जनअधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष का सफर अभी जारी है...
डायरी-21 जून 2001, रांची स्थित एचपीडीसी में राज्य के कई हिस्सों के जनआंदोलनों में संघर्षरत साथियों की जुबानी, जो आज इतिहास बन गया है।
आजादी के बाद 60 वर्षों में करीब 60 लाख झारखंडी अपने जंगल-जमीन और विरासत से विस्थापित हो चुके है। झारखंड अलग राज्य की लड़लाई में हमलोगों ने नारा दिया था-कैसे लोगे झारखंड-लड़के लेगें झारखंड। अब नारा दे रहे हैं-कैसे लिया झारखंड-लड़के लिया झारखंड। जेकिन आज भी झारखंडी आदिवासी-मूलवासी, किसान, कहीं बड़े परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन के खिलाफ लड़ रहे हैं, तो कहीं, फील्ड फायरिंग रेंज के खिलाफ, तो कहीं उत्खनन -खदान के खिलाफ, तो कहीं शरही इलाके में झुगी-झोपड़ी उजाड़ने के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।
राज्य में अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पूंजीवाद तथा नवसाम्रज्यवाद अपना पांव फैलाना शुरू कर दिया है। शहरीकरण, सुंदरीकरण, रोड़ चौड़ीकरण के लिए शहरी क्षेत्र के गरीबो की लाखों झोपडियां और दुकाने उजाड़ना शुरू कर दिया है।
अलग राज्य बनने के पहले कोयलकरो परियाजना बनाने का जिम्मा एनएसपीसी को दिया गया था। कोइलकारो जनसंगठन 256 गांवों की र्ढाइ लाख आबादी, 55 हजार एकड़ खेती की जमीन, 27 हजार एकड़ जंगल के साथ अपना भाषा-सांस्कृति, पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहा था।
राज्य बनने के बाद अब परियोजना का निर्माण के लिए एनएचपीसी को हटाकर एनरोन तथा फ्रांस की एक बड़ी कंपनी को जिम्मा दे रहा हैं अब हमारी लड़ाई सरकार से नहीं है, लड़ाई अब बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ होगी।
जगत जी कुटकू डैम से होने वाल विस्थापन के खिलाफ चल रहे आंदोलन का सक्रिय लीडर है। आंदोलन पर चर्चा करते बताया-1984 में एक माह तीन दिन तक बांध को रोकने के लिए स्थानीय किसानों ने धरना दिया। जिस किसान का एक लाख की संपत्ति चली गयी-उसको मुआवजा के तौर पर केवल 15 हजार रूपया मिला। 1995 में फिर से धरना दिये । पहला फेज में 17 गांव डुब चुका है, अभी और 32 गांव डुबने वाला है। 1966-67 में सर्वे हुआ था, उस समय 600 घर था प्रभावित, इसमें 222 परिवार को नौकरी दिया। बाकी को कुछ नहीं मिला। बहुतों को रहने के लिए घर भी नहीं मिला।
1992 से कुटकु डैम क्षेत्र में स्थानीय समुदाय ने विस्थापन रोकने के लिए संघर्ष समिति बना कर लड़ रहे हैं। जगत सिंह ने बताया-अभी भी संघर्ष जारी है। यहां के विस्थापित कुछ लोग छत्तीसगढ जा कर बसने लगे। जब बिहार था -तब विस्थापितों को वहां रहने दिया। छत्तीसगढ, झारखंड और उत्तरांचल ये तीनों राज्यों को पूर्नगठन 2000 में हुआ। छत्तीसगट नया राज्य बनने के बाद कुटकु डैम विस्थापितों को वहां से हटाया गया। घर बना कर रहने के लिए भी जमीन नहीं दिया जा रहा है।
दामोदर घाटी-इस इलाके में पिपरवार कोयला खदान से बहुत अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। जिसके पास 2 एकड़ से कम जमीन था-उसको मुआवजा के नाप पर केवल 7 सौ दर पर मिला। इस इलाके में महुआ पेड की अधिकता थी जिससे काट दिया गया। हर साल प्रत्येक पेड करीब 3000 रू तक का पैदवार देता था। अब सब समाप्त हो गया।
रजरप्प क्षेत्र-लोगों ने बताया 6 गांव पूरी तरह विस्थापित, 4 गांव आंशिक। 40 परिवार मछुवारों अधिक दिक्कत हो रहा है। विस्थापितों में से करीब 450 लोग छाई लोडिंग का काम कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि, खदान होगा तो नौकरी मिलेगा, लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल जाती है।
उरीमरी कोलयारी, हेंन्देगीरी कोलयारी, गोविन्दपुर कोयलारी, बोकारो थार्मल पावर, गामिया, तेनुघाट डैम इन सभी परियोजनाओं से बडी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं। बोकारी जिला और हजारीबाग जिला में विस्थापितों की फौज खडी हो गयी। जो भूमिहीन हो गये हैं। रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। बोकारो की सामाजिक कार्यकर्ता तारा क्रांति कहती है-इलाके में पीने का पानी नहीं मिलता है। महिलाएं दो किलोमीटर तक पानी लाने जाती हैं। लडकियां 6-7 क्लास तक ही पढ़ पाती हैं गरीबी के कारण। महिलाओं की बडी आबादी महानगरों में पलायन कर रही है जहां उनका शरीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण होता है।
गोला, पेटरवार इलाके में विस्थापन की लड़ाई नहीं लड़ी गयी। विस्थापित जमीन से उजड़ने के बाद जंगलों में जा कर बसने लगे। रोजगार के लिए केंउदु पता लोड कर जिंदगी बसर करने लगे, लेकिन वन विभाग ने उन लोगों पर केस ठोक दिया।
पश्चिम सिंहभूम में 1980 में ईचा खरखाई डैम बनाने की योजना लायी गयी। क्षेत्र के आदिवासी-मूलवासी किसान संगठित होकर विस्थापन के खिलाफ संघर्ष करना शुरू कर दिये। संगठन के नेता गंगाराम कलौंडिया की हत्या 1982 में कर दी गईं
पोटका के सिद्वेश्वर सरकार और कुमार चंन्द्रमार्डी कहते हैं-जादूगोड़ा के यूसिएल खदान क्षेत्र में रह रहे लोग तावा में डाले गए मच्छली की तरह हैं। विस्थापितों को वहां नौकरी तो दिया जहां यूरेनियम रेडियेसन से हर तरह की बीमारी से लोग अंसमय काल के गाल में समा रहे हैं। बच्चे अपंग पैदा हो रहे हैं। महिलाएं बांझ की शिकार बनते जा रही है।
कुमारी संजय-अपने जंगल-जमीन से लोग उजड जाने के बाद शहरों में आकर झुगी-झोपडियों में रहकर रोजी-रोटी कमाने लगते हैं। रांची शहरी ़क्षेत्र में बहुत बड़ी आबादी झुगी-झोपडियों में रहती है। 1994 में झुगी-झोपडियों में रहने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए झुगी-झोपडी संघर्ष मोर्चा बनाया गया। आरएमसीएच क्षेत्र में 35 वर्षो से लोग रह रहे थे। राज्य बनने के बाद इन्हें हटा दिया गया। झुगी-झोपडियों से विस्थापित आबादी कहां चली गई किसी को नहीं पता। रांची रेलवे स्टेशन के आस-पास 8 बस्तियां हैं। गांव से आकर लोग झुगी-झोपडियों में बस गये हैं। राज्य बनने के बाद इन्हें भी हटाने की योजना बनायी गई है।
पुष्पा-कुटकू डैम विस्थापित
पुराना आंकड़ा के अनुसार 633 परिवार विस्थापित हुए। कुटकू भरना नदी त टपर कुरा, चापिया और पोलपोल गांव था। विस्थापितों के पास रोजगार का साधन अब बीडी पता ही रह गया है। सभी लोग बीडी पता तोडते हैं जो पैसा मिलता है उसी से गुजारा करते हैं। इन साल तो बीडी पता भी नहीं तोड़ पाये। जहां से बीडी पता तोडते थे उस क्षेत्र को सरकार टाईगर प्रोजेक्ट घोषित कर दिया है। हम लोगों को बता भी नहीं चला कि कब टाईगर प्रोजेक्ट घोषित किया गया। हम लोगों तब पता चला-जब बीडी पता तोड़ने आये, तो वन विभाग जंगल में घुसने नहीं दिया।
विस्थापित परिवार-सामुएल कुजूर, गाब्रिएल कुजूर, मरियानुस कुजूर, अंतु किसान, पसकल खाखा सपरिवार छत्तीसगढ के महाराजगंज में जा कर बसे हैं। एगनेशिया कुजूर कहती है-मेरा परिवार छत्तीसगढ के विजयनगर में बसा है अब यहां भी कनहर डैम से विस्थापित होने वाला है। समझ में नहीं आता-अब हम लोग कहां जाएंगें।
नोट-विकास के नाम पर राज्य बनने तक 60 लाख से ज्यादा आदिवासी-मूलवासी आबादी अपने जल-जंगल-जमीन से उजड़ चुकी है। राज्य बनने के बाद विस्थापन का दूसरा दौर शुरू हुआ। इस पीडा के शिकार विस्थापितों दर्द है यह। जिससे मैंने अपनी नोट बुक में 2001 में दर्ज की हुं।