Friday, September 25, 2026

झारखंड का मात्र 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रहा है। यह देश के लिए अच्छी नहीं हो सकती है लेकिन झारखंड के जनआंदोलनों की ताकत को दर्शाता है।

 23 सितंबर 2026 को प्रभात खबर में नीति आयोग की एक विशेष रिपोर्ट के बारे में छपा है जिसमें कहा गया है कि गैर-कोयला खनिज उत्पादन में झारखंड का मात्र 3.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रहा है। यह देश के लिए अच्छी नहीं हो सकती है लेकिन झारखंड के जनआंदोलनों की ताकत को दर्शाता है। 


यहां-नीति आयोग ने अपना विश्लेषण इस तरह दिया है-रिपोर्ट-धातु गैर-कोयला खनिज कारोबार का किया गया विश्लेषण-


नीति आयोग की सितंबर 2026 में प्रकाशित ट्रेड बाूच क्वार्टरली (अप्रैल से जून 2026) रिपोर्ट में भारत के धातु एव खनिज (गैर कोयला) अयस्क कारोबार का विश्लेषण कियागया है। रिपोर्ट में देश के कुल खनिज उत्पादन में झारखंड की हिस्सेदारी 3.6 प्रतिशत रही है। राज्य का प्रमुख योगदान बॉक्साइट, लौह अयस्क, तांबा, अयस्क और ग्रेफाइट के उत्पादन में दर्ज किया गया है। जबकि ओडिशा का सबसे अधिक योगदान 38.4 प्रकाशित है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का खनिज उत्पादन कुछ राज्यों में केंन्द्रित है। ओडिशा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और महाराष्ट्र मिलकर देश के कुल खनिज उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं। झारखंड का उल्लेख खनिज संपदा वाले राज्यों में किया गया है। 

खनन ़क्षेत्र में निवेश और उत्पादन बढ़ाने की चुनौती-रिपोर्ट में देश के खनन क्षेत्र के सामने र्प्यावरण और वन मंजुरी में देरी, भूमि अधिग्रहण की चुनौतियों तथा नीलाम किये गये खनिज ब्लॉकों को चालू करने में लगने वाले समय को संरचनात्मक बाधाओं के रूप में रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट में खनिज नीलामी प्रक्रिया को तर्कसंगत बनाने, खनन परियोजनाओं के संचालन में तेजी लाने और खनिज ब्लॉकों को निर्धारित समय सीमा में चालू करने जैसे उपाय बताये गये हैं। रिपोर्ट में खनिज उत्पादन बढ़ाने में आ रही बाधाओं का जिक्र किया गया है। जो झारखंड समेत अन्य राज्यों के लिए सुझाव दिये गये हैं। 

ये कारण बताये गये हैं-

1-पर्यावरण और वन मंजूरी में हो रहा है विलंब

2-भूमि अधिग्रहण की चुनौती

3-नीलाम खनिज ब्लॉकों को चालू करने में बिलंब

4‘-खनिज नीलामी प्रक्रिया में सुधार, तर्कसंगत बने संचालन में तेजी लावें

5-देश के खनिज कारोबार में बढ़ रही आयात निर्भरता। 


खनिजों के राष्ट्रीय उत्पादन में राज्यों का योगदान

राज्य देश में कुल खनिज उत्पादन में हिस्सेदारी खनिजों को योगदान-प्रतिशत में

ओडिशा---- 38.4 प्रतिशत क्रोमाइट-100, बॉक्साइट-72.5

                  लौह अयस्क-55.6

                  ग्रेफाइट-39.6

                   मैगनीज अयस्क-16.05

राजस्थान ---23.2 प्रतिशत सीसा-जस्ता-100

                 सेलेनाइट-100

                  गार्नेट-100

                  सिलिसियस अर्थ-100

छत्तीसगढ ---13.5 प्रतिशत टिन-100

                    लौह अयस्क-15.1

                   बॉक्साइट-4.3


कर्नाटक--- 10.1 प्रतिशत मैगनीज-16.1

                 लौह अयस्क-15.6

                  बॉक्साट-4.3

महाराष्ट्र--- 5.4 प्रतिशत कयनाइट-100

 ाि           लिमेनाइट-100

                फलोराइट-32.9

                मैंगनीज अयस्क-30.3

                  बॉक्साइट-4.6

झारखंड---- 3.6 प्रतिशत बॉक्साट-7.5

                         लौह अयस्क-6.6

                          तांबा अयस्क-3.2

                            ग्रेफाइट-0.4

मध्यप्रदेश --2.4 प्रतिशत तंबा अयस्क-76.6

                  मैगनीज अयस्क-26.1

                   फॉस्फोराइट-20.2

                     लौह अयस्क-2.3

आंध्र प्रदेश--- 1.0 प्रतिशत मैंगनीज अयस्क-11.3

                     लौह अयस्क-1.01

                     अन्य-2.4


इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड के आदिवासी -मूलवासी समुदाय अपने जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण के साथ अपने हक-अधिकारों की रक्षा के लिए अधिक सचेत और संर्घषशील हैं। इसका श्रेय झारखंड के सभी जनआंदोलन को जाता है।  

झारखड के तीन-चार जनआंदोलन हैं जो अपने जीत का संदेश विश्व तक पहुंचा दिये हैं। जनआंदोलनों के जीत का मूल मंत्र था आदिवासी-मूलवासी समुदाय की सामूहिक शक्ति जो जाति, धर्म और राजनीति से उपर उठकर खड़ी संगठित ताकत थी। इन जनआंदोलनो मे मूल रूप से कोइल-कारो जनसंगठन-गुमला, रांची-खूंटी। केंन्द्रीय जनसंघर्ष समिति-पलामू, गुमला। आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच-खूंटी, गुमला। भूमि रक्षा संघ-पूर्वी सिंहभूम, मानकी-मुण्डा संघ-पश्चिमी सिंहभूम,  भूमि सुरक्षा मच-संताल दिशुम, काठीकुड। इसके साथ ही गांव स्तर पर संताल परगना, कोल्हान, मुंण्डारी खूंटकटी क्षेत्र, ाहित पूरे राज्य में सक्रिय हैं। 

विकास के नाम पर राज्य में अब तक करोड़ो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय विस्तापित हो चुके हैं। 20 लाख जमीन विकास के नाम पर विभिन्न कंपनियों और परियोनाओं में जा चुकी है। इन विस्थापितों मे से 10-12 प्रतिशत ही किसी तरह से मुआवजा दिया गया है। बाकी विस्थापित आबादी रोजी रोटी के लिए दूसरे राज्यों में पलायन किया। कुछ राज्य में ही बेघर-बार होकर दर-दर में ठोंकरे खाने को मजबूर हैं। विकास और विस्थापन का सच को समझने के बाद आज झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान अपना विरासत की रक्षा जींदगी मूल लक्ष्य मानते हैं। 


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