VOICE OF HULGULANLAND AGAINST GLOBLISATION AND COMMUNAL FACISM. OUR LAND SLOGAN BIRBURU OTE HASAA GARA BEAA ABUA ABUA. LAND'FORESTAND WATER IS OURS.
Saturday, October 10, 2015
गाय गोहाल ही शरणस्थल बना।
रांची पहुंच गयी आठवी पास का सरटिफिकेट लेकर
कहां रहना है, क्या खाना है, ये कुछ भी पता नहीं था
मां पीपी कम्पांउड में प्रीतम सिंह सरदार के घर आया का
काम करती थी
उनके खपरैल मकान के ठीक पिछवाडे रोड के उस पार
सुजान सिंह का जमीन चारों ओर से घेरा बंदी किया हुआ था
उसके भीतर एक एसबेटस की छत का घर था
जिसमें तीन-चार गायें थीं, उसी में एक तरफ मेरे गांव
के दो परिवार, और उनके दूसरे रिस्तेदार रहते थे
डिबू दादा याने बड़ा भाई भी यहीं रह कर कुली का काम करते थे
खाना कहीं भी झोपड़ी हाटल में खा लेते थे
मेरे लिए भी सुजान सिंह का गाय गोहाल ही
शरणस्थल बना।
कहां रहना है, क्या खाना है, ये कुछ भी पता नहीं था
मां पीपी कम्पांउड में प्रीतम सिंह सरदार के घर आया का
काम करती थी
उनके खपरैल मकान के ठीक पिछवाडे रोड के उस पार
सुजान सिंह का जमीन चारों ओर से घेरा बंदी किया हुआ था
उसके भीतर एक एसबेटस की छत का घर था
जिसमें तीन-चार गायें थीं, उसी में एक तरफ मेरे गांव
के दो परिवार, और उनके दूसरे रिस्तेदार रहते थे
डिबू दादा याने बड़ा भाई भी यहीं रह कर कुली का काम करते थे
खाना कहीं भी झोपड़ी हाटल में खा लेते थे
मेरे लिए भी सुजान सिंह का गाय गोहाल ही
शरणस्थल बना।
Thursday, October 8, 2015
(अगर वो महिलाएं डायन थी तो हम ग्रामीणों को बताते जब वे जिंदा थे, तब हमलोग पुछते कि क्या सही में आप लोग गलत हो? हम गांव वाले पूछते, लेकिन अब उनलोगों को हत्या कर दिया, अब किससे पूछेगें?) जांच का विषय
जान देना है कि जान लेना है कहा थैं -कइह के बोलाए लेई गेलाएं, और मोरल मुरदा के मारेक कहथै -तो मरबे उके? हमर माइंया कर बाप नी मराथे लाश के तो उकहेे मरलैं और चोट लाइगहे।(जान देना है कि जान लेना है-बोल कर लोगों को भी बुला कर लेगये, और लाश को हम लोगों को पिटवा रहे थे, मरल मुरदा को कौसे मारियेगा? हमलोगों को मांइया का बाप लाश को पिटने से इंकार किया तो, उसको भी मारे, चोट भी लगा। पीडिता के परिवार वालों ने बताया-जब उन लोगों( महिलाओं को) को मार दिया, इसके बाद कुछ लोग घर आये और सबको धडका-धुडका के अखड़ा ले गये। वहां सबको बोला गया कि गांव में रहना है तो इसमें साइन करो। हम लोग डर के मारे वहां से खिसक गये। एक नाबालिक बताती है-वहां पांच लाश था लेकिन किनका किनका है, यह समझ में नहीं आ रहा था। वहां सबको चेहरा देख देख कर रजिस्टर में साइन करवा रहे थे। एक साइन करने के बाद रजिस्टर को आगे बढ़ाते समय हाथ में रजिस्टर थमा कर, चेहरा देखकर बोल रहे थे-गांव में रहना है तो साइन करो। कहती है-मेरा भाई और हम को भी साइन करवाये।
निर्दोष परिवार के लोगों को भी हत्यारों ने लाठी-डंडटा, तथा अन्या हथियार थमा कर पांचों महिलाओं के शवों को पीटवाया। महिलाओं के लाश को जो पीटने से इंकार किया-उसको हत्यारों ने पीटा। यही नहीं अखरा में जबरन लाये गये निर्दोष लोगों को रजिस्टर में हत्साक्षर करवाकर यह साबित करने का प्रयास किया-कि हम पूरा गांव के लोग मिलकर इन डायन-विसाहियों का हत्या किये हैं। असली साजिशकर्ता इस शजिस में सफल भी हुए। जिन लोगों को हत्या के बाद पुरना अखड़ा में बुला कर ले जाया गया था-कहते हैं, जो हत्या करने में शा मिल नहीं थेे, उन लोगों को भी मुरदा को मरवा रहा था। सात अगस्त की रात कंजिया मराई टोली के लिए काली रात थी। रात को जब सो रहे थे-तब कुछ लोग शराब में डूबे गांव की पांच निदोश मां‘-बहनों को एक एक कर मौत के घाट उतारा। पांच महिलाओं की हत्या के बाद साजिशकर्ता तथा हत्यारों ने अपने को कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए अपने घरों में सो रहे लोगों को जगा कर हिदायत दिया-कि अगर तुमको समिति में रहना है तो -पुरना अखरा चलने का फरमान दिया। किसी से कहा कि यदि तुमको गांव में रहना है तो पुरना अखरा चलो और जो हमलोग कहेगें करो, और गांव में नहीं रहना है-तो तुम्हारे साथ भी वहीं किया जाएगा, जो उन महिलाओं के साथ हुआ।
निर्दोष परिवार के लोग जिनको डरा धमका कर उस हत्याकांड में शामिल किया गया है-पूरी तरह भयभीत हैं, जिनकी पीड़ा अब दबी जुबान में बाहर प्रकट हो रहा है। हमरे गोठिया थी-निदोष मन के मुंह खोलेक होवी। ये हे तो हडबडी में हमरे मन सोचेक नी परली। और नहीं कई के बोलक नही परली और फइंस जाएही। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं-अगर डायन रहैं तो हमरे गांवाइया-का ले अही? जिंदा रहैं सेखने गांवइया के बैठातैं-हमीन पूछती-कि तोहरे सही में गलत अहा कि, का हेका,? हमरे गांवाईया पूछती, अब मोराय देलैं केके पूछब?(अगर वो महिलाएं डायन थी तो हम ग्रामीणों को बताते जब वे जिंदा थे, तब हमलोग पुछते कि क्या सही में आप लोग गलत हो? हम गांव वाले पूछते, लेकिन अब उनलोगों को हत्या कर दिया, अब किससे पूछेगें?)
जांच का विषय
1-हत्या करने के पहले कुछ लोग बैठक किये-यहीं पर सभी नशापान किये। यहां यह जांच का विषय है कि-जो युवक नशा किये-वे दारू पीये, या हंडिया पीये या फिर अंग्रेजी शराब पीये। कौन था जो शराब पिलाया? इसका शजिसकर्ता कौन है, क्या गांव है या फिर गांव से बाहर का है।
2-जिस ओझा के पास गये थे विपिन के मौत का कारण जनने, वो ओझा कौन है? सवाल यह भी है कि-किसने उस ओझा के पास जाने के लिए सलहा दिया था?
3-साधारणता अंधविष्वास सामाज के बुजूर्ग वर्ग में मिलता है, इसलिए कि ये कम पढ़ेलिखे होते है, अधिकांश अनपढ़ होते हैं और सामाज की पुरानी परंपराओं या मान्यतों पर अस्था रखते हैं। लेकिन इस कांड को अंजाम देने में षिक्षित युवाक थे। तब इन षिक्षित युवको का अंधविष्वास में डूबा होना भी बड़ा सवाल खड़ा करता हैं।
4-अगर पूरा गांव हत्या करने में शामिल था-जिस तरह कि घटना के बाद लोग सिना तान कर बोल रहे थे-हम लोगों ने मिल कर डायन को मारा है तब-घटना के दिन बढ़ कर भूमिंका निभाने वाले युवक कार्रवाई के नाम पर डर से क्यों भागते-फिर रहे हैं?
5-अगर पूरा गांव हत्या में शामिल था-तब यहां बडा सवाल है कि-कंजिया मराई टोली में 80 परिवार है-क्या 80 परिवार अंधबिश्वाश में डूबा है, सभी डायन-विसाही पर विश्वश है? इसका जवाब तो कंजिया मराई टोली को ही आज नही ंतो कल देना ही पड़ेगा।
6-इस गांव में अंिधकांश घरों में लोग दारू बना कर बेचते थे-इस कांड के बाद दारू बनाना, बेचना अपने आप बंद हो गया-जबकि पहले कई बार इस गांव में भी शराब बंदी का अभियान चलाया गया महिलाओं द्वारा तब बंदी करने में विफल रहे थे।
अगर इन बिंदुओ पर गहराई से जांच किया जाएगा-तब याह साफ हो जाएगा कि असली साजिशकर्ता कौन है?
दयामनी बरला
7 अगस्त की रात गांव की पांच निर्दोष आदिवासी महिलाओं को डायन-विसाही बता कर सबके घर के दरवाजा का तोड़ तोड़ कर घर से खिंच खिंच कर मारते -पीटते अखडा में ला कर लाठी-डंडा, बलुआ, टांगी से पीट पीट कर हत्या कर दिये। इन महिलाओं के हत्या का गवाह खून से सना अखडा का बालू-माटी के साथ धुमकुडिया, कटहल पेड़ और पीपर पेड़ भी बने।
कंजिया मराई टोली गांव में दो दिन--
कंजिया मराई टोली में सात अगस्त की रात पांच आदिवासी महिलाओं की डायन-विसाही के अरोप में निर्मम हत्या की गयी। राज्य में डायन बताकर हत्या करने का यह सबसे बड़ा मामला है। इससे समझने के लिए सोषंतो मुखर्जी और मैं कंजिया मराई टोली 13 अगस्त को मोटरवाईक से पहुचे। राज्य की राजधानी से महज 25 किमी दूर है मांडर प्रखंड मूख्यालय। थाना से करीब दो किमी दूर है गांव कंजिया मराई टोली । जो उरांव आदिवासी बहुल गांव है। समतल भूमिं को मेंड ने टांडों और खेतों में विभाजित कर कई परिवारों को उस जमीन का मलिकाना हक दिया है। चारों तरफ हरियालीं ही हरियाली। खेत में लगे धान-मंडुआ के खेत भी हरियाली बिखेरा हुआ है। हरियाली खेतों के बीच महुंआ का पड़े भी दिखाई देता है। कई खेतों में किसान धान रोप रहे हैं। रोड़ से ही गांव दिखाई देता है। गांव के चारों ओर बड़े बड़े आम, बरगद, कटहल, महुंआ, जामून, बरहड, पीपल, इमली, बरगद आदि फलदार पेडों से पटा हुआ है। बांस का तो जंगल ही लगा हुआ है।
गांव में करीब 80 परिवार है। गांव पूरी तरह से परंपारिक तरीके से बसा हुआ है। एक घर से सटा दूसरा घर। पुरना अखड़ा के बाद कई घर चटटान बना हुआ है। टोली का गंदा पानी बहने के लिए कोई नली नहीं दिखता है। फैला चटटान में घर के आगे-पिछवाडे जिधर चटटान थोड़ा ढलान है-घरों को टोली का गंदा पानी उधर ही बह रहा है। एक घर के बाद अगला घर जाने के लिए किसी के आंगन से तो किसी घर के पिछवाडें से होकर ही जाना है। चटटानों पर बने घरों के बाद गांव के भीतर भी सभी घरों के आंगन में, पिछवाडें में, गली में आम, कटहल, बांस का बाखोड़, कोयनार, ईमली, डाहू आदि फलदार पेड़ हैं। अखड़ा में एक कटहल और पीपल का पेड़ है। अखड़ा के पास ही धुमकुडिया का टुटा मकान है।
7 अगस्त की रात गांव की पांच निर्दोष आदिवासी महिलाओं को डायन-विसाही बता कर सबके घर के दरवाजा का तोड़ तोड़ कर घर से खिंच खिंच कर मारते -पीटते अखडा में ला कर लाठी-डंडा, बलुआ, टांगी से पीट पीट कर हत्या कर दिये। इन महिलाओं के हत्या का गवाह खून से सना अखडा का बालू-माटी के साथ धुमकुडिया, कटहल पेड़ और पीपर पेड़ भी बने। 8 अगस्त के अहले सुबह खबर मिला कि कंजिया गांव में पांच आदिवासी महिलाओं को डायन-बिसाही करार कर उनकी हत्या कर दी गयी। यह भी खबर आ रहा था मीडिया -चैनल के माध्यम से कि जघन्य घटना को पूरे ग्रामीणों मिल कर दिया है। और इन्हें किसी तरह का अफसोस नहीं है कि हमने पांच लोगों की हत्या कर गलत किये हैं। इस खबर ने राज्य के साथ पूरे देश को झकझोरा दिया। कि आज जब समाज और देश विकास के रास्त्ेा चांद तक पहूंच गया वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज अधंविशस में डुबा हुआ है। अधंविशस आदिवासी समाज के लिए अभिषाप बना हुआ है।
जसिंता टोप्पो का परिवार तो शिक्षित है ही, साथ समाज को शिक्षित बनाना चाहते थे-शयद इसीलिए गांव में आंगनबाड़ी स्कूल के लिए जगह खोजने की बात आयी तो, जसिंता ने पहल कर अपने खनदान वालों को जमीन देने के लिए राजी करवायी। और आज स्कूल भवन इसी जमीन पर खड़ा है। जहां गांव के बच्चे पढ़ रहे हैं और उन्हें पोषाहार भी उब्लध कराया जाता है। जसिंता का एक बेटा अर्मी में रह कर देश सेवा कर रहा है, वहीं एक बेटी फरमेशी में काम करते लोगों का स्वास्थ्य लाभ पहुंचा रही है। छोटी बेटी अभी पढ़ ही रही है। अर्मी बेटा ने अपने कमाई से एसबेसटस का मकान बनया जहां जसिंता का परिवार रहता है।
स्व0 एतवा खलखो की विधवा थी रकिया खलखो। रकिया के चार बेटे हैं। रकिया की बेटी थी तेतरी। तेतरी के पति दस साल पहले गुजर चुके हैं। विवधा होने के बाद तेतरी अपनी मां घर वापस रहने आ गयी। रकिया का एक बेटा पुलिस विभाग में कार्यरत है जो चांडिल में पोस्टेट है। रकिया के परिवार वाले बताते हैं-मां अपने बहु और नाती के साथ करीब पांच साल से रांची में रहती थी। कभी-कभी गांव आते जाते रही थी। इस साल जून माह में घर आयी थी। बच्चों का छुटटी था इसलिए बहु भी घर आयी थी। रकिया की बहु सामने कुंआ की ओर इशारा करते बताती है-उस कुंआ को इसी गर्मी में फिर से खोदवाये हैं ताकि गांव वालों को पानी को दिक्कत न हो। कुंआ धंस गया था, पानी सूख गया था। इसलिए फिर से बनवाये हैं।
इन्होंने बतायी-रकिया का बेटा घटना के दो दिन पहले घर आया था, तब मां रांची जाने का इच्छा जतायाी थी नाती को देखने का मन कर रहा है बोली। लेकिन बेटा यह कहते हुए कि अभी दीदी धान लगा रही है-इसलिए बाद में ही ले जाने की बात बोल कर घर में छोड़ दिया। रकिया की बहु बतायी-दीदी तेतरी यहीं रहती थी इस साल हमारा हिस्सा का खेत में दीदी ही खेती का काम सम्भाली हुई थी।
पीडित परिवार स्व0 मदनी के पति बताते हैं-हम हर साल नोवेंबर में बंगाल जाते हैं और जून में वापस गांव खेती बारी करने के लिए आते हैं। एक दिन में 200 मिलता है। अकेले आते जाते हैं। वहां गर्मी बहुत ज्यादा रहता है। इसकारण लोग टिक नहीं पाते हैं। जो तकलीफ सह सकता है-वही वहां कमा सकता है। बंगाल का कमाई से डेढ एकड़ जमीन गांव में खरीदे हैं। उस खेत में हर साल 45 मन तक फसल होता है। घर का बाप का जमीन को अभी बखरा नहीं कियें हैं। एक भाई जया, और दूसरा प्रहलाद है। यही दोनों बाप का जमीन पर खेती बारी करते हैं। गांव वाले जिस जमीन को खेती नहीं कर सकते हैं- मेरा परिवार उस खेत को साझा में खेती करता है।
मदनी को बेटा -बताता है-बरसात के दिन आदी, खाीरा, भेंण्डी, अदरक , झींगी, बीन खेती करते हैं। गर्मी में खीरा, टमाटर, गेंहूं, प्याज, आलू लगाते हैं। बाजार में भी सब्जी बेचते हैं। माटी तेल जला कर खेत पटाते हैं। माटी तेल गर्मी में 45 रू लीटर रहता है। बिजली तो इस साल 2015 में आया है। सूना-कहते हैं-धान काट कर फिर हम चले जाएगें बंगाल काम करने। जो हो गया अब क्या करेगें।
पीडिती एतवारिया का पति 2012 में ही गुजर चुका है। बेटा सुकुमार, कहता है-पिताजी बीमारी से मर गये, गरीबी के कारण सही इजाल नहीं हो सका। एतवारिया को बेटा आशीष 8 संत जेवियर स्कूल में क्लास 8वीं में पढ रहा है। पिता का निधन के बाद बड़ा बेटा का पढ़ाई रूक गया । बेटा बताता है-मेरा बाबा बड़ा था। तीन चाचा थे। बीच का दो चाचा भी मर चुके हैं।
दयामनी बरला
Wednesday, September 30, 2015
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