Sunday, October 4, 2026

6 दिसंबर 2005....Meri Dairy ...

 6 दिसंबर 2005


कर्रा


2 बजे हैं कर्रा प्रखंड कर्यालय में प्रखंड विकास पदाधिकारी श्री अनिरूद सिन्हा के चैमबर में श्री अनिरूद सिन्हा के अलावे सीडीपीओ सबिता कुमारी बैठे हैं। इसी बीच हम भी एनडीटीबी के दो साथियों के साथ उनके कमरे में पहुंचे। श्री अनिरूद जी से मैं प्रखंड का विस्तृत जानकारी ले रही थी। इसी बीच एक महिला अपने हाथ में कागजों का बंच लिए कमरेे में घुसी और अपना कागज बीडीओ की तरफ बढ़ा दी। उस महिला के पीछे दो-तीन और महिलाएं हाथ में आवेदन कागज लिये खड़ी थी। सामने वाली महिला का कागज देखने के बाद बीडीओ साहब ने कागज वापस करते हुए उत्क महिला को सप्लाई विभाग मंे जाने को कहा। महिला बाहर निकली, उसके पीछे खड़ी अन्य मलिाएं भी उनके पीछे हो ली। पांच मिनट बाद उत्क महिलाएं लौट कर बीडीओ के कमरे में वापस आयी और बतायी की सप्लाई विभाग में कोई नहीं है, ताला लगा हुआ है। महिलाएं बीडीओ साहब से पुछने लगी-बनेगा कि नहीं, बनेगा-मिलेगा-मिलेगा बोलते हैं, कितना दिन से दौड़ रहे हैं, लेकिन मिल नहीं रहा है। उत्क महिला से पुछने पर कि क्या नहीं मिल रहा है, जवाब देती है-राशन कार्ड। बीडीओ उत्क महिलाओं से पुछते हैं सप्लाई विभाग में कोई नहीं हैं, महिलाएं-नहीं सर ताला लगा हुआ है। घबड़ाते हुए बीडीओ साहब रामदेव कुमार दलपति को बुलवाते हैं। रामदेव कुमारजी आते हैं, बीडीओं पुछते हैं सप्लाई इंन्सपेक्टर नहीं हैं। रामदेवजी जवाब देते हैं नहीं सर नहीं हैं। बीच में ही हमने पुछा-आज नहीं हैं या कितने दिन से नहीं आ रहे हैं। रामदेव जी कहते हैं एक सत्पाह से नहीं आ रहीं हैं। क्यों नहीं आ रही 

यह पुछने पर रामदेवजी ही बोलते है कि वह बीमार है। हम लोग जब बीडीओ साहब से पुछे कि आज तो मंगलवार है,-ब्लोक दिवस है, बीडीओ उत्तर में कहते हैं हां आज ब्लोक दिवस है। आज तो ब्लोक स्तर के सभी अधिकारियो-कर्मचारियों को ब्लोक में उपस्थित रहने का आदेश रहता है ताकि इस दिन पुरे क्षेत्र के ग्रामीणों के विभिन्न तरह के समस्याओं का निपटारा संबंधित अधिकारी कर सकें। हमने उत्क महिलाओं से पुछा-चलिए तो किधर है सप्लाई विभाग देखते हैं। इसी बीच एक व्यत्कि आता है बीडीओ के कमरे में और कहता है, सर चावल में आग लगा दिया। यह सुनते ही सबका ध्यान उस व्यत्कि की ओर जाता है। उससे पुछने पर कि कयों जला दिया-उत्क व्यत्कि कहता है सड़ गया था, पिलू लग गया था, फेंकने से बकरी सब खा जाता तो मर जाता क्योंकि वह तो पोयजन हो गया। अखबार वाले अधिकारियों से सवाल-जवाब कर रहे हैं-इस खबर से प्रखंड से अपना काम कराने आये गा्रमीणों के चेहरे में अजीब तरह का उत्साह का झलक रहा था। शायद इसलिए की पहली बार टीब्ी कैमरा वाले को लोग प्रखंड कर्यालय में देख रहे थे। जब हम बीडीओ के कमरे से उत्क महिला के पीछी-पीछे सप्लाई विभाग की ओर जाने के लिए निकले, बीडीओ के कमरा के बाहर लगी भीड़ जोे बार-बार अंदर झांकने की कोशिश कर रही थी, हम लोगो के पीछे सामने आंगन तक आ गयी। साथ में बीडीओ साहब भी बाहर निकले। भीड़ ने बीडीओ साहब के सामने ही कई शिकायत की।


मुख्य बिलड़िग से बाहर निकलते ही सामने मैदान के दुसरी छोर में सप्लाई विभाग का गोदाम है। इस गोदाम के दहिने कोने से घना धुंआं उठ रहा है, धुंआ के साथ किसी चीज के जलने की गंध आ रही हैं। भीड. से एक व्यत्कि बगल में आ कर धीमें आवाज में कहता है-उधर देखिए चावल जल रहा हैं। गोदाम के पास पहुंचने पर वस्तुस्थिति समझ में आती है। गोदाम का एक बड़ा शटर बंद है। बगल में एक छोटा शटर उठा हुआ है। उसके सामने चावल बोरी का ढेर है जो जलकर आंगारा का रूप लेता जा रहा है। कुछ तो जल कर राख हो चुका है, लेकिन अभी भी 20-25 बोरी दिखाई दे रहा है जिसको जलना बाकी है। जल रहे चावल के ढेर के बगल में कुछ चावल के दाने पड़े हैं उसे एक कुता खाने में लीन है। जिस कमरे में चावल रखा गया था, उसमें घुस कर देखने की कोशिश में सीढ़ी तक गयी। लेकिन अंदर नहीं घुस सकी-कारण की गोदाम के कमरा से लेकर जल रहे चावल के ढेर तक कानी अंगुली के एक चौथाई के बराबर मोटा-मोटा काला-काला पिलू पुरा बिछा हुआ रेंग रहा था। देखकर मन- बदन सिहर जा रहा था। पुरा कमरा में पीलू रेंग रहा था, र्फस गीला था। गोदाम के पास हम लोगों के साथ कर्रा प्रखंड के प्रभात खबर का संवाददाता साईद भी थे। इन्होने बताया की यह चावल दो साल से गोदाम में पड़ा हुआ था जिसका वितरण नहीं किया गया। बीडीओ साहब से पुछने पर कि यह किसका चावल था, क्यों नहीं बांटा गया, इसके उत्तर में बीडीओ बात को टालते हुए कहते हैं-हां-हां चलिए सीओ से पुछते हैं कहते हुए वे कर्यालय की ओर बढ गये।


सप्लाई इंन्सपेक्टर कौन है यह पुछने पर बीडीओ साहब रामकदेव कुमार की ओर इशारा करते हुए पुछते हैं-क्या नाम है जी उसका। रामदेव कहते है मंजु कुमारी, कब से नहीं आ रही हैं पुछने पर दलपति कहते हैं- आठ दिन से। क्यों नहीं आ रहे हैं पता है पुछने पर कहते हैं बीमार है। वहां मौजुद ग्रामीण कहने लगे-बहुत दिन से नहीं आ रहे हैं। एनडीटीबी के साथियों ने जब रामदेव से पुछा क्या पिछले ब्लोक दिवस के दिन इंन्सपेक्टर आयी थी, उत्तर मिलता है-नहीं, याने दो सप्ताह से नहीं आ रहे हैं। ये तमाम बातें बीडीओं के सामने ही होता रहा, जबकि बीडीओ साहब चुप थे। विदित हो कि इसके पहले ही जब हम बीडीओ के कमरे में बैठे प्रखंड़ में कितने बीपीएल परिवार है, इसमें अनतोदय-अन्नपुर्ण योजना में कितने लाभूक हैं। बीपीएल लाभूकों के लिए हर माह कितना राशन प्रखंड कर्यालय को मिलता है, इसकी जानकारी लेने की कोशिश करने पर बीडीओ साहब जवाब दिये-कि इसका डीटेल तो आप को प्रखंड के सप्लाई आफसर ही दे सकता है। ये तमााम घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि प्रखंड में ग्रामीणों की सेवा में पदास्थापित अधिकारी एक-दुसरे अधिकारी के बारे जानीकारी भी नहीं रखते हैं। जो भी हो-लेकिन सवाल बहुत ही गंभीर है-आखिर यह किसका चावल था, गरीबों का, बृधाओं का, या फिर महिलाओं या बच्चों का, जिनके नाम पर आता है, उन्हें तो नहीं मिला-जिससे कीड़ा खा गया, सड़ गया, जिससे गंदगी साफ करने के नाम पर जला दिया गया। दुखद बात तो यह है कि इसी अनाज को प्राप्त करने के लिए सुदूर गांवों से बुढा-बुढी लकडी टेकते-टेकते पैदल चल कर आते हैं-अंतोदय-अन्नपुर्ण सुविधा लेने के नाम पर। इससे प्राप्त करने के लिए लाभुकों की सुची में अपना नाम दर्ज करवाने, या फिर राशन कार्ड बनवाने के लिए गरीब कई दिनों से प्रखंड कर्यालय का चक्र काटते हैं। गरीबों के साथ हो रहे इस न इंनसाफी के लिए आखिर कौन जिम्मेवार है क्या प्रखंडों में बैठे पदाधिकारी, या यहां की भ्रष्ट कुप्रशानिक व्यवस्था या फिर ग्रामीण विकास विभाग। आखिर इसका जवाब कौन देगा। 

ग्रामीणों के समस्याओं का सही समय में हल करने के लिए हर सप्ताह में एक दिन प्रखंडों में पदास्थापित पधारिकारियों को एक दिन हर हाल में प्रखंड कर्यालय में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है। यह दिन मंगल के दिन को निस्चित किया गया हैं इस दिन को प्रखंड कर्यालय का मंगल दिवस कहा जाता है। इसी दिन ग्रामीण अपने-अपने सस्मयाओं को लेकर आते हैं क्योंकि इस दिन सभी विभागों के संबंधित अधिकारी मौजुद रहते हैं। ताकि गांव के साथ ग्रामीणों का सही विकास हो सके। मैं भी इस दिन का लाभ उठााना चाही। प्रखंड विकास पदाधिकारी से प्रखंड की जनसंख्या की स्थिति, ग्रामीणों में शिक्षा-स्वास्थ्य की स्थिति की जानकारी लेनी थी। अंचल पदाधिकारी से प्रखंड में कृर्षि भूमिं, वनभूमि, जलस्त्रोत, बंजर भूमि, चरागह भमि, तथा आदिवासियों के जमीन की स्थिति का विवरण एकत्र करना था। सप्लाई अधिकारी से प्रखड के बीपीएल ग्रामीणों की सख्या, ग्रामीणों के नाम आने वाला अंतोदय-अन्नपुर्णा योजना के तहत मिलने वाला राशन, किरोसिन तेल, डीलरों की संख्या आदि सुचनायें लेना था। लेबर आफिसर से प्रखंड से हो रहे मजदूरों के पलायन की स्थिति की जानकारी लेनी थी। इसी तरह सीडीपीओ से ग्रामीण महिलाओं-बच्चों के स्वास्थ्य आदि का जानकारी एकत्र करना था। इसी उद्वेश्य के साथ मंगलवार या मंगल दिवस को 11.30 में कर्रा प्रखंड कर्यालय पहुंचे। बाहर प्रगंन में ग्रामीणों की भीड़ लगी हुई थी। इस भीड़ में कुछ नेता टाइप के लोग भी दिख रहे थे। सबसे पहले बीडीओं में मिलना था, उसके चेम्बर तक गये, दरवाजा में ताला लटक रहा था।


बगल में ही सीओ का दरवाजा खुला हुआ पाकर सीओ के कमरे में गयी। सीओ नवीण सुवार्णाे बैठे हुए थे। बीडीओ से मिलना है लेकिन दरवाजा में तो ताला लगा है वो आएगें की नहीं-यह पुछने पर सीओ साहब एक कर्मचारी को बुलाकर, जाओ बीडीओ साहब को जल्दी आने के लिए कहो, बाहर से लोग आऐ हैं। 20 मिनट के  बाद बीडीओ साहब सीओ के चेम्बर में आए जहां हम लोग बैठे थे। सीओ ने सीआइ को बुला का प्रखंड के जमीन-जंगल का विवरण देने को कहा। इन दोनो अधिकारियों के अनुसार 178 रेवन्यू गांव हैं, जिसमें 1 गांव बंेचिरागी-आबादीविहीन है। कुल क्षेत्रफल-2001 के अनुसार-50745.24 हेक्टेयर है।

बीडीओ श्री अनिरूद्व सिन्हा के अनुसार प्रखंड की कुल जनसंख्या 90,836 है। जिसमें पुरूषों की संख्या 45,305 तथा महिलाओं की 45,331 है। इसमें अनुसूचित जनजाति 65,025 तथा जेनेरल की 25,811 है। यहां आदिम जनजाति नहीं हैं। इन्होंन बताया कि यहां 17,488 बीपीएल हैं। प्रखंड में शिक्षा का प्रतिशत 28 है। इसमें महिलाओं में शिक्षा का प्रतिशत 17 है जबकि पुरूषों में 36 है। यह पुछने पर कि क्या-राज्य सरकार या मितल समूह प्रखंड कर्यालय कोे किसी तरह का लिखित सूचना दिये हैं कि-मितल को उद्योग लगाने के लिए जमीन चाहिए। इसके जवाब में बीडीओ ने कहा-आज तक तो किसी तरह का लिखित सूचना नहीं मिला है। सिर्फ अखबारों में ही पढ़ रहे हैं।


सीडीपीओ साबिता कुमारी जो खूंटी में पदास्थापित हैं जो 11 जुलाई 05 से कर्रा प्रखंड  अतिरित्क इनचार्च के रूप में सीडीपीओं की भूमिका निभा रही थी। जो मंगल दिवस के दिन ही सीडीपीओ का चार्ज बीडीओ को सौंपी। साबिता कहती हैं-दो-दो प्रखंड का जिम्म्ेावारी संभालना बहुत कठिन होता है। इन्होंने बताया कि यहां 117 आंगनबाड़ी केंन्द्र हैं। इसके लिए 110 सेविकाएं हैं। तीन सेविकाएं मुखिया चुनाव लड़ने के लिए इसत्फिा दे दीं। प्रखंड में 23 पंचायत हैं जिसमें संशोधन के बाद 19 हो गया है। 117 आंगनबाड़ियों के लिए चार सुपरवाइजर हैं। ग्रामीण महिलाओं और बच्चों को पोषाहार के रूप में गुड-मुरही दिया जाता था। अब सुप्रिम कोर्ट का आदिश दिया है कि स्थानीय सेविकाएं ही इसकी व्यवस्था स्वंय करेगीं। इसी कारण सभी सेविकाओं के नाम से खाता खोलवाया गया है। हर सेविका को प्रतिमाह इसके लिए 4600 कुछ रूपया दिया जा रहा है। महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर आइसीडीएस की ओर से क्या व्यवस्था है-इसके जवाब में साबिताजी ने बतायी कि आइसीडीएस में कोइ्र सरकारी डाक्टर-नर्स नहीं है। प्राथमिक हेल्थ सेंटर के डाक्टर-नर्स से ताल-मेल कर काम चला रहे है।


लेबर अफिसर से मिलने की इच्छा जाहीर करने पर पता चला कि यहां लेबर अफिसर हैे ही नही। अपने समस्याओं को निपटाने आऐ ग्रामीणों ने शिकायत किया कि-यहां हर विभाग में काम मन-मना होता हैं परिवारिक लाभ योजना के तहत 10,000 तक की राशि देने का प्रावधान है, इसमें उन्हीं लागों को दिया जाता है जो कम्शिन देते हैं। कई आंगनबाड़ी सेविकाओं ने शिकायत की कि-सुपरवाईजर उन्हेंने मन-मना ढ़ंग से हटाने की कोश्शि कर उनके जगह दुसरों को घुसाते हैं। कई लोगों ने कहा कि यहां जिनका चलता है उसी का काम होता है, यदि आप अधिकारियों के खिलाफ मुंह खेलेगें तो आप पर झुठा केस थोप दिया जाएगा। विदित हो कि राज्य सरकार राज्य बनने के पांच साल हो गये लेकिन प्रखंड वासियों के विकास कार्य में कोई नयापन नहीं आया, वही भ्रष्टाचार, अधिकारियों की कमी, अनियामितता, घुसखोर-दलालों की दया पर टिकी है ग्रामीणों का विकास। यह भी सर्वविदित है अर्जुन मुंडा ने राज्य में देशी-विदेेशी पूुजीपतियो को उद्योग लगाने के लिए जमीन-जंगल-पानी देने के लिए पूुजीपतियों से 40 करार कर लिया है। इसी के तहत मितल समूह को इस्पात करखाना खोलने के लिए मुंडा सरकार मनोहरपुर क्षेत्र को दिखाया था। इसका विरोध मनोहरपुर क्षेत्र की जनता ने की। वहां विरोध के बाद राज्य सरकार और मितल समूह कर्रा प्रखंड में जमीन तलाशाने में लगे हैं। वहीं दूसरी ओर विस्थापन का भय लोगों को विस्थापन के खिलाफ अनआंदोलन करने को उद्वेलित कर रहा है और गांव-गांव में जनगोबंदी का बिंगुल फूंका जा रहा है। कर्रा प्रखंड में विस्थापन के खिलाफ उठे इस जनगोबंदी को विस्थापन के खिलाफ शहादती संघर्ष का परचम लहराने वाला कोयलकारो जनसंगठन का भी समर्थन है। 




                                   दयामनी बरला

Ramin Vikas Mantri Shree Jayram Ramesh Ge Ne Ghoshna Kiya Tha ..Nagdi ki Dairy ..




 

Saturday, October 3, 2026

2 मार्च 2012 की मेरी डायरी ---About Nagdi Movement

 2 मार्च 2012 की मेरी डायरी                 

महामहिम राज्यपाल महोदय                                          दिनांक-2 मार्च 2012

झारखंड

विषय- कांके नगड़ी के ग्राम सभा से बिना सहमती लिये ही, किसानों की कृर्षि भूंमि, जो इनका एक मात्र जीविका का साधन है-को सरकार आई आई एम और लॉ कालेज के नाम पर जबरन पुलिस बल के द्वारा जमीन कब्जा कर रही है-इसको रोकने के संबंध में।

महाषय,

इतिहास गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह-बिच्छु से लड़कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जंगल, पानी, जमीन पर हमारा परंपारिक अधिकार है। इस राज्य के जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सिद्वू-कान्हू, बिरसा मुंडा जैसे वीर आदिवासी  नायकों ने षहादत दी है। इन षहिदों के खून का कीमत है छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम 1908। इस कानून में आदिवासियों के जमीन की रक्षा का विषेष प्रावधान है। यह कानून कृर्षि भूंमि में किसी तरह के गैर कृर्षि निर्माण कार्य को भी इजाजत नहीं देता है। लेकिन राज्य सरकार नगड़ी ग्रामवासियों के हाथ से पुलिस के बल पर जमीन छीन कर किसानों-राईयतों भूंमिहीन, गरीब-कंगाल बनाने जा रही है। 

महामहिम का ध्यान इस ओर अक्रिष्ट करना चाहते हैं-कि राज्य पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में आता है और इस इलाके में पेसा कानून भी अस्तित्व में है। इस कानून के आलोक में कहना चाहते हैं-कि इस इलाके में जो भी विकास योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की जाएगी-इसकी इजाज ग्राम सभा से ली जाएगी। लेकिन सरकार आई आई एम और लॉ कॉलेज के नाम पर जमीन ग्रामीण देना चाहते हैं-यह नहीं, इस संबंध में ग्राम सभा से किसी तरह का राय-विचार-विमार्ष नहीं लिया गया। यह पांचवी अनूसूचि को दिये अधिकार ’’ग्राम सभा ’’ सहित पेसा कानून का घोर उल्लंघन है। यह हम आदिवासी मूलवासी किसानों के उपर राज्यकीय दमन है। 

हम नगड़ी ग्रामवासी आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि 57-58 में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय के लिए जमीन अधिग्रहण की बात सरकार कहती है-लेकिन तब भी हम ग्रामीण जमीन अधिग्रहण का विरोध किये-हम अपने पूर्वजों का जमीन नहीं देना चाहते हैं, यही कारण है कि-जमीन का पैसा सरकार देना चाही-तब भी हमलोगों ने पैसा नहीं लिया। (सलंग्न-29 फरवरी 2012-जिला भू-अर्जन पदाधिकारी रांची)। 

हम नगड़ीवासी महामहिम को यह भी बताना चाहते हैं-कि नगड़ी आदिवासी बहुल गांव है। यहां (57-58) 153 पंचाटियां थीं, (वर्तमान में कई और परिवार बढ़ गये हैं) यहां कुछ परिवार मुस्लिम भी हैं। इन 153 पंचाटियों में से 128 राईतों (पंचाटियों) ने जमीन का पैसा लेने से इन्कार किया, क्योंकि हम किसी भी कीमत में अपना जमीन देना नहीं चाहते हैं। करीब 25 मुष्लिम समुदाय के पंचाटियों नेे पैसा लिये। 

हम आप को यह भी कहना चाहते हैं-कि हम आदिवासी समाज का जीविका, अस्तित्व, भाषा-संस्कृति, इतिहास और पहचान जमीन-जंगल के साथ जुड़ा हुआ है। हम तब तक आदिवासी हैं-जबतक जमीन के साथ जुड़े हुए हैं। और इस पांचवी अनुसूचि एवं सीएनटी एक्ट क्षेत्र में हमारे अधिकारों की रक्षा एवं विकसीत करने की जिम्मेवारी राज्य के महामहिम राज्यपाल की है। 

हम महामहिम को यह भी बताना चाहते हैं कि-57-58 में सरकार द्वारा प्रयास किये गये जमीन अधिग्रहण का विरोध तब भी हम लोगों ने किया और जमीन हमारे पूर्वजों से लेकर आज भी हमारे ही हाथ में है। आज भी हम खेती कर रहे हैं और जमीन का मजगूजारी भी देते आ रहे हैं। लेकिन साजिष के तहत कुछ लोगों का मजगूजारी रसीद 2008 से काटना बंद कर दिया। लेकिन कुछ लोगों का मलगुजारी 2011 तक भुगतान किया गया है। 

यहां यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं-कि 57-58 में पूर्ववर्ती राज्य सरकार द्वारा राजेन्द्र कृर्षि विष्वविद्यालय वर्तमान में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके के लिए जिस जमीन को मात्र चिन्हित किया गया था-का मालिकाना हक बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके को है-सरकार यह मानती है। इसी आधार पर राज्य सरकार उक्त भूंमि का अपने विभिन्न योजनाओं में अलग-अलग उद्वेष्य में उपयोग करना चाह रही है और इस बावत बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके पर उक्त भूंमि पर अनापति प्रमाण पत्र जारी करने का दबाव डाला गया। ज्ञातव्य हो कि बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय और पथ निर्माण विभाग रांची के बीच प्रषनगत भूंमि पर रिंग रोड निर्माण हेतु कई पत्राचार हुआ। इसमें जमीन का मलिकाना हक बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय को नहीं है-क्योंकि जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया है-यह बात स्वंय अधीक्षण अभियंता पथ निर्माण विभाग, पथ अंचल रांची ने पत्रांक 1137 दिनांक 18.08.08 में स्पष्ट किया है। (छायाप्रति सलंग्न)।


हम आप को बताना चाहते हैं-कि जिस जमीन को 57-58 में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय द्वारा अधिग्रहीत मानती है-वह बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय द्वारा अधिग्रहीत नहीं है। इसकी पुष्टी स्वंय बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय ने (6375) दिनांक 17-12-2008 में की गयी है।(छायाप्रति सलंग्न) सरकार जमीन अधिग्रहण के नाम पर-कागज पर फरजी अधिग्रहण कर रखा है-और इसी फरजी अधिग्रहण के आधार पर जिला भू-अर्जन विभाग ने आई आई एम हेतु कुल 214.29 एकड़ जमीन राज्यअदेश संख्या-658/ रा0 दिनांक 07.03.2009 से मानव संसाधन विकास, झारखंड को निशुल्क हस्तानान्तरण कर दिया है। साथ ही 12.635 एकड़ भूंमि रिंग रोड़ निर्माण के लिए पथ निर्माण विभाग को हस्तानान्तरण कर दिया गया।  

 सरकार हमारे अधिकारों का हनन करते हुए जब्रजस्ती 9 जनवरी 2012 को पुलिस बलों के सहयोग से हमारे जमीन पर कब्जा कर लिया और गलत तरीके से घेराबंदी का काम किया जा रहा है। हमारी यह जमीन उपजाउ कृर्षि भूमिं है। यहां साल में तीन फसल उगाते हैं। धान का फसल काटने के बाद हमलोगों ने वहां चना, गेंहूं आदि फसल भी बो दिये थे-जिसको पुलिस वालों ने रौंद डाला। 

हम नगड़ीवासी आप से कहना चाहते हैं-हम विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन हम आदिवासी किसानों को उजाड़ कर नहीं। हम आई आई एम तथा लॉ कालेज का विरोध नहीं कर रहे हैं-लेकिन हमारे कृर्षि भूंमि में नहीं। 

हमारा संकल्प -हम अपने पूर्वजों की जमीन को एक इंच भी नहीं देगें, क्योंकि हमारे सामाजिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति, सरना-ससनदीरी, मसना, इतिहास और पहचान को किसी भी मुआवजा से नहीं भरा जा सकता है, ना ही उसको पूनार्वासित किया जा सकता है।

हमारा सुझााव-

1-चिन्हित किया गया जमीन कांके नगड़ी के किसानों की उपजाउ कृर्षि भूंमि है और यह जीविका का एक मात्र साधन है। इस पर किसी भी तरह का इमारत -बिल्डिंग नहीं बनाना चाहिए

2-आई आई एम एवं लॉ कालेज एक विषिष्ट षिक्षण संस्थान है, इसलिए यह ऐसी जगर पर बनायी जाए जो गांव से 30-35 किलो मीटर दूरी पर हो, ताकि षिक्षण कार्यक्रम में किसी तरह का बाधा नहीं पहुंचे।

3-आई आई एम एवं लॉ कालेज षिक्षण संस्थान ष्षहर -गांव की भीड़ भाड़ से दूर ष्षांत जगह में बनाया जाए

4-ऐसी जगह से संस्थान खड़ा किया जाए जो सरकारी जमीन हो, बंजर भूंमि और कृर्षि योग्य नहीं हो, सरकार ऐसी जगह चिन्हित करे

हमारी मांगें-

1-गा्रम सभा को दिये गये अधिकारों का सम्मान किया जाए तथा जिस जमीन को जबरन पुलिस बल द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा है-उसे यथाषीध्र रोका जाए

2-छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम 1908 के मूलधारा 46 में आदिवासियों को जो अधिकार दिये गये हैं-उसका सम्मान किया जाए।

3-हम आदिवासी-मूलवासी किसी भी कीमत में हमारी खेती की जमीन को आई आई एम एवं लॉ कालेज के लिए नहीं देगें

4-आदिवासी-मूलवासियों का विस्थापन रोका जाए।

                                          

                                                               आप के विष्वास्त 

                                                                  कांके -नगड़ी

                                                                  2 मार्च 2012

नोट-मैंने फरवरी 2012 में नगडी के 227 एकड जमीन से संबंधित आरटीआइ आवेदन रांची जिला भूअर्जन विभाग-रांची और बिरसा कृषिविश्वविद्यालय कांके को दी थी। जिसमें निम्नलिखत सवाल मैंने की थी-1- कांकें नगडी में आप ने कितना एकड़ जमीन अधिग्रहण किये हैं

2-किन-किन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-किसानों की सूची के साथ

3-जिन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-उन किसानों को जमीन का कीमत किस दर से भुगतान किये हैं-पावदी रसीद के साथ जानकारी

4-जिन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-उस जमीन का खाता सं0, और रकबा की जानकारी

5-अगर आप जमीन अधिग्रहण किेये हैं-तो उस जमीन का उपयोग किस रूप में आप कर रहे हैं

ठसी आरटीआई आवेदन में मिला जानकारी के आधार पर पहला आवेवदन राजपाल के नाम बना कर, जमीन वापसी की मांग के लिए 2 मार्च 2012 आवेदन दिये थे। इसके बाद ही 4 मार्च 2012 से नगडी चौंरा में धरना में बैठना शुरू किये। जो 3 जुलाई तक जारी रहा।  रिपोर्ट में दर्ज तथ्य, मेरे द्वारा आरटीआई द्वारा मांगी गयी आवेदन में मिली जानकारी में मौजुद है। आरटीआई में मिली सभी कॉपी मैंने नगडी आंदोलन 2012 में सभी को दे दी हुं। इसी जानकारी के तहत लड़ाई लड़ी गयी थी। दुखद बात है कि 2025 में रिम्स 2 के नाम पर फिर से जब जमीन पर सरकार काम करना शुरू किया, तब नगडी के किसानों को माले विधायक री अरूप चटर्जी, पूर्व विधायक श्री विनोद कुमार सिंह, माले के राज्य सचिव श्री मनोज भक्त जी, कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष-श्री केशव कमलेश जी, विधायक श्री राजेश कच्छप जी, राजस्व मंत्री श्री दीपक बीरआ जी, कल्याण मंत्री श्री चमरा लिंण्डा जी, झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव श्री सुप्रीयो भटार्चाजी,  स्वस्थ्य मंत्री श्री इरफान अंसारी जी सबके पास लेकर गयी। सभी ने पोजेटिव जवाब दिये। 

इसी बीच शिबुसोरेन जी का तबीयत खराब हो गया। हेमंत सोरेन और कल्पना दिल्ली में गुरूजी के इलाज में लगे थे। इस दौरान मैंने मुख्यमंत्री जी एवं विधायक कल्पना सोरेन के नाम पर सीएम आवासीय कालर्यालय में नगडाी का जमीन छोड़ कर दूसरे जगह रिम्स 2 बनाने की मांग को लेकर आवेदन दी। इसी बीच 4 अगस्त को निधन हो गया।  इसी बीच कुछ नहीं किया जा सकता था। 

मैं हैरान थी जब नगडी के लोगों को उपरोक्त सभी नेताओं के पास लेकर जा रही थी-मुझे पता भी नहीं चलता था, नगड़ी के रैयतों का एक ग्रुप पूर्व मुंख्यमंत्री श्री बाबूलाल के पास गये। श्री मारांडी जी ने राज्य सरकार से अग्राह किया कि खेती की जमीन में रिम्स 2 नहीं बनाया जाए। इन्होंने ज्यादा उल्टा-सिधा नहीं किया। इसके बाद लोग संसाद श्री संजय सेठ के पास गये। उन्होंने राज्यपाल से मिलाया। संसाद श्री सेठजी भी खेत में हल जोतने का घोषणा किये। लेकिन खेत में नहीं उतरे। इसके बाद जेएमएम कं पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व कल्याण मंत्री श्री चंपाई सोरेन ने खेत में हल चलाने-रोपा रोपने का घोषणा किया। 

तय दिन में पूरे राज्य के बीजेपी के साथी नगडी खेत में ट्रेक्टर लाकर हल जोता, धान रोपा। हैरानी की बात तो यह है कि -धान रोपने के बाद फसल का एक बाईल भी किसान नहीं काटंे। 

2012 में हमलोगों ने खेत जोता, धान रोपा और फसल भी काटा। 15 अगस्त 2012 को 40-45 हल-बैल के साथ पूरा गांव खेत जोता, धान रोपा, मैं साथ थी। कांके थाना में सीओ और थाना प्रभारी ने सिर्फ मेरे उपर नामित एफआईआर किया। दयामनी बरला करीब 100 से 150 लोगों के साथ दिवाल तोडी, खेत जोती और खेती बारी की। एफआईआर में कहा-बाकी लोगों का नाम -पता नहीं है। 7-8 साल तक केस डायरी पुलिस लिखते रही-बाकी लोगों को नाम, पता नहीं मिल रहा है। 2012 से 2023 तक कचहारी का चक्कर मैं लगाते रही। मेंरे उपर कुल 8 केस थे। 9 जून 2012 को नेगड़ी का जमीन बचाने के लिए जानी शिकार निकाले थे। नगड़ी चौंरा से राजभवन तक। 

इसकी तैयारी के लिए 35 गांवों में दिन-रात लोगों को आंदोलन में जोडने का काम किये। राज्य बनने के बाद 2001 में उसी इलाके में ग्रेटर रांची बनाने की योजना फाईनल थी। प्रथम मुख्यमंत्री ने इसका उदधाटन भी कर दिये थे। सरकारी सूची में 35 गांवों का नाम दर्ज था। सभी गांव विस्थापन को लेकर भयभीत था। सभी गांव के ग्रामीण नगड़ी आंदोलन के समर्थन में उतरे। तय कार्याक्रम के अनुसार 35 गांवों के समर्थक, माले के तत्कालन विधायक श्री विनोद सिंह, मासस के तत्कालीन विधायक ्रश्री अरूप चटर्जी हम लोगों के साथ नगडी चौंरा से पैदल भारी भीड के साथ राजभवन पहंुचे थे। उस दिन बडी घटना होते-होते बच गयी सिर्फ विनोद सिंह और अरूप जी के कारण। लोग इतना उग्र हो गये थे-कि किसी का बात ही मान रहे थे। लेकिन सब ठीक रहा। इस दिन हम लोगों के उपर दायर केस 15 सितंबर 2025 को खत्म हुआ है। 

आज दुख है कि राजनीति करके जमीन बचाने को आंदोलन को खत्म कर दिया गया। मैं नगडी के साथियों को बार-बार मना करते रही कि राजनीति मत कीजिए। गठबंधन की सरकार है-अग्राह करेगें, मनाएगें। लेकिन जो हुआ सबके सामने है। 2013 में तीन महीना जेल में रहने के बाद बाहर मैं निकली। जनवरी माह था। एक दिन तत्कालीन प्रखात खबर के प्रधान संपादक श्री हरिवंश जी फोन करके बोले-आज मैं केंन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रामेश जी को अपने दफदर में चाय-पानी के लिए बुलाया हुं। मैं चाहता हुं-तुम भी आओ। मैं सोच में पड़ गयी, जाना चाहिए या नहीं। फिर मन बनाया-नगडी खेत से संबंधित सभी दस्तावेजों को फाईल बनायी और गयी। याद है अंग्रेजी अखबार के 3-4 रिपोर्टर वहां थे। वहां मुझ को देखते ही एक ने कहा-आखिर तुम क्या चाहती हो, तुम्हारे हिसाब से राज्य चले, सब जगह विरोध करती हो जमीन नहीं देना है। इस समय हरिवंश जी और मंत्री नहीं पहुंचे थे। 

लोग बहुत कुछ बोलते गये, मैं चुप थी। हरिवंश जी और मुत्री अंदर प्रवेश किये। सभी ने अभिनंदन किया। बात शुरू हुई। प्रत्रकारों ने मंत्री जी को धन्यबाद और बधाई देने लगे कि आप ने नरेगा कानून बहुत अच््रछा लेकर आये हैं, गांव का बहुत विकास हो रहा है। गांव वाले बहुत खुश हैं। मैं चुप सुनते रही। मैं अपनी बात कहने का अवसर ढुंढ रही थी। मैं अपने को गाली देने लगी-दयामनी क्या तुम चुप रहने के लिए यहां आयी हो, या अपनी बात कहने के लिए। मैं चुपी तोडी-मंत्री साहब नरेगा बहुत अच्छा है लेकिन भ्रध्टाटाचर भी चरम पर है। मजदूरों का मज कर शोषण हो रहा हे। प्रभात खबर में मेरी बहुत सारी रिपोर्ट नरेगा में मजदूरों के शोषण पर छपी है। प्रधान संपादक जी ने कहा-हां दयामनी इस पर बहुत काम की है। सर एसी कमरा में योजनाएं बनती है और जब जमीन पर उतारा जाता है, तब गांव वाले और सरकार के बीच लड़ाई होता है। जैसे कि नगडी में अभी हो रहा है। तुरंत उठ कर मंत्री के पास फाइल लेकर पहुंची। एक-एक पेज पलट कर दिखायी, एक-एक कागजात। और अग्राह की, सर सुकुरहुटं में 2100 एकड तक बंजर भूमि है। आप को समय हो तो दिखा सकते हैं।

25-26 दिन के बाद ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रामेश जी झारखंड आ कर प्रोजक्ट भवन में प्रेस कांन्फ्रेस करके घोषणा किया-नगडी के किसानों का जमीन बहु फसली है किसन जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। मैं उनके साथ हुं। आइआइएम और ट्रीपल आइटी जैसे संस्थान सुकुरहुटु के बंजर भूमि पर बनेगा। इसी घोषणा के आधार पर 2012 के बाद नगडी का जमीन यथावत किसानों के हाथ था। जहां 2024 तक किसान खेती करते रहे। 

राजनीति में रहकर आदिवासी नेता भी आदिवासी समाज के समस्याओं को समझते नहीं है सिर्फ अपना कुर्सी की राजनीति करते हैं। 2012 में मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुण्डा जी थें। दो उपमुख्यमंत्री थे-एक सुदेश कुमार महतो और दूसरा हेमंत सोरेन। उस समय कल्याणमंत्री श्री चंपाई सोरेन जी थे। जिनको नगडी का जमीन के बारे जानकारी नहीं है-सबको है लेकिन पद में रहते नगडी के किसानों का जमीन जो 1957-58 में गलत तरीक से अधिग्रहण किया था। इमानदारी से रैयतों को वापस करना चाहिए था। नहीं करके राजनीति के आग में झोंक दिया। 

Friday, October 2, 2026

इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स लिमिटेड प्लांट के विस्थापितों और रैयतों को मुआवजा और नौकरी दिलाने के लिए मासास से पूर्व विधायक अरूप चटर्जी के नेतृत्व में 2014 में बडा आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन के समर्थन में मैं भी शामिल हुई थी।

 बोकारो जिला के चंदनकिसारी (सियालजोरी) में स्थित

इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स लिमिटेड प्लांट के विस्थापितों और रैयतों को मुआवजा और नौकरी दिलाने के लिए मासास से पूर्व विधायक अरूप चटर्जी के नेतृत्व में 2014 में बडा आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन के समर्थन में मैं भी शामिल हुई थी। 

धरना कार्यक्रम के दौरान स्टील प्लांट को भगाबांध गांव के रैयतों जमीन देने से इंकार कर दिया था। गांव वाले जमीन अधिग्रहण का जोरदार विरोध किया। परिणाम यह हुआ कि कंपनी ने गांव के चारों ओर का जमीन अधिग्रहण कर स्टील प्लांट खडा किया। बीच में गांव को छोड दिया गया। चारों ओर प्लांट का चालू हालात में। गांव वाले अपने गाय, बैल के साथ । इसे देखने समझने के लिए विस्थापित साथियों के साथ प्लांट के अंदर गांव गये थे। इस पर स्टील प्लांट के मालिक ने मेरे साथ 22 लोगों के उपर प्लांट में तोड फोड का केस दर्ज किया था। बोकारो कोर्ट मे कई साल तक केस चला था। 

Xtell Plant ke bhitar Bhagabandh Village


Plant ke main Gate per Dharna  

Lameen Malik, Displaced 


Plant ke Undar Bhagabandh Gaon



डायरी-21 जून 2001, रांची स्थित एचपीडीसी में राज्य के कई हिस्सों के जनआंदोलनों में संघर्षरत साथियों की जुबानी, जो आज इतिहास बन गया है।

 जनअधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष का सफर अभी जारी है...

डायरी-21 जून 2001, रांची स्थित एचपीडीसी में राज्य के कई हिस्सों के जनआंदोलनों में संघर्षरत साथियों की जुबानी, जो आज इतिहास बन गया है।

आजादी के बाद 60 वर्षों में करीब 60 लाख झारखंडी अपने जंगल-जमीन और विरासत से विस्थापित हो चुके है। झारखंड अलग राज्य की लड़लाई में हमलोगों ने नारा दिया था-कैसे लोगे झारखंड-लड़के लेगें झारखंड। अब नारा दे रहे हैं-कैसे लिया झारखंड-लड़के लिया झारखंड। जेकिन आज भी झारखंडी आदिवासी-मूलवासी, किसान, कहीं बड़े परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन के खिलाफ लड़ रहे हैं, तो कहीं, फील्ड फायरिंग रेंज के खिलाफ, तो कहीं उत्खनन -खदान के खिलाफ, तो कहीं शरही इलाके में झुगी-झोपड़ी उजाड़ने के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। 

राज्य में अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पूंजीवाद तथा नवसाम्रज्यवाद अपना पांव फैलाना शुरू कर दिया है। शहरीकरण, सुंदरीकरण, रोड़ चौड़ीकरण के लिए शहरी क्षेत्र के गरीबो की लाखों झोपडियां और दुकाने उजाड़ना शुरू कर दिया है। 

अलग राज्य बनने के पहले कोयलकरो परियाजना बनाने का जिम्मा एनएसपीसी को दिया गया था। कोइलकारो जनसंगठन 256 गांवों की र्ढाइ लाख आबादी, 55 हजार एकड़ खेती की जमीन, 27 हजार एकड़ जंगल के साथ अपना भाषा-सांस्कृति, पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहा था। 

राज्य बनने के बाद अब परियोजना का निर्माण के लिए एनएचपीसी को हटाकर एनरोन तथा फ्रांस की एक बड़ी कंपनी को जिम्मा दे रहा हैं अब हमारी लड़ाई सरकार से नहीं है, लड़ाई अब बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ होगी। 

जगत जी कुटकू डैम से होने वाल विस्थापन के खिलाफ चल रहे आंदोलन का सक्रिय लीडर है। आंदोलन पर चर्चा करते बताया-1984 में एक माह तीन दिन तक बांध को रोकने के लिए स्थानीय किसानों ने धरना दिया। जिस किसान का एक लाख की संपत्ति चली गयी-उसको मुआवजा के तौर पर केवल 15 हजार रूपया मिला। 1995 में फिर से धरना दिये । पहला फेज में 17 गांव डुब चुका है, अभी और 32 गांव डुबने वाला है। 1966-67 में सर्वे हुआ था, उस समय 600 घर था प्रभावित, इसमें 222 परिवार को नौकरी दिया। बाकी को कुछ नहीं मिला। बहुतों को रहने के लिए घर भी नहीं मिला। 

1992 से कुटकु डैम क्षेत्र में स्थानीय समुदाय ने विस्थापन रोकने के लिए संघर्ष समिति बना कर लड़ रहे हैं। जगत सिंह ने बताया-अभी भी संघर्ष जारी है। यहां के विस्थापित कुछ लोग छत्तीसगढ जा कर बसने लगे। जब बिहार था -तब विस्थापितों को वहां रहने दिया। छत्तीसगढ, झारखंड और उत्तरांचल ये तीनों राज्यों को पूर्नगठन 2000 में हुआ। छत्तीसगट नया राज्य बनने के बाद कुटकु डैम विस्थापितों को वहां से हटाया गया। घर बना कर रहने के लिए भी जमीन नहीं दिया जा रहा है।

 दामोदर घाटी-इस इलाके में पिपरवार कोयला खदान से बहुत अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। जिसके पास 2 एकड़ से कम जमीन था-उसको मुआवजा के नाप पर केवल 7 सौ दर पर मिला। इस इलाके में महुआ पेड की अधिकता थी जिससे काट दिया गया। हर साल प्रत्येक पेड करीब 3000 रू तक का पैदवार देता था। अब सब समाप्त हो गया। 

रजरप्प क्षेत्र-लोगों ने बताया 6 गांव पूरी तरह विस्थापित, 4 गांव आंशिक। 40 परिवार मछुवारों अधिक दिक्कत हो रहा है। विस्थापितों में से करीब 450 लोग छाई लोडिंग का काम कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि, खदान होगा तो नौकरी मिलेगा, लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल जाती है। 

उरीमरी कोलयारी, हेंन्देगीरी कोलयारी, गोविन्दपुर कोयलारी, बोकारो थार्मल पावर, गामिया, तेनुघाट डैम इन सभी परियोजनाओं से बडी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं। बोकारी जिला और हजारीबाग जिला में विस्थापितों की फौज खडी हो गयी। जो भूमिहीन हो गये हैं। रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। बोकारो की सामाजिक कार्यकर्ता तारा क्रांति कहती है-इलाके में पीने का पानी नहीं मिलता है। महिलाएं दो किलोमीटर तक पानी लाने जाती हैं। लडकियां 6-7 क्लास तक ही पढ़ पाती हैं गरीबी के कारण। महिलाओं की बडी आबादी महानगरों में पलायन कर रही है जहां उनका शरीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण होता है। 

गोला, पेटरवार इलाके में विस्थापन की लड़ाई नहीं लड़ी गयी। विस्थापित जमीन से उजड़ने के बाद जंगलों में जा कर बसने लगे। रोजगार के लिए केंउदु पता लोड कर जिंदगी बसर करने लगे, लेकिन वन विभाग ने उन लोगों पर केस ठोक दिया। 

पश्चिम सिंहभूम में 1980 में ईचा खरखाई डैम बनाने की योजना लायी गयी।  क्षेत्र के आदिवासी-मूलवासी किसान संगठित होकर विस्थापन के खिलाफ संघर्ष करना शुरू कर दिये। संगठन के नेता गंगाराम कलौंडिया की हत्या 1982 में कर दी गईं 

पोटका के सिद्वेश्वर सरकार और कुमार चंन्द्रमार्डी कहते हैं-जादूगोड़ा के यूसिएल खदान क्षेत्र में रह रहे लोग तावा में डाले गए मच्छली की तरह हैं। विस्थापितों को वहां नौकरी तो दिया जहां यूरेनियम रेडियेसन से हर तरह की बीमारी से लोग अंसमय काल के गाल में समा रहे हैं। बच्चे अपंग पैदा हो रहे हैं। महिलाएं बांझ की शिकार बनते जा रही है। 

कुमारी संजय-अपने जंगल-जमीन से लोग उजड जाने के बाद शहरों में आकर झुगी-झोपडियों में रहकर रोजी-रोटी कमाने लगते हैं। रांची शहरी ़क्षेत्र में बहुत बड़ी आबादी झुगी-झोपडियों में रहती है। 1994 में झुगी-झोपडियों में रहने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए झुगी-झोपडी संघर्ष मोर्चा बनाया गया। आरएमसीएच क्षेत्र में 35 वर्षो से लोग रह रहे थे। राज्य बनने के बाद इन्हें हटा दिया गया। झुगी-झोपडियों से विस्थापित आबादी कहां चली गई किसी को नहीं पता। रांची रेलवे स्टेशन के आस-पास 8 बस्तियां हैं। गांव से आकर लोग झुगी-झोपडियों में बस गये हैं। राज्य बनने के बाद इन्हें भी हटाने की योजना बनायी गई है। 

पुष्पा-कुटकू डैम विस्थापित

पुराना आंकड़ा के अनुसार 633 परिवार विस्थापित हुए। कुटकू भरना नदी त टपर कुरा, चापिया और पोलपोल गांव था। विस्थापितों के पास रोजगार का साधन अब बीडी पता ही रह गया है। सभी लोग बीडी पता तोडते हैं जो पैसा मिलता है उसी से गुजारा करते हैं। इन साल तो बीडी पता भी नहीं तोड़ पाये। जहां से बीडी पता तोडते थे उस क्षेत्र को सरकार टाईगर प्रोजेक्ट घोषित कर दिया है। हम लोगों को बता भी नहीं चला कि कब टाईगर प्रोजेक्ट घोषित किया गया। हम लोगों तब पता चला-जब बीडी पता तोड़ने आये, तो वन विभाग जंगल में घुसने नहीं दिया। 

विस्थापित परिवार-सामुएल कुजूर, गाब्रिएल कुजूर, मरियानुस कुजूर, अंतु किसान, पसकल खाखा सपरिवार छत्तीसगढ के महाराजगंज में जा कर बसे हैं। एगनेशिया कुजूर कहती है-मेरा परिवार छत्तीसगढ के विजयनगर में बसा है अब यहां भी कनहर डैम से विस्थापित होने वाला है। समझ में नहीं आता-अब हम लोग कहां जाएंगें। 

नोट-विकास के नाम पर राज्य बनने तक 60 लाख से ज्यादा आदिवासी-मूलवासी आबादी अपने जल-जंगल-जमीन से उजड़ चुकी है। राज्य बनने के बाद विस्थापन का दूसरा दौर शुरू हुआ। इस पीडा के शिकार विस्थापितों दर्द है यह। जिससे मैंने अपनी नोट बुक में 2001 में दर्ज की हुं। 

Sunday, September 27, 2026

मुझे एक डायरी मिला-----5 , 6, 7 October 2001

 जिंदगी की डायरी

मुझे एक डायरी मिला-

5 अक्टोबर 2001-

1 फरवरी 2001 को खूंटी जिलो के तपकारा ओपी क्षेत्र में कोइलकारो जनसंगठन ने डेरांग के पास नो-इंट्री गेट लगया था, ताकि कोई भी सरकारी आमदी परियोजना क्षेत्र में आ नहीं सके। इस नो-इ्रट्री गेट को रनिया पुलिस थाना और तपकारा ओपी के पुलिस लोहाजिमी जंगल की ओर गये थे। जाते समय गेट के किनारे से गाडी पार किया। वापसी के समय गेट को तोड़ कर पुलिस वाले अपने गाडी पर लाद कर ले जाने लगे। 

ठसी समय गुटुहाते का अमृत गुडिया डेरांग की ओर से आ रहा था, पुलिस वालों को पूछा-आप लोग क्यों गेट को तोड कर ले जा रहे हैं? लेने से मना करने पर पुलिस वालों ने उससे बंदुक के कुंदे से पीट कर घायल कर दिया। और गेट को अपने साथ तपकारा ओपो लेकर गये। 

यह खबर आग की तरह फैल गयी पूरे कोइल-कारो जनसंगठन के आंदोलन इलाके में। रात को जनसंगठन की बैठक हुई। निर्णय लिया गया-कल 2 फरवारी को तपकारा ओपी का घेराव करेगें। दूसरे दिन 11 बजे से चारों ओर से जनसंगठन के लोग तपकारा ओपी पहुंचें। जनसंगठन ने इस दौरान अपनी मांग रखी-

3-4 हजार लोग जमा थे। धेराव कार्यक्रम शांतिपूर्ण चल रहा थां। लोग मांग कर रहे थे-डीएसपी आए और हमारो मांगों को सुने। साथ ही लिखित मांग पत्र उन्हें सौंपना चाहते थे। 

छो-ढाई बजे तक लोग इंतजार करते रहे। इसी बीच तोरपा के तत्कालीन विधायक श्री कोचे मुंण्डा जी वहां आये। ओपी में गये। लोगों की उम्मीद जगी कि अब हमारी मांग सुनी जाएगी। थोडी देर बाद विधायक जी अंदर से बाहर आये । क्या बात हुआ-लोगों में जिज्ञसा बढी, लेकिन कोई सकारात्मक बात नहीं बनी। 

इसके 10-15 मिनट बाद ओपी की ओर से गोली चलने लगी। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है। वहां जवान से लेकर बुजुर्ग महिला-पुरूष हर उम्र के मौजूद थे। 

चारो तरफ अफरा-तफरा मची। जो भागने सका, वो भागा। पुलिस की गोली से आठ लोग मरे। करीब 25 लोग घायल हुए। देखते ही देखते ओपी के अगल-बगल खून से लाल हो गया। इस गोली कांड को लेकर सामाजिक संगठन इंसाफ ने तय किया जनसुवाई कार्यक्रम करने का। क्योंकि पुलिस का दबाव जनसंगठन पर बढ़ रहा था। लोगों की गिरफतारी के लिए।

इस गोली कांड में जनसंगठन के आठ साथि शहीद हुए। 25 घायल हुए-इस घटनो को लेकर कोइल-कारो जनसंगठन ने पुलिस पर केस किया। दूसरी तरफ पुलिस ने जनसंगठन के 13 साथियों को नमजद आरोपी बनाते हुए केस दर्ज किया। इस घटना का सचाई को सामने लाने और जनसंगठन का साथ देने के लिए इंसाफ ने जनसुनाई करने की योजना बनायी।

5 अक्टोबर 2001 को दिल्ली में एक बैठक बुलायी गयी थी। बैठक में सायलजी ने फोन पर जस्टिस साचर जी से बात की -नोवेबर 1-4 की बीच समय तय करने के लिए। बोम्बे इंसाफ के राजन सिंह से भी फोन पर समय तय करने के लिए बात किये। राजन ने कहा-ठीक है दिल्ली आकर जस्टिस साचर से फाइनल कर लेगें। 

जम्हार गांव से रंथु जी फोन कर बताये-गांव के समस्याओं को लेकर महिला समिति 19 अक्टोबर को कर्रा प्रखंड कार्यालय का घेराव करेगी, कार्यक्रम तय करने के लिए जयश्री 9-10 अक्टेबर को आप के पास रांची आएगी। 

7 अक्टेबर को मसीह दास गुडिय सदर कंन्डुना और विजय गुडिया को फोन कर जनसुनवाई की जानकारी दिये। इसके लिए रांची में 21 अक्टोबर को बैठक भी तय किया गया।

आज दक्षिण अफरिका यात्रा की डायरी निकाली। यात्रा के दौरान स्वेटो, जाहनसवर्ग, दक्षिण अफ्रिका में मिले -स्थानीय समुदाय-काले लोगों पर-चित्रण किये। एक रिपोर्ट तैयार की । अश्वेतों या काले लोगों की जनसंख्या कितनी है। विभिन्न टाउनशीप में रहने वाले 85 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी जी रहे हैं। 20 प्रतिशत घरों में ही बिजली था। यहां बिजली का नीजिकरण हो चुका था। प्रीपेड बिजली के बारे यहीं समझने का मौका मिला था। 

वहां काले लोगों का आंदोलन को समझने का मौका मिला। 1994 के बाद की स्थिति -काले लोगों की क्या थी है? प्रशासन की क्या भूमिका है-आम जनता के प्रति, जनता की क्या आशांए थी। द0 अफ्रीका का 87 प्रतिशत ़क्षेत्र श्वेतों के लिए सुरक्षित रखा गया। लगभग 13 प्रतिशत अश्वेतों के लिए। इस तरह देश के 10-13 प्रतिशत भाग में ही देश की 80 प्रतिशत अश्वेतों की आबादी रहती है। अश्वेतों को बाण्टूस्तान के घने और बंजर इलाकों में ही रहने का अधिकार दिया गया था।

21 अक्टोबर को रांची स्थित विकास मैत्री में जनसुवाई को लेकर बैठक हुई थी। मच पर श्री याकूब कांन्डुलना-बंडआ जयपुर, श्री इमानुएल डहंगा-बंडआ जयपुर, श्री सोमा गुडिया-कालेट थे। 

 जनसुनवाई में जजमेंट टीम में -सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस साचर जी,  सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता श्री संजय पारिख जी, अधिवक्ता सुश्री सुधा भरद्वाज, पीयूसीएल के श्री चितरंजन सिंह, और डॉ0 विनोद रैयना होगें इसकी जानकारी साझा की गयी। बैठक के दौरान जनसुनवाई क्यों जरूरी है इस पर रांची के अधिवक्ता श्री रश्मि कत्यायन जी ने कहा-एक इनक्वारी होता है आवाज को बंद करना,  दूसरा होता है आवाज को हमेशा उठाते रहना। जनता का आवाज को आवाज देने के लिए यह सुनवाई होगा। 

बैठक में जनसुनवाई के मुख्य ंिबन्दुओं का निर्धारित किया गया-1-कोयलकारो परियोजना पर 3-


2-कानूनी पक्ष परियोजना पर

3-सास्कृतिक पक्ष

4-स्वाशासन-पड़हा, पंचायत

5-झारखंड में कोयलकारो परियोजना जरूरी है क्या?

6-कोयलकारो परियोजना पर स्थानिय लोगों का क्या राय है?

7-ग्रामीणों को इससे क्या लाभ होगा

8-नया राज्य बनने के बाद पुलिस फायरिंग क्यों?

सुनवाई की तैसारी के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला का कॉपी निकालना है

2-रांची एक्सआईसेस से परियोजना से संबंधित कॉपी निकालना है-परियोजना पर पहला अध्यायन किया था।

3-मुख्य सचिव से मिलना है

4-सुधीर प्रसाद को बांध बनाने की जिम्मेवारी दी गई थी-उनसे बात करना

5- ग्रामीण एसपी से मिलना

6-रिपोर्ट-हिंन्दी और अंग्रेजी में बनाना

यह मैंने अपनी नोट बुक जो 2001 में लिखि थी, उसका रिपोर्ट है।

1995 से मैं सामाजिक काम में हुं। मेरी आदत थी प्रत्येक दिन का डायरी लिखना। आज मेंरे पास हजारों नोट बुक है। मैने अपना नोटबुक या डायरी कभी नहीं बेची या हटायी।

आज सुबह मेरा हाथ एक छोटा नोट बुक पर पडा। खोली -4-5 पेज पलटी। मन किया आप लोगों से साझा करने का। नोट बुक में नोट की गयी मुददे को गहराई से आज के संदर्भ में सोचने लगी, तो लगने लगा झारखंड राज्य बने 26 साल हो गये। लेकिन आदिवासी-मूवलवासी या मूल झारखंडी अब भी विस्थापन, जंगल, जमीन का लूट, बेरोजगारी, हर स्तर पर शोषण दमन का शिकार हो रहे हैं। फिर भी उम्मीद के साथ संघर्षरत हैं। 


Saturday, September 26, 2026

मोदी की चिंता अपने प्रिय मित्र अडानी अंबानी का केवल है


 केंद्र की मोदी सरकार इस देश की सारी संपत्तियों को अपने प्रिय मित्र अडानी और अंबानी जैसे अरबपतियों के हाथ में सौंप दिए.