करम त्योहार को कई तरह से मना सकते हैं। मैंने करम त्योहार को अलग तरह से जीया हैं-इससे आप लोगों को साझा कर रही हुं।
आदिवासी समाज आज कई तरह के सवालों के घेरे में स्वंय को खड़ा पा रहा है। हम कभी हम ही मना सकते हैं सरहूल तुम नहीं। तो कभी हम ही मना सकते हैं करम त्योहार तुम नहीं। हम असली आदिवासी-तुम नकली। यह मौसम करम त्योहार मनाने का है। हिन्दू धर्म की अस्था में सभी तरफ पुजा पंडालें सजने लगी है। भारत देश की संविधान सभी जाति-धर्म को अपना अस्था से किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता देता है। कमडारा अरहरा गांव आदिवासी भूईहरी ईलाका है। जो गुमला, पालकोट, बसिया, सिसई, सिसई से सटा क्षेत्र है। जो आदिवासी इतिहास में ढोंयसागढ क्षेत्र में था। यह ईलाका पालकोट राजा और जरिया राजा का प्रभाव क्षेत्र रहा है। जहां जमींदारों का बोल-बाला था। यही कारण है कि यहां सदरी भाषा /नागपुरी का जब्रजस्त प्रभाव रहा है। मुंण्डा आदिवासी समाज कोई गांव राईज करम मनाते हैं, तो कोई गांव ढिढरा करम। करम के मौसम में गांव-गांव अखड़ा में करम की तैयारी में मांदर की आवाज से समूचा आदिवासी इलाका गुंज उठता था। दिनभर खेत में काम करने, गाय-बकरी चराने के बाद खाना खाने के बाद गांव के युवक मांदर लेकर अखडा पहुंचते थे। बस एक मांदर की आवास, देखते-देखते सभी टोला-महला से युवक मांदर के साथ अखडा में हाजिर। अब मांदर की गुंज सभी को अखडा में खिंच लाता।
याद है करम नाच के हर स्टेप के अपना गीत और लय होता है। मांदर के हर थाप का अपना ताल, होता है। मांदर के हर थाप के साथ गीत के राग-लय अलग-अलग होता है। मांदर के ताल के साथ नाच रही महिलाओं के गीत लय में पूरा गांव सराबोर रहता है। सभी गीत व्यक्ति, समाज के साथ पूरी आदिवासी सामुदायिक जीवन शैली को संबोधन करता है। जो एक व्यक्ति को दूसरे जोड़ता है। गीत का हर शब्द -हर बोल और लय एक समाज को दूसरे से जोडता है। आदमी को पूरे प्रकृति और पर्यावरण से जोडता है। कोई उंच-नीच नहीं। सभी गीत अपने इतिहास, घटनाओं और प्रकृतिक जीवन मूल्यों को अभिव्यक्त करता है। जो आदिवासी समुदाय के जंगल-झाड़ी को साफ करने, गांव बसाने के साथ जंगल-जमीन पर अपना खूंटकटी हक का याद दिलाता है।
करम गीतों में जीवंत आदिवासी जमीन शैली-
गुमला जिला के कमडारा प्रखंड के अरहरा गांव मुंडा आदिवासी बहुल गांव है। जो चटकपुर, करंजटोली, भादुल टोली, ठिकेदार टोली और बजार टोली और बड़का टोली इन 6 टोलों में फैला हुआ है। बडका टोली और करंज टोली के बीच से रांची-राउरकेला रेलवे लाईन गुजरती है। करम अखड़ा बडका टोली में है। मेरा जन्म बड़का टोली में हुआ। अरहरा गांव में पहले जमींनदारों का बोल-बाला था। उनके नाते-रिस्तेदारों में चीक-बडाईक परिवार को माना जाता था। इसी में चैकीदार और ओहदार भी होते थे।
बाजार टोली में घांसी-बजनिया परिवार रहता था। यहीं एक लोहरा परिवार भी थां। दो-तीन परिवार झोरा -नाविक थे। बड़का टोली में एक परिवार हरियर का था। जिसके साथ गांव के सदान और मुंण्डा परिवार छुआछूत मानते थे। मुंण्डा आदिवासी समुदाय का करम अखड़ा से सटा हुआ उत्तर दिशा में हिरयर बुढा का घर था। अखडा से सटा पश्चिम दिशा में मोहन चीक बड़ाईक का घर था। अखडा से सटा -पश्चिम-दक्षिण कोणा में मेरा परिवार-बोयसा और जुरा बरला का घर। अखडा से सटा ठीक दक्षिण में लादूरा का घर।
इन सभी परिवार का आंगन करम अखडा ही था। अखडा के किनारे एक हरियर बुढा के आंगन की सीमा पर बड़ा सा ईमली पेड़ अभी भी है। अखडा के पूरब-दक्षिण में डुगरू पाहन का घर सीमा पर दूसरा ब़डा ईमली पेड। दोनों पेड के नीचे एक-एक बड़ा पत्थर का बिछा बेंच था। जहां सभी आकर बैठते थे। करम के मौसम में पूरा अखडा बच्चे, युवक-युवातियो, महिला-पुरूष, बुढे-बुढियों से भरा होता। रात भर मांदर की गुज और गीत से पूरा गांव गुंज उठता था।
मुझे याद है- मांदर बजाते आबा गीत गाया करते थै-
1-बोने के बोने में
झालि मिंजुरा...रे
बोने के बोने में..2
झालि मिंजूरा रे
बोने में झालिया मिंजूर रे
सोभाय रे...
बोने में झालिया मिंजुर सोभाय....2
(जंगल-जंगल में मोरपंख फैलाया मोर पंक्षी
ज्ंागल मोर पक्षी से ही सोभायमान है )
मां हमेशा गुनगुनाती थी-करम गीत। निश्चित रूप आज मैं महसूस करती हुं मां मेरे लिए ही गाती थी। गांव के सीमा पर कारो नदी जब बरसात में भर जाता था-नदी पार करने के लिए झोरा -नाविक अपने नाव पर लोगों को पार करते थे।
1-एके गोटन बेटी
कोईल पारे दियालों
गुनी...गुनी......
को0 -गुनी...गुनी निंदों नहीं आवाय...
हायरे दाईया.....गुनी गुनी निदों नहीं आवाय..
2-हारे पार काइर देरे रे
झोरा रे भाईया ... गुनी...गुनी
गुनी 2
गुनी-बुझी निंदो नहीं आवै
2-हारे पार काईर देरे
झोरा रे भाईया
डाली टाका -डाली टाका
फिराईयो देबुं हारे दाईया...2
(सार है-एक ही मेरी प्यारी बेटी है। उसको कोईल नदी के उस पार शादी दिये हैं। बरसात में नदी भर गया है। बेटी का याद दिन-रात सता रहा है। हे नाविक भाई आप नदी पार कर दीजिए, आप को पार करने का कीमत चुका देगें)
करम मौसम मे दोपर को गाय-बकरी चराने वाले और खेत में काम करने वाले युवक खाने के लिए घर लाने के बाद युवक मांदर बजा कर अपनी थकान मिटाते, मनोरंजन करते थे। मांदर की आवाज सुन सभी जान जाते थे कि फलाना आ गया है। ंहमेशा गीत सुनती थी-
1-मांदर जे किनाले लालू भैया रे...
जानी किनाले के लगी...रे
जानी किनाले के लागी...
2-से मांदर फंुटी गेलैंय लालू भाईया रे
जानी मोराले के लागी...रे
जानी मोराले के लागी
गांव का जमीन साहुकारों द्वारा छीन लेने के बाद बाबा लापा गांव में धांगर-नौकर हो गया। मां और मझिला भाई रांची चले आये। मां पंजाबी परिवार में दाई का काम करने लगी। भाई रांची में कुली का काम करने लगा। मैं भी 8वी पास कर रांची आ गयी। संत मारग्र्रेट हाई स्कूल में नाम लिखायी। 10वी क्लास मेे छात्रवृति मिला था। बिजय दादा गांव में अकेले था। छात्रवृति के पैसा से मैंने दादा के लिए गुमला मांदर खरीद दी थी। वह उसे बजाया करता था। जब भी मैं गांव आती थी तो मांदर को खुद भी बजाती और बादा को भी बजवाती थी।
सभी गांवों में अखडा ईमली पेड के पास ही होता था। अरहरा में अखडा के किनारे दो बडा-बडा ईमली का पुराना पेडं अभी भी है। करम मौसम में अकसर ही बारिश होता है । बारिश भी रिझवारों को रोक नहीं पाता है। मांदर की गुंज के साथ गीत .लोग झूमने लगते
1-..रिमिझिमि तेतारी छाईयां....
ना हारे धिरे चालू ...
रासे चलो मदोना....ना हारे धिरे चालु
रासे चलु....
सार - रिमझिम बारिश हो रहा है...ईमली गाछ के नीचे अखडा में अस्तिे-झुमते हम नाचें।
बहन-भाई का अटुट प्यार करम गीत में-
गोडे का झोटिया
गिर पार...लक
दादा हेरालों-2
हाय-हाय खोईज लाइन दे दादा
बिझ-लाइन दे दादा हेरालों-2
सार-मेरा पैर का छुटिया-बिझिया कहीं गिर गया है, खो गया है। दादा-बडा भाई आप खोज कर ला दीजिए, मेरा बिझिया कहीं गिर गया हे।
गांव के धान के खेतों में पहले खखडा और मच्छली बहुत होते थे। बारिश अच्छी होती थी। खेतों और नाला -डोफा में साफ पानी बहते रहता था। पानी में छोटी मच्छलियां झांड में इधर-उधर तैरते खेलते रहती थी। इससे करम गीत में गाते हैं--
1-बुदु रे बुदु मझाइर
बुदु मछाइर समधिन
जेराय रे
बुदु मछाईर समधिन जोराय
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ब्रसात दिनों में गांव में बहुत तरह का साग-पात स्वतः खेतों में उग आता है। कुछ गोडा-मडुआ खेत में लगाया जाता है-जो गांव के लोगों के लिए पौष्टिक आहार है-इसे भी करम गीत में गाते हैं-
साग तियन लुटुर पुटुर
बरी तियन छोरे छोरे रे
बरी तियन छोरे छोर
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आदिवासी गांव जंगल-पहाडो की तराई में बसा हुआ है। इस प्रकृतिकमूलक जीवनशैली का अंग साथ रचंे-बसे सभी समुदाय हैं। जिनका रिस्ता करम गीत में भी गाते हैं-
1-कोईलो किनारे बसाले हो राजा
कोईलों किनारे बसाले हो राजा
कोईलो निरामाला सोभाए रे
कोईलो निरामाला सोभाए-2
2-काठ केरा डोंगा
बंांस केरा डांग रे-2
झोरा भाईया रिझे
डोंगा चलाऐ रे झोरा भाईया
रिझे डोगा चलाए-2
जब मेरी मां रांची शहर आ कर रोटी के लिए पंजाबी परिवार में आया का काम करती थी। उनके मलकिन ने एक पुराना लाइलुन साडी दी थी मां को। जो एक-दो जगह थोडा फटा हुआ था। मैं पहली बार करम के दिन उसी साडी को पहन कर अखडा में अपने साथियों के साथ करम नाची थी। साडी बार बार फिसल रहा था और पैर फंस जा रहा था। मन में खुशी था कि मैं भी साडी पहनी हुं।
रात भर करम नाचने के बाद सुबह गांव की सभी महिलाएं अपने अपने घर से कांसा लोटा में पानी, साल का ताजा दतुवन, साल पत्ता पर मोड कर भांप में पकाया धान की रोटी, साल पाता में सिंदुर और धवन लेकर अखडा मे ंआयी। मां रांची में थी। मा के बदले मुझे ही करम राजा के लिए उपरोक्त सारा चीज लायी। महिलाएं जैसे जैसे कर रही थी मैं सेवा की।
ग्लाॅशोप मेमोरियल उच्च विद्यालय कमडारा से आठवीं क्लास पास करने के बाद मैं रांची आ गयी। कारण की घर में बहुत दिक्कत था। मां ने मेरा एकमिशन नौंवीं क्लास में संत माग्रटेस बालिका विद्यालय में करा दी। आॅक्टोबर का महिना था। स्कूल में नमाही परीक्षा चल रहा था। जिस दिन मेरा परीक्षा खत्म हुआ, उसी दिन मेरा गांव अरहरा में करम त्योहार था।
4 बजे स्कूल से निकलने के बाद मैं सुशील दादा से जिद करने लगी-चलो गांव करम के लिए। मेरे जिद के सामने दादा मजबूर थे। हम दोनों गांव जाने के लिए खजूर तालाब के पास आए। पता चला सिमडेगा की ओर जाने वाली अभी कोई गाडी नहीं है। फिर भी मैं जिद कर रही थी -जाएगें ही। रांची से राउरकेला रेलवे लाईन से पासिंजर ट्रेन और मालगाडी आती-जाती है। हम लोग राउरकेला पेसेंजर गाडी से हमेशा बकसपुर स्टेशन पर चढ़ कर हदिया आते थे। हटिया से रांची बस से आते थे। मैं कभी बस रोड़ से यात्रा नहीं की थी। यह भी पता नहीं था कि कितना -कितना बजे बस गाडी तोरपा की ओर जाती है।
थोडी देर में एक टेकर आयी ।हम दोनों गाडी पर चढ कर खूंटी पहूंचे। हम दोनों शायद नीचे चैक में उतरे। वहां से आगे जाने के लिए कोई गाडी नहीं था। हम दोनों पैदल थोडा दूर गये ।अंधकार हो चुका था। खूंटी की ओर से गाडी आने की रोशनी दिखाई दी। हम दोनों रूक कर इंतजार करने लगे। गाडी सामने पहूंची। वह बडां बंद गाडी था। लिखा था-डेंजर। हाथ दिये-गाडी रूकी।
हम दोनों को पूछा कहां जाओगे। बताये पोकला जाएंगें। बोला आओ कहते गाडी का दरवाजा खोल दिया। गाडी पर चढे सामने डाईभर के पास। गाडी में दो पुरूष थे, एक गाडी चला रहा था और एक उसके पीछे लंबा सीट पर बैठा थां। पीछे बैठा था वह कम उम्र का था।
गाडी अहिस्ते अहिस्ते चल रहा था। करीब आधी रात को पकना पहुंचे होगें। गाडी रूक गयी। वो लोग बोले हम लोग खाना खा लेगें। दोनो उत्तर गये ।हम दोनों गाडी में बैठे रहे। करीब एक-डेढ घंण्टा के बाद एक आदमी आया और बोला आप दोनों को खाने के लिए बुला रहे हैं। हम दोनों नहीं गये। थोडी देर बाद दो प्लेट में रोटी और मीट एक लडका लेकर आया। हम दोनों तय कर लिए थे कि कुछ नहीं खाना है।
प्लेट हम दोनों नहीं लिए। थोडी देर बाद दोनों वापस आये। गाडी चलना शुरू हो गया। दस-बादह मिनट के बाद गाडी चला रहा व्यक्ति उसका साथी को बोला, लो अब तुम गाडी चलाओ। पीछे बैठा लडका आगे गया और चलाने लगा। पहले जो चला रहा था वह पीछे आ कर बैठ गया। अब मेरे बगल आकर बैठ गया। हम दोनों को अभास हो गया था। दादा किनारे दरवाजा के पास बैठा था मैं बगल में थी।
हम दोनों उन लोगों का मानसिकता को समझ गये। दादा बोला मुंण्डारी -अपना भाषा में। तुम इधर घसको दरवाजा के तरफ, मैं उधर घसक गयी। दादा मेरे तरफ आ गया। वा आदमी दादा से बोलने लगा-तुम अपनी बहन के मेरे हवाले कर दो, नही ंतो ठीक नहीं होगा। मेरे के नीचे दो-तीन लोहा का तलवार की तरह हथियार था दिखाते हुए बोलने लगा जब जरूरत होता है तो इसका इस्तमाल करते हैं।
पीछे बैठा आदमी बोला-गाडी रोको, गाडी आगे नहीं जाएगी। गाडी रूक गया। दादो एक हाथ से गाडी का दरवाजा खोल कर मुझको गाडी से नीचे ढकेल दिया। मैं नीचे उतरते ही आगे की ओर भागने लगी। मेरे पीछे दादो भाग रहा था। पूरा अंधकार था। रास्ता भी अनजान था। हम दोनों थोडी दूर भागे ही थे कि गाडी स्र्टाट कर लाईट मारते हम दोनों के पीछे आने लगा। हम दोनों को पकड लेगा यह दिमाग में आते ही दादा बोला-चलो धान खेत में घुसो।
रोड के दहिनी ओर धान का खेत था। रोड से ही धान खेत में कुद गये। खेत रोड के किनारे ही था लेकिन बहुत नीचे था। जैसे ही धान खेत में मैं छलांग लगायी, मेरा सिर नीचे ओर पैर उपर मेंड के सहारे खडा हो गया। गाडी करीब आ रहा था। मन में डर था मेरा पैर को देख लेगा। मैं धान का पौधा का मजबूती के साथ पकडी और नीचे कादो माटी में पैर जमा कर पानी खेत में खडी हो गयी। मेरा पैर का चप्पल पैर से अलग हो चुका था धान खेत में।
धान के पौधा मेरे सिर से उंचा था। खेत के नाला से बहता पानी का आवाज आ रहा था। धान खेत के अंदर अंदर बढते हुए खेत के दूसरी छोर मेंड पर पहुंचे। दादा ने अहिस्ता से आवाज दिया-किधर हो रे। मैं जवाब दी-इधर हुं। रोड से दो -तीन खेत आगे निकलने के बाद हम दोनों मिले। मेंड के सहारे कई खेतों को पार कर टांड में पहुंचे जो रोड से आधा कोस दूर होगा। टांड में पहंुंचते ही पूरब दिशा में चांद पूरी रोशनी के साथ आकाश में दिखाई दिया। चांद की रोशनी मे ंहम दोनों रोड़ से दूर अनुमान से पोकला गांव की ओर बढ़े।
हम दोनों एक छोटा नाला के पास पहुंचे। नाला में पानी बह रहा था। नाला के उस पार उंचा ढलान था। ढलान चढ़ते समय बार बार फिसकर नीचे चली जाती थी। लाल गुडगुड पत्थरीला ढलान था। खाली पैर पर गुडगुड कंकड के घर्षण से थोड़ा लहर महसुस होने गया था। बहुत प्रयास के बाद एक कांसी का पौधा पक डपायी। इसके सहारे उपर चढ गयी। थोडा दूर चलने के बाद लगा अब हम दोनों पोकला सीमान पहुंच गए हैं। अब खतरा से बाहर महसूस करने लगे। रेलवे स्टेशन के पास पुराना बाजार टांड पहुंचे ही थे कि मुंर्गा के बांक की आवाज सुनाई दी। अब सुरक्षित गांव पहुंच सकते हैं।
पेकला से रेलवे लाईन के किनारे के रास्ते सोनमेर होते हुए बदु गढहा पहंुचे। सोनमेर से ही मेरे गांव के करम अखड़ा के मांदर की आवाज सुनते ही गांव की तरफ कदम और तेजी से बढ़ने लगा। गांव सीमा पहुंचते ही दूसरा मुर्गा की बांग सुनाई दी। हम दोनों लाईन किनारे बड़ा जीतिया पेड़ होते हुए अरहरा दोहर पार कर पाहन सबका आम -कटहल धाईर के रास्ते गांव पहुंचे। अखड़ा रास्ता से ही घर पहुंचे कारण कि यही एक रास्ता है घर तक आने के लिए।
अखड़ा मे ंहम दोनों नहीं रूके, सीधे घर चले गये। घर का बाहर दरवाजा बांस का पटरा का था। हम दोनों उसे हटा कर अंदर गये। विजय दादा को आवाज दिये वह सोया नहीं था। उठ कर ढिबरी जलाया। बिजय दादा-अभी इतना रात को कहां से आ रहे हो। हम दोनों रांची से इतना ही बोल पाये। तीनों भाई-बहन बैठे। थोड़ी देर में जोलेन दादा जो अखड़ा में था, वह भी घर आ गया। हम दोनों कुछ नहीं बताये। थोडी देर बाद सभी अखड़ा चले गये। सुबह मैंने करम का सेवा में मां की भूमिका पूरी की।
जब ये घटना का सामना किये, तब पता नहीं था कि वो जगह कहां था। किस जगह -किस धान के खेत में छलागं लगा कर भागे थे। किस रास्ता से पोकला तक पहुंचे थे। बाद में जब भी उस रोड से गुजरते म नही मन उस जगह की पहचान करने की कोशिश करते। लेकिन वो टांड का पेड़ अच्छी तरह याद था। 2008 में जब अर्सोलर मित्तल कंपनी कमडारा-तोरपा क्षेत्र में कारखाना लगाने के लिए करीब 40 गांवों को हटा कर स्टील कारखाना लगाना चाहता था। इसके विरोध में मैं गांव वालों की अगुवाई कर आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच का गठन कर गांव-गांव लोंगों को जागरूक करने घूम रही थी। तब उस जगह को पूरी तरह पहचानी। वो जगह है-टुरूंडु गांव। रोड के बांयी ओर बड़ा से तालाब हैं जिसका पानी दाहिनी ओर खेतों में बहते हुए आगे नाला में मिल जाता है। वहीं आगे टांड में एक बड़ा से बढ का पेड है जो आज भी खड़ा है। हमेशा मै उसे निहारते आती जाती हॅु। कंरम त्योहार मेरे जिंदगी में एक बड़ा यादगार छोड़ के गया हैं। प्रत्येक वर्ष करम के मौसम में अपने बड़े भाई सुशील, बिजय, जोलेन, बाबा-जूरा और मा हिसिया की याद में भावुक हो जाती हूं।
हजारों लोक गीत हैं-जो हम सबको एक दूसरे से जोड़ता है, जो प्रकृति और पर्यावरण की गोद में बांधे रहने का सुखद अनुभुति प्रदान करता है। आज विकास के नाम पर हमारे खेत में, जंगल, जमीन में यही नहीं पूरी जीवनशैली में पूंजीवाद, वैश्वीकरण हावी हो गया हैं। जो हमें एक दूसरे से अलग कर रहा है, प्रकृति और पर्यावरण से अलग कर रहा है। परिणाम सामने है-हम अपने इतिहास और सामुदायिकता के जीवनशैजी के मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। हमारीे संगठित ताकत विखरते जा रही है। इससे आदिवासी समुदाय के साथ सभी को नुकसान हो रहा है। जगल-जमीन से हमें बेदखल किया जा रहा है। जंगल-पहाड उजाडे जा रहे हैं। सरना, अखड़ा, ससनदीरी, जाहेरस्थान, देशावली सभी विकास के नाम पर उजाड दिये जा रहें हैं। इसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। मै मानती हुं-जल-जंगल-जमीन की रक्षा हम करेगें, तभी हमरा गांव-समाज बचेगा, हमारा इतिहास-भाषा-सास्कृति और करम त्योहार, सरहूल त्योहार भी बचेगा।