Saturday, January 22, 2011

.BUT PROVIDE US OUR GENERATION BY GENERATION ..IT IS THE MEANING OF LIVE


What is the meaning of Sustainable Development?

I mean...Balance Development..
But ..Balance with whom ?
I mean..With our Heritage ..Land, Water, forest, hills, agriculture, environment, Social-Cultural values and With Human Values...

We Want to Develop With our these Heritage..

We can Sustain only with them...

They can provide ...every land to Water..every hand to livelihood.. Its not provide only to us.
..BUT PROVIDE US OUR GENERATION BY GENERATION ..IT IS THE MEANING OF LIVE

अगर हो सके तो कोई सम्मा जलाइये

आइये हम मिलकर गीत गाएं

१। अगर हो सके तो
कोई सम्मा जलाइये
इस दौरे सियासत का अँधेरा मिटाए
२। जुम्मों- सितम्म का आग लगा है
यंहा -वंहा
पानी से नहीं - आग से
बुझाइये
३। क्यों कर रहे हैं-- आंधियां रुकने
का इंतजार॥
आइये कन्धा से कन्धा
मिलाइये
४। नफरत फैला रहे हैं जो मजहब में
सता के भूखे लोगों से
मजहब बचाइये
कुर्सी के भूखे लोगों से
मजहब बचाइये



Thursday, January 13, 2011

बिरसा तुम..एक- एक इंच जमीन बचाने के लिए लड़ाई लड़ा


आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच के साथियों बिरसा उलगुलान को याद करते गीत गाये-
1. 1899 रेम बिरसाम लड़ाई केना
हिसि मुका पगाड़ी केम मायोम केदा
बिरसाम लड़ाई केना रे
मिद बिता ओते लाईम लड़ाई केना
2. रांची -दुरंदआ रे
बिरसा मुर्ती ko तिंगु केदमा
मुर्ती को तिंगु केद मारे
गोटा
दिशुम एकला जाना
हिन्दी--
1899 में बिरसा तुम अंग्रेजों के खिलाफ
लड़ाई लड़ा
तुम जो सिर पर 20 हाथ का
पगड़ी बांधा था
खून से लाहूलुहान हो गया
बिरसा तुम..एक- एक इंच जमीन बचाने
के लिए लड़ाई लड़ा
रांची-दुरंगदआ में तुम्हारा
मुर्ती खड़ा किया
पूरा
देश डोल उठा

गीत 2......
1..हायरे बिरसा मुंडा के ...2
सोबेन हगा मिसि कोयते
हिरो लगातिंगा
हायेरे बिरसा मुंडा के...2
सोने चांवर तेको
हिरे लाईजा
२-हाय रे बिरसा मुंडा के
रूपा राव चंवर टेको
हीरे laija

हिन्दी--
हयरे बिरसा मुंडा को
सभी भाई-बहन मिलकर
सोन का चांवर से हवा दे रहे हैं
हयरे बिरसा मुंडा को सभी
मिलकर उसको नमन करेगें
हयरे बिरसा मुंडा को
गीत 3...
1 नवरतन कोंचा बाड़ी
उली सुबा रे
हायरे हायरे मुंडा कोओ
खूंट-कटी दोआ कना रे
हायरे हायरे
मुंडा कोआ राजनीति
दोआ कना रे
2. नेलेपेरे साईलाना
हगा को
नेलेपेरे साईलाना मिसि को
बिल दिरि ससन दिरि
दोआ कना रे
मुंडा कोआ खूंटकटी
आईन
मिशील
दोआ कना रे
हायरे हायरे
मुंडा कोओ खूंटकटी
दोआ कना रे
३-चेतन रेदो दआ मेनाआ रे
लतर रेदा दिरि तेको खमपुआकदा
हायरे हायरे मुंडा कोआ
खूटकटी आईन-
मिशील
कानून दोआ कना रे
हिन्दी----
नवरत्नगढ़ के बाड़ पेड़ और आम पेड़ के छाया में
मुंडा आदिवासियों का खुंटकटी रखा हुआ है
मुंडा आदिवासियों को राजनीति रखा हुआ है
देखो सभी भाई-बहन देखो, देखो
मुंडाओं का बिछा हुआ-ससन दिरि(धार्मिक पत्थल)
रखा हुआ है
मुंडा आदिवासियों का खूंटकटी अधिकार रखा हुआ है
मुंडाओं का परंपारिक कानून-व्यवस्था रखा हुआ है

नदियां-जितनी दूर तक बह रहीं हैं-उतना जीवंत इस समाज का इतिहास है,


9 जनवरी झारखंड के इतिहास में -जल, जंगल, जमीन, भाषा-संस्कृति बचाने के संघर्ष के इतिहास में महत्वपूर्ण दिन है। 9 जनवरी 1900 को बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में खूंटी जिला स्थित डोमबारी बूरू आदिवासी ’शहीदों के खून से लाल हो गया था। उलगुलान नायकों को साईल रकम-डोमबारी पहाड़ में अंग्रेज सैनिकों ने रांची के डिप्टी कमिश्नर स्ट्रीटफील्ड के अगुवाई में घेर लिया था। स्ट्रीटफील्ड ने मुंडा आदिवासी आंदोलनकारियों से बार बार आत्मसामर्पण करने का आदेश दे रहा था। इतिहास गवाह है-उनगुलान के नायकों ने अंग्रेज सैनिकों के सामने घुटना नहीं टेका। सैनिक बार बार बिरसा मुंडा को उनके हवाले सौंपने का आदेश दे रहे थे-ऐसा नहीं करने पर उनके सभी लोगों को गोलियों से भून देने की धमकी दे रहे थे-लेकिन आंदोलनकारियों ने बिरसा मुंडा को सरकार के हाथ सौंपने से साफ इनकार कर दिये।
जब बार बार आंदोलनकारियों से हथियार डालने को कहा जा रहा था-तब नरसिंह मुंडा ने सामने आया और ललकारते हुए बोला-अब राज हम लोगों का है-अंग्रेजों का नहीं। अगर हथियार रखने का सवाह है तो मुंडाओं को नहीं, अंग्रेजों को हथियार रख देना चाहिए, और यदि लड़ाई की बात है तो-मुंडा समाज खून के आखिरि बुंद तक लड़ने को तैयार है।
स्ट्रीटफील्ड फिर से चुनौती दिया कि-तुरंत आत्मसमार्पण करे-नही तो गांलियां चलाई जाएगी। लेकिन aandolankari -निर्भय डंटे रहे। सैनिकों के गोलियों से छलनी-घायल एक -एक कर गिरते गये। डोमबारी पहाड़ खून से नहा गया। lashen बिछ गयीं। कहते हैं-खून से तजना नदी का पानी लाल हो गया। डोमबारी पहाड़ के इस रत्कपात में बच्चे, जवान, वृद्व, महिला-पुरूष सभी shamil थे। आदिवासी samaj में पहले महिला-पुरूष sabhi लंमा बाल रखते थे। अंग्रेज सैनिकों को दूर se पता नहीं चल रहा था कि जो lash पड़ी हुई है-वह महिला का है या पुरूषों का है। इतिसाह में मिलता है-जब वहां नजदीक से lash को देखा गया-तब कई lash महिलाओं और बच्चों की थी। वहीं एक बच्चा को जिंदा पाया गया-जो मृत ma का स्तन चूस रहा था। इस समूहिक जनसंहार के बाद भी मुंडा समाज अंग्रेजो के सामने घुटना नहीं टेका। इतिहास बताता है-जब बिरसा को खोजने अंग्रेज सैनिक सामने आये-तब माकी मुंडा एक हाथ से बच्चा गोद में सम्भाले, दूसरे हाथ से टांकी थामें सामने आयी। जब उन से सैनिकों ने पूछा-तुम कौन हो, तब माकी ने गरजते हुए-बोली-तुम कौन होते हो, मेरे ही घर में हमको पूछने वाले की मैं कौन हुं?
इस गौरवशाली इतिहास को आज के संर्दभ में देखने की जरूरत है। आज जब झारखंड का एक एक इंच जमीन, जंगल, पानी, पहाड़, खेत-टांड पर सौंकड़ों देशी -विदेशी कंपनियां कब्जा करने जा रहे हैं। सरकार आज सभी जनआंदोलनों का दमन कर स्थानीय जनता के परंपारिक और संवैधानिक अधिकारों को छीन कर पूंजीपतियों के हाथों सौंपने में लगी हुई है। ऐसे परिस्थिति में आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच बिरसा उलगुलान के 9 जनवारी के ‘’शहीदों के इतिहास को आगे बढ़ाने के लिए आज तोरपा प्रखंड के चुकरू गांव में इतिहास पर गंभीर चर्चा किया। मंच न महसूस किया कि-आज बिरसा उलगुलान के ’शहीदों के रास्ता का समाज भूलते जा रहा है। बिरसा की राजनीतिक चेतना को भूलते जा रहे हैं। बिरसा मुंडा ने आदिवासी राज्यसत्ता की राजनीति का नींव रखा था। जो जल, जंगल, जमीन बचाने के संघर्ष रूप में था। बिरसा की इस राजनीति को अंग्रेजे अच्छी तरह समझते थे। इसीकारण इनके नजर में बिरसा मुंडा थे। यही कारण है कि-अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा को पकड़ कर जेल में रखा और जहर देकर मार डाले। बिरसा मुंडा-ने उस समय यह महसूस किया था-जब यहां कोई सुविधा नहीं था, समाज ashikshit था, आने-जाने का कोई सुविधा नहीं था, आज की तरह सड़के नहीं थी, बिजली नहीं था, फोन नहीं था, गाड़ी की सुविधा नहीं था-फिर भी बिरसा मुंडा महसूस किया-कि मुंडा-आदिवासियों को अपना राज चाहिए, अपना समाज, गांव-जंगल-जमीन-नदी-पहाड़ चाहिए। बिरसा मुंडा ने-महसूस किया था-झारखंड की धरती जितनी दूर तक फैली है-यह उनका घर आंगन है। नदियां-जितनी दूर तक बह रहीं हैं-उतना जीवंत इस समाज का इतिहास है, पहाड़ की उंचाई-के बराबर हमारा संस्कृति उंचा है। सभी वक्ताओं ने यह महसूस किया-कि बिरसा मुंडा ने आखिर क्यों अपना परिवार छोड़ा? क्यों घर छोड़ा। मंच ने अहवान किया-संक्लप लिया कि-हमें आज अपने पंचायत में, गांव में, टोला-महला में, जगल, जमीन में, डोमबारी के इतिहास को लिखने की जरूरत है। विकास के क्षेत्र में-सरकारी योजनाओं में बिरसा मुंडा के उलगुलान के इतिहास को लिखना होगा। मंच के साथियों ने बिरसा उलगुलान को याद करते कई गीत गाये-

Wednesday, January 12, 2011

धनकुबेरों के राजनीति को ख़ारिज कर ---जान राजनीति का परचम हलराया


संघर्ष और निर्माण की ओर बढ़ता कदम
आज१२ जान ११ को, खूंटी जिला के प्रखंडों में उपमुखिया का चुनाव प्रखंड विकास पदाधिकारी ke देख रेख में संपन हुआ. तोरपा ब्लाक के आमा पंचायत में उपमुखिया के लिए फिलिप टोपनो आदिवासी मूलवासीअस्तित्व रक्षा मंच से, रुकमनी देवी बीजेपी समर्थित नामांकन भरे । ९ परसद में से ७ पर्सदों ने मंच के फिलोपटोपनो को वोट दिये, जबकि रुकमनी देवी को मात्र २ वोट मिला-अपना वोट सहित। आदिवासी मूलवासी अस्तित्वरक्षा मंच ने धनकुबेरों के राजनीति को ख़ारिज कर ---जान राजनीति का परचम हलराया
तोरपा
ब्लोक के आमा पंचायत में आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच ने चुनाव में जीत हाशिल कर निर्माण की प्रक्रिया में अपने उपस्थिति दर्ज किया। पंचायत में कुल ९ वाड है-इसमें मंच ने ६ वाड जीता। मुखिया पद के लिए-जे एम् एम् -ने अगुस्तिन टोपनो, बीजेपी-चमरा पहन, दुसरे संगठन-धनकुंवर टोपनो, आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच-जों टोपनो उमीदवार थे। मंच ने मुखिया पद जीत लिया।
पंचायत समिति- के उमीदवार-रोशन टोपनो-निर्दलीय, मार्शेल टोपनो-जे एम् एम्, शशि कुमार टोपनो-दुसरे संगठन, आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच-तुर्तन टोपनो थे। मंच नि जीत हाशिल किया। उप मुखिया का पद भी मंच लेने की स्थिति में है। मंच ने हर घर से वाड परसद से लाकर पंचायत समिति के उम्मीदवारों के लिए चंदा जमा किया था।

Sunday, January 9, 2011

कामरेड महेद्र सिंह आज भी हमारे बीच हैं..अनुगूँज बन कर.

कामरेड महेद्र सिंह आज भी हमारे बीच हैं..अनुगूँज बन कर........जिन्होंने पहले ही हम से कह गए...

चाँद क़दमों के फासले पर
खड़ी हो निर्विकार भाव से तब
हिमालय की तरह अटल जिंदगी
को
जश्न की तरह जीने का
कुछ और ही मतलब है

साँस की हर डोर
जिसका एक सिरा
थाम रखा हो निर्दयी
कल ने
सिर्फ तभी दिल में
हर धड़कन को
रिदम की तरह
जीवन की लाय में
बंधना जरुरी है

कल जब नहीं
होंगे हम
जिंदगी की हर ख़ुशी
और गम में
हिस्सेदारी बन कर
जिन्दा रहेगी
हमारी गूंज
अनुगूँज बन कर

Saturday, January 8, 2011

७ जनवरी ११ को जबड़ा डैम के बिरोध में घोर्पेंडा गाँव में बैठक करते gramin


Triveni Engicons pvt।ltd द्वारा कर्रा ब्लाक के छाता नदी में डैम बना शुरू कर दिया है। ग्रामीणों का सिकायत है की इसके लिए ग्रामीणों से किसी तरह से राय-मशबिरा नहीं लिया गया। एक तरफ सरकार कानून बनती है...गाँव में कोई भी परियोजना गाँव वालों के सहमती के बिना नहीं बन सकता है। गाँव वालों के सहमती के बाद ही..योजना को जमीन पर उतरा जायेगा। कानून में यह भी कहा गया है..की किसी भी परियोजना को यदि गाँव वालों की मंजूरी मिल जाती है..तब किसानो का जमीन तभी लिया जायगा..जब किसानों के जमीन का कीमत दिया गया हो..यह भुगतान कर दिया हो। लेकिन साकार अपने ही बनाये कानून को ख़ारिज कर किसानों के अधिकारों का हनन करने में तुला हुआ है। ना तो जमीन लेने से पहले किसानों से सहमती ले रही है..और ना ही जमीन का कीमत पहले दिया जा रहा है, और ना ही किसानों को जमीन का क्या कीमत दिया जायेगा..यह भी तय नहीं हो रहा है, यह भी तय नहीं हो रहा है..की जमीन का मुवावजा दिया जायगा यह नहीं..डैम किस उद्देश्य से बनाया जा रहा है..पानी किसको दिया जायेगा..कुछ भी ग्रामीणों को बताया नहीं जा रहा है..सिर्फ जो दलाली कर रहे हैं..वही किसानों को बोल रहे हैं..आप को नौकरी मिलेगा, मुवावजा मिलेगा, आप के खेत को पानी मिलेगा। किसान जमीन देना नहीं चाहते हैं ..लेकिन ठेकेदार और दलाल ग्रामीणों को जान से मरने की धमकी दे रहे हैं। ज्ञात हो की डैम को लेकर १३ दिसंबर को दो लोगों का उपहरण किया गया था, जिसमे एक ठेकेदार का आदमी था, दूसरा गाँव का। जो गाँव का था..उसका हत्या कर दिया गया..और ठेकेदार का आदमी को छोड़ दिया गया। डैम से प्रभावित होने वाले गांवों में..जबड़ा, जोंधने, घोर्पिंडा, तिकीसुलुंगी आदि है। भय को तोड़ते हुए, ग्रामीण डैम नहीं बनाने देने की खिलाफ संघर्ष के लिए उठ खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों का कहना है..यदि हम डैम..नहीं बनाने देते हैं..फिर भी जान से लोग मरने की धमकी दे रहे हैं..और जमीन दे भी रहे हैं..तो हम लोग इसे ही बर्बाद हो रहे हैं..इसलिए ..अच्छा है की हम जमीन, गाँव, समाज की रक्षा के लड़ाई लड़कर मारें..