Saturday, March 17, 2012

किसान आंसू भरी आंखो से अपने उजड़ते जींदगी को निहारते रहे। बंदुक से लैस पुलिस वालों के सामने ये मूकदर्शक बने रहे।

13 मार्च 2012
नंदू टोप्पो-नगड़ी..धरनास्थल
नंदू टोप्पो दुखित मन से बताते हैं-कोरोंज गड़हा के पास 2 एकड़ में गेंहू लगाये थे, पुलिस वाले सबको रौंद दिया। कहते हैं-हर साल धान काटने के बाद गेंहु, आलू, टमाटर, कोंहड़ा लगाते थे। पूरा गर्मी बाजार में बेचते थे। सप्ताह में चार दिन बाजार साग-सब्जी बेचने ले जाते थे। एक बाजार में कम से कम 500 रूप्या तक को बेचते थे। इस साल तो सरकार हमारे खेत में पुलिस बैठाकर रख दिया है। धरनास्थल में मौजूद श्री बिरसा उरांव कहते हैं-जुमार नदी के किनारे धान काटने के बाद आलू, गेंहू, मटर लगाये थे। मटर फूल रहा था। नया पेड़ बकाईन और गमहर लगाये थे-उसको भी पुलिसवाले उखाड़ कर फेंक दिये। हर साल जेठउवा फसल-कोंहड़ा, झींगी, नेनउवा, बोदी, भेंडी, मिरचा, प्याज, लहसून आदि लगाते थे। अब यहां पुलिस रोज पहरा देने आ रहे हैं कैसे लगायेंगे। कहते हैं-हम लोगों का जीविका का सबसे बड़ा आधार यही है-अब इसी भी सरकार काॅलेज बनाने के लिए जब्रजस्ती छीन रही है।
गीता टोप्पो, सचिनरवा टोप्पो बताते हैं-खेत में ईटा, बालू, पत्थर, गिटी सरकार गिरा दिया, इस कारण खेती ही नहीं करने सके। खेत नदी के किनारे है-सिंचाई के लिए पानी का कोई दिक्कत नहीं है। हर साल धान और गरमा फसल लगाते हैं। बबलू टोप्पो-गीता भी अपना दर्द सुनाते हैं कहते हैं-हम लोग एक क्वींटल आलू तीन एकड़ जमीन में लगाये थे, मटर एक एकड़ में लगाये थे, मटर फूल रहा था। सभी को रौंद दिया। हर नदी किनारे जमीन है-पटावन के लिए कोई दिक्कत नहीं है। सालों भर सब्जी उगा कर बेचते थे। लालू टोप्पो, सवना टोप्पो, दीपू टोप्पो, उमेश भगत और भगत टोप्पो आदि ने भी यही व्यस्था सुनाये।
सरकारी दमन के शिकार किसानों का महादेव टोप्पो-धनिया टोप्पो बताये हैं-20 किलो चना 2 एकड़ खेत में बोये थे, 10 किलो सरसों 4 एकड़ में बोये थे। सभी को पुलिस खड़ा करके बुलडोजर चलवा दिया। इसके बाद झिंगी, कदू,, कोंहड़ा, कोभी, खिरा लगाने का सोच रहे थे। अब तो पुरा गांव का खेत में ही सरकार पुलिस पहरा लगवा दिया है। मंगल टोप्पो, चुमू टोप्पो, झण्डु टोप्पो, जतरू टोप्पो ये सभी भाई हैं। इन्होंने बताया कि यहां उनका तीन कुंआ है, सभी कुंआ में बारहों माह पानी रहता है। इन साल खेत में घेरा सरकार डाल दिया है इस कारण पानी खेत में नहीं पहुंचा और धान खेती नहीं कर सके। हर साल कुंआ खेती करते थे-6 एकड़ में 80 किलो गेंहू, लगाते थे। इसके बाद हरि सब्जी कई तरह के लगाते थे। सालों भर बाजार में बेचते थे। इन्होंने बताया कि -2 एकड़ जमीन रिंग रोड़ में चला गया। धुचू उरांव, बंदी राम टोप्पो, एतवा टोप्पो, महंती टोप्पो -सबका जमीन जमुन चंवरा के पास है। सभी बरसाती धान के साथ गरर्मी के दिनों में झिंगा, बोदी, कोंहड़ा, खिरा, पालक, भाजी सभी लगाते थे। कोरोंज गड़हा-धूचू उरांव बताते हैं-मेरा टांड रिंग रोड़ में भी चला गया, बाकी में इन साल साग-सब्जी नहीं उगा पाये, सभी जमीन को सरकार हड़प लिया। सरकार द्वारा जबरजस्ती पुलिस के बल पर जमीन कब्जा किया गया -और घेराबंदी का काम शुरू किया गया। अपने लेबर को रखने तथा अन्य काम के लिए अर्जुन टोप्पो के जमीन पर आउटहाउस बना दिया है-उस ओर इशारा करते हुए अर्जुनजी कहते हैं-वही मेंरा खेत है-जिसमें घर बना दिया गया हैं। गुटी गड़हा -बिरसा टोप्पो बताते हैं-कि यहां वे बरसात में धान की खेती करते थे और गरर्मी के दिनों में साग-सब्जी उगाते थे। पंडू उरांव, महादेव टोप्पो, अलबिस टोप्पो बताते हैं-हम लोग धान खेती नहीं करन सके-कारण कि जमीन में घेरा -बांउड्रीवाल खाड़ा कर दिया है-इस कारण अब पानी खेत में भी नहीं पहुंचता है। यह दर्द सिर्फ इन्ही किसानों का नहीं है-बल्कि पूरे नगड़ीवासियों का है।
विदित हो- कि इस इलाके में सब्जी की खेती बड़े पैमाने में किसान करते हैं। कांके क्षेत्र में जो भी बाजार लगता है-सभी बाजार में यहां के किसानों का सब्जी जाता हैं। ये किसान बाहर से आने वाले विक्रेताओं के हाथ थोक में सब्जी बेचते हैं। नगड़ी के अलावे चमा, बुकरू, रोलाजारा, पतगांइ, बेरा टोली, सेमर टोली, बडहू और नवाडीह ये सभी गांवों के किसान बारो माह सब्जी खेती करते हैं और कांके रांची हर के साथ बाहर भी सब्जी भेजते हैं।
ग्रामीणो को पिड़ा है कि-सरकार कृर्षि का विकास के लिए कांके कृर्षि बिश्वबिद्यालय कांके कृर्षि वि’वविद्यालय की स्थापना 1948 में हैं ताकि झारखंड के साथ पूर भारत में कृर्षि का विकास के साथ किसानों को अर्थिक रूप से सस्कत किया जाए। साथ ही कृर्षि को दुनिया के अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ा जाए। ताकि किसानों के पैदवारों को व्यवसायिक पहचान मिले। इसके लिए कांके कृर्षि वि’वविद्यालय ने कृर्षि से संबंधित कई विभाग खोला है। इसमें मूल रूप से कृर्षि विभाग, प’ाुपालन विभाग, वन विभाग आदि का स्थापना किये हैं। कृर्षि को बढ़ावा देने के लिए सरकार हर विभाग में हर साल सैकड़ो विद्यार्थीयों को प्र’िाक्षित करता है। जो दे’ा के विभिन्न राज्यों में कृर्षि विकास के नाम पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
इसके लिए पहले ही कांके के ग्रामीणों ने हजारों एकड़ जमीन सरकार को दे चुके हैं। दे’ा सेवा के नाम पर कांकेवासियों ने रिनपास के लिए भी अपनी जमीन, जंगल, खेत-बारी सरकार को दे चुके हैं। आज पूरे वि’व में कांके का नाम है चाहे वो बिरसा कांके कृर्षि विश्वाविद्यालय के नाम पर, यह कांके पागल खाना के नाम पर। खेती-बारी को बढ़वा देने के लिए कृर्षि वि’वविद्यालय ने आज भी सैकड़ों एकड़ जमीन पर गेंहू, चना, हर तरह का साग-सब्जी, फल-फूल, फलदार पेड़ लगा रखा है। जुमार नदी के किनारे आज भी गेन्ह्नु लहलहा रहा है।
दूसरी ओर सरकार की किसान विरोधी, आदिवासी विरोधी नीति नगड़ी के किसानों को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती है। यही कारण है कि ग्रामवासियों के तमाम संविधानिक अधिकारों को दर किनार करते हुए-आई आई एम और लाॅ कालेज के नाप पर 227 एकड़ बहुफसली कृर्षि भूंमि को जबरजस्ती बंदुक के नोक पर कब्जा करने जा रही है। यह सिर्फ नगड़ी के किसानों का दमन नहीं है-बल्कि पूरे राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसानों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है। सरकार और इनके माफिया ग्रामीणों को जबरजस्त जमीन लूटने का प्रक्रिया चला रहे हैं।
नगड़ी गांव का भौगोलिक स्थिति पूरी तरह से कृर्षि आधारित है। दो तरफ से जिंदा नदी बह रहा है। पछिम से पूरब जुमार नदी बहते हुए किसानों के खेत-टांड, पेड़-पौधों को सिंचते हुए बह रही है। इस नदी के जलस्त्रोत से बिरसा कृर्षि बिश्वबिद्यालय भी खेती-बार और बगवानी ट्रेनिंग के तहत सिंचाई का काम हो रहा है। जुमार नदी किसानों का जीवनदायीनी है। गांव के पूरब दिशा में छोटका नदी बह रहा है। इस नदी के किनारे किनारे कई गांवों के किसान बरसाती धान कटाई के बाद सैंकड़ो एकड़ खेत में गेहु, चना, प्याज, हलसूल, कदू, कोंहड़ा, ककड़ी, मिरचा, अदरक, लाल भाजी, पालक, गंधारी, तरबुज, आलू , भेंड़ी आदि खेती करते हैं। नगड़ी के किसान इस सर्ष 2012 में भी 50 एकड़ से अधिक खेत में गेहू, चना, प्याज, आलू खेती किये थे। लहलहाते खेत को जमीन कब्जा करने के दौराने बुलडोजर से फसल को नष्ट कर दिया। किसान आंसू भरी आंखो से अपने उजड़ते जींदगी को निहारते रहे। बंदुक से लैस पुलिस वालों के सामने ये मूकदर्शक बने रहे।
नदी के किनारे गड़हा दोन है। उसके उपर इसे कम गड़हा दोन और उपर में चांवरा है। सभी खेतों को एक साथ मिलाने के लिए दोन और चांवरा के आड़ को बुलडोजर से तोड़ कर समतल करना प्ररंभ्म कर दिया। एक दो बार और बुलडोजर चला देने पर तो गांव के किसान अपना -अपना खेत-टांड को भी नहीं पहचान पाएंगे। 9 जनवारी को पूरा पुलिस फोरस खेत के चारों ओर लगा दिया गया। इसके बाद खेत में गाय, भैंस, बकरी, भेड़ आदि को भी चारने जाने से पुलिस वालों ने रोकना शुरू किया। किसी भी आदमी को खेत में उतरने नहीं दिया जाने लगा। सरकार की इस दमनकारी नीति के खिलाफ नगड़ी वासी पहले से ही आंदोलनरत थे और आज भी आंदोलनरत हैं।
नोट...पेज .२...लगातार पढ़ें..पेज..३..

3 comments:

  1. Really so impressive di, It's a perfect and memorable activity for society

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    1. Aap itani tanmayta se samaj k liye ladayi kar rahi hain ... kaash aapke saath administration bhi taal se taal mila k chalti to yahan ki garib janta ko kadam kadam pe damankari nitiyon ka saamanaa nahi karna padta.

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  2. हमारे देश में ऐसा भी हो रहा है ??
    आश्‍चर्य है !!

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