Saturday, November 5, 2022

धरना का समय - 12 बजे से स्थान-राजभवन के समक्ष

                                           प्रेस विज्ञप्ति

आप सभी जानते हैं कि हमारे पूर्वजों ने संाप, भालू, बाघ, बिच्छू जैसे खुंखार जंगली जानवरों से लड़कर झारखंडी की धरती को आबाद किया है। जब-जब हमारे विरासत पर हमला हुआ, समाज ने संघर्ष किया। आज राज्य बनने के बाद लगातार आदिवासी, मूलवासी समुदाय के उपर चारों ओर से हमला हो रहा है।  राज्य बनने के बाद आज तक राज्य और केंन्द्र में जितने भी संवैधानिक कानूनांे में संशोधन या फेर-बदल किया गया, सभी आदिवासी, मूलवासी, किसान, दलित और मजदूरों के संवैधानिक अधिकार को कमजोर करने का काम किया है। 

केंन्द्र सरकार और पिछली राज्य सरकार ने 2016 में भूमि बैंक बनाया, और 21 लाख एकड़ से अधिक समुदायिक संपत्ति/जमीन को भूमि बैंक में शामिल कर दिया। आज धड़ले से जमीन पर गैरकानूनी कब्जा का धंधा चरम पर है। जमीन का दस्तावेज आॅनलाइन होने के बाद रातों-रात जमीन का असली मालिक का नाम हटा कर किसी दूसरा व्यक्ति का नाम दर्ज किया जा रहा है। जमीन के खतियान जैसे मूल दस्तावेजों में भारी छेड-छोड किया जा रहा है। सरकार द्वारा नित नये कानून लाकर आदिवासी, मूलवासी, किसानों के परंपरागत एवं संवैधानिक अधिकारों को  कमजोर करके पूुजिपतियों और कारपोरेट उद्वोगों के हित को पूरा करने जा रही है।  झारखंड में आदिवासी, मूलवासी समुदाय के जल, जंगल, जमीन का सुरक्षा कवच सीएनटी, एसपीटी एक्ट, 5वीं अनूसूचि क्षेत्र, पेसा कानून में प्रावधान, समुदाय के सभी परंपरागत अधिकारों को तकनीकी रूप से कमजोर किया जा रहा है। 

वर्तमान समय में केंन्द्र सरकार द्वारा लायी जा रही स्वामित्व योजना के तहत प्राॅपटी कार्ड बनाने की प्रक्रिया भी इसका हिस्सा है। जिसके तहत प्रोपाॅटी कार्ड देने के नाम पर आदिवासी मूलवासी, दलित किसान समुदाय के समुदायिक जमीन को सरकार अपने हाथ में लेने की योजना बनायी है। वर्तमान में लाया जा रहा स्वामित्व योजना इसी उद्वेश्य का एक हिस्सा है। इससे सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, 5वीं अनूसूचि, पेसा कानून, मुंडारी खूुटकटटी अधिकार, हो आदिवासी समुदाय के विलकिनसन रूल में प्रावधान परंपरागत समुदायिक अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। 

 ऐसे समय में कल्याणकारी राज्य के नागरिकों, मानवधिकार के शुभचितकों और आम लोगों की जिम्मेदारी है कि सामाजिक न्याय और राज्य हित में जनविरोधी नीतियों रोका जाए। इसके लिए व्यापक जनहस्तक्षेप की जरूरत है। इसी उद्वेश्य से 7 नवंबर 2022 को राजभवन के समक्ष धरना-सभा करने का निर्णय लिया गया है। धरना सभा में राज्य के विभिन्न ग्रामीण इलाकों के आदिवासी, मूलवासी, दलित किसान समुदाय भाग लेगें।

सभा के बाद-मांग पत्र राज्यपाल के नाम, मुख्यमंत्री के नाम, जनजातिय कल्याण मंत्री के नाम, भूमि सुधार एवं राजस्व विभाग -सचिव के नाम सौपां जाएगा। 

आप सभी जानते हैं कि झारखंड में सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंडारी खूंटकटी एवं 5वीं अनुसूचि क्षेत्र के आदिवासी बहुल जिला खूंटी में प्राॅपटी कार्ड बनाने के लिए ड्रोन से जमीन का सर्वे किया जा रहा था, आदिवासी सामाजिक संगठन लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। बगोदर के माले विधायक श्री विनोद कुमार सिंह जी ने 10 मार्च को इस संबंध में विधान खूटी जिला 5वीं अनूसूचि क्षेत्र में आता है, बावजूद इसके ग्राम सभा की सहमति के बिना ही स्वामित्व योजना के तहत संपत्ति/जमीन का ड्रोन से सर्वे किया जा रहा है। इसके जवाब में स्वंय मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा-खूंटी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वामित्व योजना के तहत संपत्ति और जमीन का डिजिटल सर्वे डा्रेन के जरिए  हो रहा था। यह काम केन्द्र सरकार द्वारा किया जा रहा था। इसको लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में संशय की स्थिति है, इसलिए राज्य सरकार इसे फिलहाल होल्ड करने का आदेश देता है। इन्होनें कहा-इस संबंध में जांच करायी जाएगी। बजट सत्र में सीएम के आदेश के तुरंत बाद ड्रोन सर्वे को होल्ड कर दिया गया है। लेकिन यह स्थायी रूप से नहीं। 

आप सभी जानते हैं कि केंन्द्र सरकार डिजिटल इंडिया लैंण्ड रिकाॅर्ड अधुनीकिकरण कार्यक्रम लेकर आयी है। इसके तहत देश भर की सभी संपत्ति और जमीन का स्वामित्व कार्ड बनाने जा रहा है। इसके लिए देश के सभी जमीन व संपत्ति का एक सोफटवेयर और हार्डवेयर तैयार कर रही है। जमीन व संपत्ति का ड्रोन सर्वे इसी प्रकिया के तहत खूंटी जिला के गांवों से शुरू किया गया है। पायलट प्रोजेक्ट के पहला चरण में (2022-22) में खूंटी जिला के 725 गांवों का डिजिटल सर्वे पूरा करने के बाद झारखंड के बाकि जिलों में, दूसरे चरण  2022-23 में 12000 गोवों, तीसरे चरण में 20000 गांवों का ड्रोन डिजिटल सर्वे करके डिजिटल नक्सा, खतियान भी बनाया जाएगा। ड्रोन से जमीन व संपत्ति का डिजिटल सर्वे कर संपत्ति/स्वामित्व कार्ड बनाने का काम 2024 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। 

झारखंड के आदिवासी समुदाय का अपना विशिष्ट इतिहास है। जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत संवैधानिक अधिकार है। स्वामित्व योजना के लागू होने से राज्य के आदिवासी समुदाय के सभी परंपरागत संवैधानिक अधिकार स्वातः खत्म हो जाएगा। इसलिए ड्रोन सर्वे जो होल्ड किया गया है को पूरा तरह रदद किया जाना चाहिए। 

हमारी मांगें-

1-केंन्द्र सरकार द्वारा काॅरपोरेट घराणों एवं पूंजिपतियों के लिए लायी जा रही स्वामित्व योजना के तहत प्राॅपटी/ संपत्ति कार्ड योजना का लागू नहीं किया जाए। 

2-झारखंड में सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, ं 5वीं अनुसूचि एवं पेसा कानून में प्रावधान अधिकारों को कड़ाई से लागू किया जाए। 

3-आदिवासी बहुल खूंटी जिला में प्राॅपटी कार्ड बनाने के लिए ड्रोन से जमीन /संपत्ति का सर्वे किया जा रहा था को होल्ड किया गया है, इसको पूरी तरह स्थायी रूप से रोका जाए। 

 4-रघुवर सरकार ने गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाड़ी जमीन को भूमि बैंक में शामिल किया है, इस भूमि बैंक को रदद किया जाए। 

5-राज्य के सभी जलस्त्रोंतों, नदी-नाला, झील-झरना का पानी लिफट ऐरिगेशन के तहत पाइप द्वारा किसानों के खेतों तक कृषि विकास के लिए पहुंचाया जाए। 

6-आॅनलाइन जमीन के दस्तावेजों का हो रहा ़क्षेड़-छाड़ को रोका जाए।

7-जमीन का लगान रसीद आॅफलाइन काटा जाए।

8-2013 के जमीन अधिग्रहण कानून को कड़ाई से लागू किया जाए।

9-भूमि बैंक का रदद किया जाए।

10-ग्राम सभा के हक अधिकार, पेसा कानून को कड़ाई से लागू किया जाए।

                     आयोजक-खतियान-जमीन बचाओं संघर्ष मोर्चा झारखंड

घटक संगठन-केंन्द्रीय जनसंघर्ष समिति-लातेहार, गुमला

आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच

पहाडिया सेवा समिति-साहेबगंज

भूमि बचाव संघर्ष समिति-गोडा

जबड़ा डैम प्रभावित संधर्ष समिति-कर्रा

आजादी बचाओं आंदोलन-हजारीबाग

विस्थापित मुक्ति वाहिनी-चांडिल

आदिवासी जागरूकता मंच-गुमला

आदिवासी एकता मंच 

प्रेस वर्ता में -संयोजक दयामनी बरला, रोनाल्ड रिगन खलखो, कुरदुला कुजूर, टोम, मोनोरेन तोपनो, ंललिता तिग्गा, अरूण तोपनो। 

धरना का समय - 12 बजे से

स्थान-राजभवन के समक्ष



Friday, October 7, 2022

झारखंड में आदिवासी, दलित, किसान और मजदूर वर्ग के बच्चों के शिक्षित करने के लिए संचालित स्कूलों का बुरा हाल है...

सरकारी आवासीय विद्यालय कहीं शिक्षक तो कहीं भवन नहीं और कहीं बच्चे नहीं ले रहे एडमिशन राज्य के आवासीय विद्यालयों में को व्यवस्था के कारण पढ़ाई पर असर (दैनिक भास्कर 1 अक्टूबर 2022) झारखंड में आदिवासी, दलित, किसान और मजदूर वर्ग के बच्चे ही सरकरी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हैं। कम आय वाले अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नामांकन कराते हैं। राइट टू एजुकेशन कानून के अनुसार देश के सभी बच्चों को गुनवाता पूर्ण शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है। लेकिन सभी जानते हैं कि सरकारी शिक्षा सिस्टम पूरी तरह से चौपट हो चुका है। यही कारण है कि इन सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेज कर उनकी ज़िंदगी बरबाद नहीं करना चाहते हैं। झारखंड में आदिवासी, दलित, किसान और मजदूर वर्ग के बच्चों के शिक्षित करने के लिए संचालित स्कूलों का बुरा हाल है... राज्य में सरकारी आवासीय विद्यालयों की स्थिति विकट है। कहीं शिक्षक नहीं, कहीं भवन नहीं, तो कहीं बच्चे ही एडमिशन नहीं ले रहे हैं। सीटें खाली रह जा रही हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस आवासीय विद्यालय झारखंड, बालिका आवासीय विद्यालय और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की व्यवस्था एक-दूसरे से होड़ कर रही है। 57 झारखंड बालिका आवासीय विद्यालयों को अब तक अपना भवन नहीं मिल पाया है । कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में शिक्षकों की कमी तो है ही, किसी भी जिले की स्कूल में शत-प्रतिशत एडमिशन नहीं हुआ है। इसी प्रकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस आवासीय विद्यालय उनकी भी सभी सीटें भर नहीं पाई हैं। झारखंड बालिका आवासीय विद्यालयों का अपना भवन नहीं है। इनका संचालन कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय से ही हो रहा है। ऐसे 57 विद्यालय साथ चल रहे हैं। स्पष्ट है कि दोनों स्कूलों पर इसका असर पड़ रहा है। 21 बालिका आवासीय विद्यालयों के भवन तैयार शिफ्ट करने का निर्देश 57 में से 21 झारखंड बालिका आवासीय विद्यालय के भवन बनकर तैयार हैं। झारखंड शिक्षा परियोजना ने इन 21 नए विद्यालय भवनों में स्कूलों को स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है। हालांकि इनमें से 36 झारखंड बालिका आवासीय विद्यालय भवनों के तैयार होने में अभी बिलम है। जेपीसी की राज्य परियोजना निदेशक किरण कुमारी पासी ने शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया है कि जिन बालिका आवासीय विद्यालय के भवन अब बन चुके हैं उन्हें शीघ्र से पेश किया जाए। सभी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने का भी दिशा निर्देश दिया। किसी जिले के कस्तूरबा विद्यालय में नहीं हुआ शत-प्रतिशत नामांकन राज्य के किसी भी जिले के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में इस बार शतप्रतिशत एडमिशन नहीं हो पाया है। करीब 21% सीटें खाली रह गई हैं। 203 कस्तूरबा बालिका विद्यालय में 106 576 एडमिशन सीटें हैं इस बार मात्रा 84 31 5 सीटों पर ही नामांकन हो पाया है। बोकारो गढ़वा, गुमला, सिमडेगा, रांची, गोड्डा और चतरा जिले जहां 75% से कम नामांकन हुआ है, वहां के प्रभारी को शो को जारी करने का निर्देश है। 15 अक्टूबर तक सभी जिलों को अपने वहां की रिक्त सीटों पर विज्ञापन के द्वारा प्रकाशित कर एडमिशन लेने का निर्देश दिया गया है इन स्कूलों में 10-15 शिक्षकों के स्वीकृत पद हैं इनमें से 727 पदों पर चयन हुआ है 288 पद रिक्त है। नेताजी सुभाष आवासीय विद्यालय 13 जिलों में नहीं भरी सीटें राज्य के 13 जिलों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस आवासीय विद्यालय की सीटें इस बार भी नहीं भरी है। नामांकन की समीक्षा के क्रम में शिक्षा अधिकारियों ने जेपीसी को बताया है कि चतरा, दुमका, गढ़वा, गिरिडीह, गोड्डा, गुमला, हजारीबाग, कोडरमा, पाकुड़ पलामू, पश्चिमी सिंहभूम और सिमडेगा जिले के इन स्कूलों में शत-प्रतिशत नामांकन नहीं हुआ है। पाकुड़ जिला शिक्षा पदाधिकारी की रिपोर्ट के अनुसार कक्षा 9 के बच्चों के रहने और पढ़ने के लिए कमरे की आवश्यकता है सभी जिलों को कहा गया कि वे स्वीकृत सभी सीटों पर शीघ्र एडमिशन

Wednesday, October 5, 2022

चावल उत्पादन 70 लाख टन घटने के आसार ..

 चावल उत्पादन 70 लाख टन  घटने के आसार ..

टूटे चावल के निर्यात पर रोक...

  . नई दिल्ली 10 सितंबर 2022

प्रभात खबर में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार देश में चावल की बढ़ती खुदरा कीमत को नियंत्रण में रखने व घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के इरादे से सरकार ने टूटे चावल के निर्यात पर रोक लगा दी है।

 खरीफ सत्र में धान की बुवाई के रकबे में 4 . 95% की गिरावट आने से चावल उत्पादन 60 से 70 लाख टन कम होने का अनुमान जताया गया है। इसके अलावा सरकार ने निर्यात को कम करने के लिए गैर बासमती चावल पर 20% का सीमा शुल्क को भी लगा दिया है। केंद्रीय खाद्य सचिव सुधांशु पांडे ने कहा कि बहुत बड़े पैमाने पर टूटे चावल की खेप बाहर भेजी जाती रही है। पशु चारे के लिए भी समुचित मात्रा में टूटा चावल उपलब्ध नहीं है। इसका इस्तेमाल इथेनॉल में मिलाने के लिए भी किया जाता है। इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए टूटे चावल के निर्यात पर रोक लगाने का फैसला किया गया है। चावल की थोक कीमतें 1 साल में करीब 8% बढ़कर ₹3,291 प्रति क्विंटल हो चुकी

पुनर्वास व विस्थापन नीति के तहत लाभ लेने के लिए जमीन की रसीद जरूरी…

 पुनर्वास व विस्थापन नीति के तहत लाभ लेने के लिए जमीन की रसीद जरूरी…

बुडमू.. 10 सितंबर 2022

 छप्पर कोलियरी को फिर से शुरू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए छप्पर पंचायत में सीसीएल, मुखिया, प्रमुख, जिप सदस्य, उपप्रमुख व रैयतों की बैठक आयोजित की गई। बड़का सायल के महाप्रबंधक एके सिंह ने रैयतों को  पुनर्वास व विस्थापन नीति की जानकारी। सीओ शंकर कुमार विद्यार्थी ने कहा कि मुआवजा के लिए जमीन की रसीद, वंशावली, जाति व आवासीय प्रमाण पत्र बनाकर सीसीएल में आवेदन करें। पंचायत के सभी 5 राजस्व ग्राम में सीएसआर द्वारा सड़क, बिजली, पानी, खेल मैदान के सुंदरीकरण की सूची मांगी गई है। प्रत्येक 15 दिनों में सीसीएल स्वस्थ शिविर लगाएगी बैठक के दौरान 17 रैयतों को 108 एकड़ के मुआवजा की नोटिस दी। रैयतों के बीच खेल सामग्री व 20 सिलाई मशीन बांटी गई। दो जल मीनार का उद्घाटन भी किया गया।

झारखंड में 11 विश्विविद्यालय और 63 अंगीभूत कॉलेज हैं

 झारखंड में 11  विश्वविद्यालय और 63 अंगी भूत कॉलेज है।

उच्च  और तकनीकी शिक्षा विभाग झारखंड के अंतर्गत फिलहाल 11 विश्वविद्यालय और 63 अंगी भूत कॉलेज हैं। कूल 11 विश्वविद्यालय में 1. रांची विश्वविद्यालय 

2.विनोबा भावे विश्वविद्यालय 

3.सिद्धू कानू मुर्मू विश्वविद्यालय

4. कोल्हान विश्वविद्यालय

5. निलंबर पीतांबर विश्वविद्यालय

6. डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय 

7.जमशेदपुर विमेंस विश्वविद्यालय 

8.झारखंड रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय 

9.बिनोद  बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय धनबाद

10. झारखंड यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलॉजी और झारखंड राज्य ओपन यूनिवर्सिटी शामिल है 

11.पंडित रघुनाथ मुरमू जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना अभी प्रक्रिया अधीन है।

फोर्टीफाईड चावल का ग्रामीण ने क्यों विरोध करते हैं?

 झारखंड में अक्टूबर माह से राशन दुकान में फोर्टीफाईड चावल बांटने की योजना है । 

झारखंड में अक्टूबर से चावल का वितरण 25, 238 जन वितरण प्रणाली की दुकानों से प्रारंभ करने की तैयारी राज्य सरकार ने की है। फिलहाल झारखंड के 2 प्रखंडों चाकुलिया और धालभूमगढ़ में जन वितरण प्रणाली की दुकानों में फोर्टीफाईड चावल का वितरण पहले से ही हो रहा है । 16 सितंबर को जमशेदपुर में राज्य स्तरीय कार्यशाला किया गया। जिसमें खास तौर पर इसी बात पर चर्चा की गई कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के घेरे में आने वाले लोगों को फोर्टीफाईड चावल दीया जाना क्यों आवश्यक है।  एक तरह से कार्यशाला के माध्यम से राज्य में जन वितरण प्रणाली की दुकानों में फोर्टीफाईड चावल के वितरण पर सहमति बनाई गई । राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट के तहत सबको भोजन दिलाना ही मुख्य उद्देश्य नहीं, बल्कि सबको  पौष्टिक आहार की भी बात कही गई है ।

क्या है फोर्टीफाईड चावल?

फोर्टीफाईड में आयरन, फोलिक एसिड और बी 12 का मिश्रण किया जाता है । इस चावल में आम चावल की तुलना में आयरन विटामिन b12 , फोलिक एसिड  की मात्रा अधिक है । इसके अलावा जिंक, विटामिन ए, विटामिन बी वाले  फोर्टीफाईड  भी तैयार किए जा सकते हैं। 

 खाने से भोजन में पौष्टिक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है और स्वास्थ्य अच्छा रहता है। 

 वर्ष 2024 तक देश भर में इस योजना को लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।

 यहां यह समझने की जरूरत है कि राज्य मेंफोर्टीफाईड चावल का वितरण 2021 के शुरुआत में ही पायलट प्रोजेक्ट के रूप में झारखंड के खूंटी जिला में वितरण करना शुरू कर दिया गया था। चावल मैं जो फोर्टीफाईड चावल मिलाया जाता है उसकी जानकारी ना तो ग्राम सभा को पहले दी गई,  और ना ही ग्राम पंचायत से संबंधित अधिकारियों को,  ना ही राशन डीलर को,  ना तो कार्ड धारियों को ।

जब ग्रामीणों ने देखा कि चावल में प्लास्टिक नुमा कुछ चावल से बड़े आकार का चीज उसमें दिखाई दिया तब ग्रामीणों क्षेत्रों में ग्राम सभा के बैनर से विरोध करना शुरू किया , और खाद्य आपूर्ति विभाग पर आरोप लगाना शुरू किया कि सरकार लोगों को प्लास्टिक के मिलावट का चावल बांट रही है। 

 लोगों ने चावल का नमूना लेकर जगह-जगह बैठक करना शुरू किया और सरकार से मांग करने लगे कि प्लास्टिक मिलावट चावल आदिवासी किसान और गरीब तबके के लोगों को हानि पहुंचाने के दृष्टिकोण से दिया जा रहा है । 


यहां इसलिए ऐसा आरोप लगने लगा क्योंकि खाद्य आपूर्ति विभाग ने इसकी जानकारी पहले से राशन कार्ड धारियों को, ग्राम सभा को, और डीलर को भी नहीं दिया था । हम लोगों ने भी इस आरोप को समझने की कोशिश किए क्योंकि खूंटी जिला के मुरहू प्रखंड अंतर्गत गुल्लू गांव में मार्च महीने में ही 15 से 20 गांवों के ग्राम प्रधान और आम राशन कार्ड धारियों ने एक बड़ी बैठक की थी। 

 जिसमें हम लोगों को भी बुलाया गया था और ग्रामीणों ने हम लोगों के सामने चावल का नमूना लेकर आए । कुछ लोगों ने चावल से प्लास्टिक नुमा चावल से बड़े आकार की ठोस वस्तु को चुनकर अलग करके लाया और दिखाते हुए बोले  ,यह प्लास्टिक मिला हुआ चावल है और सभी जानते हैं की प्लास्टिक को अगर गाय खा जाती है तो वह पचती नहीं है और वह पॉयजन/जहर बन जाता है। जिससे गाय भी मर जाती है।

 ग्रामीणों ने कई उदाहरण पेश किए जो गाय, बकरी प्लास्टिक खा के मर गए थे । इस बैठक में यह तय किया गया की इस मामले को हम खाद्य आपूर्ति मंत्री रामेश्वर उरांव, खूंटी के , जिला खाद्य आपूर्ति पदाधिकारी तक पहुंचाएं। यह जिम्मेवारी ग्रामीणों में मुझे दी। मैंने वादा किया कि इस मामले को खूंटी जिला  खाद्य आपूर्ति पदाधिकारी, डीसी और राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री श्री रामेश्वर उरांव जी के पास पहुंचा देंगे। मैंने इसकी कोशिश भी की और खाद्य आपूर्ति मंत्री रामेश्वर उरांव जी से इस मामले पर बात की। श्री उरांव जी ने मुझे आश्वस्त किया कि मैं खूंटी आऊंगा और गांव के लोगों से, डीलर से, और  कार्ड धारियों  से और जहां से भी इस तरह की शिकायतें आ रही है, लोगों में भ्रम है उनके साथ बैठक करेंगे और उन्हें बताएंगे कि फोर्टीफाईड   चावल है।  जो लोगों के कुपोषण को दूर करने के लिए दिया जा रहा है। खाद्य आपूर्ति मंत्री श्री रामेश्वर उरांव जी से बातचीत के बाद  सरकार ने लोगों को जानकारी देने के लिए अखबारों में फोर्टीफाईड चावल देने की जानकारी प्रकाश श करना शुरू कर दिए ।

हिंदुस्तान अखबार, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर में यह जानकारियां छपी जाने लगी। इसके बाद कई इलाकों में विरोध का स्वर कम हुआ। मैंने स्वयं खूंटी की dso रंजीता मेम से भी बात की और उन्होंने मैसेज भेजें की ग्रामीणों को जानकारी दीजिए कि यहां प्लास्टिक मिलावट चावल नहीं है बल्कि कुपोषण दूर करने के लिए सरकार  फोर्टीफाईड चावल दे रही है।

इसके साथ ही सरकार ने टीम बनाकर कई इलाकों में जांच के लिए भेजा और जांच के बाद सरकारी अधिकारियों ने रिपोर्ट जारी किया और ग्रामीणों को बताने की कोशिश किए कि यहां प्लास्टिक मिलावट चावल नहीं लेकिन यह फोर्टीफाईड चावल है।


फोर्टीफाईड चावल का ग्रामीण ने क्यों विरोध करते हैं?

 मैं यहां फिर से इस बात को दोहराना चाहती हूं कि सरकार इस योजना को चुपचाप गांव के बीच में वितरण करना शुरू किया, इस कारण इसका विरोध शुरू किया। दूसरी बात यह भी समझने की जरूरत है कि गांव के लोग कभी अपने शरीर का पूरी तरह से तकनीकी तौर पर बीपी की स्थिति, शुगर की स्थिति, चेक नहीं करते हैं ना ही सरकारी स्वास्थ्य विभाग भी ग्रामीणों को इस मामले में सचेत नहीं करती है। न ही कभी सरकार ग्रामीणों के हेल्थ ठीक रखने के लिए इस तरह के कोई विशेष प्रावधान भी नहीं करती है, की कौन कितना एनेमिक है ? किसका blood pressure का स्थिति क्या है ? शुगर की स्थिति क्या है ? 

इसकी जांच करने के लिए सरकारी व्यवस्था होनी चाहिए। तब सरकार सही तरीके से ग्रामीणों के स्वास्थ्य की जानकारी एकत्र करते हुए उन लोगों को किसको कितना विटामिन? किसको कितना कैल्शियम  देना चाहिए ,ताकि उनका स्वास्थ्य ठीक रहे । इसकी व्यवस्था सरकार को हर पंचायत में   व्यवस्था की जांच करने की व्यवस्था करनी चाहिए। सिर्फ आयरन मिला हुआ चावल देने से ही उनका स्वस्थ है ठीक रहेगा यहां मानना उचित नहीं होगा।

झारखंड में 15 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं

 10 सितंबर 2022

झारखंड के 38,432 anganbadi Kendra Hain

झारखंड में कुपोषण मिटाने के नारे के साथ 2 सितंबर से से पोषण जागरूकता रत निकाला गया। यह हर जिले के प्रखंडों में घूम कर बच्चों को पोषण युक्त भोजन देने का प्रचार प्रसार कर रहा है। इसके लिए आंगनबाड़ी केंद्रों ,सहायिका ,सेविका और आम लोगों को शपथ भी दिलाई जा रही है । 

इसका कारण है कि राज्य में कुपोषण की स्थिति नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 की कुपोषण रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में जीरो 5 वर्ष से कम उम्र वाले 36, लाख 64000 बच्चों में से 42% यानी 15 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। इनमें भी 9 . १ प्रतिशत यानी तीन लाख के करीबी बच्चे अति गंभीर कुपोषण के शिकार हैं ।

दैनिक भास्कर की टीम कुपोषण से लड़ाई के लिए सरकारी अमले के अभियान की पड़ताल करने रांची धनबाद, जमशेदपुर और बोकारो के 55 आंगनबाड़ी केंद्रों तक पहुंचे । पड़ताल में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। पता चला कि आंगनबाड़ी केंद्रों को अप्रैल-मई से प्रति बच्चा मिलने वाली ₹250 की पोषाहार राशि मिली ही नहीं है। चावल निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है लेकिन दाल, सब्जियां ,बदाम ,चना ,गुड़, अंडा आदि आंगनबाड़ी सेविकाओं को उधार पर खरीदनी पड़ रही है।

 उधार ₹10,000 से ज्यादा हो जाने पर दुकानदार ने राशन देना बंद कर दिया , ऐसे में कई जगहों पर बच्चों को सिर्फ दाल भात या खिचड़ी मिल रही है और कई जगह तो वह भी नहीं।