Thursday, April 25, 2019

jharkhand वीरों की धरती है। बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी, जतरा टाना भगत, नीतंबर-पितंबर, माकी मुंडा, डोंका मुंडा जैसे बीरों की धरती

झारखंड के असली नायकों को इतिहास भूल गया

jharkhand  वीरों की धरती है। बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी, जतरा टाना भगत, नीतंबर-पितंबर, माकी मुंडा, डोंका मुंडा जैसे बीरों की धरती। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बताता है कि अंग्रेजों को अगर देश में किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ा, वह क्षेत्र झारखंड ही है। यहां के आदिवासियों ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया। हजारों शहीद भी हुए। लेकिन पीछे नहीं हटे। झुके नहीं। अंग्रेजों को जमक र सामना किया। दुर्भाग्य की बात यह है कि इनमें से स्वतंत्रता संग्राम के अधिकांश ऐसे नायकों को इतिहास में जगह नहीं मिली। हां भगवान बिरसा मुंडा सिदी-कान्हू, तिलका मांझी जैसे 15-20 नायकों को ही इतिहास ने जगह दी। दरअसल उस समय के इतिहासकारों ने सैकड़ों हजारों वीर आदिवासियों के साथ घेर अन्याय किया। ऐसे नायक गुमनाम ही रह गये। कहीं-कहीं सरकारी दस्तावेजों में इनमें से कई के नाम का सिर्फ उल्लेख है, लेकिल वह भी बहुत खोजने पर मिलता है। ऐसे नायकों को उनके गांव पंचायत के लोग भी शायद नहीं जानते । प्रधानमंत्री ने झारखंड समेत कुछ आदिवासी बहुल राज्यों में भारतीय स्वतंेत्रता संग्राम के नायकों के लिए आदिवासी म्यूजियम बनने का फैसला किया है। लेकिन डर इस बात का है कि इस म्यूजियम में कहीं ऐसे गुमनाम नायक छूट न जायंे। संशय इसलिये है, क्योंकि झारखं डमें ऐसे नायकों का दस्तावेज बनाया ही नहीं गया, जो थोड़े दस्तावेज बने भी होगें, वे नष्ट हो गये होगे। झारखं डमें ऐसे दस्तावेज हैं ही नहीं, इसलिए सबसे बड़ी चुनौती है कि ऐसे नायकों को खोजा जाये। अगर ट्राईबल म्यूजियम में भी ऐसे नायको के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी, तो यह म्यूजियम अधुरा ही रहेगा।
देश-दुनिया  के कई बेहतरीन लाइब्रेरी, अभिलेखागार में कुछ दस्तावेज इस संदर्भ में हैं, लेकिन झारखं डमें नहीं। ऐसे दस्तावेजों को विदेशों से भारत उसके बाद झारखंड लाना होगा। यह काम केंन्द्र सरकार ही कर सकती है। कुछ जानकारी आदिवासी समाज के गीतों से भी मिल सकती है। देश और झारखंड अपने वीर नायकों की वीरता की कहानी पढ़ना चाहता हैं, सुनना चाहतो, डनहें सम्मान देना चाहता हे, लेकिन जानकारी मिले तब न, सरकारी दस्तावेजों में कहीं-कहीं सिर्फ ऐसे नायकों के नाम का उल्लेख हैं, वे किस गांव के थे, यह बताना, उनकी चाद में कार्यक्रमों का आयोजन करना भी बड़ा धर्म है और ऐसे नायकों के प्रति सम्मान होगा।
भगवान बिरसा मुंडा को पूरा देश जानता है, उनके बारे में लोगों को जानकारी है, लेकिन कई जा पर जानकारियां विदेशों में हैं, उन दिनों मिशनरी से जुड़े लोग जर्मन से आया करते थे। उन्होंने बिरसा मुंडा के आंदोलन पर काफी कुछ लिखा। उन जानकारियों पर शोध करने की जरूरत है, यहां बात हो रही है, गुमनाम नायकों की, पहले दो नायकों की बात करें। सूरज मांझी और सोना मांझी के बारे में पूरे झारखंड में पता कर लीलिए, शायद ही कोई होगा जो बता पायेगा। संभव है कि उनके गांव में भी लोग इन दोनें के बारे में नहीं जानते होंगे। तो जानिए-सूरज मांझी और सोना मांझी दोनों वृहद झारखंड के थे। सूरज मांझी विद्रोहियों के नेता थे, उन पर अंग्रेजों ने भाषण के माध्यम से उत्तजेना फैलाने के आरोप लगाया था। 13 नवंबर 1ृ857 को उन्हें उम्र कैद की सजा दी गयी। उन्हें कालापानी की सजा हुई थी। 3 सितंबर 1ृ858 को उन्हें अलीपुर जेल से अंडमान जेल भेजा गया। 14 अक्टोबर को उन्हें अंडमान जेल में बंद किया गया था। इसी प्रकार सोना मांझी पर भी इसी प्रकार का अरोप था। 1ृ3 अप्रैल 1ृृृृ858 को उन्हें आजीवन कारावास की सला सुनायी गयी। कालापानी की सजा देने के बाद उन्हें 1ृृृृ4 अक्टोबर 1ृ858 को अंडमान जेल पहुंचाया गया। उसके बाद क्या हुआ, किसी को पता नहीं।
बिरसा के उलगुलान के दौरान एक बड़ी घटना घटी थी। तत्कालीन रांची जिला के गुटुहड निवासी मंगन मुंडा के पुत्र हतिराम मुंडा को अंग्रेजों ने जिंदा दफन करने का शायद ही कोई दूसरा उदाहरण हो, लेकिन आज झारखंड के लोग हतिराम मुडा की वीरता की कहानी को नहीं जानते। लोन यही जानते हैं कि 1ृृृृ855 में भोगनाडीह में संताल विद्रोह हुआ था। 1857 में सिपाही विद्रोह, लेकिन 1ृृृृृ855 और 1ृ857 के बीच यानी 1ृृृृ856  में संतालों ने हजारीबाग, खडगडीहा, बेरमो के आसपास बड़ा विद्रोह कर दिया था। इन्हें एक साल पहले हुए संताल विद्रोह से प्रेरणा मिली थी। इनमें से कई ऐसे संथाल थे, जो 1ृृ855 के विद्रोह में शामिल हुए थे। हजारीबाग के आसपास हुए संताल विद्रेाह के नेता थे रूपु मांझी, अर्जुन मांझी, यह विद्रोह गोला, चितरपुर, पेटरवार और पुरूलिया तक फैल गया था। अंग्रेजों और उनके पिछलगू जमींदारों-महाजनों ने संतालों और उनके नेता रूपु मांझी के घर को फंूक दिया था। आज न रूपु मांझी की चर्चा होती है और न ही अर्जुन मांझी की।
इसी तरह गुलाबी मांझी -(कुसुमडीह संताल परगना), चंद्रा मरांडी -(सिंघाटांड- संताल परगना), कान्हू मरांड-(गारका- संताल परगना), रातू मरांडी( रिवजुरिया-संताल परगना), सुदर मरांडी ( सरसाबाद-संताल परगना), धेरेया मुंडा (डेमखानेल-रांची), हरि मुंडा ंगुटुहातु-रांची, माल्का मुंडा-सिंहभूम, नरसिंह मुंडा-जनुमपीडी-रांची, सोमबराय मुंडा-रांची, सुखराम मुंडा-चकलधरपुर, बाजू मुर्मू-डुमरिया-संताल परगना, मंगल मुर्मू- नरायणपुर-संताल परगना, जैसे सैकडों ऐसे आदिवासी रहे हैं। जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में जान गवांयी है। चाह पुलिस की गोलियों से मारे गये या फिर जेल में बंद कर इन्हें इतनी यातनाएं दी गयी कि उनकी जान चली गयी। वे सभी ट्राइबल म्यूजियम में जगल पाने के हकदार हैं और सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही कि कैसी ऐसे नायकों को खोज निकाला जाये।
यह सही है कि झारखंड क्षेत्र में आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ लगातार संर्घष किया ओर जान भी दी, लेकिन यह भी सच है कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़नेवालों में गैर आदिवासी भी थे। ऐसे नयकों को भी उचित स्थान मिलना चाहिए। झारखं डमें कोई ऐसी जगह नहीं हे, जहां सभी शहीदों की प्रतिमा हो यह स्मारक हो। इस पर विचार करना चाहिए। रांची जेल में ही भगवान बिरसा मुंडा की मौत हुई थी। उलीहातू में उनका जन्म हुआ था। डोंबारी बुरू में उन्होनं अंतिम लड़ाई लड़ी थी।  बंदगांव के पास रोगोतो जंगल से उन्हें पकडा गया था।  ये सभी ऐतिहासिक स्थल हैं, इनका सर्किट बना कर इन सभी का विकास कर इसे संरक्षित किया जा सकता है। झारखं डमें साठ के दशक में जनजातीय शोध संस्थान खुला था, आज स्थिति देख लीलिए, साधन के अभाव में शोध कार्य बंद है। किसी तरह यह संस्थान जिंदा है। बेहतर हो, विशेष केंन्द्रीय सहायता से इसे विकसित किया जाये। झारखं डमें राष्ट्रीय स्तार का अभिलेखागार बने। जहां से देश-दुनिया से शोध करने आये छात्र खाली हाथ लौट कर न जायें।


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