 1 रूप्या में जमीन की रजिस्ट्री करने की व्यवस्था लायी। 

इस व्यवस्था के बाद हर साल 70 महिलाएं इसका लाभ उठाते रहीं। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं एक रूप्या में जमीन, मकान, प्लैट का रजिस्ट्रेशन करायी। 2 लाख से अधिक रजिस्ट्री की गयी। इससे राज्य को 1296 करोड़ राजस्व का नुकासान भी उठाना पड़ा। 

कोरोना काल में वर्तमान हेमंत सरकार ने इस व्यवस्था फिर से वापस लिया। तर्क दिया गया कि इस व्यवस्था के तहत गरीब महिलाएं लाभ नहीं ले पा रही हैं साथ ही राज्य का राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। इसी को देखते हुए राज्य की गठबंधन सरकार ने इस व्यवस्था को वापस लिया। 

5 सितंबर 2019 का तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने टवीट किया था-झारखंड देश का पहला राज्य है जहां महिलाओं के लिए 50 लाख रूपया तक की जमीन , मकान की रजिस्ट्री सिर्फ एक रूपये में होती है। अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा महिलाएं बन चुकी हैं मकान मालकिन। 

जानकारी के लिए-देश के बाकी राज्यों में भी महिलाओं को रजिस्ट्री में कुछ प्रतिशत की छूट मिलती है-उदाहरण के तौर में-दिल्ली में 4 प्रतिशत स्टाम्प डयूटी देनी पड़ती है। यूपी में महिलाओं द्वारा जमीन खरीदने पर सिर्फ एक (1) प्रतिशत ही स्टाम्प डयूटी में छूट दी गयी है। 

23 मार्च 2021 को राज्य सरकार ने महिलाओं को 1 रूप्या में जमीन रजिस्ट्री में छूट देने से राज्य सरकार को 400 करोड़ का नुकसान बताया। राज्य के पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पिछली सरकार ने महिला के नाम से जमीन रजिस्ट्री कराने कर छूट दी थी, इससे राज्य को करीब 400 करोड़़ रूप्ये राजस्व का नुकसान हुआ था। वह रजिस्ट्री शुल्क भी देने में सक्षम होता है। यह सिर्फ जमीन लूटने की षडयंत्र के तहत किया गया था। 

जो भी नये-नये व्यवस्था जमीन संबंधित लाये गाये पिछली रघुवर दास की सरकार के द्वारा उसका समीक्षा होनी चाहिए कि आदिवासी, मूलवासी, दलित और मेहनत मजदूरी करने वाला परिवार को कितना लाभ मिला?। इसकी सूची सरकार को जारी करना चाहिए, तभी सामाजिक न्याय की बात हो सकती है। 

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23 मार्च का प्रभात खबर में विधायक सरयू ने बयान दिया था कहा था-कि राज्य में कई स्थानों पर सरकारी जमीन पर लोग वर्षों से रहते आ रहे हैं, उनकों सरकार से सुविधाएं भी मिल रही है। ऐसे जमीन को नियमित करना चाहिए। इनके अनुसार जमशेदपुर में कई इलाके ऐसे हैं नियमित करने का कोई नियम बना लेना चाहिए, इससे सरकार को बड़ी संख्या में राजस्व मिलेगा। 

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2014 से 2019 के बीच राज्य की कल्याणकारी सरकार आखिर अमिरों को ही क्यों सस्ते दर में जमीन दी?

बाबा रामदेव को रघुवर सरकार ने 101 रूपये की टोकन मनी पर 15 एकड़ जमीन नमकोम प्रखंड के बरगांवा में दिया है। यह कहा गया कि यहां स्कूल खुलेगा, जहां गरीबों के बच्चे पढ़ेंगे। लेकिन सचाई को क्या है, यह जांचने की जरूरत है। 

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Friday, August 7, 2026