VOICE OF HULGULANLAND AGAINST GLOBLISATION AND COMMUNAL FACISM. OUR LAND SLOGAN BIRBURU OTE HASAA GARA BEAA ABUA ABUA. LAND'FORESTAND WATER IS OURS.
Saturday, June 1, 2019
विषय-खूंटी जिला आदिवासी बहुल जिला है, लेकिन जिला की आदिवासी आबादी की संख्या को गलत तरीके से हाईकोर्ट में कम दिखाकर, जिला को ननश्डियूल एरिया बताया जा रहा है, पर हस्तक्षेप किया जाए।---- आज भी न्याय नहीं मिले है संघर्ष करने की जरुरत है
सेवा में,
उपायुक्त महोदय दिनांक-23/9/2014
जिला-खूंटी पत्रांक-01
विषय-खूंटी जिला आदिवासी बहुल जिला है, लेकिन जिला की आदिवासी आबादी की संख्या को गलत तरीके से हाईकोर्ट में कम दिखाकर, जिला को ननश्डियूल एरिया बताया जा रहा है, पर हस्तक्षेप किया जाए।
12 सितंबर 2014 के प्रभात खबर में प्रकाश्ति समाचार से जानकारी मिली है कि प्राथी मो आश्कि अहमद, उपेंन्द्र नाथ महतो व कर्नल लाल ज्योतिंद्र देव व अन्य ने हाईकोर्ट में श्डियूल एरिया निर्धारण के मामले में सवाल उठाया है कि जिलों में आदिवासी आबादी 50 प्रतिषत से कम है, एैसे जिलों को भी किस आधार पर शिडयूल एरिया घोषित किया गया है। इसमें खूंटी जिला को भी शामिल किया गया है, जिसमें रांची और खूंटी जिला दोनों को मिलाकर आदिवासी आबादी 41.81 दिखाया गया है। जिसकी अगली सुनवाई 25 सिंतबर को होने वाला है।
12 सिंतबर 2007 को खूंटी को जिला बनाया गया। खूंटी जिला में 6 प्रखंड हैं। ये सभी प्रखंड़ों में आदिवासी बहुल है। अब खूंटी जिला का अपना अस्तित्व है। 2001 की जनगणा कें आधार पर खूंटी जिला की आबादी 5,30,299 है।
2001 के आधार -जिले में प्रखंडवार आदिवासी आबादी का प्रतिषत है-
1-आड़की प्रखंड--------------79.36
2-खूंटी प्रखंड---------------65.91
3-मुरहू प्रखंड---------------80.64
4-कर्रा प्रखंड---------------73.08
5-तोरपा प्रखंड--------------69.26
6-रनिया प्रखंड--------------70.71
भारत सरकार का 2011 का सेंस्स के आधार पर खूंटी जिला की आदिवासी आबादी 73 प्रतिश्त है।
केंन्द्र सरकार के नियम के अनुसार जिन क्षेत्रों में आदिवासी आबादी 50 प्रतिषत यह 50 प्रतिश्त से अधिक है, एैसे क्षेत्रों को श्डियूल एरिया के अतंर्गत रखा है। उपरोक्त आंकड़े बताते हैं-कि खूंटी जिला पूरी तरह आदिवासी बहुल है, और श्डियूल एरिया के अतंर्गत आता है।
हम यहां यह भी बताना चाहते हैं कि झारखंड में खूंटी जिला ही एक मात्र मुंडा आदिवासी बहुल क्षेत्र है। राजनीति में खूंटी जिला से खूंटी विधानसभा और तोरपा विधानसभा में मुंडा आदिवासी समुदाय हमेशा से नेतृत्व देते आ रहे हैं। यही नहीं खूंटी जिला के आदिवासी समुदाय ने भारत के स्वतं़त्रता संग्राम में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अग्रेजो के खिलाफ उलगुलान कर देश के इतिहास में अपना परचम हलराया है।
परंपरागत से खूंटी जिला आदिवासी बहुल ़क्षेत्र रहा है। इ़स क्षेत्र के आदिवासी समुदाय के जल-लंगल-जमीन पर परंपरागत हक-अधिकार को खूंटकटी अधिकार और सीएनटी एक्ट में प्रावधान किया गया है। यहां के आदिवासी समुदाय के परंपरागत अधिकार के आधार पर ही इस क्षेत्र को पंाचवी अनुसूची क्षेत्र में रखा गया है।
हम खूंटी जिला के आदिवासी-मूलवासी आप से अग्राह करते हैं-कि आदिवासी समुदाय को अपने सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक राजनीतिक और ऐतिहासिक अधिकारों से बंचित करने की कोशिश की जा रही है, इस पर जिला प्रषासन हत्सक्षेप करे, ताकि आदिवासी समुदाय का हम-अधिकारों की रक्षा की जा सके।
निवेदक-
संयोजक
दयामनी बरला आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच
अध्यक्ष-तुरतन तोपनो
उपाध्यक्ष-राजू लोहरा
महासचिव- हादू तोपनो
सचिव--दयाल कोनगाडी
कोषाध्यक्ष-ज्वालन तोपनो
काॅपी किया गया है-
१ -राज्यपाल महोदय
२-क्श्मिनर महोदय
३ -मुख्य सचिव
उपायुक्त महोदय दिनांक-23/9/2014
जिला-खूंटी पत्रांक-01
विषय-खूंटी जिला आदिवासी बहुल जिला है, लेकिन जिला की आदिवासी आबादी की संख्या को गलत तरीके से हाईकोर्ट में कम दिखाकर, जिला को ननश्डियूल एरिया बताया जा रहा है, पर हस्तक्षेप किया जाए।
12 सितंबर 2014 के प्रभात खबर में प्रकाश्ति समाचार से जानकारी मिली है कि प्राथी मो आश्कि अहमद, उपेंन्द्र नाथ महतो व कर्नल लाल ज्योतिंद्र देव व अन्य ने हाईकोर्ट में श्डियूल एरिया निर्धारण के मामले में सवाल उठाया है कि जिलों में आदिवासी आबादी 50 प्रतिषत से कम है, एैसे जिलों को भी किस आधार पर शिडयूल एरिया घोषित किया गया है। इसमें खूंटी जिला को भी शामिल किया गया है, जिसमें रांची और खूंटी जिला दोनों को मिलाकर आदिवासी आबादी 41.81 दिखाया गया है। जिसकी अगली सुनवाई 25 सिंतबर को होने वाला है।
12 सिंतबर 2007 को खूंटी को जिला बनाया गया। खूंटी जिला में 6 प्रखंड हैं। ये सभी प्रखंड़ों में आदिवासी बहुल है। अब खूंटी जिला का अपना अस्तित्व है। 2001 की जनगणा कें आधार पर खूंटी जिला की आबादी 5,30,299 है।
2001 के आधार -जिले में प्रखंडवार आदिवासी आबादी का प्रतिषत है-
1-आड़की प्रखंड--------------79.36
2-खूंटी प्रखंड---------------65.91
3-मुरहू प्रखंड---------------80.64
4-कर्रा प्रखंड---------------73.08
5-तोरपा प्रखंड--------------69.26
6-रनिया प्रखंड--------------70.71
भारत सरकार का 2011 का सेंस्स के आधार पर खूंटी जिला की आदिवासी आबादी 73 प्रतिश्त है।
केंन्द्र सरकार के नियम के अनुसार जिन क्षेत्रों में आदिवासी आबादी 50 प्रतिषत यह 50 प्रतिश्त से अधिक है, एैसे क्षेत्रों को श्डियूल एरिया के अतंर्गत रखा है। उपरोक्त आंकड़े बताते हैं-कि खूंटी जिला पूरी तरह आदिवासी बहुल है, और श्डियूल एरिया के अतंर्गत आता है।
हम यहां यह भी बताना चाहते हैं कि झारखंड में खूंटी जिला ही एक मात्र मुंडा आदिवासी बहुल क्षेत्र है। राजनीति में खूंटी जिला से खूंटी विधानसभा और तोरपा विधानसभा में मुंडा आदिवासी समुदाय हमेशा से नेतृत्व देते आ रहे हैं। यही नहीं खूंटी जिला के आदिवासी समुदाय ने भारत के स्वतं़त्रता संग्राम में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अग्रेजो के खिलाफ उलगुलान कर देश के इतिहास में अपना परचम हलराया है।
परंपरागत से खूंटी जिला आदिवासी बहुल ़क्षेत्र रहा है। इ़स क्षेत्र के आदिवासी समुदाय के जल-लंगल-जमीन पर परंपरागत हक-अधिकार को खूंटकटी अधिकार और सीएनटी एक्ट में प्रावधान किया गया है। यहां के आदिवासी समुदाय के परंपरागत अधिकार के आधार पर ही इस क्षेत्र को पंाचवी अनुसूची क्षेत्र में रखा गया है।
हम खूंटी जिला के आदिवासी-मूलवासी आप से अग्राह करते हैं-कि आदिवासी समुदाय को अपने सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक राजनीतिक और ऐतिहासिक अधिकारों से बंचित करने की कोशिश की जा रही है, इस पर जिला प्रषासन हत्सक्षेप करे, ताकि आदिवासी समुदाय का हम-अधिकारों की रक्षा की जा सके।
निवेदक-
संयोजक
दयामनी बरला आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच
अध्यक्ष-तुरतन तोपनो
उपाध्यक्ष-राजू लोहरा
महासचिव- हादू तोपनो
सचिव--दयाल कोनगाडी
कोषाध्यक्ष-ज्वालन तोपनो
काॅपी किया गया है-
१ -राज्यपाल महोदय
२-क्श्मिनर महोदय
३ -मुख्य सचिव
नॉट ----- आज भी न्याय नहीं मिले है संघर्ष करने की जरुरत है
-पांचवी अनुसूचित में माइनर मिनिरलस पर ग्राम सभा को नियंत्रित-संचालित करने का अधिकार है-
आदिवासी सामाज ने सांप, बिच्छू, बाघ, भालू से लडकर धरती को आबाद किया है-
देश जब अेग्रेज सम्रज्यवाद के गुलामी जंजीर से जकड़ा हुआ था -तब देश को अंग्रेज हुकूमत से आजाद करने के लिए झारखंड के आदिवासी -जनजाति व अनुसूचित जाति समुदाय ने शहादती संघर्ष कर स्वतत्रता संग्राम को मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। शहीद सिद्वू-कान्हू, ंिसदराय-बिंदराय, जतरा टाना भगत, बीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हमारे गांव में हमारा राज-याने जल-जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत अधिकार बरकरार रखने, गांव-समाज को पर्यावरणीय मूल्यों के साथ विकसित करनेे, अपने क्षेत्र में में अपना प्रशासनिक व्यवस्था पुर्नस्थापित करने, कर अपना भाषा-संस्कृति के साथ संचालित-नियंत्रित एवं विकसित करने का सपना था।
आजाद देश के राजनीतिज्ञों, बुधीजीवियों, एवं संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि-देश का विकास, शांति-व्यवस्था एक तरह के कानून से संभव नहीं हैं-इसीलिए देश में दो तरह के कानून बनाये गये। एक सामान्य कानून जो सामान्य क्षेत्र के लिए दूसरा विशेष कानून जो विशेष क्षेत्र के लिए बनाया गया। प्रकृतिकमूलक आदिवासी बहुल एरिया को विशेष क्षेत्र में रखा गया। इन क्षेत्रों पांचवी अनुसूचि तथा छठी अनुसूचि में बांटा गया।
इसी अनुसूचि क्षेत्र में छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम, संताल परगना अधिनियम और पेसा कानून भी है। ये सभी कानून आदिवासी, मूलवासी, दलित, मच्छूवरा सहित 33 आदिम जनजाति समुदायों के अधिकारों रक्षा के लिए है।
लेकिन- हर स्तर पर इन कानूनों को वयलेषन-हनन किया गया
देश के विकास का इतिहास गवाह है-जबतक आदिवासी समाज अपना जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा रहता है-तबतक ही वह आदिवासी अस्तित्व के साथ जिंदा रह सकता है। आदिवासी सामाज को अपने धरोहर जल-जंगल-जमीन से जैसे ही अलग करेगें-पानी से मच्छली को बाहर निकालते ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देता है-आदिवासी सामाज भी इसी तरह अपनी धरोहर से अलग होते ही स्वतः दम तोड़ देता है।
विकास वनाम विस्थापन
अधिग्रहीत जमीन-एकड़ में---
1-एचईसी हटिया-9500 एकड़
2-बोकारो स्टील प्लांट-34227 एकड़
3-दमोदर घाटी निगम-2,88,874
4-आदित्यपुर औधोकि क्षेत्र-34,432
5-सुर्वणरेखा परियोजना-85,000
6-खनन के कारण--लाखों एकड़
7-शहरीकरण के द्वारा-लाखों एकड़-कोई हिसाब नहींl
विस्थापित आबादी-80 लाख से ज्यादा
1967 में हटिया के ३० गांव को बिस्थपित कर हैवी इंजनेयरिंग कार्पोरेशन {एच ० ई ० सी ० } की इस्थापना की गयी थी , आज बिस्थपितिओं की यह हल है , न इनका घर है ,न रोजगार ही य
यह है एच ० ई सी ० बिस्थपितों को बसाया गया नायसराय कॉलोनी {पुनर्वासित कॉलोनी } यह तस्बीर २०१७ को खींची गयी है
आदिवासी -मूलवासी किसान, जनजाति, अनुसूचित जाति- समुदाय का सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक, एतिहासिक मूल्य प्रकृति-जल-जंगल-जमीन-नदी-पहाड पर ही टिका हुआ है। इसे उजड़ते ही सबकुछ नष्ट हो जाता है।
विस्थापितों पर सामाजिक, राजनीतिक, संस्कृतिक, आर्थिक प्रतिकुल प्रभाव--सामुहिकता टुटा
ऽ सामाजिक मूल्य खत्म हुआ
ऽ भाषा-संस्कृति खत्म हुआ
ऽ इतिहास खत्म हुआ
ऽ पहचान खत्म हुआ
ऽ आर्थिक स्त्रोत/आधार खत्म हुआ
ऽ जैविक संपदा खत्म हुआ
ऽ जलस्त्रोत प्रदूषित हो गया
ऽ जमीन मालिक जमीन विहीन हो गये
ऽ बंधुआ मजदूर बन गये
ऽ महिलाएं -रेजा, और जूठन धोने वाली आया बन गयीं
ऽ युवातियां यौन शोषन और हर स्तर पर हिंसा का शिकार बनी
ऽ भारी संख्या में विस्थापित राज्य से
ऽ आदिवासी आबादी अल्पसंख्यक होता जा रहा है-बहरी आबादी आदिवासी समुदाय पर हावी होता जा रहा है।
ऽ राजनीतिक चेतना कमजोर हुआ
ऽ आज -राजनीति दिशा, विकास योजनाओं का नीति, के साथ अन्य अधिकारों को निर्धारित करने का आधार समुदाय के जनसंख्या को ही पैमाना माना जा रहा है।
उदा0-डीलिमिटेशन-1- मांग उठ रहा है-81 विधानसभा सीट में से 28 सीट आदिवासी समुदाय के लिए अरक्षित है-लेकिन 28 सीट को घटाकर 21 सीट कियी जा रहा है-दलील दिया जा रहा है-राज्य में सिर्फ आदिवासी आबादी मात्र 26 प्रतिशत ही रह गया है, इसलिए छोटी आबादी के लिए 28 सीट रिर्जब रखना सही नहीं है।
2-14 लोक सभा सीट में से 4 सीट आदिवासी सामाज के लिए अरक्षित है-इसमें से 2 सीटी घटाने की वाकालत की जा रही है-
3-आदिवासी बहुल क्षेत्र में आदिवासी सामाज अपने धरोहर के साथ, अपने परंपारिक सामाजिक मूल्यों और अधिकारों के साथ ही आदिवासी सामाज को विकास हो, इसके लिए भारतीय संविधान ने झारखंड के आदिवासी सामाज को 5वीं अनूसूची के तहत-सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक , ग्राम सभा को विशेष अधिकार मिला है-इसको खत्म करने के लिए झारखंड़ हाई कोर्ट में पीआईएल किया गया है-तर्क दिया जा रहा है कि-राज्य के कई जिलों में आदिवासी आबादी 50 प्रतिशत से कम है-एैसे में उन जिलों को अनुसूचि क्षेत्र का दर्जा नहीं दिया जाए।
अगर 5वीं अनूसूचि को खत्म कर दिया जाएगा-तो उपरोक्त तमाम प्रतिकुल प्रभाव आदिवासी -मूलवासी समुदाय पर पडेगा, परिणमता-आने वाले समय में आदिवासी समुदाय के अस्तित्व बचे रहने की कल्पना नहीं की जा सकती है-
एसएआर कोर्ट-झारखंड में आदिवासी समुदाय के जमीन-जंगल को गैर कनूनी तरीके से छिने जाने को रोकने के लिए एसएआर कोर्ट है, जो आज सीएनटी एक्ट के तहत आदिवासी समुदाय के मालिकाना अधिकार को बनाये रखने का न्यूनतम व्यवस्था है, इससे भी यदि खत्म किया जाए-तब झारखंड के आदिवासी समुदाय के अधिकारों को संरक्षित करने का दावा बेईमानी होगा।
एसएआर कोर्ट को खत्म करने की जगह-जरूरत है, इस व्यवस्था या संस्थान में जिस भ्रष्टचार यह भ्रष्टव्यवस्था, लचर व्यवस्था के कारण आदिवासी ठके जा रहे हैं-इस भ्रष्टव्यवस्था को खत्म करने के साथ लचर व्यवस्था को न्यायपूर्ण बनाने की।
विस्थापितों को नौकरी-मुआवजा, घर अन्य सुविधाएं उपलब्ध करने का सरकारी वादा-
नौकरी में लेने की पद्वती-
क-जमीन लेने के पहले-सरकारी वादा-हर विस्थापित परिवार से एक व्यत्कि को
ख-विस्थापितों को पीढ़ी दर पीढ़ी नौकरी देने का वादा.......
वस्तविकता--
क-जो व्यत्कि सत्क्षार में योग्य साबित होता है उसको नौकरी, पदों की संख्यानुसार
ख-मुश्किल से परिवार के एक व्यत्कि को सिंर्फ एक बार.....इसके बाद सिर्फ माफिया या अफसरों के नाते-रिस्तदारों को ही ..........नौकरी
जमीन रहने के लिए----राज्य में जिस भी विकास योजनाओं से ग्रामीण विस्थापित हुए हैं---उन विस्थापितों को प्रत्येक परिवार को रहने के लिए सिर्फ --10 डिसमिल, 15 डिसमिल अधिकतम 20 डिसमिल जमीन दिया गया-
नोट-आज तक इस उक्त जमीन का कानूनी मलिकाना हक विस्थापितों को नहीं मिला--जमीन उनके नाम से रजिस्र्ट नहीं किया गया
परिणामता---विस्थापितों के जमीन का दबांग लोग उनके हाथ से छीन कर अपने कब्जा में ले रहे हैं, यह दूसरे को बेच रहे हैं।
विस्थापित परिवार--दूसरी बार सरकार के गैर जिम्मेदराना रवैया के कारण उनकी बची-खूची जिंदगी छिना जा रहा है
पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में सरकार द्वारा-विभिन्न विकास योजनाओें के लिए एमओयू करना--आदिवासियों के अधिकार, ग्राम सभा के अधिकारों का वायलेशन-हनन है-
पांचवीं अनुसूचि क्षेत्र में भारतीय संविधान के ग्राम सभा को अधिकार दिया है-कि कहीं भी किसी भी विकास योजना के लिए उत्क ग्राम सभा क्षेत्र यह आदिवासी क्षेत्र में जमीन दिया जाए या ना दिया जाए ...यह तय करने का अधिकार ग्राम सभा को है-
लेकिन- जमीन अधिग्रण के संबंध में ग्राम सभा से न तो पूछा जाता है और न ही उनकी राय को मानी जाती है--
सरकार ग्राम सभा बुलाती भी है-तो रैयतो की राय नहीे मानी जाती है, सरकारी पक्ष उसी निर्णय को रैयतों को थोपते हैं-जो अधिकारी चाहते हैं-सिर्फ नाम के लिए ही बैठक होता है।
माइनर-मिनिरलस-पांचवी अनुसूचित में माइनर मिनिरलस पर ग्राम सभा को नियंत्रित-संचालित करने का अधिकार है-
ऽ लेकिन-अनुसूचि क्षेत्र के सभी बालू घाटों की निलामी की गयी
ऽ पत्थर-खदान यह के्रशर--सभी पत्थर के्रशरों या खदानों को लीजधारको को दी गयी
शहरीकारण का विकास के लिए अनुसूचि क्षेत्र के कृर्षि भूमिं को-गैर कृर्षि कार्य के लिए--
ऽ कृर्षि भूमिं का प्रकृति बदल कर हस्तंत्रित कर -भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी किसान समुदाय को विस्थापित किया जा रहा है
ऽ यह सीधे तौर पर आदिवासी मूलवासी, दलित, किसानों के अधिकारों का हनन है
कंपनियों के परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण की छूट
अब सरकार कंपनियों को स्वंय ही जमीन मालिकों से जमीन खरीदने के लिए छूट दे दी है-साम, दाम, दंड भेद अपना कर कंपनी के लठैत, बिचैलिया रैयतों से जमीन औने पौन कीमत पर जमीन जबरन हड़प रहे हैं।
ख-जो रैयत जमीन नहीं बेचना चाहता है, या नहीं छोड़ना चाहता है-उसके पुलिस बल प्रयोग कर, आतंक पैदाकर, छूठे मुकदमों में फंसा दिया जा रहा है
सभी तरफ से सरकार, प्रशासन कंपनीवाले मिलकर जमीन मालिकों के उपर दमन के कंपनी के लिए जमीन कब्जा दिला रहे हैं
इसका उदाहरण-बोकारो के चंदनकियारी प्रखंड में एल्केट्रो स्टील द्वारा जबरन जमीन अधिग्रण का विरोध करने वाले गांव भागाबांध को जा कर देखा जा सकता है
इस तरह के सौकड़ों उदाहरण राज्य भर में मिलेगा
गांव-आदिवासी गांव का मतलब -गांव सीमाना के भीतर एक-एक इंच जमीन, मिटी, गिटी, बालू, पत्थर, घांस-फूस, झाड- जंगल मिलाकर गांव बनता है-
इसी के आधार पर राज्य के आदिवासी बहुल गांवों का अपना परंपरिक मान्यता है। गांव घर को आबाद करने वाले आदिवासी समुदाय के पूर्वजों ने सामाजिक-पर्यावरणीय जीवनशैली के ताना बाना के आधार पर गांव बसाये हैं।
सामाज के बुजूगों ने अपने गांव सीमा को खेती-किसानी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर व्यवस्थित किये हैं-
क-घरो को एक तरफ बासाया गया-
जहां हर जाति-धर्म समुदाय बास करता है
ख-खेत-टांड एक तरफ
गंाव सीमा भीतर के कुछ खेत-टांड को गैराही रखा, कुछ को परती रखे-ताकि गा्रमीण सामुदायिक उपयोग करे। जिसमें नदी-नाला, तालाब, कुंआ-आहर, सरना-मसना, खेल मैदान, खलिहान, अखड़ा बाजार, जतरा, मेला, चरागाह आदि के लिए।
इसी के आधार पर राज्य में आदिवासी सामाज का जमीन को आबाद करने का अपना परंपरिक व्यास्था है यही नहीं इसका अपना विशिष्ट इतिहास भी है।
रैयती जमीन
खूंटकटीदार मालिकाना
विलकिंगसन रूल क्षेत्र
गैर मजरूआ आम
गैर मजरूआ खास
परती
जंगल-झाड़ी भूंमि-सामुदाय की समूहिक धरोहर
नोट-1932 में जो सर्वे सेटेलमेंट हुआ-इस रिकोर्ड के आधार पर जमीन को उपरोक्त वर्गों में बांटा गया। उस समय लोगों की आबादी कम थी। कम परिवार था। 84 साल पहले जमीन को चिन्हित किया गया था-कि ये परती है, जंगल-झाडी भूमिं है।
84 वर्ष में जो भी परती-झारती था, अब वो आबाद हो चूका है। अब उस जमीन पर बढ़ी आबादी खेती-बारी कर रही है।
गैर मजरूआ आम भूंमि पर तो गांव के किसानों को पूरा अधिकार है ही, गैर मजरूआ खास जमीन पर भी ग्रामीणों का ही हक है।
आज सरकार विकास के नाम पर लैंड बैंक---बना कर आदिवासी समुदाय के हाथ से उनका जमीन-जंगल छीन कर उद्योपतियों को देने का योजना बना रही हैं-इसे आदिवासी समाज पूरी तरह कमजोर हो जाएगा
षिक्षा की स्थिति-
ग्रामीण इलाकों के स्कूल चाहे प्राइमरी हो, प्रथमिक हो, उच्चविद्यालय हो -सभी का पठन-पाठन स्थिति दयनीय है-गुणवता बिलकूल कमजोर है
सरकार का आदेश-8वी क्लास तो किसी फेल नहीं करना-सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को पंगु बनाने की साजिश है
3-काॅलेजों की स्थिति-खूंटि काॅलेज
खूंटि बिरसा काॅलेज -8000 विद्यिर्थी हैं-इसमें 70 प्रतिशत महिलाएं हैं-इनके लिए 300 बेड का हाॅस्टल बना है क्लयाण विभाग से
ल्ेकिन इस हाॅस्टल में सीआरपीएफ को रखा गया--होस्टल के लिए -जरूरी उपस्कर विभाग आज तक नही दे सकी
स्वस्थ्य की स्थिति-25 हजार की आबदी में हर प्रखं डमें रेफरल अस्पताल है-लेकिन वहां न तो डाक्टर, न नर्स कोई नहीं रहता-
अस्पताल में-मलेरिया टेस्ट करने का मशीन नहीं
यहां तक कि हडी टुटने पर एक्स्रे मशीन भी नहीं
स्ूाचना अधिकार कानून---
ऽ सूचना कभी भी समय पर नहीं दिया जाता है
ऽ विकास योजनाओं पर आधिकारी फर्जी सूचना उपलब्ध कराते हैं
मनरेगा कानून का पालन नहीं--
ऽ 100 दिनों का रोजगार मजदूरों को कभी नहीं मिलता
ऽ किये गये काम का मजदूरी-भी नहीं मिला, मजदूरों का पैसा-ठेकेदार-दलाल हडप लेते हैं
ऽ 50 दिनों को -बेरोजगार कहीं लागू नहीं किया गया
आदिवासी उपयोजना--
1975-80 के दौरान अनुसूचित जाति उप योजना व आदिवासी उप-योजना आरंभ की गयी। इसका उद्वेश्य-अनुसूचित जातियो व जनजातियों की जनसंख्या में प्रतिशत के अनुपात में बजट का न्यायसंगत हिस्सा इन समुदयों की भलाई व विकास के सही प्राथमिकता के कार्यों के लिए उपलब्ध हो।
लेकिन-हर वर्ष इस राशि का 40-50 प्रतिशत ही खर्च होता है-बाकी सरेडर हो जाता है
इस राशि का उपयोग-दूसरे मदों-फलाई ओवर व हाईवे
जेल, बड़े पैमाने का मिठाई वितरण, पशुओं के इंजैक्शन और कामनवैल्थ खेलों में खर्च होते रहे।
आज किसी भी योजना को सरकार मनमनी ढ़ग से लागू करती है-
ऽ चाहे परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला हो
ऽ यह कोई भी विकास योजनाओं को लागू करने मामला हो,
ऽ सरकार हमेशा आम जनता को उत्पीडीत करने वाले तत्वों को संरक्षण देने का काम करते रही है
ऽ अगर आज जनता सरकार की मनमनी के खिलाफ, भष्ट व्यवस्था, या भ्रष्ट नेता, मंत्रियों के खिलाफ आवाज बुलंद करती है-तब उसे फोल्स केस में फंसा कर जेल भेज देती है
ऽ आज कल-तो आवाज उठाने वालों को नक्सली करार दिया जा रहा है-
ऽ आज-राज्य के जेलों में 600 बेकसुर आदिवासी जेल में बंद हैं
अनुसूचित क्षेत्रों में शांति-व्यवस्था और सुशासन को सुद्वढ़ करने का उपाय---
1-पांचवी अनूसूचि में प्रदत अधिकारों को अनुसूचि क्षेत्र में अक्षरशा पालन किया जाए
2-सीएनटी एक्ट के धारा 46 को कड़ाई से लागू किया जाए
3-पेसा कानून के तहत ग्राम सभाओं को प्रदत अधिकारों का अक्षरशा पालन हो
4-एसपीटी एक्ट का पालन हो
5-वन अधिकारी कानून के तहत ग्रामीणों को समुदायिक पटा तथा खेती के लिए मिनिमम 2 हेक्टेयर जमीन का पटा दिया जाए
6-आदिवासी उप-योजना का राशि -पूरी राशि हर बजट एलोकेशन का सही लाभकारी कार्यो में खर्च किया जाए
7-जनसूचना आयूक्त आदिवासी समुदाय से ही नियुक्त किया जाए
8-लगत या फर्जी सूचना देने वाले अधिकारियों पर कड़ाई से कार्रवाई की जाए
9-प्रत्येक प्रखंड स्तर पर अस्पतालों, प्रखडों, पंचायतों में स्थानीय कर्मचारियों का नियुक्ति किया जाए
10-भाषा-सस्कृति के आधार पर स्थाीनयता निति लागू किया जाए
11-भूमिं अधिग्रहण कानून-2013 को लागू किया जाए
12-भूमिं अधिग्रहण कानून-2013 के सेक्शन-24 के तहत-नगड़ी में गलत तरीके से अधिग्रहीत 150 एकड़ किसानों की जमीन-रैयतों को वापस किया जाए
13-नगड़ी में लाॅ यूनिवरसिटी के लिए जबरन किसानों ली गयी जमीन का कीमत वर्तमान बाजार मूल्य एक लाख प्रति डिसमिल के दर से भूगतान किया जाए-तथा विस्थापित रैयतों के परिवार को पीढ़ी दर पीढ़ी प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी दिया जाए
14-राज्य में-सभी परियोजनाओं से , पूर्व में हुए तमाम विस्थापितों को -पुर्नवासित तथा नौकरी दिया जाए। जब तब पूर्व के विस्थापितों को नौकरी और पुर्नवासित नहीं किया जाएगा-दूसरा विस्थापन नहीं किया जाए
15-सरकारी जमीन, परती जमीन, जंगल-झाड़ी जमीन, गैर मजरूआ आम, खास जमीन को स्थानीय ग्राम सभा, बेघर वालों, गरीबों, बीपलएल परिवार तथा विस्थापित परिवारों को आबंटित किया जाए--किसी बड़े पूजिंपति, कारपोरेट या सक्षम को नहीं
16-मुंडारी खूंटकटी व्यवस्था के साथ छेड-छाड़ नहीं किया जाए
17-हो आदिवासी ईलाके में विलकिंशन रूल सक्षम है-के साथ छेड-छाड नहीं हो
18-ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने तथा रोजगार व्यवस्था के लिए-नदी-नालों में छोटे छोटे चेक डैम बना कर पानी किसानों के खेतो तक पहुचाया जाए
19-शिाक्ष तथा स्वस्थ्य का नीजिकरण नहीं किया जाए
दयामनी बरला
न्यू गार्डेन सिरोम टोली
क्लब रोड़ रांची-1
मे0 9431104386
देश जब अेग्रेज सम्रज्यवाद के गुलामी जंजीर से जकड़ा हुआ था -तब देश को अंग्रेज हुकूमत से आजाद करने के लिए झारखंड के आदिवासी -जनजाति व अनुसूचित जाति समुदाय ने शहादती संघर्ष कर स्वतत्रता संग्राम को मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। शहीद सिद्वू-कान्हू, ंिसदराय-बिंदराय, जतरा टाना भगत, बीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हमारे गांव में हमारा राज-याने जल-जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत अधिकार बरकरार रखने, गांव-समाज को पर्यावरणीय मूल्यों के साथ विकसित करनेे, अपने क्षेत्र में में अपना प्रशासनिक व्यवस्था पुर्नस्थापित करने, कर अपना भाषा-संस्कृति के साथ संचालित-नियंत्रित एवं विकसित करने का सपना था।
आजाद देश के राजनीतिज्ञों, बुधीजीवियों, एवं संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि-देश का विकास, शांति-व्यवस्था एक तरह के कानून से संभव नहीं हैं-इसीलिए देश में दो तरह के कानून बनाये गये। एक सामान्य कानून जो सामान्य क्षेत्र के लिए दूसरा विशेष कानून जो विशेष क्षेत्र के लिए बनाया गया। प्रकृतिकमूलक आदिवासी बहुल एरिया को विशेष क्षेत्र में रखा गया। इन क्षेत्रों पांचवी अनुसूचि तथा छठी अनुसूचि में बांटा गया।
इसी अनुसूचि क्षेत्र में छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियम, संताल परगना अधिनियम और पेसा कानून भी है। ये सभी कानून आदिवासी, मूलवासी, दलित, मच्छूवरा सहित 33 आदिम जनजाति समुदायों के अधिकारों रक्षा के लिए है।
लेकिन- हर स्तर पर इन कानूनों को वयलेषन-हनन किया गया
देश के विकास का इतिहास गवाह है-जबतक आदिवासी समाज अपना जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा रहता है-तबतक ही वह आदिवासी अस्तित्व के साथ जिंदा रह सकता है। आदिवासी सामाज को अपने धरोहर जल-जंगल-जमीन से जैसे ही अलग करेगें-पानी से मच्छली को बाहर निकालते ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देता है-आदिवासी सामाज भी इसी तरह अपनी धरोहर से अलग होते ही स्वतः दम तोड़ देता है।
विकास वनाम विस्थापन
अधिग्रहीत जमीन-एकड़ में---
1-एचईसी हटिया-9500 एकड़
2-बोकारो स्टील प्लांट-34227 एकड़
3-दमोदर घाटी निगम-2,88,874
4-आदित्यपुर औधोकि क्षेत्र-34,432
5-सुर्वणरेखा परियोजना-85,000
6-खनन के कारण--लाखों एकड़
7-शहरीकरण के द्वारा-लाखों एकड़-कोई हिसाब नहींl
विस्थापित आबादी-80 लाख से ज्यादा
1967 में हटिया के ३० गांव को बिस्थपित कर हैवी इंजनेयरिंग कार्पोरेशन {एच ० ई ० सी ० } की इस्थापना की गयी थी , आज बिस्थपितिओं की यह हल है , न इनका घर है ,न रोजगार ही य

यह है एच ० ई सी ० बिस्थपितों को बसाया गया नायसराय कॉलोनी {पुनर्वासित कॉलोनी } यह तस्बीर २०१७ को खींची गयी है
आदिवासी -मूलवासी किसान, जनजाति, अनुसूचित जाति- समुदाय का सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक, एतिहासिक मूल्य प्रकृति-जल-जंगल-जमीन-नदी-पहाड पर ही टिका हुआ है। इसे उजड़ते ही सबकुछ नष्ट हो जाता है।
विस्थापितों पर सामाजिक, राजनीतिक, संस्कृतिक, आर्थिक प्रतिकुल प्रभाव--सामुहिकता टुटा
ऽ सामाजिक मूल्य खत्म हुआ
ऽ भाषा-संस्कृति खत्म हुआ
ऽ इतिहास खत्म हुआ
ऽ पहचान खत्म हुआ
ऽ आर्थिक स्त्रोत/आधार खत्म हुआ
ऽ जैविक संपदा खत्म हुआ
ऽ जलस्त्रोत प्रदूषित हो गया
ऽ जमीन मालिक जमीन विहीन हो गये
ऽ बंधुआ मजदूर बन गये
ऽ महिलाएं -रेजा, और जूठन धोने वाली आया बन गयीं
ऽ युवातियां यौन शोषन और हर स्तर पर हिंसा का शिकार बनी
ऽ भारी संख्या में विस्थापित राज्य से
ऽ आदिवासी आबादी अल्पसंख्यक होता जा रहा है-बहरी आबादी आदिवासी समुदाय पर हावी होता जा रहा है।
ऽ राजनीतिक चेतना कमजोर हुआ
ऽ आज -राजनीति दिशा, विकास योजनाओं का नीति, के साथ अन्य अधिकारों को निर्धारित करने का आधार समुदाय के जनसंख्या को ही पैमाना माना जा रहा है।
उदा0-डीलिमिटेशन-1- मांग उठ रहा है-81 विधानसभा सीट में से 28 सीट आदिवासी समुदाय के लिए अरक्षित है-लेकिन 28 सीट को घटाकर 21 सीट कियी जा रहा है-दलील दिया जा रहा है-राज्य में सिर्फ आदिवासी आबादी मात्र 26 प्रतिशत ही रह गया है, इसलिए छोटी आबादी के लिए 28 सीट रिर्जब रखना सही नहीं है।
2-14 लोक सभा सीट में से 4 सीट आदिवासी सामाज के लिए अरक्षित है-इसमें से 2 सीटी घटाने की वाकालत की जा रही है-
3-आदिवासी बहुल क्षेत्र में आदिवासी सामाज अपने धरोहर के साथ, अपने परंपारिक सामाजिक मूल्यों और अधिकारों के साथ ही आदिवासी सामाज को विकास हो, इसके लिए भारतीय संविधान ने झारखंड के आदिवासी सामाज को 5वीं अनूसूची के तहत-सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक , ग्राम सभा को विशेष अधिकार मिला है-इसको खत्म करने के लिए झारखंड़ हाई कोर्ट में पीआईएल किया गया है-तर्क दिया जा रहा है कि-राज्य के कई जिलों में आदिवासी आबादी 50 प्रतिशत से कम है-एैसे में उन जिलों को अनुसूचि क्षेत्र का दर्जा नहीं दिया जाए।
अगर 5वीं अनूसूचि को खत्म कर दिया जाएगा-तो उपरोक्त तमाम प्रतिकुल प्रभाव आदिवासी -मूलवासी समुदाय पर पडेगा, परिणमता-आने वाले समय में आदिवासी समुदाय के अस्तित्व बचे रहने की कल्पना नहीं की जा सकती है-
एसएआर कोर्ट-झारखंड में आदिवासी समुदाय के जमीन-जंगल को गैर कनूनी तरीके से छिने जाने को रोकने के लिए एसएआर कोर्ट है, जो आज सीएनटी एक्ट के तहत आदिवासी समुदाय के मालिकाना अधिकार को बनाये रखने का न्यूनतम व्यवस्था है, इससे भी यदि खत्म किया जाए-तब झारखंड के आदिवासी समुदाय के अधिकारों को संरक्षित करने का दावा बेईमानी होगा।
एसएआर कोर्ट को खत्म करने की जगह-जरूरत है, इस व्यवस्था या संस्थान में जिस भ्रष्टचार यह भ्रष्टव्यवस्था, लचर व्यवस्था के कारण आदिवासी ठके जा रहे हैं-इस भ्रष्टव्यवस्था को खत्म करने के साथ लचर व्यवस्था को न्यायपूर्ण बनाने की।
विस्थापितों को नौकरी-मुआवजा, घर अन्य सुविधाएं उपलब्ध करने का सरकारी वादा-
नौकरी में लेने की पद्वती-
क-जमीन लेने के पहले-सरकारी वादा-हर विस्थापित परिवार से एक व्यत्कि को
ख-विस्थापितों को पीढ़ी दर पीढ़ी नौकरी देने का वादा.......
वस्तविकता--
क-जो व्यत्कि सत्क्षार में योग्य साबित होता है उसको नौकरी, पदों की संख्यानुसार
ख-मुश्किल से परिवार के एक व्यत्कि को सिंर्फ एक बार.....इसके बाद सिर्फ माफिया या अफसरों के नाते-रिस्तदारों को ही ..........नौकरी
जमीन रहने के लिए----राज्य में जिस भी विकास योजनाओं से ग्रामीण विस्थापित हुए हैं---उन विस्थापितों को प्रत्येक परिवार को रहने के लिए सिर्फ --10 डिसमिल, 15 डिसमिल अधिकतम 20 डिसमिल जमीन दिया गया-
नोट-आज तक इस उक्त जमीन का कानूनी मलिकाना हक विस्थापितों को नहीं मिला--जमीन उनके नाम से रजिस्र्ट नहीं किया गया
परिणामता---विस्थापितों के जमीन का दबांग लोग उनके हाथ से छीन कर अपने कब्जा में ले रहे हैं, यह दूसरे को बेच रहे हैं।
विस्थापित परिवार--दूसरी बार सरकार के गैर जिम्मेदराना रवैया के कारण उनकी बची-खूची जिंदगी छिना जा रहा है
पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में सरकार द्वारा-विभिन्न विकास योजनाओें के लिए एमओयू करना--आदिवासियों के अधिकार, ग्राम सभा के अधिकारों का वायलेशन-हनन है-
पांचवीं अनुसूचि क्षेत्र में भारतीय संविधान के ग्राम सभा को अधिकार दिया है-कि कहीं भी किसी भी विकास योजना के लिए उत्क ग्राम सभा क्षेत्र यह आदिवासी क्षेत्र में जमीन दिया जाए या ना दिया जाए ...यह तय करने का अधिकार ग्राम सभा को है-
लेकिन- जमीन अधिग्रण के संबंध में ग्राम सभा से न तो पूछा जाता है और न ही उनकी राय को मानी जाती है--
सरकार ग्राम सभा बुलाती भी है-तो रैयतो की राय नहीे मानी जाती है, सरकारी पक्ष उसी निर्णय को रैयतों को थोपते हैं-जो अधिकारी चाहते हैं-सिर्फ नाम के लिए ही बैठक होता है।
माइनर-मिनिरलस-पांचवी अनुसूचित में माइनर मिनिरलस पर ग्राम सभा को नियंत्रित-संचालित करने का अधिकार है-
ऽ लेकिन-अनुसूचि क्षेत्र के सभी बालू घाटों की निलामी की गयी
ऽ पत्थर-खदान यह के्रशर--सभी पत्थर के्रशरों या खदानों को लीजधारको को दी गयी
शहरीकारण का विकास के लिए अनुसूचि क्षेत्र के कृर्षि भूमिं को-गैर कृर्षि कार्य के लिए--
ऽ कृर्षि भूमिं का प्रकृति बदल कर हस्तंत्रित कर -भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी किसान समुदाय को विस्थापित किया जा रहा है
ऽ यह सीधे तौर पर आदिवासी मूलवासी, दलित, किसानों के अधिकारों का हनन है
कंपनियों के परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण की छूट
अब सरकार कंपनियों को स्वंय ही जमीन मालिकों से जमीन खरीदने के लिए छूट दे दी है-साम, दाम, दंड भेद अपना कर कंपनी के लठैत, बिचैलिया रैयतों से जमीन औने पौन कीमत पर जमीन जबरन हड़प रहे हैं।
ख-जो रैयत जमीन नहीं बेचना चाहता है, या नहीं छोड़ना चाहता है-उसके पुलिस बल प्रयोग कर, आतंक पैदाकर, छूठे मुकदमों में फंसा दिया जा रहा है
सभी तरफ से सरकार, प्रशासन कंपनीवाले मिलकर जमीन मालिकों के उपर दमन के कंपनी के लिए जमीन कब्जा दिला रहे हैं
इसका उदाहरण-बोकारो के चंदनकियारी प्रखंड में एल्केट्रो स्टील द्वारा जबरन जमीन अधिग्रण का विरोध करने वाले गांव भागाबांध को जा कर देखा जा सकता है
इस तरह के सौकड़ों उदाहरण राज्य भर में मिलेगा
गांव-आदिवासी गांव का मतलब -गांव सीमाना के भीतर एक-एक इंच जमीन, मिटी, गिटी, बालू, पत्थर, घांस-फूस, झाड- जंगल मिलाकर गांव बनता है-
इसी के आधार पर राज्य के आदिवासी बहुल गांवों का अपना परंपरिक मान्यता है। गांव घर को आबाद करने वाले आदिवासी समुदाय के पूर्वजों ने सामाजिक-पर्यावरणीय जीवनशैली के ताना बाना के आधार पर गांव बसाये हैं।
सामाज के बुजूगों ने अपने गांव सीमा को खेती-किसानी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर व्यवस्थित किये हैं-
क-घरो को एक तरफ बासाया गया-
जहां हर जाति-धर्म समुदाय बास करता है
ख-खेत-टांड एक तरफ
गंाव सीमा भीतर के कुछ खेत-टांड को गैराही रखा, कुछ को परती रखे-ताकि गा्रमीण सामुदायिक उपयोग करे। जिसमें नदी-नाला, तालाब, कुंआ-आहर, सरना-मसना, खेल मैदान, खलिहान, अखड़ा बाजार, जतरा, मेला, चरागाह आदि के लिए।
इसी के आधार पर राज्य में आदिवासी सामाज का जमीन को आबाद करने का अपना परंपरिक व्यास्था है यही नहीं इसका अपना विशिष्ट इतिहास भी है।
रैयती जमीन
खूंटकटीदार मालिकाना
विलकिंगसन रूल क्षेत्र
गैर मजरूआ आम
गैर मजरूआ खास
परती
जंगल-झाड़ी भूंमि-सामुदाय की समूहिक धरोहर
नोट-1932 में जो सर्वे सेटेलमेंट हुआ-इस रिकोर्ड के आधार पर जमीन को उपरोक्त वर्गों में बांटा गया। उस समय लोगों की आबादी कम थी। कम परिवार था। 84 साल पहले जमीन को चिन्हित किया गया था-कि ये परती है, जंगल-झाडी भूमिं है।
84 वर्ष में जो भी परती-झारती था, अब वो आबाद हो चूका है। अब उस जमीन पर बढ़ी आबादी खेती-बारी कर रही है।
गैर मजरूआ आम भूंमि पर तो गांव के किसानों को पूरा अधिकार है ही, गैर मजरूआ खास जमीन पर भी ग्रामीणों का ही हक है।
आज सरकार विकास के नाम पर लैंड बैंक---बना कर आदिवासी समुदाय के हाथ से उनका जमीन-जंगल छीन कर उद्योपतियों को देने का योजना बना रही हैं-इसे आदिवासी समाज पूरी तरह कमजोर हो जाएगा
षिक्षा की स्थिति-
ग्रामीण इलाकों के स्कूल चाहे प्राइमरी हो, प्रथमिक हो, उच्चविद्यालय हो -सभी का पठन-पाठन स्थिति दयनीय है-गुणवता बिलकूल कमजोर है
सरकार का आदेश-8वी क्लास तो किसी फेल नहीं करना-सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को पंगु बनाने की साजिश है
3-काॅलेजों की स्थिति-खूंटि काॅलेज
खूंटि बिरसा काॅलेज -8000 विद्यिर्थी हैं-इसमें 70 प्रतिशत महिलाएं हैं-इनके लिए 300 बेड का हाॅस्टल बना है क्लयाण विभाग से
ल्ेकिन इस हाॅस्टल में सीआरपीएफ को रखा गया--होस्टल के लिए -जरूरी उपस्कर विभाग आज तक नही दे सकी
स्वस्थ्य की स्थिति-25 हजार की आबदी में हर प्रखं डमें रेफरल अस्पताल है-लेकिन वहां न तो डाक्टर, न नर्स कोई नहीं रहता-
अस्पताल में-मलेरिया टेस्ट करने का मशीन नहीं
यहां तक कि हडी टुटने पर एक्स्रे मशीन भी नहीं
स्ूाचना अधिकार कानून---
ऽ सूचना कभी भी समय पर नहीं दिया जाता है
ऽ विकास योजनाओं पर आधिकारी फर्जी सूचना उपलब्ध कराते हैं
मनरेगा कानून का पालन नहीं--
ऽ 100 दिनों का रोजगार मजदूरों को कभी नहीं मिलता
ऽ किये गये काम का मजदूरी-भी नहीं मिला, मजदूरों का पैसा-ठेकेदार-दलाल हडप लेते हैं
ऽ 50 दिनों को -बेरोजगार कहीं लागू नहीं किया गया
आदिवासी उपयोजना--
1975-80 के दौरान अनुसूचित जाति उप योजना व आदिवासी उप-योजना आरंभ की गयी। इसका उद्वेश्य-अनुसूचित जातियो व जनजातियों की जनसंख्या में प्रतिशत के अनुपात में बजट का न्यायसंगत हिस्सा इन समुदयों की भलाई व विकास के सही प्राथमिकता के कार्यों के लिए उपलब्ध हो।
लेकिन-हर वर्ष इस राशि का 40-50 प्रतिशत ही खर्च होता है-बाकी सरेडर हो जाता है
इस राशि का उपयोग-दूसरे मदों-फलाई ओवर व हाईवे
जेल, बड़े पैमाने का मिठाई वितरण, पशुओं के इंजैक्शन और कामनवैल्थ खेलों में खर्च होते रहे।
आज किसी भी योजना को सरकार मनमनी ढ़ग से लागू करती है-
ऽ चाहे परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला हो
ऽ यह कोई भी विकास योजनाओं को लागू करने मामला हो,
ऽ सरकार हमेशा आम जनता को उत्पीडीत करने वाले तत्वों को संरक्षण देने का काम करते रही है
ऽ अगर आज जनता सरकार की मनमनी के खिलाफ, भष्ट व्यवस्था, या भ्रष्ट नेता, मंत्रियों के खिलाफ आवाज बुलंद करती है-तब उसे फोल्स केस में फंसा कर जेल भेज देती है
ऽ आज कल-तो आवाज उठाने वालों को नक्सली करार दिया जा रहा है-
ऽ आज-राज्य के जेलों में 600 बेकसुर आदिवासी जेल में बंद हैं
अनुसूचित क्षेत्रों में शांति-व्यवस्था और सुशासन को सुद्वढ़ करने का उपाय---
1-पांचवी अनूसूचि में प्रदत अधिकारों को अनुसूचि क्षेत्र में अक्षरशा पालन किया जाए
2-सीएनटी एक्ट के धारा 46 को कड़ाई से लागू किया जाए
3-पेसा कानून के तहत ग्राम सभाओं को प्रदत अधिकारों का अक्षरशा पालन हो
4-एसपीटी एक्ट का पालन हो
5-वन अधिकारी कानून के तहत ग्रामीणों को समुदायिक पटा तथा खेती के लिए मिनिमम 2 हेक्टेयर जमीन का पटा दिया जाए
6-आदिवासी उप-योजना का राशि -पूरी राशि हर बजट एलोकेशन का सही लाभकारी कार्यो में खर्च किया जाए
7-जनसूचना आयूक्त आदिवासी समुदाय से ही नियुक्त किया जाए
8-लगत या फर्जी सूचना देने वाले अधिकारियों पर कड़ाई से कार्रवाई की जाए
9-प्रत्येक प्रखंड स्तर पर अस्पतालों, प्रखडों, पंचायतों में स्थानीय कर्मचारियों का नियुक्ति किया जाए
10-भाषा-सस्कृति के आधार पर स्थाीनयता निति लागू किया जाए
11-भूमिं अधिग्रहण कानून-2013 को लागू किया जाए
12-भूमिं अधिग्रहण कानून-2013 के सेक्शन-24 के तहत-नगड़ी में गलत तरीके से अधिग्रहीत 150 एकड़ किसानों की जमीन-रैयतों को वापस किया जाए
13-नगड़ी में लाॅ यूनिवरसिटी के लिए जबरन किसानों ली गयी जमीन का कीमत वर्तमान बाजार मूल्य एक लाख प्रति डिसमिल के दर से भूगतान किया जाए-तथा विस्थापित रैयतों के परिवार को पीढ़ी दर पीढ़ी प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी दिया जाए
14-राज्य में-सभी परियोजनाओं से , पूर्व में हुए तमाम विस्थापितों को -पुर्नवासित तथा नौकरी दिया जाए। जब तब पूर्व के विस्थापितों को नौकरी और पुर्नवासित नहीं किया जाएगा-दूसरा विस्थापन नहीं किया जाए
15-सरकारी जमीन, परती जमीन, जंगल-झाड़ी जमीन, गैर मजरूआ आम, खास जमीन को स्थानीय ग्राम सभा, बेघर वालों, गरीबों, बीपलएल परिवार तथा विस्थापित परिवारों को आबंटित किया जाए--किसी बड़े पूजिंपति, कारपोरेट या सक्षम को नहीं
16-मुंडारी खूंटकटी व्यवस्था के साथ छेड-छाड़ नहीं किया जाए
17-हो आदिवासी ईलाके में विलकिंशन रूल सक्षम है-के साथ छेड-छाड नहीं हो
18-ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोकने तथा रोजगार व्यवस्था के लिए-नदी-नालों में छोटे छोटे चेक डैम बना कर पानी किसानों के खेतो तक पहुचाया जाए
19-शिाक्ष तथा स्वस्थ्य का नीजिकरण नहीं किया जाए
दयामनी बरला
न्यू गार्डेन सिरोम टोली
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Friday, May 31, 2019
अपने इमानदारी मेहनत से जनाधिकारों के लिए संघर्षरत शक्तियों को संगठित करके अपने धरोहर की सुरक्षा की गारंटी करनी होगीं
15 नवंबर 2000 में झारख्ंाड अलग राज्य का पूर्नगठन हुआ। यह सर्वविदित है कि झारखंड अलग राज्य की मांग, झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय ने अपने जल-जंगल-जमीन, भाषा-सास्कृति, पहचान को विकसित और संगक्षित करने के लिए की थी। अलग राज्य का नींव अबुआ हातुरे-अबुआ राईज, हमर गांव में-हमर राईज छोटानागपुर और संताल परगना इलाके में अंगे्रज हुकूमत द्वारा थोपी जा रही भूमि बंदोस्ती कानून या लैंण्ड सेटेलमेंट के खिलाफ संघर्ष के साथ डाला गया। इस, हमारे गांव में हमारा राज के संघर्ष को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संताल हूल 1856, 1788-90 में पहाडिया विद्रोह, 1798 में चुआड विद्रोह, 1800 में चेरो विद्रोह, 1820-21 में हो विद्रोह, 1831-33 में कोल विद्रोह, सरदारी विद्रोह और 1895-1900 में बिरसा मुंडा उलगुलान के नाम से इतिहास में अंकित किया गया है।
इस अलग राज्य की लड़ाई ने आजादी के बाद छोटानागपुर एवं सताल परगना के इलाके में आजादी के बाद संपन्न हुए राजनीतिक चुनाव को भी प्रभावित किया, और आदिवासी-मूलवासी समुदाय ने 1952 के पहला चुनाव में अलग राज्य के नाम पर 33 जनप्रतिनिधियों को चुन कर बिहार विधान सभा में भेजा। अलग राज्य की इस लड़ाई को राजनीतिक तौर पर जयपाल सिंह मुंडा, निरल ऐनेम होरो सहित हजारों आदिवासी मूलवासी अगुओं ने आगे बढ़ाया। इसके बाद का0 ऐके राय, बिहारी महतो और शिबू सोरेन ने भी नया दिशा दिया। समय के साथ आंदोलन ने हर तरह के उतार-चढ़ाव देखा। अलग राज्य के नाम पर आदिवासी-मूलवासियों के संगठित ताकत का अहसास भारतीय जनता पार्टी एवं संघ परिवार था, कि अलग राज्य के नाम पर आदिवासी-मूलवासी संगठित हैं। यदि आदिवासी समाज के बीच अपना जगह बनाना है-तो अलग राज्य पुर्नगठन के सवाल को पार्टी अजेंडा बनाना होगा।
विदित हो कि 1996-57 में बीजेपी ने झारखंड अलग राज्य के नाम पर एक 32 पेज की पुस्तिका प्रकाशित किया-वनांचल ही क्यों?। इस पुरे पुस्तिका का एक ही सार था-राज्य में इसाई समुदाय और अल्पसंख्याक समुदाय ने अपनी गहरी पैठ बनायी है, इस पैठ को कौसे उखाडा जाए और स्वंय उस जगह को अपने अजेंडा के साथ पाटा जाए। इस पुस्तिका में आदिवासी समाज को वनवासी के नाम से संबोधित किया गया। आदिवासी समुदाय को वनवासी संबोधन किया गया-इसको लेकर सामाजिक संगठनों सहित लोकतंत्रिक राजनीतिक पार्टियों ने भी विरोध किया। आदिवासी-मूलवासी समुदाय तथा तमाम जनसंगठनों ने सवाल उठाया कि-आदिवासी समुदाय को वनवासी करार कर, आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन के परंपरागत अधिकारों से अलग करने की बड़ी साशिज रची गयी है। साथ ही झारखंड के जंगल-जमीन-पानी और खनिज को पूंजिपतियों के हाथों बेचने की तैयारी है। इस विरोध और सर्मथन के बीच आदिवासी समुदाय ने स्पस्ट नारा दिया था-कि भाजपा द्वारा झारखंड को वनांचल का दर्जा देने का मतलब-झारखंड को व्योपारियों/व्यवसायिक / पूजिंपतियों का अखाडा बनाना है। इस तर्क के साथ आदिवासी-मूलवासी समुदाय ने वनांचल शब्द का कड़ा विरोध किया। विरोध के परिणामस्वरूप भाजपा ने एक कदम पीछे हटा और वनांचल शब्द को छोडकर झारखंड के नाम पर ही अलग राज्य को पुर्नगठन करने इस अजेंडा के साथ बीजेपी ने अलग राज्य पूर्नगठन का काम को आगे बढ़ाया। क्योंकि इस समय केंन्द्र की सत्ता पर भाजपा थी। सत्ता की राजनीतिक गणित का जोड़-घटाव के बाद भाजपा ने देखा कि यही मौका है आदिवासी बहुल, खानिज संपदा से परिपूर्ण धरती पर अपना साम्रज्य स्थापित करने का। इस मौका को हाथ से जाने नहीं दिया, और अजेंडा को अमलीजामा पहनाने में बीजेपी सफल रहा।, और देश में एक साथ तीन आदिवासी बहुल राज्यों को अलग राज्य का दर्जा दिया गया।
इस बात को नहीं भूलना चाहिए भाजपा को कि-झारखंड अलग राज्य के पुर्नगठन की तारीख 15 नवंबर को इसलिए चुना गया कि-झारंखड आदिवासियों का इतिहास, अस्तित्व और पहचान से जुड़ा है। इसके आदिवासी समुदाय ने लंबी लड़ाई लड़ी है। बिरसा मुडा आदिवासी समाज का पहचान है-इतिहास का हिस्सा हैं। भाजपा आदिवासी समाज को जताने चाहा-कि झारखंड आदिवासी समाज के सम्मान में बन रहा है। इसी उद्वेश्य से 15 नवंबर 2000 को राज्य को जन्म दिया गया।
लेकिन राज्य बनने के बाद राज्य ने 16 साल की उम्र देखी। इस 16वें साल में 12 साल तक तो राज्य में भाजपा के नेतृत्व में राज्य का शासन व्यवस्था चला। इन 16वें साल में पहली बार भाजपा पूर्ण बहुमत में आकर अकेले झारखंड का शासन व्यवस्था पर कब्जा जमा ली है। कोई रोकने वाला नहीं-आज बीजेपी अपने असली ऐजेंडा को राज्य में लागू कर रही है। इसी अजेंडा के तहत फरवरी 2016 में स्थानीयता नीति लागू किया गया, जो पूरी तरह आदिवासी, मूलवासी, किसान, सहित राज्य के मेहनतकश आज जनता के विरोध में स्थानीयता नीति का रूपरेखा खींचा गया और कानून का रूप दिया गया। जबकि मूल आदिवासी-मूलवासी झारखंडी समुदाय ने, अपने भाषा-संकृति, रिति-रिवाज, खान-पान, जीवनशैली एवं 1932 के खतियान का आधार बना कर, स्थानीयता नीति बनाने की मांग की थी। लेकिन राज्य सरकार ने इसको खारिज कर, जो 30 सालों से झारखंड में रह रहा हो-सभी झारखंडी हैं, इसी के आधार पर स्थानीयता नीति को पास किया। जो पूरी तरह से आदिवासी-मूलवासी विरोधी है। इसका विरोध हुआ, लेकिन बहुमत का नाजायज लाभ उठाते हुए, अपना अजेंडा को कानून रूप दिया। यहां से शुरू होता है-झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान, मेहनतकशों के संवैधानिक अधिकारों पर धारदार हमला। जनविरोधी स्थानीयता नीति के साथ ही सीएनटी-एसपीटी एक्ट जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज का सुराक्षा कवच है, को तोडना का प्रयास किया गया।
जून 2016 के कैबिनेट में रघुवर सरकार ने सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश लाया, और संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति के पास हस्ता़क्षर के लिए भेज दिया। जब इस अध्यादेश का राज्य की जनता ने विरोध की, तब राष्ट्रपति भी उसे वापस का दिये। जबकि कैबिनेट के तीन-चार दिन बाद झारखंड विधानसभा सत्र शुरू होने वाला था, इसका भी रघुवर सरकार ने इंतजार नहीं किया कि, संशोधन पर विधान सभा में चर्चा के लिए रखा जाता।
जब जुलाई में विधानसभा सत्र शुरू हुआ-विपक्षी पर्टी ने विधान सभा के भतीर तथा जनआंदोलनों, सामाजिक संगठनों ने मैदान में विरोध करना शुरू किये। परिणामस्वरूप विधान सभा सत्र स्थागित हो गया। 22 अगस्त को रांची के थेलोजिकल हाॅल में दो दिनों से हो रहे भारी बारिश के बावजूद 600 लोग एकत्र होकर संशोधन अध्यादेश पर चर्चा कर बाद एक स्वर में विरोध किया। इसके साथ ही पूरे राज्य में विरोध का स्वर गूंजने लगा। 23 अगस्त को विपक्षी पार्टियों ने संयुक्त घोषणा किया-कि किसी भी हाल में संशोधन अध्यादेश को पास करने नहीं देगें। 24 अगस्त को राज्य के 24 आदिवासी संगठनों ने राजभवन मार्च के साथ राजभवन के पास सभा के संशोधन के विरोध आवाज बुलंद किये। तथा 22 अक्टोबर को रांची के मोराबादी मैदान में विशाल रैली एवं सभा की घोषणा की।
पूर्व तय कार्यक्रम के अनुसार 22 अक्टोबर को पूरे राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसान सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश के विरोध में मोराबादी में जमा होने के लिए गांवों से निकले। लेकिन रघुवर सरकार ने भारत के नागरिकों को भारतीय संविधान में प्रदत अभिव्यक्ति के अधिकार को हनन करते हुए गांव-गांव में पुलिस प्रशासन द्वारा बे्रेकेटिंग लगवा दिया गया, गांव के लोग रांची मोराबादी मैदान आ रहे थे, सबकी गाडी रोक दी गयी। यहां तक कि लोगों को पैदल भी नहीं आने दिया गया। रांची शहर को चारे ओर ब्रेकेटिंग से घेरा गया। ताकि जनता सभा तक न जा सके। इसी क्रम में खूंटी के सोयको में ग्रामीणों को रांची आने से रोका गया सोयको में। रैली में आने वालों तथा पुलिस प्रशासन के बीच विवाद बढ़ा, तक पुलिस ने फयरिंग की। इस फायरिंग में अब्रहम मुंडू मारा गया, 7 लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गये। जिनका इलाज रिम्स में हुआ। इस घटना में 10 लोगों पर नेमड एफआईआर किया गया, यहां तक कि मृतक अब्रहम मुडू सहित घायलों पर भी किया।
केंन्द्र तथा राज्य की रघंुवर सरकार पूरी तरह आदिवासी-मूलवासी, किसानों के जल-जंगल-जमीन और खानिज को लूटने के लिए कई हथकंडे अपना ली है। याद दिलाना चाहती हुॅ कि 2014 में मोदी सरकार ने जिस जमीन अधिग्रहण अध्यादेश को लाया था-वह पूरी तरह से देश के किसानों को उखाड़ फेंकने की नीति थी। ताकि देश-विदेश के कारपोरेट घरानों को आसानी से जमीन हस्तांत्रित किया जा सके। इस अध्यादेश में 9 संशोधन तथा 2 उपनियम लाया गया था। रघुवर सरकार इसी संशोधन के आधार पर सीएनटी एक्ट के धारा-71(2) जिसमें आदिवासियों का जमीन यदि कोई गैर आदिवासी छल-बल से कब्जा किया है, और उस जमीन पर कोई निर्माण कार्य किया गया है-तो इस जमीन का मुआवजा देकर, उसे सेटेल करने का प्रावधान है-को समाप्त करने की बात कही गयी। इस तरह के केस को देखने के लिए हर जिला में जिला उपायुक्त को अधिकृत किया गया है-एसआरए कोर्ट (शिडूयल एरिया रेगुलेशन एक्ट) एैसे मामलों पर न्याय करे। लेकिन दुभग्य की बात है कि-इस तरह के जितने भी मामले आये हैं-सिर्फ 1-2 प्रतिशत में ही रैयतों-आदिवासी समाज को न्याय मिला है।
विदित हो कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के मामले में सामाजिक संगठनों ने पहले भी आवाज उठाया कि-जो छेद है इस एक्ट में, जैसे मुआवजा देकर मामले को रफा-दफा किया जाता है, इसको बंद किया जाए। लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं किया। आज भी सरकार के कार्रवाई पर संदेह है।
धारा-49 -इसमें पहले जनकल्याकारी कार्यों के लिए जमीन हस्तांत्रित करने का प्रावधान था। इसके तहत उद्योग और मांइस के लिए ही जमीन लेना था, लेकिन अब इसमे संशोधन करके किसी तरह के काम के लिए जमीन लेने का प्रावधान कर दिया गया। याने यह कहा जाए-अब जमीन लेने के लिए पूरी तरह से बड़ा गेट को खोल दिया गया। धारा-21-में प्रावधान है कि-कृर्षि भूमि का नेचर-ननकृर्षि भूमि में बदला नहीं जा सकता है। लेकिन रघुवर सरकार ने इस कवच को तोड कर -कृर्षि भूमि का नेचर-ननकृर्षि भूमि में बदलने का कानून बनया। याने अब -कृर्षि भूमि में भी व्यवसायिक संस्थान खडा कर सकते है। यह सबसे खतरनाक साबित होने वाला है। एसपीटी एक्ट -का धारा 13 तथा सीएनटी एक्ट को धारा 21 दोनों एक है। इस कानून के पास होने के एक समय आएगा-झारखंड एक भी किसान नहीं बच पायेगें।
विकास के मकडजाल में आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदाय फंसते जा रहा है। विकास का यह मकडजाल काॅरपोरेट घरानों, देश-विदेश के पूंजिपतियों के लिए जमीन की लूट के लिए केंन्द्र तथा राज्य के रघुवर सरकार द्वारा तैयार नीतियों का जाल है। जो आदिवासी-मूलवासी, किसान सामाज के उपर एक ष्ष्फेंका जालष्ष् की तरह है। इस जाल के सहारे आदिवासी-मूलवासी, किसान एवं मेनतकश समुदाय को राज्यकीय व्यवस्था के सहारे काबू में ला कर इनके हाथ से जल-जंगल-जमीन एवं पर्यावरण को छीण कर काॅरपोरेट घरानों कों सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है। एक ओर भाजपानीत केंन्द्र एवं राज्य सरकार आदिवासी, किसानों के हक-अधिकारों के संगरक्षण की ढोल पीटती है, और दूसरी ओर इनके सुरक्षा कवच के रूप में भारतीय संविधान में प्रावधान अधिकारों को ध्वस्त करते हुए काॅरपोरेटी सम्राज्य स्थापित करने जा रही है। जिंदगी के तमाम पहलूओं-भोजन, पानी, स्वस्थ्य, शिक्षा, सहित हवा सभी को व्यवसायिक वस्तु के रूप में मुनाफा कमाने के लिए ग्लोबल पूंजि बाजार में सौदा करने के लिए डिस्पले-सजा कर के रख दिया है।
देश जब अेग्रेज सम्रज्यवाद के गुलामी जंजीर से जकड़ा हुआ था -तब देश को अंग्रेज हुकूमत से आजाद करने के लिए झारखंड के आदिवासी -जनजाति व अनुसूचित जाति समुदाय ने शहादती संघर्ष कर स्वतत्रता संग्राम को मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। शहीद सिद्वू-कान्हू, ंिसदराय-बिंदराय, जतरा टाना भगत, बीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हमारे गांव में हमारा राज-याने जल-जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत अधिकार बरकरार रखने, गांव-समाज को पर्यावरणीय मूल्यों के साथ विकसित करनेे, अपने क्षेत्र में में अपना प्रशासनिक व्यवस्था पुर्नस्थापित करने, कर अपना भाषा-संस्कृति के साथ संचालित-नियंत्रित एवं विकसित करने का सपना था।
आजाद देश के राजनीतिज्ञों, बुधीजीवियों, एवं संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि-देश का विकास, शांति-व्यवस्था एक तरह के कानून से संभव नहीं हैं-इसीलिए देश में दो तरह के कानून बनाये गये। एक सामान्य कानून जो सामान्य क्षेत्र के लिए दूसरा विशेष कानून जो विशेष क्षेत्र के लिए बनाया गया। प्रकृतिकमूलक आदिवासी बहुल एरिया को विशेष क्षेत्र में रखा गया। इन क्षेत्रों पांचवी अनुसूचि तथा छठी अनुसूचि में बांटा गया।
इसी अनुसूचि क्षेत्र में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना अधिनियम 1949, पेसा कानून 1996, वन अधिकार अधिनियम 2006 भी है। ये सभी कानून आदिवासी, मूलवासी, दलित, मच्छूवरा सहित 33 आदिम जनजाति समुदायों के अधिकारों रक्षा के लिए है।
लेकिन- हर स्तर पर इन कानूनों को वयलेशन-हनन किया जा रहा है।
देश के विकास का इतिहास गवाह है-जबतक आदिवासी समाज अपना जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा रहता है-तबतक ही वह आदिवासी अस्तित्व के साथ जिंदा रह सकता है। आदिवासी सामाज को अपने धरोहर जल-जंगल-जमीन से जैसे ही अलग करेगें-पानी से मच्छली को बाहर निकालते ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देता है-आदिवासी सामाज भी इसी तरह अपनी धरोहर से अलग होते ही स्वतः दम तोड़ देता है।
अपनी मिटटी के सुगंध तथा अपने झाड-जंगल के पुटुस, कोरेया, पलाश, सराई, महुआ, आम मंजरी के खुशबू से सनी जीवनशैली के साथ विकास के रास्ते बढने के लिए संक्लपित परंपरागत आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज के उपर थोपी गयी विकास का मकडजाल स्थानीयता नीति 2016, सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन बिल 2017, महुआ नीति 2017, जनआंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया-क्षति पूर्ति कानून 2016, गो रक्षा कानून 2017, भूमि बैंक, डिजिटल झारखंड, लैंण्ड रिकार्ड आॅनलाइन करना, सिंगल विण्डोसिस्टम से आॅनलाइन जमीन हस्तांत्रण एवं म्यूटेशन जैसे नीति-कानूनों को लागू होना, निश्चित रूप से आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदायों के समझ के परे की व्यवस्था है। यह व्यवस्था राज्य के एक-एक इंच जमीन, एक-एक पेड-पौधों, एक-एक बूंद पानी को राज्य के ग्रामीण जनता के हाथ से छीनने का धारदार हथियार है।
गांव-आदिवासी गांव का मतलब -गांव सीमाना के भीतर एक-एक इंच जमीन, मिटी, गिटी, बालू, पत्थर, घांस-फूस, झाड- जंगल मिलाकर गांव बनता है-
इसी के आधार पर राज्य के आदिवासी बहुल गांवों का अपना परंपरिक मान्यता है। गांव घर को आबाद करने वाले आदिवासी समुदाय के पूर्वजों ने सामाजिक-पर्यावरणीय जीवनशैली के ताना बाना के आधार पर गांव बसाये हैं।
सामाज के बुजूगों ने अपने गांव सीमा को खेती-किसानी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर व्यवस्थित किये हैं-क-घरो को एक तरफ बासाया गया-जहां हर जाति-धर्म समुदाय बास करता हैंै। ख-खेत-टांड एक तरफ गंाव सीमा भीतर के कुछ खेत-टांड को गैराही रखा, कुछ को परती रखे-ताकि गा्रमीण सामुदायिक उपयोग करे। जिसमें नदी-नाला, तालाब, कुंआ-आहर, सरना-मसना, खेल मैदान, खलिहान, अखड़ा बाजार, जतरा, मेला, चरागाह आदि के लिए।
इसी के आधार पर राज्य में आदिवासी सामाज का जमीन को आबाद करने का अपना परंपरिक व्यास्था है यही नहीं इसका अपना विशिष्ट इतिहास भी है। आदिवासी परंपरागत व्यवस्था में जमीन को अपने तरह से परिभाषित किया गया है-रैयती जमीन, खूंटकटीदार मालिकाना, विलकिंगसन रूल क्षेत्र, गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, परती, जंगल-झाड़ी भूंमि।
नोट-1932 में जो सर्वे सेटेलमेंट हुआ-इस रिकोर्ड के आधार पर जमीन को उपरोक्त वर्गों में बांटा गया। उस समय लोगों की आबादी कम थी। कम परिवार था। 84 साल पहले जमीन को चिन्हित किया गया था-कि ये परती है, जंगल-झाडी भूमिं है। 84 वर्ष में जो भी परती-झारती था, अब वो आबाद हो चूका है। अब उस जमीन पर बढ़ी आबादी खेती-बारी कर रही है।
गैर मजरूआ आम भूंमि पर तो गांव के किसानों को पूरा अधिकार है ही, गैर मजरूआ खास जमीन पर भी ग्रामीणों का ही हक है।
आज सरकार विकास के नाम पर लैंड बैंक---बना कर आदिवासी समुदाय के हाथ से उनका जमीन-जंगल छीन कर उद्योपतियों को देने का योजना बना रही हैं। केंन्द्र की मोदी सरकार तथा राज्य की रघुवर सरकार झारखंड से बाहर एवं देश के बाहर कई देशों में पूजिपतियों को झारखंड की धरती पर पूंजि निवेश के लिए आमंत्रित करने में व्यस्त हैं। 16-17 फरवरी 2017 को झारखंड की राजधानी रांची में ग्लोबल इनवेस्टर समिट को आयोजन कर 11 हजार देशी-विदेशी पूंजिपतियों को आमंत्रित किया गया था। इस दौरान 210 कंपनियों के साथ एमओयू किया गया। इस एमओयू में 121 उद्वोगों के लिए किया गया, जबकि कृर्षि के लिए सिर्फ एक एमओयू किया गया। इसके पहले 2000 से 2006 के बीच 104 बड़े बडे कंपनियों के साथ एमओयू किया गया हे। यदि सभी कंपनियों को अपने जरूरत के हिसाब से जमीन, जंगल, पानी, खनीज उपलब्ध किया जाए आने वाले दस सालों के अंदर झारख्ंाड में एक इंज भी जमीन नहीं बचेगी, एक बूंद पानी नहीं बचेगा। इसे सिर्फ आदिवासी मूलवासी, किसान ,मेहनतकश समुदाय केवल नहीं उजडेगें, परन्तु प्रकृति पर निर्भर सभी समुदाय स्वता ही उजड़ जाऐगें। जिनका कल का कोई भविष्य नहीं होगा।
अपने इतिहास को याद करन का समय आया है। हमारा संघर्ष का इतिहास है-घुटना नहीं टेक सकते। जब आप के विरोधी ताकतें एक साथ खड़ा हैं-तब परिस्थिति की मांग है कि-राज्य और देश के आदिवासी-मूलवासी, किसान, मेहनतकश, शोषित-बंचित सबकों एक मंच में आना होगा, अपने इमानदारी मेहनत से जनाधिकारों के लिए संघर्षरत शक्तियों को संगठित करके अपने धरोहर की सुरक्षा की गारंटी करनी होगीं
इस अलग राज्य की लड़ाई ने आजादी के बाद छोटानागपुर एवं सताल परगना के इलाके में आजादी के बाद संपन्न हुए राजनीतिक चुनाव को भी प्रभावित किया, और आदिवासी-मूलवासी समुदाय ने 1952 के पहला चुनाव में अलग राज्य के नाम पर 33 जनप्रतिनिधियों को चुन कर बिहार विधान सभा में भेजा। अलग राज्य की इस लड़ाई को राजनीतिक तौर पर जयपाल सिंह मुंडा, निरल ऐनेम होरो सहित हजारों आदिवासी मूलवासी अगुओं ने आगे बढ़ाया। इसके बाद का0 ऐके राय, बिहारी महतो और शिबू सोरेन ने भी नया दिशा दिया। समय के साथ आंदोलन ने हर तरह के उतार-चढ़ाव देखा। अलग राज्य के नाम पर आदिवासी-मूलवासियों के संगठित ताकत का अहसास भारतीय जनता पार्टी एवं संघ परिवार था, कि अलग राज्य के नाम पर आदिवासी-मूलवासी संगठित हैं। यदि आदिवासी समाज के बीच अपना जगह बनाना है-तो अलग राज्य पुर्नगठन के सवाल को पार्टी अजेंडा बनाना होगा।
विदित हो कि 1996-57 में बीजेपी ने झारखंड अलग राज्य के नाम पर एक 32 पेज की पुस्तिका प्रकाशित किया-वनांचल ही क्यों?। इस पुरे पुस्तिका का एक ही सार था-राज्य में इसाई समुदाय और अल्पसंख्याक समुदाय ने अपनी गहरी पैठ बनायी है, इस पैठ को कौसे उखाडा जाए और स्वंय उस जगह को अपने अजेंडा के साथ पाटा जाए। इस पुस्तिका में आदिवासी समाज को वनवासी के नाम से संबोधित किया गया। आदिवासी समुदाय को वनवासी संबोधन किया गया-इसको लेकर सामाजिक संगठनों सहित लोकतंत्रिक राजनीतिक पार्टियों ने भी विरोध किया। आदिवासी-मूलवासी समुदाय तथा तमाम जनसंगठनों ने सवाल उठाया कि-आदिवासी समुदाय को वनवासी करार कर, आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन के परंपरागत अधिकारों से अलग करने की बड़ी साशिज रची गयी है। साथ ही झारखंड के जंगल-जमीन-पानी और खनिज को पूंजिपतियों के हाथों बेचने की तैयारी है। इस विरोध और सर्मथन के बीच आदिवासी समुदाय ने स्पस्ट नारा दिया था-कि भाजपा द्वारा झारखंड को वनांचल का दर्जा देने का मतलब-झारखंड को व्योपारियों/व्यवसायिक / पूजिंपतियों का अखाडा बनाना है। इस तर्क के साथ आदिवासी-मूलवासी समुदाय ने वनांचल शब्द का कड़ा विरोध किया। विरोध के परिणामस्वरूप भाजपा ने एक कदम पीछे हटा और वनांचल शब्द को छोडकर झारखंड के नाम पर ही अलग राज्य को पुर्नगठन करने इस अजेंडा के साथ बीजेपी ने अलग राज्य पूर्नगठन का काम को आगे बढ़ाया। क्योंकि इस समय केंन्द्र की सत्ता पर भाजपा थी। सत्ता की राजनीतिक गणित का जोड़-घटाव के बाद भाजपा ने देखा कि यही मौका है आदिवासी बहुल, खानिज संपदा से परिपूर्ण धरती पर अपना साम्रज्य स्थापित करने का। इस मौका को हाथ से जाने नहीं दिया, और अजेंडा को अमलीजामा पहनाने में बीजेपी सफल रहा।, और देश में एक साथ तीन आदिवासी बहुल राज्यों को अलग राज्य का दर्जा दिया गया।
इस बात को नहीं भूलना चाहिए भाजपा को कि-झारखंड अलग राज्य के पुर्नगठन की तारीख 15 नवंबर को इसलिए चुना गया कि-झारंखड आदिवासियों का इतिहास, अस्तित्व और पहचान से जुड़ा है। इसके आदिवासी समुदाय ने लंबी लड़ाई लड़ी है। बिरसा मुडा आदिवासी समाज का पहचान है-इतिहास का हिस्सा हैं। भाजपा आदिवासी समाज को जताने चाहा-कि झारखंड आदिवासी समाज के सम्मान में बन रहा है। इसी उद्वेश्य से 15 नवंबर 2000 को राज्य को जन्म दिया गया।
लेकिन राज्य बनने के बाद राज्य ने 16 साल की उम्र देखी। इस 16वें साल में 12 साल तक तो राज्य में भाजपा के नेतृत्व में राज्य का शासन व्यवस्था चला। इन 16वें साल में पहली बार भाजपा पूर्ण बहुमत में आकर अकेले झारखंड का शासन व्यवस्था पर कब्जा जमा ली है। कोई रोकने वाला नहीं-आज बीजेपी अपने असली ऐजेंडा को राज्य में लागू कर रही है। इसी अजेंडा के तहत फरवरी 2016 में स्थानीयता नीति लागू किया गया, जो पूरी तरह आदिवासी, मूलवासी, किसान, सहित राज्य के मेहनतकश आज जनता के विरोध में स्थानीयता नीति का रूपरेखा खींचा गया और कानून का रूप दिया गया। जबकि मूल आदिवासी-मूलवासी झारखंडी समुदाय ने, अपने भाषा-संकृति, रिति-रिवाज, खान-पान, जीवनशैली एवं 1932 के खतियान का आधार बना कर, स्थानीयता नीति बनाने की मांग की थी। लेकिन राज्य सरकार ने इसको खारिज कर, जो 30 सालों से झारखंड में रह रहा हो-सभी झारखंडी हैं, इसी के आधार पर स्थानीयता नीति को पास किया। जो पूरी तरह से आदिवासी-मूलवासी विरोधी है। इसका विरोध हुआ, लेकिन बहुमत का नाजायज लाभ उठाते हुए, अपना अजेंडा को कानून रूप दिया। यहां से शुरू होता है-झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान, मेहनतकशों के संवैधानिक अधिकारों पर धारदार हमला। जनविरोधी स्थानीयता नीति के साथ ही सीएनटी-एसपीटी एक्ट जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज का सुराक्षा कवच है, को तोडना का प्रयास किया गया।
जून 2016 के कैबिनेट में रघुवर सरकार ने सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश लाया, और संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति के पास हस्ता़क्षर के लिए भेज दिया। जब इस अध्यादेश का राज्य की जनता ने विरोध की, तब राष्ट्रपति भी उसे वापस का दिये। जबकि कैबिनेट के तीन-चार दिन बाद झारखंड विधानसभा सत्र शुरू होने वाला था, इसका भी रघुवर सरकार ने इंतजार नहीं किया कि, संशोधन पर विधान सभा में चर्चा के लिए रखा जाता।
जब जुलाई में विधानसभा सत्र शुरू हुआ-विपक्षी पर्टी ने विधान सभा के भतीर तथा जनआंदोलनों, सामाजिक संगठनों ने मैदान में विरोध करना शुरू किये। परिणामस्वरूप विधान सभा सत्र स्थागित हो गया। 22 अगस्त को रांची के थेलोजिकल हाॅल में दो दिनों से हो रहे भारी बारिश के बावजूद 600 लोग एकत्र होकर संशोधन अध्यादेश पर चर्चा कर बाद एक स्वर में विरोध किया। इसके साथ ही पूरे राज्य में विरोध का स्वर गूंजने लगा। 23 अगस्त को विपक्षी पार्टियों ने संयुक्त घोषणा किया-कि किसी भी हाल में संशोधन अध्यादेश को पास करने नहीं देगें। 24 अगस्त को राज्य के 24 आदिवासी संगठनों ने राजभवन मार्च के साथ राजभवन के पास सभा के संशोधन के विरोध आवाज बुलंद किये। तथा 22 अक्टोबर को रांची के मोराबादी मैदान में विशाल रैली एवं सभा की घोषणा की।
पूर्व तय कार्यक्रम के अनुसार 22 अक्टोबर को पूरे राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसान सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश के विरोध में मोराबादी में जमा होने के लिए गांवों से निकले। लेकिन रघुवर सरकार ने भारत के नागरिकों को भारतीय संविधान में प्रदत अभिव्यक्ति के अधिकार को हनन करते हुए गांव-गांव में पुलिस प्रशासन द्वारा बे्रेकेटिंग लगवा दिया गया, गांव के लोग रांची मोराबादी मैदान आ रहे थे, सबकी गाडी रोक दी गयी। यहां तक कि लोगों को पैदल भी नहीं आने दिया गया। रांची शहर को चारे ओर ब्रेकेटिंग से घेरा गया। ताकि जनता सभा तक न जा सके। इसी क्रम में खूंटी के सोयको में ग्रामीणों को रांची आने से रोका गया सोयको में। रैली में आने वालों तथा पुलिस प्रशासन के बीच विवाद बढ़ा, तक पुलिस ने फयरिंग की। इस फायरिंग में अब्रहम मुंडू मारा गया, 7 लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गये। जिनका इलाज रिम्स में हुआ। इस घटना में 10 लोगों पर नेमड एफआईआर किया गया, यहां तक कि मृतक अब्रहम मुडू सहित घायलों पर भी किया।
केंन्द्र तथा राज्य की रघंुवर सरकार पूरी तरह आदिवासी-मूलवासी, किसानों के जल-जंगल-जमीन और खानिज को लूटने के लिए कई हथकंडे अपना ली है। याद दिलाना चाहती हुॅ कि 2014 में मोदी सरकार ने जिस जमीन अधिग्रहण अध्यादेश को लाया था-वह पूरी तरह से देश के किसानों को उखाड़ फेंकने की नीति थी। ताकि देश-विदेश के कारपोरेट घरानों को आसानी से जमीन हस्तांत्रित किया जा सके। इस अध्यादेश में 9 संशोधन तथा 2 उपनियम लाया गया था। रघुवर सरकार इसी संशोधन के आधार पर सीएनटी एक्ट के धारा-71(2) जिसमें आदिवासियों का जमीन यदि कोई गैर आदिवासी छल-बल से कब्जा किया है, और उस जमीन पर कोई निर्माण कार्य किया गया है-तो इस जमीन का मुआवजा देकर, उसे सेटेल करने का प्रावधान है-को समाप्त करने की बात कही गयी। इस तरह के केस को देखने के लिए हर जिला में जिला उपायुक्त को अधिकृत किया गया है-एसआरए कोर्ट (शिडूयल एरिया रेगुलेशन एक्ट) एैसे मामलों पर न्याय करे। लेकिन दुभग्य की बात है कि-इस तरह के जितने भी मामले आये हैं-सिर्फ 1-2 प्रतिशत में ही रैयतों-आदिवासी समाज को न्याय मिला है।
विदित हो कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के मामले में सामाजिक संगठनों ने पहले भी आवाज उठाया कि-जो छेद है इस एक्ट में, जैसे मुआवजा देकर मामले को रफा-दफा किया जाता है, इसको बंद किया जाए। लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं किया। आज भी सरकार के कार्रवाई पर संदेह है।
धारा-49 -इसमें पहले जनकल्याकारी कार्यों के लिए जमीन हस्तांत्रित करने का प्रावधान था। इसके तहत उद्योग और मांइस के लिए ही जमीन लेना था, लेकिन अब इसमे संशोधन करके किसी तरह के काम के लिए जमीन लेने का प्रावधान कर दिया गया। याने यह कहा जाए-अब जमीन लेने के लिए पूरी तरह से बड़ा गेट को खोल दिया गया। धारा-21-में प्रावधान है कि-कृर्षि भूमि का नेचर-ननकृर्षि भूमि में बदला नहीं जा सकता है। लेकिन रघुवर सरकार ने इस कवच को तोड कर -कृर्षि भूमि का नेचर-ननकृर्षि भूमि में बदलने का कानून बनया। याने अब -कृर्षि भूमि में भी व्यवसायिक संस्थान खडा कर सकते है। यह सबसे खतरनाक साबित होने वाला है। एसपीटी एक्ट -का धारा 13 तथा सीएनटी एक्ट को धारा 21 दोनों एक है। इस कानून के पास होने के एक समय आएगा-झारखंड एक भी किसान नहीं बच पायेगें।
विकास के मकडजाल में आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदाय फंसते जा रहा है। विकास का यह मकडजाल काॅरपोरेट घरानों, देश-विदेश के पूंजिपतियों के लिए जमीन की लूट के लिए केंन्द्र तथा राज्य के रघुवर सरकार द्वारा तैयार नीतियों का जाल है। जो आदिवासी-मूलवासी, किसान सामाज के उपर एक ष्ष्फेंका जालष्ष् की तरह है। इस जाल के सहारे आदिवासी-मूलवासी, किसान एवं मेनतकश समुदाय को राज्यकीय व्यवस्था के सहारे काबू में ला कर इनके हाथ से जल-जंगल-जमीन एवं पर्यावरण को छीण कर काॅरपोरेट घरानों कों सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है। एक ओर भाजपानीत केंन्द्र एवं राज्य सरकार आदिवासी, किसानों के हक-अधिकारों के संगरक्षण की ढोल पीटती है, और दूसरी ओर इनके सुरक्षा कवच के रूप में भारतीय संविधान में प्रावधान अधिकारों को ध्वस्त करते हुए काॅरपोरेटी सम्राज्य स्थापित करने जा रही है। जिंदगी के तमाम पहलूओं-भोजन, पानी, स्वस्थ्य, शिक्षा, सहित हवा सभी को व्यवसायिक वस्तु के रूप में मुनाफा कमाने के लिए ग्लोबल पूंजि बाजार में सौदा करने के लिए डिस्पले-सजा कर के रख दिया है।
देश जब अेग्रेज सम्रज्यवाद के गुलामी जंजीर से जकड़ा हुआ था -तब देश को अंग्रेज हुकूमत से आजाद करने के लिए झारखंड के आदिवासी -जनजाति व अनुसूचित जाति समुदाय ने शहादती संघर्ष कर स्वतत्रता संग्राम को मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। शहीद सिद्वू-कान्हू, ंिसदराय-बिंदराय, जतरा टाना भगत, बीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हमारे गांव में हमारा राज-याने जल-जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत अधिकार बरकरार रखने, गांव-समाज को पर्यावरणीय मूल्यों के साथ विकसित करनेे, अपने क्षेत्र में में अपना प्रशासनिक व्यवस्था पुर्नस्थापित करने, कर अपना भाषा-संस्कृति के साथ संचालित-नियंत्रित एवं विकसित करने का सपना था।
आजाद देश के राजनीतिज्ञों, बुधीजीवियों, एवं संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि-देश का विकास, शांति-व्यवस्था एक तरह के कानून से संभव नहीं हैं-इसीलिए देश में दो तरह के कानून बनाये गये। एक सामान्य कानून जो सामान्य क्षेत्र के लिए दूसरा विशेष कानून जो विशेष क्षेत्र के लिए बनाया गया। प्रकृतिकमूलक आदिवासी बहुल एरिया को विशेष क्षेत्र में रखा गया। इन क्षेत्रों पांचवी अनुसूचि तथा छठी अनुसूचि में बांटा गया।
इसी अनुसूचि क्षेत्र में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना अधिनियम 1949, पेसा कानून 1996, वन अधिकार अधिनियम 2006 भी है। ये सभी कानून आदिवासी, मूलवासी, दलित, मच्छूवरा सहित 33 आदिम जनजाति समुदायों के अधिकारों रक्षा के लिए है।
लेकिन- हर स्तर पर इन कानूनों को वयलेशन-हनन किया जा रहा है।
देश के विकास का इतिहास गवाह है-जबतक आदिवासी समाज अपना जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा रहता है-तबतक ही वह आदिवासी अस्तित्व के साथ जिंदा रह सकता है। आदिवासी सामाज को अपने धरोहर जल-जंगल-जमीन से जैसे ही अलग करेगें-पानी से मच्छली को बाहर निकालते ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देता है-आदिवासी सामाज भी इसी तरह अपनी धरोहर से अलग होते ही स्वतः दम तोड़ देता है।
अपनी मिटटी के सुगंध तथा अपने झाड-जंगल के पुटुस, कोरेया, पलाश, सराई, महुआ, आम मंजरी के खुशबू से सनी जीवनशैली के साथ विकास के रास्ते बढने के लिए संक्लपित परंपरागत आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज के उपर थोपी गयी विकास का मकडजाल स्थानीयता नीति 2016, सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन बिल 2017, महुआ नीति 2017, जनआंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया-क्षति पूर्ति कानून 2016, गो रक्षा कानून 2017, भूमि बैंक, डिजिटल झारखंड, लैंण्ड रिकार्ड आॅनलाइन करना, सिंगल विण्डोसिस्टम से आॅनलाइन जमीन हस्तांत्रण एवं म्यूटेशन जैसे नीति-कानूनों को लागू होना, निश्चित रूप से आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदायों के समझ के परे की व्यवस्था है। यह व्यवस्था राज्य के एक-एक इंच जमीन, एक-एक पेड-पौधों, एक-एक बूंद पानी को राज्य के ग्रामीण जनता के हाथ से छीनने का धारदार हथियार है।
गांव-आदिवासी गांव का मतलब -गांव सीमाना के भीतर एक-एक इंच जमीन, मिटी, गिटी, बालू, पत्थर, घांस-फूस, झाड- जंगल मिलाकर गांव बनता है-
इसी के आधार पर राज्य के आदिवासी बहुल गांवों का अपना परंपरिक मान्यता है। गांव घर को आबाद करने वाले आदिवासी समुदाय के पूर्वजों ने सामाजिक-पर्यावरणीय जीवनशैली के ताना बाना के आधार पर गांव बसाये हैं।
सामाज के बुजूगों ने अपने गांव सीमा को खेती-किसानी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर व्यवस्थित किये हैं-क-घरो को एक तरफ बासाया गया-जहां हर जाति-धर्म समुदाय बास करता हैंै। ख-खेत-टांड एक तरफ गंाव सीमा भीतर के कुछ खेत-टांड को गैराही रखा, कुछ को परती रखे-ताकि गा्रमीण सामुदायिक उपयोग करे। जिसमें नदी-नाला, तालाब, कुंआ-आहर, सरना-मसना, खेल मैदान, खलिहान, अखड़ा बाजार, जतरा, मेला, चरागाह आदि के लिए।
इसी के आधार पर राज्य में आदिवासी सामाज का जमीन को आबाद करने का अपना परंपरिक व्यास्था है यही नहीं इसका अपना विशिष्ट इतिहास भी है। आदिवासी परंपरागत व्यवस्था में जमीन को अपने तरह से परिभाषित किया गया है-रैयती जमीन, खूंटकटीदार मालिकाना, विलकिंगसन रूल क्षेत्र, गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, परती, जंगल-झाड़ी भूंमि।
नोट-1932 में जो सर्वे सेटेलमेंट हुआ-इस रिकोर्ड के आधार पर जमीन को उपरोक्त वर्गों में बांटा गया। उस समय लोगों की आबादी कम थी। कम परिवार था। 84 साल पहले जमीन को चिन्हित किया गया था-कि ये परती है, जंगल-झाडी भूमिं है। 84 वर्ष में जो भी परती-झारती था, अब वो आबाद हो चूका है। अब उस जमीन पर बढ़ी आबादी खेती-बारी कर रही है।
गैर मजरूआ आम भूंमि पर तो गांव के किसानों को पूरा अधिकार है ही, गैर मजरूआ खास जमीन पर भी ग्रामीणों का ही हक है।
आज सरकार विकास के नाम पर लैंड बैंक---बना कर आदिवासी समुदाय के हाथ से उनका जमीन-जंगल छीन कर उद्योपतियों को देने का योजना बना रही हैं। केंन्द्र की मोदी सरकार तथा राज्य की रघुवर सरकार झारखंड से बाहर एवं देश के बाहर कई देशों में पूजिपतियों को झारखंड की धरती पर पूंजि निवेश के लिए आमंत्रित करने में व्यस्त हैं। 16-17 फरवरी 2017 को झारखंड की राजधानी रांची में ग्लोबल इनवेस्टर समिट को आयोजन कर 11 हजार देशी-विदेशी पूंजिपतियों को आमंत्रित किया गया था। इस दौरान 210 कंपनियों के साथ एमओयू किया गया। इस एमओयू में 121 उद्वोगों के लिए किया गया, जबकि कृर्षि के लिए सिर्फ एक एमओयू किया गया। इसके पहले 2000 से 2006 के बीच 104 बड़े बडे कंपनियों के साथ एमओयू किया गया हे। यदि सभी कंपनियों को अपने जरूरत के हिसाब से जमीन, जंगल, पानी, खनीज उपलब्ध किया जाए आने वाले दस सालों के अंदर झारख्ंाड में एक इंज भी जमीन नहीं बचेगी, एक बूंद पानी नहीं बचेगा। इसे सिर्फ आदिवासी मूलवासी, किसान ,मेहनतकश समुदाय केवल नहीं उजडेगें, परन्तु प्रकृति पर निर्भर सभी समुदाय स्वता ही उजड़ जाऐगें। जिनका कल का कोई भविष्य नहीं होगा।
अपने इतिहास को याद करन का समय आया है। हमारा संघर्ष का इतिहास है-घुटना नहीं टेक सकते। जब आप के विरोधी ताकतें एक साथ खड़ा हैं-तब परिस्थिति की मांग है कि-राज्य और देश के आदिवासी-मूलवासी, किसान, मेहनतकश, शोषित-बंचित सबकों एक मंच में आना होगा, अपने इमानदारी मेहनत से जनाधिकारों के लिए संघर्षरत शक्तियों को संगठित करके अपने धरोहर की सुरक्षा की गारंटी करनी होगीं
Thursday, May 30, 2019
आज भी जंगल वंही सुरक्छित है जंहा आदिवासी समुदाय है , इस सचाई को कोई छुटला नहीं सकता हैं ,
आदिवासी समाज का जल जंगल जमीन के जीवंत संबंध है. जल जंगल जमीन इनका धरोहर है, यही इनका भाषा , संस्कृति , इतिहास , सामाजिक मूल्य, आर्थिक मूल्य के साथ राजनितिक शक्ति भी है, आदिवासी समाज दुःख में भी नाचता गता है, और सुख में भी नाचता गता है, इसलिए हमें अपनी बिरासत को हर हल में बचा कर रखना है, हम बिकास का बिरोध नहीं करते , हम बिकास चाहते है, लेकिन आदिवासी, किसान, मजदूरों और जंगल , पहाड़ और पर्यावरण को उजाड़ कर नहीं, तथाकथित बिकास के पैरोकारों से अपील है की , प्रकृति का दोहन बंद किया जय, पर्यावरण के साथ जीना सीखें , तभी हम अगले पीढ़ी को भी हम उनके अधिकारों को दे हैं , आदिवासी समाज से दुनिया सीखना होगा की , हम प्रकृति से हैं , उसे दूना प्रकृति को देते है , यही करना है की आज भी जंगल वंही सुरक्छित है जंहा आदिवासी समुदाय है , इस सचाई को कोई छुटला नहीं सकता हैं ,
Richwar yuwak Chaila Sindhu aur uski premika ke sath Juda hai, Kabhi Samay ho to Jarur Is Romanchak kahani ko Sune,
khunti Jila ke Murhu Block aur Ranchi Jila ke Bundu Bluck ke Sime per sadiyon se Nirantar kal kal krte apni gati se bah rahi Daa Song sadgi, yah Munda Adivasi Bahul Gaon Pan Sakam ke pas hai. Is Daa Son Sadagi ka Bishes Lok kahani hai, Jo Richwar yuwak Chaila Sindhu aur uski premika ke sath Juda hai, Kabhi Samay ho to Jarur Is Romanchak kahani ko Sune,
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