Saturday, September 26, 2026

भाजपा की सरकार चाहे वो राज्य में रही हो या केंन्द्र मे ंहमेशा अमीरों की चिंता करते रही है। झारखंड में 2014 से 2019 तक बीजेपी की सरकार थी। मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास थे । तब राज्य की महिलाओं को जो 50 लाख कीमत तक का जमीन खरीदी, जमीन का रजिस्ट्री मात्र एक रूपया कर दिया।

 भाजपा की सरकार चाहे वो राज्य में रही हो या केंन्द्र मे ंहमेशा अमीरों की चिंता करते रही है। झारखंड में 2014 से 2019 तक बीजेपी की सरकार थी। मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास थे । तब राज्य की महिलाओं को जो 50 लाख कीमत तक का जमीन खरीदी, जमीन का रजिस्ट्री मात्र एक रूपया कर दिया। 

ं 50 लाख कीमत तक के जमीन रजिस्ट्री 1 रूपया मे किया गया-इसका लाभ किसको मिला?

झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास ने राज्य के सामृद्व महिलाओं को लाभ पहुुचाने के लिए भू-राजस्व एवं निबंधन विभाग के माध्यम से 50 लाख कीमत की जमीन खरीदने पर 1 रूप्या में जमीन की रजिस्ट्री करने की व्यवस्था लायी। 

इस व्यवस्था के बाद हर साल 70 महिलाएं इसका लाभ उठाते रहीं। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं एक रूप्या में जमीन, मकान, प्लैट का रजिस्ट्रेशन करायी। 2 लाख से अधिक रजिस्ट्री की गयी। इससे राज्य को 1296 करोड़ राजस्व का नुकासान भी उठाना पड़ा। 

कोरोना काल में वर्तमान हेमंत सरकार ने इस व्यवस्था फिर से वापस लिया। तर्क दिया गया कि इस व्यवस्था के तहत गरीब महिलाएं लाभ नहीं ले पा रही हैं साथ ही राज्य का राजस्व का भी नुकसान हो रहा है। इसी को देखते हुए राज्य की गठबंधन सरकार ने इस व्यवस्था को वापस लिया। 

5 सितंबर 2019 का तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने टवीट किया था-झारखंड देश का पहला राज्य है जहां महिलाओं के लिए 50 लाख रूपया तक की जमीन , मकान की रजिस्ट्री सिर्फ एक रूपये में होती है। अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा महिलाएं बन चुकी हैं मकान मालकिन। 

जानकारी के लिए-देश के बाकी राज्यों में भी महिलाओं को रजिस्ट्री में कुछ प्रतिशत की छूट मिलती है-उदाहरण के तौर में-दिल्ली में 4 प्रतिशत स्टाम्प डयूटी देनी पड़ती है। यूपी में महिलाओं द्वारा जमीन खरीदने पर सिर्फ एक (1) प्रतिशत ही स्टाम्प डयूटी में छूट दी गयी है। 

23 मार्च 2021 को राज्य सरकार ने महिलाओं को 1 रूप्या में जमीन रजिस्ट्री में छूट देने से राज्य सरकार को 400 करोड़ का नुकसान बताया। राज्य के पर्यटन, कला संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पिछली सरकार ने महिला के नाम से जमीन रजिस्ट्री कराने कर छूट दी थी, इससे राज्य को करीब 400 करोड़़ रूप्ये राजस्व का नुकसान हुआ था। वह रजिस्ट्री शुल्क भी देने में सक्षम होता है। यह सिर्फ जमीन लूटने की षडयंत्र के तहत किया गया था। 

जो भी नये-नये व्यवस्था जमीन संबंधित लाये गाये पिछली रघुवर दास की सरकार के द्वारा उसका समीक्षा होनी चाहिए कि आदिवासी, मूलवासी, दलित और मेहनत मजदूरी करने वाला परिवार को कितना लाभ मिला?। इसकी सूची सरकार को जारी करना चाहिए, तभी सामाजिक न्याय की बात हो सकती है। 

-23 मार्च का प्रभात खबर में विधायक सरयू ने बयान दिया था कहा था-कि राज्य में कई स्थानों पर सरकारी जमीन पर लोग वर्षों से रहते आ रहे हैं, उनकों सरकार से सुविधाएं भी मिल रही है। ऐसे जमीन को नियमित करना चाहिए। इनके अनुसार जमशेदपुर में कई इलाके ऐसे हैं नियमित करने का कोई नियम बना लेना चाहिए, इससे सरकार को बड़ी संख्या में राजस्व मिलेगा। 

2014 से 2019 के बीच राज्य की कल्याणकारी सरकार आखिर अमिरों को ही क्यों सस्ते दर में जमीन दी?

बाबा रामदेव को रघुवर सरकार ने 101 रूपये की टोकन मनी पर 15 एकड़ जमीन नमकोम प्रखंड के बरगांवा में दिया है। यह कहा गया कि यहां स्कूल खुलेगा, जहां गरीबों के बच्चे पढ़ेंगे। लेकिन सचाई को क्या है, यह जांचने की जरूरत है। 

Friday, September 25, 2026

झारखंड का मात्र 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रहा है। यह देश के लिए अच्छी नहीं हो सकती है लेकिन झारखंड के जनआंदोलनों की ताकत को दर्शाता है।

 23 सितंबर 2026 को प्रभात खबर में नीति आयोग की एक विशेष रिपोर्ट के बारे में छपा है जिसमें कहा गया है कि गैर-कोयला खनिज उत्पादन में झारखंड का मात्र 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रहा है। यह देश के लिए अच्छी नहीं हो सकती है लेकिन झारखंड के जनआंदोलनों की ताकत को दर्शाता है। 


यहां-नीति आयोग ने अपना विश्लेषण इस तरह दिया है-रिपोर्ट-धातु गैर-कोयला खनिज कारोबार का किया गया विश्लेषण-


नीति आयोग की सितंबर 2026 में प्रकाशित ट्रेड बाूच क्वार्टरली (अप्रैल से जून 2026) रिपोर्ट में भारत के धातु एव खनिज (गैर कोयला) अयस्क कारोबार का विश्लेषण कियागया है। रिपोर्ट में देश के कुल खनिज उत्पादन में झारखंड की हिस्सेदारी 3.6 प्रतिशत रही है। राज्य का प्रमुख योगदान बॉक्साइट, लौह अयस्क, तांबा, अयस्क और ग्रेफाइट के उत्पादन में दर्ज किया गया है। जबकि ओडिशा का सबसे अधिक योगदान 38.4 प्रकाशित है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का खनिज उत्पादन कुछ राज्यों में केंन्द्रित है। ओडिशा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और महाराष्ट्र मिलकर देश के कुल खनिज उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं। झारखंड का उल्लेख खनिज संपदा वाले राज्यों में किया गया है। 

खनन ़क्षेत्र में निवेश और उत्पादन बढ़ाने की चुनौती-रिपोर्ट में देश के खनन क्षेत्र के सामने र्प्यावरण और वन मंजुरी में देरी, भूमि अधिग्रहण की चुनौतियों तथा नीलाम किये गये खनिज ब्लॉकों को चालू करने में लगने वाले समय को संरचनात्मक बाधाओं के रूप में रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट में खनिज नीलामी प्रक्रिया को तर्कसंगत बनाने, खनन परियोजनाओं के संचालन में तेजी लाने और खनिज ब्लॉकों को निर्धारित समय सीमा में चालू करने जैसे उपाय बताये गये हैं। रिपोर्ट में खनिज उत्पादन बढ़ाने में आ रही बाधाओं का जिक्र किया गया है। जो झारखंड समेत अन्य राज्यों के लिए सुझाव दिये गये हैं। 

ये कारण बताये गये हैं-

1-पर्यावरण और वन मंजूरी में हो रहा है विलंब

2-भूमि अधिग्रहण की चुनौती

3-नीलाम खनिज ब्लॉकों को चालू करने में बिलंब

4‘-खनिज नीलामी प्रक्रिया में सुधार, तर्कसंगत बने संचालन में तेजी लावें

5-देश के खनिज कारोबार में बढ़ रही आयात निर्भरता। 


खनिजों के राष्ट्रीय उत्पादन में राज्यों का योगदान

राज्य देश में कुल खनिज उत्पादन में हिस्सेदारी खनिजों को योगदान-प्रतिशत में

ओडिशा---- 38.4 प्रतिशत क्रोमाइट-100, बॉक्साइट-72.5

                  लौह अयस्क-55.6

                  ग्रेफाइट-39.6

                   मैगनीज अयस्क-16.05

राजस्थान ---23.2 प्रतिशत सीसा-जस्ता-100

                 सेलेनाइट-100

                  गार्नेट-100

                  सिलिसियस अर्थ-100

छत्तीसगढ ---13.5 प्रतिशत टिन-100

                    लौह अयस्क-15.1

                   बॉक्साइट-4.3


कर्नाटक--- 10.1 प्रतिशत मैगनीज-16.1

                 लौह अयस्क-15.6

                  बॉक्साट-4.3

महाराष्ट्र--- 5.4 प्रतिशत कयनाइट-100

 ाि           लिमेनाइट-100

                फलोराइट-32.9

                मैंगनीज अयस्क-30.3

                  बॉक्साइट-4.6

झारखंड---- 3.6 प्रतिशत बॉक्साट-7.5

                         लौह अयस्क-6.6

                          तांबा अयस्क-3.2

                            ग्रेफाइट-0.4

मध्यप्रदेश --2.4 प्रतिशत तंबा अयस्क-76.6

                  मैगनीज अयस्क-26.1

                   फॉस्फोराइट-20.2

                     लौह अयस्क-2.3

आंध्र प्रदेश--- 1.0 प्रतिशत मैंगनीज अयस्क-11.3

                     लौह अयस्क-1.01

                     अन्य-2.4


इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड के आदिवासी -मूलवासी समुदाय अपने जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण के साथ अपने हक-अधिकारों की रक्षा के लिए अधिक सचेत और संर्घषशील हैं। इसका श्रेय झारखंड के सभी जनआंदोलन को जाता है।  

झारखड के तीन-चार जनआंदोलन हैं जो अपने जीत का संदेश विश्व तक पहुंचा दिये हैं। जनआंदोलनों के जीत का मूल मंत्र था आदिवासी-मूलवासी समुदाय की सामूहिक शक्ति जो जाति, धर्म और राजनीति से उपर उठकर खड़ी संगठित ताकत थी। इन जनआंदोलनो मे मूल रूप से कोइल-कारो जनसंगठन-गुमला, रांची-खूंटी। केंन्द्रीय जनसंघर्ष समिति-पलामू, गुमला। आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच-खूंटी, गुमला। भूमि रक्षा संघ-पूर्वी सिंहभूम, मानकी-मुण्डा संघ-पश्चिमी सिंहभूम,  भूमि सुरक्षा मच-संताल दिशुम, काठीकुड। इसके साथ ही गांव स्तर पर संताल परगना, कोल्हान, मुंण्डारी खूंटकटी क्षेत्र, ाहित पूरे राज्य में सक्रिय हैं। 

विकास के नाम पर राज्य में अब तक करोड़ो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय विस्तापित हो चुके हैं। 20 लाख जमीन विकास के नाम पर विभिन्न कंपनियों और परियोनाओं में जा चुकी है। इन विस्थापितों मे से 10-12 प्रतिशत ही किसी तरह से मुआवजा दिया गया है। बाकी विस्थापित आबादी रोजी रोटी के लिए दूसरे राज्यों में पलायन किया। कुछ राज्य में ही बेघर-बार होकर दर-दर में ठोंकरे खाने को मजबूर हैं। विकास और विस्थापन का सच को समझने के बाद आज झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान अपना विरासत की रक्षा जींदगी मूल लक्ष्य मानते हैं। 


Thursday, September 24, 2026

SIR आज की खबर


 

झारखंड में, SIR

जोहार 
SIR  आज के अखबार की रिपोर्ट

 

गांव में......

सभी Sathiyon ko Mera Jharkhandi Johar

इस पेड़ को आप लोग पहचाने है? अगर जानते है तो नाम बताइये 
गांव में ईमली 
के नीचे ही  बैठक होती है 




 

Wednesday, September 23, 2026

 Hamari Gramin arthvyavastha Jal Jungle Jameen per hi Tika Hua Hai Bachpan Se Hi Hamare bacche Hamare Arthik vyavastha ka hissa Ban Jaate Hain. jabki Bade amiron ke bacche acche Shiksha prapt karne ke liye school ke bad tution padhte Hain, aur Hamare bacche school se Laut Ke bajaron mein apna रोजी-रोटी ki vyavastha Karte Hain.






Tuesday, September 22, 2026

करम त्योहार को कई तरह से मना सकते हैं। मैंने करम त्योहार को अलग तरह से जीया हैं-इससे आप लोगों को साझा कर रही हुं।

 करम त्योहार को कई तरह से मना सकते हैं। मैंने करम त्योहार को अलग तरह से जीया हैं-इससे आप लोगों को साझा कर रही हुं। 

आदिवासी समाज आज कई तरह के सवालों के घेरे में स्वंय को खड़ा पा रहा है। हम कभी हम ही मना सकते हैं सरहूल तुम नहीं। तो कभी हम ही मना सकते हैं करम त्योहार तुम नहीं। हम असली आदिवासी-तुम नकली। यह मौसम करम त्योहार मनाने का है। हिन्दू धर्म की अस्था में सभी तरफ पुजा पंडालें सजने लगी है। भारत देश की संविधान सभी जाति-धर्म को अपना अस्था से किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता देता है। कमडारा अरहरा गांव आदिवासी भूईहरी ईलाका है। जो गुमला, पालकोट, बसिया, सिसई, सिसई से सटा क्षेत्र है। जो आदिवासी इतिहास में ढोंयसागढ क्षेत्र में था। यह ईलाका पालकोट राजा और जरिया राजा का प्रभाव क्षेत्र रहा है। जहां जमींदारों का बोल-बाला था। यही कारण है कि यहां सदरी भाषा /नागपुरी का जब्रजस्त प्रभाव रहा है।  मुंण्डा आदिवासी समाज कोई गांव राईज करम मनाते हैं, तो कोई गांव ढिढरा करम। करम के मौसम में गांव-गांव अखड़ा में करम की तैयारी में मांदर की आवाज से समूचा आदिवासी इलाका गुंज उठता था। दिनभर खेत में काम करने, गाय-बकरी चराने के बाद खाना खाने के बाद गांव के युवक मांदर लेकर अखडा पहुंचते थे। बस एक मांदर की आवास, देखते-देखते सभी टोला-महला से युवक मांदर के साथ अखडा में हाजिर। अब मांदर की गुंज सभी को अखडा में खिंच लाता।

याद है करम नाच के हर स्टेप के अपना गीत और लय होता है।  मांदर के हर थाप का अपना ताल, होता है। मांदर के हर थाप के साथ गीत के राग-लय अलग-अलग होता है। मांदर के ताल के साथ नाच रही महिलाओं के गीत लय में पूरा गांव सराबोर रहता है। सभी गीत व्यक्ति, समाज के साथ पूरी आदिवासी सामुदायिक जीवन शैली को संबोधन करता है। जो एक व्यक्ति को दूसरे जोड़ता है। गीत का हर शब्द -हर बोल और लय एक समाज को दूसरे से जोडता है। आदमी को पूरे प्रकृति और पर्यावरण से जोडता है। कोई उंच-नीच नहीं। सभी गीत अपने इतिहास, घटनाओं और प्रकृतिक जीवन मूल्यों को अभिव्यक्त करता है। जो आदिवासी समुदाय के जंगल-झाड़ी को साफ करने, गांव बसाने के साथ जंगल-जमीन पर अपना खूंटकटी हक का याद दिलाता है। 

करम गीतों में जीवंत आदिवासी जमीन शैली-

गुमला जिला के कमडारा प्रखंड के अरहरा गांव मुंडा आदिवासी बहुल गांव है। जो चटकपुर, करंजटोली, भादुल टोली, ठिकेदार टोली और बजार टोली और बड़का टोली इन 6 टोलों में फैला हुआ है। बडका टोली और करंज टोली के बीच से रांची-राउरकेला रेलवे लाईन गुजरती है। करम अखड़ा बडका टोली में है। मेरा जन्म बड़का टोली में हुआ। अरहरा गांव में पहले जमींनदारों का बोल-बाला था। उनके नाते-रिस्तेदारों में चीक-बडाईक परिवार को माना जाता था। इसी में चैकीदार और ओहदार भी होते थे। 

बाजार टोली में घांसी-बजनिया परिवार रहता था। यहीं एक लोहरा परिवार भी थां। दो-तीन परिवार झोरा -नाविक थे। बड़का टोली में एक परिवार हरियर का था। जिसके साथ गांव के सदान और मुंण्डा परिवार छुआछूत मानते थे। मुंण्डा आदिवासी समुदाय का करम अखड़ा से सटा हुआ उत्तर दिशा में हिरयर बुढा का घर था। अखडा से सटा पश्चिम दिशा में मोहन चीक बड़ाईक का घर था। अखडा से सटा -पश्चिम-दक्षिण कोणा में मेरा परिवार-बोयसा और जुरा बरला का घर। अखडा से सटा ठीक दक्षिण में लादूरा का घर। 

इन सभी परिवार का आंगन करम अखडा ही था। अखडा के किनारे एक हरियर बुढा के आंगन की सीमा पर बड़ा सा ईमली पेड़ अभी भी है। अखडा के पूरब-दक्षिण में डुगरू पाहन का घर सीमा पर दूसरा ब़डा ईमली पेड। दोनों पेड के नीचे एक-एक बड़ा पत्थर का बिछा बेंच था। जहां सभी आकर बैठते थे। करम के मौसम में पूरा अखडा बच्चे, युवक-युवातियो, महिला-पुरूष, बुढे-बुढियों से भरा होता। रात भर मांदर की गुज और गीत से पूरा गांव गुंज उठता था। 

मुझे याद है- मांदर बजाते आबा  गीत गाया करते थै-

1-बोने के बोने में 

झालि मिंजुरा...रे

 बोने के बोने में..2

झालि मिंजूरा रे 

बोने में झालिया मिंजूर रे 

सोभाय रे...

बोने में झालिया मिंजुर सोभाय....2

(जंगल-जंगल में मोरपंख फैलाया मोर पंक्षी

ज्ंागल मोर पक्षी से ही सोभायमान है )


मां हमेशा गुनगुनाती थी-करम गीत। निश्चित रूप आज मैं महसूस करती हुं मां मेरे लिए ही गाती थी। गांव के सीमा पर कारो नदी जब बरसात में भर जाता था-नदी पार करने के लिए झोरा -नाविक अपने नाव पर लोगों को पार करते थे। 

1-एके गोटन बेटी

कोईल पारे दियालों

गुनी...गुनी......

को0 -गुनी...गुनी निंदों नहीं आवाय...

हायरे दाईया.....गुनी गुनी निदों नहीं आवाय..

2-हारे पार काइर देरे रे 

झोरा रे भाईया ... गुनी...गुनी

गुनी  2

गुनी-बुझी निंदो नहीं आवै


2-हारे पार काईर देरे 

झोरा रे भाईया

डाली टाका -डाली टाका 

फिराईयो देबुं हारे दाईया...2

(सार है-एक ही मेरी प्यारी बेटी है। उसको कोईल नदी के उस पार शादी दिये हैं। बरसात में नदी भर गया है। बेटी का याद दिन-रात सता रहा है। हे नाविक भाई आप नदी पार कर दीजिए, आप को पार करने का कीमत चुका देगें)


करम मौसम मे दोपर को गाय-बकरी  चराने वाले और खेत में काम करने वाले युवक खाने के लिए घर लाने के बाद युवक मांदर बजा कर अपनी थकान मिटाते, मनोरंजन करते थे। मांदर की आवाज सुन सभी जान जाते थे कि फलाना आ गया है। ंहमेशा गीत सुनती थी-

1-मांदर जे किनाले लालू भैया रे...

 जानी किनाले के लगी...रे 

जानी किनाले के लागी...

2-से मांदर फंुटी गेलैंय लालू भाईया रे

जानी मोराले के लागी...रे 

जानी मोराले के लागी

गांव का जमीन साहुकारों द्वारा छीन लेने के बाद बाबा लापा गांव में धांगर-नौकर हो गया। मां और मझिला भाई रांची चले आये। मां पंजाबी परिवार में दाई का काम करने लगी। भाई रांची में कुली का काम करने लगा। मैं भी 8वी पास कर रांची आ गयी। संत मारग्र्रेट हाई स्कूल में नाम लिखायी। 10वी क्लास मेे छात्रवृति मिला था। बिजय दादा गांव में अकेले था। छात्रवृति के पैसा से मैंने दादा के लिए गुमला मांदर खरीद दी थी। वह उसे बजाया करता था। जब भी मैं गांव आती थी तो मांदर को खुद भी बजाती और बादा को भी बजवाती थी। 

सभी गांवों में अखडा ईमली पेड के पास ही होता था। अरहरा में अखडा के किनारे दो बडा-बडा ईमली का पुराना पेडं अभी भी है। करम मौसम में अकसर ही बारिश होता है । बारिश भी रिझवारों को रोक नहीं पाता है। मांदर की गुंज के साथ गीत .लोग झूमने लगते

1-..रिमिझिमि  तेतारी छाईयां....

ना हारे धिरे चालू ...

रासे चलो मदोना....ना हारे धिरे चालु

रासे चलु....

सार - रिमझिम बारिश हो रहा है...ईमली गाछ के नीचे अखडा में अस्तिे-झुमते हम नाचें।

 बहन-भाई का अटुट प्यार करम गीत में-

गोडे का झोटिया

गिर पार...लक 

दादा हेरालों-2

हाय-हाय खोईज लाइन दे दादा

बिझ-लाइन दे दादा हेरालों-2

सार-मेरा पैर का छुटिया-बिझिया कहीं गिर गया है, खो गया है। दादा-बडा भाई आप खोज कर ला दीजिए, मेरा बिझिया कहीं गिर गया हे। 

गांव के धान के खेतों में पहले खखडा और मच्छली बहुत होते थे। बारिश अच्छी होती थी। खेतों और नाला -डोफा में साफ पानी बहते रहता था। पानी में छोटी मच्छलियां झांड में इधर-उधर तैरते खेलते रहती थी। इससे करम गीत में गाते हैं--

1-बुदु रे बुदु मझाइर

बुदु मछाइर समधिन 

जेराय रे

बुदु मछाईर समधिन जोराय

--

ब्रसात दिनों में गांव में बहुत तरह का साग-पात स्वतः खेतों में उग आता है। कुछ गोडा-मडुआ खेत में लगाया जाता है-जो गांव के लोगों के लिए पौष्टिक आहार है-इसे भी करम गीत में गाते हैं-

साग तियन लुटुर पुटुर

बरी तियन छोरे छोरे रे

बरी तियन छोरे छोर

--

आदिवासी गांव जंगल-पहाडो की तराई में बसा हुआ है। इस प्रकृतिकमूलक जीवनशैली का अंग साथ रचंे-बसे सभी समुदाय हैं। जिनका रिस्ता करम गीत में भी गाते हैं-

1-कोईलो किनारे बसाले हो राजा

कोईलों किनारे बसाले हो राजा

कोईलो निरामाला सोभाए रे

कोईलो निरामाला सोभाए-2

2-काठ केरा डोंगा

बंांस केरा डांग रे-2

झोरा भाईया रिझे 

डोंगा चलाऐ रे झोरा भाईया

रिझे डोगा चलाए-2


जब मेरी मां रांची शहर आ कर रोटी के लिए पंजाबी परिवार में आया का काम करती थी। उनके मलकिन ने एक पुराना लाइलुन साडी दी थी मां को। जो एक-दो जगह थोडा फटा हुआ था।  मैं पहली बार करम के दिन उसी साडी को पहन कर अखडा में अपने साथियों के साथ करम नाची थी। साडी बार बार फिसल रहा था और पैर फंस जा रहा था। मन में खुशी था कि मैं भी साडी पहनी हुं। 

रात भर करम नाचने के बाद सुबह गांव की सभी महिलाएं अपने अपने घर से कांसा लोटा में पानी, साल का ताजा दतुवन, साल पत्ता पर मोड कर भांप में पकाया धान की रोटी, साल पाता में सिंदुर और धवन लेकर अखडा मे ंआयी। मां रांची में थी। मा के बदले मुझे ही करम राजा के लिए उपरोक्त सारा चीज लायी। महिलाएं जैसे जैसे कर रही थी मैं सेवा की। 


ग्लाॅशोप मेमोरियल उच्च विद्यालय कमडारा से आठवीं क्लास पास करने के बाद मैं रांची आ गयी। कारण की घर में बहुत दिक्कत था। मां ने मेरा एकमिशन नौंवीं क्लास में संत माग्रटेस बालिका विद्यालय में करा दी। आॅक्टोबर का महिना था।  स्कूल में नमाही परीक्षा चल रहा था। जिस दिन मेरा परीक्षा खत्म हुआ, उसी दिन मेरा गांव अरहरा में करम त्योहार था। 

4 बजे स्कूल से निकलने के बाद मैं सुशील दादा से जिद करने लगी-चलो गांव करम के लिए। मेरे जिद के सामने दादा मजबूर थे। हम दोनों गांव जाने के लिए खजूर तालाब के पास आए। पता चला सिमडेगा की ओर जाने वाली अभी कोई गाडी नहीं है। फिर भी मैं जिद कर रही थी -जाएगें ही। रांची से राउरकेला रेलवे लाईन से पासिंजर ट्रेन और मालगाडी आती-जाती है। हम लोग राउरकेला पेसेंजर गाडी से हमेशा बकसपुर स्टेशन पर चढ़ कर हदिया आते थे। हटिया से रांची बस से  आते थे। मैं कभी बस रोड़ से यात्रा नहीं की थी। यह भी पता नहीं था कि कितना -कितना बजे बस गाडी तोरपा की ओर जाती है। 

थोडी देर में एक टेकर आयी ।हम दोनों गाडी पर चढ कर खूंटी पहूंचे। हम दोनों शायद नीचे चैक में उतरे। वहां से आगे जाने के लिए कोई गाडी नहीं था। हम दोनों पैदल थोडा दूर गये ।अंधकार हो चुका था। खूंटी की ओर से गाडी आने की रोशनी दिखाई दी। हम दोनों रूक कर इंतजार करने लगे। गाडी सामने पहूंची। वह बडां बंद गाडी था। लिखा था-डेंजर। हाथ दिये-गाडी रूकी।

 हम दोनों को पूछा कहां जाओगे। बताये पोकला जाएंगें। बोला आओ कहते गाडी का दरवाजा खोल दिया। गाडी पर चढे सामने डाईभर के पास। गाडी में दो पुरूष थे, एक गाडी चला रहा था और एक उसके पीछे लंबा सीट पर बैठा थां। पीछे बैठा था वह कम उम्र का था।

गाडी अहिस्ते अहिस्ते चल रहा था। करीब आधी रात को पकना पहुंचे होगें। गाडी रूक गयी। वो लोग बोले हम लोग खाना खा लेगें। दोनो उत्तर गये ।हम दोनों गाडी में बैठे रहे। करीब एक-डेढ घंण्टा के बाद एक आदमी आया और बोला आप दोनों को खाने के लिए बुला रहे हैं। हम दोनों नहीं गये। थोडी देर बाद दो प्लेट में रोटी और मीट एक लडका लेकर आया। हम दोनों तय कर लिए थे कि कुछ नहीं खाना है। 

प्लेट हम दोनों नहीं लिए। थोडी देर बाद दोनों वापस आये। गाडी चलना शुरू हो गया। दस-बादह मिनट के बाद गाडी चला रहा व्यक्ति उसका साथी को बोला, लो अब तुम गाडी चलाओ। पीछे बैठा लडका आगे गया और चलाने लगा। पहले जो चला रहा था वह पीछे आ कर बैठ गया। अब मेरे बगल आकर बैठ गया। हम दोनों को अभास हो गया था। दादा किनारे दरवाजा के पास बैठा था मैं बगल में थी। 

हम दोनों उन लोगों का मानसिकता को समझ गये। दादा बोला मुंण्डारी -अपना भाषा में। तुम इधर घसको दरवाजा के तरफ, मैं उधर घसक गयी। दादा मेरे तरफ आ गया। वा आदमी दादा से बोलने लगा-तुम अपनी बहन के मेरे हवाले कर दो, नही ंतो ठीक नहीं होगा। मेरे के नीचे दो-तीन लोहा का तलवार की तरह हथियार था दिखाते हुए बोलने लगा जब जरूरत होता है तो इसका इस्तमाल करते हैं। 

पीछे बैठा आदमी बोला-गाडी रोको, गाडी आगे नहीं जाएगी। गाडी रूक गया। दादो एक हाथ से गाडी का दरवाजा खोल कर मुझको गाडी से नीचे ढकेल दिया। मैं नीचे उतरते ही आगे की ओर भागने लगी। मेरे पीछे दादो भाग रहा था। पूरा अंधकार था। रास्ता भी अनजान था। हम दोनों थोडी दूर भागे ही थे कि गाडी स्र्टाट कर लाईट मारते हम दोनों के पीछे आने लगा। हम दोनों को पकड लेगा यह दिमाग में आते ही दादा बोला-चलो धान खेत में घुसो।

रोड के दहिनी ओर धान का खेत था। रोड से ही धान खेत में कुद गये। खेत रोड के किनारे ही था लेकिन बहुत नीचे था। जैसे ही धान खेत में मैं छलांग लगायी, मेरा सिर नीचे ओर पैर उपर मेंड के सहारे खडा हो गया। गाडी करीब आ रहा था। मन में डर था मेरा पैर को देख लेगा। मैं धान का पौधा का मजबूती के साथ पकडी और नीचे कादो माटी में पैर जमा कर पानी खेत में खडी हो गयी। मेरा पैर का चप्पल पैर से अलग हो चुका था धान खेत में। 

धान के पौधा मेरे सिर से उंचा था। खेत के नाला से बहता पानी का आवाज आ रहा था। धान खेत के अंदर अंदर बढते हुए खेत के दूसरी छोर मेंड पर पहुंचे। दादा ने अहिस्ता से आवाज दिया-किधर हो रे। मैं जवाब दी-इधर हुं। रोड से दो -तीन खेत आगे निकलने के बाद हम दोनों मिले। मेंड के सहारे कई खेतों को पार कर टांड में पहुंचे जो रोड से आधा कोस दूर होगा। टांड में पहंुंचते ही पूरब दिशा में चांद पूरी रोशनी के साथ आकाश में दिखाई दिया। चांद की रोशनी मे ंहम दोनों रोड़ से दूर अनुमान से पोकला गांव की ओर बढ़े। 

हम दोनों एक छोटा नाला के पास पहुंचे। नाला में पानी बह रहा था। नाला के उस पार उंचा ढलान था। ढलान चढ़ते समय बार बार फिसकर नीचे चली जाती थी। लाल गुडगुड पत्थरीला ढलान था। खाली पैर पर गुडगुड कंकड के घर्षण से थोड़ा लहर महसुस होने गया था। बहुत प्रयास के बाद एक कांसी का पौधा पक डपायी। इसके सहारे उपर चढ गयी। थोडा दूर चलने के बाद लगा अब हम दोनों पोकला सीमान पहुंच गए हैं। अब खतरा से बाहर महसूस करने लगे। रेलवे स्टेशन के पास पुराना बाजार टांड पहुंचे ही थे कि मुंर्गा के बांक की आवाज सुनाई दी। अब सुरक्षित गांव पहुंच सकते हैं। 

पेकला से रेलवे लाईन के किनारे के रास्ते सोनमेर होते हुए बदु गढहा पहंुचे। सोनमेर से ही मेरे गांव के करम अखड़ा के मांदर की आवाज सुनते ही गांव की तरफ कदम और तेजी से बढ़ने लगा। गांव सीमा पहुंचते ही दूसरा मुर्गा की बांग सुनाई दी। हम दोनों लाईन किनारे बड़ा जीतिया पेड़ होते हुए अरहरा दोहर पार कर पाहन सबका आम -कटहल धाईर के रास्ते गांव पहुंचे। अखड़ा रास्ता से ही घर पहुंचे कारण कि यही एक रास्ता है घर तक आने के लिए। 

अखड़ा मे ंहम दोनों नहीं रूके, सीधे घर चले गये। घर का बाहर दरवाजा बांस का पटरा का था। हम दोनों उसे हटा कर अंदर गये। विजय दादा को आवाज दिये वह सोया नहीं था। उठ कर ढिबरी जलाया। बिजय दादा-अभी इतना रात को कहां से आ रहे हो। हम दोनों रांची से इतना ही बोल पाये। तीनों भाई-बहन बैठे। थोड़ी देर में जोलेन दादा जो अखड़ा में था, वह भी घर आ गया। हम दोनों कुछ नहीं बताये। थोडी देर बाद सभी अखड़ा चले गये। सुबह मैंने करम का सेवा में मां की भूमिका पूरी की।  

जब ये घटना का सामना किये, तब पता नहीं था कि वो जगह कहां था। किस जगह -किस धान के खेत में छलागं लगा कर भागे थे। किस रास्ता से पोकला तक पहुंचे थे। बाद में जब भी उस रोड से गुजरते म नही मन उस जगह की पहचान करने की कोशिश करते। लेकिन वो टांड का पेड़ अच्छी तरह याद था। 2008 में जब अर्सोलर मित्तल कंपनी कमडारा-तोरपा क्षेत्र में कारखाना लगाने के लिए करीब 40 गांवों को हटा कर स्टील कारखाना लगाना चाहता था। इसके विरोध में मैं गांव वालों की अगुवाई कर आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच का गठन कर गांव-गांव लोंगों को जागरूक करने घूम रही थी। तब उस जगह को पूरी तरह पहचानी। वो जगह है-टुरूंडु गांव। रोड के बांयी ओर बड़ा से तालाब हैं जिसका पानी दाहिनी ओर खेतों में बहते हुए आगे नाला में मिल जाता है। वहीं आगे टांड में एक बड़ा से बढ का पेड है जो आज भी खड़ा है। हमेशा मै उसे निहारते आती जाती हॅु। कंरम त्योहार मेरे जिंदगी में एक बड़ा यादगार छोड़ के गया हैं। प्रत्येक वर्ष करम के मौसम में अपने बड़े भाई सुशील, बिजय, जोलेन, बाबा-जूरा और मा हिसिया की याद में भावुक हो जाती हूं। 

 हजारों लोक गीत हैं-जो हम सबको एक दूसरे से जोड़ता है, जो प्रकृति और पर्यावरण की गोद में बांधे रहने का सुखद अनुभुति प्रदान करता है। आज विकास के नाम पर हमारे खेत में, जंगल, जमीन में यही नहीं पूरी जीवनशैली में पूंजीवाद, वैश्वीकरण हावी हो गया हैं। जो हमें एक दूसरे से अलग कर रहा है, प्रकृति और पर्यावरण से अलग कर रहा है। परिणाम सामने है-हम अपने इतिहास और सामुदायिकता के जीवनशैजी के मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। हमारीे संगठित ताकत विखरते जा रही है। इससे आदिवासी समुदाय के साथ सभी को नुकसान हो रहा है। जगल-जमीन से हमें बेदखल किया जा रहा है। जंगल-पहाड उजाडे जा रहे हैं। सरना, अखड़ा, ससनदीरी, जाहेरस्थान, देशावली सभी विकास के नाम पर उजाड दिये जा रहें हैं। इसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। मै मानती हुं-जल-जंगल-जमीन की रक्षा हम करेगें, तभी हमरा गांव-समाज बचेगा, हमारा इतिहास-भाषा-सास्कृति और करम त्योहार, सरहूल त्योहार भी बचेगा।