Thursday, June 30, 2011

आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच की बचनब्दता -२९- 30 जून २०११



SANKALAP LETA...ADIVASI MULVASI ASTITVA RAKCHA MANCH

आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच

खूंटी -गुमला
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच की बचनब्दता -२९- 30 जून २०११
द्वितीय शहादत सह संल्कप दिवस-कोरको टोली-तोरपा -खूंटी
समुन्नत झारखंड और नवझारखंड के लिए आदिवासी मूलवासी अस्त्त्वि रक्षा मंच लगातार संघर्षशील है। हमरा संघर्ष और निर्माण का स्वप्न एक ऐसी जनराजनीति से निर्देशित है जिसकी दिशा हूलगुलान के शहीदों और बिचारकों ने ही तय कर दिया था। झारखंड राज्य गठन के बाद हमारी चुनौती और हमारा दायित्व और ज्यादा गहन हो गया है। हमने देखा है कि झारखंड कारपोरेट घरानों के निशाने पर है और झारखंड की अधिकांश राजनीति इन निगमों का पिछलग्गू बन गयी है। यह सारी दुनिया के आदिवासी-मूलवासियों के संसाधनों की लूट कर पूंजीपतियों की आर्थिक संरचना का दौर है। साथ ही जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधियों का पूंजिपतियों के साथ गांठजोड़ की राजनीति कर यहां के प्रकृतिक संसाधनों का दोहन दिया जा रहा है। ऐसे दौर में आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच का साफ मानना है कि हम एक समुन्नत समाज के नवनिर्माण की नई जनराजनीतिक चेतना का विकास के पहल से ही हालात को बदल सकते हैं और इसके लिए हम सब को अपने बिचारों की धार को तेज करना होगा। कोई भी समाज या जनसंगठन बिना विचार के न तो जीवित रह सकता है और न ही वह समकालीन चुनौतियों का पूरी तत्पराता के साथ मुकाबला कर सकता है। हम उन खतरों से वाकिफ हैं जो हमारे इर्दगिर्द मौजूद है। हमारी भाषा, संस्कृति, लोकाचार और हमारी आजीविका की संस्कृति तथा परंपरागत हुनर, तकनीक और कृर्षि-जंगल आधारित आजीविका को न केवल खत्म करने की कोशिश की जा रही है बल्कि इसे अवैज्ञानिक समझ साबित कर विनाशाकारी विकास की परियोजनाओं को थोपने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसी विकास नीति के पक्ष में बात की जा रही है जिससे न केवल परस्थिकीय संकट खड़ा हुआ है बल्कि धरती और जीवन ही संकटग्रस्त हो गया है। झारखंड की त्रासदी यह है कि झारखंडी समाज और संस्कृति में अंतरनिहित वैज्ञानिक समुन्नति की प्रक्रियाओं और प्रवृतियों को ही खारिज कर देने के लिए माहौल बनाया जा रहा है। इतिहास साक्षी है और हमारे शहीदों के विचार बताते हैं कि झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों ने जिस तरह के लयात्मक समन्वय की सामाजिक चेतना का सृजन किया था उसे और गतिशील बना कर ही संकट का न केवल मुकाबला किया जा सकता है बल्कि झारखंड के नवनिर्माण का भावी मार्ग को भी प्रशस्त किया जा सकता है। झारखंडी जनगण के सामूहिक विवेक और इतिहास चेतना में जिस तरह की राजनीतिक विरासत मौजूद है वह हमारी सबसे बड़ी ताकत है। यह न केवल सामुदायिकता और समानता के मूल्यों पर आधरित जनतंत्र की विरासत है बल्कि इसमें स्त्री पुरूष की समानता का मूल्य जीवंत है. विभिन्न कारकों और सांस्कृतिक हमलों के कारण जो विघटन हुआ है उसे पहचानने की जरूरत है और यह समझ स्पस्ट करने की जरूरत है कि झारखंड के आदिवासी मूलवासी जनगण का संघर्ष न केवल स्थानीय स्तर पर परंपरा की रूढि़यों और रूकावटों को खत्म कर एक नए समाज के निर्माण के दिशा में आगे बढ़ने के लिए है और इसके विचार और सिद्धांत के लिए दीर्घकालिक सामाजिक चेतना हमें प्रेरित करती है
झारखंड के आदिवासियों और मूलवासियों का सपना दिनां दिन कठिन होता जा रहा है. झारखंड को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया गया है जहां भविष्य बहुत अंधकारमय दिखता है. इससे बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता जनसंघर्ष को तेज करना और उसके आधार पर एक नई जनराजनीतिक बहस और चरित्र का निर्माण करना है। हमें यह बताना होगा कि झारखंडी मूल्य और विचार क्या हैं तथा उसे जीवन में किस तरह सार्थक किया जा सकता है। हमारे संगठन को पूरा देश इसी उम्मीद के साथ देख रहा है। हमारे संगठन न केवन दुनिया के सबसे बड़े कारपोरेट को चुनौती दी है बल्कि इस बिमर्ष को भी अपने मौलिक नारों के माध्यम से खड़ा किया है कि झारखंड की अस्मिता और अस्तित्व का वैज्ञानिक नजरिया क्या है तथा उन्नति के मानक का मतलब क्या है। हमने उस बिमर्ष को पुनः रेखांकित किया है कि समुन्नति एक प्रकृतिक अवधारणा है और यदि दुनिया के पर्यावरण की हिफाजत करनी है तो विकास के वर्तमान माडल को बदलना होगा। हमारे जनसंगठन ने यह भी स्थापित किया है कि जनसंगठन और जनांदोलन की राजनीति का वास्तविक अर्थ क्या है। हमने अपने अनुभव से सीखा है कि इतिहास केवल प्रेरित ही नहीं करता बल्कि वह गढ़ने की शक्ति भी प्रदान करता है और जनसक्रियता के व्यापक संदर्भ न केवल जनगण की राजनीतिक चेतना को उन्नत करते हैं बल्कि उनके इतिहासबोध को और ठोस बनाते हुए भावी समाज के निर्माण की दिशा में ठोस तर्क और प्रवृतियों का सृजन भी करते हैं। हम कह सकते हैं कि हमारी बचनबद्धता झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों की हिफाजत, लोगों की आजीविका संस्कृति को आगे ले जाने, भाषा और विरासत के पुननिर्माण के साथ एक ऐसी जनराजनीतिक चेतना के निर्माण के प्रति है जिससे हूलगुलानों के सपने को जमीन पर उतारा जा सके। हूलगुलानों का संदेश था कि हमें अपने अस्तित्व को न केवल बचाना है बल्कि उसे गतिशील भी रखना है और साथ ही ऐसे सामाजिक मूल्यों के साथ स्वयं को आत्मलीन करना है जिसमें एक ईमानदार और जनतांत्रिक झारखंड गढ़ा जा सके। हमारा अनुभव है कि असली ताकत तो गांवों में है और लोगों में है लेकिन इस ताकत का राजनीतिक इस्तेमाल कर जिस तरह झारखंड की छवि बना दी गयी है उसे बदलना होगा। संताल हूल और बिरसा उलगुलान ने जिस तरह का नेतृत्व विकसित किया था उसी तरह का नेतृत्व हमें भी निर्मित करना होगा। जो समझौताविहीन संघर्ष तथा जनगण के नियंत्रण में हो। हमारा साफ मानना है कि असली राजनीतिक और आर्थिक ताकत जनता में है और किसी भी निर्णय की प्रक्रिया में उसे नजरअंदाज करने की प्रवृति को खतम कर हम वास्तविक स्वशसन की दिशा तेज कर सकते हैं।
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच के विचार निर्माण की प्रक्रिया जनसमुदायों की इसी समझ से विकसित हुई है. यह कार्यभार हमारे समक्ष है कि हम इस प्रक्रिया और गति प्रदान करें। हम व्यापक लक्ष्यों के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिसमें आम आदमी की भूमिका प्रमुख है।
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच जनतांत्रिक मूल्यों पर बिश्वाश करता है। मंच व्यापक जनसमुदाय की निर्णायक हिस्सेदारी में बिश्वाश करता है। हमारी सफलता का यही मूख्य कारण है. मंच यह भी मानता है कि संकीर्ण राजनीतिक हितों से जनगण के व्यापक सपनों को पूरा नहीं किया जा सकता। मंच जनगण की सक्रियता के साथ एक जीवंत समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इतिहास से सीखते हुए हमारा अनुभव यह भी बताता है कि संघर्ष स्थानीय संसाधनों के बल पर ही मंजिल हासिल करता है। हम देख रहे हैं कि झारखंड को विखंडित करने की हर तरह की साजिशें चल रही हैं. झारखंड की अस्मिता को खत्म करने के षडयंत्र को नाकामयाब करना भी हमरा मकसद है। झारखंड को किसी भी हालत में हम भ्रष्ट तथा लुटेरे लोगों का साम्राज्य नहीं बनने दे सकते।. हूलगुलानों की सीख यही है। हमें साफ तौर पर कहना होगा कि झारखंड शोषकों और लुटेरों का चारागाह नहीं है बल्कि उन करोड़ों आदिवासियों और मूलवासियों का एक जीवन है जो श्रम की महत्ता का आदर करते हैं तथा लूट की संस्कृति से नफरत करते हैं.। कारपोरेट राजनीति और विकास की कारपोरेट नीतियों को चुनौती देने के लिए हमें अपनी परंपरा के ईमानदार तथा सादगीपूर्ण जीवन को और आगे ले जाने की जरूरत है.। दुनिया को कारपोरेट साजि’ा से बाहर निकाल का जनतांत्रिक उन्नति के रास्ते पर ले जाने के लिए हमें वैकल्पिक नीतियों को जमीन पर उतारने की दिशा में कदम बढ़ाना होगा.
आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच को मजबूत बनाने की दिशा में हमें सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ने की जरूरत है. याद रखना चाहिए कि हमें सारा देश गौर से देख रहा है। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच झारखंडियों की जनएकता को मजबूत बनाने की एक प्रक्रिया भी है और विचार भी.। साथ ही मंच मानता है कि झारखंड के किसान-कारीगर-कामगारों की व्यापक एकता भी जरूरी है.। जनता को बांटनेवाली विभाजक प्रवृतियों के प्रति हम सबको लगातार सजग रहने की जरूरत है.। झारखंड में विभिन्न तरह के विचारों के सहारे न केवल झारखंडी मूल्यों को लगतार कमजोर किया जा रहा है बल्कि जनता की एकता को तोड़ने के लिए कई तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं.। इन सबको नाकाम करने का कार्यभार भी मंच का बुनियादी दायित्व है.
इस बात को एक बार और दुहराने की जरूरत है कि जनसंगठन न केवल जनराजनीति को जन्म देता है बल्कि विचारों से लैस जनसंगठन व्यपाक बदलावों की भी दिशा तय करता है। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच को और मजबूत बनाते हुए हम अपने संसाधनों की हिफाजत करेंगे और इन संसाधनों से जो अर्थ संरचना उभरती है उसके आधार पर समुन्नत झारखंड की दिशा भी तय करेगे। एक नवझारखंड के नवनिर्माण के ऐतिहासिक दायित्व के प्रति हम सजग हैं और इस मकसद के लिए जनतंत्र को आधार बना कर हमें आगे बढ़ना है।
इतिहास गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह, बिच्छु से लड़ कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जल-जंगल-जमीन पर हमारा खूंटकटी अधिकार है। हम यहां के मालिक हैं। जब जब हमारे पूर्वजों द्वारा आबाद इस धरोहर को बाहरी लोगों ने छीनने का प्रयास किया तब-तब यहां विद्रोह उठ खड़ा हुआ। इस राज्य के जलन-जंगल-जमीन को बचाने के लिए तिलका मांझी, सिद्वू-कान्हू, फूलो-झाणो, सिंदराय-बिन्द्रय , वीर बिरसा मुंडा, गया मुंडा, माकी मुंडा जैसे वीरों ने अपनी शहादत दी। इन शहीदों के खून का कीमत है-छोटानागपुर काशतकारी अधिनियक 1908 और संतालपरगना का’तकारी अधिनियम । इन कानूनों में कहा गया है कि आदिवासी इलाके के जल-जंगल-जमीन पर कोई भी बाहरी व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकता है। यहां के जमीन का मालिक नहीं बन सकता है। हम सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान में हमारे इस क्षेत्र को बिशेष अधिकार मिला है-यह है पांचवी अनुसूचि क्षेत्र। इसे पांचवी अनुसूची क्षेत्र में जंगल-जमीन-पानी, गांव-समाज को अपने परंपरागत अधिकार के तहत संचालित एवं विकसित एंव नियंत्रित करने को अधिकार है। आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच इन अधिकारों का सम्मान करता है, और इसकी रक्षा के लिए बचनबद्व है।

संकल्प

1-छोटानागपुर का’तकारी अधिनियम 1908 के मूल धारा 46 में आदिवासियों को जो अधिकार दिया गया है, इसकी रक्षा के लिए मंच बचनबद्व है।

2-73वे संविधान सं’शोधन के तहत इस इलाके के ग्राम सभा को जल, जंगल, जमीन, गांव, समाज को संचालित , विकसित तथा नियांत्रित करने का अधिकार प्राप्त है-इसकी रक्षा के लिए मंच हमेशा संघर्ष के लिए तैयार रहेगा।

3-आदिवासी-मूलवासियों का परंपरागत अधिकार जमीन के साथ, जंगल, पहाड़, नदी-नालों, सहित तमाम जलस्त्रोतों पर है, इस पर बाहरी, सरकारी या कंपनियों का हस्तक्षेप मंच कताई स्वीकार नहीं करेगा।

4-विकास योजनाओं में हर आम किसान, महिला एंव युवाओं को बराबरी का भागीदारी बनाने के लिए मंच संघर्ष करेगा।

5-कृर्षि, पर्यावरण के विकास के लिए कारो नदी, छाता नदी, कोयल नदी सहित सभी जलस्त्रोतों का पानी किसानों के खेतों तक लिफट एरिगेशन के तहत पहुंचाने की व्यवस्था के लिए मंच हर संभव कोशिश करेगा।

6-इस इलाके में किसी तरह की परियोजनाएं, जिससे विस्थापन हो, रोकने के प्रयास जारी रहेगा।

7-विकास से लिए क्षेत्र में कृर्षि तथा वन आधारित कुटीर उद्योगों की स्थापना के लिए सरकार पर दबाव देने का लगातार प्रयास किया जाएगा।

8-’सिक्चा के क्षेत्र में हो रहे घोटालों का रोकने का प्रयास किया जाएगा

9-जनराजनीतिक चिंतन को मजबूदी देने के लिए मंच तत्पर रहेगा-ताकि झारखंड के इतिहास, धरोहर-जंगल-पानी-जमीन, गांव समाज की रक्षा के साथ ही इसका विकास को दिशा दिया जा सके।

10-जाति-धर्म, वर्ग और स्वर्थपरस्त राजनीति से उपर उठकर मंच संघर्ष जारी रखेगा ।

11-मंच स्थानीय संसाधनों, चंदा, एक एक मुठी धान, चावल के बल पर ही संघर्ष जारी रखेगा ।

12-हम विकास विरोधी नहीं हैं-विकास चाहते हैं-लेकिन हमारा-जल-जंगल-जमीन, समाज, भाषा-संस्कृतिक के कीमत पर नहीं।

13-पूर्नावास और पूर्नास्थापन नीति एक धोखा है, मंच इसे मीठा जहर मानती है। इसे जो भी स्वीकार करेगा-भविष्य नष्ट होना तय है।

14-पूर्नावास और पूर्नास्थापन नीति उनके लिए बने जो आजादी के बाद विस्थापित हो, बेघर-बार, भूमिंहीन, बेराजगारी, असिक्चा , बीमारी और कंगाली का जीवन जी रहे हैं। जब तक इन पूर्व में विस्थापितों का पूर्ण एवं आदर्श पुर्नावास नहीं किया जाएगा-झारखंड में किसी तरह का विस्थापन नहीं होने दिया जाएगा।

15-हमारा भाषा-संस्कृति, सामासजिक मूल्यों, धार्मिक अस्था, सरना-ससन दीरी, मंदिर, मशजीद, गिरजा को किसी पूर्नावास पैकेज से नहीं भरा जा सकता है, और न ही इन ही इनका पूर्नावासित किया जा सकता है।

आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच
संयोजक- प्रखंड समितियां- कर्रा, तोरपा, कमडारा, रनिया

नोट-आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच ने हुलगुलान दिवस सभा में २९-30 जून 2011 को यह संकल्प पत्र जारी किया।

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