Saturday, March 15, 2014

संघर्षशील साथियों को मेरा जोहर

संघर्षशील साथियों को मेरा जोहर 
आप लोगों को यह बताने की जरुरत नहीं है की आज हैम और हमारा राज्य और देश किस चुनौती पूर्ण दौर से गुजर रहा है, और हैम लोग यह भी जान  रहे हैं की आने वाला कल को और भी कठिन परिस्थितियों का सामना करना होगा।  हम एक और राज्य के साढ़े तीन करोड़ जनता के मान -सम्मान , हक़ -अधिकार , न्याय , शांति , भाषा -संस्कृति  और गौरवपूर्ण इतिहास को संरक्चित और बिकसित करने कि लड़ाई लड़ रहे है।लेकिन इसमें हम लोगों को जो सफलता मिलनी चाहिए - अब तक मुकाम तक नहीं पहुँच पाये हैं।  दूसरी ओर राज्य  के भ्रस्ट नेता-मंत्री , माफिया , जल -जंगल -जमीन के लुटेरे , कार्पोरेट -पूंजी , सांप्रदायिक ताकतें  दिन दूनी रात चौगुनी ताक़तवर होते जा रहे हैं। 
तब हमें ऐसे गम्भीर परिस्थितियों का सामना करने के लिए हम लोगों को वंहा प्रहार करने कि जरुरत है --जंहा पर खड़ा हो कर वे अपनी ताकत मजबूत करते हैं।  
साथियो हमें पता है कि यह लड़ाई बहुत कठिन है --क्योंकि जनता के थाली का खाना लूट कर , जनता के अधिकारों को लूट कर अपना महल बनाने वाले, अपना बैंक बैलेंस बढ़ने वालें -साम -दाम -दण्ड -भेद की पूरी ताकत लगा कर अपना लूट और भ्रस्ट तंत्र से हमारी ताकत को कुचलने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे --
लेकिन हमें भरोषा है ---उस करो नदी के बहते पानी के जिंदगी पर, हमें भरोसा है--जंगल के एक -एक पेड़ पौधों पर, भरोसा है , डोंबारी बुरु पर, भरोसा है कोयल -करो के शहीद साथियों के सपनो पर, भरोसा है राज्य के तमाम शहीदों के सपनो पर ---जिसको हैम लोगो को पूरा करना ह
आप कि हमारी ईमानदारी , सचाई , न्याय  और संघर्ष ही  हमारी लड़ाई का हथियार है --यही हमारा संघर्ष का पूंजी भी है 
हैम लोगों ने नारा दिया है - लड़ेंगे- जीतेंगे  

Tuesday, February 11, 2014

यही तो है जिंदगी का बसंत, जो हम में जीने की उम्मीदें भरता है। चहकते चिडियों को देख कर गीत गा रहे हैं-छोटे-मोटे पिपाइर गछे -कौआ, मैंना, सुगा भरी गेलैं-कहे-कहे सुगा, मौना से भेलाएं झारगरा, कहे-कहे कौआ, सुगा से भेलायं झागरा


अगघन माह में धन कटनी-मिसनी का काम अंतिम चरण में होता है। पुस माह के कनकनी में चार बजे भोर से बदन में हल्का चादर ओढे खलिहान में बैल-भैंस के साथ दौंरा धान दौंरी करने के आनंद को कोई भी किसान का बेटा जो आज इंजिनियर हैं-उस दिन को याद करते ही मन-बदन में शीतलता  लता का अहसास जरूरता करता है। खलिहान के बगल में धान की भूस की बोरसी में बैल खेदते कनकनी हाथों को सेंकने का याद से ही मन गरम होने लगता है। खलिहान में धान का गांज खत्म होते ही -मदाइत लगाकर पुवाल को गांव के बगल में पुटकल पेड़ पर बने मचान पर चढ़ाने के बाद अब किसान रिलैक्स महसूस करने लगते हैं। कनकनी कम होने लगा है। पुस खत्म होते ही माघ चढ़ गया। ग्रामीण क्षे+त्रों में कई इलाकों में माघ जतरा भी शुरु  होने वाला है। जतरा देखने के लिए पैसे का इंतजाम में ग्रामीण  जुट रहे हैं। पुटकल, कोयनार, कचनार, महुआ, कुसुम, जाम, पलाश   पेड के हरे पत्ते  अब पीले नजर आने लगे हैं। अब सुबह -शाम केवल हल्की ठंड महशुस हा रही है। दिन को सूरज अब अपनी गरमी का अहसास कराने लगा है। 
गांव के इमली पेड़ में अब इमली फल ही ज्यादा नजर आ रहा है। गांव के टोली-महला और टांड में बेर के पेड़ों पर पीला, लाल बेर गांव के बच्चों के साथ गाय-बैल, बकरी, सुवर को भी अपनी ओर खिच रहा है। खेत में अभी काम कम है। जो रवि की फसल लगाये हैं, वे अभी भी खेतों में व्यस्त हैं। पुस माह की ठंड और हल्की बारिस ने जमीन को अभी नमी ही रखा है। ग्रामीण महिलाएं अब आने वाले बरसात के लिए नजदीक के जंगल से लकड़ी-झूरी में जुट जा रही हैं। क्योंकि कुछ दिन के बाद गरमी तेज होने वाली है। साथ ही आने वाले बरसात के में खेती-बारी के लिए खेत-टांड में मांईद भी डालना है। ताकि बरसात शुरू होते ही खेत की जोताई-कोड़ाई हो सके। गड़हा खेत में कहीं कहीं छिपिर छिपिर पानी है-जहां खेसारी का लरंग अभी पचपन से बाहर निकल रहा है। लगता है फूलने की तैयारी में है। गढ़हा-नाला के किनारे किनारे बुट -मटर , आलू, गेहुं, बेलाइंती, बैगन, फूल गोफी, पोटोम कोबी, सलगम मुराइ लहलहा रहा है। इसके बीच बीच में चिमटी साग, दाइल साग भी मन को अपनी ओर खिंच ले रहा है। 
इसी बीच गांव में शादी-विवाह, लगन, नया कुटुब सभी निभाना भी है। परिवारिक, सामाजिक व्यस्त जिंदगी को हमारे प्रकृतिक जीवन सैली ने अपने जिंदगी के साथ हमारे सामाजिक, संस्कृतिक जिम्मेदारियों के साथ बांधता जा रहा है। आम पेड के पुराने पत्ते माघ माह ही झड़ना शुरू हुए। पलाश  के हरे पत्तों में भी अब पीलापन अब गया है। इन पीले पत्तों के बीच काला-काला नुकीली कोमलें निकलने लगी हैं। जंगल की हरियाली भी पीलेपन में तब्दील हो गयी है। हल्की-हल्की पछुवा हवा के झोंके से पेड़ों के पीले पत्ते गिरने लगे हैं। करीब सभी पेड़ों के पुराने पत्ते गिरने लगे हैं-’ाायद इसीलिए लोग अब कहने लगें हैं कि पतझड आ गया है। 
हां -जैसे जैसे पेंड़ों से पत्ते झडने लगें हैं-पूरी प्रकृति -पर्यावरण में नयी जिंदगी की आशाओं की कोंपले भी अपना रूप लेने लगा है। गांव के अगल-अगल के सेमल पेड़ लाल फूलों से लद गया है। किसान अपने आंगन में चरती मुर्गी को देख सोचने लगा है कि-ये अभी अंण्डा नही तो तो अच्छा है-क्योंकि अभी सेंमल फूल के समय घुरनी से चुचा निकालेगी तो -चुचा जिंदा नहीं रह पायेंगे। यह ग्रामीणों में आम सोच बनी हुई है। देखते देखते गांव के आम बागीचा मंजर से ढंक गया है। महुंआ पेड़ में भी रूचू हो चुका है। ढेलकटा, कोरेया और साल के पेड़ दूधिया फूलों से ढ़क चुका है। जगल में लाल -बैगनी पत्तों से लदे कुसुम, महुआ, जाम पेड़ लोगों को संघर्ष करने और जीने का संदेश  देने लगा है। कोयल की  कुहू-कुहू की मधुर आवाज आम के मंजरियों में मंडरा रहे मधु-मखियों में नयी जोश  भर रहा है। कई ऐसे पेड़ हैं-जिसमें नयी पतियों के साथ ही फूल भी खिलने लगे है।
प्रकृतिकमूलक आदिवासी-मूलवासी सामाज की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक जिंदगी भी प्रकृति के जीवनचक्र के साथ ही आग बढ़ता है। प्रकृति-पर्यावरण में नये पत्ते, नये फूलों के साथ ही आर्थिक समृद्वी का भी सहसास होने लगता है। पुटकल साग कोयनार साग साथ साथ निकल आया है। बर, पाकर, पीपल, जाम, डुमाईर पकने लगा हैं। लोग इन पेड़ों के नीचे दिखने लगे हैं, जबकि कुआ, मैना, सुगा पके फलों से लदे डालियों में चहकने लगे हैं। नये पत्ते-फूलो से सजी प्रकृति ने -आदिवासी-मूलवासी सामाज को सरहूल परब मनाने का न्योता भी दिया है। यही तो है जिंदगी का बसंत, जो हम में जीने की उम्मीदें भरता है। चहकते चिडियों को देख कर गीत गा रहे हैं-छोटे-मोटे पिपाइर गछे -कौआ, मैंना, सुगा भरी गेलैं-कहे-कहे सुगा, मौना से भेलाएं झारगरा, कहे-कहे कौआ, सुगा से भेलायं झागरा

दूसरी ओर राज्य पिछड़ रहा है-विकास नहीं हो रहा है, यह दलील देते हुए नेता- मंत्री राज्य को विषेश दर्जा दिलाने का नाटक कर राज्य की जनता को गुमराह किया जा रहा है।

झारखंड अलग राज्य की मांग न सिर्फ भौगालिक रूप से राज्य पूर्नगठन की मांग थी, न सिर्फ सरकारें बनाने की। लेकिन अलग राज्य की लड़ाई झारखंड के इतिहास, पहचान, जल-जंगल-जमीन, की रक्षा के साथ आदिवासी-मूलवासियों के भाषा-सांस्कृति के साथ कृर्षि-पर्यावरण, जलस्त्रोंतों, शिक्चा -स्वास्थ्य, मानव संसाधनों का विकास, विज्ञान-प्रावैधिकी की समुनत विकास के लिए था। झारखंड का दुरभग्य है-कि राज्य बनने के बाद राज्य में 9 मुख्यमंत्री बने, दर्जनों उप मुख्य मंत्री बने। सौकड़ों मंत्री और विधायक बने, लेकिन राज्य के जनमुखी -स्सटेनेबल डबलपमेंट के दिशा  में राज्य को एक कदम भी नहीं बढ़ा सके। राज्य के जनअधिकारों, प्रकृतिक संसाधनों को लूटाने, लुटने, कमीशन बनाने के लिए बारी बारी से नेताओं ने एलांश  करते रहे। लेकिन भ्रष्ट अपराधिक राजनीतिक-प्रशसनिक गंठजोड़ ने राज्य हित में न तो सोचा न ही काम किया। यह मैं नहीं बल्कि सरकार की आॅडिट रिपोर्ट बता रही है। विकास के नाम पर विभागों को जो राशी  आबंटित की जा रही हैं उसको सरकार खर्च नहीं कर पा रही है। दूसरी ओर नेता, मंत्री राज्य में धन की कमी का रोना रोते हैं। जो धन रा’िा राज्य के विकास के नाम पर विभिन्न विभागों को आबंटित की गयी-उसको किस तरह खर्च किया जाए, इस पर नेता-मंत्रियों को कोई रूचि नहीं है। दूसरी ओर राज्य पिछड़ रहा है-विकास नहीं हो रहा है, यह दलील देते हुए नेता- मंत्री  राज्य को विषेश  दर्जा दिलाने का नाटक कर राज्य की जनता को गुमराह किया जा रहा है। 
अलग झारखंड गठन के बाद से विगत 11 वर्षों में विभिन्न विभागों के पास विकास योजनाओं के 146.52 करोड़ रूपये पड़े हुए हैं। आॅडिट रिपोर्ट में 36 विभागों के पास पड़ी हुई इस राशी  को ट्रेजरी में जमा करना जरूरी बताया गया है। 
यह राशी  ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, राजस्व, एवं भूमि सुधार, मानव संसाधन, पंयायती राज, उद्योग, पशुपालन, ग्रामीण कार्य, सूचना एवं जनसंपर्क, परिवहन, समाज कल्याण, कल्याण, वित, कृर्षि, गृह, खेलकूद, निबंधन, विज्ञान-प्रावैधिकी, कार्मिक प्रशासनिक सुधार, श्रम नियोजन, सांख्यिकी विभाग, खाद्य आपूर्ति, सहायता एवं पुनर्वास विभाग की ओर से कोषागार में जमा नहीं करायी गयी है। 
जनकारी के अनुसार 11 सालों में 10 से अधिक विभागों में 15.46 करोड़ रूपये की गड़बडी का मामला भी उजागार हुआ हैं यह राशी  योजनाओं को पूरा करने के लिए संबंधित विभागों को दी गयी थी। विभागों में की गयी वित्तीय अनियमितता के संदर्भ में 139.01 करोड़ रूपयें सरकार वसूल नहीं पायी है। यह आंकडे विभिन्न विभागों के अंकेछण प्रतिवेदन के आधार पर वित बिभाग  की ओर से तैयार किये गये हैं। 
जनकारों के अनुसार इस राशी  से 58 हजार  टयूबवेल और 45 हजार से अधिक इंदिरा आवास बनाये जा सकते थे। 
वित विभाग की रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक राशी  ग्रमीण विकास विभाग  में पड़ी हुई है। सबसे कम राशी  निबंधन विभाग की है।
ग्रामीण विकास विभाग के 73.98 करोड़ रूपये और श्रम विभाग के पास 500 रूपये पड़े हैं। सहायता एवं पुनर्वास विभाग का 23.70 करोड़, राजस्व एवं भूमिं सुधार विभाग का 12.44 करोड़, कल्याण विभाग का 12.99 करोड़, कृर्षि विभाग का 14.31 करोड़, मानव संसाधन विभाग का 4.66 करोड़ रूपय बेकार पड़े हैं। 
अधिक वसूली योग्य राशी  ग्रामीण विकास में
सरकार की ओर से गत 11 वर्षों में ग्रामीण विकास विभाग से सबसे अधिक वसूली योग्य राशी  35.89 करोड़, रूपये ली जाना है, इसी प्रकार कल्याण विभाग से 21.84 करोड़, मानव संसाधन विभाग से 17.25 करोड़, राजस्व एवं भूमिं सुधार विभाग से 24.06 करोड़, परिवहन विभाग से 9.31 करोड़, समाज कल्याण से 1.36 करोड़, गृह विभाग से 14.06 करोड, वन एवं पर्यावरण विभाग से 3.28 करोड़, पथ निर्माण से 2.74 करोड़, कार्मिक विभाग से सरकार को 3.28 करोड़ की वसूली की जानी है। 
अधिक गड़बड़ी पंचायती राज विभाग में-
विगत 11 वर्षों में सबसे अधिक सरकारी रा’िा की गडबड़ी पंचायती राज विभाग में हुई है। वित विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पंचायती राज विभाग में 13.42 करोड़, की गडबड़ी हुई है। इसके अलावा समाज कल्याण विभाग में 36.99 लाख, ग्रामीण विकास में 60.64 लाख, राजस्व एवं भूमिं सुधार विभाग में 28.88 लाख, वित विभाग में 33.92 लाख और कृर्षि विभाग में 24.41 लाख की गड़बड़ी है।

Tuesday, November 19, 2013

इन १३ बर्षो में राज का मुखिया पद आदिवासियों के हाथ में रहा. राज में सैकड़ों आदिवासी मंत्री बने बिभिन बिभागों को संचालित-नियंत्रित करने कि जिम्मेवारी आदिवासियों में ही हाथ में रहा। आदिवासी कल्याण मंत्री भी आदिवासी ही रहे। फिर भी राज में आदिवासियों के हित में बने कानूनों का आदिवासी हित में न तो पालन-लागु किया गया न ही सुरक्छा किया गया.

राज बने  13 साल पुरे  हो गए इन १३ सालों  में ९ आदिवासी मुख्यमंत्री  बने।   इन १३ वर्षों  में नियम अनुसार टी ए सी कि  25 बैठकें होनी चहिये थी।  लेकिन २५ बैठकों  के बदले 12 बैठकें ही कि गयी।   नौ महीने से बैठक नहीं, प्रशासनिक नियंत्रण भी पूरी तरह शिथील है। 
82 सदस्यों वाली झारखंड विधान सभा में 28 विधायक आदिवासी, लेकिन टीएसी प्रभावी नहीं हो सकी। विदित हो की ये 28 विधायक आदिवासी आरक्षित सीट से चुन कर आते हैं। एसटी विधायक भी इसे साफ तौर पर महसूस करते हैं। जनजातीय अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसुचित जनजातियों के प्रशासन  और नियंत्रण में जनजातीय सलाहकार परिषद की भूमिंका सबसे महत्वपूर्ण होती है। लेकिन झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता ने टीएसी को लगभग अप्रभावी बना दिया है। कई बार ऐसा हुआ, जब छह महीने से अधिक समय तक टीएसी की बैठक नहीं हुई है। 
राष्ट्रपति शासन  में नये सिरे से टीएसी के गठन के लिए फाइल बढ़ायी गयी थी। लेकिन विधि परमार्श  लेने में ही मामला लटक गया। इससे पहले 2010 में राष्ट्रपति प्रशसान  के दरम्यान राज्यपाल ने डाॅ रामदयाल मुंडी को टीएसी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था। परिषद की नियमावली के अनुसार साल में कम से कम दो बार टीएसी की बैठक होनी चाहिए। 
टीएसी की जिम्मेदारी
परिषद का यह कर्तव्य होगा  िकवह उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और उन्नति से संबंधित ऐसे विषयों पर सलाह दे सकती है, जो उसको राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किये जायें। मुख्यमुत्री टीएसी के अध्यक्ष और कल्याण मंत्री उपाध्यक्ष होते हैं। इसमें आदिवासी विधायकों को ही सदस्य बनाया जाता है। 
हर माह बैठक का प्रस्ताव
15.07, 2010 को हुई बैठक में कुल 18 प्रस्ताव रखे गये थे। इनमें जनजातीय कमीशन यह तमाम बिकाश योजनाओं  पर बिमर्श , पाँचवी  अनुसूचित क्षेत्र में प्रशासन  को बेहतर बनाने के उपाय तथा टीएसी की बैठक हर महीने हो, इस पर विचार किया  जाना शामिल है , लेकिन यह नहीं हो सका। 
इन १३ बर्षो में राज का मुखिया पद आदिवासियों के हाथ में रहा. राज में सैकड़ों आदिवासी मंत्री बने बिभिन बिभागों को संचालित-नियंत्रित करने कि जिम्मेवारी आदिवासियों में ही हाथ में रहा।  आदिवासी कल्याण मंत्री भी आदिवासी ही रहे।  फिर भी राज में आदिवासियों के हित में बने कानूनों का आदिवासी हित में न तो पालन-लागु किया गया न ही  सुरक्छा किया गया. न ही राज में आदिवासी-मूलवासी-दलित-मेहनतकशों के अधिकारिओं कि गारेंटी के लिए स्थानीय निति बनाये।  झारखण्ड अलग राज कि लड़ाई झारखण्ड के आदिवासी-मूलवासी- के किसानों कि सामाजिक सांस्कृतिक -भाषा-इतिहाश -जल -जंगल-जमीन- कि सुरक्छा और बिकास के लिए लड़ी गयी थी साथ ही किसान -मजदूरों -मेहनतकशों-शोषितों  को न्याय देना ही राज का सपना था ---तब हैम किसको दोस देंगे ? 
स्मीक्षा में दिलचस्पी नहीं
15.07, 2010 को टीएसी की बैठक में आठ विधायकों को विभिन्न जिलों में विकास योजनाओं की समीक्षा कर रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन अधिकतर विधायकों ने समीक्षा कर रिपोर्ट सौंपने में दिलचस्पी नही नहीं दिखायी। टीएसी की अब तक हुई बैठकों में जितने प्रस्वाव पारित हुए या अफसरों को निर्दे’ा दिये वे सभी हवा होते चले गये। 
आज तक हुई बैठक
पहली बैठक 14.02.02 अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी
दूसरी बैठक 24.03.03 व 19.11.03 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
तीसरी बैठक 22.04.05 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
चैथी बैठक 28.01.06 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
पांचवी बैठक 16.01.07 अध्यक्ष मधु कोडा
छठी बैठक 15.03.08 अध्यक्ष मधु कोडा
सतवीं बैठक 15.07.10 कार्य0 अ0 डा. रामदयाल मुंडा
आठवीं बैठक 21.08.10 कार्य0 अ0 डा. रामदयाल मुंडा
नौवीं बैठक 19.04.2.11 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
दसवीं बैठक 16.06.11 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
11वी बैठक 30 01.12 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
12 वीं बैठक 9.11.12 अध्यक्ष अर्जुन मुंडा
 (यह  रिपोर्ट 9 अगस्त 2013 तक कि है )
 

Wednesday, November 13, 2013

जिंदगी में पहली बार गुलाब का फूल लगायी हूँ .

maine 
मैंने २०१३ में अपने घर के पास फूल लगायी -इस फूल का पौधा को मैं पड़ोस के आँगन से उतर कर लायी थी। '
 जुलाई २०१३  को मैं नगड़ी  के  केस की  तारीख  में  उपास्थित होने सिबिल कोर्ट गयी थीं -कोर्ट के बाद मैं बाहर फूल बेचने वालों के पास फूल का गाछी खरीदने जगन के साथ गयी-मैं गुलाब का गाछी देखने लगी।  दुकानदार बोले -दीदी आप पसंद कीजिये।  मैं पूछी इसको कितना में बेचेंगे? दुकानदार बोला -आप पसंद तो कीजिए -मैं बोली आप दम बताएँगे, तब तो मई तय करुँगी-कि किस को कितना ले जाना है। दुकानदार बोले-आप जब हैम लोगों के लिए लड़ रही हैं- तो हम आप से  फूल पैसा क्यों लेंगे।  मैं दुकानदार को सिर्फ देख रही थी-कुछ नहीं बोल प् रही थी।  आगे बोला - आप तो हमको नहीं पहचानेगे -लेकिन मई आप को पहचानता हूँ जिस दिन आप जेल से निकली- मैं  वंही गेट पर था। मैंने तीन गुलाब चुनी- आज तीन में से दो बड़ा हो मैं जिंदगी में पहली बार गुलाब का फूल लगायी हूँ .-
इसको मैं अपने बड़े भाई शुसील के आँगन से पौधा को उखड कर लायी थी --जो निचे है 

Monday, November 11, 2013

jingadi ek bagiya hai--aap sabhi muskurate rahiye--jagat ko apni sugandh se mahkate rahiye-

jindagi  bhi  ek  pulwari  hai----iski  sugandh  sabhi  tak  pahunche---sabhi  nigahon  ko  moh  paye--yahi  jindagi  ka maksad hai 





Monday, November 4, 2013

अगर ऐसा ही करत्ते आ रहे हैं - तब लोकतंत्र कि रक्छा में हम अपना ईमानदारी योगदान नहीं कर रहे हैं।

समाज , राज्य और पूरे  देश में अभी एक ही चर्चा है कि -देश से किस तरह भ्रस्टाचार को जड़ से उखाड़  फेंका जा सकता है - इसके लिए सभी चिंता जाहिर करते हैं -लेकिन सच तो यही है कि -जो राज्य और देश कि बागडोर सँभालने वाले कतई  नहीं चाहत्ते हैं कि -देश से भ्रस्टाचार और भ्रस्टाचरी ख़तम हो जाएँ।  जब चुनाव सामने आता है -तो राजनेतिक पार्टीं उन्ही आदमी को अपना उमीदवार बनाएगा - जो कितना बड़ा गुंडा होगा, कितना हत्या किया है, कितना डाका डालने में बड़ा रेकॉर्ड बना पाया है , कितना छल -बल, छूट -फाँस माँ मास्टर डिग्री हासिल किया है। .आप जनता को कितना ठग सकता है ---यही है उमीदवारों कि - योग्यता।  हाँ हमें भी इस चुनाव में अपने भूमिका तलाशनी चाहिए कि - हम क्या करते हैं ? 
मुझे लगता है कि हैम लोगों को भी अपनी भूमिका - जो अभी तक निभाते आये हैं -उससे ईमानदारी से स्वीकार कर लेना चाहिए।  कि हमने क्या नेताओं के -कहने पर उनके दवारा खड़ा किये - भ्रस्ट , लुटेरे , कातिल, खुनी , डकैत उमीदवारों को ही अपना जनप्रतिनिधि बनाने के लिए -अपना योगदान-किये हैं ???????
अगर ऐसा ही करत्ते आ रहे हैं - तब लोकतंत्र कि रक्छा में हम अपना ईमानदारी योगदान नहीं कर रहे हैं।