Thursday, August 13, 2026

लोकसभा में बुधवार को विपक्ष के जोरदार हंगामें के बीच खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक 2026 पारित कर दिया गया।

 नई दिल्ली/रांची, हिन्दुस्तान टीम एवं प्रभात खबर की रिपोर्ट

देश में खनियों और खनिज युक्त भूमि पर राज्य सरकारें अब अतिरिक्त कर, उपकर-संस या किसी भी तरह का अन्य शुल्क नहीं लगा सकेगी। लोकसभा में बुधवार को विपक्ष के जोरदार हंगामें के बीच खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक 2026 पारित कर दिया गया। इस विधेयक के जरिये केंन्द्र सरकार ने राज्यों की शुल्क लगाने की शक्तियों को समाप्त कर दिया है। इसका व्यापक असर झारखं डमें भी पडेगा। 

बुधवार को लोकसभा में विपक्षी दलों को हंगामा जारी रहने से दोपहर दो बजे एफसी आरए विधेयक संयूक्त संसदीय समिति को भेजने का प्रस्ताव पारित करने के बाद पीठासीन सभापति जगदंकबका पाल ने दोपहर 02.27 बजे सदन की कार्यवाही तीन बजे तक के लिए स्थागति कर दी। कार्यवाही दोबारा शुरू होने पर केंन्द्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी किशन रेडी ने विपक्षी सदस्यों के भारी विरोध के बीच विधेयक को चर्चा एवं पारित करने के लिए सदन के पटल पर रखा। आरएसपी के एनके प्रेमचंन्दन समेत कुछ अन्य विपक्षी  सांसदों ने इस विधेयक का विरोध किया। कहा कि यह संविधान और संघीय ढांचे के खिलाफ है। 

हालांकि सदन ने बिना चर्चा के ही इस विधेयक को ध्वानिमत से पारित कर दिया। विधेयक के पारित होने के बाद विपक्ष के भारी हंगामें के कारण लोकसभा की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थागित कर दी गई।

भूमि का विनियमन भी कंेद्र करेगा-जानकारी के अनुसार, खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन संशोधन विधेयक में न सिर्फ राज्यों की शुल्क लागू करने की शक्तियाु समाप्त की गई हैं, बल्कि इसके लागू होने के बाद निर्धारित मानकों के अनुसार खनिज संपदा से जुडी भूमि का विनियमन भी केंन्द्र सरकार के नियंत्रण में आ जाएगा। Bidheyak--थ्वधेयक में प्रावधान किया गया है कि 2026 के संशोधन अधिनियम के लागू होने से पहले एैसा कोई कर, उपकर या अन्य शुल्क, जो राज्य सरकार के पास जमा नहीं किया गया हो या जिसकी वसूली उसके द्वारा नहीं की गयी हो, उसे हर लिहाज से अवैध माना जायेगा। ुक्

विधेयक में कहा गया है, हांलाकि , ऐसे लागू होने से पहले खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर लगाया गया कोई कर, उपकार या अन्य शुल्क, जो पहले ही राज्य सरकार के पास जमा किया जा चुका है या उसके द्वारा वसुल किया जा चुका है, उसे वापस नहीं किया जायेगा। पर जिन्होनें सेस या कर जमा ही नहीं किया है तो उन्हें आगे भी जमा नहीं करना होगा। 

सरकार ने बिल को विकास से जोड़ा-जी किशन रेडी ने कहा कि संशोधन का उद्वेश्य खनिज क्षेत्र में वित्तीय व्यवस्था को स्थिर, स्पष्ट और अनुमान योग्य बनाना है। उनके मुताबिक इससे राष्ट्रीय आर्थिक विकास को बढ़ावउ मिलेगा और आत्मनिर्भर भारत तथा 2027 तक विकसित भारत के लक्ष्य में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि खनिजों पर अलग-अलग क्षेत्रों में आमरन कर व्यवस्था सार्वजनिक हित को प्रभावित करती है। अधिक टैक्स और शुल्क  से स्थानीय आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने, बाजार के विकास में कमी आने और परिवहन लागत अढ़ने की स्थिति पैदा हो सकती है। केंन्द्रीय मंत्री ने कहा कि खनिजों पर असमान कर व्यवस्था से घरेलू आपुर्ति मंहगी हो सकती है और पर्प्याप्त स्थाीनय संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद खनिजों के आयात का जोखिम बढ़ सकता है। इसका असर आम नागरिक के जीवन-यापन की लागत पर पड़ सकता है। 

झारखंड पर यह पड़ेगा असर

आठ से 10 हजार करोड़ का राजस्व प्रभावित हो सकता है-1.36 लाख करोड़ बकाये की मांग पर भी पड्रेगा असर। खनिज संपदा के मामले में झारखंड देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में है। इसलिए विधेयक असर यहां दूसरे राज्यों की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। झारखंड ने 2024 में झारखंड मिनरल बियरिंग लैंण्ड सेसे कानून बनाया था। इयके तहत खनिज-युक्त भूमि, जिसमें कोयला-युक्त भूमि भी शामिल है, पर खनिज के प्रेषण के आधार पर उनकर की व्यवस्था की गयी है। इससे पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार को लगभग आठ हजार करोड़ रूपये केवल झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस से मिले थे। इस वर्ष सरकार ने जेएमबीएल सेस से करीब 10 हजरी करोड़ से अधिक राजस्व का अनुमान लगाया है। झारखंड लंबे समय से केंन्द्र सरकार से 1.36 लाख करोड, अब बढ़कर 1.41 लाख करोड की मांग करता है। इसमें एक लाख करोड की मांग का मुआवजा है। जिसमें 41,142 करोड़ बकाया और 60 हजार करोड़ व्याज है। इस अधिनियम से इस पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ ाकतर है। हालांकि इस विधेयक से ढारखंड की रोयल्टी पर कोई असर नहीं पडेगा। 


Wednesday, August 12, 2026

झारखंड में एसआईआर के तहत 43.61987 मतदाता सूची संे बाहर

झारखंड में एसआईआर के तहत 43.61987 मतदाता सूची संे बाहर

रांची-भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर विशेष गहन पुनरीक्षण-2026 के तहत बुधवार को मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशित किया गया। प्रारूप मतदाता सूची के अनुसार राज्य में कुल 2,21,01,249 मतदाता शामिल किए गए हैं। इनमें 1,12,06,755 पुरूष, 1,08,94,234 महिला तथा 260 थर्ड जेंडर मतदाता है। एसआईआर से पहले झारखं डमें मतदाताओं की कुल संक्ष्या 2,64,63,234 थी। प्रारूप सूची के प्रकाशन के बाद 43,61,987 मतदाता सूची से बाहर हो गए है। इन नामों को कारणों, जैसे मरण, स्थायी रूप से अन्य स्थान पर स्थानांतरण, एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होना था। निर्धारित प्रक्रिया पूरी नहीं होने पर आधार पर हटाया गया है। 

इधर उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री ने सभी मतदाताओं से अपील की है कि वे मतदाता सूची में अपना नाम, पता और अन्य विवरण का मिलान अवश्य कर हें। यदि नाम छूट गया हो तो किसी प्रकार की त्रुुटि हो तो निर्धारित अवधि में दावा एवं आपति इर्ज करांएं। 

मतदाता अपॉनलाइन भी सूची में अपना नाम देख सकते हैं। इसके अलावा संबंधित मतदान केंन्द्र पर भी सूची उपलब्ध रहेगी। 

ड्राफट वोटर लिस्ट के मुख्य आंकडे

श्रेणी-------------मतदाताओं की संख्या

एसआईआर के पहले----2,64,63,236

प्रारूप सूची में--------2,21,01,249

पुरूष मतदाता--------1,12,06,755

म्हिला मतदाता--------1,08,94,236

थर्ड जेंडर-----------260

हटाए गए कुल नाम-----43,61,987


क्यों कटे 43,61

4 सितंबर तक दावा--आपति दर्ज कराएं

छावा ओर आपति-4 सितंबर 2026 तक

फॉम -6ः नया नाम जोड़ने या छूटे हुए पात्र मतदाता फॉम-6 के साथ घोषणा पत्र भरकर बीएलओं या ऑनलाइन अवजमतेण्मबपण्हवअण्पदध्म्ब्प्छमज।चच.....जमा कर सकते हैं। 

युवा मतदाताओं के लिए विशेष कैंपः 1 अक्टूबर 2026 को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं के लिए 8, 9, 22 और 23 अगस्त 2026 को विशेष अभियान चलाए जाएंगे। 

अंतिम प्रकाशनः सभी दावों और आपतियों के निस्तारण के बाद अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 7 अक्टूबर को होगा। 


यहां करें जांच-मतदाता अपने नाम की जांच ऑनलाइन भी कर सकते हैं। इसके लिए निम्न लिंक का उपयोग किया जा सकता है-ीजजचेरूध्ध्ेींतमण्हववहसमधर््गत्मश्रथ्मकदचदठ68इत3



क्यों कटे 43,61 लाख वोटरों के नाम

1,16,484 ऐसे विदेशी और अन्य अवैध मतदाता थे जिन्होंने गणना प्रपत्र पर हस्ताक्षर करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

7,63,903 मृत मतदाताओं के नाम हटाये गये।

15,92,194 मतदाता अपने स्थान से हमेशा के लिए स्थानांतरित हो चुके हैं।

24,50,810 मतदाता अपने पते पर नहीं मिले या अनुास्थित पाए गए।

4,38,596 मतदाता पहले से ही अन्य सूचियों में नामांकित थे। 


2,389 नए पोलिंग बूथ बने

मतदाताओ की सुविधा के लिए बूथों का युक्तिकरण किया गया है। किसी भी बूथ पर 1200 से अधिक मतदाता नहीं होगें और किसी मतदाता को 2 किमी से अधिक दूरी तय नहीं करनी पडेगी। राज्य के सभी 24 जिलों के 81 विधानसभा क्षेत्रों में 2,389 नए मतदान केंन्द्र बनाए गये हैं। इनमें से 1,248 वर्तमान स्थानों पर तथा 1,141 नए स्थानों पर बनाए गए हैं। 68 मतदान केंन्द्रों को मर्ज किया गया, जिसके बाद राज्य में कुल पोलिंग बूथों की संख्या 29,571 से बढ़कर 31,892 हो गई है। 


जामींदारी प्रथा ka उन्मुलन 1950 में हुआ, ं----आंज अडानी, अंबानी का नयी जमीनदारी शुरू

 जामींदारी प्रथा उन्मुलन 1950 में हुआ, ंआंज अडानी, अंबानी का नयी जमीनदारी शुरू

Ajadi  के बाद पहली बार 1950-1955 के बीच जमींदारी प्रथा  को समाप्त करने के लिए विधेयक लाये गए। और ये विधेयक अधिनियम बनकर लागू हो गये। जिनके परिणामस्वरूप जमीदारो प्रथा भारत में उन्मुलन हो गया और किसानों एवं राज्य के बीव पुनर सीधा संबंध स्थापित हो गया। भूमि अधिनियम कानून  बनने के बाद जमीन पर जोतने वाले का स्वामित्व हो गया। जमींदारों के खेत जोतकर उनके लिए पूंजि अर्जित करने वाले गरीब हलधर किसान जमींदारों के चंगुल से बाहर निकले गये।ं

अब ंअडानी, अमबानी की जमीनदारी प्रथा शुरू हो गयी है। जिसकी जागीरदारी का कमान मोदी सरकार संम्भाल रही है। लैंण्ड डिजिटालाईजेशन, वन नेशन वन लैंण्ड रिकाॅर्ड, स्मामित्व योजना, लेंण्ड बैंक इस प्रक्रिया का मूल हथियार है। 


jal, jangal , jameen bachane ki Ladai ka yah ek drisye hai, jo mittal company dawara Jameen-

 

Tuesday, August 11, 2026

50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूप्या मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

 19 जून 2017

ं 50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूप्या मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास ने राज्य के सामृद्व महिलाओं को लाभ पहुुचाने के लिए भू-राजस्व एवं निबंधन विभाग के माध्यम से 50 लाख कीमत की जमीन खरीदने पर 1 रूप्या में जमीन की रजिस्ट्री करने की व्यवस्था लायी। 

इस व्यवस्था के बाद हर साल 70 महिलाएं इसका लाभ उठाते रहीं। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं एक रूप्या में जमीन, मकान, प्लैट का रजिस्ट्रेशन करायी। 2 लाख से अधिक रजिस्ट्री की गयी। इससे राज्य को 1296 करोड़ राजस्व का नुकासान भी उठाना पड़ा। 

कोरोना काल में वर्तमान हेमंत सरकार ने इस व्यवस्था फिर से वापस लिया। तर्क दिया गया कि इस व्यवस्था के तहत गरीब महिलाएं लाभ नहीं ले पा रही हैं साथ ही राज्य का राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। इसी को देखते हुए राज्य की गठबंधन सरकार ने इस व्यवस्था को वापस लिया। 

5 सितंबर 2019 का तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने टवीट किया था-झारखंड देश का पहला राज्य है जहां महिलाओं के लिए 50 लाख रूपया तक की जमीन , मकान की रजिस्ट्री सिर्फ एक रूपये में होती है। अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा महिलाएं बन चुकी हैं मकान मालकिन। 

जानकारी के लिए-देश के बाकी राज्यों में भी महिलाओं को रजिस्ट्री में कुछ प्रतिशत की छूट मिलती है-उदाहरण के तौर में-दिल्ली में 4 प्रतिशत स्टाम्प डयूटी देनी पड़ती है। यूपी में महिलाओं द्वारा जमीन खरीदने पर सिर्फ एक (1) प्रतिशत ही स्टाम्प डयूटी में छूट दी गयी है। 

23 मार्च 2021 को राज्य सरकार ने महिलाओं को 1 रूप्या में जमीन रजिस्ट्री में छूट देने से राज्य सरकार को 400 करोड़ का नुकसान बताया। राज्य के पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पिछली सरकार ने महिला के नाम से जमीन रजिस्ट्री कराने कर छूट दी थी, इससे राज्य को करीब 400 करोड़़ रूप्ये राजस्व का नुकसान हुआ था। वह रजिस्ट्री शुल्क भी देने में सक्षम होता है। यह सिर्फ जमीन लूटने की षडयंत्र के तहत किया गया था। 

जो भी नये-नये व्यवस्था जमीन संबंधित लाये गाये पिछली रघुवर दास की सरकार के द्वारा उसका समीक्षा होनी चाहिए कि आदिवासी, मूलवासी, दलित और मेहनत मजदूरी करने वाला परिवार को कितना लाभ मिला?। इसकी सूची सरकार को जारी करना चाहिए, तभी सामाजिक न्याय की बात हो सकती है। 

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23 मार्च का प्रभात खबर में विधायक सरयू ने बयान दिया था कहा था-कि राज्य में कई स्थानों पर सरकारी जमीन पर लोग वर्षों से रहते आ रहे हैं, उनकों सरकार से सुविधाएं भी मिल रही है। ऐसे जमीन को नियमित करना चाहिए। इनके अनुसार जमशेदपुर में कई इलाके ऐसे हैं नियमित करने का कोई नियम बना लेना चाहिए, इससे सरकार को बड़ी संख्या में राजस्व मिलेगा। 

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2014 से 2019 के बीच राज्य की कल्याणकारी सरकार आखिर अमिरों को ही क्यों सस्ते दर में जमीन दी?

बाबा रामदेव को रघुवर सरकार ने 101 रूपये की टोकन मनी पर 15 एकड़ जमीन नमकोम प्रखंड के बरगांवा में दिया है। यह कहा गया कि यहां स्कूल खुलेगा, जहां गरीबों के बच्चे पढ़ेंगे। लेकिन सचाई को क्या है, यह जांचने की जरूरत है। 

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Friday, August 7, 2026

thoda mood bana hai

 






























याचिकाकर्ता छात्रों का मुख्य आरोप हे कि परीक्षा के दौरान ओएमआर शीट में उनके द्वारा दर्ज किए गए उत्तर और एनटीए द्वारा पोर्टल पर अपलोड की गयी प्रतियों के बीच बड़ा अंतर है।

 नीटयूजी-काउंसिलिग से पहले सुनवाई की मांग, शीर्ष न्यायालय सहमत

प्रभात खबर-5 अगस्त 2026

सुप्रीम कोर्ट पहुंचे छल छात्रों ने कहा ओएमआर शीट में बदल गये उत्तर-

ऐजेसिंयां नयी दिल्ली

नीट-यूजी 2026 को लेकर विविाद थामने का नाम नहीं ले रहा हे। परीक्षा में शामिल छल अभ्यर्थियों ने एनटीए द्वारा जारी ओएमआर शीट में गंभीर गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्चकांत, न्यायमूर्ति जाॅयमाल्वा बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने आगामी काउंसिलिंग प्रक्रिया शुरू होने से पहले मामले पर त्वरित सुनवाई करने की मांग को स्वीकार कर लिया है। अधिवक्ता ने पीठ को बताया कि 600 से 650 से अधिक अंक पानेवाले इन मेघावी छात्रों का दावा हे कि एनटीए की वेबसाइट पर अपलोड हुई ओएमआर शीट की स्कैन काॅपी में उनके उत्तर वे नहीं हैं जो उन्होंने परीक्षा कंेन्द्र पर भरे थे। छात्रों का तर्क है कि यदि काउंसिलिंग से पहलं ओएमआर शीट में हुई इस कथित विसंगति का पारदर्शी समाधान नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर उनकी मैरिट रैंक और मेडिकल काॅलेज में दखिले की संभवनाओं पर पडेगा। 

आरोप-ओएमआर शीट में कई प्रश्नों के उत्तर गलत-

याचिकाकर्ता छात्रों का मुख्य आरोप हे कि परीक्षा के दौरान ओएमआर शीट में उनके द्वारा दर्ज किए गए उत्तर और एनटीए द्वारा पोर्टल पर अपलोड की गयी प्रतियों के बीच बड़ा अंतर है। कई प्रश्नों के उततर या तो बदले हुए दिख रहे हैं या गलत दर्ज हैं, जिससे उनके वास्तविक अंक प्रभावित हुए हैं। 

किए कई मेल, एनटीए ने नहीं दिया जवाब-

अदालत में दखिल याचिका के अनुसार, ओएमआर शीट में विसंगति सामने आने के बाद छात्रों ने तुरंत एनटीए को आधिकारिक ईमेल भेजे और व्यक्तिगत रूप से एजंेसी के कार्यालय भी पहुंचे, हालांकि, एनटीए की ओर से कोई संतोषजनक जवाब या समाधान न मिलने के बाद अभ्यर्थियों को न्याय के लिए शीर्ष अदालत का रूख करना पड़ा। 

पहली बार नहीं, जब छात्र ऐसे मामले ले पहुंचे-नीट-यूजी 2026 में ओएमआर शीट ओर अंक परिवर्तन को लेकर पहले भी कानूनी सवाल उठ चुके हैं। हाल ही में बाॅम्बे हाइकोर्टत्र झारखंड हाइकोर्ट और दिल्ली हाइकोर्ट में भी अभ्यर्थियों ने एनटीए पोर्टल पर अंक बदले जाने और घोषित स्कोर में अंतर को लेकर याचिकाएं दायर की और ऐसी गड़कडी पर न्याय की गुहार लगायींै। 

पेपर लीक के कारण रद परीक्षा दोबारा हुई-उल्लेखनीय है कि नीट-यूजी 2026 की परीक्षा शुरूआती तौर पर 3 मई को आयोजित की गयी थी। हालांकि, बड़े पैमाने पर प्रश्नपत्र लीक के आरोप साबित होने के बाद इसे रदद कर दिया गया था। इसके बाद एनटीए ने 21 जून को दोबारा परीक्षा कराई थी। जो अब ओएमआर विवाद के घेरे में है। 


जेपीएससी की विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में कथित अनियमितता की जांच कर रही सीआइडी ने सोमवार को पांच जिलों के 18 स्थानों पर छापेमारी में मिले दस्तावेजों के आधार पर पूछताछ तेज कर दी है।

 जेपीएससी अनयिमितता-प्रभात खबर 5 अगस्त 2026

सीआइडी ने तीन और आरोपियों को किया गिरफतार-छात्रों के दस्तावेज व चेक कोचिंग संचालकों पास कैसे पहुंचे, सीआडी कर रही जांच।

विशेष संवाददाता-रांची

जेपीएससी की विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में कथित अनियमितता की जांच कर रही सीआइडी ने सोमवार को पांच जिलों के 18 स्थानों पर छापेमारी में मिले दस्तावेजों के आधार पर पूछताछ तेज कर दी है। सीआइडी ने कथित रूप से कोचिंग संचालक आदित्व पांडेय को धनबाद तथा हजारीबाग से लालू यादव और प्रदीप यादव को पूछताछ के लिए पकड़ा है। 

इसके अलावा टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह, मार्केटिंग मैनेजर अभय वितारी और जेपीएससी के प्रोग्रामर उस्मान से भी पूछताछ की गयी। सूत्रों से मिली जानकारी के अनूसार, सीआइडी की टीम छापेमारी के दौरान बराबम ब्लैंक चेक और अभ्यार्थियों के दस्तावेजा के बारे में जानकारी ले रही है। पूछताछ में यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि ब्लैंक चेक किसके थे और इन्हें किन कारणों से लिया गया था। जांच टीम यह भी जानना चाहती है कि अथ्यार्थियों के एडमिट कार्ड, मार्कशीट ओएमआर शीट की कार्बन काॅपी और अन्य हस्तावेज आरोपियों के ठिकानों पर क्यों रखे गये थे। 

कोचिंग संस्थानों की भूमिका की जांच--

सीआइडी कोचिंग संस्थानों में होनेवाली गतिविधियों और टीडीपीएल कंपनी से जुडे लोगों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही है। अधिकारियों के स्तर पर यह जानकारी जुटायी जा रही है कि कोचिंग सेंटर में अभ्यर्थियों से किस तरह का काम कराया जाता था और परीक्षा प्रक्रिया से जुडे लोगों के साथ उनका संपर्क कैसे था। जांच टीम यह भी पता कर रही है कि किन अभ्यर्थियों ने आरोपियों को चेक दिया थे। 

नौकरी के बाद भुगतान की आशंका--

पूछताछ में इस बिंदू पर भी फोकस है कि क्या कुछ अभ्यर्थियों से नौकरी के बाद पैसे या जमीन देने का वादा लिया गया था। बराबम कागजात और बैंक रिकाॅर्ड के आधार पर लेन-देन की संभावित कडियों को जोडा जा रहा है। सीआइडी यह भी जांच रही है कि जमीन से जुडे़ दस्तावेज किन अभ्भ्यर्थियों के हैं और उनका इस्तेमाल किस उद्वेश्य से किया जाना था। सूत्रों के अनुसार कई ब्लैंक चेक सीआईडी को मिले हैं। इसकी जांच हो रही है। पर सीआइडी ने इस संबध में किसी भी जानकारी की पुष्टि नहीं की है। 

पूछताछ के बाद आगे बढ़ेगी जांच--

सीआइडी आधिकारियों के अनुसार पूछताछ के बाद जांच की दिशा और स्पष्ट होगी। बयानो का मिलान छापेमारी में बरामद चेक, बैंक दस्तावेज, इलेक्ट्रानिक उपकरण और अभ्यर्थियों के कागजात से किया जायेगा। इसके आधार पर सीआइडी आगे की कार्रवाई और अन्य संदिग्धों की भूमिका तय करेगी। छापेमारी, और पूछताछ को लेकर सीआइडी ने अब तक आधिकारिक रूप से विस्तृत जानकारी जारी नहीं की है। 

परीक्षा अनियमितता मामले में बड़ी कार्रवाई-

झारखंड अपराध अनुसंधान विभाग सीआइडी ने झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में अनियमितता से जुडे एक मामले में तीन लोगों को मंगलवार को गिरफतार किया। इनका नाम उमेश कुमार, बुद्वेश्वर भगत और रमेश कुमार है। सीआइडी ने बताया कि यह कार्रवाई कांड संख्या 16-26 के तहत प्रप्त लाक्ष्यों के आधार पर की गयी हे। जांच में डिजिटल साक्ष्य और अथिलेखीय साक्ष्य भी बरामद किये गये हैं। 


Thursday, August 6, 2026

Welcome in Village

 

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आदिवासी-मूलवासी किसानों जंगल-जमीन लूटने का नया हथियार -भूमि बैंक

 आदिवासी-मूलवासी किसानों जंगल-जमीन लूटने का नया हथियार -भूमि बैंक 

भूमि बैंक बनाने की लिए सरकार कौन सा नीति -नियम अपनाया था। किस आधार पर जमीन के किस्मों के प्लाॅटों को चिन्हित करने का क्या मापदंड अपनाया जाए, क्या इसकी कोई नीति बनी थी। यही नहीं भूमि बैंक का इस्तेमाल/उपयोग कौन करेगा, किस तरह से उपयोग किया जाएगा, इसको उपयोग करने के लिए कौन अधिकृत होगा, इसके लिए क्या नीति बनायी गयी है, यह स्पष्ट करना चाहिए। 

यदि भूमि बैंक बनाने की नीति बनी थी तब कृषि व्यवस्था, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, संस्कृतिक, परंपरागत-जीवनशैली और पर्यावरण को संरक्षित और विकसित करने के लिए क्या योजना बनायी गयी है। इस पर भी मंथन करने की जरूरत है। इसकी जानकारी राज्य के ग्रामीण, आदिवासी, मूलवासी, दलित, किसानों को देना चाहिए। क्योंकि झारखड का भू-भाग पहाड़ी और जंगल-झाड़ी से अच्छादित है। राज्य के 24 जिलों का भौगोलिक स्थिति, लैंण्डस्कैप अलग अलग है। कोई जिला समतल है, तो कोई जिला जंगल-पहाड़ों से अच्छादित है। अलग-अलग भौगालिक पहचान के साथ वहां के आदिवासी-मूलवासी सामुदाय की बोली-भाषा, रीति-संस्कृति की भी अपनी विशिष्टता है। इसके साथ ही प्रकृतिक उत्पाद, फूल-फल भी वहां के प्रकृति और मौसम के आधार पर निर्भर करता है। 

जब राज्य के कृषि व्यवस्था की को समझने के लिए जरूरी है कुछ बुनियादी आधार को समझने की। पहाड़ी इलाकों की जमीन ढ़लाउ होती है। ग्रामीण आबादी /समुदाय इसी ढ़लाउ जमीन पर खेती-बारी करता है। बरसात का पानी ढलाने के टांडं, गोडा, बारी-झारी, पेड़-पौधों को सिंचते हुए नीचे के चंवरा खेतों को सिंचते हुए सबसे नीचे के गड़हा दोन या एक नंबर के खेतों में पहुंचती है। सबसे नीचे वाले खेत ही बहु फसली भी होती है। यही ग्रामीण इलाके का जीवित जलस्त्रोत भी है। 

समतल इलाके में अधिकांश जमीन पर खेती की जाती है। इन इलाकों में सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था हो तो सालों भर खेती की जा सकती है। इन इलाकों में भी टांड, चैंरा, दोन और गढ़हा दोन है। टांड में गोड़ा, मंडुआ, शंकर कंदा, उरद, कुरथी, गंगाई, जौ, बजरा, तील, सुरगुजा खेती की जाती है। चैंरा में हल्का धान, दोन और गढ़हा दोन में देर से तैयार होने वाला धान की खेती करते हैं। ये सभी बरसाती खेती है, जो सिर्फ बरशा पानी से स्वातः सिंचता है। 

झारखंड का एक-एक इंच जमीन बहु-फसली है

राज्य की बड़ी आबादी के उनके नाम से भूमि नहीं है-फिर भी वह भूमि का मालिक हैनदी-का बहता पानी पर किसी एक परिवार या कोई एक गांव मालिक नहीं होता-नदी के उदगम से लेकर जिस भी इलाके से, गांवों से होकर नहीं बहती है, जितनी दूर नदी की धारा बहती है-उतने दूर तक के धरती सिंचती है। उतने दूर तक  मनुष्य से लेकर पेड़-पौधे, झाड़-जंगल, जीव-जंतु, गांय, बैल, बाघ, भालू, सभी को जीवन मिलता है। सबकी जिंदगी सिंचती है। तब धरती फूलती-फलती है, सामुदाय भी फूलता-फलता है। 

आखिर गांव का परिभाषा सरकार के नजर में क्या है? क्योंकि भूमि बैंक में शामिल जमीन के प्लाॅटों में -गैर मजरूआ आम भूमि के प्लाॅटों में सबसे ज्यादा रास्ता का ही प्लाॅट है। 

झारखंड का परंपरागत गांव

हम गांव किसको मानते हैं -आबादी का समूह। घरों का समूह। हर घर का घर-बारी होता है। बारी-झारी होता है।  खेती-किसानी के लिए हर परिवार -गाय, बैल, बकरी, भेड़, सुवर, मुर्गी-चेंगना, बत्तक पालता है। इन पलातू जीव-जंतु के चरने के लिए, आने-जाने के लिए, जगह तो चाहिए ही। किसान हल-बैल लेकर खेत-टांड जोतने जाएगें, उसके लिए छाउर-चैड़ा कच्चा रास्ता होता है।  किसानों को अपने खेतों तक हल-बैल ले जाने के लिए रास्ता होता है। गांव मावेशियों को चराने, नहलाने-धोने, पानी पिलाने के लिए गांवों के  आबादी क्षेत्र में और गांव के सीमा में बहती नाला, छोटी नदियों का होना जरूरी है। ये छोटी नदी-नाला जीवित रहेगा-तभी गांव का सामाजिक, आर्थिक, कृषि व्यवस्था संरक्षित और विकसित होगा। 


गांव का रास्ता-पगडंडी ही गांव के सामाजिक, आर्थिक, संस्कृतिक विकास का हाइवे है-  भूमि बैंक में शामिल गैर मजरूआ आम भूमि के किस्म में सबसे अधिक प्लाॅट रास्ता से संबंधित है। भूमि बैंक में शामिल प्लाॅटों की अध्यायन करेगें, देखेगें तब यह सवाल उठता है कि आखिर सरकार के रास्तों वाले प्लॅटों को क्यों भूमि बैंक में शामिल किया ? सरकार के नजर में गांव में रास्ता नहीं होना चाहिए? आप भूमि बैंक में शामिल भूमि के प्लाॅटों का अध्यायन करगें तो यह सवाल आप की भी बेचैनी बढ़ाएगा।  किसी भी गांव का नाम दिमाग में आते ही, तरह-तरह के विशाल पेड़-पौधे, बांस का झुंड, टंगरा/चटटान, अखड़ा, सरना, मसना, कब्रिस्थान, हड़गड़ी, ससनदीरी, मरघटी डाडी, चुंवा, कुंआ सभी दिखने लगता है, ये गांव के किस स्थान में किस दिशा में अवस्थित है। कौन रास्ता किसके घर तक जाता है। उपर टोला, नीचे टोला, पाहन टोली, अम्बा टोली, पुजार टोली, लोहरा टोली, कुम्हार टोली, घांसी टोली, तुरी कोचा, महरा/अहिर कोचा सभी को एक दूसरे से जोड़ने के लिए कई रास्ते रहते हैं। यही है गांव, जहां सभी जाति-समुदाय के समरसता की आत्मा बसती है।  

सरकार नहीं चाहती है कि किसानों के खेतों की बीच में मोटा आड़, नाला और पाइन रहे-

रघुवार सरकार द्वारा बनाये गये भूमि बैंक का अध्यान करेगें, तो यह समझ में आता है कि ग्रामीणों के खेत-टांड के बीच मोटा आड़ नहीं होना चाहिए। नदी-पाइन, नाला भी नहीं हो, शायद इसीलिए सभी गांवों के खतों के बीच मोट आड़ वाले प्लाॅट, पाइन वाले प्लाॅट, गढहा वाले प्लाॅट, को चिन्हित कर भूमि बैंक में शामिल किया गया है। 

भूमि बैक में शामिल जमीन का उपयोग करने के लिए कौन अधिकृति है-

भूमि बैंक किसके लिए बना है? इसका उपयोग कौन करेगा? इस सवाल को समझने के लिए पिछली सरकार द्वारा आयोजित मोंमेंन्टम झारखंड के उदेश्यों को समझना 2017  में पहला मोमेंन्टम झारखंड का आयोजन 16-17 फरवरी को किया गया था। उस समय राज्य सरकार मोंमेंन्टम झारखंड उत्साव में आये कंपनियों, देशी-विदेशी निवेशकों के समक्ष अपनी रिपोट पेस कर घोषणा किया था-कि सरकार ने निवेशकों को आसानी से जमीन उपल्बध कराने के लिए 21 लाख एकड़ जमीन भूमि बैंक में सुरक्षित रखा है। मोमेंन्टम झारंखड का लोगो  ““उड़ता हाथी ““  सभी ने देखा था। 

(तत्कालीन सरकार का रिपोट-पर आधारित)


Wednesday, August 5, 2026

khunti District ke karra Block---Grameenon ka Awaj Buland karta Yah Play Card







 

क्या है स्वामित्व योजना?

 क्या है स्वामित्व योजना?

केंन्द्र सरकार की यह योजना राष्ट्रीय पंचायती दिवस 24 अप्रैल 2020 को शुरू किया गया था। प्रचायती राज मंत्रालय ही इस योजना को लागू कराने वाला नोडल मंत्रालय है। राज्यों में योजना के लिए राजंस्व/भूलेख विभाग नोडल विभाग है। ड्रोन के जरिये प्राॅपर्टी के सर्वे ंके लिए सर्वे आॅफ इडिया नोडल एजेंसी है। योजना का मकसद है कि ग्रामीण इलाकों की जमीनों का सीमांकन ड्रोन सर्वे टेक्नोलाॅजी के जरिए होगा।  इससे ग्रामीण इलाकों में मौजूद घरों के मालिकों के संपत्तियों का मालिकाना हक का एक “प्राॅपर्टी कार्ड ”रिकाॅर्ड बनेगा। वह इसका इस्तेमाल बैंकों से कर्ज लेने के अलावा अन्य कार्यों में भी उपयोग कर सकता है। 


आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्राकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शक्तियों का हमला तेज होता जा रहा है

 आदिवासी ईलाके में जब अंग्रेज शोषक शासकों, जमींनदारों और इजारेदारों द्वारा आदिवासियों के स्वाशान व्यवस्था पर चारों तरफ से हमला कर दिया था तब बिरसा मुंण्डा ने कहा था देखो-हमारी धरती धूल की तरह उड़ी चली जा रही है। आज वैश्विक पूंजी बाजार में आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्राकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शक्तियों का हमला तेज होता जा रहा है। आदिवासी किसानों के परंपरागत अधिकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, खूंटखटी अधिकार, विलकिनसन रूल, पेसा कानून और 5वीं अनुसूचि में प्रावधान अधिकारों पर काॅरपोरेट कंपनियों का बुलडोजर चल रहा है। विस्थापन की लड़ाई -जंगल, जमीन, खनिज के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ आदिवासी, मूलवासी, किसान, मजदूर समुदाय जाति, धर्म, वर्ग और राजनीति से उपर उठकर संगठित शक्ति बन कर संघर्ष की परंपरा रही है। जो जीत की गारंटी करता था।  

लेकिन आज के पूंजीवादी बाजार व्यवस्था में स्वंय देश की कल्याणकारी सरकार देश की संवैधानिक संघीय ढंचों को ध्वस्त करने काम कर रही है। संविधान के लोकतंत्रिक बुनियाद का तहस-नहस कर दिया है। आदिवासी, दलित, किसानों एवं मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों में बहुत सारे संशोधन पूंतीपतियों और कारपोरेट घरानों के हित मे ंकर चुका है। धर्म मानने की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, खत्म हो चुकी है। जो सामुदाय की सामूहिक-संगठित प्रतिरोध की शक्ति को कमजोर करने का बड़ा हथियार सिद्व होता जा रहा है। 


  देश की वैश्विक नीति विश्व बैंक और काॅरपोरेट घरानों के दिशा निर्देशों, पूंजिपतियों के मुनाफा कमाने की होड़ एवं कल्याणकारी राष्ट्र (देश) एवं राज्य की बदलती भूमिका ने देश के आदिवासी, मूलवासी किसान, दलितों के परंपरागत संवैधानिक अधिकार को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को जहां सरकार विकास का पैमाना मानती है, वहीं निजी पूंजि को भी तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए भूमि की सामुदायिक स्वामित्व के रिकार्ड एवं पंजीयन व्यवस्था को अपने अनूरूप बदल कर  भूमि की खरीद-बिक्री में तेजी लाना सरकार अपनी प्राथमिता मानती है। इसके जमीन के सभी परंपरागत भूमि दस्तावेजों, खतियान पार्ट वन, खतियान पार्ट टू, गांव का नक्सा, वीलेज नोट सभी को लैंण्ड रिकार्ड मोडनाईजेशन कार्यक्रम के तहत  डिजिटल लैंण्ड पार्सल मैप, बनायी गयी हैै। इस डिजिटल रिकार्ड का संचालन एवं नियंत्रण की जिम्मेवारी एनआईसी को दिया गया है। जिसमें भूमि के मालिकाना का रिकार्ड, संपत्ति कर/टैक्स एवं भूमि के खरीद-बिक्री की प्रक्रिया भी पूरी की जाती है। इस प्रक्रिया में ग्राम सभा, आदिवासी समुदाय, किसानों के सहमति-अहसमति देने-लेने की कोई जगह नहीं है। ताकि सरकार रियल इस्टेट, देशी-विदेशी कंपनी जिससे भी जमीन चाहिए, आसानी से उपलब्ध किया जा सके।

ग्लोबल पूंजी बाजार की व्यवस्था ने भोजन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य को मुनाफा का मूल आधार के रूप में विकसित किया। जिंदगी की इन मूलभूत जरूरतों को निजी पूंजी/ कंपनियों के स्वामित्व के हवाले सरकार ने कर दिया है।  इसके लिए दो बातों की आवश्कता थी पहली-देश के लोकतंत्र एवं लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को समाप्त करना, तथा बाजार में राज्य के हस्तक्षेप को समाप्त करना। दूसरी-प्राकृतिक संसाधनों, जंगल, जमीन, पानी, और खानिज पर कब्जा करना। इसका मूल उद्वेश्य, राष्ट्र और राज्य की संप्रभूता को समाप्त करना और बाजार की पूजिवादी व्यवस्था को मजबूत करना।

देश की लोकतंत्रिक व्यवस्था अलोतंत्रिक हो गयी है। अपने आम नागरिकों के कल्याण की जगह काॅरपोरेट घरानो, पूंजीपतियों के कल्याण की चिंता सर्वोपरि होते जा रही है। यही कारण है कि देश के संविधान में प्रावधान अनूसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़े समुदाय के सामुदायिक अधिकारों को खारिज कर काॅरपोरेट के हाथों को मजबूत किया जा रहा है। 

ंवल्डबैंक सहित अन्य पूंजिपतियों के द्वारा भोजन, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मौलिक अधिकारों का नीजिकरण के अब मुकाफा कमाने का सबसे बड़ा साधन जंगल, जंमीन और खानिज बन गया है। वल्डबैंक ने जमीन के खरीद-बिक्री एवं जमीन अधिग्रहण कानूनों की जटिलताओं को सरलीकरण करने का प्रयोजन किया है। इस उद्वेश्य की पूर्ति के लिए ही भूमि के दस्तावेजों का डिजिटालाईजेशन किया गया। 5वीं और 6ठी अनुसूचित क्षेत्र में बडे पैमाने पर समाज का समुदायिक भूमि है जिसको गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला, खेल मैदान के रूप में है। साथ ही आदिवासी समुदाय के धर्मिक स्थल सरना, ससनदीरी, जाहेर, जहिरा, बहा सरना, केडा सरना, गुमी सरना, देसाउली है। 2014-15 में ये सभी भूमि केंन्द्र सरकार के निर्देश पर 22 लाख एकड जमीन भूमिबैंक में शामिल कर दिया गया। जिससे सिंगल विंडो सिस्टम से धडले से खरीद-बिक्री हो रहा है। 


2020-21 में मोदी सरकार ने  24 ंअप्रैल 2020 को केंन्द्र सरकार ने देश में स्वमित्व योजना लागू करने की घोषणा की। घोषित स्वमि

त्व योजना के तहत डिजिटल इंण्डिया लैंड रिकाॅर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) चलाने की योजना बनायी गयी। इस योजना के तहत ड्रोन से गांवों की संपति का सवेक्षेण कर जीअईएस मानचित्र बनाये जाऐगें। साथ ही जमीन मालिको को प्राॅपटी कार्ड बना कर दिया जाएगा जो 14 डिजिट का होगा। ये जीआईएस नक्से और स्थानीय डेटाबेस ग्राम पंचायतों और और राज्य सरकार के अन्य विभागों द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग किये जाएगें। इस स्वमित्व योजना का कई उदद्वयों के साथ मूल उद्वेश्य एक राष्ट्र एक साॅफटवेयर (व्दम छंजपवद व्दम ैवजिूंतम) व्यवस्था करना है। ( दिशानिर्देश पेज 26)





 आखिर यह गडा बदलाव किसके लिए

डिजिटल इंडिया लैंड रिकाॅर्ड अधुनीकिरण ने भारत को बदल रहा है। देश के नियम-कानून को बदल दे रहा है। देश की संघीय व्यवस्था को बदल रहे हैं। परंपरागत गांव का अस्तित्व बदल दिया जा रहा हैं। गांव की भौगोलिक स्थिति और समाज की सामाजिक मूल्य बदल दिया जा रहा है। 

बदलाव होना चाहिए, लेकिन बदलाव लाने का उद्वेश्य क्या है? बदलाव लाने के केंन्द्र में किनको रखा गया है? क्या अमीरों को, पूंजीपतियों को, देश -विदेश के काॅरपोरेट घरानों को या आदिवासी, दलित, किसान, मेहनतकश मजदूरों को? यह सवाल महत्वपूर्ण है। 

जमीन का जो अधुनिकीकरण व्यवस्था स्थापित किया जा रहा है, वह पढे़-लिखे समुदाय के लिए निश्चित तौर पर उपयोगी साबित होगा। क्योंकि इस व्यवस्था में सारी जानकारियां आॅनलाईन /वेबसाईड में उपलब्ध होगा। इसको उपयोग करने के लिए बहुत सारी जानकारी रखना जरूरी होगा। साथ ही कम्प्युटर, लेपटाॅप, स्मार्ट फोन जरूरी होगा। इसको उपयोग करने के लिए बिजली की उपलब्ध के साथ आॅनलाईन कनेक्शन /नेटवार्क बिना बाधा के सतत उपलब्धता अतिअवश्यकता होगा। राज्य के अल्पशिक्षित ग्रामीण किसान को इसका कितना लाभ मिलेगा यह भी विचारणीय बिंन्दु है। 




इस बदलाव से आदिवासी-मूलवासी सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा

गांव के सीमा के भीतर या बाहर के गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास जमीन को भूमि बैंक द्वारा आॅनलाईन किसी को भी हस्तांत्रित करने से, अब गांव की डेमोग्राफी, जियोलाॅजी, जैविक विविधता, विविधता में एकता वाली सामाजिक ताना-बाना, परंपारिक सामाजिक व्यवस्था-पड़हा व्यवस्था, राजी पड़हा, मानकी-मुण्डा, डोकलो-सोहोर, मांझी-परगना व्यवस्था सभी कमजोर हो जाएगा।

इसलिए ऐसा होगा-क्योंकि गांव के बीच में, गांव-टोली-महला के आस पास, या किसानों के ख्.ोत-टांड, के बीच, या अगल-बगल जो भी गैर मजरूआ आम, खास जमीन है, परती भूमि, जंगल-झाड को सरकार किसी भी जाति-समुदाय, या भाषा-संस्कृति के लोगों को हस्तांत्रित कर रही है। इससे एक भाषा-भाषी या जाति समुदाय के बीच अब कोई भी बाहरी समुदाय को बसाने का काम किया जा रहा है।

प्रकृति-पर्यावणीय आदिवासी-मूलवासी गांवों का अस्तित्व खतरे में है। 

भूमिं बैंक के लिए -गांव के बीच, खेत-टांड के बीच, गांवों सीमाओं के जिन गैर मजरूआ आम, खास जमीन को चिन्हित किया गया है-उन जमीनों के हस्तांत्रण के बाद उस इलाके में पहले की स्थानीय आबादी केवल नहीं रहेगी, लेकिन बाहर से आने वाली आबाद स्थानीय आबादी से ताकतवर होगी। ऐसे परिस्थिति में उस गांव का परंपारिक भाषा-संस्कृति, रहन-सहन के साथ गांव का नाम भी बदल जाएगा। जैसे कि विकास के नाम पर पूरे झारखंड के गांव गायब होते गये, गांवों का नाम अब नगर, बिहार, पूरी (जैसे अशोक बिहार, कुसुम बिहार, प्रेम नगर, नयन नगर, गंगानगर, जमुनानगर, चनक्यपुरी आदि)  में तब्दील होता जा रहा है। 

जबकि परंपारिक आदिवासी गांवों का नाम पेड़, पौधों, जंगली जनवरों, नदी, नालों, झरनों, पशु-पक्षियों के नाम से रखा गया है। साथ ही हजारों गांवों का नाम गांव के प्रधान याने गांव बसाने वाले पहला बुजूर्ग के नाम पर नामकरण किया गया है।

बडीबिरिंगा, कनारोंवा, लोवागड़ा, अंबाकोना, डाउकोना, जमटोली, करीमाटी, सिमडेगा, मयोमडेगा, लतापानी, सराईपानी, हेसलाबेड़ा, महाबुआंग, किरीबुरू, बाघलता, सारूबेड़ा, मेघाहातुबुरू, कोयोंगसेरा, बगीसेरा, रंगामाटी, टुटवापानी, जोकिपोखर, सेरेंदआ, सरजोमदआ, कहुपानी, जिलिंगसेरेंग, बिलसेरेंग, महुंवाटांड, कादोपानी, चंपाबहा, जोजोहातु, बुरूहातु, मरंगबुरू, बहाबुरू, गरूड़पीडी, हेसो, निमडीह, जोजोसेरेंग, सरजोमडीह, बकाकेरा, लउाकेरा, महूंवाटोली, बांसटोली, जनुमपीडी, बंडआजयपुर, नामकुम, सियारटोली,  आदि.।..

झारखंड 24 जिलों का है। इसमें हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर, कोडरमा, रामगढ, गिरिडीह औधोगिक जिले हैं। यह बाहर से आयी आबादी भी अधिक है। तब स्थनीयता नीति के तहत अब ये भी झारखंडी माने जाएगें और यहां स्थनीय समुदाय को जो सुख-सुविधा राज्य और केंन्द्र सरकार द्वारा मिलता है, इन्हें भी मिलेगा। हां नौकरियों में आरक्षण राज्य की नयी आबादी के आधार पर ही निर्धारण होगा।  तब यहां की कुल आबादी में अब आदिवासी-मूलवासियों की आबादी का ग्राफ सबसे नीचे चला जाएगा। एैसे स्थिति में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों की पहचान स्वत ही खत्म हो जाएगी। 

झारखंड में लगभग 48-50 नगरीय शहर हैं। जहां हर औद्योगिक शहर में हजारों अपाॅटमेंट बन गया है जहां बडे औद्योगिक घराने और व्यवसायिक घराने की आबादी है। इसमे राज्य से बाहर की आबादी भी बडी संख्या में आकर बसी है। दूसरी ओर शहरीकरण, और उद्योगों, खदानों के कारण स्थानीय आदिवासी-मूलवासी, किसान, मजदूरों की बडी आबादी विस्थापित हो गयी है। जो रोजी-रोटी के लिए अन्य राज्यों में पलायन कर गयी है। 

2001 में झारखंड की कुल आबादी का 26.3 प्रतिशत आदिवासी आबादी थी। 2011 के जनगणना के आधार पर राज्य की कुल आबादी का 26.2 प्रतिशत आदिवासी रह गये। याने 10 साल में 1 प्रतिशत आदिवासी घट गये। चिंता का विषय हे कि 2011 के बाद 25 वर्षों में आदिवासी आबादी कितना रहेगा। जिस तेजी से बाहरी आबादी हावी होता जा रहा है।