Wednesday, October 5, 2022

फोर्टीफाईड चावल का ग्रामीण ने क्यों विरोध करते हैं?

 झारखंड में अक्टूबर माह से राशन दुकान में फोर्टीफाईड चावल बांटने की योजना है । 

झारखंड में अक्टूबर से चावल का वितरण 25, 238 जन वितरण प्रणाली की दुकानों से प्रारंभ करने की तैयारी राज्य सरकार ने की है। फिलहाल झारखंड के 2 प्रखंडों चाकुलिया और धालभूमगढ़ में जन वितरण प्रणाली की दुकानों में फोर्टीफाईड चावल का वितरण पहले से ही हो रहा है । 16 सितंबर को जमशेदपुर में राज्य स्तरीय कार्यशाला किया गया। जिसमें खास तौर पर इसी बात पर चर्चा की गई कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के घेरे में आने वाले लोगों को फोर्टीफाईड चावल दीया जाना क्यों आवश्यक है।  एक तरह से कार्यशाला के माध्यम से राज्य में जन वितरण प्रणाली की दुकानों में फोर्टीफाईड चावल के वितरण पर सहमति बनाई गई । राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट के तहत सबको भोजन दिलाना ही मुख्य उद्देश्य नहीं, बल्कि सबको  पौष्टिक आहार की भी बात कही गई है ।

क्या है फोर्टीफाईड चावल?

फोर्टीफाईड में आयरन, फोलिक एसिड और बी 12 का मिश्रण किया जाता है । इस चावल में आम चावल की तुलना में आयरन विटामिन b12 , फोलिक एसिड  की मात्रा अधिक है । इसके अलावा जिंक, विटामिन ए, विटामिन बी वाले  फोर्टीफाईड  भी तैयार किए जा सकते हैं। 

 खाने से भोजन में पौष्टिक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है और स्वास्थ्य अच्छा रहता है। 

 वर्ष 2024 तक देश भर में इस योजना को लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।

 यहां यह समझने की जरूरत है कि राज्य मेंफोर्टीफाईड चावल का वितरण 2021 के शुरुआत में ही पायलट प्रोजेक्ट के रूप में झारखंड के खूंटी जिला में वितरण करना शुरू कर दिया गया था। चावल मैं जो फोर्टीफाईड चावल मिलाया जाता है उसकी जानकारी ना तो ग्राम सभा को पहले दी गई,  और ना ही ग्राम पंचायत से संबंधित अधिकारियों को,  ना ही राशन डीलर को,  ना तो कार्ड धारियों को ।

जब ग्रामीणों ने देखा कि चावल में प्लास्टिक नुमा कुछ चावल से बड़े आकार का चीज उसमें दिखाई दिया तब ग्रामीणों क्षेत्रों में ग्राम सभा के बैनर से विरोध करना शुरू किया , और खाद्य आपूर्ति विभाग पर आरोप लगाना शुरू किया कि सरकार लोगों को प्लास्टिक के मिलावट का चावल बांट रही है। 

 लोगों ने चावल का नमूना लेकर जगह-जगह बैठक करना शुरू किया और सरकार से मांग करने लगे कि प्लास्टिक मिलावट चावल आदिवासी किसान और गरीब तबके के लोगों को हानि पहुंचाने के दृष्टिकोण से दिया जा रहा है । 


यहां इसलिए ऐसा आरोप लगने लगा क्योंकि खाद्य आपूर्ति विभाग ने इसकी जानकारी पहले से राशन कार्ड धारियों को, ग्राम सभा को, और डीलर को भी नहीं दिया था । हम लोगों ने भी इस आरोप को समझने की कोशिश किए क्योंकि खूंटी जिला के मुरहू प्रखंड अंतर्गत गुल्लू गांव में मार्च महीने में ही 15 से 20 गांवों के ग्राम प्रधान और आम राशन कार्ड धारियों ने एक बड़ी बैठक की थी। 

 जिसमें हम लोगों को भी बुलाया गया था और ग्रामीणों ने हम लोगों के सामने चावल का नमूना लेकर आए । कुछ लोगों ने चावल से प्लास्टिक नुमा चावल से बड़े आकार की ठोस वस्तु को चुनकर अलग करके लाया और दिखाते हुए बोले  ,यह प्लास्टिक मिला हुआ चावल है और सभी जानते हैं की प्लास्टिक को अगर गाय खा जाती है तो वह पचती नहीं है और वह पॉयजन/जहर बन जाता है। जिससे गाय भी मर जाती है।

 ग्रामीणों ने कई उदाहरण पेश किए जो गाय, बकरी प्लास्टिक खा के मर गए थे । इस बैठक में यह तय किया गया की इस मामले को हम खाद्य आपूर्ति मंत्री रामेश्वर उरांव, खूंटी के , जिला खाद्य आपूर्ति पदाधिकारी तक पहुंचाएं। यह जिम्मेवारी ग्रामीणों में मुझे दी। मैंने वादा किया कि इस मामले को खूंटी जिला  खाद्य आपूर्ति पदाधिकारी, डीसी और राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री श्री रामेश्वर उरांव जी के पास पहुंचा देंगे। मैंने इसकी कोशिश भी की और खाद्य आपूर्ति मंत्री रामेश्वर उरांव जी से इस मामले पर बात की। श्री उरांव जी ने मुझे आश्वस्त किया कि मैं खूंटी आऊंगा और गांव के लोगों से, डीलर से, और  कार्ड धारियों  से और जहां से भी इस तरह की शिकायतें आ रही है, लोगों में भ्रम है उनके साथ बैठक करेंगे और उन्हें बताएंगे कि फोर्टीफाईड   चावल है।  जो लोगों के कुपोषण को दूर करने के लिए दिया जा रहा है। खाद्य आपूर्ति मंत्री श्री रामेश्वर उरांव जी से बातचीत के बाद  सरकार ने लोगों को जानकारी देने के लिए अखबारों में फोर्टीफाईड चावल देने की जानकारी प्रकाश श करना शुरू कर दिए ।

हिंदुस्तान अखबार, प्रभात खबर, दैनिक भास्कर में यह जानकारियां छपी जाने लगी। इसके बाद कई इलाकों में विरोध का स्वर कम हुआ। मैंने स्वयं खूंटी की dso रंजीता मेम से भी बात की और उन्होंने मैसेज भेजें की ग्रामीणों को जानकारी दीजिए कि यहां प्लास्टिक मिलावट चावल नहीं है बल्कि कुपोषण दूर करने के लिए सरकार  फोर्टीफाईड चावल दे रही है।

इसके साथ ही सरकार ने टीम बनाकर कई इलाकों में जांच के लिए भेजा और जांच के बाद सरकारी अधिकारियों ने रिपोर्ट जारी किया और ग्रामीणों को बताने की कोशिश किए कि यहां प्लास्टिक मिलावट चावल नहीं लेकिन यह फोर्टीफाईड चावल है।


फोर्टीफाईड चावल का ग्रामीण ने क्यों विरोध करते हैं?

 मैं यहां फिर से इस बात को दोहराना चाहती हूं कि सरकार इस योजना को चुपचाप गांव के बीच में वितरण करना शुरू किया, इस कारण इसका विरोध शुरू किया। दूसरी बात यह भी समझने की जरूरत है कि गांव के लोग कभी अपने शरीर का पूरी तरह से तकनीकी तौर पर बीपी की स्थिति, शुगर की स्थिति, चेक नहीं करते हैं ना ही सरकारी स्वास्थ्य विभाग भी ग्रामीणों को इस मामले में सचेत नहीं करती है। न ही कभी सरकार ग्रामीणों के हेल्थ ठीक रखने के लिए इस तरह के कोई विशेष प्रावधान भी नहीं करती है, की कौन कितना एनेमिक है ? किसका blood pressure का स्थिति क्या है ? शुगर की स्थिति क्या है ? 

इसकी जांच करने के लिए सरकारी व्यवस्था होनी चाहिए। तब सरकार सही तरीके से ग्रामीणों के स्वास्थ्य की जानकारी एकत्र करते हुए उन लोगों को किसको कितना विटामिन? किसको कितना कैल्शियम  देना चाहिए ,ताकि उनका स्वास्थ्य ठीक रहे । इसकी व्यवस्था सरकार को हर पंचायत में   व्यवस्था की जांच करने की व्यवस्था करनी चाहिए। सिर्फ आयरन मिला हुआ चावल देने से ही उनका स्वस्थ है ठीक रहेगा यहां मानना उचित नहीं होगा।

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