Saturday, October 3, 2026

2 मार्च 2012 की मेरी डायरी ---About Nagdi Movement

 2 मार्च 2012 की मेरी डायरी                 

महामहिम राज्यपाल महोदय                                          दिनांक-2 मार्च 2012

झारखंड

विषय- कांके नगड़ी के ग्राम सभा से बिना सहमती लिये ही, किसानों की कृर्षि भूंमि, जो इनका एक मात्र जीविका का साधन है-को सरकार आई आई एम और लॉ कालेज के नाम पर जबरन पुलिस बल के द्वारा जमीन कब्जा कर रही है-इसको रोकने के संबंध में।

महाषय,

इतिहास गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह-बिच्छु से लड़कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जंगल, पानी, जमीन पर हमारा परंपारिक अधिकार है। इस राज्य के जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सिद्वू-कान्हू, बिरसा मुंडा जैसे वीर आदिवासी  नायकों ने षहादत दी है। इन षहिदों के खून का कीमत है छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम 1908। इस कानून में आदिवासियों के जमीन की रक्षा का विषेष प्रावधान है। यह कानून कृर्षि भूंमि में किसी तरह के गैर कृर्षि निर्माण कार्य को भी इजाजत नहीं देता है। लेकिन राज्य सरकार नगड़ी ग्रामवासियों के हाथ से पुलिस के बल पर जमीन छीन कर किसानों-राईयतों भूंमिहीन, गरीब-कंगाल बनाने जा रही है। 

महामहिम का ध्यान इस ओर अक्रिष्ट करना चाहते हैं-कि राज्य पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में आता है और इस इलाके में पेसा कानून भी अस्तित्व में है। इस कानून के आलोक में कहना चाहते हैं-कि इस इलाके में जो भी विकास योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की जाएगी-इसकी इजाज ग्राम सभा से ली जाएगी। लेकिन सरकार आई आई एम और लॉ कॉलेज के नाम पर जमीन ग्रामीण देना चाहते हैं-यह नहीं, इस संबंध में ग्राम सभा से किसी तरह का राय-विचार-विमार्ष नहीं लिया गया। यह पांचवी अनूसूचि को दिये अधिकार ’’ग्राम सभा ’’ सहित पेसा कानून का घोर उल्लंघन है। यह हम आदिवासी मूलवासी किसानों के उपर राज्यकीय दमन है। 

हम नगड़ी ग्रामवासी आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि 57-58 में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय के लिए जमीन अधिग्रहण की बात सरकार कहती है-लेकिन तब भी हम ग्रामीण जमीन अधिग्रहण का विरोध किये-हम अपने पूर्वजों का जमीन नहीं देना चाहते हैं, यही कारण है कि-जमीन का पैसा सरकार देना चाही-तब भी हमलोगों ने पैसा नहीं लिया। (सलंग्न-29 फरवरी 2012-जिला भू-अर्जन पदाधिकारी रांची)। 

हम नगड़ीवासी महामहिम को यह भी बताना चाहते हैं-कि नगड़ी आदिवासी बहुल गांव है। यहां (57-58) 153 पंचाटियां थीं, (वर्तमान में कई और परिवार बढ़ गये हैं) यहां कुछ परिवार मुस्लिम भी हैं। इन 153 पंचाटियों में से 128 राईतों (पंचाटियों) ने जमीन का पैसा लेने से इन्कार किया, क्योंकि हम किसी भी कीमत में अपना जमीन देना नहीं चाहते हैं। करीब 25 मुष्लिम समुदाय के पंचाटियों नेे पैसा लिये। 

हम आप को यह भी कहना चाहते हैं-कि हम आदिवासी समाज का जीविका, अस्तित्व, भाषा-संस्कृति, इतिहास और पहचान जमीन-जंगल के साथ जुड़ा हुआ है। हम तब तक आदिवासी हैं-जबतक जमीन के साथ जुड़े हुए हैं। और इस पांचवी अनुसूचि एवं सीएनटी एक्ट क्षेत्र में हमारे अधिकारों की रक्षा एवं विकसीत करने की जिम्मेवारी राज्य के महामहिम राज्यपाल की है। 

हम महामहिम को यह भी बताना चाहते हैं कि-57-58 में सरकार द्वारा प्रयास किये गये जमीन अधिग्रहण का विरोध तब भी हम लोगों ने किया और जमीन हमारे पूर्वजों से लेकर आज भी हमारे ही हाथ में है। आज भी हम खेती कर रहे हैं और जमीन का मजगूजारी भी देते आ रहे हैं। लेकिन साजिष के तहत कुछ लोगों का मजगूजारी रसीद 2008 से काटना बंद कर दिया। लेकिन कुछ लोगों का मलगुजारी 2011 तक भुगतान किया गया है। 

यहां यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं-कि 57-58 में पूर्ववर्ती राज्य सरकार द्वारा राजेन्द्र कृर्षि विष्वविद्यालय वर्तमान में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके के लिए जिस जमीन को मात्र चिन्हित किया गया था-का मालिकाना हक बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके को है-सरकार यह मानती है। इसी आधार पर राज्य सरकार उक्त भूंमि का अपने विभिन्न योजनाओं में अलग-अलग उद्वेष्य में उपयोग करना चाह रही है और इस बावत बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय कांके पर उक्त भूंमि पर अनापति प्रमाण पत्र जारी करने का दबाव डाला गया। ज्ञातव्य हो कि बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय और पथ निर्माण विभाग रांची के बीच प्रषनगत भूंमि पर रिंग रोड निर्माण हेतु कई पत्राचार हुआ। इसमें जमीन का मलिकाना हक बिरसा बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय को नहीं है-क्योंकि जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया है-यह बात स्वंय अधीक्षण अभियंता पथ निर्माण विभाग, पथ अंचल रांची ने पत्रांक 1137 दिनांक 18.08.08 में स्पष्ट किया है। (छायाप्रति सलंग्न)।


हम आप को बताना चाहते हैं-कि जिस जमीन को 57-58 में बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय द्वारा अधिग्रहीत मानती है-वह बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय द्वारा अधिग्रहीत नहीं है। इसकी पुष्टी स्वंय बिरसा कृर्षि विष्वविद्यालय ने (6375) दिनांक 17-12-2008 में की गयी है।(छायाप्रति सलंग्न) सरकार जमीन अधिग्रहण के नाम पर-कागज पर फरजी अधिग्रहण कर रखा है-और इसी फरजी अधिग्रहण के आधार पर जिला भू-अर्जन विभाग ने आई आई एम हेतु कुल 214.29 एकड़ जमीन राज्यअदेश संख्या-658/ रा0 दिनांक 07.03.2009 से मानव संसाधन विकास, झारखंड को निशुल्क हस्तानान्तरण कर दिया है। साथ ही 12.635 एकड़ भूंमि रिंग रोड़ निर्माण के लिए पथ निर्माण विभाग को हस्तानान्तरण कर दिया गया।  

 सरकार हमारे अधिकारों का हनन करते हुए जब्रजस्ती 9 जनवरी 2012 को पुलिस बलों के सहयोग से हमारे जमीन पर कब्जा कर लिया और गलत तरीके से घेराबंदी का काम किया जा रहा है। हमारी यह जमीन उपजाउ कृर्षि भूमिं है। यहां साल में तीन फसल उगाते हैं। धान का फसल काटने के बाद हमलोगों ने वहां चना, गेंहूं आदि फसल भी बो दिये थे-जिसको पुलिस वालों ने रौंद डाला। 

हम नगड़ीवासी आप से कहना चाहते हैं-हम विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन हम आदिवासी किसानों को उजाड़ कर नहीं। हम आई आई एम तथा लॉ कालेज का विरोध नहीं कर रहे हैं-लेकिन हमारे कृर्षि भूंमि में नहीं। 

हमारा संकल्प -हम अपने पूर्वजों की जमीन को एक इंच भी नहीं देगें, क्योंकि हमारे सामाजिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति, सरना-ससनदीरी, मसना, इतिहास और पहचान को किसी भी मुआवजा से नहीं भरा जा सकता है, ना ही उसको पूनार्वासित किया जा सकता है।

हमारा सुझााव-

1-चिन्हित किया गया जमीन कांके नगड़ी के किसानों की उपजाउ कृर्षि भूंमि है और यह जीविका का एक मात्र साधन है। इस पर किसी भी तरह का इमारत -बिल्डिंग नहीं बनाना चाहिए

2-आई आई एम एवं लॉ कालेज एक विषिष्ट षिक्षण संस्थान है, इसलिए यह ऐसी जगर पर बनायी जाए जो गांव से 30-35 किलो मीटर दूरी पर हो, ताकि षिक्षण कार्यक्रम में किसी तरह का बाधा नहीं पहुंचे।

3-आई आई एम एवं लॉ कालेज षिक्षण संस्थान ष्षहर -गांव की भीड़ भाड़ से दूर ष्षांत जगह में बनाया जाए

4-ऐसी जगह से संस्थान खड़ा किया जाए जो सरकारी जमीन हो, बंजर भूंमि और कृर्षि योग्य नहीं हो, सरकार ऐसी जगह चिन्हित करे

हमारी मांगें-

1-गा्रम सभा को दिये गये अधिकारों का सम्मान किया जाए तथा जिस जमीन को जबरन पुलिस बल द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा है-उसे यथाषीध्र रोका जाए

2-छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम 1908 के मूलधारा 46 में आदिवासियों को जो अधिकार दिये गये हैं-उसका सम्मान किया जाए।

3-हम आदिवासी-मूलवासी किसी भी कीमत में हमारी खेती की जमीन को आई आई एम एवं लॉ कालेज के लिए नहीं देगें

4-आदिवासी-मूलवासियों का विस्थापन रोका जाए।

                                          

                                                               आप के विष्वास्त 

                                                                  कांके -नगड़ी

                                                                  2 मार्च 2012

नोट-मैंने फरवरी 2012 में नगडी के 227 एकड जमीन से संबंधित आरटीआइ आवेदन रांची जिला भूअर्जन विभाग-रांची और बिरसा कृषिविश्वविद्यालय कांके को दी थी। जिसमें निम्नलिखत सवाल मैंने की थी-1- कांकें नगडी में आप ने कितना एकड़ जमीन अधिग्रहण किये हैं

2-किन-किन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-किसानों की सूची के साथ

3-जिन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-उन किसानों को जमीन का कीमत किस दर से भुगतान किये हैं-पावदी रसीद के साथ जानकारी

4-जिन किसानों का जमीन अधिग्रहण किये हैं-उस जमीन का खाता सं0, और रकबा की जानकारी

5-अगर आप जमीन अधिग्रहण किेये हैं-तो उस जमीन का उपयोग किस रूप में आप कर रहे हैं

ठसी आरटीआई आवेदन में मिला जानकारी के आधार पर पहला आवेवदन राजपाल के नाम बना कर, जमीन वापसी की मांग के लिए 2 मार्च 2012 आवेदन दिये थे। इसके बाद ही 4 मार्च 2012 से नगडी चौंरा में धरना में बैठना शुरू किये। जो 3 जुलाई तक जारी रहा।  रिपोर्ट में दर्ज तथ्य, मेरे द्वारा आरटीआई द्वारा मांगी गयी आवेदन में मिली जानकारी में मौजुद है। आरटीआई में मिली सभी कॉपी मैंने नगडी आंदोलन 2012 में सभी को दे दी हुं। इसी जानकारी के तहत लड़ाई लड़ी गयी थी। दुखद बात है कि 2025 में रिम्स 2 के नाम पर फिर से जब जमीन पर सरकार काम करना शुरू किया, तब नगडी के किसानों को माले विधायक री अरूप चटर्जी, पूर्व विधायक श्री विनोद कुमार सिंह, माले के राज्य सचिव श्री मनोज भक्त जी, कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष-श्री केशव कमलेश जी, विधायक श्री राजेश कच्छप जी, राजस्व मंत्री श्री दीपक बीरआ जी, कल्याण मंत्री श्री चमरा लिंण्डा जी, झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव श्री सुप्रीयो भटार्चाजी,  स्वस्थ्य मंत्री श्री इरफान अंसारी जी सबके पास लेकर गयी। सभी ने पोजेटिव जवाब दिये। 

इसी बीच शिबुसोरेन जी का तबीयत खराब हो गया। हेमंत सोरेन और कल्पना दिल्ली में गुरूजी के इलाज में लगे थे। इस दौरान मैंने मुख्यमंत्री जी एवं विधायक कल्पना सोरेन के नाम पर सीएम आवासीय कालर्यालय में नगडाी का जमीन छोड़ कर दूसरे जगह रिम्स 2 बनाने की मांग को लेकर आवेदन दी। इसी बीच 4 अगस्त को निधन हो गया।  इसी बीच कुछ नहीं किया जा सकता था। 

मैं हैरान थी जब नगडी के लोगों को उपरोक्त सभी नेताओं के पास लेकर जा रही थी-मुझे पता भी नहीं चलता था, नगड़ी के रैयतों का एक ग्रुप पूर्व मुंख्यमंत्री श्री बाबूलाल के पास गये। श्री मारांडी जी ने राज्य सरकार से अग्राह किया कि खेती की जमीन में रिम्स 2 नहीं बनाया जाए। इन्होंने ज्यादा उल्टा-सिधा नहीं किया। इसके बाद लोग संसाद श्री संजय सेठ के पास गये। उन्होंने राज्यपाल से मिलाया। संसाद श्री सेठजी भी खेत में हल जोतने का घोषणा किये। लेकिन खेत में नहीं उतरे। इसके बाद जेएमएम कं पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व कल्याण मंत्री श्री चंपाई सोरेन ने खेत में हल चलाने-रोपा रोपने का घोषणा किया। 

तय दिन में पूरे राज्य के बीजेपी के साथी नगडी खेत में ट्रेक्टर लाकर हल जोता, धान रोपा। हैरानी की बात तो यह है कि -धान रोपने के बाद फसल का एक बाईल भी किसान नहीं काटंे। 

2012 में हमलोगों ने खेत जोता, धान रोपा और फसल भी काटा। 15 अगस्त 2012 को 40-45 हल-बैल के साथ पूरा गांव खेत जोता, धान रोपा, मैं साथ थी। कांके थाना में सीओ और थाना प्रभारी ने सिर्फ मेरे उपर नामित एफआईआर किया। दयामनी बरला करीब 100 से 150 लोगों के साथ दिवाल तोडी, खेत जोती और खेती बारी की। एफआईआर में कहा-बाकी लोगों का नाम -पता नहीं है। 7-8 साल तक केस डायरी पुलिस लिखते रही-बाकी लोगों को नाम, पता नहीं मिल रहा है। 2012 से 2023 तक कचहारी का चक्कर मैं लगाते रही। मेंरे उपर कुल 8 केस थे। 9 जून 2012 को नेगड़ी का जमीन बचाने के लिए जानी शिकार निकाले थे। नगड़ी चौंरा से राजभवन तक। 

इसकी तैयारी के लिए 35 गांवों में दिन-रात लोगों को आंदोलन में जोडने का काम किये। राज्य बनने के बाद 2001 में उसी इलाके में ग्रेटर रांची बनाने की योजना फाईनल थी। प्रथम मुख्यमंत्री ने इसका उदधाटन भी कर दिये थे। सरकारी सूची में 35 गांवों का नाम दर्ज था। सभी गांव विस्थापन को लेकर भयभीत था। सभी गांव के ग्रामीण नगड़ी आंदोलन के समर्थन में उतरे। तय कार्याक्रम के अनुसार 35 गांवों के समर्थक, माले के तत्कालन विधायक श्री विनोद सिंह, मासस के तत्कालीन विधायक ्रश्री अरूप चटर्जी हम लोगों के साथ नगडी चौंरा से पैदल भारी भीड के साथ राजभवन पहंुचे थे। उस दिन बडी घटना होते-होते बच गयी सिर्फ विनोद सिंह और अरूप जी के कारण। लोग इतना उग्र हो गये थे-कि किसी का बात ही मान रहे थे। लेकिन सब ठीक रहा। इस दिन हम लोगों के उपर दायर केस 15 सितंबर 2025 को खत्म हुआ है। 

आज दुख है कि राजनीति करके जमीन बचाने को आंदोलन को खत्म कर दिया गया। मैं नगडी के साथियों को बार-बार मना करते रही कि राजनीति मत कीजिए। गठबंधन की सरकार है-अग्राह करेगें, मनाएगें। लेकिन जो हुआ सबके सामने है। 2013 में तीन महीना जेल में रहने के बाद बाहर मैं निकली। जनवरी माह था। एक दिन तत्कालीन प्रखात खबर के प्रधान संपादक श्री हरिवंश जी फोन करके बोले-आज मैं केंन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रामेश जी को अपने दफदर में चाय-पानी के लिए बुलाया हुं। मैं चाहता हुं-तुम भी आओ। मैं सोच में पड़ गयी, जाना चाहिए या नहीं। फिर मन बनाया-नगडी खेत से संबंधित सभी दस्तावेजों को फाईल बनायी और गयी। याद है अंग्रेजी अखबार के 3-4 रिपोर्टर वहां थे। वहां मुझ को देखते ही एक ने कहा-आखिर तुम क्या चाहती हो, तुम्हारे हिसाब से राज्य चले, सब जगह विरोध करती हो जमीन नहीं देना है। इस समय हरिवंश जी और मंत्री नहीं पहुंचे थे। 

लोग बहुत कुछ बोलते गये, मैं चुप थी। हरिवंश जी और मुत्री अंदर प्रवेश किये। सभी ने अभिनंदन किया। बात शुरू हुई। प्रत्रकारों ने मंत्री जी को धन्यबाद और बधाई देने लगे कि आप ने नरेगा कानून बहुत अच््रछा लेकर आये हैं, गांव का बहुत विकास हो रहा है। गांव वाले बहुत खुश हैं। मैं चुप सुनते रही। मैं अपनी बात कहने का अवसर ढुंढ रही थी। मैं अपने को गाली देने लगी-दयामनी क्या तुम चुप रहने के लिए यहां आयी हो, या अपनी बात कहने के लिए। मैं चुपी तोडी-मंत्री साहब नरेगा बहुत अच्छा है लेकिन भ्रध्टाटाचर भी चरम पर है। मजदूरों का मज कर शोषण हो रहा हे। प्रभात खबर में मेरी बहुत सारी रिपोर्ट नरेगा में मजदूरों के शोषण पर छपी है। प्रधान संपादक जी ने कहा-हां दयामनी इस पर बहुत काम की है। सर एसी कमरा में योजनाएं बनती है और जब जमीन पर उतारा जाता है, तब गांव वाले और सरकार के बीच लड़ाई होता है। जैसे कि नगडी में अभी हो रहा है। तुरंत उठ कर मंत्री के पास फाइल लेकर पहुंची। एक-एक पेज पलट कर दिखायी, एक-एक कागजात। और अग्राह की, सर सुकुरहुटं में 2100 एकड तक बंजर भूमि है। आप को समय हो तो दिखा सकते हैं।

25-26 दिन के बाद ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रामेश जी झारखंड आ कर प्रोजक्ट भवन में प्रेस कांन्फ्रेस करके घोषणा किया-नगडी के किसानों का जमीन बहु फसली है किसन जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। मैं उनके साथ हुं। आइआइएम और ट्रीपल आइटी जैसे संस्थान सुकुरहुटु के बंजर भूमि पर बनेगा। इसी घोषणा के आधार पर 2012 के बाद नगडी का जमीन यथावत किसानों के हाथ था। जहां 2024 तक किसान खेती करते रहे। 

राजनीति में रहकर आदिवासी नेता भी आदिवासी समाज के समस्याओं को समझते नहीं है सिर्फ अपना कुर्सी की राजनीति करते हैं। 2012 में मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुण्डा जी थें। दो उपमुख्यमंत्री थे-एक सुदेश कुमार महतो और दूसरा हेमंत सोरेन। उस समय कल्याणमंत्री श्री चंपाई सोरेन जी थे। जिनको नगडी का जमीन के बारे जानकारी नहीं है-सबको है लेकिन पद में रहते नगडी के किसानों का जमीन जो 1957-58 में गलत तरीक से अधिग्रहण किया था। इमानदारी से रैयतों को वापस करना चाहिए था। नहीं करके राजनीति के आग में झोंक दिया। 

No comments:

Post a Comment