Asam ke chay bagan me jharkhand ke adivasi
pure Asam ka chay bagan inhi asivasi samuday ke mehnat ke bal per chal raha hai. lekin in chy pati todne wale samuday ka dard bhi samajhne ki jarurat hai, jo aaj tak logon ne undekhi hi kar diya hai.
VOICE OF HULGULANLAND AGAINST GLOBLISATION AND COMMUNAL FACISM. OUR LAND SLOGAN BIRBURU OTE HASAA GARA BEAA ABUA ABUA. LAND'FORESTAND WATER IS OURS.
Asam ke chay bagan me jharkhand ke adivasi
pure Asam ka chay bagan inhi asivasi samuday ke mehnat ke bal per chal raha hai. lekin in chy pati todne wale samuday ka dard bhi samajhne ki jarurat hai, jo aaj tak logon ne undekhi hi kar diya hai.
Gaon ka Economy
Gram Swaraj
apna khet, apni kheti, apna khad, apni upaj, apni kolhu, apna pure sudh sarshon ka tel.
सेवा में,
माननीय पंचायती राज मंत्री
श्री आलमगीर आलम पत्रांक-02/2022
झारखंड सरकार दिनांक-28/2/2022
विषय- केंन्द्र की ओर से थोपी जा रही स्वामित्व योजना के तहत प्रोपटी/ संपति कार्ड की जरूरत नहीं- पांचवी अनुसूचि क्षेत्र एवं सीएनटी एक्ट क्षेत्र के आदिवासी बहुल खॅटी जिला में ग्रामसभाओं को सही जानकारी बिना दिये, साथ ही ग्रामसभाओं की सहमति के बिना जबरन ड्रोन से जमीन का सर्वे किया गया है को रð किया जाए, एवं सर्वे कार्य को रोका जाए।
एवं
आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत अधिकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंडारी खूंटी अधिकार, हो इलाके के विलकिनसन रूल्स एवं 5वीं अनुसूचि के अधिकारों सहित 1932 के खतियान का कड़ाई से लागू किया जाए।
महाशय
आप को सादर जानकारी दी जाती है कि अप्रैल 2020 को केंन्द्र सरकार द्वारा घाषित स्वमित्व योजना के तहत डिजिटल इंण्डिया लैंड रिकाॅर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत ड्रोन से गांवों की संपति का सवेक्षेण कर जीअईएस मानचित्र बनाये जाऐगें। साथ ही जमीन मालिको को प्राॅपटी कार्ड बना कर दिया जाएगा। ये जीआईएस नक्से और स्थानीय डेटाबेस ग्राम पंचायतों और और राज्य सरकार के अन्य विभागों द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग किये जाएगें। इस स्वमित्व योजना का कई उदद्वयों के साथ मूल उद्वेश्य एक राष्ट्र एक साॅफटवेयर (One Nation One Software) व्यवस्था करना है।
लेकिन हमारा इतिहास गवाह है कि झारखंड में जल, जंगल, जमीन को आबाद करने का आदिवासी-मूलवासी किसान समुदाय का अपना गैरवशाली इतिहास है। आदिवासी समुदाय खतरनाक जंगली जानवरों से लड़ कर जंगल-झाड़ को साफ कर गाॅंव बसाया, जमीन आबाद किया है। आदिवासी-मूलवासी किसान समुदाय जंगल, नदी, पहाडों की गोद में ही अपने इतिहास, भाषा-संास्कृति, पहचान के साथ विकसित होता है।
प्रकृतिक-पर्यावरण जीवन मूल्य के साथ आदिवासी -मूलवासी समुदाय के ताना-बाना को संरक्षित और विकसित करने के लिए ही छोटानापुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 बनाया गया है। साथ ही भारतीय संविधान में पेसा कानून 1996 एवं पांचवी अनुसूचि में आदिवासी समुदाय के जल, जंगल, जमीन पर इनके खूंटकटी अधिकार सहित अन्य परंपरागत अधिकारों का प्रावधान किया गया है। यही हमारा स्वमित्व का पहचान है।
सर्व विदित है कि आदिवासी समुदाय के जंगल, जमीन, सामाजिक-संस्कृतिक, आर्थिक आधार को संरक्षित एवं विकसित करने के लिए भारतीय संविधान में विशेष कानूनी प्रावधान किये गये हैं। सीएनटी, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून में, फोरेस्ट राईट एक्ट 2006 में, विशेष प्रावधान है। इसके तहत गांव के सीमा के भीतर एवं बाहर जो प्रकृतिक संसाधन है जैसे गिटी, मिटी, बालू, झाड़-जंगल, जमीन, नदी-झरना, सभी गांव की सामुदायिक संपति है। इस पर क्षेत्र के ग्रामीणों का सामुदायिक अधिकार है। ये अधिकार 1932 के खतियान और विपेज नोट में भी दर्ज है।
ये सभी अधिकार आदिवासी समुदाय के लंबे संघर्ष और शहादत के बाद मिला है। खतियान एवं वीलेज नोट में दर्ज सामुदायिक एवं खूंटकटी अधिकार को बचाना जगरूक नागरिकों के साथ राज्य की कल्याणकारी सरकार की भी जिम्मेदारी है।
वर्तमान में लाया जा रहा केंन्द्र सरकार की स्वामित्व योजना का उदेश्य भारत के लिए एक एकीकृत संपति सत्यापन -समाधान के तहत पूरे देश के लिए एक ही डिजिटल लैंण्ड रिकार्ड बनाना है, जो पांचवी अनुसूचि क्षेत्र, एवं सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंण्डारी खूंटकटी अधिकार, हो आदिवासी बहुल क्षेत्र के परंपरागत अधिकारों के खिलाफ है।
ऽ हम सभी नम्रतापूर्वक निम्नलिखित बिंन्द ुओं पर आप का ध्यान खिंजना चाहते हैं- स्वमित्व योजना के कार्यान्वयन के लिए रूपरेखा है, उसमें झारखंड के 5वीं अनुसूचि क्षेत्र के प्रावधानों, सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून के अधिकारों के संबंध में कुछ भी नहीं कहा गया है। याने इन अधिकारों को केंन्द्र की इस योजना पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है।
ऽ आदिवासी परंपरागत व्यवस्था अनुसार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट में भूईहरी जमीन, भूतखेता, डालीकतारी, पहनाई जमीन, महतोई जमीन, बैठखेत जमीन हैं, जो समुदाय के सेवा देने के लिए व्यवस्था किया है। जिसको लगान मुक्त रखा गया है। इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए, सरकार क्या व्यवस्था कर रही है यह स्पष्ट करना होगा।
ऽ मुंण्डारी खूंटकटी क्षेत्र, विलकिनसन रूल, माझी परगना क्षेत्र के परंपरागत आदिवासी समुदाय के जमीन संबंधी व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए क्या व्यवस्था राज्य सरकार कर रही है? जो आदिवासी समुदाय के लिए गंभीर का विषय है।
ऽ बड़ा सवाल यह भी है कि-जो जमीन भूमि बैंक में डाला गया है-वह समुदाय की सामुदायिक संपति है। इसको यथावत समुदाय के हाथ में सुरक्षित रखने का कोई चिक्र या प्रावधान नहीं किया गया है।
ऽ 2014 के बाद लैंण्ड रिकाॅर्ड आॅनलाइन होने के बाद, 1932 के खतियान में दर्ज समुदाय के सामुदायिक अधिकार को डिजिटल खतियान में पूरी तरह से हटा दिया गया है। जो पांचवी अनुसूचि, सीएनटी, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून, मुंण्डारी खूंटकटी अधिकार एवं 1932 के खतियान का अतिक्रमण याने खात्म करने की साजिश है।
ऽ जमीन संबंधित मुददे राज्य सरकार के अधिन है। यह क्षेत्र पांचवी अनुसूचि में है, ऐसे में केंन्द्र सरकार का स्वामित्व योजना को लागू करने के पहले नियमतः जनजातीय परामर्शदात्री समिति -टीएसी में चर्चा होनी चाहिए थी, इसके बाद राज्य में लागू करना था। इसकी जानकारी राज्य आदिवासी समुदाय को भी देनी थी। जो नहीं हुआ।
ऽ आदिवासी-मूलवासी जंगल-जमीन के संबंध में कई समस्याओं से जुझ रहे हैं-2014 के बाद जो भूमि बैंक बना, आखिर किस नीति के तहत बना? क्या सीएनटी, एसपीटी एक्ट में संशोधन कर लाया गया? या पांचवी अनूसूचि के पेसा कानून में संशोधन कर भूमि बैंक बनाया गया? इस सवाल का जवाब कौन देना? राज्य का आदिवासी-मूलवासी समुादाय जानना चाहती है।
संपति कार्ड/प्राॅपर्टी कार्ड लागू होने से आदिवासी इलाके में निम्नलिखित खतरे भविष्य में होगें।
1- परंपरागत ग्रामीण आदिवासी इलाके का डेमोग्राफी -भौगोलिक एरिया पूरी तरह बदल जाएगा-कारण 2016 में ही ग्रामीण इलाके के गैरमरूआ आम भूमि, गैरमरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला, सरना-मसना, ससनदीरी, अखड़ा जैसे सामुदायिक भूमि को चुन-चुन कर भूमि बैंक में डाल दिया गया, जिसका आॅनलाइन खरीद-फरोक्त चरम पर हो रहा है।
2-5 वीं अनुसूचि क्षेत्र, सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंडारी खूंटकटी एवं विलकिसन रूल्स के तहत गांव के सीमा के भीतर के गैर मजरूआ आम, खास, जंगल-झाड़ी, परती-झरती, नदी-नाला आदि सामुदायिक जमीन की, खरीद-फरोक्त के कारण भारी संख्या में अब बाहरी सामुदाय का प्रावेश एवं कब्जा होगा।
3-आदिवासी ग्रामीण इलाके में शहरी आबादी के प्रवेश स,े प्रकृतिक जीवनशैली से जुडे आदिवासी-मूलवासी किसान, दलित समुदाय का परंपरागत सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, आधार टूट जाएगा।
4-ड्रोन सर्वे पूरा होने के साथ ही गांव का नया डिजिटल नक्सा बनेग। इस नये डिजिटल नक्सा और 1932 के खतियान कोई मेल नहीं रहेगा। ताजा उदाहरण है -आॅनलाइन डिजिटल खतियान और 1932 का मैनुअल-आॅफलाइन खतियान। तब निश्चित है कि नया डिजिटल नक्या बनने के साथ ही आदिवासी-मुलवासी समुदाय को, समुदायिक अधिकार देने के साथ एैतिहासक पहचान देने वाला 1932 का खतियान अस्तित्व विहीन हो जाएगा।
5-परिणामस्वरूप आदिवासी समुदाय के अधिकार, सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, पांचवी अनूसूची, मुंडारी खूंटकटी अधिकार, कोल्हान क्षेत्र का विल्किनसन रूल्स स्वता कमजोर हो जाएगा।
6-ड्रोन से सर्वे के बाद में जमीन का मालिकाना हक क्लेम-दावा करने के लिए ग्रामीण आदिवासी, मूलवासी, दलित समुदाय से, अपना जमीन संबंधित संभवता कई तरह के दस्वावेज मागे जाएंगें, भोले-भाले ग्रामीण दस्तावेज पेस नहीं कर पायेगें-ऐसे परिस्थिति में जमीन उनके हाथ से निकल जाएगा।
7-ग्रामीण इलाके में बढ़ते शहरी आबादी के कारण ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था, वन व्यवस्था, जल स्त्रोत एवं पर्यावरणीय व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
8- ग्रामीण आदिवासी इलाके में बड़ी संख्या में बाहरी आबादी के प्रवेश होने से, राज्य में आदिवासी आबादी तेजी से घटेगी, परिणाम स्वरूप आदिवासी सामुदाय की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति स्वतः कमजोर होगा।
फोरेस्ट राईट एक्ट के तहत सरकारी व्यवस्था के सामने दावा साबित नहीं कर पाने के कारण, परंपरागत वासिदे कानून का लाभ नहीं ले पा रहे-इसका ताजा उदाहरण-
1-विगत सुप्रीम कोट का फैसला-जिसमें झारखंड से 1,07,187 लोगों ने दावा पेस किया गया, इसमें 27,809 आवेदकों के दावापत्र रदद करने का फैसला दिया था। कारण कि लोगों ने अपना दावा साबित नहीं कर पाया। इससे बहुत सारी बातों का समझा जा सकता है।
2-जमीन पर कब्जा ग्रामीणों के हाथ में है, जोत-कोड कर रहे हैं, पहले जमीन का रसीद काटता था-अब रसीद काटना बंद कर दिया-
झारखंड में भूमि सुधार कानून के तहत राज्य में लाखों छोटे किसानों को एक-एक एकड, कहीं कहीं दो-तीन एकड़ तक जमीन बंदोबस्त कर दिया गया था। लोग इस जमीन का मलगूजारी रसीद भी काटते थे, लेकिन अब कई इलाके में इस जमीन का रसीद काटना बंद कर दिया गया, और किसानों को उक्त जमीन की बंदोबस्ती संबंधित कई तरह के कागजात मांगें जाते हैं। लोग अधिकारियों के समुख कागजात पेस नहीं कर पा रहे हैं, इस कारण ग्रामीण जमीन का रसीद भी नहीं काट पा रहे हैं।
3-जमीन आॅनलाइन व्यवस्था में भारी गड़बडी-
राज्य में जमीन संबंधित काम-कागज 2014-15 तक आॅफलाइन हो रहा था। जमीन मालिक आॅफलाइन रसीद हल्का करमचारी द्वारा कटवा रहे थे। आॅनलाइन व्यवस्था होने के बाद जमीन का खतियान में भारी गडबडियां हो गयी हैं। किसी का खतियान में रैयत का नाम गलत है, खाता नबंर गलत है, प्लोट नंबर गलत है, जमीन का रकबा भी गलत है। इसको सुधरवाने के लिए लोग अमीन के पास, सीओ के पास दौडते दौडते थक रहे हैं-कोई कार्रवाई नहीं हो रहा है।
4-आॅनलाइन खतियान में गलती के कारण-बहुत से किसान जमीन का मलगुजारी रसीद 4-5 सालों से नहीं कटवा पा रहे हैं।
इस तरह से आदिवासी -मुलवासी, किसान, दलित समाज से जमीन निकल जाएगा। यही नहीं समुदाय का सुरक्षा कवच सीएनटी, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून में मिला अधिकार मुंडारी खूंटकटी अधिकार कागजों में रह जाएगा, लेकिन वास्तविक अधिकार स्वतः खत्म हो जाएगा।
उपरोक्त परिणामों से जमीन का लूट बढेगा। परिवार और समाज में अशांति बढ़ेगा। इससे उत्पन्न परिस्थ्यिों से विस्थापन, पलायन, बेरोजगारी, भूख, भूमिहीन, अस्वस्थ्य, सूखा-आकाल एवं प्रदूषण जैसे महामारी का ही सामना करना पड़ेगा।
हमारी मांगें हैं-
1-केंन्द्र सरकार की नयी स्वामीत्व योजना /प्रोपटी/संपति कार्ड बनाने के लिए आदिवासी बहुल खूंटी जिला में परंपरागत ग्राम सभी एवं आदिवासी किसान संगठनों ने ड्रोन द्वारा जमीन का सर्वे नहीं करने की मांग कर रहे हें, इसलिए बजरन किया गया सर्वे का रदद किया जाए साथ ही तत्काल सर्वे को रोका जाए।
2-1932 के खतियान को यथावत कडा़ई से लागू किया जाए।
3-प्रा्रपाॅटी काडगर्् नहीं -सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंडारी खूंटकटी एवं 5वीं अनुसूची में प्रावधान ग्राम सभा के अधिकारों को कड़ाई से लागू किया जाएं एवं आदिवासी-मूलवासी समुदाय के सामुदायिक अधिकारों को संरक्षित किया जाए।
4-भूमि बैंक को रदद किया जाए-रघुवर सरकार ने गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास जमीन, को भूमि बैंक में शमिल किया गया है, इस भूमि बैंक को रदद किया जाए।
5-क्षेत्र के सभी जलस्त्रोतों, नदी-नाला का पानी लिफट ऐरिगेशन के तहत पाइप लाइन द्वारा किसानों के खेतों तक कृषि विकास के लिए पहुंचाया जाए।
6-आॅनलाइन जमीन के दस्तावेजों का हो रहा छेड़-छाड़ एवं जमीन का हेरा-फेरी बंद किया जाए।
निवेदक
मुंडारी खूंटकटी परिषद, आदिवासी एकता मंच ं
संयुक्त पड़हा समिति एव सभी ग्राम सभाए
सेवा में,
माननीय मुख्यमंत्री
श्री हेमंत सोरेन पत्रांक-02/2022
झारखंड सरकार दिनांक-28/2/2022
विषय- केंन्द्र की ओर से थोपी जा रही स्वामित्व योजना के तहत प्रोपटी/ संपति कार्ड की जरूरत नहीं- पांचवी अनुसूचि क्षेत्र एवं सीएनटी एक्ट क्षेत्र के आदिवासी बहुल खॅटी जिला में ग्रामसभाओं को सही जानकारी बिना दिये, साथ ही ग्रामसभाओं की सहमति के बिना जबरन ड्रोन से जमीन का सर्वे किया गया है को रð किया जाए, एवं सर्वे कार्य को रोका जाए।
एवं
आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत अधिकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंडारी खूंटी अधिकार, हो इलाके के विलकिनसन रूल्स एवं 5वीं अनुसूचि के अधिकारों सहित 1932 के खतियान का कड़ाई से लागू किया जाए।
महाशय
आप को सादर जानकारी दी जाती है कि अप्रैल 2020 को केंन्द्र सरकार द्वारा घाषित स्वमित्व योजना के तहत डिजिटल इंण्डिया लैंड रिकाॅर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत ड्रोन से गांवों की संपति का सवेक्षेण कर जीअईएस मानचित्र बनाये जाऐगें। साथ ही जमीन मालिको को प्राॅपटी कार्ड बना कर दिया जाएगा। ये जीआईएस नक्से और स्थानीय डेटाबेस ग्राम पंचायतों और और राज्य सरकार के अन्य विभागों द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग किये जाएगें। इस स्वमित्व योजना का कई उदद्वयों के साथ मूल उद्वेश्य एक राष्ट्र एक साॅफटवेयर (One Nation One Software) व्यवस्था करना है।
लेकिन हमारा इतिहास गवाह है कि झारखंड में जल, जंगल, जमीन को आबाद करने का आदिवासी-मूलवासी किसान समुदाय का अपना गैरवशाली इतिहास है। आदिवासी समुदाय खतरनाक जंगली जानवरों से लड़ कर जंगल-झाड़ को साफ कर गाॅंव बसाया, जमीन आबाद किया है। आदिवासी-मूलवासी किसान समुदाय जंगल, नदी, पहाडों की गोद में ही अपने इतिहास, भाषा-संास्कृति, पहचान के साथ विकसित होता है।
प्रकृतिक-पर्यावरण जीवन मूल्य के साथ आदिवासी -मूलवासी समुदाय के ताना-बाना को संरक्षित और विकसित करने के लिए ही छोटानापुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 बनाया गया है। साथ ही भारतीय संविधान में पेसा कानून 1996 एवं पांचवी अनुसूचि में आदिवासी समुदाय के जल, जंगल, जमीन पर इनके खूंटकटी अधिकार सहित अन्य परंपरागत अधिकारों का प्रावधान किया गया है। यही हमारा स्वमित्व का पहचान है।
सर्व विदित है कि आदिवासी समुदाय के जंगल, जमीन, सामाजिक-संस्कृतिक, आर्थिक आधार को संरक्षित एवं विकसित करने के लिए भारतीय संविधान में विशेष कानूनी प्रावधान किये गये हैं। सीएनटी, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून में, फोरेस्ट राईट एक्ट 2006 में, विशेष प्रावधान है। इसके तहत गांव के सीमा के भीतर एवं बाहर जो प्रकृतिक संसाधन है जैसे गिटी, मिटी, बालू, झाड़-जंगल, जमीन, नदी-झरना, सभी गांव की सामुदायिक संपति है। इस पर क्षेत्र के ग्रामीणों का सामुदायिक अधिकार है। ये अधिकार 1932 के खतियान और विपेज नोट में भी दर्ज है।
ये सभी अधिकार आदिवासी समुदाय के लंबे संघर्ष और शहादत के बाद मिला है। खतियान एवं वीलेज नोट में दर्ज सामुदायिक एवं खूंटकटी अधिकार को बचाना जगरूक नागरिकों के साथ राज्य की कल्याणकारी सरकार की भी जिम्मेदारी है।
वर्तमान में लाया जा रहा केंन्द्र सरकार की स्वामित्व योजना का उदेश्य भारत के लिए एक एकीकृत संपति सत्यापन -समाधान के तहत पूरे देश के लिए एक ही डिजिटल लैंण्ड रिकार्ड बनाना है, जो पांचवी अनुसूचि क्षेत्र, एवं सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंण्डारी खूंटकटी अधिकार, हो आदिवासी बहुल क्षेत्र के परंपरागत अधिकारों के खिलाफ है।
ऽ हम सभी नम्रतापूर्वक निम्नलिखित बिंन्द ुओं पर आप का ध्यान खिंजना चाहते हैं- स्वमित्व योजना के कार्यान्वयन के लिए रूपरेखा है, उसमें झारखंड के 5वीं अनुसूचि क्षेत्र के प्रावधानों, सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून के अधिकारों के संबंध में कुछ भी नहीं कहा गया है। याने इन अधिकारों को केंन्द्र की इस योजना पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है।
ऽ आदिवासी परंपरागत व्यवस्था अनुसार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट में भूईहरी जमीन, भूतखेता, डालीकतारी, पहनाई जमीन, महतोई जमीन, बैठखेत जमीन हैं, जो समुदाय के सेवा देने के लिए व्यवस्था किया है। जिसको लगान मुक्त रखा गया है। इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए, सरकार क्या व्यवस्था कर रही है यह स्पष्ट करना होगा।
ऽ मुंण्डारी खूंटकटी क्षेत्र, विलकिनसन रूल, माझी परगना क्षेत्र के परंपरागत आदिवासी समुदाय के जमीन संबंधी व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए क्या व्यवस्था राज्य सरकार कर रही है? जो आदिवासी समुदाय के गंभीर का विषय है।
ऽ बड़ा सवाल यह भी है कि-जो जमीन भूमि बैंक में डाला गया है-वह समुदाय की सामुदायिक संपति है। इसको यथावत समुदाय के हाथ में सुरक्षित रखने का कोई चिक्र या प्रावधान नहीं किया गया है।
ऽ 2014 के बाद लैंण्ड रिकाॅर्ड आॅनलाइन होने के बाद, 1932 के खतियान में दर्ज समुदाय के सामुदायिक अधिकार को डिजिटल खतियान में पूरी तरह से हटा दिया गया है। जो पांचवी अनुसूचि, सीएनटी, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून, मुंण्डारी खूंटकटी अधिकार एवं 1932 के खतियान का अतिक्रमण याने खात्म करने की साजिश है।
ऽ जमीन संबंधित मुददे राज्य सरकार के अधिन है। यह क्षेत्र पांचवी अनुसूचि में है, ऐसे में केंन्द्र सरकार का स्वामित्व योजना को लागू करने के पहले नियमतः जनजातीय परामर्शदात्री समिति -टीएसी में चर्चा होनी चाहिए थी, इसके बाद राज्य में लागू करना था। इसकी जानकारी राज्य आदिवासी समुदाय को भी देनी थी। जो नहीं हुआ।
ऽ आदिवासी-मूलवासी जंगल-जमीन के संबंध में कई समस्याओं से जुझ रहे हैं-2014 के बाद जो भूमि बैंक बना, आखिर किस नीति के तहत बना? क्या सीएनटी, एसपीटी एक्ट में संशोधन कर लाया गया? या पांचवी अनूसूचि के पेसा कानून में संशोधन कर भूमि बैंक बनाया गया? इस सवाल का जवाब कौन देना? राज्य का आदिवासी-मूलवासी समुादाय जानना चाहती है।
संपति कार्ड/प्राॅपर्टी कार्ड लागू होने से आदिवासी इलाके में निम्नलिखित खतरे भविष्य में होगें।
1- परंपरागत ग्रामीण आदिवासी इलाके का डेमोग्राफी -भौगोलिक एरिया पूरी तरह बदल जाएगा-कारण 2016 में ही ग्रामीण इलाके के गैरमरूआ आम भूमि, गैरमरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला, सरना-मसना, ससनदीरी, अखड़ा जैसे सामुदायिक भूमि को चुन-चुन कर भूमि बैंक में डाल दिया गया, जिसका आॅनलाइन खरीद-फरोक्त चरम पर हो रहा है।
2-5 वीं अनुसूचि क्षेत्र, सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंडारी खूंटकटी एवं विलकिसन रूल्स के तहत गांव के सीमा के भीतर के गैर मजरूआ आम, खास, जंगल-झाड़ी, परती-झरती, नदी-नाला आदि सामुदायिक जमीन की, खरीद-फरोक्त के कारण भारी संख्या में अब बाहरी सामुदाय का प्रावेश एवं कब्जा होगा।
3-आदिवासी ग्रामीण इलाके में शहरी आबादी के प्रवेश स,े प्रकृतिक जीवनशैली से जुडे आदिवासी-मूलवासी किसान, दलित समुदाय का परंपरागत सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, आधार टूट जाएगा।
4-ड्रोन सर्वे पूरा होने के साथ ही गांव का नया डिजिटल नक्सा बनेग। इस नये डिजिटल नक्सा और 1932 के खतियान कोई मेल नहीं रहेगा। ताजा उदाहरण है -आॅनलाइन डिजिटल खतियान और 1932 का मैनुअल-आॅफलाइन खतियान। तब निश्चित है कि नया डिजिटल नक्या बनने के साथ ही आदिवासी-मुलवासी समुदाय को, समुदायिक अधिकार देने के साथ एैतिहासक पहचान देने वाला 1932 का खतियान अस्तित्व विहीन हो जाएगा।
5-परिणामस्वरूप आदिवासी समुदाय के अधिकार, सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, पांचवी अनूसूची, मुंडारी खूंटकटी अधिकार, कोल्हान क्षेत्र का विल्किनसन रूल्स स्वता कमजोर हो जाएगा।
6-ड्रोन से सर्वे के बाद में जमीन का मालिकाना हक क्लेम-दावा करने के लिए ग्रामीण आदिवासी, मूलवासी, दलित समुदाय से, अपना जमीन संबंधित संभवता कई तरह के दस्वावेज मागे जाएंगें, भोले-भाले ग्रामीण दस्तावेज पेस नहीं कर पायेगें-ऐसे परिस्थिति में जमीन उनके हाथ से निकल जाएगा।
7-ग्रामीण इलाके में बढ़ते शहरी आबादी के कारण ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था, वन व्यवस्था, जल स्त्रोत एवं पर्यावरणीय व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
8- ग्रामीण आदिवासी इलाके में बड़ी संख्या में बाहरी आबादी के प्रवेश होने से, राज्य में आदिवासी आबादी तेजी से घटेगी, परिणाम स्वरूप आदिवासी सामुदाय की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति स्वतः कमजोर होगा।
फोरेस्ट राईट एक्ट के तहत सरकारी व्यवस्था के सामने दावा साबित नहीं कर पाने के कारण, परंपरागत वासिदे कानून का लाभ नहीं ले पा रहे-इसका ताजा उदाहरण-
1-विगत सुप्रीम कोट का फैसला-जिसमें झारखंड से 1,07,187 लोगों ने दावा पेस किया गया, इसमें 27,809 आवेदकों के दावापत्र रदद करने का फैसला दिया था। कारण कि लोगों ने अपना दावा साबित नहीं कर पाया। इससे बहुत सारी बातों का समझा जा सकता है।
2-जमीन पर कब्जा ग्रामीणों के हाथ में है, जोत-कोड कर रहे हैं, पहले जमीन का रसीद काटता था-अब रसीद काटना बंद कर दिया-
झारखंड में भूमि सुधार कानून के तहत राज्य में लाखों छोटे किसानों को एक-एक एकड, कहीं कहीं दो-तीन एकड़ तक जमीन बंदोबस्त कर दिया गया था। लोग इस जमीन का मजगूजारी रसीद भी काटते थे, लेकिन अब कई इलाके में इस जमीन का रसीद काटना बंद कर दिया गया, और किसानों को उक्त जमीन की बंदोबस्ती संबंधित कई तरह के कागजात मांगें जाते हैं। लोग अधिकारियों के समुख कागजात पेस नहीं कर पा रहे हैं, इस कारण ग्रामीण जमीन का रसीद भी नहीं काट पा रहे हैं।
3-जमीन आॅनलाइन व्यवस्था में भारी गड़बडी-
राज्य में जमीन संबंधित काम-कागज 2014-15 तक आॅफलाइन हो रहा था। जमीन मालिक आॅफलाइन रसीद हल्का करमचारी द्वारा कटवा रहे थे। आॅनलाइन व्यवस्था होने के बाद जमीन का खतियान में भारी गडबडियां हो गयी हैं। किसी का खतियान में रैयत का नाम गलत है, खाता नबंर गलत है, प्लोट नंबर गलत है, जमीन का रकबा भी गलत है। इसको सुधरवाने के लिए लोग अमीन के पास, सीओ के पास दौडते दौडते थक रहे हैं-कोई कार्रवाई नहीं हो रहा है।
4-आॅनलाइन खतियान में गलती के कारण-बहुत से किसान जमीन का मलगुजारी रसीद 4-5 सालों से नहीं कटवा पा रहे हैं।
इस तरह से आदिवासी -मुलवासी, किसान, दलित समाज से जमीन निकल जाएगा। यही नहीं समुदाय का सुरक्षा कवच सीएनटी, एसपीटी एक्ट, पेसा कानून में मिला अधिकार मुंडारी खूंटकटी अधिकार कागजों में रह जाएगा, लेकिन वास्तविक अधिकार स्वतः खत्म हो जाएगा।
उपरोक्त परिणामों से जमीन का लूट बढेगा। परिवार और समाज में अशांति बढ़ेगा। इससे उत्पन्न परिस्थ्यिों से विस्थापन, पलायन, बेरोजगारी, भूख, भूमिहीन, अस्वस्थ्य, सूखा-आकाल एवं प्रदूषण जैसे महामारी का ही सामना करना पड़ेगा।
हमारी मांगें हैं-
1-केंन्द्र सरकार की नयी स्वामीत्व योजना /प्रोपटी/संपति कार्ड बनाने के लिए आदिवासी बहुल खूंटी जिला में परंपरागत ग्राम सभी एवं आदिवासी किसान संगठनों ने ड्रोन द्वारा जमीन का सर्वे नहीं करने की मांग कर रहे हें, इसलिए बजरन किया गया सर्वे का रदद किया जाए साथ ही तत्काल सर्वे को रोका जाए।
2-1932 के खतियान को यथावत कडा़ई से लागू किया जाए।
3-प्रा्रपाॅटी काडगर्् नहीं -सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, मुंडारी खूंटकटी एवं 5वीं अनुसूची में प्रावधान ग्राम सभा के अधिकारों को कड़ाई से लागू किया जाएं एवं आदिवासी-मूलवासी समुदाय के सामुदायिक अधिकारों को संरक्षित किया जाए।
4-भूमि बैंक को रदद किया जाए-रघुवर सरकार ने गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास जमीन, को भूमि बैंक में शमिल किया गया है, इस भूमि बैंक को रदद किया जाए।
5-क्षेत्र के सभी जलस्त्रोतों, नदी-नाला का पानी लिफट ऐरिगेशन के तहत पाइप लाइन द्वारा किसानों के खेतों तक कृषि विकास के लिए पहुंचाया जाए।
6-आॅनलाइन जमीन के दस्तावेजों का हो रहा छेड़-छाड़ एवं जमीन का हेरा-फेरी बंद किया जाए।
निवेदक-आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच
मुंडारी खूंटकटी परिषद
आदिवासी एकता मंच ं
संयुक्त पड़हा समिति एव सभी ग्राम सभाए