Thursday, November 2, 2017

BONE.. KE ..BONE..ME JHALIYA ..MINJURA RE BONE..ME JHALIYA MINJUR SOBHE....RE BONE ME JHALIY MINJUR SOBHE...


JAM BHI KISI BHI MAYUR KO  DEKHTI  HUN.....PITAJI  KI  YAD  AATI  HAI. MERE  PITAJI KARAM PARAB KE DIN MANDAR BAJATE HUWE YE GEET  GATE THE...
BONE.. KE ..BONE..ME  JHALIYA ..MINJURA   RE  BONE..ME  JHALIYA  MINJUR  SOBHE....RE  BONE   ME  JHALIY MINJUR  SOBHE...
HINDI ME__JALNGAL -JANGLA  ME  MAYOUR,...MAYOUR ...JANGAL  KI  SOBHA,,,HAI .

आदिवासी तब तक आदिवासी रहेंगे ---जब तक जल जंगल जमीन नदी पहाड़ के साथ जुड़े हैं

इतिहास गवाह है कि-हमारे पूर्वज सांप, बिच्छू, बाघ, भालू से लडकर झारखंड की धरती को आबाद कियां। जंगल-झाड को साफ किया, रहने लायक घर बनाये। खेती लायक जमीन साफ किया। गांव बसाया। जहां तक जंगल -झाडी साफ कर लोग बसते गये, गांव का विस्तार होता गया। अपने गांव को अपने तरह से संचालित -संरक्षित एवं विकसित करने के लिए नियम-कानून बनाये, जो उनका परंपरागत व्यवस्था कहलाया। जंगल-झाड साफ करके जमीन-जंगल को आबाद किये, इस जंगल-जमीन पर आदिवासी समुदाय ने अपना खूंटकटी अधिकार माना।

आदिवासी  तब तक आदिवासी रहेंगे ---जब तक जल जंगल जमीन नदी पहाड़  के साथ जुड़े हैं , प्रकृति से अलग होते ही इनका पहचान भाषा संस्कृति  इतिहास अपने आप समाप्त हो जायेगा। ... इसी लिए आदिवासी समाज जल जंगल  जमीन की  बचने की लड़ाई लड़ रहे हैं  

184 अंक लाने के बावजूद सफल घोषित किया गया। जबकि एससी-एसटी वर्ग के अभ्यर्थी 188 अंक और 190 अंक लाकर भी असफल रहे।

छठी जेपीएससी पीटी का मामला, 326 पदों के लिए हुई थी परीक्षा
छठी जेपीएससी पीटी परीक्षा में हुइ गडबडियों की भेंट झारखंड की प्रतिभाएं चढ़ रही है। 326 पदों के लिए जेपीएससी पीटी की परीक्षा दिसंबर 2016 को ली गयी थी। इसका रिजल्ट फरवरी में प्रकाशित किया गया था। चुकिं रिजल्ट का कोई कअ आॅफ नहीं बताया गया था इसलिए परीक्षा विवादित हो गयी। और परीक्षार्थियों ने रिजल्ट का विरोध किया। परीक्षा के रिजल्ट में पांच हजार से अधिक अभ्याथी सफल घोषित किए गए थे।
अधिक माक्र्स लाकर भी फेल और कम माक्र्स लाने वाले पास
जेपीएससी पीटी परीक्षा का जब रिजल्ट प्रकाषित किया गया कि देव कुमार सफलद अथ्यार्थियों ने अािक अंक लाकर भी परीक्षा में असफल रहे। जब उन्होंने इस मामले में झारखंड हाईकोर्ट में रिट पिटिशन किया तो जेपीएससी के परीक्षा निदेशक ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि रिजल्ट राजस्थान और आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार निकाला गया है।
आदेश के अनुसार ही पीटी परीक्षा में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं किया गया। परीक्षी में एक दूसरी गडबड़ी तब सामने आयी जब खुशी लाल महतो जिनका रोल नंबर 6801703 था को प्रथम सूची में ही 184 अंक लाने के बावजूद सफल घोषित किया गया। जबकि एससी-एसटी वर्ग के अभ्यर्थी 188 अंक और 190 अंक लाकर भी असफल रहे। जेपीएससी ने खुशी लाल महतों का रिजल्ट स्पोर्टस कैटेगरी में बताकर इससे पल्ला झाड़ लिया। पर चूंकि स्पोर्टस कोटा भी रिजर्वेशन की श्रेणी में आता है इसलिए जेपीएससी का यह तर्क भी गले नहीं उतरता। इसके अलावा जेपीएससी की पहली संे पांचवी पीटी परीक्षा में आरक्षण के नियमों का पालन किया गया। इसलिए छठी जेपीएससी में इसका पालन नहीं किया जाना उचित नहीं लगता। मामले में परीक्षार्थियों की परेशानी बढ़ गई है ं।
आदिवासी छात्र संघ ने सवाल उठाया-आंध्र और राजस्थान का जजमेंट क्यों लागू किया??
परीक्षा के रिजल्ट में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाना झारखंड के उम्मीदवारों के भविष्य के साथ खिलवाड है। झारखं डमें अ्रध और राजस्थान का जजमेंट लागू किया जाना उचित नहीं है।

इतिहास गवाह है कि-हमारे पूर्वज सांप, बिच्छू, बाघ, भालू से लडकर झारखंड की धरती को आबाद कियां।

इतिहास गवाह है कि-हमारे पूर्वज सांप, बिच्छू, बाघ, भालू से लडकर झारखंड की धरती को आबाद कियां। जंगल-झाड को साफ किया, रहने लायक घर बनाये। खेती लायक जमीन साफ किया। गांव बसाया। जहां तक जंगल -झाडी साफ कर लोग बसते गये, गांव का विस्तार होता गया। अपने गांव को अपने तरह से संचालित -संरक्षित एवं विकसित करने के लिए नियम-कानून बनाये, जो उनका परंपरागत व्यवस्था कहलाया। जंगल-झाड साफ करके जमीन-जंगल को आबाद किये, इस जंगल-जमीन पर आदिवासी समुदाय ने अपना खूंटकटी अधिकार माना।
स्वतंत्रता संग्राम के राजनीतिक क्षीतिज पर जवाहरलाल नेहरूजी, शुबास चंन्द्र बोस जैसे नेताओं का नाम कहीं दिखाई नहीं दिया था-तभी चुटियानागपुर के आदिवासी वीरों के क्रांति के बिंगुल से देश के अंगे्रज हुकुमत डोलने लगा था। 1807 का तमाड़ विद्रोह, 1819-20 में रूदु और कोंता मुंडा का तमाड़ विद्रोह, 1820-21 में पोडाहाट में हो विद्रोह, 1832 में भरनो में बुद्वु भगत का विद्रोह, 1830-33 में कोल्हान में मानकी-मुंडाओं का विद्रोह, 1854 में मोगो मांझी एवं बिर सिंह मांझी में संतालों का आंदोलन, 1855-56 में सिद्वु-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो के नेतृत्व में संताल हूल, 1855-56 में लुबिया मांझी और बैरू मांझी का भूमि आंदोलन, 1885 में बैठबेगारी और जमीनदारों, इजारेदारों के खिलाफ आंदोलन, 1895-1900 में बिरसा उलगुलान ने आंदोलनों का इतिहास रचाा। आजादी के बाद आज भी अपने इतिहास, जल, जंगल, जमीन, पहचान, अस्तित्व की रक्षा के लिए आदिवासी समाज संघर्षरत है।
 झारखंड में अपने गांव में अपना राज की अवधारना और अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ संग्राम-संताल हूल से उलगुजान तक का गैरवषाली इतिहास ---
जब देश अंग्रेजी हुकूमत के गुलाम में जकडा हुआ था और देश अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति पाने के लिए छटपटा रहा था-तब छोटानागपुर की धरती पर ईसाई मिशनरियों का पर्दापन हुआ। 1845 में गोस्सनर मिशन के चार मिश्नरी सर्वप्रथम यहां आये। इन्होंने धर्म प्रचार के साथ ही घनघोर जंगल-छाड के ढंके इस भूखंड में लोगों के बीच में शिक्षा, स्थस्थ्य जैसे मूलभूत सेवाओं का काम शुरू किये। गोस्सनर मिशन के बाद 1868 में काॅथोलिक मिशन ने अपना पहला कदम रखा। 1869 में एस0पी0जी मिशन भी छोटानागपुर में अपनी संेवकाई प्ररंभ की।
छोटानागपुर में ईसाई मिशनरियों ने ऐसे समय में अपना काम शुरू किये-जब स्वतंत्रता संग्राम के नगाडे की आवाज से समूचा छोटानागपुर डोल रहा था। चारों तरफ अंग्रेज शोषक साशकों द्वारा आदिवासी समुदाय के जंगल-जमीन पर जबरन कब्जा करना एवं जमीन बंदोबस्ती के नाम पर जबरन टैक्स वासूली किया जा रहा था। जो टैक्स नहीं चुकाने में असर्मथ हो रहे थे, जमींनदार और ईजारेदारों उनकी बाची हुई जमीन भी लूट ले रहे थे। यही नहीं आदिवासियों को अंग्रेज शोषक साशकों  तथा इनके पिठूओं ने बैठबेगारी भी खूब करवाया। इनके द्वारा जमीन लूट तथा बैठबेगारी से त्रस्त आदिवासी समुदाय जरूरत पड़ी तो तीर-धनुष उठा कर अंग्रेज शोषक साशकों और जमीनदार-इजारेदारों का मुकाबला किया, यह ऐतिहासिक सच्चाई है।
इतिहास गवाह है- जब ईसाई मिशनरी चुटियानागपुर में आये-तब इन्होंने शिक्षा, स्वस्थ्य सेवा के साथ ही अपने हक-अधिकारों के लिए संघर्षरत आदिवासी समुदाय को जमींदरों, इजारेदारो, महाजनों एवं सूदखोदों के चंगुल से अपनी संपति को मुक्त करने में मदद कर रहे थे। ृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृ
इसी बीच 18 मार्च 1885 को फा0 लीवंस रांची के डोरंडा (दुरंगदआ) में आये। फादर डेकाॅक जो तत्कालीन पल्ली  पुरोहित थे, उसके विचार से सहमत नहीं थंे , अतः 23 नवम्बर 1885 तोरपा चले गये, वहां आदिवासियों को जमींदरों और महाजनों एवं सूदखोरों के खिलाफ संघर्ष में मदद करने लगे। बेलजियम येसू समाजी जैसे मुलेंडर कान्सटेंट और जे.बी. होफमैन और कार्डोन नें शोषकों द्वारा आदिवाससियों के उपर किये गये  केस लड़ने में आदिवासियों की मदद की। फा0 होफमैन 1885 में सरवादआ गये। वहां आदिवासियों को शिक्षित और संगठित करने की भूमिका भी निभाये। यही नहीं आदिवासियों के परंपारिक भूमिं व्यवस्था के तहत उनके अधिकारो कि रक्षा के लिए सीएनटी एक्ट कानून का प्ररूप भी तैयार किये। विदित हो कि जब चुटियानागपुर में आदिवासियों के जमीन पर अंग्रेज शाषक जबरन कब्जा करने के साथ बैठबेगारी खटवाया जा रहा था। यही नही आदिवासी समुदाय के बेटी-बहूओं के उपर चैतरफा जमीनदारों का जुल्म होने लगा। ऐसे समय में ईसाई मिशनरियों का आदिवासी समुदाय के बीच काम करना निश्चित रूप से उनके जीवन को प्रभावित किया। जिसके कारण परिवार ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया। कई लोगों ने अंग्रेज शोषक साशकों और जमीनदारों के शोषण -दमन और जुल्म से अपने को सुरक्षित करने के जिए ईसाई धर्म का अंगीकार किया। कुछ लोगों ने अंग्रेजों द्वारा छीनी गयी अपनी जमीन की वापसी के लिए ईसाई धर्म को स्वीकारा। जिन लोगों ने जिस उद्वेश्य की पूर्ति के  ईसाई धर्म को स्वीकारा था , कहा जाता है कि-एैसे लोगों ने उद्वेश्यों की पूर्ति नहीं होने पर ईसाई धर्म को छोडकर वापस अपने मूल धर्म में आ गये।
उपरोक्त घटनाक्रम के दौरान सिर्फ जमीन संबंधित आंदोलन मजबूत नहीं हुआ लेकिन इन आंदोलनों से आदिवासी सामाज और कई तरह से प्रभावशाली बना। सामाज में जाग्रीती आयी और राजनीतिक चेतना का प्रादूर्भाव हुआ। सिद्वू-कान्हू, चांद-भैरव का हूल और बिरसा मुंडा का उलगुलान ने संताल-परगना और छोटानागपुर के आदिवासी समुदाय में अपने विरासत की रक्षा के लिए अपनी शासन-व्यवस्था चलाने के लिए राजनीतिक उदघोषणा भी किया-दिकु राईज टुण्डू जना-अबुआ राईज एटेज जना, याने इस बात की घोषणा की कि-अब रानी विक्टोरिया का राजपाट समाप्त हो गया, अब हमलोगों का राजपाट शुरू होगा।
आंदोलित आदिवासी सामाज ने महसूस किया-कि संगठित ताकत से ही अंग्रेजों सहित तमाम उनके साहयोगी शोषक सक्तियों को परास्त किया जा सकता है। परिणामता समुहिक संगठनों को जन्म देने की प्रक्रिया भी शुरू होने लगा। 1905 तक बिहार, उडिसा और छोटानागपुर बंगाल का हिस्सा रहा। रानी विक्टोरिया कलकत्ता से ही शासन व्यवस्था चलाती थी। जब छोटनागपुर के आदिवासी समाज का जमीन-जंगल पर जबरन मलगुजारी वासूलना  शुरू किया तब मुंडाओं ने विरोध किया। रानी विक्टोरिया ने आदिवासी समाज से उनके द्वारा क्लेम किये जा रहे जमीन का कागजात दाखिल करने का आदेश दिया-तब मुंडा आदिवासियों ने अपना ससनदीरी को ही उठा कर उनके दरबार में लेकर गये। रानी विक्टोरिया को मुंडाओं के इस व्यवस्था से असहमति हुई, इसके बवजूद भी आदिवासियों का संघर्ष कमजोर नहीं हुआ और अपने हक और न्याय की लाड़ाई को मजबूती के साथ आगे बढ़ाते रहे।

Friday, September 22, 2017

असम सरकार एवं भारत सरकार से असम के आदिवासी समुदाय को आदिवासी स्टेटस देने की मांग को लेकर लगातार संगठन ने संघर्ष करते आ रहा है। इसके साथ ही चाय बगान में काम करने वाले लोगों के सामाजिक, आर्थिक, भाषा-संस्कृति की रक्षा, शैक्षनिक सुविधा तथा स्वस्थ्य सुविधा की मांग के लिए भी संघर्षरत हैं।

छोटानागपुर के आदिवासी समुदाय को रेल लाईन बनाने और चाय बगान में काम करने के लिए अंग्रेजो द्वारा 1856 के दशक में ले जाया गया था। इस घटनाक्रम को आदिवासी सामाज अपने लोक गीत में याद करता है-जो मुंडा सामाज जादुर राग में गाता है।
 1-हरे रेल चलाए
हरे रेल चलाए
पहिया-पहिया
रेल चालाए रे...........2
2-गाड़ी से उतराय
दुरबिन से देखाय
चाय  बगान
हरियारो दिसैरे........2


असम के चाय बगान के अदिवासी समाज के बारे बचपन से ही कई कहानियां सुन रखे थे। कई बार गांव के बुर्जग बताते थे-गांव के कई लोग असम चले गये हैं। ृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृउन लोगों को जब असम और कलकता में रेल लाईन बन रहा था, उसी समय लोग काम करने के लिए लेकर गये हैं। अब वे वहीं बस गये। मां और मोसी भी हमेशा बताते रहती थी-तुम्हारी मछली मोसी और मोसा भी असम चाय बगान चले गये हैं, उन दोनों को मां के मामा गांव बमहनी के लोग बहुत पहले जाकर बस गये हैं-वही लोग जब गांव वापस आये थे, तब मोसी दोनों को भी लेकर गये हैं। वो लोग पूरा परिवार डिब्रूगढ चाय बगान में काम करते हैं। ये कहानी मैं अपने परिवार और समाज में सुनी थी।
9 सितंबर 2017 को ऑल आदिवासी महिला ऑफ असम की ओर से महिला लीडरशीप पर एक दिन का सेमिनार तेजपुर के सोनिपुर में रखा गया था। मैंने महिलाओं साथियों से पहले ही अपनी मानसा रख दी थी-कि एक बेला मैं सेमिनार हॉल में रहुंगी और दूसरी बेला चाय बगान जाना चाहती हुं। मित्रों ने मेरा कर्याक्रम ऐसी ही तय किया। असम पहुंचने के पहिलंे से मेरे मन में सामाज के बुर्जगों से सुनी कहनी और रेल लाईन और चाय बगान पर गाये गये लोक गीत मन में हिलकोरा मारने लगा था। मन में जिग्यासा थी कि-चलो झारखंड के इतिहास से जुडी कडी को नजदीक से समझने का मौका आज मिला है। मेरे साथ स्टीफन और गोडफ्रे साथ थे। हम लोग तीन नंबर चाय बगान के निकट पहुंचे, मन मचल रहा था-बगान के पौधों को नजदीक से देखने के लिए। हम लोगों ने एक बगान के पास पहुंचे, मैं कैमरा लेकर हरियाली ओढे चाय के पौधों से पटा-फैला लंबा-चौडा खेत को कैमरा में कैद करने लगी। दो-तीन तसबीर ली, तब एक साथी बोले-दीदी मैं आप का पिक्चर यहां लेता हुं। मैंने भी सोचा-सही है, यादगार के लिए जरूरी है। खुब फोटो खिंचाए, अकेल भी, और साथियों के साथ भी बारी बारी से।
हम लोग गांव की ओर बढ़े। रास्ते में दोनों ओर फैला हुआ चाय के हरियाली पौधे। बीच -बीच में पेड़ भी।  रास्ते में एक मैदान में फुटबॉल खेलते युवाओं की भीड़ थी। मैं अपनी ऑंख में बल देते हुए --ये तो सभी आदिवासी लडके लगते हैं....लेकिन...इतने संख्या में.........??? मेरा मन सोचने लगा...वहां रूकना चाहिए था .जाकि कुछ जानकारी तो मिला जाता । यह सोचते-सोचते हम लोग आगे बढते जो रहे थे।


तभी हमारे साथियों ने एक व्यक्ति से बेंजामिन कन्डुलना का घर किधर है-पूछने लगे। उनके बताये रास्ते से एक घर के पास पहुंचे। आंगन में एक महिला घर के पिंडा को गोबर से लीब रही है। उनसे मेंजामिन के बारे पूछने पर बतायी-यही घर है-लेकिन वो बगान तरफ लेबर लोगों के पास गया है। आइऐ बैठिये--एक दूसरी महिला घर से निकली--देखते ही पूछने लगी-दिशुमेतेपे हिजुआकना? (देश से आये हैं?) हम लोगों के लिए कुर्सी लाकर रख दिया एक लड़का। उनसे पूछे आप का क्या नाम है? उत्तर दिया-हिरयुस कन्डुलना-पिता अनुग्रह कन्डुलना-गांव  बुरू इरगी बताया। (सिमडेगा जिला-बानो प्रखंड)। हिलारियुस का बडा भाई अमरूष कन्डुलना है, जो गांव में रहता है।
 हिलारियुस की बहन-मरिया कन्डुलना दुबली-पतली संवली आती है, हम लोगों के सामने ही एक ओर रखे सुखी लकडी के ढुटू-टुकड़ा पर बैठ जाती है। हम लोगों के साथ बैठी मगदली कन्डुलना कहती है-इनु दिशुम रेनको..(देश के).यह सुनते ही मरिया उठकर सामने आकर हाथ मिला कर हम लोगों का अभिवादन करती है। पूछती है- चिलका बेस गी? उत्तर में, मैंने-हे बेसगी, अपे दो? उत्तर देती है-अलेयो बेस गी। ..(कैसे हैं? ठीक हैं? आप लोग? हां-ठीक हैं).।
मरिया पूछती है-विवलाम हिजुवा कना? मैने-कहा होला निंदा, नेताआरे मियद मिटिंग रेको केडाकदिंगा.....अपेलो नेपेल मेनतेंग हिजुआकनांइ। ..(कब आये हैं? कल रात? एक बैठक में आयी हुं, आप लोगों से मिलने आयी हुं).।
मरिया बताती है-अंइग दो नआ दो तोपनो होबाजनांगइ। अंइगा ससुराइर दिशुम तो  बनाबुरू तनआ। मैंने पुछा--अमआ किसानआ नुतुम? तानिश तोपनो । बनाबुरू का नाम सुनते ही मैं एक टक मरिया को देखते रही...इसलिए की बनाबुरू गांव में कई बार मित्तल कंपनी के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान गयी हुं, वहां रही हु -बनाबुरू की सुषमा आंदोलन में बहुत एकटिव रहती है।
तीन महिलाएं-8 नंबर बागान में चाय पती तोड रही हैं। हमलोग उनके पास गये। वो आपस में मुंडारी में बातें कर रही हैं- मैंने नजदीक आकर जोहर-बोली-तीनों मेरी तरफ देखते हुए-हाथ में तोडे नन्हे चायपति के कोपलें लिए ही दोनों हाथों को जोडकर जोहार की ।
मैंने -चिलका बेस गी? तीनों एक साथ बोली-बेसगी, आपे दो? मैंने उत्तर दी-अलेयो बेस गी। ..(कैसे हैं? ठीक हैं, आप लोग कैसे हैं? हमलोग भी ठीक ही हैं).।
मैंने-पूछी-अपेआ हातू दो, कोतआ तनआ? ..( आप लोगों का गांव कहां है?).
तीनो -एक साथ बोली-तीन नंबर हातु......याने तीन नंबर गांव
मैं तीनों का जवाब सुनकर .....सोचने लगी......तीन नंबर हातु.........गांव का कैसा नाम है? मैंने पूछा-ओकोते रे तीन नंबर.....हातु मेनआ?..(तीन नंबर गांव किधर है? ).  तीनों-सामने लंबा-चौडा चाय बगान की ओर इसारा करते....हने हनतेरे ..(ओ उधर है)...। दूर तक चाय खेत ...के बीच हल्का सा दिखाई दे रहा है....छोटा मिटी का घरनुमा झुंण्ड।
मैंने उन महिलाओं से नाम पूछी-एक महिला उत्तर दी.....मुक्ता केरकेटा...अमआ किसानआ चिनआ नुतुम? उत्तर-कइंग बला कना.....हातु दो कोतआ?..(आप का पति का नाम? बोली -शादी नहीं हुआ है। आप का गांव ? ). -बोली तीन नंबर हातु। तब मैने दोबारा पूछी....दिशुम कोताआ? जवाब दी-रूनडुउ। (दिशुम कहां है? बोली-रूनडुउ). मैं गैरे देखने लगी.....इसलिए कि रूनडुउ -रंेडवा मेरा मामा गांव है। मुक्ता स्वंय बताते जा रही थी-सुशील केरकेटा बड़ा भाई है। बडी दीदी निमुन्ती है, नआ दिशुुम सेनाकनाए। हुडिंग मिसिंगा नुतुम-जेसी केरकेटा नेताआ रेगी मेनाइया। ..(अभी देश गयी है, छोटी बहन जेसी है, वो यहीं हैे)।. अमआ अबा गआ नुतुम..(आप के पिताजी को नाम? ). -.उत्तर दी जकरियास केरकेटा। बोली-बंगाइया आय दो। ..(अब वो नहीं है).।
दूसरी महिला-अंगआ दो? उत्तर दी- गीती डहंगा। अमआ किसानाआ? उत्तर-संजय डंहगा। बतायी-होइयारिंआ-बिरसा डहंगा। दिशुम दो कोतआ? उत्तर दी-जोजो टोला तपकारा। मै पूछी-तपकारा नेलाकदामें? उत्तर दी-कइंग सेना कना। अइंगा किसान दोय सेना मिसा मिसा। ..( आप का नाम? जवाब-गीती डहंगा, आप के पति का? उत्तर-संजय डंहगा, ससुर-बिरसा डहंगा, गांव -तपकरा जोजो टोली, आप अपना गांव गये हैं? कभी नहीं, मेरे पति कभी कभी जाते हैंे).।
तीसरी महिला ने अपना नाम-पालो नाग बतायी। पति का नाम करण नाग। दिशुम का नाम पूछने पर बोली-कले सरिआ, याने नहीं जानते हैं।


हम लोगों के बीच बात-चीत चल ही रहा था-तब तक दो और महिलाएं सिर पर और पीछे पीठ पर बांस की टोकरी लटकाये काम से लौट रही है। उन महिलाओं से भी हम लोग बात करने लगे।
मैं नाम जनना चाही-उत्तर में एक महिला बोली-जितनी तोपनो। पति उलियम तोपनो। अपेआ हातु?(आप का गांव?) उत्तर में-तीन नंबर हातु। मैने दोहराते हुए पूछी-अपेआ दिशुम?(आप का देश?)  उत्तर दी-इटम सिदुम(यह गांव खूंटी जिला के तोरपा प्रखंड में है। ) ।
उनके साथ वाली महिला से पूछी-अमआ नुतुम??(आप का नाम?)   उत्तर दी-बीणा डहंगा। अपेआ हातु??(आप का गांव?)   उत्तर दी- तीन नंबर हातु । दिशुम दा?(आप का देश?)  -बतायी-जोजो टोली तपकारा।
तीसरी महिला-सिर पर टोकरी का रस्सी लटकायी तथा पीठ पर-ठोको लटकायी खडी है। इनसे नाम पूछी-उत्तर दी-फूलमनी केरकेटा। अपमेआ दिशुम?(आप का देश?)-  उत्तर दी- जोजोदआ मदहातू। दिशुम नेलाकदाम??(आप का देश देखे हैं?)   पूछने पर -उत्तर दी का गीं?, नहीं। इन महिलाओं से बात-चीत के क्रम में बतायी-दिन भर का हजीरी 126 रूप्या मिलता है। 24 किलो पत्ता देने पर ही एक हजिरा बनता है। यदि 24 किलो से कम हो तो हजिरा नहीं बनता है। इन्होंने यह भी बतायी- यदि पूरा काम करेगें तो-12 दिन में 3 किलो आटा और तीन किलो चावल मिलता है। इसके लिए 10  रूपया पेमेंट में ही काट लेता है। पहले 3 रूप्या काटता था। हाजिरी को जोड़ कर बतातें हैं-एक सप्ताह में 820 रू0 मिलता है। यदि काम में नहीं जाएगें तो हाजिरी नहीं बनता है।
बस्ती में दो बुजुर्ग आपस में बात कर रहे हैं, हमलोग दोनों को देखकर जोहार-जोहार, दुकु-सुकु को चिलका? बेस गिआलें....दोनों हम लोगों से पूछा-अपेदो?  हमलोगों की तरफ से मैंने उत्तर दिया-अलेयो गी बेस गी। ?(आप लोग कैसे हैं?, ठीक ही हैं)  दोनों ने आगे पूछा-दिशुमते हिजुआकनापे? मैंने उत्तर दी-हे अपेलोओ नपम मेनतेले हिजुगा कना। उन दोनों से नाम पूछने पर एक ने बताया-अंइगा दो दोनातुश तोपनो । अमआ आबागआ? उत्तर-लाको तोपनो, आयदो बंगाइआ नाआदो। दिशमु दो अलेआ-बनाबुरू तनाआ। दूसरे से पूछने पर-अमआदो? उत्तर-अंइगआ दो- मतियस गुडिया ..। अबागआ?-अबागआ दो-इलियाजर गुडिया। दिशुम दो गोपलाय तना। हिन्दी-दोनों ने पूछा-आप लोग देश से आये हैं? हां-आप लोगों से मिलने के लिए आये हैं।  उनमें से एक ने-मेरा देश का नाम बनाबुरू है। दूसरे ने-मेरा नाम मतियस गुडिया और मेरे पिताजी का नाम इलियाजर गुडिया है, हमलोगों का देश-गोपलाय है। (दोनों गांव खूंटी जिला के तोरपा प्रखंड में है)।



दोनातियुष तोपनो और मतियस गुडिया ने बताया कि -येे दोनों अब चाय बगान के काम से रिटार्यड हो चुके हैं। इन्होंने बताया-अब हम दोनों के स्थान पर बेटा काम कर रहे हैं। जब उन से पूछे-कितने उम्र में रिटार्यड होते है? इन्होनें बताया-60 साल में।
राजू कोनगाडी-पिता मरकस कोनगाडी सोनाबेल चाय बगान के 8 नंबर लाईन के कॉलोनी के अपने घर के आंगन में मिले। उनसे -आप का गांव कहां है? के उत्तर में बोलते हैं-हम लोगों का अपना गांव तो झारखंड में है, गांव का नाम उडीकेल है। आगे बताने लगते हैं-हम लोग तो नहीं जानते हैं-यहां हमारे दादा-दादी अपने गांव कब आये थे। मेरा-पिता और मां का जन्म यहीं हुआ था, अब तो दोनों नहीं हैं, हम लोग केवल यहां हैं। हम लोग दो  भाई हैं। बड़ा भाई तेलेंगा कोनगाडी को गांव भेज दिये-वहां का जमीन जयदाद देख-भाल करने के लिए।
हम लोग बात कर ही रहे थे, तब तक राजू की पत्नि करूणा आती है और पूछती है-दिशुमेते पे हिजुआकना? मैंने -हेई, अबुआ होडो को कोतआ कोरे मेनापेआ मेन ते दंडामेने तेले हिआकना। (आप लोग देश से आये हैं? मैंने-हां, हमलोगों का आदमी कहां-कहां रहते हैं-खोजने के लिए आये हैं) । जवाब सुनते ही करूणा का चेहरा खिल उठता है, कौतुहल पूर्वक दोनों हाथ जोडकर जोहार करती है। और अपने बेटे को जल्दी कुर्सी लाने बोलती है।
राजू बताते हैं-नीई करूणा केदो जठडिंटोलाए तेले आउवा काउआ।(करूणा को तो जठडिंटोली से लाए हैं)।  तब करूणा से उनके पिताजी का नाम-पूछने पर बतायी-पिताजी का नाम मंगरा हेमरोम है। वे जठडिटोला में ही रहते हैं। बात-बात में राजू कहते हैं-यहां हम दोनों करूणा के साथ बगान में काम करते हैं। बच्चे पढ रहे हैं। गांव-घर को नहीं छोडेंगें-यही सोच कर बड़ा भाई को गांव भेज दिये। यहां तो बस हजिरा खट रहे हैं। सप्ताह में 820 रूप्या मिलता है, इससे बहुत कुछ नहीं कर पाते है, बस जीवन कट रहा है। राजू बोलते हैं-तीन बेटा हैं, इसलिए गांव आना-जाना अब हर साल कर रहे हैं। पहले तो पता नहीं था-कि हमलोगों का गांव कहां है। बाद में जब पिताजी जिंदा थे-तो बोले-पता कीजिए कि हमलोगों का देश कहां है-हमलोगों को अपना देश जाना चाहिए। तब पिताजी ने खोजना-पता करना शुरू किया, हमलोगों का अपना गांव कहां है, जब पता चला तो हमलोगों वहां गये और हमारे खनदान को खोज निकाले।


प्रकाश आइंद-पिता रमेश आइंद ने बताया कि हमारा मूल देश तो झारखंड है। हमारे पिता का दादू सब यहां आये थे, तब से हमारे मां-बाब यहां रह रहे हैं। प्रकाश कहता है-गांव कभी नहीं गये, कारण कि मां-पिताजी भी कभी गांव गाये नहीं। सिर्फ पिताजी बताये हैं हमलोगों का गांव उकडीमंडी है। विदित हो कि उकडीमंडी खूंटी जिला के कर्रा प्रखंड में है।
चाय बगान से लौटते हुए रास्ते में पौलुस कन्डुलना गांव इटाम सिदुम-तोरपा प्रखंड(खूंटी जिला), पौलुस से पूछने पर कि-आप का देश का नाम क्या है? उत्तर में -हॉं सुने हैं, लेकिन कभी गये नहीं, कारण की मां-बाबा हमलोगों को अपना गांव लेकर ही नहीं गाये। जेम्स तोपना गांव तोरपा बांस टोली(खूंटी जिला), जेम्स कहता है-अपने गांव के बारे सुने हैं, लेकिन गये नहीं है। कोई जानकार आदमी मिलेगा तो जरूर अपना गांव खोजने जाएगें।  परमेश्वर तांती (उडिसा), सुशेल तोपनो-गांव कितापीडी (खूंटी जिला), गुड न्यूज धनवार -गांव रायसेमला तोरपा प्रखंड (खूंटी जिला), जुसफ होरो -गांव सिमडिमडा कर्रा प्रखंड (खूंटी जिला), जुलियस आइंद-गांव -गाडी गांव कर्रा प्रखंड (खूंटी जिला),जुलियस से पूछने पर कि आप अपना गांव देखे हैं? उत्तर में-नहीं मां-बाबा कभी देश हमलोगों को दिखाये ही नहीं।  ग्रेगोरी होरो-गांव सिमडिमडा (खूंटी जिला), दोनाशियुष आइंद-गांव गाडी लप्पा कर्रा प्रखंड (खूंटी जिला), स्टीफन गुडिया-गांव तपकरा तोरपा प्रखंड (खूंटी जिला)। बहुतों ने कहा-हमलोग सुने हैं, हमलोंगों का गावं झारखंड में है-लेकिन कहां है? कोई नहीं बता सका।
 10 सितंबर को साथियों के साथ तीस नंबर लाईन, तीन खोरिया पहुंचे। जहां तीस नंबर चाय बगान में काम करने वाले लोग रहते हैं। समुएल भेंगरा-से पूछने पर कि-आप का गांव कहां है-उत्तर दिया, हातु रूगडी तनाआ, खूंटी जिला रे मेनआ। इन्होनंे बताया -अब वह चाय बगान के काम से सेवा मुक्त हो चुके हैं, इनके जगह पर इनकी बहु काम कर रही है। आप का परमामेंन्ट हुआ था-पूछने पर कहते हैं-हां परमामेंन्ट हुआ था। कितना बेतन मिलता था-पूछने पर कहते हैं-सप्ताह में 720 रू0 मिलता था। इन्हेंने बताया-जब वह, रिटायमेंन्ट हुआ तो, इनको 2 लाख रूपया मिला, जो पीएफ के रूप में जमा किया गया था।


तीस नंबर लाईन -तीन खोरिया में ही एतवा भूईया और पतरस बिलुंग मिले। दोनों से बात-चीत के क्रम में आप का देश कहां है-पूछने पर बोलते हैं-सुने हैं, हमारे मां-बाप बताते थे, हमलोगों देश झारखंड है, लेकिन मां-बाप हमलोगों को अपना देश एक बार भी नहीं ले गये, तो हमलोग देखे नहीं-कि वो कहां है। हां... हमलोग अब लोगों को खोज रहे हैं......कि जो जनकारी रखते हैं-उनको बोलेंगें, हमलोगों को एक बार देश देखने ले चलो।  इसी बस्ती में सुमाती नाग, बीरबल नाग और मनुएल नाग मिलते हैं। इन लोगों ने बताया-हमलोगों को देश तो कोयोंगसार में हैं। (खूंटी जिला-मुरूहू पंचायत)। सुमाती बताती है-अपना दंेश मे खेत-बारी भी है, लेकिन एक बार भी नहीं गये हैं। क्यों नहीं जाते हैं-पूछने पर कहते हैं-पैसा ही े नहीं जोंगाड कर पा रहे हैं। सोच रहे हैं-पैसा जमा करके जो लोग आते-जाते हैं, उनके साथ जाकर देश देख कर आएगें।
शाम को फूटबॉल खेलकर 12-14 संख्या में लड़के आ रहे हैं बस्ती की ओर। हम लोगों ने उन लोगों को रोक कर बाते करना शुरू किये। बच्चों से उनका नाम, किस क्लास में पढ़ाई कर रहो हो? इसी क्रम में उन लोगों से पूछे-आप लोगों को गांव का नाम जानते हैं-एक स्वर में बच्चों ने कहा-तीरीस नंगर लाईन, तीन खोरिया। जब उनसे पूछे-आप लोग जानते हैं-कि आप के दादा-आजा कहां ये आये थे। बच्चों ने कहा-नहीं, नहीं जानते हैं। हमने फिर से दोहरा कर पूछा-आप लोग सुने हैं कि आप लोगों का देश झारखंड है? बच्चे एक दूसरे को देखने लगे, वे असहज महसूस करने लगे, चेहरे से साफ झलक रहा था। तब हम लोगों ने बच्चों से कहा-कोई बात नहीं, नहीं सुने हो.....हां आज घर जाने के बाद अपने बड़ों से, मां-बाबा से जरूर पूछना कि-हमलोगों के दादा-आजा कहां से आकर यहां बसे हैं। बच्चों  ने मुस्कुराते हुए--जी हां....तब उनलोगों को जाने के लिए इशारा कर दिये।
झारखंड के आदिवासी समूदाय का इतिहास सांप-बिच्छू, बाघ-भालू से लड़कर जंगल-जमीन को आबाद करने को गौरवशाली इतिहास रहा है। जब अंग्रेज शोषक-साशकों का दमन-छोटानागपुर इलाके में बढ़ने लगा, झारखं्रड के आदिवासी सामाज सिद्वू-कान्हू, सिंदराय-बिंदराय, वीर बुद्वु भगत, फूलो-झानों, माकी-देवमनी, वीर बिरसा मूुडा, जतरा टाना भगत जैसे वीर शहीदों के अगवाई में 1800 के दशक में विदोह का जो बिंगुल फंूका था, 1900 के दशक तक पूरे छोटानागपुर-संतालपरगना ईलाके में या वर्तमान झारखंड में जंगल-जमीन छीनताई के विरोध, तथा अपने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिए आंदोलन  दर आंदोलन की रचना की। यही नहीं जबरन मजगुजारी वासुली एवं बैठबेगारी के खिलाफ आदिवासी समुदाय ने शहादती संघषर््ा को अंजाम तक पहुंचाया। एक तरफ अपनी आहूती देकर अपने दिशुम -झारखंड के विरासत की रक्षा में लगे थे। एैसे समय में दसरी ओर अग्रेंज शासक आदिवासी समुदाय को बंधुवा एवं सस्ता मजदूर के रूप में देश के दूसरे हिस्सों में भी मिटटी काटने, भार ढोने, आदि के काम के लिए लेजाया गया। जब अंग्रेज छोटानागपुर ईलाके से कलकता और असम इलाके में रेल लाईन बिछाना था, तब छोटानागपुर के आदिवासियों को भी रेल लाईन बनाने के लिए ले जाया गया। इसलिए कि आदिवासी समुदाय के लोग कठोर मेहनती तो थे ही, इमानदारी से खटते भी थे।


इतिहासकार बताते हैं-जब रेललाईन बनाने का काम खत्म हुआ, तब भी जिन लोगों को काम करने अंग्रेजों ने लेकर गये थे, उन्हें वापस छोटानागपुर नहीं भेजा गया। उन्हें इधर ही दूसरे कामों में व्यस्त कर दिया गया। अंग्रेजों असम में चाय की खेती करने लगे थे। अधिकांश आदिवासियों को उन चाय खेतों में बंधुवा मजदूर की तरह खटाने लगा। कुछ लोगों को कलकता और बंगाला देश तक रेल लाईन बनाने के लिए लेज जाया गया। आज भी बंगला देश के ढाका आदि ईलाकों में बडी संख्या में संताल, हो, मुंडा, खडिया, उरांव मिलेगें, जो अपने पूर्वजों को याद करके झारखडं को अपना देश मानते हैं।
असम के कोकराझार, उदालगुडी, सोनितपुर, नागोन, नोरर्थ लाखिमपुर, जोरहाट, तीन सुखिया, डिबं्रगढ, शिवासानगर, गोलाघाट आदि जिलों में अधिकतम चाय की खेती होती है। असम 70 लाख करीब आदिवासी आबादी है, जो असम की कुल आबादी का 17 प्रतिशत है। असम के इन आदिवासियों को टी0 ट्राईब के नाम से संबोधित किया गाया है। असम के सभी चाय बगानों में पत्ता तोड़ने का काम आदिवासी, दलित समुदाय ही करते हैं। अंग्रेजों के समय इन्हें गुलामी की तरह रखा जाता था, मजदूरी नाम मात्र का दिया जाता था, आज भी इन आदिवासी, दलित समुदाय के साथ उसी तरह व्योहार किया जाता है। आज भी चाय बगान में काम करने वाले मजदूरों को केंन्द्र सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी दर के तहत तय मजदूरी भी नहीं दिया जाता है। न ही इन्हें बुनियादी सुभिदाएं दी जाती हैं।
चाय बगान में काम करने वाले आदिवासियों के सामाजिक आर्थिक स्थिति को समझने के लिए सोनितपुर जिला के आदिवासियों के संर्दर्भ में समझने को मौका लिया। जहां तीन चाय बगान में काम करने वालों के रहने वाले स्थल, या सेंन्टर में जा कर एवं कार्यस्थल में उनसे बात करने के बाद मिला। सोनितपुर जिला का अर्थव्यस्था 70-80 प्रतिशत कृर्षि पर आधाति है। इस जिला में भी आदिवासी संख्या बडी है। यहां संताल, उरांव, कुरमी, गोंड, अहीर, ग्वाला, खडिया, भूमिंज, तांती आदि हैं। यहां 73 चाय के बागान हैं। लोगों ने बताया 1865-1881 तक चाय बगान में काम करने वाले मजदूरों को प्रति माह 5 रूपया पुरूषों को तथा महिलाओं को 4 रूपया महिलाओं को मिलता था। यह मजदूरी दर 1900 तक था। 1901 में मजदूरी दर बढ़ा, पुरूषों को प्रतिमाह 5.5 रूपया , महिलाओं को 4.50 रूपया दिया गया। यही व्यवस्था लंबे समय तक चलता रहा।
असम के आदिवासियों की सामाजिक स्थिति बहुत ही दैनिये है। जहां तक सामुहिकता का सवाल है-यह समुदाय समुह में ही है। लेकिन यहां यहा सामाज मालिक की तरह नहीं, बरन बंधुवा मजदूर की तरह जिंदगी गुजार रहा है। चाय बगान चलाने वाले कंपनियां मजदूरों के रहने के लिए जो जंगह दिये हैं, वहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। पानी का सही व्यवस्था नहीं है, न ही राशन का व्यवस्था था। मकानों में सही सौचालयों का भी व्यवस्था नहीं है। छोटानागपुर -वर्तमान झारखंड के कई जिलों-ईलाकों से आये पुर्वजों के पीढी यहां हैैं। कुछ लोग अपनी भाषा-संस्कृति भी पूरी तरह भूल चुके हैं। आज का नया पीढ़ी के कई लोग अपने मूल राज्य के गांव को याद करते हैं। कई लोग कई लोगों के सहयोग से अपना मूल राज्य और गांव, परिवार को खोज निकालने का प्रयास कर रहे हैं। वहां बसे लोग अपनु मूल राज्य एवं गावं को देश मानते हैं। यही कारण है कि-जब कोई झारखंड से चाय बगान में काम करने वालों के पास पहुंचता है-तो लोग बहुत खुश होते हैं-अवभगत में जुट जाते हैं-कहते हैं-हम लोगों का देश के लोग आये हैं।
कई लोगों से बात करने के बाद मैं हैरान रही कि-परमानेट नौकरी का मतलब वहां के लोगों के लिए क्या होता है। परमानेट नौकरी का मतलब है-चाय बगान में 60 साल की उम्र तक काम कर सकते हैं। 60 साल की उम्र के बाद शरीरिक रूप से आयोग्य घोषित करते हुए, सरकारी काम का नियम -कानून को आधार मानते हुए -चाय बगान याने पत्ता तोड़ने यह अन्य काम से मुक्त कर दिया जाता है। सेवा मुक्त करते समय कुछ पीएफ की राशि दी जाती है, जो 50-60 हजार तक की होती है। प्रति दिन का 120, कहीं 134 तो किसी बगान में 128 रू हजीरा तभी बनता है-जब प्रतिदिन 24 किलो चाय पत्ता तोड़ कर जमा किया जाता है। कितना पीएफ काटता है? यह पूछने पर कोई बता नहीं पता है । परमानेट नौकरी के नाम पर 18 साल से उपर के लोगों को बगान में पत्ता तोड़ने, दवा छिड़ने आदि का काम मिलता है। इसमें भी परिवार से दो-तीन लोगों को ही। 18 साल से नीचे के बच्चे किसी तरह के आर्थिक अर्जन जुडे नहीं होते। इस कारण पूरा परिवार का आर्थिक भार एक या दो सदस्यों के मजदूरी पर टिका होता है। 60 साल की उम्र में सेवा मुक्त होने के बाद, उनके जगह पर परिवार के सक्षम सदस्य को काम पर रखा जाता है। इसी लिए आम तौर पर लोग इस तरह के व्यवस्था को परमामेंट नौकरी मानते हैं।
लोगों की जिंदगी को देखने के बाद लगता है-चाय बगान चलाने वाले कंपनियां करोडों का व्योपार कर रहे हैं। मुनाफा कमा रहे हैं, लेकिन जिन मजदूरों के खून-पसीना के कीमत पर चाय का व्योपार चल रहा है-उन मजदूरों को दो जून की रोटी, दवा, सही मकान भी मुनासिब नहीं है। असम में हजारों चाय बगान इन्हीं शोषित मजदूरों के श्रम से जिंदा है। लेकिन इनके मानवअधिकारों कीे रक्षा का ख्याल न तो कंपनियों को है न ही सरकार  लोगों से पूछने पर कि-बीमारी के समय इलाज के लिए कहां जाते हैं-इसके उत्तर में लोगों ने बताया-कंपनी के तरफ से इलाज के लिए स्वस्थ्य केंन्द्र है-लेकिन सब बीमारी में एक ही दवा मिलता है, पेट दर्द में भी और सिर दर्द में भी। कहते हैं-हमलोग दूसरे जगह से भी जल्द ठीक होने के लिए दवा खरीद कर लाते हैं।
चाय बगान में काम करने वालों की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमजोर है, जिस कारण बच्चों को अच्छी एवं उंची शिक्षा मां-बाप नहीं दे सकते हैं। कंपनी की ओर से प्राईमेरी, मिडिल स्कुल हैं, जिनका स्तर सरकारी स्कुलों की तरह ही है। कोई कोई परिवार के बच्छे स्कुलों में पढ़ रहे हैं। पढ़ाई कम होने के कारण भविष्य के प्रति भी कोई प्रायोजन नहीं बना सकते हैं। जिंदगी का मकसद सिर्फ प्रतिदिन का रोटी जोगाड़ करना।
निम्न आय आर्जन करने के कारण जीवन स्तर बहुत नीचे है। जीतने बच्चे दिखाई देते हैं-सभी कोपोषित। रहने के लिए छोपडपटीनुमा एक-दो कमरे का घर दिया गया है। लोगों ने बताया-जलावन के लिए लकड़ी कंपनी वाले साल में देते हैं-एक छोटा लोरी में। इसके एवज में 800 रूपया देना पड़ता है। बगान में काम करने वाले सदस्यों को हर 12 दिन में 3 किलो आंटा, 3 किलो चावल कंपनी की ओर से मिलता है। इसके एवज में जब सप्ताह में मजदूरी मिलता है-इसी में से 10 रूपया काट लिया जाता है। मैंने सुन रखी थी कि चाय बगान में दिन भर काम करने वाले मजदूरों को सादा पानी नहीं पिलाया जाता है। उनके लिए प्रति दिन -तीन-चार ड्राम पानी चाय पति और नमक के साथ उबाल कर मजदूरों को पिलाया जाता है। वहां के लोग बताते हैं-इस परंपरा को अंग्रेजो ने शुरू किया था, जो अभी अगस्त 2017 तक चलते रहा।  जानकारों का मानना है कि-इससे मजदूरों के स्वस्थ्य पर गहरा प्रतिकूल असर डाला है।


चाय की खेती तो अंग्रेजों शुरू की थी और सर्वविदित है कि-भारत में अंग्रेज नील का व्यापार करने आये थे, जो इस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा व्यापार को पूरे देश में फैला दिये थे। नील की खेती एवं व्यापार करते पूरे भारत की धरती को अपने कब्जे में ले लिया था। आज आजाद भारत में असम के चाय बगान में काम कर रहे मजदूर अपने देश की सरकार के हाथों गुलामी की जिंदगी जीने को विवश हैं।  सरकार बनाने के इन टी-टाईबस को वोटर राईटस है, सभी का वोटर आईडी है-लेकिन भारतीय संविधान के तहस असम में कई दशकों से रह रहे इस आदिवासी समुदाय को आज तक आदिवासी का दर्जा भी नहीं मिला।
पूरे असम में ऑल आदिवासी स्टुडेट ऑफ असम के बैनर तले आदिवासी, मेहनतकष  समुदाय के हक-अधिकारों सहित चाय बगान में काम करने वालों को केंन्द्र सरकार द्वारा तय मिनिमम वेज रेट के तहत उचित मजदूरी देने, शिक्षा, स्वस्थ्य, तथा आदिवासी स्टेटस की मांग को लेकर संगठित हो कर संघर्ष का बिंगुल फुंक दिए हैं। अंग्रेजो के समय में झारंखड के आदिवासी -मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदाय के उपर जो शोषण-दमन शुरू हुआ था, आजाद भारत में देश के  विभिन्न हिस्से में आज भी इन समुदायों के उपर विभिन्न तरह के शोषण-दमन ंबदस्तूर जारी है। आज भी देश के विभिन्न हिस्से में आदिवासी-किसान, दलित अपना अस्तित्व, विरासत-जल-जंगल-जमीन, पहचान बचाने के लिए संघर्षरत है। असम के आदिवासी समुदाय के स्थितियों पर चिंतित युवाओं ने ऑल आदिवासी स्टुडेंट ऑफ असम यूनियन का गठन 22 साल पहले किया है। असम सरकार एवं भारत सरकार से असम के आदिवासी समुदाय को आदिवासी स्टेटस देने की मांग को लेकर लगातार संगठन ने संघर्ष करते आ रहा है। इसके साथ ही चाय बगान में काम करने वाले लोगों के सामाजिक, आर्थिक, भाषा-संस्कृति की रक्षा, शैक्षनिक सुविधा तथा स्वस्थ्य सुविधा की मांग के लिए भी संघर्षरत हैं। संगठन चाय बगान में कार्यरत लोगों के आर्थिक स्थिति को मजबूदी प्रदान के लिए सरकार से मांग कर रहा है कि-120, 130 मजदूरी जो वर्तमान में दी जाती है, इसके जगह 250 रूपया दिया जाए। ताकि आर्थिक रूप सश्क्त होने पर सामाज हर स्तर पर स्वतः ही मजबूत होगा।
असम मजदूर यूनियन के ख्रीस्तोफर धनवार तेजपुर, ऑल आदिवासी स्टूडेंट ऑफ असम -कोकराझार के स्टीफन लकड़ा, तोफर कुलू-सदस्य, गणेश उरांव-सदस्य, बिंन्देश्वर गांझू-नोगान, सदस्य, डेविट-लाखिमपुर-ऑल आदिवासी ऑफ असम के सचिव, लियोश सोरेन-अध्यक्ष,-धीमागी जिला सहित दर्जनों नेताओं ने बताया कि-हमलोग अपने समाज के हक-अधिकार के लिए लंबे समय से संघर्ष करते आ रहे हैं, आगे भी संघर्ष जारी रहेगा। लोगों ने बताया कि-चाय बगान में हमारे लोगों को सिर्फ पत्ता तोड़ने का ही काम दिया जाता है, जबकि दूसरे काम के लिए भी सक्षम होते हैं-लेकिन उससे साजिश के तहत बंचित किया जाता है। यही नहीं-यदि कोई आदमी मेंनेजमेंट के खिलाफ आवाज उठाता है-तब उन्हें काम से ही निकाल दिया जाता है, यही नहीं उसे जहां वो रह रहा है-वहां से भी निकाल दिया जाता है। जिसके चलते अपने उपर हो रहे शोषण के खिलाफ भी बोल रही सकता है। बेरोनिका तिर्की तथा शुभ मेरी टोप्पों ने बताया-तीस नंबर लाईन के इलाके में चाय बगान में काम करने वाले कुछ परिवार खेती-बारी भी करते हैं। कुछ परिवार तो खेती बारी से अपने लिए प्रर्याप्त आनाज पौदा कर लेते हैं।
आज असम में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और झारखंड में बीजेपी की सरकार है। केंन्द्र में भी बीजेपी सरकार है। तब सवाल उठता है कि-जब झारखंड सरकार ने स्थानीयता नीति के तहत जो भी 30 सालों से झारखंड में रह रहे हैं-को झारखंडी होने का अधिकार दे रहा है, जो झारखंड से मैंट्रीक की शिक्षा हाशिल की है-उन्हें भी झारखंडी होने का दर्जा दिया । तब असम के आदिवासी समुदाय जो कई दशकों से वहां रह रहे हैं-को वहां आदिवासी स्टेटस क्यों नहीं देने की पहल कर रही है? यह केंन्द्र की मोदी सरकार के आदिवासी शुभचिंतक होने पर भी सवाल खड़ा करता है।

Thursday, September 21, 2017

Tuesday, September 19, 2017

परिवार में छह सदस्य थे-पांच जगह रहते थे

टिचरजी सबको बोल दी थी-26 जनवरी तक जिसके पास ड्रेस नहीं है, बनवा लो। मां को प्रति माह 25 रू0 तनखा मिलता था। मां इस पैसा को हमदोनों को, जोलेन दादा और बिजय दादा सबको बांट देती थी। पुलिस वाले हमदोनों को खाना के साथ 15 रू महिना देते थें। मां के मलकीन के घर के बगल वाले घर में फुलमनी आया का काम करती थी। फूलमनी बोली हमको एक परिवार वाले सुबह शाम वर्तन, कपड़ा, घर झाडू-पोछा करने के लिए आया खोजने के लिए बोले हैं। एक दिन फुलमनी मुझ को लेकर उस परिवार से बात करायी। मैं काम करने के लिए तैयार हो गयी। सुबह सुबह दादा के साथ दोनों मिलकर पुलिस चैकी का काम जल्दी से निपटा लेते थे। इसके बाद मैं उस नया घर में काम करने निकल जाती। इस परिवार में तीन बच्चे और पति-पत्नि रहते थे। यह बंगाली परिवार था। बीबीजी मेरा नाम-दयामुंई पुकारती था।
पुलिस चैकी में पहले वाले कुछ पुलिस दूसरा जगह चले गये। उनके जगह नये आये हैं। हवलदार तो वही है। एक लंबा सा आया -साधु सिंह नाम था। व्योहार से बहुत अच्छे थें। चैकी में पहुंचते ही आवाज देते थें-बरला.....
तब सब ठीक है नू...। जो भी नया आदमी आता, सबको बताते थे-ये हम लोगों की दाई हैं। दोनों भाई-बहन पढ़ते हैं। बरला जरा.....पानी पिलाओ....आया हुआ व्यत्कि मुस्कुराता हुआ चेहरा देखता। जितने पुलिस पुराने थ,े वो हमदोनों के खाने का ख्याल रखते थे। नया आते,ं ये पहले वालों की तरह नहीं होतें।
अब ज्यादातर दिन हमदोनों के लिए खाना नहीं बच रहा था। हमदोनों साधु सिंह को ही बोल पाते ं-आज खाना नहीं है। रविकांत दूसरा जगह चला गया। मरांडी भी गया। अब हमदोनों को अधिकांश दिन अपने ही डेरा में भात-रोटी बनाना पड़ रहा था, उसी डिबा और टिना में ।
जिस बंगाली परिवार में काम पकडी थी- उनकी बड़ी बेटी मेरी ही उम्र की थी। उनकी एक छोटी बहन और एक बड़ा भाई भी था। घर पोछने के समय उसका बडा बेटा मेरे पीछे पीछे घुमते रहता था। मुझको अजीब सा लगता -लेकिन चुप रहती। एक दिन उसकी मां बाजार गयी थी। उसकी बहन दोनों भी नहीं थे घर में। उनकी मां बोल कर गयी--वह बगल पडोसी के घर जा रही है, तंुरत आएगी। जब मैं घर पोछा करने लगी-बड़ा लडका मुझे पीठ तरफ से मेंरे दोनों कांख के नीचे से हाथ पार कर छाती तक हाथ पहुुुचाने की कोशिश करने लगा। मैं हड़बडा कर खड़ी हो गयी और विरोध करते बोली--देखो घर में सबको बता दुंगी। तब वह नहीं -नहीं मत बताना-दूबारा ऐसा नहीं करेगें कहते हुए दूसरे कमरा में गया। तब से पुरूषों को देखकर मन में असुरक्षित सा महसूस होने लगता था।
स्कूल में 26 जनवरी का परेट जारों से चल रहा था। क्लास में मुदित देमता से नयी मुलाकात थी। निलम कच्छप भी मुदित के साथ ही रहती थी, इसलिए मेरी दोस्ती दोनों से ही हो गयी। पिछला साल तो मैं एलो हाउस में थी। इस साल मुझे ग्रीण हाउस मिला । मुदित ब्लू हाउस और निलम मेरून हाउस में थी। याद है पिछले साल गणतंत्र दिवस बहुत धुमधाम से मनाया गया था।
 देखते देखते  26 जनवरी आ गया। सभी तरफ चहल-पहल था। आज पुलिस चैकी में भी दूसरे दिनों से अलग ही लग रहा है। और दिन कुछ सिपाही हमदोनों के आते तक सोते रहते थे। आज सभी उठ गये हैं। कोई नहाने की तैयारी में है, कोई मुंह साफ कर रहा है। दो सिपाही बैरक प्रंगण में लाल बिच्छी ईंटों पर फूलों से कुछ बना रहे हैं। एक-दो अपने बेड पर बैठ कर अपना ड्रेस ठीक कर रहे हैं। दादा के साथ हमदोनों जल्दी जल्दी चैकी का काम निपटाने की कोशिश में जुट गये। हम दोनों को सात बजे तक स्कूल पहुंचना है।
चैकी का काम निपटा कर डेरा लौटे और हड-बड तैयार हुए और स्कूल के लिए निकल गये। स्कूल आंगन में सभी क्लास की लड़कियां जमा हुई। तिरंगा झंण्डा के नीचे गुलाम फुल की लाल-गुलाब पंखूडियों से भारत बना हुआ था। सभी लड़कियां बहुत खूस नजर आ रही थीं। स्कूल की प्रिंसिपल से लेकर सभी शिक्षिकाएं आसमानी नीला रंग की साडी और सफेद ब्लाउज में थीं। संस्कृत सर हमेशा की तरह धोती कुरता में।ं, लेकिन आज सफेद कुरता के जगह हल्का ब्राउन रंग का कुरता में हैं। गणित सर दोनों हमेशा की तरह सफेद कमीज और सफेद पैंट पहने में।
 आठ बजे सभी झंण्डा के नीचे थे। स्कूल की लीडर -परेड सावधान, परेड-बिसराम, परेड........। स्कूल की प्रिंसिपल आगे आयी और झंण्डा का डोर पकडं ली ....देखते ही देखते फूलों की पंखुडियां और फूल आसामन से झरने लगा, तब....जन...गण....मन.....गान के साथ तिरंगा झंण्डा को गाइड की लडकियों ने बैंड बाजा के साथ सलामी दी।  8 बजे तिरंगा झंडा फहराने के बाद मैदान में कार्याक्रम शुरू हुआ। रिले रेस, नाटक, घडा फोड़, कुर्सी दौंड़, साई-धागा रेस, आदि दिन भर चला। जो प्रतियोगिता में जीते थे-उनको पुरस्कार दिया गया।
प्रतिदिन क्लास शुरू करने के पहले बाईबल क्लास होती थी। क्लास में सबके पास बाईबल थी, मेरे पास नहीं था। एक दिन मैंने क्लास रूम में रखे लकड़ी के अलमीरा से बाईबल चोरी करने की सोची। मैं आज हिम्मत नहीं जुटा सकी। दूसरे दिन मैं टिफिन के समय जब क्लास रूम में कोई नहीं था ,अलमीरा के पास गयी। अलमीरा खोलकर बाईबल को निकाल ली। थोड़ी देर अपने डेस्क में रखी, लेकिन मन बोला-नहीं चोरी मत करो। मैं बाईबल वापस रख दी।
जनवरी के बाद अब पढ़ाई टाईट से होने लगा। इस साल पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं हो रही थी, पिछले साल तो शहरी वातावरण में अपने को अडजस्ट करने मेे भी दिक्कत हो रहा था।
स्कूल से लौट कर बंगाली बीबीजी के घर काम करने जाती थीं तो आशा लगा रहता था, कि सब काम निपटाने के बाद चाय के साथ दो अंटा रोटी मिलेगा। इनके घर से दो घर पहले एक छोटा मकान था। इस घर में एक ही जवान रहता था। वह हमेशा बंगाली परिवार में आता जाता था। एक दिन बीबीजी बोली-दयामुंई ये न अकेला रहता है, तुम इसके घर का दो वर्तन धो देना और पोझा लगा देना, तुमको कुछ पैसा देगा...चलेगा? मैं ने हामीं भर दी।
 अब कल से इनका घर का काम भी देखना है। इसलिए भी काम करने को तैयार हो गयी, क्योंकि पैसों की जरूरत थी। स्कूल फीस के रूप में 3 रू प्रतिमाह देना था। पिछले साल जो किताब नहीं खरीद सके थे-सुशील दादा के साथ हमदोनों गुदड़ी के पास पुराना किताबों का दुकान था वहां से जाकर खरीद लिए। जोलेन दादा पिछले साल तक गांव में था। अब वो भी रांची आ गया। जोलेन दादा गांव के बगल कुदा स्कुल में 8वीं क्लास में पढ़ रहा था। अब बिजय दादा केवल घर में रह जाएगा। बिजय दादा गांव में ही दूसरों के खेत-टांड में मेहनत-मजदूरी कर अपना रोटी जुगाड़ कर ले रहा था। बाबा कोटबो छपर टोली में 8 साल से धांगर है। साल में एक-दो बार एक-दो दिन के लिए आते थे। हर साल पूस महिना में बाबा को साल भर का धंगराई का मेहनतना 3 काठ धान मिलता था। पहनने के लिए एक पढ़िया करेया और एक पेछाउडी। धान लाने बिजय दादा अपने साथ, एक -दो लड़कों को लेकर जाता । जिस दिन धान लेकर आते थें, सबको दाल-भात खिलाते थे।
स्कूल से लौट कर मैं बंगाली बीबीजी के घर काम करने के बाद बीबीजी उस दूसरे घर में वर्तन साफ करने ले जाती थी जहां अकेले एक युवक रहता था। एक दिन बीबीजी बाजार गयी, तब मुझे उनका घर अकेले काम करने जाना पड़ा। वर्तन धो ली, अब घर में झाडू मारना और पोछा लगाना था। मैं डरे सहमंे मन से अपना काम पूरा की और निकल कर सीधे बंगाली बीबीजी के घर आगयी। मेरा दो रोटी और चाय खा कर पुलिस चैकी काम करने निकल गयी। मेरे जाने के पहले सुशील दादा पहुंच कर मसाला पीस रहा था। जैसे मैं चैकी में पहुंची, बरला....इधर आओ, दरोगा ने आवाज दिया। मैं गयी, वहां चार-पांच सिपाही लाईन से खड़े थे। दरोगा पूछा....इसमें से तुम को कोई कुछ बोलता है? कुछ भी गलत बात बोलता है? एक बार के लिए मैं सकपका गयी। वहां रमानंदजी भी मौजूद थे, जो एक दिन मेरे उपर हाथ डाला था, लेकिन मैं....जी नहीं.....बोलते सिर झुका ली।
 हम लोगों को संस्कृत पंडित सर पढ़ाते थे। हम लोग 4-5 लड़कियां होम वर्क करके नहीं लाए, सर डंटते हुए बोले......दहीना हाथ बढ़ाओ.....हाथ बढ़ाते ही , तलहथी पर सरट-सरट तीन छडी पड़ा। शरम से सिर छुक गया। दो-तीन मिनट बाद सर बोले.....तुम लोगों को मां-बाप पढ़ने के लिए भेजते हैं, बढ़िया से पढ़ो.......आगे होम वर्क जो करके नहीं आएगा....मेरा क्लास में नहीं रहेगा....वो बाहर रहेगा। जिस दिन जिस विषय का होमवर्क पूरा नहीं कर पाती थी, क्लास में मुदित से उनका होमवर्क कापी लेकर जल्दी से उतार लेती थी। क्लास में दूसरे लड़कियों को देखते रहती थी-सोचती थी, ये सभी बड़े घर की बेटियां हैं, मैं इनके सामने तो कुछ भी नहीं हुं.......................।
क्लास सिलाई में हम लोगों को रूमाल का किनारा, उस पर फूल बनाना, थैला पर फूल बना कर थैला सिलाई करना था। मां से रूमाल कपड़ा के लिए मरकिन खरीदने के लिए पैसा लिये, उसी को क्लास सिलाई बना ली। हमारे क्लास को मैडम बेला तिग्गा भूगोल पढ़ाती थी, स्वथ्य विज्ञान मिस भेंगरा पढ़ाती थी। गांव से जितनी नयी लड़कियां आती हैं, सबकों समझाती हैं--गांव से पढ़ने आयी हो, अवसर मिला है मेहनत करो, रिजल्ट अच्छा करो.....तब आगें बढ़ोगे।
पीपी कमपाउंड में एक धोबी परिवार था। उसकी बेटी मेरा ही क्लास में पढ़ती थी। इसके साथ हम दोनों की बढ़िया दोस्ती थी। छुटी के दिन कभी वो मेरे पास आती थी, कभी मैं उनके डेरा में जाती। उनके मां-बाबा पीपी कमपाउंड के एक गली में टेबल लगा कर लोगों का कपड़ा अयरन करते थे। साथ ही जो लोग कपड़ा धाने के लिए देते थे, उनका कपड़ा भी धोते थे। ये लोग भी एक पंजाबी परिवार के छोटा सा कमरा में रहते थे। मां बोलती थी-तुम जो-सो के साथ जल्दी घुलमिल जाती हो, एैसा ठीक नहीं है। तब लगता था मां मना कर रही है। बोलती थी कौन कौसा आदमी क्या है-तुम नहीं जनती हो।
परिवार  में छह सदस्य थे-पांच जगह रहते थे
बाबा कमडरा प्रखंड के सुरवा गांव में लोखन पाहन के घर धांगर.....था। मां --जयफर स्टूडियों के मालिक के घर रांची के पीपी कमपांउड में आया का काम करती थी।...
जेलेन दोदा--(मुझ से बड़ा)--थड़पखना रांची के कबाड़ी दुकान मे दिहाडी मजदूरी का काम करता था। वहीं पुराना लोहा लकड के ढेर के बीच रात गुजारता था।.
स्ुाशील दादा और मैं- टहेलसिंह के बगान में एक आउट हाउस में रांची ...में असियाना मिला।.
बिजय दादा--(सबसे बड़ा भाई)--अपने घर अरहरा में, कमडारा, गुमला में किसानों के खेत में मजदूरी कर रोजी-रोटी चलाता था। .
हाथ में चुड़ी का दाग आज भी
परिवार में छह सदस्य थे। पर सभी अलग अलग जगहों पर। तीन बहनों की सबसे छोटी बहन, मेरे लंम्बे घने बाल थे। स्कूल में बाल बांधने के लिए काला फीता का प्रयोग किया जाता था। स्कूल के बाहर कभी कभी मैं लाल फीता से बाल बांधती थी। एक दिन मैं लाल फीता बांधकर मां के पास उनके मलकिन के घर गयी थीै। मेरा बाल देखकर मां बोली-तुम्हारा बाल एैसे ही बहुत सुंदर  है, तुम लाल फीता मत बांधना, अच्छा नहीं दिखता है।  मैं वहीं अपने बाल की चोटी से लाल फीता को खोल दी। साथियों को देख कर हाथ में चुडी पहनने का मन होता था। एक बार चुडी पहनकर गांव गयी थी। बिजय दादा काड़ा चराने गया हुआ था। मैं रात का खाना बनाने के लिए सिलोट पत्थर पर हलदी, धनिया पीस रही थी। मेरा हाथ की चुडियां झनर झनर आवाज कर रही थी। दादा काड़ा घर ला रहा था। कड़ा को गोहाल में भीतार कर घर घुसे। मैं तबतक दूसरा काम में व्यस्त थी। दादा अंदर आकर पींडा पर बैठते हुए बोला-हम तो सोच रहे थे-कौन तेलीन जनी आयी है, चुडी बज रहा है। हम दोनों खूब हंसे। लेकिन मैं समझ गयी कि-दादा को मेरा चुडी पहनना अच्छा नहीं लगता है। तब से चुडी नहीं पहनी। रमटहल का मकान----पीपी कमपाउंड-----
बड़ा सा होला का गेट। अंदर में एक छोटा कमरा। कमरा में एक टुटा पुराना लकड़ी का बंेच। फर्स पर कच्चा सिमेंट का पसल्टर। आंगननुमा छोटा सा ईंटा का घेरा। गेट के सामने जमीन से थोड़ा बाहर निकला पानी का नल। नल का मुंह को एक नटनुमा ढकन से बंद करते हैं। बगान का पूरा जमीन गरमी में भी गीला रहता है। बगान के चारों ओर उंचा घेरा है। बगान के पूरब पंजाबी परिवार का दो तल्ला मकान है। इसके यहां रिक्सा का बोडी बनता है। अरहारा का सिमोन दादा यहीं रिक्सा बोडी बनाता है। बगान के उत्तर ओर भी मकान है। कमान के बगल में एक छोटा मंदिर भी है। वहीं एक आम का पेंड भी हैं-जिसका डाली बगान की ओर झुका हुुआ है। बगान के पश्चिमी ओर हिंन्दपीडी जाने वाला रोड़ हैं। यहीं दिवाल से सटा एक बड़ा सतालू का पेड है।
पुलिस वालों के यहां रोज-रोज खाना नहीं बचता है। कभी कभी पुलिस चैकी में उनके दोस्त-यार आते हैं, तो खाना नहीं बचता है। जिस दिन खाना नहीं बचता है-पुलिस वाले 10-15 रूपया हम दोनों को धरा देते हैं। इसे चावल या आंटा खरीदते हैं। हम दोनों के पास रांेटी बनाने के लिए ताई नहीं था।
 बगान में ही एक बड़ा टिना का मुंह काट कर निकाला गया-टिन का टुकड़ा पड़ा मिला। इसको बढिया से धोये और इसी पर रोटी बनाने लगे। भात पकाने के लिए डेगची और कड़ाही भी नहीं था। बगान में ही एक छोटा दूध का पुराना जंग लगा डिबा मिला। उसको मिटी से रगड-रगड़ कर साफ किये। जब-जब हम दोनों के पुलिस वालों के पास भात-रोटी नहीं बचता था, तब-तब इसी डिबा में भात पकाते थे। खाना बनाने के लिए हम दोनों लकड़ी खरीद नहीं सकते थे। सुजाता सिनुेमा हाॅल के बगल एक पंजाबी परिवार भैंस पाल रखा था।
उनके यहां करीब 7-8 भैसें थी। हर सुबह हिंन्दपीडी की मिहलाएं भैंस का गोहाल से गोबर उठा कर ले जाती थी। मुझको भी शांति वहां ले गयी थी दिखाने कि तुम भी उपला बनाने के लिए उठा लाओ। मां अपने मलकिन से फटा टीना मांगी थी। जिसका पेंदी -नीचला भाग सही थी। इसी को काट कर टोकरी बना लिये। सुबह चार ही बजे उठते थे, देर होने पर सौच के लिए जगह नहीं मिलता थां, उजियाला होने पर। सौच से निपट कर सीधे टीना पकड़ कर सरदारजी के भैंस गोहाल जाती और गोबर उठा कर लाती थी। हाथ-मुंह धो कर रात को खाना लाया वर्तन लेकर सुजाता पुलिस चैकी जाती। बसन-वर्तन करन कर वापस डेरा में आकर पहले गोबर का उपला बगान के घांस में जहां खाली था डाल देती थी। इसके बाद स्कूल के लिए निकलती थी।
जब-जब भात बनाना होता था, ईंटा का चुल्हा बिलकुल छोटा -जिस पर डिबा बैठा सकते थें और नीचे गोबर का उपला डाल सकें, बना लिये थे। डिबा में तीन ही मुठी चावल पकता था। जब भात डबकता था, तो पूरा चुल्हा में पानी और चावल साथ गिरने लगता था। आंटा रोटी बनाने के लिए एक कांच का बोतल को साफ कर लिये थे। आंटा का गुंधा गुलिया को अलमुनियम का थाली को उलाट कर उस पर बोतल से बेल कर गोल करते थे। ताई तो टिना का टुकड़ा.........।
अक्टोबर महिना में स्कूल में नमाही परीक्षा था। लगातार आठ दिनों से झिमिर झिमिर पानी बरस रहा था। मेरे पास छाता नहीं था। पीपी कमपांड से बिना छाता के लिए अपना किताब-कोपी को एक प्लाटिक में डाल कर अपने छाती से चिपका कर, दुपटा का एक छोर से किताब को ढंक कर स्कल जाते थे। आते समय भी एैसा ही लपेट कर आती थी। परीक्षा करीब था इसलिए मैं स्कूल नागा नहीं करती थी। आज भी पानी पानी ही मैं घर जाने लगी। दूसरी लडकियों के पास छाता और बरसाती हैं, तो वे अपने साथियों के साथ निकल गयी। पानी ज्यादा गिराने लगा, मैं बचने के लिए स्कूल से थोड़ा दूर आकर छोटानागपुर किताब दुकान के पास रूक गयी। पानी कम किया तो मैं जाने लगी। थोडी दूर गयी थी, तभी एक बरसाती पहिना, सिर भी ढंका एक व्यक्ति मुझ को पार कर आगे निकला।
चर्च रोड़ छोड़ कर बरनाबस अस्पताल घेरा के बगल से होकर पिलगर्ल लाईन होकर आते थे। जैसे ही मैं पिलगर्ल लाईन पार की बरसाती वाला आदमी वहां रूका हुआ मिला। मैं बेथेसदा गल्र्स हाई स्कूल के पिछवाड़े जैसे ही पहुंची बरसाती पहना आदमी मेरे पास पहुंच गया। मैं कुछ समझती-तब तक वह मुझको दोनों हाथों से जकड़ के पोटर लिया और रोड के पार लीची बगीचा के बीच झाडियों के तरफ खींच कर ले जाने लगा। मैं जोर लगा रही थी-अपने को छुड़ाने के लिए...मेरा किताब जमीन पर गिर कर बिखर गया। पैर का चप्पल खुल गयां । मैं संभलने की कोशिश की। जमून पेड़ का छोटा सूखा लकड़ी टूटकर सामने जमीन पर पड़ा था। मैंने उसे उठा ली और उस आदमी को मारने के लिए दौड़ाने लगी। तब तक बेथेसदा स्कुल गेट के सामने कुंआ से कुछ लड़कियां पानी भर रही थी, वो मुझ को देख ली। उन लोगों को समझते देर नहीं लगी और दो-तीन लड़कियां मेरी तरफ दौड़ कर आने लगी। लड़कियों को देख कर वह सीधे गोस्सनर मिडिल स्कूल के पीछवाड़े से होते हुए खजूर तालाब वाले मिशन के खेत वाले रास्ते पर आगे जाने लगा, जिस रास्ते से मुझे घर जाना था।
लड़कियों को मैंने पूरी बात बतायी। लडकियां पूछी-तुम कहां रहती हो? मैं बतायी-पीपी कमपांड में। तब लड़कियां बोली-तब तुम को तो उसी रास्ता से जाना हैं-जिस रास्ता से वो बदमाश जा रहा है। तब उन लोगों ने तय की कि-वे मुझे मेन रोड़ तक पहुंचा देगें। मेन रोड़ के बाद तो बहुत लोग मिलेगें। तब लड़कियों ने मुझे मेन रोड़ तक पहुचा दी। मेन रोड़ पार कर अपना बाजार वाले रास्ते से पीपी कमपाउंड में मैं घुस गयी। सबसे पहले में मां के पास उनके बीबीजी के घर ही मिलने गयी। मां को पूरी घटना बता दी। मां बोली-आगे से ख्याल रखना-जब रास्ता में साथी सब मिलेगें तब उन्हीं के साथ आना-जाना करना