A JOURNEY FOR PROTECT EXISTENC.
VOICE OF HULGULANLAND AGAINST GLOBLISATION AND COMMUNAL FACISM. OUR LAND SLOGAN BIRBURU OTE HASAA GARA BEAA ABUA ABUA. LAND'FORESTAND WATER IS OURS.
Wednesday, August 5, 2026
क्या है स्वामित्व योजना?
क्या है स्वामित्व योजना?
केंन्द्र सरकार की यह योजना राष्ट्रीय पंचायती दिवस 24 अप्रैल 2020 को शुरू किया गया था। प्रचायती राज मंत्रालय ही इस योजना को लागू कराने वाला नोडल मंत्रालय है। राज्यों में योजना के लिए राजंस्व/भूलेख विभाग नोडल विभाग है। ड्रोन के जरिये प्राॅपर्टी के सर्वे ंके लिए सर्वे आॅफ इडिया नोडल एजेंसी है। योजना का मकसद है कि ग्रामीण इलाकों की जमीनों का सीमांकन ड्रोन सर्वे टेक्नोलाॅजी के जरिए होगा। इससे ग्रामीण इलाकों में मौजूद घरों के मालिकों के संपत्तियों का मालिकाना हक का एक “प्राॅपर्टी कार्ड ”रिकाॅर्ड बनेगा। वह इसका इस्तेमाल बैंकों से कर्ज लेने के अलावा अन्य कार्यों में भी उपयोग कर सकता है।
आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्राकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शक्तियों का हमला तेज होता जा रहा है
आदिवासी ईलाके में जब अंग्रेज शोषक शासकों, जमींनदारों और इजारेदारों द्वारा आदिवासियों के स्वाशान व्यवस्था पर चारों तरफ से हमला कर दिया था तब बिरसा मुंण्डा ने कहा था देखो-हमारी धरती धूल की तरह उड़ी चली जा रही है। आज वैश्विक पूंजी बाजार में आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्राकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शक्तियों का हमला तेज होता जा रहा है। आदिवासी किसानों के परंपरागत अधिकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, खूंटखटी अधिकार, विलकिनसन रूल, पेसा कानून और 5वीं अनुसूचि में प्रावधान अधिकारों पर काॅरपोरेट कंपनियों का बुलडोजर चल रहा है। विस्थापन की लड़ाई -जंगल, जमीन, खनिज के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ आदिवासी, मूलवासी, किसान, मजदूर समुदाय जाति, धर्म, वर्ग और राजनीति से उपर उठकर संगठित शक्ति बन कर संघर्ष की परंपरा रही है। जो जीत की गारंटी करता था।
लेकिन आज के पूंजीवादी बाजार व्यवस्था में स्वंय देश की कल्याणकारी सरकार देश की संवैधानिक संघीय ढंचों को ध्वस्त करने काम कर रही है। संविधान के लोकतंत्रिक बुनियाद का तहस-नहस कर दिया है। आदिवासी, दलित, किसानों एवं मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों में बहुत सारे संशोधन पूंतीपतियों और कारपोरेट घरानों के हित मे ंकर चुका है। धर्म मानने की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, खत्म हो चुकी है। जो सामुदाय की सामूहिक-संगठित प्रतिरोध की शक्ति को कमजोर करने का बड़ा हथियार सिद्व होता जा रहा है।
देश की वैश्विक नीति विश्व बैंक और काॅरपोरेट घरानों के दिशा निर्देशों, पूंजिपतियों के मुनाफा कमाने की होड़ एवं कल्याणकारी राष्ट्र (देश) एवं राज्य की बदलती भूमिका ने देश के आदिवासी, मूलवासी किसान, दलितों के परंपरागत संवैधानिक अधिकार को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को जहां सरकार विकास का पैमाना मानती है, वहीं निजी पूंजि को भी तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए भूमि की सामुदायिक स्वामित्व के रिकार्ड एवं पंजीयन व्यवस्था को अपने अनूरूप बदल कर भूमि की खरीद-बिक्री में तेजी लाना सरकार अपनी प्राथमिता मानती है। इसके जमीन के सभी परंपरागत भूमि दस्तावेजों, खतियान पार्ट वन, खतियान पार्ट टू, गांव का नक्सा, वीलेज नोट सभी को लैंण्ड रिकार्ड मोडनाईजेशन कार्यक्रम के तहत डिजिटल लैंण्ड पार्सल मैप, बनायी गयी हैै। इस डिजिटल रिकार्ड का संचालन एवं नियंत्रण की जिम्मेवारी एनआईसी को दिया गया है। जिसमें भूमि के मालिकाना का रिकार्ड, संपत्ति कर/टैक्स एवं भूमि के खरीद-बिक्री की प्रक्रिया भी पूरी की जाती है। इस प्रक्रिया में ग्राम सभा, आदिवासी समुदाय, किसानों के सहमति-अहसमति देने-लेने की कोई जगह नहीं है। ताकि सरकार रियल इस्टेट, देशी-विदेशी कंपनी जिससे भी जमीन चाहिए, आसानी से उपलब्ध किया जा सके।
ग्लोबल पूंजी बाजार की व्यवस्था ने भोजन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य को मुनाफा का मूल आधार के रूप में विकसित किया। जिंदगी की इन मूलभूत जरूरतों को निजी पूंजी/ कंपनियों के स्वामित्व के हवाले सरकार ने कर दिया है। इसके लिए दो बातों की आवश्कता थी पहली-देश के लोकतंत्र एवं लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को समाप्त करना, तथा बाजार में राज्य के हस्तक्षेप को समाप्त करना। दूसरी-प्राकृतिक संसाधनों, जंगल, जमीन, पानी, और खानिज पर कब्जा करना। इसका मूल उद्वेश्य, राष्ट्र और राज्य की संप्रभूता को समाप्त करना और बाजार की पूजिवादी व्यवस्था को मजबूत करना।
देश की लोकतंत्रिक व्यवस्था अलोतंत्रिक हो गयी है। अपने आम नागरिकों के कल्याण की जगह काॅरपोरेट घरानो, पूंजीपतियों के कल्याण की चिंता सर्वोपरि होते जा रही है। यही कारण है कि देश के संविधान में प्रावधान अनूसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़े समुदाय के सामुदायिक अधिकारों को खारिज कर काॅरपोरेट के हाथों को मजबूत किया जा रहा है।
ंवल्डबैंक सहित अन्य पूंजिपतियों के द्वारा भोजन, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मौलिक अधिकारों का नीजिकरण के अब मुकाफा कमाने का सबसे बड़ा साधन जंगल, जंमीन और खानिज बन गया है। वल्डबैंक ने जमीन के खरीद-बिक्री एवं जमीन अधिग्रहण कानूनों की जटिलताओं को सरलीकरण करने का प्रयोजन किया है। इस उद्वेश्य की पूर्ति के लिए ही भूमि के दस्तावेजों का डिजिटालाईजेशन किया गया। 5वीं और 6ठी अनुसूचित क्षेत्र में बडे पैमाने पर समाज का समुदायिक भूमि है जिसको गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला, खेल मैदान के रूप में है। साथ ही आदिवासी समुदाय के धर्मिक स्थल सरना, ससनदीरी, जाहेर, जहिरा, बहा सरना, केडा सरना, गुमी सरना, देसाउली है। 2014-15 में ये सभी भूमि केंन्द्र सरकार के निर्देश पर 22 लाख एकड जमीन भूमिबैंक में शामिल कर दिया गया। जिससे सिंगल विंडो सिस्टम से धडले से खरीद-बिक्री हो रहा है।
2020-21 में मोदी सरकार ने 24 ंअप्रैल 2020 को केंन्द्र सरकार ने देश में स्वमित्व योजना लागू करने की घोषणा की। घोषित स्वमि
त्व योजना के तहत डिजिटल इंण्डिया लैंड रिकाॅर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) चलाने की योजना बनायी गयी। इस योजना के तहत ड्रोन से गांवों की संपति का सवेक्षेण कर जीअईएस मानचित्र बनाये जाऐगें। साथ ही जमीन मालिको को प्राॅपटी कार्ड बना कर दिया जाएगा जो 14 डिजिट का होगा। ये जीआईएस नक्से और स्थानीय डेटाबेस ग्राम पंचायतों और और राज्य सरकार के अन्य विभागों द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग किये जाएगें। इस स्वमित्व योजना का कई उदद्वयों के साथ मूल उद्वेश्य एक राष्ट्र एक साॅफटवेयर (व्दम छंजपवद व्दम ैवजिूंतम) व्यवस्था करना है। ( दिशानिर्देश पेज 26)
आखिर यह गडा बदलाव किसके लिए
डिजिटल इंडिया लैंड रिकाॅर्ड अधुनीकिरण ने भारत को बदल रहा है। देश के नियम-कानून को बदल दे रहा है। देश की संघीय व्यवस्था को बदल रहे हैं। परंपरागत गांव का अस्तित्व बदल दिया जा रहा हैं। गांव की भौगोलिक स्थिति और समाज की सामाजिक मूल्य बदल दिया जा रहा है।
बदलाव होना चाहिए, लेकिन बदलाव लाने का उद्वेश्य क्या है? बदलाव लाने के केंन्द्र में किनको रखा गया है? क्या अमीरों को, पूंजीपतियों को, देश -विदेश के काॅरपोरेट घरानों को या आदिवासी, दलित, किसान, मेहनतकश मजदूरों को? यह सवाल महत्वपूर्ण है।
जमीन का जो अधुनिकीकरण व्यवस्था स्थापित किया जा रहा है, वह पढे़-लिखे समुदाय के लिए निश्चित तौर पर उपयोगी साबित होगा। क्योंकि इस व्यवस्था में सारी जानकारियां आॅनलाईन /वेबसाईड में उपलब्ध होगा। इसको उपयोग करने के लिए बहुत सारी जानकारी रखना जरूरी होगा। साथ ही कम्प्युटर, लेपटाॅप, स्मार्ट फोन जरूरी होगा। इसको उपयोग करने के लिए बिजली की उपलब्ध के साथ आॅनलाईन कनेक्शन /नेटवार्क बिना बाधा के सतत उपलब्धता अतिअवश्यकता होगा। राज्य के अल्पशिक्षित ग्रामीण किसान को इसका कितना लाभ मिलेगा यह भी विचारणीय बिंन्दु है।
इस बदलाव से आदिवासी-मूलवासी सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा
गांव के सीमा के भीतर या बाहर के गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास जमीन को भूमि बैंक द्वारा आॅनलाईन किसी को भी हस्तांत्रित करने से, अब गांव की डेमोग्राफी, जियोलाॅजी, जैविक विविधता, विविधता में एकता वाली सामाजिक ताना-बाना, परंपारिक सामाजिक व्यवस्था-पड़हा व्यवस्था, राजी पड़हा, मानकी-मुण्डा, डोकलो-सोहोर, मांझी-परगना व्यवस्था सभी कमजोर हो जाएगा।
इसलिए ऐसा होगा-क्योंकि गांव के बीच में, गांव-टोली-महला के आस पास, या किसानों के ख्.ोत-टांड, के बीच, या अगल-बगल जो भी गैर मजरूआ आम, खास जमीन है, परती भूमि, जंगल-झाड को सरकार किसी भी जाति-समुदाय, या भाषा-संस्कृति के लोगों को हस्तांत्रित कर रही है। इससे एक भाषा-भाषी या जाति समुदाय के बीच अब कोई भी बाहरी समुदाय को बसाने का काम किया जा रहा है।
प्रकृति-पर्यावणीय आदिवासी-मूलवासी गांवों का अस्तित्व खतरे में है।
भूमिं बैंक के लिए -गांव के बीच, खेत-टांड के बीच, गांवों सीमाओं के जिन गैर मजरूआ आम, खास जमीन को चिन्हित किया गया है-उन जमीनों के हस्तांत्रण के बाद उस इलाके में पहले की स्थानीय आबादी केवल नहीं रहेगी, लेकिन बाहर से आने वाली आबाद स्थानीय आबादी से ताकतवर होगी। ऐसे परिस्थिति में उस गांव का परंपारिक भाषा-संस्कृति, रहन-सहन के साथ गांव का नाम भी बदल जाएगा। जैसे कि विकास के नाम पर पूरे झारखंड के गांव गायब होते गये, गांवों का नाम अब नगर, बिहार, पूरी (जैसे अशोक बिहार, कुसुम बिहार, प्रेम नगर, नयन नगर, गंगानगर, जमुनानगर, चनक्यपुरी आदि) में तब्दील होता जा रहा है।
जबकि परंपारिक आदिवासी गांवों का नाम पेड़, पौधों, जंगली जनवरों, नदी, नालों, झरनों, पशु-पक्षियों के नाम से रखा गया है। साथ ही हजारों गांवों का नाम गांव के प्रधान याने गांव बसाने वाले पहला बुजूर्ग के नाम पर नामकरण किया गया है।
बडीबिरिंगा, कनारोंवा, लोवागड़ा, अंबाकोना, डाउकोना, जमटोली, करीमाटी, सिमडेगा, मयोमडेगा, लतापानी, सराईपानी, हेसलाबेड़ा, महाबुआंग, किरीबुरू, बाघलता, सारूबेड़ा, मेघाहातुबुरू, कोयोंगसेरा, बगीसेरा, रंगामाटी, टुटवापानी, जोकिपोखर, सेरेंदआ, सरजोमदआ, कहुपानी, जिलिंगसेरेंग, बिलसेरेंग, महुंवाटांड, कादोपानी, चंपाबहा, जोजोहातु, बुरूहातु, मरंगबुरू, बहाबुरू, गरूड़पीडी, हेसो, निमडीह, जोजोसेरेंग, सरजोमडीह, बकाकेरा, लउाकेरा, महूंवाटोली, बांसटोली, जनुमपीडी, बंडआजयपुर, नामकुम, सियारटोली, आदि.।..
झारखंड 24 जिलों का है। इसमें हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर, कोडरमा, रामगढ, गिरिडीह औधोगिक जिले हैं। यह बाहर से आयी आबादी भी अधिक है। तब स्थनीयता नीति के तहत अब ये भी झारखंडी माने जाएगें और यहां स्थनीय समुदाय को जो सुख-सुविधा राज्य और केंन्द्र सरकार द्वारा मिलता है, इन्हें भी मिलेगा। हां नौकरियों में आरक्षण राज्य की नयी आबादी के आधार पर ही निर्धारण होगा। तब यहां की कुल आबादी में अब आदिवासी-मूलवासियों की आबादी का ग्राफ सबसे नीचे चला जाएगा। एैसे स्थिति में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों की पहचान स्वत ही खत्म हो जाएगी।
झारखंड में लगभग 48-50 नगरीय शहर हैं। जहां हर औद्योगिक शहर में हजारों अपाॅटमेंट बन गया है जहां बडे औद्योगिक घराने और व्यवसायिक घराने की आबादी है। इसमे राज्य से बाहर की आबादी भी बडी संख्या में आकर बसी है। दूसरी ओर शहरीकरण, और उद्योगों, खदानों के कारण स्थानीय आदिवासी-मूलवासी, किसान, मजदूरों की बडी आबादी विस्थापित हो गयी है। जो रोजी-रोटी के लिए अन्य राज्यों में पलायन कर गयी है।
2001 में झारखंड की कुल आबादी का 26.3 प्रतिशत आदिवासी आबादी थी। 2011 के जनगणना के आधार पर राज्य की कुल आबादी का 26.2 प्रतिशत आदिवासी रह गये। याने 10 साल में 1 प्रतिशत आदिवासी घट गये। चिंता का विषय हे कि 2011 के बाद 25 वर्षों में आदिवासी आबादी कितना रहेगा। जिस तेजी से बाहरी आबादी हावी होता जा रहा है।
Wednesday, July 29, 2026
आज वैश्विक पूंजी बाजार में आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्रकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शत्कियों का हमला तेज होता जा रहा है।
MERI BOOK SAMBHIDAN PRADAT ADIVASI ADHIKAR KHATRE ME KI PRASTAWNA
2- प्रस्तावना
आदिवासी ईलाके में जब अंग्रेज शोषक शासकों, जमींनदारों और इजारेदारों द्वारा आदिवासियों के स्वाशान व्यवस्था पर चारों तरफ से हमला कर दिया था तब बिरसा मुंण्डा ने कहा था देखो-हमारी धरती धूल की तरह उड़ी चली जा रही है। आज वैश्विक पूंजी बाजार में आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्रकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शत्कियों का हमला तेज होता जा रहा है। आदिवासी किसानों के परंपरागत अधिकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, खूंटखटी अधिकार, विलकिनसन रूल, पेसा कानून और 5वीं अनुसूचि में प्रावधान अधिकारों पर काॅरपोरेट कंपनियों का बुलडोजर चल रहा है। विस्थापन की लड़ाई -जंगल, जमीन, खनिज के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ समुदाय का संगठित विरोध की परंपरा थी। लेकिन आज के पूंजीवादी इस बाजार व्यवस्था में स्वंय देश की कल्याणकारी सरकार ने आदिवासी, दलित, किसानों एवं मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों में बहुत सारे संशोधन पूंतीपतियों और कारपोरेट घरानों के हित मे ंकर चुके हैं। इसे सामुदाय की सामूहिक-संगठित प्रतिरोध की शक्ति को कमजोर कर दिया गया है।
देश की वैश्विक नीति विश्व बैंक और काॅरपोरेट घरानों के दिशा निर्दशों, पूंजिपतियों के मुनाफा कमाने की होड़ एवं कल्याणकारी राष्ट्र (देश) एवं राज्य की बदलती भूमिका ने देश के आदिवासी, मूलवासी किसान, दलितों के परंपरागत संवैधानिक अधिकार को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को जहां सरकार बढ़ाना चाहती है, वहां निजी पूंजि को भी तेजी से बढ़ावा देती है। इसके लिए भमि स्वामित्व के रिकार्ड एवं पंजीयन व्यवस्था को अपने अनूरूप करके भूमि की खरीद-बिक्री को बढ़ावा देना सरकार अपनी प्राथमिता मानती है। इसके लिए पार्सल मैप बनायी जा रही हैै साथ ही साथ डिजिटल रिकार्ड रखने की व्यवस्था की जा रही है। जिसमें भूमि के मालिकाना का रिकार्ड भी अपडेट किया जाता है। इसके साथ ही संपत्ति कर/टैक्स एवं भूमि के लेन-देन का रिकार्ड बनाया जाना है। ताकि सरकार रियल इस्टेट, देशी-विदेशी कंपनी जिससे भी जमीन चाहिए, आसानी से उपलब्ध किया जा सके।
ग्लोबल पूंजी बाजार की व्यवस्था ने भोजन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य को मुनाफा का केन्द्र के रूप में विकसित किया। जिंदगी की इन मूलभूत जरूरतों को निजी पूंजी स्वामित्व के हवाले सरकार ने कर दिया है। इसके लिए दो बातों की आवश्कता थी पहली-देश के लोकतंत्र एवं लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को समाप्त करना, तथा बाजार में राज्य के हस्तक्षेप को समाप्त करना। दूसरी-प्राकृतिक संसाधनों, जंगल, जमीन, पानी, और खानिज पर कब्जा करना। इसका मूल उद्वेश्य, राष्ट्र और राज्य की संप्रभूता को समाप्त करना और बाजार की पूजिवादी व्यवस्था को मजबूत करना।
आज देश इसी बाजारवादी व्यवस्था को मजबूत करने का काम कर रही है। देश की लोकतंत्रिक व्यवस्था अलोतंत्रिक हो गयी है। अपने आम नागरिकों के कल्याण की जगह काॅरपोरेट घरानो, पूंजीपतियों के कल्याण की चिंता सर्वोपरि होते जा रही है। यही कारण है कि देश के संविधान में प्रावधान अनूसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़े समुदाय के सामुदायिक अधिकारों को खारिज कर काॅरपोरेट के हाथों सौंपा जा रहा है। इनके अस्तित्व को ही खत्म करने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है।
ंवल्डबैंक सहित अन्य पूंजिपतियों के नजर में पूंजि निवेश और मुकाफा कमाने का सबसे बड़ा साधन अब जंगल, जंमीन, पानी और खानिज बन गया है। इसी के आधार पर वल्डबैंक ने जमीन के खरीद-बिक्री एवं जमीन अधिग्रहण कानूनों की जटिलताओं को सरल करने का प्रयोजन किया है। इस उद्वेश्य की पूर्ति के लिए जमीन, जंगल जो आदिवासी समाज के भूमि व्यवस्था में सामुदायिक संपति है, को व्यत्किगत संपत्ति का दर्जा देने पर जोर लगा रही है। ताकि जमीन, जंगल की खरीद -बिक्री की प्राक्रिया आसान हो। जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान हो। 2014 के बाद वर्तमान केंन्द्र सरकार इसी प्रयोजन के साथ देश के भीतर जमीन, जंगल के खरीद-बिक्री को सरल बनाने के लिए बहुत सारे कानूनों में फेरबदल कर नये-नये नीतियों को अपना रही है।
यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि देश भर के विस्थापन विरोधी जनअंदोलनों ने लगातार जमीन अधिग्रहण कानून 1894 को काला कानून मानते हुए, इससे खत्म करने की मांग करते रहे। जनअंदोलनों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरणविदों की मांग को देखते हुए तत्कालीन यूपीए(कांग्रेस नेतृत्व) सरकार ने देश के विभिन्न जनआंदोलनो के लीडर, आदिवासी संगठनों के लीडर, परंपरागत आदिवासी, मूलवासी, दिलत, किसान संगठनों के अगुवाओं को बुलाकर कई बार चर्चा के बाद जमीन अधिग्रहण कानून 2013 बनाया था। जिसमें जमीन, जंगल, और पानी पर सामुदाय के परंपरागत अधिकार को बहुत हद तक मान्यता दिया गया है, साथ ही पेसा कानून में प्रावधान, समुदाय के उन प्रावधानों को भी प्रमूखता से जगह मिला है, जिसमें जमीन, जंगल अधिग्रहण करने के पहले परंपरागत गांव/ग्राम सभा की इजाजत जरूरी है। कृषि एवं खाद्य सुरक्षा की गारंटी करने के लिए बहु फसली जमीन के अधिग्रहण पर शक्त प्रतिबंद लगायी गयी है। लेकिन केंन्द्र की बीजेपी सरकार इस कानून को खारिज करते हुए जमीन अधिग्रहण अध्यादेश 2014 लाया था। इसका पूरजोर विरोध देश की जनता ने किया था। केंन्द्र सरकार जनविरोध के कारण कानून तो पास नहीं ंकर सकी, लेकिन राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि जो भी राज्य सरकार इस प्रस्तावित अध्यादेश के आधार पर अपने राज्य में जमीन संबंधाी कानून बनाना चाहेगें, केंन्द्र सरकार उनको सहयोग करेगा।
केंन्द्र सरकार की दिशा निर्देश पर झारखंड की तत्कालीन रघुवर दास सरकार ने छोटानागपुर कास्तकारी अधिनियम 1908 के धारा 71ए, धारा-21 और संताल परगना कास्तकारी अधिनियम 1949 के धारा 19 में संसोधन करने का अध्यदेश लाया था। इस प्रस्तावित अध्यादेश का राज्य की जनता ने कड़ा विरोध किया। विरोध स्वरूप कुल 221 आवेदन राज्य के आदिवासी, मुलवासी, किसान संगठनों सहित राजनीतिक दलों ने भी तत्कालीन राजपाल श्रीमति द्रोपदी मुर्मूजी का सौंपा। इतने बड़ी संख्या में संसोधन का विरोध को देखते हुए राजपाल द्रोपदी मुर्मूजी ने राज्य सरकार के संसोधन का प्ररूप सरकार को बिना मंजूरी दिये ही वापस कर दी।
लेकिन दूसरी ओर राज्य के 24 जिलों के गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाड़ी भूमि, नदी-नाला, झारना, खेल मैदान, सरना, मसना, अखड़ा, चरागाह सहित गांव के सामुदायिक संपत्ति/भूमि के प्लाॅटों को चुन-चुन कर भूमि बैंक में डाल दिया। इस भूमि बैंक के जरिये सरकार निवेशकों को राज्य में आक्रशित करना चाहता है। निवेशकों को जमीन हस्तांत्रित करने में किसी तरह का कठिनाई नहीं हो, इसके लिए सिंगल विंडों सिस्टम बनाया गया। आज जमीन का डिजिटल व्यवस्था ने राज्य के आदिवासी, मुलवासी किसानों के जमीन के रिकाॅर्ड में छेड़छाड़ कर अपने जमीन से रैयतों को बेदखल कर रहा है। जमीन के गलत डिजिटल अपडेट होने के कारण अपने जमीन का मालगुजारी रसीद नहीं काटवा पा रहे हैं। इस व्यवस्था ने आदिवासी, मूलवासी, दलित किसानों को उथल-पुथल कर दिया है। पूरी जिंदगी खेतों में मेहनत कर देश को अन्न खिलाने वाले किसान कई तरह के परेशानियों से घिर गये हैं।
आदिवासी समुदाय का गैरवशाली गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह, बिच्छु से लड़ कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जल-जंगल-जमीन पर हमारा खूंटकटी अधिकार है। हम यहां के मालिक हैं। जब जब हमारे पूर्वजों द्वारा आबाद इस धरोहर को बाहरी लोगों ने छीनने का प्रयास किया तब-तब यहां विद्रोह उठ खड़ा हुआ। इस राज्य के जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए तिलका मांझी, सिद्वू-कान्हू, फूलो-झाणो, सिंदराय-ंिबंदराय, वीर बिरसा मुंडा, गया मुंडा, माकी मुंडा जैसे वीरों ने अपनी शहादत दी। इन शहीदों के खून का कीमत है-छोटानागपुर कास्तकारी अधिनियम 1908 और संतालपरगना कास्तकारी अधिनियम, कोल्हान क्षेत्र के लिए विलकिनसन रूल बना । इन कानूनों में कहा गया है कि आदिवासी इलाके के जल-जंगल-जमीन पर कोई भी बाहरी व्यक्ति प्रवेष नहीं कर सकता है। यहां के जमीन का मालिक नहीं बन सकता है। हम सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान में हमारे इस क्षेत्र को विषष अधिकार मिला है-यह है पांचवी अनुसूचि क्षेत्र। इसे पांचवी अनुसूची क्षेत्र में जंगल-जमीन-पानी, गांव-समाज को अपने परंपरागत अधिकार के तहत संचालित एवं विकसित एंव नियंत्रित करने को अधिकार
झारखंड अलग राज्य बने 23 साल हो गये, इन 23 वर्षो में राज्य को यहां पहुंचा दिया गया कि झारखंड के आदिवासियों और किसानों के सपनो को पूरा करना दिनों दिन कठिन होता जा रहा है। झारखंड को एक ऐसे मुकाम पर पहंुचा दिया गया है जहां भविष्य बहुत अंधकारमय दिखता है। इससे बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता जनसंघर्ष को तेज करना और उसके आधार पर एक नई जनराजनीतिक बहस और चरित्र का निर्माण करना है। हमें यह बताना होगा कि झारखंडी मूल्य और विचार क्या हैं तथा उसे जीवन में किस तरह सार्थक किया जा सकता है। आदिवासी-मूलवासी, दलित समुदाय के संगठित शत्कि की सामुदायिक ताकत की ओर पूरी दुनिया देख रहा है जो सिद्वू-कान्हू, फूलो-झानो, सिंदराय-बिंदराय मानकी, तेलांगा खडिया, वीर बुद्वु भगत, बिरसा मुंण्डा, माकी मुंण्डा और जतरा टाना भगत के शहादती संघर्ष में छिपा हुआ है। जो हमारा इतिहास है, विरासत और पहचान है।
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Monday, July 27, 2026
रेल बेच दिया, संडक बेच दिया, एयरपोर्ट बेच दिया, रेलवेस्टेशन बेच दिया, बंदरगाह बेच दिया- Ab आदिवासी, किसानों की जमीन बेचने की तैयारी
रेल बेच दिया, संडक बेच दिया, एयरपोर्ट बेच दिया, रेलवेस्टेशन बेच दिया, बंदरगाह बेच दिया- Ab आदिवासी, किसानों की जमीन बेचने की तैयारी
केंन्द्र सरकार की लैंण्ड रिकाॅर्ड मोर्डनाइजेशन कार्यक्रम का ही एक भाग है
लैंण्ड टाइटलिंग एक्ट
केंन्द्र में मोदी सरकार आने के बाद देश के जमीन-जंगल संबंधित कानूनों में कई तरह के बदलाव लाये गये। इसी क्रम में देश में भूमि संबंधी एक नया कानून लाने की योजना बनायी गयी। जो लैंड टाइटलिंग के नाम से जाना जाता है। केंन्द्र सरकार की इस मसौदा को नीति ओयोग ने 9 सितंबर 2020 को झारखंड सरकार का भेजा था। इसमें राज्य सरकार से सुझाव 3 महीने के भीतर देने को कहा था। इस मसौदा में सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंण्डारी खूंटकटटी अधिकार, विलकिनसन रूल एवं 5वीं अनुसूचि के संबंध में कोई जिक्र नहीं है। इससे बड़ा और गंभीर सवाल उठता है कि इस लैंण्ड टाइटलिंग एक्ट के लागू होने से सीएनटी, एसपीटी एक्ट एवं 5वीं अनुसूचि में प्रावधान आदिवासी, मूलवासी, किसानों, दलितों के जंगल-जमीन पर परंपरागत एवं संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहेगें या नहीं?।
नये कानून पर केंन्द्र की दलील
केंन्द्र सरकार और नीति आयोग का मनना है कि इसे लागू करने के बाद परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान हो जाएगा। प्रस्तावित मसौदा में पूरे देश के लिए एक नयी तकनीकी व्यवस्था को स्थापित करना है, साथ ही स्थापित व्यवस्था के प्रशाकिय शक्ति पर नियंत्रित करना है। लैंण्ड टाइटलिंग कानून के तहत ग्रामीण अंचलो की अचल संपत्तियों (भूमि/भू-खंड़ों ) के नया टाइटल का पंजिकृत करना मुख्य उद्वेश्य है।
ं केंन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों से राय मांगी थी-
21 सितंबर 2020 को एक पत्र क्ण्व् 6;5द्धध्2017.ॅत् राज्यों को भेजा था, जिसमें 30 सितंबर 2020 तक अपनी मंतव्य भेजने को कहा था। राज्यों से जवाब नहीं मिलने पर नीति आयोग न फिर से राज्य सरकारों के पास पत्र भेजा था। इसमें जमीन संबंधित नया अधुनिकी माॅडल बनाने की बात कही गयी है। यह ड्राफट 301 पेज की है। इसमें 3 माह का समय दिया गया था। कहा गया था कि यदि राज्य सरकार सितंबर माह तक कोई प्रतिक्रिया नहीं भेजती है, तब इसे स्वीकृति के तौर पर माना जाएगा।
झारखंड के संदर्भ में यहां इन बिंन्दु पर ध्यान देना चाहिए, पहला यहां पांचवी अनुसूचि क्षेत्र होने के नाते इस मसौदा पर आदिवासी सहलाकार परिषद में भी चर्चा होना चाहिए। क्योंकि कानून तौर पर यह मुदा राज्य के जमीन से संबंधित है, इसलिए इसमें जब तक राज्य विधानसभा इसकी स्वीकृति नहीं देगी, केन्द्रीय कानून का राज्य में लागू नहीं किया जा सकता है।
ंनोट-लैंण्ड टाइटिलिंग व्यवस्था लाने के बाद जमीन विवादों को किसी सिविल अदालतों में भी नहीं ले जाया जा सकता है। जबकि लोग अपने जमीन संबंधी मामलों को अदालतों ले जाने का अधिकार था। मामला अदालत में जाने के बाद मुकदमा चलता था। लेकिन इस नयी व्यवस्था में किसी मामले को अदालत में चुनौती नहीं दिया जा सकता है।
Meri Book--Sambhidhan Pradat Adivasi Adhikar Khatre Me --Digital India Me adivasi Adhikar
अध्याय- Digital India
महत्वपूर्ण बदलाव आखिर किसके लिए
डिजिटल इंडिया लैंड रिकाॅर्ड अधुनीकिरण ने भारत को बदल रहा है। देश के नियम-कानून को बदल दे रहा है। देश की संघीय व्यवस्था को बदल रहे हैं। परंपरागत गांव का अस्तित्व बदल दिया जा रहा हैं। गांव ka भौगोलिक स्थिति और समाज की सामाजिक मूल्य बदल दिया जा रहा है।
बदलाव होना चाहिए, लेकिन बदलाव लाने का उद्वेश्य क्या है? बदलाव लाने के केंन्द्र में किनको रखा गया है? क्या अमीरों को, पूंजीपतियों को, देश -विदेश के काॅरपोरेट घरानों को या आदिवासी, दलित, किसान, मेहनतकश मजदूरों को? यह सवाल महत्वपूर्ण है।
जमीन का जो अधुनिकीकरण व्यवस्था स्थापित किया जा रहा है, वह पढे़-लिखे समुदाय के लिए निश्चित तौर पर उपयोंगी साबित होगा। क्योंकि इस व्यवस्था में सारी जानकारियां आॅनलाइन /वेबसाईड में उपलब्ध होगा। इसको उपयोग करने के लिए बहुत सारी जानकारी रखना जरूरी होगा। साथ ही कमप्युटर, लेपटोप, स्मार्ट फोन जरूरी होगा। इसको उपयोग करने के लिए बिजली की उपलब्ध के साथ आॅनलाइन कनेशन /नेटवार्क बिना बाधा के सतत उपलब्धता अतिअवश्यकता होगा। राज्य के अल्पशिक्षित ग्रामीण किसान कों इसका कितना लाभ मिलेगा यह भी विचारणीय बिंन्दु है।
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