Thursday, March 8, 2018

झारखंड बनने के बाद आदिवासियों की संख्या में कमी दर्ज की गयी है। केवल झारखंड की बात की जाए, तो यहां 30 लाख आदिवासियों की गणना किस धर्म में हुए यह वे कहां गए, इसका किसी को पता नहीं। झारख्ंाड के सभी राजनीतिक दल सरना धर्म कोड के पक्षधर हे, लेकिन 17 वर्षों में अबतक किसी ने भी सरना धर्म कोड लागू करने की पहल नहीं की है।

झारखंड सहित देशभर के 11 करोड़ प्रकृति पूजक आदिवासियों ने तेज की धर्म कोड की मांग-
आजनीतिक दल आदिवासी धर्म कोड के पक्षधर, पर लागू करने की पहल नहीं, कर रहे सिर्फ राजनीति
झारखंड सहित पूरे देश में रह रहे आदिवासियों ने जैन धर्माबलंबियों की संख्या को आधार बनाते हुए सरना धर्म कोड की मांग तेज कर दी है। 2011 की जनगणना के अनु सार देश में जैन ध्र्मावलंबियों की अबादी 44, 51, 753 आंकी गयी है। आदिवासी समाज का तर्क है कि जब इनका अलग से धर्म कोड हो सकता है तो पूरे देश में रह रहे 10,42,81,034 प्रकृति पूजक आदिवासियों को अलग धर्म कोड क्यों नहीं हो सकता। झारखंड बनने के बाद आदिवासियों की संख्या में कमी दर्ज की गयी है। केवल झारखंड की बात की जाए, तो यहां 30 लाख आदिवासियों की गणना किस धर्म में हुए यह वे कहां गए, इसका किसी को पता नहीं। झारख्ंाड के सभी राजनीतिक दल सरना धर्म कोड के पक्षधर हे, लेकिन 17 वर्षों में अबतक किसी ने भी सरना धर्म कोड लागू करने की पहल नहीं की है।
संख्या बढ़ी, फिर भी प्रतिशत में कमी दर्शायी गयी-
दो दशक की जनगणना के आंकडे के अनुसार आदिवासियों की संख्या कम हो गयी। 2001 की जनगणन रिपोर्ट के अनुसार झारखं डमें आदिवासियों की आबादी 70.14 लाख थी, वहीं 2011 में आबादी बढ़ कर 86,45,042 हो गयी। लेकिन 2001 में 26.3 प्रतिशत दर्शायी गयी। जबकि 2011 में यह घट कर 26.2 प्रतिशत हो गयी।
2011 के जनगणना के हिसाब से झारखं डमें आदिवासियों की कूल संख्या 86,45,042 है। जिसमें ईसाई लिखने वाले आदिवासियों की संख्या 14 लाख और सरना लिखने वाले 42,35,786 हैं। अगर दोनों को मिला दिया जाए, तो ईसाई व सरना आदिवासियों की संख्या 56,35,786 है। इसे कुल संख्या से घटा दिया जाए, तो 30,09,256 किधर गए। या तो इन्होनें हिंदू धर्म दर्ज कराया या फिर अन्य में। 2011 में सरना कोड की मांग उठी, तो आदिवासियों ने जनगणना में फार्म में खुद ही सरना धर्म अंकित कर दिया था। इसलिए जनगणना रिपोर्ट में सरना धर्मावलंबियों का अंकडा 42 लाख आ सका। (स्त्रोत-दैनिक भास्कर 17 अक्टोबर 2017)
विदित हो कि 2011 में जनगणना के पहले सरना कोड की मांग को लेकर जोरदार आंदोलन हुआ था-तब यह तय किया गया था, कि जब तक जनगणना फोम में सरना कोड अंकित नहीं किया जाएगा, आदिवासी समुदाय जनगणना का बहिस्कार करेगें। लेकिन सरकार की ओर से किसी तरह को कार्रवाई नहीं किया गया, और जनगणना भी शुरू कर दिया गया। तब कई ग्रामीण ईलाकों में आदिवासी समुदाय ने जनगणना का बहिस्कार किया। परिणामता, उन गांवों की आदिवासी आबादी जनगणना रिपोर्ट से गौण हो गया।
सरकार को बताना होगा कि 30,09,256 आदिवासी आबादी को किस धर्म समुह में शामिल किया गया है। यदि आदिवासियों हित की चिंता किसी भी राजनीतिक पार्टीयांें को है-तो स्वेतपत्र जारी करना चाहिए कि इनकी गणना  कहां की गयी है। 
जहां तक दोहरा लाभ लेने का अरोप--जहां तक ईसाई बने आदिवासियों पर  दोहरा लाभ लेने का अरोप है, तो इसको भी उजागार करना चाहिए कि किन किन योजनाओं में ये दोहरा लाभ ले रहे हैं, क्योंकि इसका अंकड़ा सरकार के पास तो होगा ही। ताकि अरोप साफ हो सके।
सरना, मसना घेरा बंदी करने पीछे और कोई रहस्य तो नहीं?
रघुवर सरकार ने घोषणा की है कि आदिवासी समुदाय के सरना, मसना, कब्रस्थान, हडगड़ी का घेराबंदी किया जाएगा, ताकि आदिवासियों का धर्मिक स्थल सुरक्षित रहे। इस योजना के तहत सरकार ने 44 करोड राशि देकर राज्य के 603 स्थलों की घेराबंदी करने का निर्देश दिया है। यह काम शहरी ईलाकों में जहां आदिवासी गांव विलुप्त हो रहे हैं, जमीन का अतिक्रमण हो रहा है, आदिवासी गांव अब नगरिय रूप ले चुका है, जहां वहां गांव बसाने वाले आदिवासी आबादी और उनकी जमीन पूरी तरह खत्म हो चुकी है-वहां सरना, मसना, हडगडी स्थलों के घेराबंदी की मांग समाज करते आया है। लेकिन आरएसएस और बीजेपी ने इस मांग को अलग रूप देने की कोशिश कर रहा है। इस योजना के तहत आदिवासी समाज को अपनी ओर खिंचने का एक बड़ा जरीया मान रहा है। लेकिन सवाल है कि-ग्रामीण ईलाकों के सरना, मसना, कब्रिस्थान, हडगडी का घेराबंदी करने के पीछे उद्वेश्य अलग है, सरकार भूमिं बैंक बनायी है-इसमें पूरे राज्य के सभी समुदाय के कब्रिस्थानों, अखड़ा, सरना, मसना, हडगडी, जहेरथान, झील, नाला-लोर, खेलमैदान, आम रास्ता, चरागाह, डोंगरी, झाड़ी, सहित सभी गैर मजरूआ आम, मजरूआ खास जमीन को मिलाकर भूमिं बैंक बनाया है। सरकार धर्मिक स्थलों योजना के तहत इन भूमिं बैंक की योजना को सफल बनाना चाहती है। ताकि समाज विरोध न करें और भूमिं बैंक के तहत आदिवासी ईलाके को इए-एक इंच जमीन ंिसगल विंडो सिस्टम से आॅन लाईन सरकार जिसको चाहे हस्तंत्रित कर सके। यह जमीन लूटने का एक बड़ी साजिश का हिस्सा है, इसको समझने की जरूरत है।
क्या सही में भाजपा सरकार सरना आदिवासी समाज के हितों की रक्षा करना चाहती है?
रघुवर सरकार 2016 में कई कानून लेकर आये। सबसे पहले आदिवासी-मूलवासी जनविरोधी स्थानीयता नीति 2016 लाया। गो रक्षा कानून, आदिवासी-मुलवासी किसान विरोधी महुआ नीति 2017, झारखंड धर्म स्वतंत्र विधेयक 2017, जमीन अधिग्रहण संशोधन विधेयक 2017, भूमिं बैक, इन सभी कानून को बिना बहस किये, जनता से बिना विमार्श किए एक छण भर में राज्य का कानून का रूप दिया गया। तब सरना समुदाय के लिए सरना धर्म कोड देने में विलंब क्यों? क्योंकि राज्य में बीजेपी की सरकार और केंन्द्र में भी बीजेपी की सरकार है। यही नहीं राज्य के 14 संासदों में 12 संसद बीजेपी के, 4 राज्यसभा सदस्यों में 3 बीजेपी के हैं। तब सरना कोर्ड को कानूनी रूप देने में कोई बाधा है ही नहीं, सिर्फ इच्छा शक्ति हो।

7 March 2018 ko Kunti District ke Kara Block me Rally & sabha aour Demand to BDO, CO, Dc, and Governor Jharkhand

ंसेवा में,
प्रखंड विकास पदाधिकारी कर्रा
जिला-खूंटी                           
महोदय ,                                               पत्रांक.....06..
                                                      दिनांक.....7 मार्च 2018.
विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला,  सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाषय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देष गुलाम था, और आजादी के लिए देष छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देष के मुक्ति संग्राम में अपनी षहाद दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है ;बनेजवकपंदद्ध देख-रेख कर सकता है, सरकार इस जमीन का मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में षामिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेषानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में इस्तेमाल होने जा रहा है।
, वर्तंमान धर्मांतरण बिल, भूमिं अधिग्रहण बिल 2017, भूमि बैंक एवं वर्तमान स्थानीय नीति, इन कानूनों के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाषासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था पूरी तरह तार-तार हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबाद के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी जा जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवष होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
8-सरना कोड के लिए वैधानिक रूप से जनगणना में सरना कोड नहीं लागू किये जाने से आदिवासी समाज की आबादी का अस्तित्व खतरे में है।
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में षामिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए
8-किसान विरोधी महुआ नीति को रदद किया जाए।
9-मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
12-गारीबों को मिलने वाली राषन को डीबीटी मुक्त किया जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।



                                निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी                             
    संयोजक....-दयामनी बरला          अध्याक्ष-तुरतन तांपनांे
                            उपाध्यक्ष-राजू लोहरा
                            सचिव -हादू तोपनो, उपसचिव-ऐनेम तोपनो 















सेवा में,
 अंचल पदाधिकारी कर्रा
जिला-खूंटी                           
महोदय ,                                               पत्रांक......06.
                                                    दिनांक.......7 मार्च 2018.....
विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला,  सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाषय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देष गुलाम था, और आजादी के लिए देष छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देष के मुक्ति संग्राम में अपनी षहाद दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है ;बनेजवकपंदद्ध देख-रेख कर सकता है, सरकार इस जमीन का मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में षामिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेषानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में इस्तेमाल होने जा रहा है।
, वर्तंमान धर्मांतरण बिल, भूमिं अधिग्रहण बिल 2017, भूमि बैंक एवं वर्तमान स्थानीय नीति, इन कानूनों के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाषासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था पूरी तरह तार-तार हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबाद के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी जा जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवष होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
8-सरना कोड के लिए वैधानिक रूप से जनगणना में सरना कोड नहीं लागू किये जाने से आदिवासी समाज की आबादी का अस्तित्व खतरे में है।
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में षामिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए
8-किसान विरोधी महुआ नीति को रदद किया जाए।
9-मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
12-गारीबों को मिलने वाली राषन को डीबीटी मुक्त किया जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।

                                 निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी                           
    संयोजक..-दयामनी बरला,            अध्याक्ष-तुरतन तोपनो
                            उपाध्यक्ष-राजू लोहरा
                            सचिव-हादू तोपनो
                           उपसचिव -ऐनेम तोपनो






सेवा में
उपायुक्त महोदय
जिला-खूंटी                                       पत्रांक............06.
द्वारा-प्रखंड विकास पदाधिकारी कर्रा                  दिनांक.......7 मार्च 2018....   

विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला,  सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाषय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देष गुलाम था, और आजादी के लिए देष छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देष के मुक्ति संग्राम में अपनी षहाद दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है ;बनेजवकपंदद्ध देख-रेख कर सकता है, सरकार इस जमीन का मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में षामिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेषानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में इस्तेमाल होने जा रहा है।
, वर्तंमान धर्मांतरण बिल, भूमिं अधिग्रहण बिल 2017, भूमि बैंक एवं वर्तमान स्थानीय नीति, इन कानूनों के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाषासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था पूरी तरह तार-तार हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबाद के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी जा जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवष होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
8-सरना कोड के लिए वैधानिक रूप से जनगणना में सरना कोड नहीं लागू किये जाने से आदिवासी समाज की आबादी का अस्तित्व खतरे में है।
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में षामिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए
8-किसान विरोधी महुआ नीति को रदद किया जाए।
9-मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
12-गारीबों को मिलने वाली राषन को डीबीटी मुक्त किया जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।



                                निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी
    संयोजक..-दयामनी बरला,            अध्याक्ष-तुरतन तोपनो
                            उपाध्यक्ष-राजू लोहरा
                            सचिव-हादू तोपनो
                            उपसचिव -ऐनेम तोपनो




सेवा में,
महामहिम राज्यपाल महोदया,
झारखंड सरकार
द्वारा-प्रखंड विकास पदाधिकारी कर्रा                          दिनांक............7 मार्च 2018
जिला-खूंटी                                                पत्रांक...06.
विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला,  सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाषय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देष गुलाम था, और आजादी के लिए देष छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देष के मुक्ति संग्राम में अपनी षहाद दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है ;बनेजवकपंदद्ध देख-रेख कर सकता है, सरकार इस जमीन का मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में षामिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेषानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में इस्तेमाल होने जा रहा है।
, वर्तंमान धर्मांतरण बिल, भूमिं अधिग्रहण बिल 2017, भूमि बैंक एवं वर्तमान स्थानीय नीति, इन कानूनों के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाषासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था पूरी तरह तार-तार हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबाद के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी जा जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवष होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
8-सरना कोड के लिए वैधानिक रूप से जनगणना में सरना कोड नहीं लागू किये जाने से आदिवासी समाज की आबादी का अस्तित्व खतरे में है।
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में षामिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए
8-किसान विरोधी महुआ नीति को रदद किया जाए।
9-मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
12-गारीबों को मिलने वाली राषन को डीबीटी मुक्त किया जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।



                                निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी

                     संयोजक.-दयामनी बरला,            अध्याक्ष-तुरतन तोपनो
                            उपाध्यक्ष-राजू लोहरा
                            सचिव-हादू तोपनो,     उपसचिव-ऐनेम तोपनो

विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला, सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।

ंसेवा में,
प्रखंड विकास पदाधिकारी तोरपा
जिला-खूंटी                           
महोदय ,                                               पत्रांक.....04..
                                                      दिनांक.....23 फरवरी 2018.
विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला,  सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाषय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देष गुलाम था, और आजादी के लिए देष छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देष के मुक्ति संग्राम में अपनी षहाद दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है ;बनेजवकपंदद्ध देख-रेख कर सकता है, सरकार इस जमीन का मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में षामिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेषानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में इस्तेमाल होने जा रहा है।
, वर्तंमान धर्मांतरण बिल, भूमिं अधिग्रहण बिल 2017, भूमि बैंक एवं वर्तमान स्थानीय नीति, इन कानूनों के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाषासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था पूरी तरह तार-तार हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबाद के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी जा जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवष होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
8-सरना कोड के लिए वैधानिक रूप से जनगणना में सरना कोड नहीं लागू किये जाने से आदिवासी समाज की आबादी का अस्तित्व खतरे में है।
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में षामिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए
8-किसान विरोधी महुआ नीति को रदद किया जाए।
9-मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
12-गारीबों को मिलने वाली राषन को डीबीटी मुक्त किया जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।



                                निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी                             
    संयोजक...Dayamani Barla          अध्याक्ष-Turtan Topno
                            उपाध्यक्ष-Raju Lohra
                            सचिव  -Hadu Topno, up sachiv- Anem Topno































सेवा में,
 अंचल पदाधिकारी तोरपा
जिला-खूंटी                           
महोदय ,                                               पत्रांक......04.
                                                    दिनांक.......23 फरवरी 2018.....
विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला,  सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाषय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देष गुलाम था, और आजादी के लिए देष छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देष के मुक्ति संग्राम में अपनी षहाद दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है ;बनेजवकपंदद्ध देख-रेख कर सकता है, सरकार इस जमीन का मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में षामिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेषानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में इस्तेमाल होने जा रहा है।
, वर्तंमान धर्मांतरण बिल, भूमिं अधिग्रहण बिल 2017, भूमि बैंक एवं वर्तमान स्थानीय नीति, इन कानूनों के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाषासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था पूरी तरह तार-तार हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबाद के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी जा जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवष होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
8-सरना कोड के लिए वैधानिक रूप से जनगणना में सरना कोड नहीं लागू किये जाने से आदिवासी समाज की आबादी का अस्तित्व खतरे में है।
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में षामिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए
8-किसान विरोधी महुआ नीति को रदद किया जाए।
9-मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
12-गारीबों को मिलने वाली राषन को डीबीटी मुक्त किया जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।

                                 निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी                           
    संयोजक...Dayamani Barla            अध्याक्ष-Turtan Topno
                            उपाध्यक्ष-Raju Lohra
                            सचिव -Hadu Topno
                           उपसचिव  -Anem Topno






सेवा में
उपायुक्त महोदय
जिला-खूंटी                                       पत्रांक............04.
द्वारा-प्रखंड विकास पदाधिकारी तोरपा                  दिनांक.......23 ्फरवरी 2018....   

विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला,  सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाषय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देष गुलाम था, और आजादी के लिए देष छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देष के मुक्ति संग्राम में अपनी षहाद दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है ;बनेजवकपंदद्ध देख-रेख कर सकता है, सरकार इस जमीन का मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में षामिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेषानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में इस्तेमाल होने जा रहा है।
, वर्तंमान धर्मांतरण बिल, भूमिं अधिग्रहण बिल 2017, भूमि बैंक एवं वर्तमान स्थानीय नीति, इन कानूनों के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाषासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था पूरी तरह तार-तार हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबाद के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी जा जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवष होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
8-सरना कोड के लिए वैधानिक रूप से जनगणना में सरना कोड नहीं लागू किये जाने से आदिवासी समाज की आबादी का अस्तित्व खतरे में है।
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में षामिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए
8-किसान विरोधी महुआ नीति को रदद किया जाए।
9-मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
12-गारीबों को मिलने वाली राषन को डीबीटी मुक्त किया जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।



                                निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी
    संयोजक.....Dayamani Barla..........            अध्याक्ष-Turtan Topno
                            उपाध्यक्ष-Raju Lohra
                            सचिव -Hadu Topno
                            उपसचिव  -Anem Topno




सेवा में,
महामहिम राज्यपाल महोदया,
झारखंड सरकार
द्वारा-प्रखंड विकास पदाधिकारी तोरपा                          दिनांक.....23 March 20`18.......
जिला-खूंटी                                                पत्रांक......05.......
विषय-आदिवासी-मूलवासी विरोधी स्थानीयता नीति एवं भूमिं अधिगहण कानून 2017 को रदद करने, तथा ग्रामीणों कें समुदायिक धरोहर जंगल-झाडी, चरागाह, सरना-मसना, नदी-नाला,  सहित गैरमजरूआ आम एवं खास जमीन को भूमिं बैंक से मुक्त करने, एवं पांचवी अनुसूचि के प्रावधानों को कडाई से लागू करने के संबंध में।
महाषय,
सविनयपूर्वक कहना है कि-हमारे पूर्वजों ने सांप-बिच्छू, बाघ-भालू जैसे खतरनाक जानवरों से लड़कर इस झारखंड राज्य की धरती को आबाद किया है। इतिहास गवाह है-कि जब अंग्रेजों के हुकूमत में देष गुलाम था, और आजादी के लिए देष छटपटा रहा था तब आदिवासी समुदाय के वीर नायकों ने, सिदू-कान्हू, चांद-भैरव, सिंदराय-बिंदराय, तिलका मांझी से लेकर वीर बिरसा मुंडा के अगुवाई में देष के मुक्ति संग्राम में अपनी षहाद दी। इन्हीं वीर नायकों के खून से आदिवासी-मूलवासियों के धरोहर जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए छोटानागपुर काष्तकारी अधिनियक 1908 और संताल परगना काष्तकारी अधिनियम 1949 लिखा गया। जो राज्य के आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परंपरागत धरोहर जल-जंगल-जमीन का सुरक्षा कवच है।
हम आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि भारतीय संविधान ने हम आदिवासी-मूलवासी ग्रामीण किसान समुदाय को पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में गांव के सीमा के भीतर एवं गांव के बाहर जंगल-झाड़, बालू-गिटी, तथा एक -एक इंच जमीन पर, ग्रामीणों को मालिकाना हक दिया है।
जमीन -जंगल पर समुदाय का परंपारिक मलिकाना हक से संबंधित जमीन का अभिलेख खतियान भाग दो में गैर मजरूआ आम एवं गैरमजरूआ खास, जंगल-झाडी, नदी-नाला सहित सभी तरह के समूदायिक जमीन पर समुदाय का हक दर्ज है। इसके आधार पर सरकार इस तरह के जमीन का सिर्फ संरक्षक है ;बनेजवकपंदद्ध देख-रेख कर सकता है, सरकार इस जमीन का मालिक नहीं है, न ही सरकार इस तरह के जमीन को बेच सकती है।
लेकिन दुखद बात है कि-सरकार हम आदिवासी-मूलवासी किसानों के परंपरागत हक-अधिकार को छीन के गैर मजरूआ आम एवं खास जमीन का भूमिं बैंक बना कर, पूजिंपतियों को आॅनलाईन हस्तांत्रण कर रही है। यदि एैसा होता है-तो ग्रामीण आदिवासी-मूलवासी सहित प्रकृति एवं पर्यावरण पर निर्भर समुदाय पूरी तरह समाप्त हो जाएगें। समुदाय की सामाजिक मूल्य, भाषा-संस्कृति, जीविका एवं पहचान अपने आप खत्म हो जाएगा।
हम यह भी बताना चाहते हैं-कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था यहां के जंगल-झाड़, पेड़-पैधों, नदी-नाला, झरनों में आधारित है, इसी पर पूरी ग्रामीण अथव्यवस्था टिकी हुई है, जिसका मूल स्त्रोत किसानों के जोत के अलावे गैर मजरूआ आम और गैर मजरूआ खास जमीन ही है।
आज आदिवासी-मूलवासी समुदाय के समूदायिक धरोहर तमाम तरह के जमीन को भूमिं बैंक में षामिल कर बाहरी लोगों को आॅनलाइन हस्तंत्रित किया जा रहा हेेे-जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय को समूल उखाड़ फेंकने की तैयारी ही माना जाएगा। इससे आदिवासी -मूलवासी समुदाय खासे चिंतित हैं।
आप को यह भी बताना चाहते है कि 95 प्रतिषत ग्रामीण आबादी न तो कमप्युटर देखी है, न ही इंटरनेट ओपरेट कर सकती है। एैसे में जमीन संबंधी सभी तरह के कार्यों को आॅनलाईन संचालित होने से ग्रामीणों की परेषानी बढ़ी है।
वर्तमान सरकार द्वारा लाये गये स्थानीयता नीति में प्रावधान कानूून के लागू होने से-एक ओर दूसरे राज्यों से आयी आबादी सहित बड़े बड़े पूजिंपतियों को राज्य में आबाद करने एवं विकसित होने का बड़ा अवसर दे रहा है। दूसरी ओर राज्य के आदिवासी-मूलवासियों को अपने परंपरागत बसाहाट, धरोहर से उजाड़ने के लिए बड़ा हथियार के रूप में इस्तेमाल होने जा रहा है।
, वर्तंमान धर्मांतरण बिल, भूमिं अधिग्रहण बिल 2017, भूमि बैंक एवं वर्तमान स्थानीय नीति, इन कानूनों के लागू होने से आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर निम्नलिखित खतरा मंडरा रहा है-
1-परंपारिक आदिवासी-मूलवासी गांवों का परंपरागत स्वाषासन गांव व्यवस्था तहस-नहस हो जाएगा।
2-आदिवासी-मूलवासी किसानों के गांवों की भौगोलिक तथा जियोलोजिकल या भूमिंतत्वीय, भूगर्भीय अवस्था पूरी तरह तार-तार हो जाएगा।
3-परंपारिक आदिवासी इलाके में भारी संख्या में बाहरी आबाद के प्रवेष से आदिवासी परंपरागत सामाजिक मूल्य, सामूहिकता पूरी तरह बिखर जाएगा।
4-जंगल-जमीन, जलस्त्रोंतों, जंगली-झाड़, भूमिं पर आधारित परंपरागत अर्थव्यस्था पूरी तरह नष्ट हो जाएगें।
5-स्थानीय आदिवासी-मूलवासी समुदाय पर बाहर से आने वाली जनसंख्या पूरी तरह हावी जा जाएगी, तथा आदिवासी जनसंख्या तेजी से विलोपित हो जाएगा।
6-सामाजिक, आर्थिक आधार के नष्ट होने से भारी संख्या में आदिवासी-मूलवासी समुदाय दूसरे राज्यों में पलायन के लिए विवष होगी।
7-आदिवासी-मूलवासी समूदाय की सामूहिक एकता को विखंडित किया जा रहा है
8-सरना कोड के लिए वैधानिक रूप से जनगणना में सरना कोड नहीं लागू किये जाने से आदिवासी समाज की आबादी का अस्तित्व खतरे में है।
उपरोक्त तमाम खतरों एवं बिंन्दुओं को आप के ध्यान में लाते हुए-हम आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच  आप के सामने निम्नलिखित मांग रखते हैं-
1-सीएनटी एक्ट एसपीटी एक्ट को कडाई से लागू किया जाए।
2-गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, जंगल-झाडी सहित सभी तरह के सामुदायिक  जमीन को भूमिं बैंक में षामिल किया गया है, को उसे भूमिं बैंक से मुक्त किया जाए तथा किसी भी बाहरी पूजिं-पतियों को हस्तंत्रित नही किया जाए
 3- भूमिं सुधार/भूदान कानून के तहत जिन किसानों को गैर मजरूआ खास जमीन का हिस्सा बंदोबस्त कर दिया गया है-उसे रदद नहीं किया जाए
4-जमीन अधिग्रहण कानून 2013 को लागू किया जाए
5-किसी तरह का भी जमीन अधिग्रहण के पहले ग्रांव सभा के इजाजत के बिना जमीन अधिग्रहण किसी भी कीमत में नहीं किया जाए।
6-5वीं अनुसूचि को कडाई्र से लागू किया जाए।
7-किसानों का लोन माफ किया जाए
8-किसान विरोधी महुआ नीति को रदद किया जाए।
9-मनरेगा मजदूरों का मजदूरी दर 159 रू से बढ़ा कर 500 रू किया जाए
10-आदिवासी-मूलवासी विरोधी वर्तमान स्थानीयता नीति को खारिज किया जाए तथा सदियों से जल-जंगल-जमीन के साथ रचे-बसे आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक मूल्यों, संस्कृतिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति इनके इतिहास को आधार बना कर 1932 के खतियान को आधार बना कर स्थानीय नीति को पूर्नभाषित करके स्थानीय नीति बनाया जाए।
11-पंचायत मुख्यालयों, प्रखंड मुख्यलयों, स्कूलों, अस्पतालों, जिला मुख्यलयों में स्थानीय बेरोजगार युवाओं को सभी तरह के नौकरियों में बहाली की जाए।
12-गारीबों को मिलने वाली राषन को डीबीटी मुक्त किया जाए।
13-सरना कोड़ लागू किया जाए।



                                निवेदक
                        आदिवासी-मूलवासी असित्व रक्षा  मंच
                              तोरपा-खूंटी

                     संयोजक.-Dayamani barla.......  अध्याक्ष-Turtan Topno

                            उपाध्यक्ष- RRaju Lohra
                            सचिव  -Hadu Topno                  उपसचिव-Aman Topno

Thursday, November 2, 2017

BONE.. KE ..BONE..ME JHALIYA ..MINJURA RE BONE..ME JHALIYA MINJUR SOBHE....RE BONE ME JHALIY MINJUR SOBHE...


JAM BHI KISI BHI MAYUR KO  DEKHTI  HUN.....PITAJI  KI  YAD  AATI  HAI. MERE  PITAJI KARAM PARAB KE DIN MANDAR BAJATE HUWE YE GEET  GATE THE...
BONE.. KE ..BONE..ME  JHALIYA ..MINJURA   RE  BONE..ME  JHALIYA  MINJUR  SOBHE....RE  BONE   ME  JHALIY MINJUR  SOBHE...
HINDI ME__JALNGAL -JANGLA  ME  MAYOUR,...MAYOUR ...JANGAL  KI  SOBHA,,,HAI .

आदिवासी तब तक आदिवासी रहेंगे ---जब तक जल जंगल जमीन नदी पहाड़ के साथ जुड़े हैं

इतिहास गवाह है कि-हमारे पूर्वज सांप, बिच्छू, बाघ, भालू से लडकर झारखंड की धरती को आबाद कियां। जंगल-झाड को साफ किया, रहने लायक घर बनाये। खेती लायक जमीन साफ किया। गांव बसाया। जहां तक जंगल -झाडी साफ कर लोग बसते गये, गांव का विस्तार होता गया। अपने गांव को अपने तरह से संचालित -संरक्षित एवं विकसित करने के लिए नियम-कानून बनाये, जो उनका परंपरागत व्यवस्था कहलाया। जंगल-झाड साफ करके जमीन-जंगल को आबाद किये, इस जंगल-जमीन पर आदिवासी समुदाय ने अपना खूंटकटी अधिकार माना।

आदिवासी  तब तक आदिवासी रहेंगे ---जब तक जल जंगल जमीन नदी पहाड़  के साथ जुड़े हैं , प्रकृति से अलग होते ही इनका पहचान भाषा संस्कृति  इतिहास अपने आप समाप्त हो जायेगा। ... इसी लिए आदिवासी समाज जल जंगल  जमीन की  बचने की लड़ाई लड़ रहे हैं  

184 अंक लाने के बावजूद सफल घोषित किया गया। जबकि एससी-एसटी वर्ग के अभ्यर्थी 188 अंक और 190 अंक लाकर भी असफल रहे।

छठी जेपीएससी पीटी का मामला, 326 पदों के लिए हुई थी परीक्षा
छठी जेपीएससी पीटी परीक्षा में हुइ गडबडियों की भेंट झारखंड की प्रतिभाएं चढ़ रही है। 326 पदों के लिए जेपीएससी पीटी की परीक्षा दिसंबर 2016 को ली गयी थी। इसका रिजल्ट फरवरी में प्रकाशित किया गया था। चुकिं रिजल्ट का कोई कअ आॅफ नहीं बताया गया था इसलिए परीक्षा विवादित हो गयी। और परीक्षार्थियों ने रिजल्ट का विरोध किया। परीक्षा के रिजल्ट में पांच हजार से अधिक अभ्याथी सफल घोषित किए गए थे।
अधिक माक्र्स लाकर भी फेल और कम माक्र्स लाने वाले पास
जेपीएससी पीटी परीक्षा का जब रिजल्ट प्रकाषित किया गया कि देव कुमार सफलद अथ्यार्थियों ने अािक अंक लाकर भी परीक्षा में असफल रहे। जब उन्होंने इस मामले में झारखंड हाईकोर्ट में रिट पिटिशन किया तो जेपीएससी के परीक्षा निदेशक ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि रिजल्ट राजस्थान और आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार निकाला गया है।
आदेश के अनुसार ही पीटी परीक्षा में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं किया गया। परीक्षी में एक दूसरी गडबड़ी तब सामने आयी जब खुशी लाल महतो जिनका रोल नंबर 6801703 था को प्रथम सूची में ही 184 अंक लाने के बावजूद सफल घोषित किया गया। जबकि एससी-एसटी वर्ग के अभ्यर्थी 188 अंक और 190 अंक लाकर भी असफल रहे। जेपीएससी ने खुशी लाल महतों का रिजल्ट स्पोर्टस कैटेगरी में बताकर इससे पल्ला झाड़ लिया। पर चूंकि स्पोर्टस कोटा भी रिजर्वेशन की श्रेणी में आता है इसलिए जेपीएससी का यह तर्क भी गले नहीं उतरता। इसके अलावा जेपीएससी की पहली संे पांचवी पीटी परीक्षा में आरक्षण के नियमों का पालन किया गया। इसलिए छठी जेपीएससी में इसका पालन नहीं किया जाना उचित नहीं लगता। मामले में परीक्षार्थियों की परेशानी बढ़ गई है ं।
आदिवासी छात्र संघ ने सवाल उठाया-आंध्र और राजस्थान का जजमेंट क्यों लागू किया??
परीक्षा के रिजल्ट में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया जाना झारखंड के उम्मीदवारों के भविष्य के साथ खिलवाड है। झारखं डमें अ्रध और राजस्थान का जजमेंट लागू किया जाना उचित नहीं है।

इतिहास गवाह है कि-हमारे पूर्वज सांप, बिच्छू, बाघ, भालू से लडकर झारखंड की धरती को आबाद कियां।

इतिहास गवाह है कि-हमारे पूर्वज सांप, बिच्छू, बाघ, भालू से लडकर झारखंड की धरती को आबाद कियां। जंगल-झाड को साफ किया, रहने लायक घर बनाये। खेती लायक जमीन साफ किया। गांव बसाया। जहां तक जंगल -झाडी साफ कर लोग बसते गये, गांव का विस्तार होता गया। अपने गांव को अपने तरह से संचालित -संरक्षित एवं विकसित करने के लिए नियम-कानून बनाये, जो उनका परंपरागत व्यवस्था कहलाया। जंगल-झाड साफ करके जमीन-जंगल को आबाद किये, इस जंगल-जमीन पर आदिवासी समुदाय ने अपना खूंटकटी अधिकार माना।
स्वतंत्रता संग्राम के राजनीतिक क्षीतिज पर जवाहरलाल नेहरूजी, शुबास चंन्द्र बोस जैसे नेताओं का नाम कहीं दिखाई नहीं दिया था-तभी चुटियानागपुर के आदिवासी वीरों के क्रांति के बिंगुल से देश के अंगे्रज हुकुमत डोलने लगा था। 1807 का तमाड़ विद्रोह, 1819-20 में रूदु और कोंता मुंडा का तमाड़ विद्रोह, 1820-21 में पोडाहाट में हो विद्रोह, 1832 में भरनो में बुद्वु भगत का विद्रोह, 1830-33 में कोल्हान में मानकी-मुंडाओं का विद्रोह, 1854 में मोगो मांझी एवं बिर सिंह मांझी में संतालों का आंदोलन, 1855-56 में सिद्वु-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो के नेतृत्व में संताल हूल, 1855-56 में लुबिया मांझी और बैरू मांझी का भूमि आंदोलन, 1885 में बैठबेगारी और जमीनदारों, इजारेदारों के खिलाफ आंदोलन, 1895-1900 में बिरसा उलगुलान ने आंदोलनों का इतिहास रचाा। आजादी के बाद आज भी अपने इतिहास, जल, जंगल, जमीन, पहचान, अस्तित्व की रक्षा के लिए आदिवासी समाज संघर्षरत है।
 झारखंड में अपने गांव में अपना राज की अवधारना और अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ संग्राम-संताल हूल से उलगुजान तक का गैरवषाली इतिहास ---
जब देश अंग्रेजी हुकूमत के गुलाम में जकडा हुआ था और देश अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति पाने के लिए छटपटा रहा था-तब छोटानागपुर की धरती पर ईसाई मिशनरियों का पर्दापन हुआ। 1845 में गोस्सनर मिशन के चार मिश्नरी सर्वप्रथम यहां आये। इन्होंने धर्म प्रचार के साथ ही घनघोर जंगल-छाड के ढंके इस भूखंड में लोगों के बीच में शिक्षा, स्थस्थ्य जैसे मूलभूत सेवाओं का काम शुरू किये। गोस्सनर मिशन के बाद 1868 में काॅथोलिक मिशन ने अपना पहला कदम रखा। 1869 में एस0पी0जी मिशन भी छोटानागपुर में अपनी संेवकाई प्ररंभ की।
छोटानागपुर में ईसाई मिशनरियों ने ऐसे समय में अपना काम शुरू किये-जब स्वतंत्रता संग्राम के नगाडे की आवाज से समूचा छोटानागपुर डोल रहा था। चारों तरफ अंग्रेज शोषक साशकों द्वारा आदिवासी समुदाय के जंगल-जमीन पर जबरन कब्जा करना एवं जमीन बंदोबस्ती के नाम पर जबरन टैक्स वासूली किया जा रहा था। जो टैक्स नहीं चुकाने में असर्मथ हो रहे थे, जमींनदार और ईजारेदारों उनकी बाची हुई जमीन भी लूट ले रहे थे। यही नहीं आदिवासियों को अंग्रेज शोषक साशकों  तथा इनके पिठूओं ने बैठबेगारी भी खूब करवाया। इनके द्वारा जमीन लूट तथा बैठबेगारी से त्रस्त आदिवासी समुदाय जरूरत पड़ी तो तीर-धनुष उठा कर अंग्रेज शोषक साशकों और जमीनदार-इजारेदारों का मुकाबला किया, यह ऐतिहासिक सच्चाई है।
इतिहास गवाह है- जब ईसाई मिशनरी चुटियानागपुर में आये-तब इन्होंने शिक्षा, स्वस्थ्य सेवा के साथ ही अपने हक-अधिकारों के लिए संघर्षरत आदिवासी समुदाय को जमींदरों, इजारेदारो, महाजनों एवं सूदखोदों के चंगुल से अपनी संपति को मुक्त करने में मदद कर रहे थे। ृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृृ
इसी बीच 18 मार्च 1885 को फा0 लीवंस रांची के डोरंडा (दुरंगदआ) में आये। फादर डेकाॅक जो तत्कालीन पल्ली  पुरोहित थे, उसके विचार से सहमत नहीं थंे , अतः 23 नवम्बर 1885 तोरपा चले गये, वहां आदिवासियों को जमींदरों और महाजनों एवं सूदखोरों के खिलाफ संघर्ष में मदद करने लगे। बेलजियम येसू समाजी जैसे मुलेंडर कान्सटेंट और जे.बी. होफमैन और कार्डोन नें शोषकों द्वारा आदिवाससियों के उपर किये गये  केस लड़ने में आदिवासियों की मदद की। फा0 होफमैन 1885 में सरवादआ गये। वहां आदिवासियों को शिक्षित और संगठित करने की भूमिका भी निभाये। यही नहीं आदिवासियों के परंपारिक भूमिं व्यवस्था के तहत उनके अधिकारो कि रक्षा के लिए सीएनटी एक्ट कानून का प्ररूप भी तैयार किये। विदित हो कि जब चुटियानागपुर में आदिवासियों के जमीन पर अंग्रेज शाषक जबरन कब्जा करने के साथ बैठबेगारी खटवाया जा रहा था। यही नही आदिवासी समुदाय के बेटी-बहूओं के उपर चैतरफा जमीनदारों का जुल्म होने लगा। ऐसे समय में ईसाई मिशनरियों का आदिवासी समुदाय के बीच काम करना निश्चित रूप से उनके जीवन को प्रभावित किया। जिसके कारण परिवार ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया। कई लोगों ने अंग्रेज शोषक साशकों और जमीनदारों के शोषण -दमन और जुल्म से अपने को सुरक्षित करने के जिए ईसाई धर्म का अंगीकार किया। कुछ लोगों ने अंग्रेजों द्वारा छीनी गयी अपनी जमीन की वापसी के लिए ईसाई धर्म को स्वीकारा। जिन लोगों ने जिस उद्वेश्य की पूर्ति के  ईसाई धर्म को स्वीकारा था , कहा जाता है कि-एैसे लोगों ने उद्वेश्यों की पूर्ति नहीं होने पर ईसाई धर्म को छोडकर वापस अपने मूल धर्म में आ गये।
उपरोक्त घटनाक्रम के दौरान सिर्फ जमीन संबंधित आंदोलन मजबूत नहीं हुआ लेकिन इन आंदोलनों से आदिवासी सामाज और कई तरह से प्रभावशाली बना। सामाज में जाग्रीती आयी और राजनीतिक चेतना का प्रादूर्भाव हुआ। सिद्वू-कान्हू, चांद-भैरव का हूल और बिरसा मुंडा का उलगुलान ने संताल-परगना और छोटानागपुर के आदिवासी समुदाय में अपने विरासत की रक्षा के लिए अपनी शासन-व्यवस्था चलाने के लिए राजनीतिक उदघोषणा भी किया-दिकु राईज टुण्डू जना-अबुआ राईज एटेज जना, याने इस बात की घोषणा की कि-अब रानी विक्टोरिया का राजपाट समाप्त हो गया, अब हमलोगों का राजपाट शुरू होगा।
आंदोलित आदिवासी सामाज ने महसूस किया-कि संगठित ताकत से ही अंग्रेजों सहित तमाम उनके साहयोगी शोषक सक्तियों को परास्त किया जा सकता है। परिणामता समुहिक संगठनों को जन्म देने की प्रक्रिया भी शुरू होने लगा। 1905 तक बिहार, उडिसा और छोटानागपुर बंगाल का हिस्सा रहा। रानी विक्टोरिया कलकत्ता से ही शासन व्यवस्था चलाती थी। जब छोटनागपुर के आदिवासी समाज का जमीन-जंगल पर जबरन मलगुजारी वासूलना  शुरू किया तब मुंडाओं ने विरोध किया। रानी विक्टोरिया ने आदिवासी समाज से उनके द्वारा क्लेम किये जा रहे जमीन का कागजात दाखिल करने का आदेश दिया-तब मुंडा आदिवासियों ने अपना ससनदीरी को ही उठा कर उनके दरबार में लेकर गये। रानी विक्टोरिया को मुंडाओं के इस व्यवस्था से असहमति हुई, इसके बवजूद भी आदिवासियों का संघर्ष कमजोर नहीं हुआ और अपने हक और न्याय की लाड़ाई को मजबूती के साथ आगे बढ़ाते रहे।