Wednesday, September 12, 2018

सरना, मसना, मंदिर, मसजिद को घेरा बंदी करने पीछे और कोई रहस्य तो नहीं?

सरना, मसना, मंदिर, मसजिद को घेरा बंदी करने पीछे और कोई रहस्य तो नहीं?
रघुवर सरकार ने घोषणा की है कि आदिवासी समुदाय के सरना, मसना, कब्रस्थान, हडगड़ी, गिरजा, मंदिर, मसजिद का घेराबंदी किया जाएगा, ताकि आदिवासियों का धर्मिक स्थल सुरक्षित रहे। इस योजना के तहत सरकार ने 44 करोड राशि देकर राज्य के 603 स्थलों की घेराबंदी करने का निर्देश दिया है। यह काम शहरी ईलाकों में जहां आदिवासी गांव विलुप्त हो रहे हैं, जमीन का अतिक्रमण हो रहा है, आदिवासी गांव अब नगरिय रूप ले चुका है, जहां वहां गांव बसाने वाले आदिवासी आबादी और उनकी जमीन पूरी तरह खत्म हो चुकी है-वहां सरना, मसना, हडगडी स्थलों के घेराबंदी की मांग समाज करते आया है। लेकिन आरएसएस और बीजेपी ने इस मांग को अलग रूप देने की कोशिश कर रहा है। इस योजना के तहत आदिवासी समाज को अपनी ओर खिंचने का एक बड़ा जरीया मान रहा है। लेकिन सवाल है कि-ग्रामीण ईलाकों के सरना, मसना, कब्रिस्थान, हडगडी का घेराबंदी करने के पीछे उद्वेश्य अलग है, सरकार भूमिं बैंक बनायी है-इसमें पूरे राज्य के सभी समुदाय के कब्रिस्थानों, अखड़ा, सरना, मसना, हडगडी, जहेरथान, झील, नाला-लोर, खेलमैदान, आम रास्ता, चरागाह, डोंगरी, झाड़ी, सहित सभी गैर मजरूआ आम, मजरूआ खास जमीन को मिलाकर भूमिं बैंक बनाया है। 16-17 फरवरी 2017 झारखंड सरकार ने मोमेंटम झारखंड का आयोजन किया। जिसमें सरकार ने पूंजिपतियों से सामने रिपोट रखा कि-23 लाख एकड भूमि बैंक में जमीन सरकार ने सुरक्षित रखा है, निवंेशक जहां भी जमीन चाहें, बिना देर किये, एक सप्ताह में सरकार जमीन देगी। सरकार धर्मिक स्थलों योजना के तहत इन भूमिं बैंक की योजना को सफल बनाना चाहती है। ताकि समाज विरोध न करें और भूमिं बैंक के तहत आदिवासी ईलाके को इए-एक इंच जमीन ंिसगल विंडो सिस्टम से आॅन लाईन सरकार जिसको चाहे हस्तंत्रित कर सके। यह जमीन लूटने का एक बड़ी साजिश का हिस्सा है, इसको समझने की जरूरत है।

क्या सही में भाजपा सरकार सरना आदिवासी समाज के हितों की रक्षा करना चाहती है?

क्या सही में भाजपा सरकार सरना आदिवासी समाज के हितों की रक्षा करना चाहती है?
रघुवर सरकार 2016 में कई कानून लेकर आये। सबसे पहले आदिवासी-मूलवासी जनविरोधी स्थानीयता नीति 2016 लाया। गो रक्षा कानून, आदिवासी-मुलवासी किसान विरोधी महुआ नीति 2017, झारखंड धर्म स्वतंत्र विधेयक 2017, जमीन अधिग्रहण संशोधन विधेयक 2017, भूमिं बैक, इन सभी कानून को बिना बहस किये, जनता से बिना विमार्श किए एक छण भर में राज्य का कानून का रूप दिया गया। तब सरना समुदाय के लिए सरना धर्म कोड देने में विलंब क्यों? क्योंकि राज्य में बीजेपी की सरकार और केंन्द्र में भी बीजेपी की सरकार है। यही नहीं राज्य के 14 संासदों में 12 संसद बीजेपी के, 4 राज्यसभा सदस्यों में 3 बीजेपी के हैं।  राज में बीजेपी की सरकर, तब सरना कोर्ड को कानूनी रूप देने में कोई बाधा है ही नहीं, सिर्फ इच्छा शक्ति हो। 

सेवा में भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग झारखंड सरकार महोदय

सेवा में
भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग
झारखंड सरकार                         
महोदय                                               पत्रांक----6
                                                      दिनांक-8 जून 2018ण्
विषय. आदिवासी.मूलवासी ग्रामीण किसानों कें परंपारिक समुदायिक धरोहर जंगल.झाडीए चरागाहए सरना.मसनाए अखड़ाए ससनदिरिए हड़गडीए जतराटांडए मंड़ा टांडए भूतखेताए डालीकतारीए पहनाईए  नदी.नालाए पाईन.झरना सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक में शामिल किया गया हैए को भूमिं बैंक से मुक्त करनेए तथा पांचवी अनुसूचिं एवं सीएनटी एक्ट एवं एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाशयए
सविनयपूर्वक कहना है कि.हमारे पूर्वजों ने सांप.बिच्छूए बाघ.भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है.कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देश गुलाम थाए और आजादी के लिए देश छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों नेए सिदू.कान्हूए चांद.भैरवए सिंदराय.बिंदरायए तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देश के मुक्ति संग्राम में अपनी शहादत दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी.मूलवासियों के धरोहर जल.जंगल.जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी.मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल.जंगल.जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं.कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी.मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल.झाड़ए बालू.गिटीए तथा एक .एक इंच जमीन परए ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन .जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खासए जंगल.झाडीए नदी.नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है Custodian  सरकार इस जमीन का देख.रेख करती हैए लेकिन मालिक नहीं हैए न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि.सरकार हम आदिवासी.मूलवासी किसानों के परंपरागत हक.अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना करए पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है.तो ग्रामीण आदिवासी.मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्यए भाषा.संस्कृतिए जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं.कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल.झाड़ए पेड़.पैधोंए नदी.नालाए झरनों में आधारित हैए इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई हैए जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी.मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में शमिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे.जो आदिवासी.मूलवासीए किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी .मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी हैए न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेशानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से.एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी.मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाटए धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में भूमि बैक को इस्तेमाल करने जा रहा है।
मंच भूमि बैंक से होन वाले खतरों की ओर आप का ध्यान खिचना चाहता है.
भूमि बैंक एवं के लागू होने से आदिवासी.मूलवासी समुदाय के परंपरागत एवं संवैधानिक अधिकारो पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है.
राज्य का पर्यावरणीय परंपरागत जंगल.झाडए नदी.झील.झरनों के ताना.बाना के साथ जिंदा हैए वो पूरी तरह नष्ट हो जाएगा

भूमि बैंक के लागू होना सीएनटी एक्ट एवं एसपीटी एक्ट पर हमला होगा
भूमि बैंक के लागू होने से पांचवी अनुसूचित के प्रावधान अधिकार खत्म हो जाएगा
भूमि बैंक के लागू होने से खूटकटी अधिकार एवं विलकिंषन रूलए मांझी.परगना व्यवस्था खत्म हो जाएगा। जिसका प्रभाव निम्नलिखित स्तर पर पडेगा।
1.परंपारिक आदिवासी.मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाशासन गांव व्यवस्था तहस.नहस हो जाएगा।
2.आदिवासी.मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीयए भूगर्भीय अवस्था जो यहां के परंारिक कृर्षिए पर्यावरणीय ताना.बानाए पूरी तरह नष्ट हो जाएगा।
3.परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबादी के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्यए सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4.जंगल.जमीनए जलस्त्रोंतोंए जंगली.झाड़ए भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5.स्थानीय आदिवासी.मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी हो जाएगीए तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6.सामाजिकए आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी.मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवश होगी।
7.आदिवासी.मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए.हम आदिवासी.मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं.
1.सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2.गैर मजरूआ आमए गैर मजरूआ खासए जंगल.झाडीए सरना.मसनाए अखड़ा ए हडगड़ीए नदी.नालाए पाईन.झरनाए चरागाहए परंपारिक.खेत जैसे भूत खेताए पहनाईए डाली कतारीए चरागाहए जतरा टांडए इंद.टांडए मांडा..टांड सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में शमिल किया गया हैए को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं.पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3. भूमिं सुधारध्भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है.उसे रदद नहीं किया जाए
4.जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5.किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6.5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7.किसानों का लोन माफ किया जाए 
9.ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने के लिए मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10.आदिवासी.मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल.जंगल.जमीन के साथ रचे.बसे आदिवासी.मूलवासियों के सामाजिक मूल्योंए संस्कृतिक मूल्योंए भाषा.संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11.पंचायत मुख्यालयोंए प्रखंड मुख्यलयोंए स्कूलोंए अस्पतालोंए जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
13.सरना कोड़ लागू किया जाए।

                                     निवेदक
                        आदिवासी.मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा.खूंटी                             
    convener .दयामनी बरला          अध्याक्ष.तुरतन तांपनांे
                            उपाध्यक्ष.राजू लोहरा
                            सचिव .हादू तोपनोए उपसचिव.ऐनेम तोपनो 

सेवा में, महामहिम राज्यपाल महोदया, झारखंड महोदया ,

सेवा में,
महामहिम राज्यपाल महोदया,
झारखंड                           
महोदया ,                                               पत्रांक.....06..
                                                      दिनांक.....8 जून 2018.
विषय- आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसानों कें परंपारिक समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, अखड़ा, ससनदिरि, हड़गडी, जतराटांड, मंड़ा टांड, भूतखेता, डालीकतारी, पहनाई,  नदी-नाला, पाईन-झरना सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक में शामिल किया गया है, को भूमिं बैंक से मुक्त करने, तथा पांचवी अनुसूचिं एवं सीएनटी एक्ट एवं एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाशय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देश गुलाम था, और आजादी के लिए देश छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देश के मुक्ति संग्राम में अपनी शहादत दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है- Custodian   सरकार इस जमीन का देख-रेख करती है, लेकिन मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है। राज्य की जनता को इन्हीं प्रकृतिक स्त्रोतों से शुद्व भोजन, शुद्व पानी और शुद्व हवा मिल रहा है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में शमिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेशानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में भूमि बैक को इस्तेमाल करने जा रहा है।
मंच भूमि बैंक से होन वाले खतरों की ओर आप का ध्यान खिचना चाहता है-
भूमि बैंक एवं के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत एवं संवैधानिक अधिकारो पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
राज्य का पर्यावरणीय परंपरागत जंगल-झाड, नदी-झील-झरनों के ताना-बाना के साथ जिंदा है, वो पूरी तरह नष्ट हो जाएगा
भूमि बैंक के लागू होना सीएनटी एक्ट एवं एसपीटी एक्ट पर हमला होगा
भूमि बैंक के लागू होने से पांचवी अनुसूचित के प्रावधान अधिकार खत्म हो जाएगा
भूमि बैंक के लागू होने से खूटकटी अधिकार एवं विलकिंषन रूल, मांझी-परगना व्यवस्था खत्म हो जाएगा। जिसका प्रभाव निम्नलिखित स्तर पर पडेगा।
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाशासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था जो यहां के परंारिक कृर्षि, पर्यावरणीय ताना-बाना, पूरी तरह नष्ट हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबादी के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी हो जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवश होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी, सरना-मसना, अखड़ा , हडगड़ी, नदी-नाला, पाईन-झरना, चरागाह, परंपारिक-खेत जैसे भूत खेता, पहनाई, डाली कतारी, चरागाह, जतरा टांड, इंद-टांड, मांडा--टांड सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में शमिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए 
9-ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने के लिए मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।

                                     निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी                             
    संयोजक....-दयामनी बरला          अध्याक्ष-तुरतन तांपनांे
                            उपाध्यक्ष-राजू लोहरा
                            सचिव -हादू तोपनो, उपसचिव-ऐनेम तोपनो 

ग्रामीण अर्थव्यस्था को समझने के लिए आदिविासी-मूलवासी, किसान, दलित सहित प्रकृति के साथ लीने वाले समुदाय के जीवनशैली तथा आार्थिक तानाबाना को समझने की जरूरत है

आर्थिक करोबार
ग्रामीण अर्थव्यस्था को समझने के लिए आदिविासी-मूलवासी, किसान, दलित सहित प्रकृति के साथ लीने वाले समुदाय के जीवनशैली तथा आार्थिक तानाबाना को समझने की जरूरत है। प्रकृतिकमूलक जीवन प्रकृति और पर्यावरण के जीवन चक्र के साथ ही समुदाय का आर्थिक चक्र भी चलते रहता है। जहां मित्तल कंपनी प्लांट लगाने की योजना बनायी है, वहां की ग्रामीण अर्थव्यस्था की एक झलक यहां रखने की कोशिश की जा रही है। इस इलाके से हर साल मौसम आधारित फलों के व्योपारी बाहर से आते हैं। कटहल, आम, सकरकंद, मुर्गी, बकरी ,बत्तक आदि खरीदन के लिए व्योपारी गांव-गांव घुमते हैं। आवागमने के लिए रोड़ तथा रेलवे लाईन की सुविधा है। ट्रेन रास्ते से भी बड़ी संख्या में व्योपारी आते हैं। गोविंदपुर, जरिया, बकसपुर, पोकला, पकरा, कुरकुरा स्टेषनों में भारी मा़त्रा में आम, कटहल, इमली, अमरूद के अलावे हर तरह के मौसमी साग-सिलयारी, कुदरूम,सनाईफूल,दतून, पत्त करोड़ो का माल इस क्षेत्र से बाहर जाता है।


इमली, लकड़ी, खुखडी-रूगडा- आम ,दतुन-पताल आदि बाहर भेजा जातहै। इस तरह इन स्टेषनों से एक दिन मे करोड़ो का माल इस क्षेत्र से बाहर जाता है।


Wednesday, May 30, 2018

Earth is Life

Eart Is Life
Nature is Heritage
Save Eart
Save Life
Nature is 
Will be Distroyed 
Life will be End

Go in Nature

Can You Walk With Us To The Nature?