आदिवासी ईलाके में जब अंग्रेज शोषक शासकों, जमींनदारों और इजारेदारों द्वारा आदिवासियों के स्वाशान व्यवस्था पर चारों तरफ से हमला कर दिया था तब बिरसा मुंण्डा ने कहा था देखो-हमारी धरती धूल की तरह उड़ी चली जा रही है। आज वैश्विक पूंजी बाजार में आदिवासी-मूलवासी, दलित, मजदूर, किसानों का जंगल, जमीन, सहित प्राकृतिक धरोहर पर कारपोरेट गठबंधन शक्तियों का हमला तेज होता जा रहा है। आदिवासी किसानों के परंपरागत अधिकार सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट, खूंटखटी अधिकार, विलकिनसन रूल, पेसा कानून और 5वीं अनुसूचि में प्रावधान अधिकारों पर काॅरपोरेट कंपनियों का बुलडोजर चल रहा है। विस्थापन की लड़ाई -जंगल, जमीन, खनिज के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ आदिवासी, मूलवासी, किसान, मजदूर समुदाय जाति, धर्म, वर्ग और राजनीति से उपर उठकर संगठित शक्ति बन कर संघर्ष की परंपरा रही है। जो जीत की गारंटी करता था।
लेकिन आज के पूंजीवादी बाजार व्यवस्था में स्वंय देश की कल्याणकारी सरकार देश की संवैधानिक संघीय ढंचों को ध्वस्त करने काम कर रही है। संविधान के लोकतंत्रिक बुनियाद का तहस-नहस कर दिया है। आदिवासी, दलित, किसानों एवं मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों में बहुत सारे संशोधन पूंतीपतियों और कारपोरेट घरानों के हित मे ंकर चुका है। धर्म मानने की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, खत्म हो चुकी है। जो सामुदाय की सामूहिक-संगठित प्रतिरोध की शक्ति को कमजोर करने का बड़ा हथियार सिद्व होता जा रहा है।
देश की वैश्विक नीति विश्व बैंक और काॅरपोरेट घरानों के दिशा निर्देशों, पूंजिपतियों के मुनाफा कमाने की होड़ एवं कल्याणकारी राष्ट्र (देश) एवं राज्य की बदलती भूमिका ने देश के आदिवासी, मूलवासी किसान, दलितों के परंपरागत संवैधानिक अधिकार को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को जहां सरकार विकास का पैमाना मानती है, वहीं निजी पूंजि को भी तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए भूमि की सामुदायिक स्वामित्व के रिकार्ड एवं पंजीयन व्यवस्था को अपने अनूरूप बदल कर भूमि की खरीद-बिक्री में तेजी लाना सरकार अपनी प्राथमिता मानती है। इसके जमीन के सभी परंपरागत भूमि दस्तावेजों, खतियान पार्ट वन, खतियान पार्ट टू, गांव का नक्सा, वीलेज नोट सभी को लैंण्ड रिकार्ड मोडनाईजेशन कार्यक्रम के तहत डिजिटल लैंण्ड पार्सल मैप, बनायी गयी हैै। इस डिजिटल रिकार्ड का संचालन एवं नियंत्रण की जिम्मेवारी एनआईसी को दिया गया है। जिसमें भूमि के मालिकाना का रिकार्ड, संपत्ति कर/टैक्स एवं भूमि के खरीद-बिक्री की प्रक्रिया भी पूरी की जाती है। इस प्रक्रिया में ग्राम सभा, आदिवासी समुदाय, किसानों के सहमति-अहसमति देने-लेने की कोई जगह नहीं है। ताकि सरकार रियल इस्टेट, देशी-विदेशी कंपनी जिससे भी जमीन चाहिए, आसानी से उपलब्ध किया जा सके।
ग्लोबल पूंजी बाजार की व्यवस्था ने भोजन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य को मुनाफा का मूल आधार के रूप में विकसित किया। जिंदगी की इन मूलभूत जरूरतों को निजी पूंजी/ कंपनियों के स्वामित्व के हवाले सरकार ने कर दिया है। इसके लिए दो बातों की आवश्कता थी पहली-देश के लोकतंत्र एवं लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को समाप्त करना, तथा बाजार में राज्य के हस्तक्षेप को समाप्त करना। दूसरी-प्राकृतिक संसाधनों, जंगल, जमीन, पानी, और खानिज पर कब्जा करना। इसका मूल उद्वेश्य, राष्ट्र और राज्य की संप्रभूता को समाप्त करना और बाजार की पूजिवादी व्यवस्था को मजबूत करना।
देश की लोकतंत्रिक व्यवस्था अलोतंत्रिक हो गयी है। अपने आम नागरिकों के कल्याण की जगह काॅरपोरेट घरानो, पूंजीपतियों के कल्याण की चिंता सर्वोपरि होते जा रही है। यही कारण है कि देश के संविधान में प्रावधान अनूसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़े समुदाय के सामुदायिक अधिकारों को खारिज कर काॅरपोरेट के हाथों को मजबूत किया जा रहा है।
ंवल्डबैंक सहित अन्य पूंजिपतियों के द्वारा भोजन, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मौलिक अधिकारों का नीजिकरण के अब मुकाफा कमाने का सबसे बड़ा साधन जंगल, जंमीन और खानिज बन गया है। वल्डबैंक ने जमीन के खरीद-बिक्री एवं जमीन अधिग्रहण कानूनों की जटिलताओं को सरलीकरण करने का प्रयोजन किया है। इस उद्वेश्य की पूर्ति के लिए ही भूमि के दस्तावेजों का डिजिटालाईजेशन किया गया। 5वीं और 6ठी अनुसूचित क्षेत्र में बडे पैमाने पर समाज का समुदायिक भूमि है जिसको गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला, खेल मैदान के रूप में है। साथ ही आदिवासी समुदाय के धर्मिक स्थल सरना, ससनदीरी, जाहेर, जहिरा, बहा सरना, केडा सरना, गुमी सरना, देसाउली है। 2014-15 में ये सभी भूमि केंन्द्र सरकार के निर्देश पर 22 लाख एकड जमीन भूमिबैंक में शामिल कर दिया गया। जिससे सिंगल विंडो सिस्टम से धडले से खरीद-बिक्री हो रहा है।
2020-21 में मोदी सरकार ने 24 ंअप्रैल 2020 को केंन्द्र सरकार ने देश में स्वमित्व योजना लागू करने की घोषणा की। घोषित स्वमि
त्व योजना के तहत डिजिटल इंण्डिया लैंड रिकाॅर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) चलाने की योजना बनायी गयी। इस योजना के तहत ड्रोन से गांवों की संपति का सवेक्षेण कर जीअईएस मानचित्र बनाये जाऐगें। साथ ही जमीन मालिको को प्राॅपटी कार्ड बना कर दिया जाएगा जो 14 डिजिट का होगा। ये जीआईएस नक्से और स्थानीय डेटाबेस ग्राम पंचायतों और और राज्य सरकार के अन्य विभागों द्वारा विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग किये जाएगें। इस स्वमित्व योजना का कई उदद्वयों के साथ मूल उद्वेश्य एक राष्ट्र एक साॅफटवेयर (व्दम छंजपवद व्दम ैवजिूंतम) व्यवस्था करना है। ( दिशानिर्देश पेज 26)
आखिर यह गडा बदलाव किसके लिए
डिजिटल इंडिया लैंड रिकाॅर्ड अधुनीकिरण ने भारत को बदल रहा है। देश के नियम-कानून को बदल दे रहा है। देश की संघीय व्यवस्था को बदल रहे हैं। परंपरागत गांव का अस्तित्व बदल दिया जा रहा हैं। गांव की भौगोलिक स्थिति और समाज की सामाजिक मूल्य बदल दिया जा रहा है।
बदलाव होना चाहिए, लेकिन बदलाव लाने का उद्वेश्य क्या है? बदलाव लाने के केंन्द्र में किनको रखा गया है? क्या अमीरों को, पूंजीपतियों को, देश -विदेश के काॅरपोरेट घरानों को या आदिवासी, दलित, किसान, मेहनतकश मजदूरों को? यह सवाल महत्वपूर्ण है।
जमीन का जो अधुनिकीकरण व्यवस्था स्थापित किया जा रहा है, वह पढे़-लिखे समुदाय के लिए निश्चित तौर पर उपयोगी साबित होगा। क्योंकि इस व्यवस्था में सारी जानकारियां आॅनलाईन /वेबसाईड में उपलब्ध होगा। इसको उपयोग करने के लिए बहुत सारी जानकारी रखना जरूरी होगा। साथ ही कम्प्युटर, लेपटाॅप, स्मार्ट फोन जरूरी होगा। इसको उपयोग करने के लिए बिजली की उपलब्ध के साथ आॅनलाईन कनेक्शन /नेटवार्क बिना बाधा के सतत उपलब्धता अतिअवश्यकता होगा। राज्य के अल्पशिक्षित ग्रामीण किसान को इसका कितना लाभ मिलेगा यह भी विचारणीय बिंन्दु है।
इस बदलाव से आदिवासी-मूलवासी सामाजिक, संस्कृतिक, आर्थिक व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा
गांव के सीमा के भीतर या बाहर के गैर मजरूआ आम, गैरमजरूआ खास जमीन को भूमि बैंक द्वारा आॅनलाईन किसी को भी हस्तांत्रित करने से, अब गांव की डेमोग्राफी, जियोलाॅजी, जैविक विविधता, विविधता में एकता वाली सामाजिक ताना-बाना, परंपारिक सामाजिक व्यवस्था-पड़हा व्यवस्था, राजी पड़हा, मानकी-मुण्डा, डोकलो-सोहोर, मांझी-परगना व्यवस्था सभी कमजोर हो जाएगा।
इसलिए ऐसा होगा-क्योंकि गांव के बीच में, गांव-टोली-महला के आस पास, या किसानों के ख्.ोत-टांड, के बीच, या अगल-बगल जो भी गैर मजरूआ आम, खास जमीन है, परती भूमि, जंगल-झाड को सरकार किसी भी जाति-समुदाय, या भाषा-संस्कृति के लोगों को हस्तांत्रित कर रही है। इससे एक भाषा-भाषी या जाति समुदाय के बीच अब कोई भी बाहरी समुदाय को बसाने का काम किया जा रहा है।
प्रकृति-पर्यावणीय आदिवासी-मूलवासी गांवों का अस्तित्व खतरे में है।
भूमिं बैंक के लिए -गांव के बीच, खेत-टांड के बीच, गांवों सीमाओं के जिन गैर मजरूआ आम, खास जमीन को चिन्हित किया गया है-उन जमीनों के हस्तांत्रण के बाद उस इलाके में पहले की स्थानीय आबादी केवल नहीं रहेगी, लेकिन बाहर से आने वाली आबाद स्थानीय आबादी से ताकतवर होगी। ऐसे परिस्थिति में उस गांव का परंपारिक भाषा-संस्कृति, रहन-सहन के साथ गांव का नाम भी बदल जाएगा। जैसे कि विकास के नाम पर पूरे झारखंड के गांव गायब होते गये, गांवों का नाम अब नगर, बिहार, पूरी (जैसे अशोक बिहार, कुसुम बिहार, प्रेम नगर, नयन नगर, गंगानगर, जमुनानगर, चनक्यपुरी आदि) में तब्दील होता जा रहा है।
जबकि परंपारिक आदिवासी गांवों का नाम पेड़, पौधों, जंगली जनवरों, नदी, नालों, झरनों, पशु-पक्षियों के नाम से रखा गया है। साथ ही हजारों गांवों का नाम गांव के प्रधान याने गांव बसाने वाले पहला बुजूर्ग के नाम पर नामकरण किया गया है।
बडीबिरिंगा, कनारोंवा, लोवागड़ा, अंबाकोना, डाउकोना, जमटोली, करीमाटी, सिमडेगा, मयोमडेगा, लतापानी, सराईपानी, हेसलाबेड़ा, महाबुआंग, किरीबुरू, बाघलता, सारूबेड़ा, मेघाहातुबुरू, कोयोंगसेरा, बगीसेरा, रंगामाटी, टुटवापानी, जोकिपोखर, सेरेंदआ, सरजोमदआ, कहुपानी, जिलिंगसेरेंग, बिलसेरेंग, महुंवाटांड, कादोपानी, चंपाबहा, जोजोहातु, बुरूहातु, मरंगबुरू, बहाबुरू, गरूड़पीडी, हेसो, निमडीह, जोजोसेरेंग, सरजोमडीह, बकाकेरा, लउाकेरा, महूंवाटोली, बांसटोली, जनुमपीडी, बंडआजयपुर, नामकुम, सियारटोली, आदि.।..
झारखंड 24 जिलों का है। इसमें हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर, कोडरमा, रामगढ, गिरिडीह औधोगिक जिले हैं। यह बाहर से आयी आबादी भी अधिक है। तब स्थनीयता नीति के तहत अब ये भी झारखंडी माने जाएगें और यहां स्थनीय समुदाय को जो सुख-सुविधा राज्य और केंन्द्र सरकार द्वारा मिलता है, इन्हें भी मिलेगा। हां नौकरियों में आरक्षण राज्य की नयी आबादी के आधार पर ही निर्धारण होगा। तब यहां की कुल आबादी में अब आदिवासी-मूलवासियों की आबादी का ग्राफ सबसे नीचे चला जाएगा। एैसे स्थिति में झारखंड के आदिवासी-मूलवासियों की पहचान स्वत ही खत्म हो जाएगी।
झारखंड में लगभग 48-50 नगरीय शहर हैं। जहां हर औद्योगिक शहर में हजारों अपाॅटमेंट बन गया है जहां बडे औद्योगिक घराने और व्यवसायिक घराने की आबादी है। इसमे राज्य से बाहर की आबादी भी बडी संख्या में आकर बसी है। दूसरी ओर शहरीकरण, और उद्योगों, खदानों के कारण स्थानीय आदिवासी-मूलवासी, किसान, मजदूरों की बडी आबादी विस्थापित हो गयी है। जो रोजी-रोटी के लिए अन्य राज्यों में पलायन कर गयी है।
2001 में झारखंड की कुल आबादी का 26.3 प्रतिशत आदिवासी आबादी थी। 2011 के जनगणना के आधार पर राज्य की कुल आबादी का 26.2 प्रतिशत आदिवासी रह गये। याने 10 साल में 1 प्रतिशत आदिवासी घट गये। चिंता का विषय हे कि 2011 के बाद 25 वर्षों में आदिवासी आबादी कितना रहेगा। जिस तेजी से बाहरी आबादी हावी होता जा रहा है।