Friday, June 2, 2017

इस धरती को हम किसी भी कीमत में लूटने नहीं देंगे -- यही हमारा संकल्प है ---और हमारे शहीद नायकों को हमारी सच्ची श्रद्धांजि भी

 एक आम बगीचा ---यह सिर्फ बगीचा मात्र नहीं है , यह पर्यावरण का सबसे बड़ा आधार है , ग्रामीण आर्थिक आधार है , यह कई पीढ़ी का दिया उपहार है , जो पीढ़ी दर पीढ़ी फल -फूल , लकड़ी , शुद हवा , पानी , छाया देते आ रहा है , अभी यह आम बगीचा आने वाले और कई  जेनेठुकरा रशन को जीवन दान देगा , इस सचाई को कोई नहीं  ठुकरा सकता है , बशर्ते की लोभी मनुष्य इससे बर्बाद ना करे।
ग्रामीण अर्थ बयवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा है।  यही नहीं ग्रामीणों के भोजन से लेकर स्वास्थय लाभ का भी मूल आधार है।   ग्रामीण नगदी फसल भी है।  बिना मेहनत के ग्रामीणों को हर साल फल देता है।  पत्ता , छल , मंजरी कई बिमारियों का निदान हैं।
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हम ग्रामीणों का अंजीर , जो बिना पैसा खर्च किये हमें मुफ्त में मिलता हैं , यह तो हमारे पूर्वजों का आशिर्बाद है ,जिन्होंने हमारे  लिए पेड़ लगा गए हैं , जब फल पकता है तो दूर दूर के राहगीरों को भी अपनी मंद मंद खुशबु से अपनी ओर आमंत्रित करता है।  इनका  फल को तो सभी देखते हैं , तोड़ कर कहते हैं, लेकिन इनके फूल को सायद किसी ने नहीं देखा।  इसीलिए लोग कहते हैं -जो इनके फूल को खेत पता है , वह किस्मत वाला होता है , घर में फूल को रखने पेर घर में धन प्रवेश करता है,,,,,,
हमारे पूर्वजों ने जिस बिराशत को हमें दिए हैं, इससे हम आने वाले पीढ़ी को सुरछित  दें , यह हमारा  धर्म है

sen gi ---shushun -चलना ही नृत्य kaji gi -durang --बोलना ही गीत संगीत है ,



sen gi ---shushun -चलना ही नृत्य 
      kaji gi -durang --बोलना ही गीत संगीत है , 
यही हमारा  इतिहास है 

 EK PED JANGAL NAHI BAN SAKTA ----
EK PED PARYAWARAN  NAHI  HO  SAKTA  HAI
HAM EK DUSRE KE SATH MIL KAR PARYAWARAN BANTE HAIN
एक पेड़ जंगल नहीं बन सकता है --एक पेड़ पर्यावरण नहीं  हो सकता है -हम एक दूसरे के संग मिल कर पर्यावरण बनते हैं
                                           हम प्राकृति के साथ जीते हैं --प्रकृति ही धर्म है
 अच्छी बारिश , अच्छी फशल , सभी प्राणियों के जिंदगी की सुखमय जीवन की कमान के साथ प्रकृति की सेवा करते हैं
 जब तक प्रकृति के साथ आदिवासी समाज नाचते -गाते रहेगा , दुनिया की कोई ताकत उन्हें हरा नहीं सकता है

नन्हे पौधों को अपने नयनों से पलता है , अपने हाथों से सहलाता है ,,,,,झाड़ियां काट कर घेरा डाल उसकी रखवाली करता है---यही है पर्यावरणीय आदिवासी मूलवासी समाज।



video नन्हे पौधों को अपने नयनों से पलता  है , अपने हाथों से सहलाता है ,,,,,झाड़ियां काट कर घेरा डाल उसकी रखवाली  करता है---यही है पर्यावरणीय आदिवासी मूलवासी समाज।

नन्हे पौधों को अपने नयनों से पलता है , अपने हाथों से सहलाता है ,,,,,झाड़ियां काट कर घेरा डाल उसकी रखवाली करता है---यही है पर्यावरणीय आदिवासी मूलवासी समाज।

आदिवासी मूलवासी किसान समाज --  पर्यावरण के सचे संरछक , सच्चे दोस्त , आदिवासी समाज पर्यावरण से जितना लेता है --उससे दो गुना उससे देता है।  यही कारण है की शादियों से आदिवासी समाज जल जंगल जमीन के साथ रहते आ रहा है , अपने जरुरत के हिसाब से जंगल से लेता है, जरुरत से ज़्यदा वह बटोरता नहीं है, पेट से जरुरत भर फल तोड़ता है , बाकि जंगल के पशु -पक्छियों के लिए छोड़ देता है, जितना पेड़ काटता है --उससे दूना पेड़ लगता है।  नन्हे पौधों को अपने नयनों से पलता  है , अपने हाथों से सहलाता है ,,,,,झाड़ियां काट कर घेरा डाल उसकी रखवाली  करता है---यही है पर्यावरणीय आदिवासी मूलवासी समाज।  इतिहास गवाह है शादियों से आदिवासी वंही बस्ते आये हैं --जंहा जंगल है , नदी है , पहाड़ है , झरना है , झील है ,,,,आज के कथित बिकास के इस दौर में , भी जंगल , नदी , झरना , पहाड़ वंही पर अपने अस्तित्वा में हैं --जंहा आदिवासी ात मूलवासी किसान समाज है ,,,,आदिवासी मूलवासी समाज के सामाजिक मूल्यों , सांस्कृतिक मूल्यों से देश के तथाकथित सभ्य समाज को सिखने की  जरुरत है ---सामूहिक जीवन शैली क्या है ---सिखने की जरुरत है ----
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                                                          अपने गॉंव में प्रकृति की गोद में ----

                                           प्राकृतिक धरोहर ----वनोपज से सजी पर्यावरण
      अपने खेत -जमीन , जंगल से उपजाए धन -चावल , अपने साल के पेड़ के नए पत्तों  की थाली
शादी समारोह ---जंगल के साल पतियों से सजा मंडवा , संधियों के साथ दुःख -सुख बतियेते --बेटे -बेटी के नई जिंदगी की सुखद कामना करते --सागे समनधी -----

किसने कहा हम बिकास बिरोधी हैं ???

 किसने कहा हम बिकास बिरोधी हैं ???
हम चाहते हैं ---धरती का बिकास , पर्यावरण का बिकास
साष्ठेनेबल डब्लपमेंट , सबको शुद हवा मिले, शुद पानी मिले , शुद भोजन मिले, सबको आशियाना मिले ,,,,,,,हर खेत को पानी मिले , हर हाथ को काम मिले , हर भूखे को भोजन मिले , हर नगे को वस्त्र मिले , श्रीस्टी में जमीन पर रेंगने वाले चींटी , आकाश में उड़ने वाले पंछी , मिटी के भीतर जीने  वाले प्राणी सबको न्याय मिले , सबके जिंदगी का सम्मान किया जाय ,,,यही हमारा बिकास का मोडल है ,,,,,,
 जिस जंगल जमीन , नदी -नाला , झाड़
 टोंगरी , पहाड़ , पारबत ,झील , झरना खेत , बारी , को हमारे पूर्वजों ने अपने खून से सिंचा , अपनी शहादत देकर इस धरती की रक्क्षा की १८ ५६ में भोगनाडीह में २५ हजार संताली आदिवासियों ने अंग्रेज सैनिकों के बन्दुक की गोली सीने में खाया , लेकिन पीठ दिखा कर नहीं भागे।  १७ ०० दशक से अनवरत हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजो की गुलामी से देश को आजादी दिलाने के लिए शहादत दर शहादत दिए।  चेरो बिद्रोह , सरदारी लड़ाई ,कोल बिद्रोह , भूमिज बिद्रोह , से लेकर बिरसा मुंडा का उलगुलान किसके शहादत की बुनियाद पर खड़ी थी , सिर्फ और सिर्फ झारखण्ड के आदिवासी मूलवासी किसानों के बलिदान पैर,. आज हमारे पूर्वजों के खून से लत -पत, यह धरती पुकार रही है,,,,,देखो आजाद भारत के काले शासक ---साइनिंग  इंडिया , स्मार्ट भारत , स्मार्ट झारखण्ड , स्मार्ट सिटी , डिजिटल इंडिया ,  डिजिटल झारखण्ड के नाम पर झारखण्ड एक एक इंच जमीन ,जंगल नदी ,पहाड़ ,झील ,झरना ,चरहागाह ,खेल मैदान , आदिवासियों के परम्परागत धार्मिक -ाधेयात्मिक अस्थल सरना , शासन दिरी , हड़गड़ी , मसना , अडिंग ओड़ा , मरांग बुरु , हुड़िंग बुरू , सरना सके , सेन होरा , बाजार डांड , जतरा पीडी , सहित तमाम जमीन को भूमि बैंक बना कर देश -बिदेश के पूंजीपतियों , कॉर्पोरेट बाजार को ऑनलाइन हस्तंतरण कर रही है।  मोदी सरकार और झारखण्ड के रघुवर सरकार ने सी एन टी , एस पी टी एक्ट में संधोधन कर एक सप्ताह में जमीन देने का वादा किये हैं, तब हमारी जिम्मेदारी बनती है ,,,की अपने पूर्वजों की इस धरोहर को हम लूटने नहीं देंगे ,,,,हम हर साल ९ जून और ३० जून को अपने शहीदों के शहादत को याद  कर शहादत दिवश मानते हैं,,हम शहादत दिवस केवल मनाएंगे नहीं ---लेकिन शहीदों के मार्ग चलेंगे भी ---चाहे जितनी भी शहादत देना पड़े ----मित्रो क्या आप लाइन में खड़े हैं -----अपने को जाँच करने का यही मौका है -------ना  जान देंगे -----ना जमीन देंगे
लड़ेंगे ---जीतेंगे
आवाज दो ---हम एक हैं



Thursday, June 1, 2017

चिलचिलाती धूप , तपती धरती से जीना सीखे , घने जंगलों में एक एक बृक्छ अपना महल बना , खुला आकाश अपना सवर्ग बना

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इतिहास गवाह है --सांप भालू , बिच्छुओं , बाघ -सिंहों से लड़ कर हमारे पूर्वजों ने इस धरती को आबाद किया है। जंगल झाड़ साफ किये , गॉँव बसाये , खेत बनाये , नदी --झरनों के साथ जीना सीखे ,जंगली जानवरों को अपना मित्र बनाये।  कंद --मूल , फूल पत्ते , घांस फुश अपना भोजन बना , चिलचिलाती धूप , तपती धरती से जीना सीखे , घने जंगलों में एक एक बृक्छ अपना महल बना , खुला आकाश अपना सवर्ग बना , सर्दी ,गर्मी ,जाड़ा ,बसंद ,बरसात सभी ऋतुएँ हमें अपने कोख में हमेँ पाला , बादलों की गर्जन , आकाश में कौँधते बिजली , मूसलाधार बारिश ने बीरों की तरह लड़ना सिखाया।  यही हमारा इतिहास , हमारा बिरासत ,हमारा पहचान है , इसे हम मिटाने नहीं देंगे। .हमारा संकल्प है।,,,,,हर हाल में लड़ेंगे ,,,,,,हार हाल में जीतेंगे 

BINAS NAHI---- BIKASH CHAHIYE

 BINAS  NAHI---- BIKASH CHAHIYE