Friday, October 2, 2026

इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स लिमिटेड प्लांट के विस्थापितों और रैयतों को मुआवजा और नौकरी दिलाने के लिए मासास से पूर्व विधायक अरूप चटर्जी के नेतृत्व में 2014 में बडा आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन के समर्थन में मैं भी शामिल हुई थी।

 बोकारो जिला के चंदनकिसारी (सियालजोरी) में स्थित

इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स लिमिटेड प्लांट के विस्थापितों और रैयतों को मुआवजा और नौकरी दिलाने के लिए मासास से पूर्व विधायक अरूप चटर्जी के नेतृत्व में 2014 में बडा आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन के समर्थन में मैं भी शामिल हुई थी। 

धरना कार्यक्रम के दौरान स्टील प्लांट को भगाबांध गांव के रैयतों जमीन देने से इंकार कर दिया था। गांव वाले जमीन अधिग्रहण का जोरदार विरोध किया। परिणाम यह हुआ कि कंपनी ने गांव के चारों ओर का जमीन अधिग्रहण कर स्टील प्लांट खडा किया। बीच में गांव को छोड दिया गया। चारों ओर प्लांट का चालू हालात में। गांव वाले अपने गाय, बैल के साथ । इसे देखने समझने के लिए विस्थापित साथियों के साथ प्लांट के अंदर गांव गये थे। इस पर स्टील प्लांट के मालिक ने मेरे साथ 22 लोगों के उपर प्लांट में तोड फोड का केस दर्ज किया था। बोकारो कोर्ट मे कई साल तक केस चला था। 

Xtell Plant ke bhitar Bhagabandh Village


Plant ke main Gate per Dharna  

Lameen Malik, Displaced 


Plant ke Undar Bhagabandh Gaon



डायरी-21 जून 2001, रांची स्थित एचपीडीसी में राज्य के कई हिस्सों के जनआंदोलनों में संघर्षरत साथियों की जुबानी, जो आज इतिहास बन गया है।

 जनअधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष का सफर अभी जारी है...

डायरी-21 जून 2001, रांची स्थित एचपीडीसी में राज्य के कई हिस्सों के जनआंदोलनों में संघर्षरत साथियों की जुबानी, जो आज इतिहास बन गया है।

आजादी के बाद 60 वर्षों में करीब 60 लाख झारखंडी अपने जंगल-जमीन और विरासत से विस्थापित हो चुके है। झारखंड अलग राज्य की लड़लाई में हमलोगों ने नारा दिया था-कैसे लोगे झारखंड-लड़के लेगें झारखंड। अब नारा दे रहे हैं-कैसे लिया झारखंड-लड़के लिया झारखंड। जेकिन आज भी झारखंडी आदिवासी-मूलवासी, किसान, कहीं बड़े परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन के खिलाफ लड़ रहे हैं, तो कहीं, फील्ड फायरिंग रेंज के खिलाफ, तो कहीं उत्खनन -खदान के खिलाफ, तो कहीं शरही इलाके में झुगी-झोपड़ी उजाड़ने के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। 

राज्य में अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पूंजीवाद तथा नवसाम्रज्यवाद अपना पांव फैलाना शुरू कर दिया है। शहरीकरण, सुंदरीकरण, रोड़ चौड़ीकरण के लिए शहरी क्षेत्र के गरीबो की लाखों झोपडियां और दुकाने उजाड़ना शुरू कर दिया है। 

अलग राज्य बनने के पहले कोयलकरो परियाजना बनाने का जिम्मा एनएसपीसी को दिया गया था। कोइलकारो जनसंगठन 256 गांवों की र्ढाइ लाख आबादी, 55 हजार एकड़ खेती की जमीन, 27 हजार एकड़ जंगल के साथ अपना भाषा-सांस्कृति, पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहा था। 

राज्य बनने के बाद अब परियोजना का निर्माण के लिए एनएचपीसी को हटाकर एनरोन तथा फ्रांस की एक बड़ी कंपनी को जिम्मा दे रहा हैं अब हमारी लड़ाई सरकार से नहीं है, लड़ाई अब बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ होगी। 

जगत जी कुटकू डैम से होने वाल विस्थापन के खिलाफ चल रहे आंदोलन का सक्रिय लीडर है। आंदोलन पर चर्चा करते बताया-1984 में एक माह तीन दिन तक बांध को रोकने के लिए स्थानीय किसानों ने धरना दिया। जिस किसान का एक लाख की संपत्ति चली गयी-उसको मुआवजा के तौर पर केवल 15 हजार रूपया मिला। 1995 में फिर से धरना दिये । पहला फेज में 17 गांव डुब चुका है, अभी और 32 गांव डुबने वाला है। 1966-67 में सर्वे हुआ था, उस समय 600 घर था प्रभावित, इसमें 222 परिवार को नौकरी दिया। बाकी को कुछ नहीं मिला। बहुतों को रहने के लिए घर भी नहीं मिला। 

1992 से कुटकु डैम क्षेत्र में स्थानीय समुदाय ने विस्थापन रोकने के लिए संघर्ष समिति बना कर लड़ रहे हैं। जगत सिंह ने बताया-अभी भी संघर्ष जारी है। यहां के विस्थापित कुछ लोग छत्तीसगढ जा कर बसने लगे। जब बिहार था -तब विस्थापितों को वहां रहने दिया। छत्तीसगढ, झारखंड और उत्तरांचल ये तीनों राज्यों को पूर्नगठन 2000 में हुआ। छत्तीसगट नया राज्य बनने के बाद कुटकु डैम विस्थापितों को वहां से हटाया गया। घर बना कर रहने के लिए भी जमीन नहीं दिया जा रहा है।

 दामोदर घाटी-इस इलाके में पिपरवार कोयला खदान से बहुत अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। जिसके पास 2 एकड़ से कम जमीन था-उसको मुआवजा के नाप पर केवल 7 सौ दर पर मिला। इस इलाके में महुआ पेड की अधिकता थी जिससे काट दिया गया। हर साल प्रत्येक पेड करीब 3000 रू तक का पैदवार देता था। अब सब समाप्त हो गया। 

रजरप्प क्षेत्र-लोगों ने बताया 6 गांव पूरी तरह विस्थापित, 4 गांव आंशिक। 40 परिवार मछुवारों अधिक दिक्कत हो रहा है। विस्थापितों में से करीब 450 लोग छाई लोडिंग का काम कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि, खदान होगा तो नौकरी मिलेगा, लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल जाती है। 

उरीमरी कोलयारी, हेंन्देगीरी कोलयारी, गोविन्दपुर कोयलारी, बोकारो थार्मल पावर, गामिया, तेनुघाट डैम इन सभी परियोजनाओं से बडी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं। बोकारी जिला और हजारीबाग जिला में विस्थापितों की फौज खडी हो गयी। जो भूमिहीन हो गये हैं। रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। बोकारो की सामाजिक कार्यकर्ता तारा क्रांति कहती है-इलाके में पीने का पानी नहीं मिलता है। महिलाएं दो किलोमीटर तक पानी लाने जाती हैं। लडकियां 6-7 क्लास तक ही पढ़ पाती हैं गरीबी के कारण। महिलाओं की बडी आबादी महानगरों में पलायन कर रही है जहां उनका शरीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण होता है। 

गोला, पेटरवार इलाके में विस्थापन की लड़ाई नहीं लड़ी गयी। विस्थापित जमीन से उजड़ने के बाद जंगलों में जा कर बसने लगे। रोजगार के लिए केंउदु पता लोड कर जिंदगी बसर करने लगे, लेकिन वन विभाग ने उन लोगों पर केस ठोक दिया। 

पश्चिम सिंहभूम में 1980 में ईचा खरखाई डैम बनाने की योजना लायी गयी।  क्षेत्र के आदिवासी-मूलवासी किसान संगठित होकर विस्थापन के खिलाफ संघर्ष करना शुरू कर दिये। संगठन के नेता गंगाराम कलौंडिया की हत्या 1982 में कर दी गईं 

पोटका के सिद्वेश्वर सरकार और कुमार चंन्द्रमार्डी कहते हैं-जादूगोड़ा के यूसिएल खदान क्षेत्र में रह रहे लोग तावा में डाले गए मच्छली की तरह हैं। विस्थापितों को वहां नौकरी तो दिया जहां यूरेनियम रेडियेसन से हर तरह की बीमारी से लोग अंसमय काल के गाल में समा रहे हैं। बच्चे अपंग पैदा हो रहे हैं। महिलाएं बांझ की शिकार बनते जा रही है। 

कुमारी संजय-अपने जंगल-जमीन से लोग उजड जाने के बाद शहरों में आकर झुगी-झोपडियों में रहकर रोजी-रोटी कमाने लगते हैं। रांची शहरी ़क्षेत्र में बहुत बड़ी आबादी झुगी-झोपडियों में रहती है। 1994 में झुगी-झोपडियों में रहने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए झुगी-झोपडी संघर्ष मोर्चा बनाया गया। आरएमसीएच क्षेत्र में 35 वर्षो से लोग रह रहे थे। राज्य बनने के बाद इन्हें हटा दिया गया। झुगी-झोपडियों से विस्थापित आबादी कहां चली गई किसी को नहीं पता। रांची रेलवे स्टेशन के आस-पास 8 बस्तियां हैं। गांव से आकर लोग झुगी-झोपडियों में बस गये हैं। राज्य बनने के बाद इन्हें भी हटाने की योजना बनायी गई है। 

पुष्पा-कुटकू डैम विस्थापित

पुराना आंकड़ा के अनुसार 633 परिवार विस्थापित हुए। कुटकू भरना नदी त टपर कुरा, चापिया और पोलपोल गांव था। विस्थापितों के पास रोजगार का साधन अब बीडी पता ही रह गया है। सभी लोग बीडी पता तोडते हैं जो पैसा मिलता है उसी से गुजारा करते हैं। इन साल तो बीडी पता भी नहीं तोड़ पाये। जहां से बीडी पता तोडते थे उस क्षेत्र को सरकार टाईगर प्रोजेक्ट घोषित कर दिया है। हम लोगों को बता भी नहीं चला कि कब टाईगर प्रोजेक्ट घोषित किया गया। हम लोगों तब पता चला-जब बीडी पता तोड़ने आये, तो वन विभाग जंगल में घुसने नहीं दिया। 

विस्थापित परिवार-सामुएल कुजूर, गाब्रिएल कुजूर, मरियानुस कुजूर, अंतु किसान, पसकल खाखा सपरिवार छत्तीसगढ के महाराजगंज में जा कर बसे हैं। एगनेशिया कुजूर कहती है-मेरा परिवार छत्तीसगढ के विजयनगर में बसा है अब यहां भी कनहर डैम से विस्थापित होने वाला है। समझ में नहीं आता-अब हम लोग कहां जाएंगें। 

नोट-विकास के नाम पर राज्य बनने तक 60 लाख से ज्यादा आदिवासी-मूलवासी आबादी अपने जल-जंगल-जमीन से उजड़ चुकी है। राज्य बनने के बाद विस्थापन का दूसरा दौर शुरू हुआ। इस पीडा के शिकार विस्थापितों दर्द है यह। जिससे मैंने अपनी नोट बुक में 2001 में दर्ज की हुं। 

Sunday, September 27, 2026

मुझे एक डायरी मिला-----5 , 6, 7 October 2001

 जिंदगी की डायरी

मुझे एक डायरी मिला-

5 अक्टोबर 2001-

1 फरवरी 2001 को खूंटी जिलो के तपकारा ओपी क्षेत्र में कोइलकारो जनसंगठन ने डेरांग के पास नो-इंट्री गेट लगया था, ताकि कोई भी सरकारी आमदी परियोजना क्षेत्र में आ नहीं सके। इस नो-इ्रट्री गेट को रनिया पुलिस थाना और तपकारा ओपी के पुलिस लोहाजिमी जंगल की ओर गये थे। जाते समय गेट के किनारे से गाडी पार किया। वापसी के समय गेट को तोड़ कर पुलिस वाले अपने गाडी पर लाद कर ले जाने लगे। 

ठसी समय गुटुहाते का अमृत गुडिया डेरांग की ओर से आ रहा था, पुलिस वालों को पूछा-आप लोग क्यों गेट को तोड कर ले जा रहे हैं? लेने से मना करने पर पुलिस वालों ने उससे बंदुक के कुंदे से पीट कर घायल कर दिया। और गेट को अपने साथ तपकारा ओपो लेकर गये। 

यह खबर आग की तरह फैल गयी पूरे कोइल-कारो जनसंगठन के आंदोलन इलाके में। रात को जनसंगठन की बैठक हुई। निर्णय लिया गया-कल 2 फरवारी को तपकारा ओपी का घेराव करेगें। दूसरे दिन 11 बजे से चारों ओर से जनसंगठन के लोग तपकारा ओपी पहुंचें। जनसंगठन ने इस दौरान अपनी मांग रखी-

3-4 हजार लोग जमा थे। धेराव कार्यक्रम शांतिपूर्ण चल रहा थां। लोग मांग कर रहे थे-डीएसपी आए और हमारो मांगों को सुने। साथ ही लिखित मांग पत्र उन्हें सौंपना चाहते थे। 

छो-ढाई बजे तक लोग इंतजार करते रहे। इसी बीच तोरपा के तत्कालीन विधायक श्री कोचे मुंण्डा जी वहां आये। ओपी में गये। लोगों की उम्मीद जगी कि अब हमारी मांग सुनी जाएगी। थोडी देर बाद विधायक जी अंदर से बाहर आये । क्या बात हुआ-लोगों में जिज्ञसा बढी, लेकिन कोई सकारात्मक बात नहीं बनी। 

इसके 10-15 मिनट बाद ओपी की ओर से गोली चलने लगी। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है। वहां जवान से लेकर बुजुर्ग महिला-पुरूष हर उम्र के मौजूद थे। 

चारो तरफ अफरा-तफरा मची। जो भागने सका, वो भागा। पुलिस की गोली से आठ लोग मरे। करीब 25 लोग घायल हुए। देखते ही देखते ओपी के अगल-बगल खून से लाल हो गया। इस गोली कांड को लेकर सामाजिक संगठन इंसाफ ने तय किया जनसुवाई कार्यक्रम करने का। क्योंकि पुलिस का दबाव जनसंगठन पर बढ़ रहा था। लोगों की गिरफतारी के लिए।

इस गोली कांड में जनसंगठन के आठ साथि शहीद हुए। 25 घायल हुए-इस घटनो को लेकर कोइल-कारो जनसंगठन ने पुलिस पर केस किया। दूसरी तरफ पुलिस ने जनसंगठन के 13 साथियों को नमजद आरोपी बनाते हुए केस दर्ज किया। इस घटना का सचाई को सामने लाने और जनसंगठन का साथ देने के लिए इंसाफ ने जनसुनाई करने की योजना बनायी।

5 अक्टोबर 2001 को दिल्ली में एक बैठक बुलायी गयी थी। बैठक में सायलजी ने फोन पर जस्टिस साचर जी से बात की -नोवेबर 1-4 की बीच समय तय करने के लिए। बोम्बे इंसाफ के राजन सिंह से भी फोन पर समय तय करने के लिए बात किये। राजन ने कहा-ठीक है दिल्ली आकर जस्टिस साचर से फाइनल कर लेगें। 

जम्हार गांव से रंथु जी फोन कर बताये-गांव के समस्याओं को लेकर महिला समिति 19 अक्टोबर को कर्रा प्रखंड कार्यालय का घेराव करेगी, कार्यक्रम तय करने के लिए जयश्री 9-10 अक्टेबर को आप के पास रांची आएगी। 

7 अक्टेबर को मसीह दास गुडिय सदर कंन्डुना और विजय गुडिया को फोन कर जनसुनवाई की जानकारी दिये। इसके लिए रांची में 21 अक्टोबर को बैठक भी तय किया गया।

आज दक्षिण अफरिका यात्रा की डायरी निकाली। यात्रा के दौरान स्वेटो, जाहनसवर्ग, दक्षिण अफ्रिका में मिले -स्थानीय समुदाय-काले लोगों पर-चित्रण किये। एक रिपोर्ट तैयार की । अश्वेतों या काले लोगों की जनसंख्या कितनी है। विभिन्न टाउनशीप में रहने वाले 85 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी जी रहे हैं। 20 प्रतिशत घरों में ही बिजली था। यहां बिजली का नीजिकरण हो चुका था। प्रीपेड बिजली के बारे यहीं समझने का मौका मिला था। 

वहां काले लोगों का आंदोलन को समझने का मौका मिला। 1994 के बाद की स्थिति -काले लोगों की क्या थी है? प्रशासन की क्या भूमिका है-आम जनता के प्रति, जनता की क्या आशांए थी। द0 अफ्रीका का 87 प्रतिशत ़क्षेत्र श्वेतों के लिए सुरक्षित रखा गया। लगभग 13 प्रतिशत अश्वेतों के लिए। इस तरह देश के 10-13 प्रतिशत भाग में ही देश की 80 प्रतिशत अश्वेतों की आबादी रहती है। अश्वेतों को बाण्टूस्तान के घने और बंजर इलाकों में ही रहने का अधिकार दिया गया था।

21 अक्टोबर को रांची स्थित विकास मैत्री में जनसुवाई को लेकर बैठक हुई थी। मच पर श्री याकूब कांन्डुलना-बंडआ जयपुर, श्री इमानुएल डहंगा-बंडआ जयपुर, श्री सोमा गुडिया-कालेट थे। 

 जनसुनवाई में जजमेंट टीम में -सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस साचर जी,  सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता श्री संजय पारिख जी, अधिवक्ता सुश्री सुधा भरद्वाज, पीयूसीएल के श्री चितरंजन सिंह, और डॉ0 विनोद रैयना होगें इसकी जानकारी साझा की गयी। बैठक के दौरान जनसुनवाई क्यों जरूरी है इस पर रांची के अधिवक्ता श्री रश्मि कत्यायन जी ने कहा-एक इनक्वारी होता है आवाज को बंद करना,  दूसरा होता है आवाज को हमेशा उठाते रहना। जनता का आवाज को आवाज देने के लिए यह सुनवाई होगा। 

बैठक में जनसुनवाई के मुख्य ंिबन्दुओं का निर्धारित किया गया-1-कोयलकारो परियोजना पर 3-


2-कानूनी पक्ष परियोजना पर

3-सास्कृतिक पक्ष

4-स्वाशासन-पड़हा, पंचायत

5-झारखंड में कोयलकारो परियोजना जरूरी है क्या?

6-कोयलकारो परियोजना पर स्थानिय लोगों का क्या राय है?

7-ग्रामीणों को इससे क्या लाभ होगा

8-नया राज्य बनने के बाद पुलिस फायरिंग क्यों?

सुनवाई की तैसारी के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला का कॉपी निकालना है

2-रांची एक्सआईसेस से परियोजना से संबंधित कॉपी निकालना है-परियोजना पर पहला अध्यायन किया था।

3-मुख्य सचिव से मिलना है

4-सुधीर प्रसाद को बांध बनाने की जिम्मेवारी दी गई थी-उनसे बात करना

5- ग्रामीण एसपी से मिलना

6-रिपोर्ट-हिंन्दी और अंग्रेजी में बनाना

यह मैंने अपनी नोट बुक जो 2001 में लिखि थी, उसका रिपोर्ट है।

1995 से मैं सामाजिक काम में हुं। मेरी आदत थी प्रत्येक दिन का डायरी लिखना। आज मेंरे पास हजारों नोट बुक है। मैने अपना नोटबुक या डायरी कभी नहीं बेची या हटायी।

आज सुबह मेरा हाथ एक छोटा नोट बुक पर पडा। खोली -4-5 पेज पलटी। मन किया आप लोगों से साझा करने का। नोट बुक में नोट की गयी मुददे को गहराई से आज के संदर्भ में सोचने लगी, तो लगने लगा झारखंड राज्य बने 26 साल हो गये। लेकिन आदिवासी-मूवलवासी या मूल झारखंडी अब भी विस्थापन, जंगल, जमीन का लूट, बेरोजगारी, हर स्तर पर शोषण दमन का शिकार हो रहे हैं। फिर भी उम्मीद के साथ संघर्षरत हैं। 


Saturday, September 26, 2026

मोदी की चिंता अपने प्रिय मित्र अडानी अंबानी का केवल है


 केंद्र की मोदी सरकार इस देश की सारी संपत्तियों को अपने प्रिय मित्र अडानी और अंबानी जैसे अरबपतियों के हाथ में सौंप दिए.
 

भाजपा की सरकार चाहे वो राज्य में रही हो या केंन्द्र मे ंहमेशा अमीरों की चिंता करते रही है। झारखंड में 2014 से 2019 तक बीजेपी की सरकार थी। मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास थे । तब राज्य की महिलाओं को जो 50 लाख कीमत तक का जमीन खरीदी, जमीन का रजिस्ट्री मात्र एक रूपया कर दिया।

 भाजपा की सरकार चाहे वो राज्य में रही हो या केंन्द्र मे ंहमेशा अमीरों की चिंता करते रही है। झारखंड में 2014 से 2019 तक बीजेपी की सरकार थी। मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास थे । तब राज्य की महिलाओं को जो 50 लाख कीमत तक का जमीन खरीदी, जमीन का रजिस्ट्री मात्र एक रूपया कर दिया। 

ं 50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूपया मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास ने राज्य के सामृद्व महिलाओं को लाभ पहुुचाने के लिए भू-राजस्व एवं निबंधन विभाग के माध्यम से 50 लाख कीमत की जमीन खरीदने पर 1 रूप्या में जमीन की रजिस्ट्री करने की व्यवस्था लायी। 

इस व्यवस्था के बाद हर साल 70 महिलाएं इसका लाभ उठाते रहीं। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं एक रूप्या में जमीन, मकान, प्लैट का रजिस्ट्रेशन करायी। 2 लाख से अधिक रजिस्ट्री की गयी। इससे राज्य को 1296 करोड़ राजस्व का नुकासान भी उठाना पड़ा। 

कोरोना काल में वर्तमान हेमंत सरकार ने इस व्यवस्था फिर से वापस लिया। तर्क दिया गया कि इस व्यवस्था के तहत गरीब महिलाएं लाभ नहीं ले पा रही हैं साथ ही राज्य का राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। इसी को देखते हुए राज्य की गठबंधन सरकार ने इस व्यवस्था को वापस लिया। 

5 सितंबर 2019 का तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने टवीट किया था-झारखंड देश का पहला राज्य है जहां महिलाओं के लिए 50 लाख रूपया तक की जमीन , मकान की रजिस्ट्री सिर्फ एक रूपये में होती है। अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा महिलाएं बन चुकी हैं मकान मालकिन। 

जानकारी के लिए-देश के बाकी राज्यों में भी महिलाओं को रजिस्ट्री में कुछ प्रतिशत की छूट मिलती है-उदाहरण के तौर में-दिल्ली में 4 प्रतिशत स्टाम्प डयूटी देनी पड़ती है। यूपी में महिलाओं द्वारा जमीन खरीदने पर सिर्फ एक (1) प्रतिशत ही स्टाम्प डयूटी में छूट दी गयी है। 

23 मार्च 2021 को राज्य सरकार ने महिलाओं को 1 रूप्या में जमीन रजिस्ट्री में छूट देने से राज्य सरकार को 400 करोड़ का नुकसान बताया। राज्य के पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पिछली सरकार ने महिला के नाम से जमीन रजिस्ट्री कराने कर छूट दी थी, इससे राज्य को करीब 400 करोड़़ रूप्ये राजस्व का नुकसान हुआ था। वह रजिस्ट्री शुल्क भी देने में सक्षम होता है। यह सिर्फ जमीन लूटने की षडयंत्र के तहत किया गया था। 

जो भी नये-नये व्यवस्था जमीन संबंधित लाये गाये पिछली रघुवर दास की सरकार के द्वारा उसका समीक्षा होनी चाहिए कि आदिवासी, मूलवासी, दलित और मेहनत मजदूरी करने वाला परिवार को कितना लाभ मिला?। इसकी सूची सरकार को जारी करना चाहिए, तभी सामाजिक न्याय की बात हो सकती है। 

-23 मार्च का प्रभात खबर में विधायक सरयू ने बयान दिया था कहा था-कि राज्य में कई स्थानों पर सरकारी जमीन पर लोग वर्षों से रहते आ रहे हैं, उनकों सरकार से सुविधाएं भी मिल रही है। ऐसे जमीन को नियमित करना चाहिए। इनके अनुसार जमशेदपुर में कई इलाके ऐसे हैं नियमित करने का कोई नियम बना लेना चाहिए, इससे सरकार को बड़ी संख्या में राजस्व मिलेगा। 

2014 से 2019 के बीच राज्य की कल्याणकारी सरकार आखिर अमिरों को ही क्यों सस्ते दर में जमीन दी?

बाबा रामदेव को रघुवर सरकार ने 101 रूपये की टोकन मनी पर 15 एकड़ जमीन नमकोम प्रखंड के बरगांवा में दिया है। यह कहा गया कि यहां स्कूल खुलेगा, जहां गरीबों के बच्चे पढ़ेंगे। लेकिन सचाई को क्या है, यह जांचने की जरूरत है। 

Friday, September 25, 2026

झारखंड का मात्र 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रहा है। यह देश के लिए अच्छी नहीं हो सकती है लेकिन झारखंड के जनआंदोलनों की ताकत को दर्शाता है।

 23 सितंबर 2026 को प्रभात खबर में नीति आयोग की एक विशेष रिपोर्ट के बारे में छपा है जिसमें कहा गया है कि गैर-कोयला खनिज उत्पादन में झारखंड का मात्र 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रहा है। यह देश के लिए अच्छी नहीं हो सकती है लेकिन झारखंड के जनआंदोलनों की ताकत को दर्शाता है। 


यहां-नीति आयोग ने अपना विश्लेषण इस तरह दिया है-रिपोर्ट-धातु गैर-कोयला खनिज कारोबार का किया गया विश्लेषण-


नीति आयोग की सितंबर 2026 में प्रकाशित ट्रेड बाूच क्वार्टरली (अप्रैल से जून 2026) रिपोर्ट में भारत के धातु एव खनिज (गैर कोयला) अयस्क कारोबार का विश्लेषण कियागया है। रिपोर्ट में देश के कुल खनिज उत्पादन में झारखंड की हिस्सेदारी 3.6 प्रतिशत रही है। राज्य का प्रमुख योगदान बॉक्साइट, लौह अयस्क, तांबा, अयस्क और ग्रेफाइट के उत्पादन में दर्ज किया गया है। जबकि ओडिशा का सबसे अधिक योगदान 38.4 प्रकाशित है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का खनिज उत्पादन कुछ राज्यों में केंन्द्रित है। ओडिशा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और महाराष्ट्र मिलकर देश के कुल खनिज उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं। झारखंड का उल्लेख खनिज संपदा वाले राज्यों में किया गया है। 

खनन ़क्षेत्र में निवेश और उत्पादन बढ़ाने की चुनौती-रिपोर्ट में देश के खनन क्षेत्र के सामने र्प्यावरण और वन मंजुरी में देरी, भूमि अधिग्रहण की चुनौतियों तथा नीलाम किये गये खनिज ब्लॉकों को चालू करने में लगने वाले समय को संरचनात्मक बाधाओं के रूप में रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट में खनिज नीलामी प्रक्रिया को तर्कसंगत बनाने, खनन परियोजनाओं के संचालन में तेजी लाने और खनिज ब्लॉकों को निर्धारित समय सीमा में चालू करने जैसे उपाय बताये गये हैं। रिपोर्ट में खनिज उत्पादन बढ़ाने में आ रही बाधाओं का जिक्र किया गया है। जो झारखंड समेत अन्य राज्यों के लिए सुझाव दिये गये हैं। 

ये कारण बताये गये हैं-

1-पर्यावरण और वन मंजूरी में हो रहा है विलंब

2-भूमि अधिग्रहण की चुनौती

3-नीलाम खनिज ब्लॉकों को चालू करने में बिलंब

4‘-खनिज नीलामी प्रक्रिया में सुधार, तर्कसंगत बने संचालन में तेजी लावें

5-देश के खनिज कारोबार में बढ़ रही आयात निर्भरता। 


खनिजों के राष्ट्रीय उत्पादन में राज्यों का योगदान

राज्य देश में कुल खनिज उत्पादन में हिस्सेदारी खनिजों को योगदान-प्रतिशत में

ओडिशा---- 38.4 प्रतिशत क्रोमाइट-100, बॉक्साइट-72.5

                  लौह अयस्क-55.6

                  ग्रेफाइट-39.6

                   मैगनीज अयस्क-16.05

राजस्थान ---23.2 प्रतिशत सीसा-जस्ता-100

                 सेलेनाइट-100

                  गार्नेट-100

                  सिलिसियस अर्थ-100

छत्तीसगढ ---13.5 प्रतिशत टिन-100

                    लौह अयस्क-15.1

                   बॉक्साइट-4.3


कर्नाटक--- 10.1 प्रतिशत मैगनीज-16.1

                 लौह अयस्क-15.6

                  बॉक्साट-4.3

महाराष्ट्र--- 5.4 प्रतिशत कयनाइट-100

 ाि           लिमेनाइट-100

                फलोराइट-32.9

                मैंगनीज अयस्क-30.3

                  बॉक्साइट-4.6

झारखंड---- 3.6 प्रतिशत बॉक्साट-7.5

                         लौह अयस्क-6.6

                          तांबा अयस्क-3.2

                            ग्रेफाइट-0.4

मध्यप्रदेश --2.4 प्रतिशत तंबा अयस्क-76.6

                  मैगनीज अयस्क-26.1

                   फॉस्फोराइट-20.2

                     लौह अयस्क-2.3

आंध्र प्रदेश--- 1.0 प्रतिशत मैंगनीज अयस्क-11.3

                     लौह अयस्क-1.01

                     अन्य-2.4


इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड के आदिवासी -मूलवासी समुदाय अपने जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण के साथ अपने हक-अधिकारों की रक्षा के लिए अधिक सचेत और संर्घषशील हैं। इसका श्रेय झारखंड के सभी जनआंदोलन को जाता है।  

झारखड के तीन-चार जनआंदोलन हैं जो अपने जीत का संदेश विश्व तक पहुंचा दिये हैं। जनआंदोलनों के जीत का मूल मंत्र था आदिवासी-मूलवासी समुदाय की सामूहिक शक्ति जो जाति, धर्म और राजनीति से उपर उठकर खड़ी संगठित ताकत थी। इन जनआंदोलनो मे मूल रूप से कोइल-कारो जनसंगठन-गुमला, रांची-खूंटी। केंन्द्रीय जनसंघर्ष समिति-पलामू, गुमला। आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच-खूंटी, गुमला। भूमि रक्षा संघ-पूर्वी सिंहभूम, मानकी-मुण्डा संघ-पश्चिमी सिंहभूम,  भूमि सुरक्षा मच-संताल दिशुम, काठीकुड। इसके साथ ही गांव स्तर पर संताल परगना, कोल्हान, मुंण्डारी खूंटकटी क्षेत्र, ाहित पूरे राज्य में सक्रिय हैं। 

विकास के नाम पर राज्य में अब तक करोड़ो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय विस्तापित हो चुके हैं। 20 लाख जमीन विकास के नाम पर विभिन्न कंपनियों और परियोनाओं में जा चुकी है। इन विस्थापितों मे से 10-12 प्रतिशत ही किसी तरह से मुआवजा दिया गया है। बाकी विस्थापित आबादी रोजी रोटी के लिए दूसरे राज्यों में पलायन किया। कुछ राज्य में ही बेघर-बार होकर दर-दर में ठोंकरे खाने को मजबूर हैं। विकास और विस्थापन का सच को समझने के बाद आज झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान अपना विरासत की रक्षा जींदगी मूल लक्ष्य मानते हैं। 


Thursday, September 24, 2026