Monday, July 17, 2017

झारखंड अलग राज्य की मांग, झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय ने अपने जल-जंगल-जमीन, भाषा-सास्कृति, पहचान को विकसित और संगक्षित करने के लिए की थी।

15 नवंबर 2000 में झारख्ंाड अलग राज्य का पूर्नगठन हुआ। यह सर्वविदित है कि झारखंड अलग राज्य की मांग, झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय ने अपने जल-जंगल-जमीन, भाषा-सास्कृति, पहचान को विकसित और संगक्षित करने के लिए की थी। अलग राज्य का नींव अबुआ हातुरे-अबुआ राईज, हमर गांव में-हमर राईज छोटानागपुर और संताल परगना इलाके में अंगे्रज हुकूमत द्वारा थोपी जा रही भूमि बंदोस्ती कानून या लैंण्ड सेटेलमेंट के खिलाफ संघर्ष के साथ डाला गया। इस, हमारे गांव में हमारा राज के संघर्ष को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संताल हूल 1856, 1788-90 में पहाडिया विद्रोह, 1798 में चुआड विद्रोह, 1800 में चेरो विद्रोह, 1820-21 में हो विद्रोह, 1831-33 में कोल विद्रोह, सरदारी विद्रोह और 1895-1900 में बिरसा मुंडा उलगुलान के नाम से इतिहास में अंकित किया गया है। 
इस अलग राज्य की लड़ाई ने आजादी के बाद छोटानागपुर एवं सताल परगना के इलाके में आजादी के बाद संपन्न हुए राजनीतिक चुनाव को भी प्रभावित किया, और आदिवासी-मूलवासी समुदाय ने 1952 के पहला चुनाव में अलग राज्य के नाम पर 33 जनप्रतिनिधियों को चुन कर बिहार विधान सभा में भेजा। अलग राज्य की इस लड़ाई को राजनीतिक तौर पर जयपाल सिंह मुंडा, निरल ऐनेम होरो सहित हजारों आदिवासी मूलवासी अगुओं ने आगे बढ़ाया। इसके बाद का0 ऐके राय, बिहारी महतो और शिबू सोरेन ने भी नया दिशा दिया। समय के साथ आंदोलन ने हर तरह के उतार-चढ़ाव देखा। अलग राज्य के नाम पर आदिवासी-मूलवासियों के संगठित ताकत का अहसास भारतीय जनता पार्टी एवं संघ परिवार था, कि अलग राज्य के नाम पर आदिवासी-मूलवासी संगठित हैं। यदि आदिवासी समाज के बीच अपना जगह बनाना है-तो अलग राज्य पुर्नगठन के सवाल को पार्टी अजेंडा बनाना होगा। 
विदित हो कि 1996-57 में बीजेपी ने झारखंड अलग राज्य के नाम पर एक 32 पेज की पुस्तिका प्रकाशित किया-वनांचल ही क्यों?। इस पुरे पुस्तिका का एक ही सार था-राज्य में इसाई समुदाय और अल्पसंख्याक समुदाय ने अपनी गहरी पैठ बनायी है, इस पैठ को कौसे उखाडा जाए और स्वंय उस जगह को अपने अजेंडा के साथ पाटा जाए। इस पुस्तिका में आदिवासी समाज को वनवासी के नाम से संबोधित किया गया। आदिवासी समुदाय को वनवासी संबोधन किया गया-इसको लेकर सामाजिक संगठनों सहित लोकतंत्रिक राजनीतिक पार्टियों ने भी विरोध किया। आदिवासी-मूलवासी समुदाय तथा तमाम जनसंगठनों ने सवाल उठाया कि-आदिवासी समुदाय को वनवासी करार कर, आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन के परंपरागत अधिकारों से अलग करने की बड़ी साशिज रची गयी है। साथ ही झारखंड के जंगल-जमीन-पानी और खनिज को पूंजिपतियों के हाथों बेचने की तैयारी है। इस विरोध और सर्मथन के बीच आदिवासी समुदाय ने स्पस्ट नारा दिया था-कि भाजपा द्वारा झारखंड को वनांचल का दर्जा देने का मतलब-झारखंड को व्योपारियों/व्यवसायिक / पूजिंपतियों का अखाडा बनाना है। इस तर्क के साथ आदिवासी-मूलवासी समुदाय ने वनांचल शब्द का कड़ा विरोध किया। विरोध के परिणामस्वरूप भाजपा ने एक कदम पीछे हटा और वनांचल शब्द को छोडकर झारखंड के नाम पर ही अलग राज्य को पुर्नगठन करने इस अजेंडा के साथ बीजेपी ने अलग राज्य पूर्नगठन का काम को आगे बढ़ाया। क्योंकि इस समय केंन्द्र की सत्ता पर भाजपा थी। सत्ता की राजनीतिक गणित का जोड़-घटाव के बाद भाजपा ने देखा कि यही मौका है आदिवासी बहुल, खानिज संपदा से परिपूर्ण धरती पर अपना साम्रज्य स्थापित करने का। इस मौका को हाथ से जाने नहीं दिया, और अजेंडा को अमलीजामा पहनाने में बीजेपी सफल रहा।, और देश में एक साथ तीन आदिवासी बहुल राज्यों को अलग राज्य का दर्जा दिया गया। 
इस बात को नहीं भूलना चाहिए भाजपा को कि-झारखंड अलग राज्य के पुर्नगठन की तारीख 15 नवंबर को इसलिए चुना गया कि-झारंखड आदिवासियों का इतिहास, अस्तित्व और पहचान से जुड़ा है। इसके आदिवासी समुदाय ने लंबी लड़ाई लड़ी है। बिरसा मुडा आदिवासी समाज का पहचान है-इतिहास का हिस्सा हैं। भाजपा आदिवासी समाज को जताने चाहा-कि झारखंड आदिवासी समाज के सम्मान में बन रहा है। इसी उद्वेश्य से 15 नवंबर 2000 को राज्य को जन्म दिया गया। 
लेकिन राज्य बनने के बाद राज्य ने 16 साल की उम्र देखी। इस 16वें साल में 12 साल तक तो राज्य में भाजपा के नेतृत्व में राज्य का शासन व्यवस्था चला। इन 16वें साल में पहली बार भाजपा पूर्ण बहुमत में आकर अकेले झारखंड का शासन व्यवस्था पर कब्जा जमा ली है। कोई रोकने वाला नहीं-आज बीजेपी अपने असली ऐजेंडा को राज्य में लागू कर रही है। इसी अजेंडा के तहत फरवरी 2016 में स्थानीयता नीति लागू किया गया, जो पूरी तरह आदिवासी, मूलवासी, किसान, सहित राज्य के मेहनतकश आज जनता के विरोध में स्थानीयता नीति का रूपरेखा खींचा गया और कानून का रूप दिया गया। जबकि मूल आदिवासी-मूलवासी झारखंडी समुदाय ने, अपने भाषा-संकृति, रिति-रिवाज, खान-पान, जीवनशैली एवं 1932 के खतियान का आधार बना कर, स्थानीयता नीति बनाने की मांग की थी। लेकिन राज्य सरकार ने इसको खारिज कर, जो 30 सालों से झारखंड में रह रहा हो-सभी झारखंडी हैं, इसी के आधार पर स्थानीयता नीति को पास किया। जो पूरी तरह से आदिवासी-मूलवासी विरोधी है। इसका विरोध हुआ, लेकिन बहुमत का नाजायज लाभ उठाते हुए, अपना अजेंडा को कानून रूप दिया। यहां से शुरू होता है-झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान, मेहनतकशों के संवैधानिक अधिकारों पर धारदार हमला। जनविरोधी स्थानीयता नीति के साथ ही सीएनटी-एसपीटी एक्ट जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज का सुराक्षा कवच है, को तोडना का प्रयास किया गया। 
जून 2016 के कैबिनेट में रघुवर सरकार ने सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश लाया, और संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति के पास हस्ता़क्षर के लिए भेज दिया। जब इस अध्यादेश का राज्य की जनता ने विरोध की, तब राष्ट्रपति भी उसे वापस का दिये। जबकि कैबिनेट के तीन-चार दिन बाद झारखंड विधानसभा सत्र शुरू होने वाला था, इसका भी रघुवर सरकार ने इंतजार नहीं किया कि, संशोधन पर विधान सभा में चर्चा के लिए रखा जाता। 
जब जुलाई में विधानसभा सत्र शुरू हुआ-विपक्षी पर्टी ने विधान सभा के भतीर तथा जनआंदोलनों, सामाजिक संगठनों ने मैदान में विरोध करना शुरू किये। परिणामस्वरूप विधान सभा सत्र स्थागित हो गया। 22 अगस्त को रांची के थेलोजिकल हाॅल में दो दिनों से हो रहे भारी बारिश के बावजूद 600 लोग एकत्र होकर संशोधन अध्यादेश पर चर्चा कर बाद एक स्वर में विरोध किया। इसके साथ ही पूरे राज्य में विरोध का स्वर गूंजने लगा। 23 अगस्त को विपक्षी पार्टियों ने संयुक्त घोषणा किया-कि किसी भी हाल में संशोधन अध्यादेश को पास करने नहीं देगें। 24 अगस्त को राज्य के 24 आदिवासी संगठनों ने राजभवन मार्च के साथ राजभवन के पास सभा के संशोधन के विरोध आवाज बुलंद किये। तथा 22 अक्टोबर को रांची के मोराबादी मैदान में विशाल रैली एवं सभा की घोषणा की। 
पूर्व तय कार्यक्रम के अनुसार 22 अक्टोबर को पूरे राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसान सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश के विरोध में मोराबादी में जमा होने के लिए गांवों से निकले। लेकिन रघुवर सरकार ने भारत के नागरिकों को भारतीय संविधान में प्रदत अभिव्यक्ति के अधिकार को हनन करते हुए गांव-गांव में पुलिस प्रशासन द्वारा बे्रेकेटिंग लगवा दिया गया, गांव के लोग रांची मोराबादी मैदान आ रहे थे, सबकी गाडी रोक दी गयी। यहां तक कि लोगों को पैदल भी नहीं आने दिया गया। रांची शहर को चारे ओर ब्रेकेटिंग से घेरा गया। ताकि जनता सभा तक न जा सके। इसी क्रम में खूंटी के सोयको में ग्रामीणों को रांची आने से रोका गया सोयको में। रैली में आने वालों तथा पुलिस प्रशासन के बीच विवाद बढ़ा, तक पुलिस ने फयरिंग की। इस फायरिंग में अब्रहम मुंडू मारा गया,  7 लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गये। जिनका इलाज रिम्स में हुआ। इस घटना में 10 लोगों पर नेमड एफआईआर किया गया, यहां तक कि मृतक अब्रहम मुडू सहित घायलों पर भी किया। 
केंन्द्र तथा राज्य की रघंुवर सरकार पूरी तरह आदिवासी-मूलवासी, किसानों के जल-जंगल-जमीन और खानिज को लूटने के लिए कई हथकंडे अपना ली है। याद दिलाना चाहती हुॅ कि 2014 में मोदी सरकार ने जिस जमीन अधिग्रहण अध्यादेश को लाया था-वह पूरी तरह से देश के किसानों को उखाड़ फेंकने की नीति थी। ताकि देश-विदेश के कारपोरेट घरानों को आसानी से जमीन हस्तांत्रित किया जा सके। इस अध्यादेश में 9 संशोधन तथा 2 उपनियम लाया गया था। रघुवर सरकार इसी संशोधन के आधार पर सीएनटी एक्ट के धारा-71(2) जिसमें आदिवासियों का जमीन यदि कोई गैर आदिवासी छल-बल से कब्जा किया है, और उस जमीन पर कोई निर्माण कार्य किया गया है-तो इस जमीन का मुआवजा देकर, उसे सेटेल करने का प्रावधान है-को समाप्त करने की बात कही गयी। इस तरह के केस को देखने के लिए हर जिला में जिला उपायुक्त को अधिकृत किया गया है-एसआरए कोर्ट (शिडूयल एरिया रेगुलेशन एक्ट) एैसे मामलों पर न्याय करे। लेकिन दुभग्य की बात है कि-इस तरह के जितने भी मामले आये हैं-सिर्फ 1-2 प्रतिशत में ही रैयतों-आदिवासी समाज को न्याय मिला है। 
विदित हो कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के मामले में सामाजिक संगठनों ने पहले भी आवाज उठाया कि-जो छेद है इस एक्ट में, जैसे मुआवजा देकर मामले को रफा-दफा किया जाता है, इसको बंद किया जाए। लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं किया। आज भी सरकार के कार्रवाई पर संदेह है। 
धारा-49 -इसमें पहले जनकल्याकारी कार्यों के लिए जमीन हस्तांत्रित करने का प्रावधान था। इसके तहत उद्योग और मांइस के लिए ही जमीन लेना था, लेकिन अब  इसमे संशोधन करके किसी तरह के काम के लिए जमीन लेने का प्रावधान कर दिया गया। याने यह कहा जाए-अब जमीन लेने के लिए पूरी तरह से बड़ा गेट को खोल दिया गया। धारा-21-में प्रावधान है कि-कृर्षि भूमि का नेचर-ननकृर्षि भूमि में बदला नहीं जा सकता है। लेकिन रघुवर सरकार ने इस कवच को तोड कर -कृर्षि भूमि का नेचर-ननकृर्षि भूमि में बदलने का कानून बनया। याने अब -कृर्षि भूमि में भी व्यवसायिक संस्थान खडा कर सकते है। यह सबसे खतरनाक साबित होने वाला है। एसपीटी एक्ट -का धारा 13 तथा सीएनटी एक्ट को धारा 21 दोनों एक है। इस कानून के पास होने के एक समय आएगा-झारखंड एक भी किसान नहीं बच पायेगें। 
विकास के मकडजाल में आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदाय फंसते जा रहा है। विकास का यह मकडजाल काॅरपोरेट घरानों, देश-विदेश के पूंजिपतियों के लिए जमीन की लूट के लिए केंन्द्र तथा राज्य के रघुवर सरकार द्वारा तैयार नीतियों का जाल है। जो आदिवासी-मूलवासी, किसान सामाज के उपर एक ष्ष्फेंका जालष्ष् की तरह  है। इस जाल के सहारे आदिवासी-मूलवासी, किसान एवं मेनतकश समुदाय को राज्यकीय व्यवस्था के सहारे काबू में ला कर इनके हाथ से जल-जंगल-जमीन एवं पर्यावरण को छीण कर काॅरपोरेट घरानों कों सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है। एक ओर भाजपानीत केंन्द्र एवं राज्य सरकार आदिवासी, किसानों के हक-अधिकारों के संगरक्षण की ढोल पीटती है, और दूसरी ओर इनके सुरक्षा कवच के रूप में भारतीय संविधान में प्रावधान अधिकारों को ध्वस्त करते हुए काॅरपोरेटी सम्राज्य स्थापित करने जा रही है। जिंदगी के तमाम पहलूओं-भोजन, पानी, स्वस्थ्य, शिक्षा, सहित हवा सभी को व्यवसायिक वस्तु के रूप में मुनाफा कमाने के लिए ग्लोबल पूंजि बाजार में सौदा करने के लिए डिस्पले-सजा कर के रख दिया है। 
देश जब अेग्रेज सम्रज्यवाद के गुलामी जंजीर से जकड़ा हुआ था -तब देश को अंग्रेज हुकूमत से आजाद करने के लिए झारखंड के आदिवासी -जनजाति व अनुसूचित जाति समुदाय ने शहादती संघर्ष कर स्वतत्रता संग्राम को मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। शहीद सिद्वू-कान्हू, ंिसदराय-बिंदराय, जतरा टाना  भगत, बीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हमारे गांव में हमारा राज-याने जल-जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत अधिकार बरकरार रखने, गांव-समाज को पर्यावरणीय मूल्यों के साथ विकसित करनेे, अपने क्षेत्र में में अपना प्रशासनिक व्यवस्था पुर्नस्थापित करने, कर अपना भाषा-संस्कृति के साथ संचालित-नियंत्रित एवं विकसित करने का सपना था। 
आजाद देश के राजनीतिज्ञों, बुधीजीवियों, एवं संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि-देश का विकास, शांति-व्यवस्था एक तरह के कानून से संभव नहीं हैं-इसीलिए देश में दो तरह के कानून बनाये गये। एक सामान्य कानून जो सामान्य क्षेत्र के लिए दूसरा विशेष कानून जो विशेष क्षेत्र के लिए बनाया गया। प्रकृतिकमूलक आदिवासी बहुल एरिया को विशेष क्षेत्र में रखा गया। इन क्षेत्रों पांचवी अनुसूचि तथा छठी अनुसूचि में बांटा गया। 
इसी अनुसूचि क्षेत्र में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना अधिनियम 1949, पेसा कानून 1996, वन अधिकार अधिनियम 2006 भी है। ये सभी कानून आदिवासी, मूलवासी, दलित, मच्छूवरा सहित 33 आदिम जनजाति समुदायों के अधिकारों रक्षा के लिए है। 
लेकिन- हर स्तर पर इन कानूनों को वयलेशन-हनन किया जा रहा है।
देश के विकास का इतिहास गवाह है-जबतक आदिवासी समाज अपना जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा रहता है-तबतक ही वह आदिवासी अस्तित्व के साथ जिंदा रह सकता है। आदिवासी सामाज को अपने धरोहर जल-जंगल-जमीन से जैसे ही अलग करेगें-पानी से मच्छली को बाहर निकालते ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देता है-आदिवासी सामाज भी इसी तरह अपनी धरोहर से अलग होते ही स्वतः दम तोड़ देता है। 
अपनी मिटटी के सुगंध तथा अपने झाड-जंगल के पुटुस, कोरेया, पलाश,  सराई, महुआ, आम मंजरी के खुशबू से सनी जीवनशैली के साथ विकास के रास्ते बढने के लिए संक्लपित परंपरागत आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज के उपर थोपी गयी विकास का मकडजाल स्थानीयता नीति 2016, सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन बिल 2017, महुआ नीति 2017, जनआंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया-क्षति पूर्ति कानून 2016, गो रक्षा कानून 2017, भूमि बैंक, डिजिटल झारखंड, लैंण्ड रिकार्ड आॅनलाइन करना, सिंगल विण्डोसिस्टम से आॅनलाइन जमीन हस्तांत्रण एवं म्यूटेशन जैसे नीति-कानूनों को लागू होना, निश्चित रूप से आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदायों के समझ के परे की व्यवस्था है। यह व्यवस्था राज्य के एक-एक इंच जमीन, एक-एक पेड-पौधों, एक-एक बूंद पानी को राज्य के ग्रामीण जनता के हाथ से छीनने का धारदार हथियार है। 
 गांव-आदिवासी गांव का मतलब -गांव सीमाना के भीतर एक-एक इंच जमीन, मिटी, गिटी, बालू, पत्थर, घांस-फूस, झाड- जंगल  मिलाकर  गांव बनता है-
इसी के आधार पर राज्य के आदिवासी बहुल गांवों का अपना परंपरिक मान्यता है। गांव घर को आबाद करने वाले आदिवासी समुदाय के पूर्वजों ने सामाजिक-पर्यावरणीय जीवनशैली के ताना बाना के आधार पर गांव बसाये हैं। 
सामाज के बुजूगों ने अपने गांव सीमा को खेती-किसानी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर व्यवस्थित किये हैं-क-घरो को एक तरफ बासाया गया-जहां हर जाति-धर्म समुदाय बास करता हैंै। ख-खेत-टांड एक तरफ गंाव सीमा भीतर के कुछ खेत-टांड को गैराही रखा, कुछ को परती रखे-ताकि गा्रमीण सामुदायिक उपयोग करे। जिसमें नदी-नाला, तालाब, कुंआ-आहर, सरना-मसना, खेल मैदान, खलिहान, अखड़ा बाजार, जतरा, मेला, चरागाह आदि के लिए। 
इसी के आधार पर राज्य में आदिवासी सामाज का जमीन को आबाद करने का अपना परंपरिक व्यास्था है यही नहीं इसका अपना विशिष्ट इतिहास भी है। आदिवासी परंपरागत व्यवस्था में जमीन को अपने तरह से परिभाषित किया गया है-रैयती जमीन, खूंटकटीदार मालिकाना, विलकिंगसन रूल क्षेत्र, गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, परती, जंगल-झाड़ी भूंमि। 
नोट-1932 में जो सर्वे सेटेलमेंट हुआ-इस रिकोर्ड के आधार पर जमीन को उपरोक्त वर्गों में बांटा गया। उस समय लोगों की आबादी कम थी। कम परिवार था। 84 साल पहले जमीन को चिन्हित किया गया था-कि ये परती है, जंगल-झाडी भूमिं है। 84 वर्ष में जो भी परती-झारती था, अब वो आबाद हो चूका है। अब उस जमीन पर बढ़ी आबादी खेती-बारी कर रही है। 
गैर मजरूआ आम भूंमि पर तो गांव के किसानों को पूरा अधिकार है ही, गैर मजरूआ खास जमीन पर भी ग्रामीणों का ही हक है। 
आज सरकार विकास के नाम पर लैंड बैंक---बना कर आदिवासी समुदाय के हाथ से उनका जमीन-जंगल छीन कर उद्योपतियों को देने का योजना बना रही हैं। केंन्द्र की मोदी सरकार तथा राज्य की रघुवर सरकार झारखंड से बाहर एवं देश के बाहर कई देशों में पूजिपतियों को झारखंड की धरती पर पूंजि निवेश के लिए आमंत्रित करने में व्यस्त हैं। 16-17 फरवरी 2017 को झारखंड की राजधानी रांची में ग्लोबल इनवेस्टर समिट को आयोजन कर 11 हजार देशी-विदेशी पूंजिपतियों को आमंत्रित किया गया था। इस दौरान 210 कंपनियों के साथ एमओयू किया गया। इस एमओयू में 121 उद्वोगों के लिए किया गया, जबकि कृर्षि के लिए सिर्फ एक एमओयू किया गया। इसके पहले 2000 से 2006 के बीच 104 बड़े बडे कंपनियों के साथ एमओयू किया गया हे। यदि सभी कंपनियों को अपने जरूरत के हिसाब से जमीन, जंगल, पानी, खनीज उपलब्ध किया जाए-तो आने वाले दस सालों के अंदर झारख्ंाड में एक इंज भी जमीन नहीं बचेगी, एक बूंद पानी नहीं बचेगा।  इसे सिर्फ आदिवासी मूलवासी, किसान ,मेहनतकश समुदाय केवल नहीं उजडेगें, परन्तु प्रकृति पर निर्भर सभी समुदाय स्वता ही उजड़ जाऐगें। जिनका कल का कोई भविष्य नहीं होगा। 
अपने इतिहास को याद करन का समय आया है। हमारा संघर्ष का इतिहास है-घुटना नहीं टेक सकते। जब आप के विरोधी ताकतें एक साथ खड़ा हैं-तब परिस्थिति की मांग है कि-राज्य और देश के आदिवासी-मूलवासी, किसान, मेहनतकश, शोषित-बंचित सबकों एक मंच में आना होगा, अपने इमानदारी संघर्ष  संगठित करके अपने धरोहर की सुरक्षा की गारंटी करनी होगीं 

Sunday, July 16, 2017

विकास का यह मकडजाल काॅरपोरेट घरानों, देश-विदेश के पूंजिपतियों के लिए जमीन की लूट के लिए केंन्द्र तथा राज्य के रघुवर सरकार द्वारा तैयार नीतियों का जाल है। जो आदिवासी-मूलवासी, किसान सामाज के उपर एक ष्ष्फेंका जाल की तरह

विकास के मकडजाल में आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदाय फंसते जा रहा है। विकास का यह मकडजाल काॅरपोरेट घरानों, देश-विदेश के पूंजिपतियों के लिए जमीन की लूट के लिए केंन्द्र तथा राज्य के रघुवर सरकार द्वारा तैयार नीतियों का जाल है। जो आदिवासी-मूलवासी, किसान सामाज के उपर एक ष्ष्फेंका जाल की तरह  है। इस जाल के सहारे आदिवासी-मूलवासी, किसान एवं मेनतकश समुदाय को राज्यकीय व्यवस्था के सहारे काबू में ला कर इनके हाथ से जल-जंगल-जमीन एवं पर्यावरण को छीण कर काॅरपोरेट घरानों कों सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है। एक ओर भाजपानीत केंन्द्र एवं राज्य सरकार आदिवासी, किसानों के हक-अधिकारों के संगरक्षण की ढोल पीटती है, और दूसरी ओर इनके सुरक्षा कवच के रूप में भारतीय संविधान में प्रावधान अधिकारों को ध्वस्त करते हुए काॅरपोरेटी सम्राज्य स्थापित करने जा रही है। जिंदगी के तमाम पहलूओं-भोजन, पानी, स्वस्थ्य, शिक्षा, सहित हवा सभी को व्यवसायिक वस्तु के रूप में मुनाफा कमाने के लिए ग्लोबल पूंजि बाजार में सौदा करने के लिए डिस्पले-सजा कर के रख दिया है। 
देश जब अेग्रेज सम्रज्यवाद के गुलामी जंजीर से जकड़ा हुआ था -तब देश को अंग्रेज हुकूमत से आजाद करने के लिए झारखंड के आदिवासी -जनजाति व अनुसूचित जाति समुदाय ने शहादती संघर्ष कर स्वतत्रता संग्राम को मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। शहीद सिद्वू-कान्हू, ंसिंदराय -बिंदराय, जतरा टाना  भगत, बीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हमारे गांव में हमारा राज-याने जल-जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत अधिकार बरकरार रखने, गांव-समाज को पर्यावरणीय मूल्यों के साथ विकसित करनेे, अपने क्षेत्र में में अपना प्रशासनिक व्यवस्था पुर्नस्थापित  कर अपना भाषा-संस्कृति के साथ संचालित-नियंत्रित एवं विकसित करने का सपना था। 
आजाद देश के राजनीतिज्ञों, बुधीजीवियों, एवं संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि-देश का विकास, शांति-व्यवस्था एक तरह के कानून से संभव नहीं हैं-इसीलिए देश में दो तरह के कानून बनाये गये। एक सामान्य कानून जो सामान्य क्षेत्र के लिए दूसरा विशेष कानून जो विशेष क्षेत्र के लिए बनाया गया। प्रकृतिकमूलक आदिवासी बहुल एरिया को विशेष क्षेत्र में रखा गया। इन क्षेत्रों पांचवी अनुसूचि तथा छठी अनुसूचि में बांटा गया। 
इसी अनुसूचि क्षेत्र में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना अधिनियम 1949, पेसा कानून 1996, वन अधिकार अधिनियम 2006 भी है। ये सभी कानून आदिवासी, मूलवासी, दलित, मच्छूवरा सहित 33 आदिम जनजाति समुदायों के अधिकारों रक्षा के लिए है। 
लेकिन- हर स्तर पर इन कानूनों को वयलेशन-हनन किया जा रहा है।
देश के विकास का इतिहास गवाह है-जबतक आदिवासी समाज अपना जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा रहता है-तबतक ही वह आदिवासी अस्तित्व के साथ जिंदा रह सकता है। आदिवासी सामाज को अपने धरोहर जल-जंगल-जमीन से जैसे ही अलग करेगें-पानी से मच्छली को बाहर निकालते ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देता है-आदिवासी सामाज भी इसी तरह अपनी धरोहर से अलग होते ही स्वतः दम तोड़ देता है। 
अपनी मिटटी के सुगंध तथा अपने झाड-जंगल के पुटुस, कोरेया, पलाश,  सराई, महुआ, आम मंजरी के खुशबू से सनी जीवनशैली के साथ विकास के रास्ते बढने के लिए संक्लपित परंपरागत आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज के उपर थोपी गयी विकास का मकडजाल स्थानीयता नीति 2016, सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन बिल 2017, महुआ नीति 2017, जनआंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया-क्षति पूर्ति कानून 2016, गो रक्षा कानून 2017, भूमि बैंक, डिजिटल झारखंड, लैंण्ड रिकार्ड आॅनलाइन करना, सिंगल विण्डोसिस्टम से आॅनलाइन जमीन हस्तांत्रण एवं म्यूटेशन जैसे नीति-कानूनों को लागू होना, निश्चित रूप से आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदायों के समझ के परे की व्यवस्था है। यह व्यवस्था राज्य के एक-एक इंच जमीन, एक-एक पेड-पौधों, एक-एक बूंद पानी को राज्य के ग्रामीण जनता के हाथ से छीनने का धारदार हथियार है। 
 गांव-आदिवासी गांव का मतलब -गांव सीमाना के भीतर एक-एक इंच जमीन, मिटी, गिटी, बालू, पत्थर, घांस-फूस, झाड- जंगल  मिलाकर  गांव बनता है-
इसी के आधार पर राज्य के आदिवासी बहुल गांवों का अपना परंपरिक मान्यता है। गांव घर को आबाद करने वाले आदिवासी समुदाय के पूर्वजों ने सामाजिक-पर्यावरणीय जीवनशैली के ताना बाना के आधार पर गांव बसाये हैं। 
सामाज के बुजूगों ने अपने गांव सीमा को खेती-किसानी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर व्यवस्थित किये हैं-क-घरो को एक तरफ बासाया गया-जहां हर जाति-धर्म समुदाय बास करता हैंै। ख-खेत-टांड एक तरफ गंाव सीमा भीतर के कुछ खेत-टांड को गैराही रखा, कुछ को परती रखे-ताकि गा्रमीण सामुदायिक उपयोग करे। जिसमें नदी-नाला, तालाब, कुंआ-आहर, सरना-मसना, खेल मैदान, खलिहान, अखड़ा बाजार, जतरा, मेला, चरागाह आदि के लिए। 
इसी के आधार पर राज्य में आदिवासी सामाज का जमीन को आबाद करने का अपना परंपरिक व्यास्था है यही नहीं इसका अपना विशिष्ट इतिहास भी है। आदिवासी परंपरागत व्यवस्था में जमीन को अपने तरह से परिभाषित किया गया है-रैयती जमीन, खूंटकटीदार मालिकाना, विलकिंगसन रूल क्षेत्र, गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, परती, जंगल-झाड़ी भूंमि। 
नोट-1932 में जो सर्वे सेटेलमेंट हुआ-इस रिकोर्ड के आधार पर जमीन को उपरोक्त वर्गों में बांटा गया। उस समय लोगों की आबादी कम थी। कम परिवार था। 84 साल पहले जमीन को चिन्हित किया गया था-कि ये परती है, जंगल-झाडी भूमिं है। 84 वर्ष में जो भी परती-झारती था, अब वो आबाद हो चूका है। अब उस जमीन पर बढ़ी आबादी खेती-बारी कर रही है। 
गैर मजरूआ आम भूंमि पर तो गांव के किसानों को पूरा अधिकार है ही, गैर मजरूआ खास जमीन पर भी ग्रामीणों का ही हक है। 
आज सरकार विकास के नाम पर लैंड बैंक---बना कर आदिवासी समुदाय के हाथ से उनका जमीन-जंगल छीन कर उद्योपतियों को देने का योजना बना रही हैं। केंन्द्र की मोदी सरकार तथा राज्य की रघुवर सरकार झारखंड से बाहर एवं देश के बाहर कई देशों में पूजिपतियों को झारखंड की धरती पर पूंजि निवेश के लिए आमंत्रित करने में व्यस्त हैं। 16-17 फरवरी 2017 को झारखंड की राजधानी रांची में ग्लोबल इनवेस्टर समिट को आयोजन कर 11 हजार देशी-विदेशी पूंजिपतियों को आमंत्रित किया गया था। इस दौरान 210 कंपनियों के साथ एमओयू किया गया। इस एमओयू में 121 उद्वोगों के लिए किया गया, जबकि कृर्षि के लिए सिर्फ एक एमओयू किया गया। इसके पहले 2000 से 2006 के बीच 104 बड़े बडे कंपनियों के साथ एमओयू किया गया हे। यदि सभी कंपनियों को अपने जरूरत के हिसाब से जमीन, जंगल, पानी, खनीज उपलब्ध किया जाए-तो आने वाले दस सालों के अंदर झारख्ंाड में एक इंज भी जमीन नहीं बचेगी, एक बूंद पानी नहीं बचेगा।  इसे सिर्फ आदिवासी मूलवासी, किसान ,मेहनतकश समुदाय केवल नहीं उजडेगें, परन्तु प्रकृति पर निर्भर सभी समुदाय स्वता ही उजड़ जाऐगें। जिनका कल का कोई भविष्य नहीं होगा। 

Friday, June 2, 2017

इस धरती को हम किसी भी कीमत में लूटने नहीं देंगे -- यही हमारा संकल्प है ---और हमारे शहीद नायकों को हमारी सच्ची श्रद्धांजि भी

 एक आम बगीचा ---यह सिर्फ बगीचा मात्र नहीं है , यह पर्यावरण का सबसे बड़ा आधार है , ग्रामीण आर्थिक आधार है , यह कई पीढ़ी का दिया उपहार है , जो पीढ़ी दर पीढ़ी फल -फूल , लकड़ी , शुद हवा , पानी , छाया देते आ रहा है , अभी यह आम बगीचा आने वाले और कई  जेनेठुकरा रशन को जीवन दान देगा , इस सचाई को कोई नहीं  ठुकरा सकता है , बशर्ते की लोभी मनुष्य इससे बर्बाद ना करे।
ग्रामीण अर्थ बयवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा है।  यही नहीं ग्रामीणों के भोजन से लेकर स्वास्थय लाभ का भी मूल आधार है।   ग्रामीण नगदी फसल भी है।  बिना मेहनत के ग्रामीणों को हर साल फल देता है।  पत्ता , छल , मंजरी कई बिमारियों का निदान हैं।
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हम ग्रामीणों का अंजीर , जो बिना पैसा खर्च किये हमें मुफ्त में मिलता हैं , यह तो हमारे पूर्वजों का आशिर्बाद है ,जिन्होंने हमारे  लिए पेड़ लगा गए हैं , जब फल पकता है तो दूर दूर के राहगीरों को भी अपनी मंद मंद खुशबु से अपनी ओर आमंत्रित करता है।  इनका  फल को तो सभी देखते हैं , तोड़ कर कहते हैं, लेकिन इनके फूल को सायद किसी ने नहीं देखा।  इसीलिए लोग कहते हैं -जो इनके फूल को खेत पता है , वह किस्मत वाला होता है , घर में फूल को रखने पेर घर में धन प्रवेश करता है,,,,,,
हमारे पूर्वजों ने जिस बिराशत को हमें दिए हैं, इससे हम आने वाले पीढ़ी को सुरछित  दें , यह हमारा  धर्म है

sen gi ---shushun -चलना ही नृत्य kaji gi -durang --बोलना ही गीत संगीत है ,



sen gi ---shushun -चलना ही नृत्य 
      kaji gi -durang --बोलना ही गीत संगीत है , 
यही हमारा  इतिहास है 

 EK PED JANGAL NAHI BAN SAKTA ----
EK PED PARYAWARAN  NAHI  HO  SAKTA  HAI
HAM EK DUSRE KE SATH MIL KAR PARYAWARAN BANTE HAIN
एक पेड़ जंगल नहीं बन सकता है --एक पेड़ पर्यावरण नहीं  हो सकता है -हम एक दूसरे के संग मिल कर पर्यावरण बनते हैं
                                           हम प्राकृति के साथ जीते हैं --प्रकृति ही धर्म है
 अच्छी बारिश , अच्छी फशल , सभी प्राणियों के जिंदगी की सुखमय जीवन की कमान के साथ प्रकृति की सेवा करते हैं
 जब तक प्रकृति के साथ आदिवासी समाज नाचते -गाते रहेगा , दुनिया की कोई ताकत उन्हें हरा नहीं सकता है

नन्हे पौधों को अपने नयनों से पलता है , अपने हाथों से सहलाता है ,,,,,झाड़ियां काट कर घेरा डाल उसकी रखवाली करता है---यही है पर्यावरणीय आदिवासी मूलवासी समाज।



video नन्हे पौधों को अपने नयनों से पलता  है , अपने हाथों से सहलाता है ,,,,,झाड़ियां काट कर घेरा डाल उसकी रखवाली  करता है---यही है पर्यावरणीय आदिवासी मूलवासी समाज।

नन्हे पौधों को अपने नयनों से पलता है , अपने हाथों से सहलाता है ,,,,,झाड़ियां काट कर घेरा डाल उसकी रखवाली करता है---यही है पर्यावरणीय आदिवासी मूलवासी समाज।

आदिवासी मूलवासी किसान समाज --  पर्यावरण के सचे संरछक , सच्चे दोस्त , आदिवासी समाज पर्यावरण से जितना लेता है --उससे दो गुना उससे देता है।  यही कारण है की शादियों से आदिवासी समाज जल जंगल जमीन के साथ रहते आ रहा है , अपने जरुरत के हिसाब से जंगल से लेता है, जरुरत से ज़्यदा वह बटोरता नहीं है, पेट से जरुरत भर फल तोड़ता है , बाकि जंगल के पशु -पक्छियों के लिए छोड़ देता है, जितना पेड़ काटता है --उससे दूना पेड़ लगता है।  नन्हे पौधों को अपने नयनों से पलता  है , अपने हाथों से सहलाता है ,,,,,झाड़ियां काट कर घेरा डाल उसकी रखवाली  करता है---यही है पर्यावरणीय आदिवासी मूलवासी समाज।  इतिहास गवाह है शादियों से आदिवासी वंही बस्ते आये हैं --जंहा जंगल है , नदी है , पहाड़ है , झरना है , झील है ,,,,आज के कथित बिकास के इस दौर में , भी जंगल , नदी , झरना , पहाड़ वंही पर अपने अस्तित्वा में हैं --जंहा आदिवासी ात मूलवासी किसान समाज है ,,,,आदिवासी मूलवासी समाज के सामाजिक मूल्यों , सांस्कृतिक मूल्यों से देश के तथाकथित सभ्य समाज को सिखने की  जरुरत है ---सामूहिक जीवन शैली क्या है ---सिखने की जरुरत है ----
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                                                          अपने गॉंव में प्रकृति की गोद में ----

                                           प्राकृतिक धरोहर ----वनोपज से सजी पर्यावरण
      अपने खेत -जमीन , जंगल से उपजाए धन -चावल , अपने साल के पेड़ के नए पत्तों  की थाली
शादी समारोह ---जंगल के साल पतियों से सजा मंडवा , संधियों के साथ दुःख -सुख बतियेते --बेटे -बेटी के नई जिंदगी की सुखद कामना करते --सागे समनधी -----

किसने कहा हम बिकास बिरोधी हैं ???

 किसने कहा हम बिकास बिरोधी हैं ???
हम चाहते हैं ---धरती का बिकास , पर्यावरण का बिकास
साष्ठेनेबल डब्लपमेंट , सबको शुद हवा मिले, शुद पानी मिले , शुद भोजन मिले, सबको आशियाना मिले ,,,,,,,हर खेत को पानी मिले , हर हाथ को काम मिले , हर भूखे को भोजन मिले , हर नगे को वस्त्र मिले , श्रीस्टी में जमीन पर रेंगने वाले चींटी , आकाश में उड़ने वाले पंछी , मिटी के भीतर जीने  वाले प्राणी सबको न्याय मिले , सबके जिंदगी का सम्मान किया जाय ,,,यही हमारा बिकास का मोडल है ,,,,,,
 जिस जंगल जमीन , नदी -नाला , झाड़
 टोंगरी , पहाड़ , पारबत ,झील , झरना खेत , बारी , को हमारे पूर्वजों ने अपने खून से सिंचा , अपनी शहादत देकर इस धरती की रक्क्षा की १८ ५६ में भोगनाडीह में २५ हजार संताली आदिवासियों ने अंग्रेज सैनिकों के बन्दुक की गोली सीने में खाया , लेकिन पीठ दिखा कर नहीं भागे।  १७ ०० दशक से अनवरत हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजो की गुलामी से देश को आजादी दिलाने के लिए शहादत दर शहादत दिए।  चेरो बिद्रोह , सरदारी लड़ाई ,कोल बिद्रोह , भूमिज बिद्रोह , से लेकर बिरसा मुंडा का उलगुलान किसके शहादत की बुनियाद पर खड़ी थी , सिर्फ और सिर्फ झारखण्ड के आदिवासी मूलवासी किसानों के बलिदान पैर,. आज हमारे पूर्वजों के खून से लत -पत, यह धरती पुकार रही है,,,,,देखो आजाद भारत के काले शासक ---साइनिंग  इंडिया , स्मार्ट भारत , स्मार्ट झारखण्ड , स्मार्ट सिटी , डिजिटल इंडिया ,  डिजिटल झारखण्ड के नाम पर झारखण्ड एक एक इंच जमीन ,जंगल नदी ,पहाड़ ,झील ,झरना ,चरहागाह ,खेल मैदान , आदिवासियों के परम्परागत धार्मिक -ाधेयात्मिक अस्थल सरना , शासन दिरी , हड़गड़ी , मसना , अडिंग ओड़ा , मरांग बुरु , हुड़िंग बुरू , सरना सके , सेन होरा , बाजार डांड , जतरा पीडी , सहित तमाम जमीन को भूमि बैंक बना कर देश -बिदेश के पूंजीपतियों , कॉर्पोरेट बाजार को ऑनलाइन हस्तंतरण कर रही है।  मोदी सरकार और झारखण्ड के रघुवर सरकार ने सी एन टी , एस पी टी एक्ट में संधोधन कर एक सप्ताह में जमीन देने का वादा किये हैं, तब हमारी जिम्मेदारी बनती है ,,,की अपने पूर्वजों की इस धरोहर को हम लूटने नहीं देंगे ,,,,हम हर साल ९ जून और ३० जून को अपने शहीदों के शहादत को याद  कर शहादत दिवश मानते हैं,,हम शहादत दिवस केवल मनाएंगे नहीं ---लेकिन शहीदों के मार्ग चलेंगे भी ---चाहे जितनी भी शहादत देना पड़े ----मित्रो क्या आप लाइन में खड़े हैं -----अपने को जाँच करने का यही मौका है -------ना  जान देंगे -----ना जमीन देंगे
लड़ेंगे ---जीतेंगे
आवाज दो ---हम एक हैं



Thursday, June 1, 2017

चिलचिलाती धूप , तपती धरती से जीना सीखे , घने जंगलों में एक एक बृक्छ अपना महल बना , खुला आकाश अपना सवर्ग बना

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इतिहास गवाह है --सांप भालू , बिच्छुओं , बाघ -सिंहों से लड़ कर हमारे पूर्वजों ने इस धरती को आबाद किया है। जंगल झाड़ साफ किये , गॉँव बसाये , खेत बनाये , नदी --झरनों के साथ जीना सीखे ,जंगली जानवरों को अपना मित्र बनाये।  कंद --मूल , फूल पत्ते , घांस फुश अपना भोजन बना , चिलचिलाती धूप , तपती धरती से जीना सीखे , घने जंगलों में एक एक बृक्छ अपना महल बना , खुला आकाश अपना सवर्ग बना , सर्दी ,गर्मी ,जाड़ा ,बसंद ,बरसात सभी ऋतुएँ हमें अपने कोख में हमेँ पाला , बादलों की गर्जन , आकाश में कौँधते बिजली , मूसलाधार बारिश ने बीरों की तरह लड़ना सिखाया।  यही हमारा इतिहास , हमारा बिरासत ,हमारा पहचान है , इसे हम मिटाने नहीं देंगे। .हमारा संकल्प है।,,,,,हर हाल में लड़ेंगे ,,,,,,हार हाल में जीतेंगे 

BINAS NAHI---- BIKASH CHAHIYE

 BINAS  NAHI---- BIKASH CHAHIYE

HAMARI DHARTI ...HAMARA PARYAWARAN.........YAHI HAMARI JINDAGI........



HAMARA  PRAKRITIK SANSHADHAN



HAMARI DHARTI ...HAMARA  PARYAWARAN.........YAHI  HAMARI  JINDAGI........

Rajpal, ko Mang Patr 8 may 2017





CNT ACT, SPT ACT SANSHODHAN KISI BHI KIMAT ME SUWIKAR NAHI,,,,

 CNT ACT, SPT ACT SANSHODHAN KISI BHI KIMAT ME SUWIKAR  NAHI,,,,
 CNT ACT, SPT ACT SANSHODHAN KE BIRODH  GAONW  GAONW ME  KALA JHANDA


CNT ACT< SPT ACT SANSHODHAN BILL WAPAS LO

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, ना जान देंगे ---ना जमीन देंगे ,,,,,,लड़ेंगे ----जीतेंगे ,,,

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BIKAS KE NAM PER HAMARE PURWAJON KA JAMEEN LOOTNA BAND KARO

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ना जान देंगे ---ना जमीन देंगे ,,,,,,लड़ेंगे ----जीतेंगे ,,,,

cnt act, spt act  एवं पाँचवी अनुसूचि के
 तहत गाँव के सीमा   भीतर  जो भी
 `संसाधन हैं,   एक एक इंच जमीन , गिटी , बालू ,  पत्थर , नदी , नाला ,  झाड़ , जंगल , पेड़ , पौधा , सभी गाँव   सामूहिक  संपति है , जिसका उपयोग पूरा गाँव  के साथ अगल बगल के गांव  के ग्रामीण "भी करते ,है ,
 गैर मजरुआ आम एवं  गैर मजरुआ खास जमीन , जंगल  झाड़ी  भूमि , टोंगरी  आदी अनाबाद जमीन का संरक्छक  सरकार है , इस जमीन का मालिक  सरकार  नहीं है ,  जब  सरकार मालिक नहीं ,  संरक्छक है ,,तब सरकार को जमीन बेचने का कोई अधिकार  नहीं है ,  लेकिन सरकार   ग्रामीणों के अधिकारों का वायलेशन ,,
 कर गाँव की सामुदायिक धरोहर ,,,जल जंगल जमीन , नदी , नाला ,  टोंगरी , झरना ,को ऑन लाइन कॉरपोरेट ,  पूँजीपतियों को  बेच रही है।  अगर इसे नहीं रोका गया तो -आने   वाले  पांच -   दस वर्षों में  झारखण्ड गाँव पूरी तरह गायब हो जायेंगे, गॉंव  की   सामाजिक ' आर्थिक , सांस्कृतिक , पर्यावर्णीय,  अस्तित्वा पूरी  मिट जायगी।  इसका  जगह लेगा  कॉरपोरेट की पूजी दवारा खड़ा  कंगकिरीट के   जंगल , कलकरखाना , खदान , मोल्ल ,  शहर,,,,,,
गांव वालों ने संकल्प लिया  है ,,,,,किसी भी कीमत  में हम अपने पूर्वजों का एक इंच जमीन लूटने नहीं देंगे ,,, ना जान देंगे ---ना जमीन देंगे ,,,,,,लड़ेंगे ----जीतेंगे ,,,,

Jal Jangal Jameen Hamara hai


Friday, May 19, 2017

जंगल जमीन के साथ जीने वाला समुदाय जनता है की हमारा बिकास का रास्ता कौन सा होगा



 ज़मीन  अधिग्रहण का जब हम लोग बिरोध करते हैं, तब सरकर और उनके लोग जमीन बचने वालों को बिकास बिरोधी  मानते हैं. जंगल जमीन के साथ जीने वाला समुदाय जनता है की हमारा बिकास का रास्ता कौन सा होगा, जमीन    देने के बाद हमारा क्या होगा, हमारा बिकास  बिनास होगा... इसलिए किसान अपनी जमीन नहीं छोड़ना चाहता है. प्रभात खबर ने किसानों के हित  में अपनी भूमिका निभाई है... प्रभात खबर को धन्यवाद। ...
5 फरवरी 2016 -प्रभात खबर
धनबाद-
62 लाख मुआवजा खा गये बिचैलिये---
गणेश मुरमू की 29.5 डिसमिल जमीन रिंग रोड में गयी। मिले सिर्फ 90 हजार रूपये-
जमीन अधिग्रहण के बदले सरकार जो मुआवजा देती है , वह रैयतों तक नहीं पहुंच पाता। विचैलिये खा जाते हैं। पूरा रैकेट है, अफसरों -दलालों की सांठगाठ ने गरीब आदिवासियों को सड़क परी ला दिया है। ऐसे तो यह पूरे राज्य में हो रहा है, लेकिन धनबाद में सबसे ज्यादा। धनबाद से सटा दुहाटांड गांव में सरकार ने रिंग रोड के लिए आदिवासियों की 269. 5 डिसमिल जमीन अधिग्रहणहीत की। कुल 4.46 करोड़ रूपये मुआवजा देना था, लेकिन इसका 10 फीसदी पैसा भी रैयतों को नहीं मिला। छोटे-छोटे दलाल-कर्मचारी तो पकड़े गये लेकिन असली सरगना अब तक पकड़ा नहीं गयां स्थिति यह है कि जिन्हें करोड़ मिलना चाहिए था, आज वह दाने-दाने के लिए तरस रहे हैं -
दुहाटांड के रहनेवाले गणेश मुरमू की 29.5 डिसमिल जमीन रिंग रोड के लिए अधिग्रहीत हुई। 63 लाख रूपये मुआवजा तय हुआ। मुआवजा राशि उसके नाम से बैंक के माध्यम से धनबाद के धनसार पैक्स में पहुंची। लेकिन बिचैलियों ने यहीं खेल कर दिया। मुआवजा की इस 63 लाख रूपये में उसके पटटीदारों को भी हिस्सा था। गणेश बताते ळें, विपिन राव नाम का आदमी बार-बार गांव आता था। एक दिन उसने कहा-कि तुम्हारी जमीन रिंग रोड़ में जा रही है। खाता खुलवाना होगा। सभी ने खुलवा लिया है। तुम भी खुलवा लो। हम पैसा दिलाने में मदद करेगें। वह बताते हैं कि एक दिन दो-तीन लोग आये औ मुझे धनसार लेकर चले गये। धनसार पैक्स में हमें चेक दिखाया और हस्ताक्षर करने को कहा। वह बताता है कि हम पैसा मांगते, तो कभी पांच हतार, कभी 10 हजार रूपये दिया जाता। 10-12 किस्तों में 90 हजार रूपये हमें दिया गयां ं। विपिन राव ने पैसे दिेये थे। गणेश बताते हैं, जब उसे मालूम चला कि उसके नाम से ज्यादा पैसे की निकासी हुई है, तो विचैलियों ने हाथ खड़ा कर लिया। कहने लगे कि जितना मिला था, उतना दे दिया। अब गणेश मुरमू लाचार है। इस बार धान की ख्ेती भी नहीं हुई है। धनबाद में मजदूरी कर पेट पाल रहा है। मुआवजा के पैसे में चाचा का भी हिस्सा था। चाचा सहदेव राम मुरमू बीमार है। पिछले कई महीनों से उनकी दवा भी नहीं चल रही हैं। पेट चलाये या बीमारी से लड़े, परिवार, समझ नहीं पा रहा है।
सहदेव का बेटा उमेश मुरमू मैट्रीक पास है। नौकरी की तलाश में भटक रहा है। सहदेव मुरमू की पत्नी अंजली का पूरा दिन पति की सेवा में गुजरता है। एक टूटे खाट में सहदेव बेसुध पड़े रहते हैं। करवट बदलने के लिए भी मदद की जरूरत है। पूरा शरीर लकवा ग्रस्त है। पहाड़ की तरह मुसीबत से जुझने के लिए इस परिवार की कर पहले ही बिचैलियों ने तोड़ दी है। अब जमीन भी नहीं बची है। थोड़ी बहुत खेती है, उससे परिवार का पेट चलना मुश्किल है।
गणेश मुरमू की जमीन व मुआवजा का फैक्ट शीट-
दुहाटांड मौजा-खाता सं0 108 व 89
प्लाट-896, 897, व 398
अधिग्रहीत जमीन का रकबा-21, 85
जोरा पोखर पैक्स में खाता सं0 200299 से एकांउट खुला।
खाता खुलवाने में पहचानकर्ता-विपिन राव, इसी ने गणेश मुरमु से संपर्क साधा था।
निकासी-गणेश मुरमू के पैक्स के खाते से राकेश कुमार के नाम नौ लाख, हयान महतो के नाम नौ लाख, राम सिन्हा के नाम 15 लाख और विपिन कुमार राव के नाम 30 लाख रूपये की निकासी हुई।
केस स्टडी -2
रसिक को मिलना था 27 लाख, मिले कुछ हजार मात्र-
रसिक मुरमू की 25 डिसमिल जमीन रिंग रोड़ में चली गयी। 27 लाख मुआवजा मिलना था। लेकिन मिला सिर्फ कुछ हजार। रिंग रोड में रसिक की जमीन जा रही है, उसे जानकारी भी नहीं थी। विपिन राव, आलोक बरिया रनाम के दो व्यक्ति उसके पास आये, उसे इन लोगों ने ही बताया की उसकी जमीन जा रही है इन लोगों ने कहा कि चिंता की बात नहीं है।, डीसी आॅफिस से खूब पैसा मिलेगा, हम तुम्हारा पैसा दिलाने में मदद करेगें। इन लोगों ने सादे कागज पर रसिक से अंगूठे का निशान व हस्ताक्षर कराया। जोरा पोखर पैक्स में रसिक का खाता भी इन लोगों ने ही खुलवाया। रसिक बताता है कि इन लोगों ने खुद को डीसी आॅफिस का आदमी बता कर चेक बुक पर भी हस्ताक्षर करया। ले लोग पैक्स ले गये। विपिन राव के घर ठहराया गया। 10 हजार रूपये दिये गये। रसिक को मालूम ही नहीं था कि उसके खाते में 27 लाख आये हैं। पैक्स से सारे पैसे बिचैलियों ने निकाल लिया। पैक्स से मिले कागजात के अनुसार आलोक बरियार, रोहित और काजल विश्वास के नाम से 27 लाख की निकासी की गयी है।
रसिक मुरमु मजदूरी कर अपने बच्चों का पेट पाल रहा है। वह बिचैलियों से जब कभी पैसा मांगने जाता, तो उसे दस-पांच हजार थमा दिया जाता। दुहाटांड में उसके पाके पास खेती की जमीन भी, उसके घर के बगल से निकलनेवाले रिंग रोड के लिए चिन्हित जमीन देख कर उसे इस बात का मलाल होता है कि पुरखों की उसकी जमीन भी चली गयी। लेकिन वह अपने परिवार के लिए कुछ भी नहीं पाया। टूटे-फूटे झार के एक कमरे में वह परिवार के साथ रहता है। मजदूरी मिलती है, तो चूही जलता है। पत्नी बसंती व परिवार के लोगों को भरोसा नहीं है कि पैसा मिलेगा।
रसिक मुरमू की जमीन और मुआवजा का फैक्ट शीट--
मौजा दुहाटांड-खाता सं0-32
प्लाट-700,709
 जमीन अधिग्रहण -20 डिसमिल 5 05 डिसमिल, जोरा पोखर पैक्स धनसार में खाता सं0-200300 से एकाउंट खुला।
खाता खुलवाने में पहचानकर्ता-विपिन राव
खाता खुलवाने और पहचानकर्ता की भूमिंका बिचैलियों ने ही निभायी। पैक्स के सादे चेक पर हस्तक्षार करा लिया।
पैक्स से निकासी करनेवाले-आलोक बरियार, रोहित व काजल विश्वास-तीनों नौ-नौ लाख निकाले।
 बिचैलियों के रैकेट ने कैसे किया खेल--
बिचैलियों के रैकेट ने तरीके से खेज किया। सबसे पहले भू-अर्जन कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी की मिलीभगत से बिचैलियों ने पता लगाया कि किस जगह की जमीन अधिग्रहीत होने वाली है। उसका पूरा रिकाॅर्ड हासिल किया। इसके बाद बिचैलिये गांव पहंुचे। विपिन राव नाम के बिचैलिये का पहले से उस गांव में आना जाना था। उसने ही सूचना दी कि गांव के किस-किस लोग की जमीन जा रही है। उसने गांववालों का भरोसा जीता। भरोसा दिलाया  िकवह उनको मुआवजा का पैसा दिला देगा। भाग दौड करने से गा्रमीण बच जायेंगे। इसके बाद विपिन राव कुछ लोंगों के साथ गांव पहुंचा। विपिन ने गांववालों को अंचल कार्यालय के दस्तावेज और सादे कागज पर हस्तक्षर करने को कहा-हालांकि गांव के कुछ लोगों ने उसका विरोध भी किया था, उसने किसी तरह उनको समझाया। जो हस्ताक्षर कर सकते थे। उनका हस्ताक्षर लिया। जिन्हें लिखना-पढ़ना नहीं आता, उपके अंगठे के निशान लिये, कुछ दिन बाद सभी बिचैलिये इनको जोरा पोखर के पैक्स ले गये। रैयतों की पूरा खातिरदारी की। होटल में खिलाना-पिलाना सबकुछ हुआ। पैक्स पहुंचने के बाद बिचोलियों ने इन आदिवासियों का खाता खुलवाया। दस्तावेज भी बताते है। कि ये लोंग खाता खुलवाने में पहचानकर्ता बने। खात खुलवाने के साथ ही इन लोगों ने रैयतों से सादे चेक पर हस्ताक्षर और जरूरत के हिसाब से अंगूठे के निशान लिये। इसके बाद पैसे की निकासी का खेल शुरू हुआ। प्रबंधन के हस्तक्षेप के बाद रैयतों के मुआवजा के चेक के पीछे इन बिचैलियों ने भी दस्तखत किये। कई बार इन बिचैलियों ने प्रबंधक को पटा भी लिया और बिना अपने हस्ताक्षर के केवल रैयतों के हस्ताक्षर वाले चेक जमा कर भी पैसे लिये। यही नहीं, चेक से पैसा अपने एकाउंट में भी टा्रंसफर कराया। अलग अलग चेक जमा कर किस्त में पैसे नकाले गये। रैयतों का चेक एकांउट पेइ था, इसलिए उनके हस्ताक्षर की जरूरत थी। सलिए बिचैलियोंने चेक के दोनों तरफ रैयतों के हस्ताक्षर या अंगूठा लगवा कर अपने पास रखे थ। पैक्स के लोग भी इस खेल में शामिल थे। उन्हें मालूम था कि ये सभी असली रैयत नहीं हैं, फिर भी भुगतान हुआ। एकाउंट ट्रांसफर पर भी रोक नहीं लगायी। इस तरह अंचल कार्यालय से लेकर पैक्स तक जाल बिछर की दलालो ने पूर पैसे हड़प  लिये।
बिचैलियों के साथ मिले थे अंचल कार्यालय के अधिकारी-कर्मचारी
ऐसे हुई अनदेखी-
अधिकारियों और कार्मयों की मिलीभगत का प्रमाण है कि रैयतों मुआवजा भूगतान के लिए भू-अर्जन अधिनियम की धारा 17-3 और न ही धारा 12-2 के तहत कोठ नोटिस नहीें दिया गया, इसकी सूचना रैयतों को बिचैलियों से मिली और अंचल कार्यालय में जाकर नोटिस लेने से लेकर सारी औपचारिकता हुई
भू-अर्जन अधिनियम के तहत आदिवाी और दलितों के मामले में मुआवजे का भुगतान शिविर लगा कर किया जाता है, इसमें जनप्रतिनिधि की उपस्थिति भी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
भुगतान की बीडियोग्राफी या फोटोग्राफी भी हो सकती थी, लेकिन नहीं हुआ।
बिचैलिये बहला-फुसलाकर आदिवासियों को खाता खुलवाने पैक्स ले गये। पैक्स में प्रबंधन ने किस आधार पर बिचैलियों को पहचानकर्ता बनाया
जांच के बाद इस बात का भी खुलासा हो गया है कि आदिवासियों को शराब के नशे में पैक्स लाया गया था तो फिर उन्हें प्रबंधक ने कैसे हस्ताक्षर और अंगुठे लिये। दरअसल यह काम बिचैलियों ने पहले ही कर लिया था
भू-अर्जन कार्यालय की ओर से यह सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया कि मुआवजा रैयतों को मिल रहा है या नहीं


6 फरवरी 2016 -प्रभात खबर

69 डिसमिल जमीन गयी, मिले सिर्फ डेढ लाख--
शराब पिला देवराज से हड़पा 1.48 करोड़-
धनबाद भूंमि मुआवजा घोटाला-2
धनबाद रिंग रोड के निर्माण के लिए अधिग्रहित की गयी जमीन का मुआवजा गरीब आदिवासियों से हड़पने के लिए विचैलियों ने तरह-तरह के हथकंडे अपनाये। पूरा दुहाटांड गांव ठगा गया। गांव से बिचोलिये चार करोड़ से अधिक हड़प चुके हैं गांव के पढ़-लिखे नौजवानों को बहलाने-फुसलाने के लिए शराब का भी सहारा लिया। आदिवासियों को डेढ़ करोड़ तक मुआवजा मिलना था। पर इनकी जमीन भी चली गयी और पैसा भी नहीं मिला। कई स्तरों पर मुआवजा वितरण में हुई अनियमितता की जांच की गयी, लेकिन उन गरीब परिवारों को न्याय नहीं मिला। ये परिवार आज अपनी बदहाली को कोस रहे हैं। दुहाटांड के आदिवासी अफसर और दलालों के दगा-फरेब में सबकुछ लुटा चुके हैं। ग्रामीण बेबसह हैं।
देवराज मुरमू दुहाटंड के चंद पढ़े लिखे नौजवानों में एक हैं। एक समय वह बेहतर पेंटर भी था। रिंग रोड निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण और इससे मिलनेवाला मुआवजा ही उसके लिए अभिशाप बन गया। रिंग रोड में देवरा की जमीन गयी। और बिचैलियों ने उसे शिकंजे में ले लिया। इंपीरत ेह 69 डिसमिल जमीन अधिग्रहित हुई थी। इसके लिए उसे दो किस्तों में 1.48 करोड़ रूपये मिलने थे। देवराज ने बताया‘ विपिन कुमार राव मेरे पास भी आया था। गांव के सब लोग कागज पर अंगूठा लगा कर दे रहे थे, विपिन ने कहा था कि पैसे जल्द मिल जायेंगे। इसलिए मैंने भी कागजात पर हस्ताक्षर कर दिये। देवराज ने बताया-विपिन राव और दूसरे लोगों ने जब भी पैसे मांगता, तो मुझे धनबाद ले जाया जाता, होटल में खिलाया-पिलाया जाता और जाते समय कभी 10 हजार तो कभी 15 हजार रूपये दे देते। बिचैलियों ने अब तक उसे करीब डेढ लाख रूपये दिये। इस बीच उसे शराब की लत लग गयी। अ बवह हमेशा शराब पीकर बेसुध रहता है। यह पूछने पर कि क्या उम्मीद है कि पैसे मिलेगें, वह मिल्मी डायलाॅग बोलता है, कगजता अरे अब क्या, अब तो डेट और डेट पर डेट..यहां लोग आये। पुलिसवाले आये, निगरानी के लोग आये, लेकिन हमें उम्मीद नहीं । जिसको पैसे लेकर भगना था, भाग गया। देवराज की बेबसी देख कर गांववाले भी हताश हैं। उसके जैसा पढ़ा-लिखा नौजवान बेकार हो गया। यह पूछने पर कि उसने तो इंटर तक की पढ़ाई की है, कहीं नौकरी क्यों नहीं करता, देवराज बताता है नौकरी कहां है, बताइये, हम मजदूरी कर लेते हैं, यही ठीक है। देवराज के घर वालों के सपने ीाी बिचैलियों के काले-कारनामों के भेंट चढ गये। अब परिवार के सामने संकटों से जूझने के अलावा कुछ नहीं बचा।
देवराज मुरमू की जमीन व मुआवजा का फैक्ट शीट-
मौजा-दुहाटांड ध्नसार-खाता सं-108,83, प्लाॅट-893,894,895,1010
मुआवजा-पहला किस्त-4320000
दूसरा किस्त- 10584000
जोरापोखर पैक्स धनसार में खाता सं-200298 से एकांउट खुला
दलालों के चक्कर में---
दुहाटांड की सुरूमणी एक मात्र ऐसी महिला है जो दलालों की चक्कर में नहीं फंसी। सुरूमणी के पास भी बिचैलिये पहुंचे थे, उसे भी सादे कागज में अंगूठा लगाने को कहा गया। सुरूमणी के पति बेंगलुरू में मजदूर करता है। सुरूमणी बताती है-अरूण चंद महतो नाम का एक व्यक्ति मेरे पास आया था। उसने जमीन के कागजात की जेरोक्स काॅपी मांगी। सुरूमणी ने कहा कि वह सादे कागज या चेक पर कैसे अंगूठा लगा सकती है। दलालों को लग गया कि यहां दाल नहीं गलनेवाली है। इसके बाद दलालों ने उसके पटटीदारों को फंसाया। सीताराम मरांडी औ सुकलाल मरांडी दो पटटीदार हैं। इसके बाद सीताराम मरांडी और सुकलाल मरांडी के नाम 65 डिसमिल जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करायी गयी। इसमे सुरूमणी की जमीन का भी हिस्सा था। दोनों ही लोगों का मुआवजा 1.19 करोड़ रूपया बना। सीताराम मरांडी और सुकलाल मरांडी के सारे चेक पर दलालों ने हस्ताक्षर कर पैक्स से पैसे उठा लिये। इसकी जानकारी सुरूमणी को मिली। वह भागी-भागी अंचल कार्यालय पह ुंची। उसे अंचल कार्यालय में बताया गया कि तुम्हारा पैसा उठा लिया गया है। सुरूमणी ने बताया कि उसने कभी चेक में हस्ताक्षर नहीं किया है, तो फिर पैसे कैसे उठा लिये गये। दरअसल बिचैलियों ने अंचल कार्यालय की सांठ-गांठ से अधिग्रहित जमीन की वशंावली सूची तैयार ही नहीं की थी। सुरूमणी कहती है कि पति को काम से बहुत कम पैसा मिलता है। हमें उम्मीद थी कि कुछ  पैसा मिलेगा तो घर बनाने के और बच्चों के पढ़ाई में खर्च करेगें।
सीताराम मरांडी और सुकलाल मरांडी की जमीन और मुआवजा का फैक्ट फाइल--
सीताराम मरांडी-खाता-127
प्लाॅट-667, 666
अधिग्रहित जमीन-385
मुआवजा मिला-तीन किस्त में-2376000, 3240000, 270000
जोरा पोखर पैक्स में खाता सं-20079 से एकाउंट खोला गया।
पहचानकार्ता बने-अनिल कुमार
पैक्स से सीताराम मरांडी के पैसे निकालने वालों का नाम-रोहित मिश्रा, मुकेश मिश्रा, सुनील कुमार, सौरभ कुमार, महेश राय, अशोक राय, गोपाल रजक, मोहन गुप्ता, राकेश गुप्ता, आलोक बरियार।
सुकलाल मरांडी -खाता सं-112, 70,
प्लाॅट-729,900
म्ुाआवजा दो किस्तों में -1296000,2376000
जोरा पोखर पैक्स में खाता सं-20016 से एकाउंट खुला
खाता खुलवाने वालेपहचानकर्ता-आलोक बरियार
पैक्स से सुकलाल मरांडभ् क्ै पैसे निकालने वालों का नाम-अनिल शर्मा, रवि दास, सुभाष मंडल, रविंद्र सिंह, आलोक बरियार, राजीव सिंह।
बिचैलिये व रकेट चलानेवाले पुलिस की पकड़ सह बाहर-धनबाद में दुहाटांड के गरीब आदिवासियों का चार करोड से ज्यादा मुआवजा हड़पने वाले बिचैलिये और रेके चलानेवाले माॅिफया पुलिस की पकड़ से बाहर है। आदिवासी रैयतों के मुआवजा घोटाले के मामले में जिला भू-अर्जन पदाधिकारी नारायाण विज्ञान प्रभाकर ने 18-4-15 को धनसार थाने में मामला दर्ज कराया। धारा 406,409,420,467,468,129 और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा तीन और चार के तहत मामला दर्ज कराया गया। इस मामले में अब तक महत 14 छोटे बिचैलियों की गिरफतारी हुई है। 47 लोग अब भी पुलिस पकड़ से बाहर हैं।




प्रकृति-पर्यावणीय आदिवासी-मूलवासी गांवों का अस्तित्व खो जाएगा-

रघुवर सरकार कहते हैं-
सीएनटी, एसपीटी एक्ट को खत्म नहीं किया गया है, कानून को सिर्फ सरलीकरण किया गया है।
सरल हो गया-क्या क्या सरल (सहज) हुआ--
धारा-49,
सीएनटी एक्ट की धारा-49 में पहले जमीन सिर्फ दो काम से अधिग्रहण किया जाना था-क-उद्योग के लिए, ख-खदान के लिए। लेकिन अब -संशोधन में सभी तरह के काम के लिए जमीन अधिग्रहण को मंजुरी दिया गया। संशोधन  के बाद अब सभी उद्वेस्यों या परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण करना आसान हो गया है।
धारा 21-सीएनटी एक्ट की धारा 21, और स्ंताल परगना काश्तकारी अधिनियम -1949 के धारा 13 में कृर्षि भूमिं का गैर कृर्षि भूमिं उपयोग में परिर्वति या बदलने की इज्जाजत नहीं देता था। याने खेती की जमीन को सिर्फ खेती के लिए ही उपयोग किया जाना था। लेकिन-संशोधन में अब कृर्षि भूमिं का चरित्र गैर कृर्षि भूमिं में बदलने की इज्जाजत दिया। अब कृर्षि भूमिं में आसानी से व्यवसायिक संस्थान, उद्योग के अलावा जमीन का किसी भी तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। स्ंाशोधन के पहले- कृर्षि भूमिं में व्यवसायिक भवन आदि के लिए नाक्सा पास नहीं होता था-अब सभी रूकावट को खत्म कर दिया गया। रघुवर सरकार ने कानून में सरलीकरण की बात करते हैं-या एक छलावा है, जबकि आदिवासी समाज के जमीन के अधिकार को पूरी तरह खत्म कर दिया।
सरकार का यह दलील देना कि इन संशोधनों के बाद जमीन का व्यवसायिक उद्वेय के लिए हस्तांत्रण के बाद भी जमीन पर रैयत का मलिकाना हक बना रहेगा -यह तर्क सिर्फ आदिवासी मूलवासी सामाज को दिगभ्रमित करता है। व्यवहारिकता यह कताई संभव नहीं है।



स्थानीयता नीति-
30 साल से रह रहे लोगों को झारखंडी होने का गैरव प्रदान किया गया, जब कि झारखंड के भूमिं पूत्रों, आदिवासी, मूलवासी, किसानों, मेंहनतकसों को अपने जल-जंगल-जमीन से उखाड़ फेंकने की कानून बनायी गयी।
नौकरी में तीसरे और चर्तुथ श्रेणी में अनुसूचित क्षेत्रों के युवकों को सिर्फ दस साल तक पूरी नौकरी देने की बात कही गयी है।
लेकिन-इसके बाद इन इलाकों के युवा वर्ग का क्या होगा। यहां नौकरियां इनको शायद नहीं मिल सकती है, क्योंकि जो स्थानीयता नीति के तहत आज राज्य के शहरी क्षेत्रों में जिस तरह से गैर कानूनी तरीके से बने कमानों को धडले से सरकार छपरबंधी रसीद काट कर उन्हें कानूनी मान्यता दे रही है, ये आबादी आने वाले दिनों में निच्शित रूप से स्थानीय आदिवासी-मूलवासी आबादी पर हावी होगी। ये बाहरी आवादी आदिवासी मूलवासी सहित यहां के तमाम 32 जनजाति आबादी को को निगल जाएगा।
रांची शहर में ढाइ लाख गैर कानून मकानों को कानूनी मान्यता दिया है। यदि इन मकानों या परिवारों में प्रति परिवार 5 सदस्य होगें तो, ...........................कुल आबादी हो जाएगी।
जबकि झारखंड 24 जिलों का है। इसमें हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर, कोडरमा, रामगढ, गिरिडीह औधोगिक जिले हैं। यह बाहर से आयी आबादी भी अधिक है। तब स्थनीयता नीति के तहत अब ये भी झारखंडी माने जाएगें और यहां स्थनीय समुदाय को जो सुख-सुविधा राज्य और केंन्द्र सरकार द्वारा मिलता है, इन्हें भी मिलेगा। हां नौकरियों में आरक्षण राज्य की नयी आबादी के आधार पर ही निर्धारण होगा।  तब यहां की कुल आबादी में अब आदिवासी-मूलवासियों की आबादी का ग्राफ सबसे नीचे चला जाएगा। एैसे स्थिति में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों की पहचान स्वत ही खत्म हो जाएगी।
आने वाले जनगणना में आदिवासी-मूलवासी आबादी की जनसंख्या 27 प्रतिशत से घट कर 10-15 प्रतिशत में आ जाएगी।


आदिवासी-मूलवासी सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा
गांव के सीमा के भीतर या बाहर के गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास जमीन को भूमिं बैंक द्वारा आॅनलाईन किसी को भी हस्तांत्रित करने से, अब गांव की डेमोग्राफी, जियोलाॅजी, जैविक विविधता, विविधता में एकता वाली सामाजिक ताना-बाना, परंपारिक सामाजिक व्यवस्था-पड़हा व्यवस्था, राजी पड़हा, मानकी-मुण्डा, डोकलो-सोहोर, मांझी-परगना व्यवस्था सभी समाप्त हो जाएगा।
इसलिए एैसा होगा-क्योंकि गांव के बीच में, गांव-टोली-महला के आस पास, या किसानों के ख्.ोत-टांड, के बीच, या अगल-बगल जो भी गैर मजरूआ आम, खास जमीन है, को सरकार किसी भी जाति-समुदाय, या भाषा-संस्कृति के लोगों को जमीन हस्तांत्रित करेगी। इस तरह से एक भाषा-भाषी या जाति समुदाय के बीच अब कोई भी बाहरी समुदाय को बैठा सकता है।
प्रकृति-पर्यावणीय आदिवासी-मूलवासी गांवों का अस्तित्व खो जाएगा-
भूमिं बैंक के लिए -गांव के बीच, खेत-टांड के बीच, गांवों सीमाओं के जिन गैर मजरूआ आम, खास जमीन को चिन्हित किया गया है-उन जमीनों के हस्तांत्रण के बाद उस इलाके में पहले की स्थानीय आबादी केवल नहीं रहेगी, लेकिन बाहर से आने वाली आबाद स्थानीय आबादी से ताकतवर होगी। ऐसे परिस्थिति में उस गांव का परंपारिक भाषा-संस्कृति, रहन-सहन के साथ गांव का नाम भी बदल जाएगा। जैसे कि विकास के नाम पर पूरे झारखंड के गांव गायब होते गये, गांवों का नाम अब नगरों, बिहार,(जैसे अशोक बिहार, कुसुम बिहार, प्रेम नगर, नयन नगर आदि)  में तब्दील होता जा रहा है।
जबकि परंपारिक आदिवासी गांवों का नाम पेड़, पैधों, जंगली जनवरों, नदी, नालों, झरनों, पशु-पक्षियों के नाम से रखा गया है। साथ ही हजारों गांवों का नाम गांव के प्रधान याने गांव बसाने वाले पहला बुजूर्ग के नाम पर नामकरण किया गया है।
बडीबिरिंगा, कनारोंवा, लोवागड़ा, अंबाकोना, डाउकोना, जमटोली, करीमाटी, सिमडेगा, मयोमडेगा, लतापानी, सराईपानी, हेसलाबेड़ा, महाबुआंग, किरीबुरू, बाघलता, सारूबेड़ा, मेघाहातुबुरू, कोयोंगसेरा, बगीसेरा, रंगामाटी, टुटवापानी, जोकिपोखर, सेरेंदआ, सरजोमदआ, कहुपानी, जिलिंगसेरेंग, बिलसेरेंग, महुंवाटांड, कादोपानी, चंपाबहा, जोजोहातु, बुरूहातु, मरंगबुरू, बहाबुरू, गरूडपीडी, हेसो, निमडीह, जोजोसेरेंग, सरजोमडीह, बकाकेरा, लउाकेरा, महूंवाटोली, बांसटोली, जनुमपीडी, बंडआजयपुर, नामकुम, सियारटोली, आदि आदि.....

आदिवासी राज्य में आदिवासी-मूलवासी किसानों की आवाज सुनने वाला कोई नहीं-यदि हम भारतीय संविधान की बात करें, तो भारतीय संविधान ने देश के हर व्यत्कि, समाज, संगठन को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता दी है। अपनी बात कहने के तरीके भी अलग अलग हो सकते हैं-या तो सभा आयोजित कर, या रैली करक, या तो धरना-प्रर्दण के माध्यम से। हम भारत देश के नागरिक हैं-और भारतीय संविधान ने हमें किसी भी विषय पर, सरकार निर्णय पर अपनी सहमति या असहमति प्रकट करने की अभिव्यत्कि का अधिकार दिया है। लेकिन-दुभग्य की बात है-कि झारखंड अलग हम किये हैं-का दावा करने वाली बीजेपी की सरकार आज राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसानों की किसी भी बात को सुनने को तैयार नहीं है। यदि आदिवासी -मूलवासी अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश कर रहे हैं-तब उन पर अंग्रजों के समय से भी ज्यादा कठोर करवाई की जा रही है। सरकार की गलत नीतियों पर सवाल उठाने वालों को छुठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है, जेल भेजा जा रहा है। आज आदिवासी समुदाय सवाल उठा रहें हैं-कि जिस बीजेपी ने अलग राज्य का पुनगर्ठन आदिवासी समाज के नायक वीर बिरसा मुंडा के जन्म दिन 15 नवंम्बर को किया था, बीजेपी भी स्वीकार किया था-कि यह आदिवासी राज्य है, और यह आदिवासियों के लिए बना है, इसीलिए बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर पूर्नगठित किया गया था। लेकिन आज आदिवासियों को अपने ही राज्य में अपने जल-जंगल-जमीन से उखाड फेंका जा रहा है। आदिवासियों को अपने ही राज्य में अभिव्यत्कि का अधिकार नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों के लोकतंत्र की हत्या- सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट में संशोधन के विरोध उठ खड़ा हुए जनआंदोलनों का सरकार ने दमन कियां। सर्वविदित है-22 अक्टोबर 2016 को सीएनटी, एसपीटी संशोधन के विरोध आयोजित रैली मोराहबादी में भाग लेने से लोगों को रोका गया। रांची शहर को चारों से बैरेकेटिंग लगा कर घेरा गया, ताकि लोग मोराहबदी मैदान न पहुंच सकें। गांव गांव पुलिस द्वारा बैरेकेटिंग लगवाया गया ताकि गांव से कोई रैली में ना जा सके। 23 नोवेम्बर 2016 को विधानसभा में 2 मिनट 57 सेकेंड में संशोधन बिल पास किया गया। विरोध में 25 नोंबेमर 2016 को विपक्षी पार्टियों एवं जनआंदोलनों ने झारखंड बंद बुलाया। बंद सफल रहा। 2 दिसंबर 2016 को भी झारखंड बंद बुलाया गया था-इस दिन आंदोलन के अगुवों के दरवाजा में पुलिस बैठा दिया गया-ताकि लोग बंद कराने न निकलें। सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन के विरोध चले आंदोलन में 22 अक्टोबर को सोयको में पुलिस की गोली से अब्रहम मुंडू शहीद हो गया। इसके साथ चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। पुलिस ने शहीद अब्रहम के साथ 10 लोगों पर नेमड एफआइआर तथा करीब 2 हजार पर अज्ञात एफआइआर किया। इसी घटना को लेकर 23 अक्टोबर को खूंटी नीचे चैक जाम किया था, इसमें 20 लोगों पर नेमड तथा 7 हाजार लोगों पर अज्ञात एफआइआर किया गया है।

आदिवासी राज्य में आदिवासी-मूलवासी किसानों की आवाज सुनने वाला कोई नहीं-यदि हम भारतीय संविधान की बात करें, तो भारतीय संविधान ने देश के हर व्यत्कि, समाज, संगठन को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता दी है। अपनी बात कहने के तरीके भी अलग अलग हो सकते हैं-या तो सभा आयोजित कर, या रैली करक, या तो धरना-प्रर्दण के माध्यम से। हम भारत देश के नागरिक हैं-और भारतीय संविधान ने हमें किसी भी विषय पर, सरकार निर्णय पर अपनी सहमति या असहमति प्रकट करने की अभिव्यत्कि का अधिकार दिया है।
लेकिन-दुभग्य की बात है-कि झारखंड अलग हम किये हैं-का दावा करने वाली बीजेपी की सरकार आज राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसानों की किसी भी बात को सुनने को तैयार नहीं है। आदिवासी राज्य में आदिवासी-मूलवासी किसानों की आवाज सुनने वाला कोई नहीं-यदि हम भारतीय संविधान की बात करें, तो भारतीय संविधान ने देश के हर व्यत्कि, समाज, संगठन को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता दी है। अपनी बात कहने के तरीके भी अलग अलग हो सकते हैं-या तो सभा आयोजित कर, या रैली करक, या तो धरना-प्रर्दण के माध्यम से। हम भारत देश के नागरिक हैं-और भारतीय संविधान ने हमें किसी भी विषय पर, सरकार निर्णय पर अपनी सहमति या असहमति प्रकट करने की अभिव्यत्कि का अधिकार दिया है।
लेकिन-दुभग्य की बात है-कि झारखंड अलग हम किये हैं-का दावा करने वाली बीजेपी की सरकार आज राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसानों की किसी भी बात को सुनने को तैयार नहीं है। यदि आदिवासी -मूलवासी अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश कर रहे हैं-तब उन पर अंग्रजों के समय से भी ज्यादा कठोर करवाई की जा रही है। सरकार की गलत नीतियों पर सवाल उठाने वालों को छुठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है, जेल भेजा जा रहा है।
आज आदिवासी समुदाय सवाल उठा रहें हैं-कि जिस बीजेपी ने अलग राज्य का पुनगर्ठन आदिवासी समाज के नायक वीर बिरसा मुंडा के जन्म दिन 15 नवंम्बर को किया था, बीजेपी भी स्वीकार किया था-कि यह आदिवासी राज्य है, और यह आदिवासियों के लिए बना है, इसीलिए बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर पूर्नगठित किया गया था। लेकिन आज आदिवासियों को अपने ही राज्य में अपने जल-जंगल-जमीन से उखाड फेंका जा रहा है। आदिवासियों को अपने ही राज्य में अभिव्यत्कि का अधिकार नहीं है।
भारतीय लोकतंत्र में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों के लोकतंत्र की हत्या- सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट में संशोधन के विरोध उठ खड़ा हुए जनआंदोलनों का सरकार ने दमन कियां।
सर्वविदित है-22 अक्टोबर 2016 को सीएनटी, एसपीटी संशोधन के विरोध आयोजित रैली मोराहबादी में भाग लेने से लोगों को रोका गया। रांची शहर को चारों से बैरेकेटिंग लगा कर घेरा गया, ताकि लोग मोराहबदी मैदान न पहुंच सकें।  गांव गांव पुलिस द्वारा बैरेकेटिंग लगवाया गया ताकि गांव से कोई रैली में ना जा सके।  23 नोवेम्बर 2016 को विधानसभा में 2 मिनट 57 सेकेंड में संशोधन बिल पास किया गया।
विरोध में 25 नोंबेमर 2016 को विपक्षी पार्टियों एवं जनआंदोलनों ने झारखंड बंद बुलाया। बंद सफल रहा। 2 दिसंबर 2016 को भी झारखंड बंद बुलाया गया था-इस दिन आंदोलन के अगुवों के दरवाजा में पुलिस बैठा दिया गया-ताकि लोग बंद कराने न निकलें।
सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन के विरोध चले आंदोलन में 22 अक्टोबर को सोयको में पुलिस की गोली से अब्रहम मुंडू शहीद हो गया। इसके साथ चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। पुलिस ने शहीद अब्रहम के साथ 10 लोगों पर नेमड एफआइआर तथा करीब 2 हजार पर अज्ञात एफआइआर किया। इसी घटना को लेकर 23 अक्टोबर को खूंटी नीचे चैक जाम किया था, इसमें 20 लोगों पर नेमड तथा 7 हाजार लोगों पर अज्ञात एफआइआर किया गया है।
 है। सरकार की गलत नीतियों पर सवाल उठाने वालों को छुठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है, जेल भेजा जा रहा है।
आज आदिवासी समुदाय सवाल उठा रहें हैं-कि जिस बीजेपी ने अलग राज्य का पुनगर्ठन आदिवासी समाज के नायक वीर बिरसा मुंडा के जन्म दिन 15 नवंम्बर को किया था, बीजेपी भी स्वीकार किया था-कि यह आदिवासी राज्य है, और यह आदिवासियों के लिए बना है, इसीलिए बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर पूर्नगठित किया गया था। लेकिन आज आदिवासियों को अपने ही राज्य में अपने जल-जंगल-जमीन से उखाड फेंका जा रहा है। आदिवासियों को अपने ही राज्य में अभिव्यत्कि का अधिकार नहीं है।
भारतीय लोकतंत्र में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों के लोकतंत्र की हत्या- सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट में संशोधन के विरोध उठ खड़ा हुए जनआंदोलनों का सरकार ने दमन कियां।
सर्वविदित है-22 अक्टोबर 2016 को सीएनटी, एसपीटी संशोधन के विरोध आयोजित रैली मोराहबादी में भाग लेने से लोगों को रोका गया। रांची शहर को चारों से बैरेकेटिंग लगा कर घेरा गया, ताकि लोग मोराहबदी मैदान न पहुंच सकें।  गांव गांव पुलिस द्वारा बैरेकेटिंग लगवाया गया ताकि गांव से कोई रैली में ना जा सके।  23 नोवेम्बर 2016 को विधानसभा में 2 मिनट 57 सेकेंड में संशोधन बिल पास किया गया।
विरोध में 25 नोंबेमर 2016 को विपक्षी पार्टियों एवं जनआंदोलनों ने झारखंड बंद बुलाया। बंद सफल रहा। 2 दिसंबर 2016 को भी झारखंड बंद बुलाया गया था-इस दिन आंदोलन के अगुवों के दरवाजा में पुलिस बैठा दिया गया-ताकि लोग बंद कराने न निकलें।
सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन के विरोध चले आंदोलन में 22 अक्टोबर को सोयको में पुलिस की गोली से अब्रहम मुंडू शहीद हो गया। इसके साथ चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। पुलिस ने शहीद अब्रहम के साथ 10 लोगों पर नेमड एफआइआर तथा करीब 2 हजार पर अज्ञात एफआइआर किया। इसी घटना को लेकर 23 अक्टोबर को खूंटी नीचे चैक जाम किया था, इसमें 20 लोगों पर नेमड तथा 7 हाजार लोगों पर अज्ञात एफआइआर किया गया है।

आज आदिवासियों को अपने ही राज्य में अपने जल-जंगल-जमीन से उखाड फेंका जा रहा है।

आदिवासी राज्य में आदिवासी-मूलवासी किसानों की आवाज सुनने वाला कोई नहीं-यदि हम भारतीय संविधान की बात करें, तो भारतीय संविधान ने देश के हर व्यत्कि, समाज, संगठन को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता दी है। अपनी बात कहने के तरीके भी अलग अलग हो सकते हैं-या तो सभा आयोजित कर, या रैली कर, या तो धरना-प्रर्दण के माध्यम से। हम भारत देश के नागरिक हैं-और भारतीय संविधान ने हमें किसी भी विषय पर, सरकार निर्णय पर अपनी सहमति या असहमति प्रकट करने की अभिव्यत्कि का अधिकार दिया है।
लेकिन-दुभग्य की बात है-कि झारखंड अलग हम किये हैं-का दावा करने वाली बीजेपी की सरकार आज राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसानों की किसी भी बात को सुनने को तैयार नहीं है। यदि आदिवासी -मूलवासी अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश कर रहे हैं-तब उन पर अंग्रजों के समय से भी ज्यादा कठोर करवाई की जा रही है। सरकार की गलत नीतियों पर सवाल उठाने वालों को छुठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है, जेल भेजा जा रहा है।
आज आदिवासी समुदाय सवाल उठा रहें हैं-कि जिस बीजेपी ने अलग राज्य का पुनगर्ठन आदिवासी समाज के नायक वीर बिरसा मुंडा के जन्म दिन 15 नवंम्बर को किया था, बीजेपी भी स्वीकार किया था-कि यह आदिवासी राज्य है, और यह आदिवासियों के लिए बना है, इसीलिए बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर पूर्नगठित किया गया था। लेकिन आज आदिवासियों को अपने ही राज्य में अपने जल-जंगल-जमीन से उखाड फेंका जा रहा है। आदिवासियों को अपने ही राज्य में अभिव्यत्कि का अधिकार नहीं है।
भारतीय लोकतंत्र में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों के लोकतंत्र की हत्या- सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट में संशोधन के विरोध उठ खड़ा हुए जनआंदोलनों का सरकार ने दमन कियां।
सर्वविदित है-22 अक्टोबर 2016 को सीएनटी, एसपीटी संशोधन के विरोध आयोजित रैली मोराहबादी में भाग लेने से लोगों को रोका गया। रांची शहर को चारों से बैरेकेटिंग लगा कर घेरा गया, ताकि लोग मोराहबदी मैदान न पहुंच सकें।  गांव गांव पुलिस द्वारा बैरेकेटिंग लगवाया गया ताकि गांव से कोई रैली में ना जा सके।  23 नोवेम्बर 2016 को विधानसभा में 2 मिनट 57 सेकेंड में संशोधन बिल पास किया गया।
विरोध में 25 नोंबेमर 2016 को विपक्षी पार्टियों एवं जनआंदोलनों ने झारखंड बंद बुलाया। बंद सफल रहा। 2 दिसंबर 2016 को भी झारखंड बंद बुलाया गया था-इस दिन आंदोलन के अगुवों के दरवाजा में पुलिस बैठा दिया गया-ताकि लोग बंद कराने न निकलें।
सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन के विरोध चले आंदोलन में 22 अक्टोबर को सोयको में पुलिस की गोली से अब्रहम मुंडू शहीद हो गया। इसके साथ चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। पुलिस ने शहीद अब्रहम के साथ 10 लोगों पर नेमड एफआइआर तथा करीब 2 हजार पर अज्ञात एफआइआर किया। इसी घटना को लेकर 23 अक्टोबर को खूंटी नीचे चैक जाम किया था, इसमें 20 लोगों पर नेमड तथा 7 हाजार लोगों पर अज्ञात एफआइआर किया गया है।

Saturday, April 29, 2017

बच्चा को बेतरायी एन टी और एस पी टी एक्ट में संशोधन के सम्बन्ध में लिखी किताब खरीने के पहले, किताब को पढ़ रही है.

कल २८ अप्रैल २०१७ को मेरे एक जुलुस के पोस्ट , जिसमे आदिवासी किसानों ने सी एन टी और एस पी टी एक्ट संशोधन बिल वापस लेने की मांग का नैरा दे रहे थे, को देख कर एक साजन ने कमेंट किया। .ये लोग जानते हैं ? सी एन टी और एस पी टी एक्ट क्या है ?लालच दे कर इन लोगों को नारा लगवा रहे हैं।  मित्रो ये तस्बीर ९ जनवरी २०१७ डोम्बारी बुरु में आयोजित साशीद जतरा  का है. जंहा ये आदिवासी महिला बच्चा को बेतरायी एन टी और एस पी टी एक्ट में संशोधन के सम्बन्ध में लिखी किताब खरीने के पहले, किताब को पढ़ रही है.
आप अपने को ही केवल पढ़ा लिखा समझदार मानते हैं,,,,तो सिर्फ यह आप का अहंकार है,,,,