Wednesday, July 29, 2026

आज वैश्विक पूंजी बाजार में आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्रकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शत्कियों का हमला तेज होता जा रहा है।

MERI BOOK SAMBHIDAN PRADAT ADIVASI ADHIKAR KHATRE ME KI  PRASTAWNA

 2-   प्रस्तावना


आदिवासी ईलाके में जब अंग्रेज शोषक शासकों, जमींनदारों और इजारेदारों द्वारा आदिवासियों के स्वाशान व्यवस्था पर चारों तरफ से हमला कर दिया था तब बिरसा मुंण्डा ने कहा था देखो-हमारी धरती धूल की तरह उड़ी चली जा रही है। आज वैश्विक पूंजी बाजार में आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्रकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शत्कियों का हमला तेज होता जा रहा है। आदिवासी किसानों के परंपरागत अधिकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, खूंटखटी अधिकार, विलकिनसन रूल, पेसा कानून और 5वीं अनुसूचि में प्रावधान अधिकारों पर काॅरपोरेट कंपनियों का बुलडोजर चल रहा है। विस्थापन की लड़ाई -जंगल, जमीन, खनिज के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ समुदाय का संगठित विरोध की परंपरा थी। लेकिन आज के पूंजीवादी इस बाजार व्यवस्था में स्वंय देश की कल्याणकारी सरकार ने आदिवासी, दलित, किसानों एवं मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों में बहुत सारे संशोधन पूंतीपतियों और कारपोरेट घरानों के हित मे ंकर चुके हैं। इसे सामुदाय की सामूहिक-संगठित प्रतिरोध की शक्ति को कमजोर कर दिया गया है। 

  देश की वैश्विक नीति विश्व बैंक और काॅरपोरेट घरानों के दिशा निर्दशों, पूंजिपतियों के मुनाफा कमाने की होड़ एवं कल्याणकारी राष्ट्र (देश) एवं राज्य की बदलती भूमिका ने देश के आदिवासी, मूलवासी किसान, दलितों के परंपरागत संवैधानिक अधिकार को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को जहां सरकार बढ़ाना चाहती है, वहां निजी पूंजि को भी तेजी से बढ़ावा देती है। इसके लिए भमि स्वामित्व के रिकार्ड एवं पंजीयन व्यवस्था को अपने अनूरूप करके भूमि की खरीद-बिक्री को बढ़ावा देना सरकार अपनी प्राथमिता मानती है। इसके लिए पार्सल मैप बनायी जा रही हैै साथ ही साथ डिजिटल रिकार्ड रखने की व्यवस्था की जा रही है। जिसमें भूमि के मालिकाना का रिकार्ड भी अपडेट किया जाता है। इसके साथ ही संपत्ति कर/टैक्स एवं भूमि के लेन-देन का रिकार्ड बनाया जाना है।  ताकि सरकार रियल इस्टेट, देशी-विदेशी कंपनी जिससे भी जमीन चाहिए, आसानी से उपलब्ध किया जा सके।

ग्लोबल पूंजी बाजार की व्यवस्था ने भोजन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य को मुनाफा का केन्द्र के रूप में विकसित किया। जिंदगी की इन मूलभूत जरूरतों को निजी पूंजी स्वामित्व के हवाले सरकार ने कर दिया है।  इसके लिए दो बातों की आवश्कता थी पहली-देश के लोकतंत्र एवं लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को समाप्त करना, तथा बाजार में राज्य के हस्तक्षेप को समाप्त करना। दूसरी-प्राकृतिक संसाधनों, जंगल, जमीन, पानी, और खानिज पर कब्जा करना। इसका मूल उद्वेश्य, राष्ट्र और राज्य की संप्रभूता को समाप्त करना और बाजार की पूजिवादी व्यवस्था को मजबूत करना।

आज देश इसी बाजारवादी व्यवस्था को मजबूत करने का काम कर रही है। देश की लोकतंत्रिक व्यवस्था अलोतंत्रिक हो गयी है। अपने आम नागरिकों के कल्याण की जगह काॅरपोरेट घरानो, पूंजीपतियों के कल्याण की चिंता सर्वोपरि होते जा रही है। यही कारण है कि देश के संविधान में प्रावधान अनूसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़े समुदाय के सामुदायिक अधिकारों को खारिज कर काॅरपोरेट के हाथों सौंपा जा रहा है। इनके अस्तित्व को ही खत्म करने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है।  

ंवल्डबैंक सहित अन्य पूंजिपतियों के नजर में पूंजि निवेश और मुकाफा कमाने का सबसे बड़ा साधन अब जंगल, जंमीन, पानी और खानिज बन गया है। इसी के आधार पर वल्डबैंक ने जमीन के खरीद-बिक्री एवं जमीन अधिग्रहण कानूनों की जटिलताओं को सरल करने का प्रयोजन किया है। इस उद्वेश्य की पूर्ति के लिए जमीन, जंगल जो आदिवासी समाज के भूमि व्यवस्था में सामुदायिक संपति है, को व्यत्किगत संपत्ति का दर्जा देने पर जोर लगा रही है। ताकि जमीन, जंगल की खरीद -बिक्री की प्राक्रिया आसान हो। जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान हो। 2014 के बाद वर्तमान केंन्द्र सरकार इसी प्रयोजन के साथ देश के भीतर जमीन, जंगल के खरीद-बिक्री को सरल बनाने के लिए बहुत सारे कानूनों में फेरबदल कर नये-नये नीतियों को अपना रही है। 

यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि देश भर के विस्थापन विरोधी जनअंदोलनों ने लगातार जमीन अधिग्रहण कानून 1894 को काला कानून मानते हुए, इससे खत्म करने की मांग करते रहे। जनअंदोलनों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरणविदों की मांग को देखते हुए तत्कालीन यूपीए(कांग्रेस नेतृत्व) सरकार ने देश के विभिन्न जनआंदोलनो के लीडर, आदिवासी संगठनों के लीडर, परंपरागत आदिवासी, मूलवासी, दिलत, किसान संगठनों के अगुवाओं को बुलाकर कई बार चर्चा के बाद जमीन अधिग्रहण कानून 2013 बनाया था। जिसमें जमीन, जंगल, और पानी पर सामुदाय के परंपरागत अधिकार को बहुत हद तक मान्यता दिया गया है, साथ ही पेसा कानून में प्रावधान, समुदाय के उन प्रावधानों को भी प्रमूखता से जगह मिला है, जिसमें जमीन, जंगल अधिग्रहण करने के पहले परंपरागत गांव/ग्राम सभा की इजाजत जरूरी है। कृषि एवं खाद्य सुरक्षा की गारंटी करने के लिए बहु फसली जमीन के अधिग्रहण पर शक्त प्रतिबंद लगायी गयी है। लेकिन केंन्द्र की बीजेपी सरकार इस कानून को खारिज करते हुए जमीन अधिग्रहण अध्यादेश 2014 लाया था। इसका पूरजोर विरोध देश की जनता ने किया था। केंन्द्र सरकार जनविरोध के कारण कानून तो पास नहीं ंकर सकी, लेकिन राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि जो भी राज्य सरकार इस प्रस्तावित अध्यादेश के आधार पर अपने राज्य में जमीन संबंधाी कानून बनाना चाहेगें, केंन्द्र सरकार उनको सहयोग करेगा। 

केंन्द्र सरकार की दिशा निर्देश पर झारखंड की तत्कालीन रघुवर दास सरकार ने छोटानागपुर कास्तकारी अधिनियम 1908 के धारा 71ए, धारा-21 और संताल परगना कास्तकारी अधिनियम 1949 के धारा 19 में संसोधन करने का अध्यदेश लाया था। इस प्रस्तावित अध्यादेश का राज्य की जनता ने कड़ा विरोध किया। विरोध स्वरूप कुल 221 आवेदन राज्य के आदिवासी, मुलवासी, किसान संगठनों सहित राजनीतिक दलों ने भी तत्कालीन राजपाल श्रीमति द्रोपदी मुर्मूजी का सौंपा। इतने बड़ी संख्या में संसोधन का विरोध को देखते हुए राजपाल द्रोपदी मुर्मूजी ने राज्य सरकार के संसोधन का प्ररूप सरकार को बिना मंजूरी दिये ही वापस कर दी। 

   लेकिन दूसरी ओर राज्य के 24 जिलों के गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाड़ी भूमि, नदी-नाला, झारना, खेल मैदान, सरना, मसना, अखड़ा, चरागाह सहित गांव के सामुदायिक संपत्ति/भूमि के प्लाॅटों को चुन-चुन कर भूमि बैंक में डाल दिया। इस भूमि बैंक के जरिये सरकार निवेशकों को राज्य में आक्रशित करना चाहता है। निवेशकों को जमीन हस्तांत्रित करने में किसी तरह का कठिनाई नहीं हो, इसके लिए सिंगल विंडों सिस्टम बनाया गया। आज जमीन का डिजिटल व्यवस्था ने राज्य के आदिवासी, मुलवासी किसानों के जमीन के रिकाॅर्ड में छेड़छाड़ कर अपने जमीन से रैयतों को बेदखल कर रहा है। जमीन के गलत डिजिटल अपडेट होने के कारण अपने जमीन का मालगुजारी रसीद नहीं काटवा पा रहे हैं। इस व्यवस्था ने आदिवासी, मूलवासी, दलित किसानों को उथल-पुथल कर दिया है। पूरी जिंदगी खेतों में मेहनत कर देश को अन्न खिलाने वाले किसान कई तरह के परेशानियों से घिर गये हैं। 

आदिवासी समुदाय का गैरवशाली गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह, बिच्छु से लड़ कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जल-जंगल-जमीन पर हमारा खूंटकटी अधिकार है। हम यहां के मालिक हैं। जब जब हमारे पूर्वजों द्वारा आबाद इस धरोहर को बाहरी लोगों ने छीनने का प्रयास किया तब-तब यहां विद्रोह उठ खड़ा हुआ। इस राज्य के जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए तिलका मांझी, सिद्वू-कान्हू, फूलो-झाणो, सिंदराय-ंिबंदराय, वीर बिरसा मुंडा, गया मुंडा, माकी मुंडा जैसे वीरों ने अपनी शहादत दी। इन शहीदों के खून का कीमत है-छोटानागपुर कास्तकारी अधिनियम 1908 और संतालपरगना कास्तकारी अधिनियम, कोल्हान क्षेत्र के लिए विलकिनसन रूल बना । इन कानूनों में कहा गया है कि आदिवासी इलाके के जल-जंगल-जमीन पर कोई भी बाहरी व्यक्ति प्रवेष नहीं कर सकता है। यहां के जमीन का मालिक नहीं बन सकता है। हम सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान में हमारे इस क्षेत्र को विषष अधिकार मिला है-यह है पांचवी अनुसूचि क्षेत्र। इसे पांचवी अनुसूची क्षेत्र में जंगल-जमीन-पानी, गांव-समाज को अपने परंपरागत अधिकार के तहत संचालित एवं विकसित एंव नियंत्रित करने को अधिकार 

झारखंड अलग राज्य बने 23 साल हो गये,  इन 23 वर्षो में राज्य को यहां पहुंचा दिया गया कि झारखंड के आदिवासियों और किसानों के सपनो को पूरा करना दिनों दिन कठिन होता जा रहा है। झारखंड को एक ऐसे मुकाम पर पहंुचा दिया गया है जहां भविष्य बहुत अंधकारमय दिखता है। इससे बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता जनसंघर्ष को तेज करना और उसके आधार पर एक नई जनराजनीतिक बहस और चरित्र का निर्माण करना है। हमें यह बताना होगा कि झारखंडी मूल्य और विचार क्या हैं तथा उसे जीवन में किस तरह सार्थक किया जा सकता है। आदिवासी-मूलवासी, दलित समुदाय के संगठित शत्कि की सामुदायिक ताकत की ओर पूरी दुनिया देख रहा है जो सिद्वू-कान्हू, फूलो-झानो, सिंदराय-बिंदराय मानकी, तेलांगा खडिया, वीर बुद्वु भगत, बिरसा मुंण्डा, माकी मुंण्डा और जतरा टाना भगत के शहादती संघर्ष में छिपा हुआ है। जो हमारा इतिहास है, विरासत और पहचान है। 

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Monday, July 27, 2026

रेल बेच दिया, संडक बेच दिया, एयरपोर्ट बेच दिया, रेलवेस्टेशन बेच दिया, बंदरगाह बेच दिया- Ab आदिवासी, किसानों की जमीन बेचने की तैयारी

 रेल बेच दिया, संडक बेच दिया, एयरपोर्ट बेच दिया, रेलवेस्टेशन बेच दिया, बंदरगाह बेच दिया- Ab आदिवासी, किसानों की जमीन बेचने की तैयारी

केंन्द्र सरकार की लैंण्ड रिकाॅर्ड मोर्डनाइजेशन कार्यक्रम का ही एक भाग है

लैंण्ड टाइटलिंग एक्ट 

केंन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद देश के जमीन-जंगल संबंधित कानूनों में कई तरह के बदलाव लाये गये। इसी क्रम में देश में भूमि संबंधी एक नया कानून लाने की योजना बनायी गयी। जो लैंड टाइटलिंग के नाम से जाना जाता है। केंन्द्र सरकार की  इस मसौदा को नीति ओयोग ने 9 सितंबर 2020 को झारखंड सरकार का भेजा था। इसमें राज्य सरकार से सुझाव 3 महीने के भीतर देने को कहा था। इस मसौदा में सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंण्डारी खूंटकटटी अधिकार, विलकिनसन रूल एवं 5वीं अनुसूचि के संबंध में कोई जिक्र नहीं है।  इससे बड़ा और गंभीर सवाल उठता है कि इस लैंण्ड टाइटलिंग एक्ट के लागू होने से सीएनटी, एसपीटी एक्ट एवं 5वीं अनुसूचि में प्रावधान आदिवासी, मूलवासी, किसानों, दलितों के जंगल-जमीन पर परंपरागत एवं संवैधानिक  अधिकार सुरक्षित रहेगें या नहीं?। 

नये कानून पर केंन्द्र की दलील

केंन्द्र सरकार और नीति आयोग का मनना है कि इसे लागू करने के बाद परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान हो जाएगा। प्रस्तावित मसौदा में पूरे देश के लिए एक नयी तकनीकी व्यवस्था को स्थापित करना है, साथ ही स्थापित व्यवस्था के प्रशाकिय शक्ति पर नियंत्रित करना है। लैंण्ड टाइटलिंग कानून के तहत ग्रामीण अंचलो की अचल संपत्तियों (भूमि/भू-खंड़ों ) के नया टाइटल का पंजिकृत करना मुख्य उद्वेश्य है। 

ं केंन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों से राय मांगी थी-

21 सितंबर 2020 को एक पत्र क्ण्व् 6;5द्धध्2017.ॅत् राज्यों को भेजा था, जिसमें 30 सितंबर 2020 तक अपनी मंतव्य भेजने को कहा था। राज्यों से जवाब नहीं मिलने पर नीति आयोग न फिर से राज्य सरकारों के पास पत्र भेजा था। इसमें जमीन संबंधित नया अधुनिकी माॅडल बनाने की बात कही गयी है। यह ड्राफट 301 पेज की है। इसमें 3 माह का समय दिया गया था। कहा गया था कि यदि राज्य सरकार सितंबर माह तक कोई प्रतिक्रिया नहीं भेजती है, तब इसे स्वीकृति के तौर पर माना जाएगा। 

झारखंड के संदर्भ में यहां इन बिंन्दु पर ध्यान देना चाहिए, पहला यहां पांचवी अनुसूचि क्षेत्र होने के नाते इस मसौदा पर आदिवासी सहलाकार परिषद में भी चर्चा होना चाहिए। क्योंकि कानून तौर पर यह मुदा राज्य के जमीन से संबंधित है, इसलिए इसमें जब तक राज्य विधानसभा इसकी स्वीकृति नहीं देगी, केन्द्रीय कानून का राज्य में लागू नहीं किया जा सकता है। 

ंनोट-लैंण्ड टाइटिलिंग व्यवस्था लाने के बाद जमीन विवादों को किसी सिविल अदालतों में भी नहीं ले जाया जा सकता है।  जबकि लोग अपने जमीन संबंधी मामलों को अदालतों ले जाने का अधिकार था। मामला अदालत में जाने के बाद मुकदमा चलता था। लेकिन इस नयी व्यवस्था में किसी मामले को अदालत में चुनौती नहीं दिया जा सकता है। 

Jharkhand ke 5th Scheduled Area Me Land Bank Kyon?

 

Meri Book--Sambhidhan Pradat Adivasi Adhikar Khatre Me --Digital India Me adivasi Adhikar

  अध्याय- Digital India

             महत्वपूर्ण बदलाव आखिर किसके लिए

डिजिटल इंडिया लैंड रिकाॅर्ड अधुनीकिरण ने भारत को बदल रहा है। देश के नियम-कानून को बदल दे रहा है। देश की संघीय व्यवस्था को बदल रहे हैं। परंपरागत गांव का अस्तित्व बदल दिया जा रहा हैं। गांव  ka  भौगोलिक स्थिति और समाज की सामाजिक मूल्य बदल दिया जा रहा है। 

बदलाव होना चाहिए, लेकिन बदलाव लाने का उद्वेश्य क्या है? बदलाव लाने के केंन्द्र में किनको रखा गया है? क्या अमीरों को, पूंजीपतियों को, देश -विदेश के काॅरपोरेट घरानों को या आदिवासी, दलित, किसान, मेहनतकश मजदूरों को? यह सवाल महत्वपूर्ण है। 

जमीन का जो अधुनिकीकरण व्यवस्था स्थापित किया जा रहा है, वह पढे़-लिखे समुदाय के लिए निश्चित तौर पर उपयोंगी साबित होगा। क्योंकि इस व्यवस्था में सारी जानकारियां आॅनलाइन /वेबसाईड में उपलब्ध होगा। इसको उपयोग करने के लिए बहुत सारी जानकारी रखना जरूरी होगा। साथ ही कमप्युटर, लेपटोप, स्मार्ट फोन जरूरी होगा। इसको उपयोग करने के लिए बिजली की उपलब्ध के साथ आॅनलाइन कनेशन /नेटवार्क बिना बाधा के सतत उपलब्धता अतिअवश्यकता होगा। राज्य के अल्पशिक्षित ग्रामीण किसान कों इसका कितना लाभ मिलेगा यह भी विचारणीय बिंन्दु है। 

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 Sabhi Sathiyon ko Johar, Namaskar,

Bahut din ke bad mai Apne Blog me aayi hun, Karan Samajik Jimmedari me Beyasth Rahna. Han Bahut kush Aap Logon se Share Karna hai, mil kar Aage ka safar Tay karenge . 

Prem ke sath Johar, Namaskar.

Saturday, July 25, 2026