Thursday, August 6, 2026

Welcome in Village

 

aakkd









आदिवासी-मूलवासी किसानों जंगल-जमीन लूटने का नया हथियार -भूमि बैंक

 आदिवासी-मूलवासी किसानों जंगल-जमीन लूटने का नया हथियार -भूमि बैंक 

भूमि बैंक बनाने की लिए सरकार कौन सा नीति -नियम अपनाया था। किस आधार पर जमीन के किस्मों के प्लाॅटों को चिन्हित करने का क्या मापदंड अपनाया जाए, क्या इसकी कोई नीति बनी थी। यही नहीं भूमि बैंक का इस्तेमाल/उपयोग कौन करेगा, किस तरह से उपयोग किया जाएगा, इसको उपयोग करने के लिए कौन अधिकृत होगा, इसके लिए क्या नीति बनायी गयी है, यह स्पष्ट करना चाहिए। 

यदि भूमि बैंक बनाने की नीति बनी थी तब कृषि व्यवस्था, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, संस्कृतिक, परंपरागत-जीवनशैली और पर्यावरण को संरक्षित और विकसित करने के लिए क्या योजना बनायी गयी है। इस पर भी मंथन करने की जरूरत है। इसकी जानकारी राज्य के ग्रामीण, आदिवासी, मूलवासी, दलित, किसानों को देना चाहिए। क्योंकि झारखड का भू-भाग पहाड़ी और जंगल-झाड़ी से अच्छादित है। राज्य के 24 जिलों का भौगोलिक स्थिति, लैंण्डस्कैप अलग अलग है। कोई जिला समतल है, तो कोई जिला जंगल-पहाड़ों से अच्छादित है। अलग-अलग भौगालिक पहचान के साथ वहां के आदिवासी-मूलवासी सामुदाय की बोली-भाषा, रीति-संस्कृति की भी अपनी विशिष्टता है। इसके साथ ही प्रकृतिक उत्पाद, फूल-फल भी वहां के प्रकृति और मौसम के आधार पर निर्भर करता है। 

जब राज्य के कृषि व्यवस्था की को समझने के लिए जरूरी है कुछ बुनियादी आधार को समझने की। पहाड़ी इलाकों की जमीन ढ़लाउ होती है। ग्रामीण आबादी /समुदाय इसी ढ़लाउ जमीन पर खेती-बारी करता है। बरसात का पानी ढलाने के टांडं, गोडा, बारी-झारी, पेड़-पौधों को सिंचते हुए नीचे के चंवरा खेतों को सिंचते हुए सबसे नीचे के गड़हा दोन या एक नंबर के खेतों में पहुंचती है। सबसे नीचे वाले खेत ही बहु फसली भी होती है। यही ग्रामीण इलाके का जीवित जलस्त्रोत भी है। 

समतल इलाके में अधिकांश जमीन पर खेती की जाती है। इन इलाकों में सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था हो तो सालों भर खेती की जा सकती है। इन इलाकों में भी टांड, चैंरा, दोन और गढ़हा दोन है। टांड में गोड़ा, मंडुआ, शंकर कंदा, उरद, कुरथी, गंगाई, जौ, बजरा, तील, सुरगुजा खेती की जाती है। चैंरा में हल्का धान, दोन और गढ़हा दोन में देर से तैयार होने वाला धान की खेती करते हैं। ये सभी बरसाती खेती है, जो सिर्फ बरशा पानी से स्वातः सिंचता है। 

झारखंड का एक-एक इंच जमीन बहु-फसली है

राज्य की बड़ी आबादी के उनके नाम से भूमि नहीं है-फिर भी वह भूमि का मालिक हैनदी-का बहता पानी पर किसी एक परिवार या कोई एक गांव मालिक नहीं होता-नदी के उदगम से लेकर जिस भी इलाके से, गांवों से होकर नहीं बहती है, जितनी दूर नदी की धारा बहती है-उतने दूर तक के धरती सिंचती है। उतने दूर तक  मनुष्य से लेकर पेड़-पौधे, झाड़-जंगल, जीव-जंतु, गांय, बैल, बाघ, भालू, सभी को जीवन मिलता है। सबकी जिंदगी सिंचती है। तब धरती फूलती-फलती है, सामुदाय भी फूलता-फलता है। 

आखिर गांव का परिभाषा सरकार के नजर में क्या है? क्योंकि भूमि बैंक में शामिल जमीन के प्लाॅटों में -गैर मजरूआ आम भूमि के प्लाॅटों में सबसे ज्यादा रास्ता का ही प्लाॅट है। 

झारखंड का परंपरागत गांव

हम गांव किसको मानते हैं -आबादी का समूह। घरों का समूह। हर घर का घर-बारी होता है। बारी-झारी होता है।  खेती-किसानी के लिए हर परिवार -गाय, बैल, बकरी, भेड़, सुवर, मुर्गी-चेंगना, बत्तक पालता है। इन पलातू जीव-जंतु के चरने के लिए, आने-जाने के लिए, जगह तो चाहिए ही। किसान हल-बैल लेकर खेत-टांड जोतने जाएगें, उसके लिए छाउर-चैड़ा कच्चा रास्ता होता है।  किसानों को अपने खेतों तक हल-बैल ले जाने के लिए रास्ता होता है। गांव मावेशियों को चराने, नहलाने-धोने, पानी पिलाने के लिए गांवों के  आबादी क्षेत्र में और गांव के सीमा में बहती नाला, छोटी नदियों का होना जरूरी है। ये छोटी नदी-नाला जीवित रहेगा-तभी गांव का सामाजिक, आर्थिक, कृषि व्यवस्था संरक्षित और विकसित होगा। 


गांव का रास्ता-पगडंडी ही गांव के सामाजिक, आर्थिक, संस्कृतिक विकास का हाइवे है-  भूमि बैंक में शामिल गैर मजरूआ आम भूमि के किस्म में सबसे अधिक प्लाॅट रास्ता से संबंधित है। भूमि बैंक में शामिल प्लाॅटों की अध्यायन करेगें, देखेगें तब यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार के रास्तों वाले प्लॅटों को क्यों भूमि बैंक में शामिल किया ? सरकार के नजर में गांव में रास्ता नहीं होना चाहिए? आप भूमि बैंक में शामिल भूमि के प्लाॅटों का अध्यायन करगें तो यह सवाल आप की भी बेचैनी बढ़ाएगा।  किसी भी गांव का नाम दिमाग में आते ही, तरह-तरह के विशाल पेड़-पौधे, बांस का झुंड, टंगरा/चटटान, अखड़ा, सरना, मसना, कब्रिस्थान, हड़गड़ी, ससनदीरी, मरघटी डाडी, चुंवा, कुंआ सभी दिखने लगता है, ये गांव के किस स्थान में किस दिशा में अवस्थित है। कौन रास्ता किसके घर तक जाता है। उपर टोला, नीचे टोला, पाहन टोली, अम्बा टोली, पुजार टोली, लोहरा टोली, कुम्हार टोली, घांसी टोली, तुरी कोचा, महरा/अहिर कोचा सभी को एक दूसरे से जोड़ने के लिए कई रास्ते रहते हैं। यही है गांव, जहां सभी जाति-समुदाय के समरसता की आत्मा बसती है।  

सरकार नहीं चाहती है कि किसानों के खेतों की बीच में मोटा आड़, नाला और पाइन रहे-

रघुवार सरकार द्वारा बनाये गये भूमि बैंक का अध्यान करेगें, तो यह समझ में आता है कि ग्रामीणों के खेत-टांड के बीच मोटा आड़ नहीं होना चाहिए। नदी-पाइन, नाला भी नहीं हो, शायद इसीलिए सभी गांवों के खतों के बीच मोट आड़ वाले प्लाॅट, पाइन वाले प्लाॅट, गढहा वाले प्लाॅट, को चिन्हित कर भूमि बैंक में शामिल किया गया है। 

भूमि बैक में शामिल जमीन का उपयोग करने के लिए कौन अधिकृति है-

भूमि बैंक किसके लिए बना है? इसका उपयोग कौन करेगा? इस सवाल को समझने के लिए पिछली सरकार द्वारा आयोजित मोंमेंन्टम झारखंड के उदेश्यों को समझना 2017  में पहला मोमेंन्टम झारखंड का आयोजन 16-17 फरवरी को किया गया था। उस समय राज्य सरकार मोंमेंन्टम झारखंड उत्साव में आये कंपनियों, देशी-विदेशी निवेशकों के समक्ष अपनी रिपोट पेस कर घोषणा किया था-कि सरकार ने निवेशकों को आसानी से जमीन उपल्बध कराने के लिए 21 लाख एकड़ जमीन भूमि बैंक में सुरक्षित रखा है। मोमेंन्टम झारंखड का लोगो  ““उड़ता हाथी ““  सभी ने देखा था। 

(तत्कालीन सरकार का रिपोट-पर आधारित)


Wednesday, August 5, 2026

khunti District ke karra Block---Grameenon ka Awaj Buland karta Yah Play Card







 

क्या है स्वामित्व योजना?

 क्या है स्वामित्व योजना?

केंन्द्र सरकार की यह योजना राष्ट्रीय पंचायती दिवस 24 अप्रैल 2020 को शुरू किया गया था। प्रचायती राज मंत्रालय ही इस योजना को लागू कराने वाला नोडल मंत्रालय है। राज्यों में योजना के लिए राजंस्व/भूलेख विभाग नोडल विभाग है। ड्रोन के जरिये प्राॅपर्टी के सर्वे ंके लिए सर्वे आॅफ इडिया नोडल एजेंसी है। योजना का मकसद है कि ग्रामीण इलाकों की जमीनों का सीमांकन ड्रोन सर्वे टेक्नोलाॅजी के जरिए होगा।  इससे ग्रामीण इलाकों में मौजूद घरों के मालिकों के संपत्तियों का मालिकाना हक का एक “प्राॅपर्टी कार्ड ”रिकाॅर्ड बनेगा। वह इसका इस्तेमाल बैंकों से कर्ज लेने के अलावा अन्य कार्यों में भी उपयोग कर सकता है। 


आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्राकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शक्तियों का हमला तेज होता जा रहा है

 आदिवासी ईलाके में जब अंग्रेज शोषक शासकों, जमींनदारों और इजारेदारों द्वारा आदिवासियों के स्वाशान व्यवस्था पर चारों तरफ से हमला कर दिया था तब बिरसा मुंण्डा ने कहा था देखो-हमारी धरती धूल की तरह उड़ी चली जा रही है। आज वैश्विक पूंजी बाजार में आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्राकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शक्तियों का हमला तेज होता जा रहा है। आदिवासी किसानों के परंपरागत अधिकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, खूंटखटी अधिकार, विलकिनसन रूल, पेसा कानून और 5वीं अनुसूचि में प्रावधान अधिकारों पर काॅरपोरेट कंपनियों का बुलडोजर चल रहा है। विस्थापन की लड़ाई -जंगल, जमीन, खनिज के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ आदिवासी, मूलवासी, किसान, मजदूर समुदाय जाति, धर्म, वर्ग और राजनीति से उपर उठकर संगठित शक्ति बन कर संघर्ष की परंपरा रही है। जो जीत की गारंटी करता था।  

लेकिन आज के पूंजीवादी बाजार व्यवस्था में स्वंय देश की कल्याणकारी सरकार देश की संवैधानिक संघीय ढंचों को ध्वस्त करने काम कर रही है। संविधान के लोकतंत्रिक बुनियाद का तहस-नहस कर दिया है। आदिवासी, दलित, किसानों एवं मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों में बहुत सारे संशोधन पूंतीपतियों और कारपोरेट घरानों के हित मे ंकर चुका है। धर्म मानने की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, खत्म हो चुकी है। जो सामुदाय की सामूहिक-संगठित प्रतिरोध की शक्ति को कमजोर करने का बड़ा हथियार सिद्व होता जा रहा है। 


  देश की वैश्विक नीति विश्व बैंक और काॅरपोरेट घरानों के दिशा निर्देशों, पूंजिपतियों के मुनाफा कमाने की होड़ एवं कल्याणकारी राष्ट्र (देश) एवं राज्य की बदलती भूमिका ने देश के आदिवासी, मूलवासी किसान, दलितों के परंपरागत संवैधानिक अधिकार को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को जहां सरकार विकास का पैमाना मानती है, वहीं निजी पूंजि को भी तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए भूमि की सामुदायिक स्वामित्व के रिकार्ड एवं पंजीयन व्यवस्था को अपने अनूरूप बदल कर  भूमि की खरीद-बिक्री में तेजी लाना सरकार अपनी प्राथमिता मानती है। इसके जमीन के सभी परंपरागत भूमि दस्तावेजों, खतियान पार्ट वन, खतियान पार्ट टू, गांव का नक्सा, वीलेज नोट सभी को लैंण्ड रिकार्ड मोडनाईजेशन कार्यक्रम के तहत  डिजिटल लैंण्ड पार्सल मैप, बनायी गयी हैै। इस डिजिटल रिकार्ड का संचालन एवं नियंत्रण की जिम्मेवारी एनआईसी को दिया गया है। जिसमें भूमि के मालिकाना का रिकार्ड, संपत्ति कर/टैक्स एवं भूमि के खरीद-बिक्री की प्रक्रिया भी पूरी की जाती है। इस प्रक्रिया में ग्राम सभा, आदिवासी समुदाय, किसानों के सहमति-अहसमति देने-लेने की कोई जगह नहीं है। ताकि सरकार रियल इस्टेट, देशी-विदेशी कंपनी जिससे भी जमीन चाहिए, आसानी से उपलब्ध किया जा सके।

ग्लोबल पूंजी बाजार की व्यवस्था ने भोजन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य को मुनाफा का मूल आधार के रूप में विकसित किया। जिंदगी की इन मूलभूत जरूरतों को निजी पूंजी/ कंपनियों के स्वामित्व के हवाले सरकार ने कर दिया है।  इसके लिए दो बातों की आवश्कता थी पहली-देश के लोकतंत्र एवं लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को समाप्त करना, तथा बाजार में राज्य के हस्तक्षेप को समाप्त करना। दूसरी-प्राकृतिक संसाधनों, जंगल, जमीन, पानी, और खानिज पर कब्जा करना। इसका मूल उद्वेश्य, राष्ट्र और राज्य की संप्रभूता को समाप्त करना और बाजार की पूजिवादी व्यवस्था को मजबूत करना।

देश की लोकतंत्रिक व्यवस्था अलोतंत्रिक हो गयी है। अपने आम नागरिकों के कल्याण की जगह काॅरपोरेट घरानो, पूंजीपतियों के कल्याण की चिंता सर्वोपरि होते जा रही है। यही कारण है कि देश के संविधान में प्रावधान अनूसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़े समुदाय के सामुदायिक अधिकारों को खारिज कर काॅरपोरेट के हाथों को मजबूत किया जा रहा है। 

ंवल्डबैंक सहित अन्य पूंजिपतियों के द्वारा भोजन, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मौलिक अधिकारों का नीजिकरण के अब मुकाफा कमाने का सबसे बड़ा साधन जंगल, जंमीन और खानिज बन गया है। वल्डबैंक ने जमीन के खरीद-बिक्री एवं जमीन अधिग्रहण कानूनों की जटिलताओं को सरलीकरण करने का प्रयोजन किया है। इस उद्वेश्य की पूर्ति के लिए ही भूमि के दस्तावेजों का डिजिटालाईजेशन किया गया। 5वीं और 6ठी अनुसूचित क्षेत्र में बडे पैमाने पर समाज का समुदायिक भूमि है जिसको गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला, खेल मैदान के रूप में है। साथ ही आदिवासी समुदाय के धर्मिक स्थल सरना, ससनदीरी, जाहेर, जहिरा, बहा सरना, केडा सरना, गुमी सरना, देसाउली है। 2014-15 में ये सभी भूमि केंन्द्र सरकार के निर्देश पर 22 लाख एकड जमीन भूमिबैंक में शामिल कर दिया गया। जिससे सिंगल विंडो सिस्टम से धडले से खरीद-बिक्री हो रहा है। 


2020-21 में मोदी सरकार ने  24 ंअप्रैल 2020 को केंन्द्र सरकार ने देश में स्वमित्व योजना लागू करने की घोषणा की। घोषित स्वमि

त्व योजना के तहत डिजिटल इंण्डिया लैंड रिकाॅर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) चलाने की योजना बनायी गयी। इस योजना के तहत ड्रोन से गांवों की संपति का सवेक्षेण कर जीअईएस मानचित्र बनाये जाऐगें। साथ ही जमीन मालिको को प्राॅपटी कार्ड बना कर दिया जाएगा जो 14 डिजिट का होगा। ये जीआईएस नक्से और स्थानीय डेटाबेस ग्राम पंचायतों और और राज्य सरकार के अन्य विभागों द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग किये जाएगें। इस स्वमित्व योजना का कई उदद्वयों के साथ मूल उद्वेश्य एक राष्ट्र एक साॅफटवेयर (व्दम छंजपवद व्दम ैवजिूंतम) व्यवस्था करना है। ( दिशानिर्देश पेज 26)





 आखिर यह गडा बदलाव किसके लिए

डिजिटल इंडिया लैंड रिकाॅर्ड अधुनीकिरण ने भारत को बदल रहा है। देश के नियम-कानून को बदल दे रहा है। देश की संघीय व्यवस्था को बदल रहे हैं। परंपरागत गांव का अस्तित्व बदल दिया जा रहा हैं। गांव की भौगोलिक स्थिति और समाज की सामाजिक मूल्य बदल दिया जा रहा है। 

बदलाव होना चाहिए, लेकिन बदलाव लाने का उद्वेश्य क्या है? बदलाव लाने के केंन्द्र में किनको रखा गया है? क्या अमीरों को, पूंजीपतियों को, देश -विदेश के काॅरपोरेट घरानों को या आदिवासी, दलित, किसान, मेहनतकश मजदूरों को? यह सवाल महत्वपूर्ण है। 

जमीन का जो अधुनिकीकरण व्यवस्था स्थापित किया जा रहा है, वह पढे़-लिखे समुदाय के लिए निश्चित तौर पर उपयोगी साबित होगा। क्योंकि इस व्यवस्था में सारी जानकारियां आॅनलाईन /वेबसाईड में उपलब्ध होगा। इसको उपयोग करने के लिए बहुत सारी जानकारी रखना जरूरी होगा। साथ ही कम्प्युटर, लेपटाॅप, स्मार्ट फोन जरूरी होगा। इसको उपयोग करने के लिए बिजली की उपलब्ध के साथ आॅनलाईन कनेक्शन /नेटवार्क बिना बाधा के सतत उपलब्धता अतिअवश्यकता होगा। राज्य के अल्पशिक्षित ग्रामीण किसान को इसका कितना लाभ मिलेगा यह भी विचारणीय बिंन्दु है। 




इस बदलाव से आदिवासी-मूलवासी सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा

गांव के सीमा के भीतर या बाहर के गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास जमीन को भूमि बैंक द्वारा आॅनलाईन किसी को भी हस्तांत्रित करने से, अब गांव की डेमोग्राफी, जियोलाॅजी, जैविक विविधता, विविधता में एकता वाली सामाजिक ताना-बाना, परंपारिक सामाजिक व्यवस्था-पड़हा व्यवस्था, राजी पड़हा, मानकी-मुण्डा, डोकलो-सोहोर, मांझी-परगना व्यवस्था सभी कमजोर हो जाएगा।

इसलिए ऐसा होगा-क्योंकि गांव के बीच में, गांव-टोली-महला के आस पास, या किसानों के ख्.ोत-टांड, के बीच, या अगल-बगल जो भी गैर मजरूआ आम, खास जमीन है, परती भूमि, जंगल-झाड को सरकार किसी भी जाति-समुदाय, या भाषा-संस्कृति के लोगों को हस्तांत्रित कर रही है। इससे एक भाषा-भाषी या जाति समुदाय के बीच अब कोई भी बाहरी समुदाय को बसाने का काम किया जा रहा है।

प्रकृति-पर्यावणीय आदिवासी-मूलवासी गांवों का अस्तित्व खतरे में है। 

भूमिं बैंक के लिए -गांव के बीच, खेत-टांड के बीच, गांवों सीमाओं के जिन गैर मजरूआ आम, खास जमीन को चिन्हित किया गया है-उन जमीनों के हस्तांत्रण के बाद उस इलाके में पहले की स्थानीय आबादी केवल नहीं रहेगी, लेकिन बाहर से आने वाली आबाद स्थानीय आबादी से ताकतवर होगी। ऐसे परिस्थिति में उस गांव का परंपारिक भाषा-संस्कृति, रहन-सहन के साथ गांव का नाम भी बदल जाएगा। जैसे कि विकास के नाम पर पूरे झारखंड के गांव गायब होते गये, गांवों का नाम अब नगर, बिहार, पूरी (जैसे अशोक बिहार, कुसुम बिहार, प्रेम नगर, नयन नगर, गंगानगर, जमुनानगर, चनक्यपुरी आदि)  में तब्दील होता जा रहा है। 

जबकि परंपारिक आदिवासी गांवों का नाम पेड़, पौधों, जंगली जनवरों, नदी, नालों, झरनों, पशु-पक्षियों के नाम से रखा गया है। साथ ही हजारों गांवों का नाम गांव के प्रधान याने गांव बसाने वाले पहला बुजूर्ग के नाम पर नामकरण किया गया है।

बडीबिरिंगा, कनारोंवा, लोवागड़ा, अंबाकोना, डाउकोना, जमटोली, करीमाटी, सिमडेगा, मयोमडेगा, लतापानी, सराईपानी, हेसलाबेड़ा, महाबुआंग, किरीबुरू, बाघलता, सारूबेड़ा, मेघाहातुबुरू, कोयोंगसेरा, बगीसेरा, रंगामाटी, टुटवापानी, जोकिपोखर, सेरेंदआ, सरजोमदआ, कहुपानी, जिलिंगसेरेंग, बिलसेरेंग, महुंवाटांड, कादोपानी, चंपाबहा, जोजोहातु, बुरूहातु, मरंगबुरू, बहाबुरू, गरूड़पीडी, हेसो, निमडीह, जोजोसेरेंग, सरजोमडीह, बकाकेरा, लउाकेरा, महूंवाटोली, बांसटोली, जनुमपीडी, बंडआजयपुर, नामकुम, सियारटोली,  आदि.।..

झारखंड 24 जिलों का है। इसमें हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर, कोडरमा, रामगढ, गिरिडीह औधोगिक जिले हैं। यह बाहर से आयी आबादी भी अधिक है। तब स्थनीयता नीति के तहत अब ये भी झारखंडी माने जाएगें और यहां स्थनीय समुदाय को जो सुख-सुविधा राज्य और केंन्द्र सरकार द्वारा मिलता है, इन्हें भी मिलेगा। हां नौकरियों में आरक्षण राज्य की नयी आबादी के आधार पर ही निर्धारण होगा।  तब यहां की कुल आबादी में अब आदिवासी-मूलवासियों की आबादी का ग्राफ सबसे नीचे चला जाएगा। एैसे स्थिति में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों की पहचान स्वत ही खत्म हो जाएगी। 

झारखंड में लगभग 48-50 नगरीय शहर हैं। जहां हर औद्योगिक शहर में हजारों अपाॅटमेंट बन गया है जहां बडे औद्योगिक घराने और व्यवसायिक घराने की आबादी है। इसमे राज्य से बाहर की आबादी भी बडी संख्या में आकर बसी है। दूसरी ओर शहरीकरण, और उद्योगों, खदानों के कारण स्थानीय आदिवासी-मूलवासी, किसान, मजदूरों की बडी आबादी विस्थापित हो गयी है। जो रोजी-रोटी के लिए अन्य राज्यों में पलायन कर गयी है। 

2001 में झारखंड की कुल आबादी का 26.3 प्रतिशत आदिवासी आबादी थी। 2011 के जनगणना के आधार पर राज्य की कुल आबादी का 26.2 प्रतिशत आदिवासी रह गये। याने 10 साल में 1 प्रतिशत आदिवासी घट गये। चिंता का विषय हे कि 2011 के बाद 25 वर्षों में आदिवासी आबादी कितना रहेगा। जिस तेजी से बाहरी आबादी हावी होता जा रहा है।