putkal sag todti mahilayen... जल-जंगल-जमीन, नदी, पहाड़ आदिवासी-मूलवासी समाज का सामाजिक, आर्थिक, सास्कृतिक, राजनीतिक औरइतिहास का मजबूत रीड़ है। पेड़ काटता है तो सिर्फ जंगल नहीं उजडता है। जंगल उजड़ता है -तो SIRF PARYAWARN नष्ट नहीं होता है। लेकिन एक PED कटता है, एक झाड़ टुटता है-तो आदिवासी-मूलवासी समाजका आर्थिक रीढ़ टूटता है।
समूहिकता टूटती है। संस्कृतिक अस्तित्व नष्ट होता है। प्रकृतिकमूलक समाज के लिए हर घांस, पात, झाड़, लतर, कंद-मूल, भोजन है। यही नहीं स्वस्थ्य का आधार भी है।
पुटकल पेड़. हर गाँव में सैकड़ों पेड़ है. हर कल नया पता निकलता है..इसका कोमल पत्ता को तोड़ते हैं. सुखा बाजारमें १५० रूपया किलो बिकता है. काचा..३०-४० रूपया किलो. पेड़ में फल भी लगता है..बहुत मीठा होता है..आदमीखाते हैं..चिड़ियाँ भी खाते हैं..जब पत्ता पूरी तरह हरा हो जाता है..गर्मी में घांस नहीं मिलता है..तो गाय, भैंस, बकरीसभी का मुख्य चारा है. इसका रासी निकालते हैं..रासी से सभी तरह का काम करते हैं किसान.पेड़ पर मवेशियों केलिये साल भर का पुवाल चढ़ा कर रखते हैं..पेड़ जलावन के काम में भी आता है...यही है..हमारी आर्थिकबेवस्था..इसे पर दुनिया का बाजार बेवस्था भी टिका हुआ है
GONDWANA TIMES....
ADIVASI CULTURE IN AKHADA...
प्रकृति के साथ रचा-बसा आदिवासी समाज की कला-संस्कृति, अपनी मान्याताएं हैं। इसको वहीं समाज आसानी से समछ सकता है, जो प्रकृति को करीब से समझता हो। प्रकृति के जीवन चक्र के साथ आदिवासी समाज का जीवन’ शैली जुड़ा हुआ है। प्रथ्वी पूरब से पश्चिम घूम रहा है। किसान खेत मे हल जोतता है-चलाता है, तो वह बैल के साथ पूरब से पश्चिम घूमता है। महिलाएं आनाज जांता में पीसतीं हैं-तो जांता को पूरब से पश्चिम घूमाती हैं। पेड़ पर कोई लतर चढ़ता है-तो पूरब से पश्चिम घूमते हुए पेड़ पर चढ़ता है। अखाड़ा में लोक नृत्य चलता है, कई पंक्तियों में जोड़ा कर नाचते हैं, मंदरीकार, नागाड़ा, ढ़ोलक बजाने वाले, गीत गाने वालों से अखाड़ा भरा रहता है-तब भी वे पूरब से पश्चिम ही बढ़ते हैं। खेत में काम करते हैं-तो वे पूरब से पश्चिम ही काम करते बढ़ते हैं। खलीहान में बैल से धान दौंरी करते हैं-तो बैल के साथ पूरब से पश्चिम ही घूमते हैं। इसलिए गोंड़ आदिवासी समाज ने अपने प्रकृतिकमूलक ज्ञान बिज्ञान -तकनीकी से घडी अविष्कार किया है। गोंडवाना टाम्ईस-घड़ी बनाना प्ररंम्भ किया, इसमें घड़ी का सूई पूरब से पश्चिम घूम रहा है। घड़ी में 12 के बाद 11, 10....का समय बैठया गया है। कई बार अध्ययन के बाद ही इस घड़ी के समय को आप पकड़ पाऐंगे। जब कि व्यसायिक कंपानियों द्वारा निर्मित घड़ी का सूईपश्चिम से पूरब घूमता है।
बिशिष्ठ अतिथि भूतपूर्व महालेखाकार श्री बेंजामिन लकड़ा ने अपने संबोधन में कहा-उरांव समाज education के क्षेत्र में आगे निकल गया है। मैं गरीबी से निकल कर इस मुकाम में पहुंचा कि आज भी कोई मेरे लेबल में पहुंच नहीं सका हैं, मुझे इसका गर्भ है। गोंड समाज education के क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ है। आप लोग सिर्फ nasha में डूबे रहतें हैं, इससे बाहर निकलने की जरूरत है। इन्होंने कहा-सिमडेगा सबसे पिछड़ा जिला है-यहां कोई मिनिरलस नहीं है, कारखाना है, लेकिन मेनपावर है यहां। इसी से विकास किया जा सकता है। इन्होंने कहा-अपने बेटियों को दिल्ली, बोम्बे धंगरिन काम करने नहीं भेजें।
kamleshji ने संबोधित करते हुए कहा-दयामनी दीदी पूरा जीवन समाज के लिए सार्पित की
है जो ताकत आप के पास है आप अपना ताकत से हम को भी मजबूत करें। मैं ने भी तय की-यहां एक अपने ही समाज के बड़े अधिकारी हैं दूसरा अपने ही समाज के मंत्री हैं, तब अपने समाज के प्रति आप की क्या जिम्मेवारी है इस पर सवाल उठाना भी जरूरी है। मैं ने अपनी बात ’शुरू करते हुए-झारखंड में आदिवासियों की संख्या दिनोंदिन घटते जा रही है। इसके क्या कारण हैं इसे पहचान करने की जरूरत है। साथ ही इसे कैसे सामना किया जाए, रोका जाए ताकि सामाज का अस्तित्व बना रहे, इसकी चिंता हम सबको करने की जरूरत है। 1991 का सेन्सस में आदिवासियों की आबादी 27.67 प्रतिशत था। 2001 घटकर 26.03 प्रतिशत हुआ। राज्य की आबादी पर ही हर समुदाय के संवैधानिक अधिकार तय किये जाते हैं। आदिवासियों की घटती आबादी को देखते हुए ही आदिवासी विरोधी ताकतें आदिवासी समुदाय को मिले एसेंमबेली और परलियामेंट सीटों में मिले अरक्षित सीट को डीलिमिटेसन करने का योजना तैयार किया गया हैं। जिसको 2006 में ही लागू करने की कोशिश केंन्द सरकार ने की थी। जनआंदोलन के कारण सरकार सफल नहीं हो सकी। मैंने सवाल उठाया-आज आदिवासी समाज की बेटियां दिल्ली, बाम्बे, कलकत्ता जैसे महानागरों में दाई काम करने के लिए दलालों और बिचैलियों द्वारा ठग-फुसलाकर ले जायी जा रही हैं। यह काला धंधा प्रशासन और राजनीतिक तत्रं के सहयोग से ही बेरोकटोट चल रहा हैं। वहां उनका शारीरिक , मानसिक और आर्थिक शोषण हो रहा हैं। जबतब हम इन दलाल-बिचैलियों का पहचान कर इस गिरोह पर सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगीं, मानव तस्करी नहीं रोका जा सकता हैं। इसके लिए मंत्री महोदया आप सत्ता में हैं आप लोगों को ही इसदिशा में कदम उठाना होगा। साथ ही जो सक्ष्म अधिकारी हैं उनकी भी जिम्मेवारी है।
मैंने सवाल उठाया-जो समाज आर्थिक रूप से कमजोर है उस समाज को हर स्तर पर दबाने की कोशिश सभी करते हैं। हम दोष लगा कर अपनी कि नशा में डूबे रहते हैं-अपने इस को समाज के प्रति जो जिम्मेवारी है इससे बरी नहीं कर सकते हैं। इनको सही दिशा देना, education के क्षेत्र में इसको आगे लाना, रोजगार मुहाईया कराना हम पढ़े लिखे लोगों की जिम्मेवारी हैं। सरकार तथा राजेताओं को इसकी कोई चिंता नहीं हैं। मंत्री महोदया से अग्राह है कि-आप के पास सभी ताकत है-झारखंड की बेटियों को मजानगरों में बिकने से बचाना होगा, आदिवासियों को उनका अधिकार दिलाना होगा। इस इलाके में कई छोटी नदियों के साथ शंख नही बह रही हैं । इन नदियों का पानी को पाईप बिछा कर किसानों के खेतों तक पहुंचाएं, तब हर खेत को पानी, हर हाथ को काम मिलेगा। तब पलायन तो रूकेगा ही सिमडेगा जिला का चैतरफा विकास होगा। सरकारी योजनाओं द्वारा विकास का मतलब आज सिर्फ नेताओं, ठेकेदारों और अधिकारियों का विकास करना हैं। हर योजनओं पर प्रखंड कार्यालय में बैठे जुनियर इंजीनियर का अधिपत्य होता है। जब तब मुंह मांगा पीसी नहीं मिलेगा, किसी कागज पर सही नहीं करता है। इस लूट तंत्र का खत्म करना होगा। यह जिम्मेवारी मंत्री महादया एवं जिम्मेदार अधिकारियों का है।
झारखंड की राजधानी रांची से 250 किलो मीटर दूर छतिसगढ़ और हमारे राज्य के सीमा में है बागबेड़ा महुआ टोली गांव। झारखंड की एतिहासिक नदी शंख इसी इलाके में इठलाती शादियों से बह रही है। 6 फरवरी 2011 को सिमडेगा जिला के गोंडवाणा आदिवासी कल्याण एवं विकास मंच ने पांचवा वार्षिक सम्मलेन का आयोजन किया था। झारखंड में आदिवासी सामाज विविधता में एकता के सूत्र में पिरोया हुआ है। उरांव, मुंडा, हो, संताल, खडिया के अलावे यहां 33 अनूसचित जनजातियां हैं। इसमें गोंड आदिवासी भी एक हैं। हो, मुंडा, की तरह ही गोंड आदिवासी समाज भी प्रकृतिकमूलक समाज है। इनकी भाषा-सांस्कृति, पहचान, इतिहास का ताना बाना जल-जंगल-जमीन से जुटा हुआ है। सिमडेगा जिला में इनकी जनसंख्या..95,574 हैं। प्रतिशत में 1.66 हैं। इस समुदाय में education का प्रतिशत 20.00 है। बोलबा और कुरडेगा में ही लगभग ३,000 परिवार हैं। केरसाई, बोलबा, पिरिया पोंछ इलाके के कानसकेली, सिकरी बिउरा, कर्रा झरिया, बासेन, किंकेल, चालाबारी, हेठया, आसनबेड़ा, बागबेड़ा, ठेसु टोली, पाकर बाहर, कोशिमर्पनी , अम्बेरा टोली, अम्बाटोली, करई गोड़ा, चाटी टोली, टंगार टोली, देवदरहा, भीम कोठी आदि गांवों से लोग सम्मेलन में शामिल हुए। कार्यक्रम में शामिल होने के लिए प्रत्येक परिवार से 1 किलो चावल, 1 पाव दाल, और 10 रूपया जमा किये। साथ ही प्रत्येक गांव से 1 बोझालकड़ी , दोना-पातल भी लाये।
कार्यक्रम में आने का आमंत्रण सिमडेगा के कमलेश मांझी ने फोन पर दिये थे। फोन में ही तय हुआ था कि 6 मार्च को मैं समय दे सकती हूं यह नहीं। कमलेश के साथ किसी तरह का परिचय नहीं था। इनके छोटे भाई गणेश मांझी जेएनयू दिल्ली में पढ़ाई कर रहे हैं। 12 जनवारी 2011 को जेएनयू में कमप्यूटर सांइस की प्रोफेसर-डीन सुश्री सोना झरिया एवं करीब 10-12 छात्र-छात्रों के साथ एक छोटी मुलाकात हुई थी। झारखंड के सामाजिक, राजनीतिक परिस्थिति, वर्तन एवं आने वाले चुनौतियों पर लंम्बी चर्चा हुई थी। इसी समय गणेश मांझी से मिले थे। इन्होंने हीकमलेश जी से मेरा परिचय करवाये थे।
रांची से 7.30 में गाड़ी लेकर सिमडेगा के लिए निकले। कमलेश बोल दिये थे कि आप सिमडेगा तक आईये, यहां से प्रफूल जी आप को गांव तक लेकर आऐंगें। करीब 12.20 में सिमडेगा पहुंचे। सिमडेगा थाना के पास प्रफूलजी से मिले। इन्होंने अपनी बहन के घर समडेगा खाना खाने के लिए ले गाये। वहां गणेश मांझी और मेरी रौशनी .मिले। वहां दो और सामाजिक कार्यकताओं से मुलाकात हुई। हम लोगों के बीच सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति पर लंम्बी बात-चीत हुई। चर्चा छिड़ा सिमडेगा का विकास और पूर्व मंत्री एनोस एक्का पर। लोगों ने बताया कि थाना के सामने 5-6 मंजिला बड़ा अपार्टमेंट बन रहा है वहा एनोश का है। ठीक उसे थोड़ा अंदर दो जगह बड़ा बड़ा गैरेज के नाम पर है। लोगों ने बाताया पहले से हीएनोश का चरित्र सिर्फ पैसा कमाने का रहा है। ठेकेदारी करता था तब से ही। इन्होंने अपना तो खूब विकास किया लेकिन अपने आम वोटरों का कुछ नहीं किया। जो उनके आगे-पीछे थे इन्होंने भी खूब कामाया।
खाने के बाद 2 बजे सिमडेगा से बाग बेड़ा के लिए निकले करीब 60 किलो मीटर दूर है बाग डेगा महुंआ टोली गांव सिमडेगा से। कुछ दूर पक्की संडक में चलने के बाद कच्ची संडक। कई छोटे छोटे नदी-नाला पार किये। दूर जाना है वापस भी लौटना है। लेकिन मन नदी-नाला देख कर मन बहुत पुलकित होता जा रहा था। आज अब रांची शहर के साथ अन्य सभी शहरों में पानी का हाहाकार मचा हुआ है। तब छोटे नदी -नालों में बहते पानी को देखकर जो आंनद होता है उसको तो प्रकृतिक प्रेमी ही महसूस कर सकता है। कच्ची संडक कई गांवो को जोडते हुए शंख नदी पहुंचती है। अभी हाल ही में पुल तैयार हुआ है। शंख नदी का चैड़ाई देखने से लगता है-शायद यह झारखंड का सबसे चौड़ा नदी है। जो साथी हमें गांव के लिए अगुवाई कर रहे थे-बोलते हैंशायद झारंखड में यही पूल सबसे लंम्बा होगा। सुखद बात तो यह है कि नदी में अभी भी पानी है।
शंख नदी पार कर कई बरसाती नालों को लांधते हुए खेत-टांड से गुजरते महुंआ टोली पहुंचे। कार्याक्रम शुरू हो चुका था। जिंदगी में यह मेरा दूसरा मौका था-जब मंत्री, अधिकारीयों के साथ मंच में बैठने का। मैं हमेशा इसे परहेज करते आयी हूं। एक बार जब बंधु तिर्की education मंत्री थे-तब खूंटी जिला के कर्रा प्रखंड में 29 नवंबर 2006 को अर्सेलर मित्तल कंपनी के खिलाफ लड़ रहे जमीन बचाव संगठन ने उसे बुलाया था। तब मंत्री श्री बंधु तिर्की ने कहा था-मित्तल कंपनी को यहां जमीन नहीं दिया जाएगा। याद है-तब सभी मंत्रियों ने श्री तिर्की को घेरा था, सभों ने कहा-मंत्री बंधुजी राज्य का विकास करना नहीं चाहते हैं इसलिए विकास के विरोध में बयान दिये है। इनके जवाब में श्री तिर्की बोले थे-आदिवासी मूलवासी, किसान गाय बैल नहीं हैं कि जब चाहो-उसे जहां-तहां खादेड़ दो। आदिवासी मूलवासियों को अपने जंगल-जमीन पर जीने का हक है।
जब मैं कार्यक्रम स्थल पहुंची तब पर्यटन एवं समाज कल्याण व बाल-विकास मंत्री श्रीमति विमला प्रधान का भाषण चल रहा था। इन्होंने लोगों अपने भाषण में समाज कल्याण व बाज विकास योजना के तहत चलायी जा रही योजनाओं पर प्रकाश डाली। लोगों से अपील की कि आंगनबाड़ी केंन्द्रों में महिलाओं और बच्चों के लिए पोषाहार दिया जाता है इसका लाग उठाना चाहिए। पहली बार गर्भवती होने वाली महिलाओं के लिए बिशेष सहयोग दिया जाता है। इन्होंने कहा-आप अपने बेटियों का दिल्ली, बोम्बें आया काम करने के लिए नहीं भेजिएगा। बालिकाओं का स्कुल जरूर भेजें। पर्याटन विकास का काम भी इस इलाके में किया जाएगा, इसमें आप लोगों के सहयोग की जरूरत हैं। बिदित हो की मंत्री बिमला प्रधानजी गोंड़ आदिवासी समाज से ही हैं.
bahishkar ke bad offecer bhi bahar nikal gaye..khali pada..kisan bhawan pic. 5
Adhikariyon ka bahishkar kar bahar nikle gramin..pic. no4
Jan denge..Jamin nahi denge..kisi bhi kimat me dam bana ne nahi denge. bole kar hall se bahar nikalte gramin...pic. no. 3
j
abda, ghorpinda, Jonhe ke gramin....pic. no.2
17 march 11 ko karra Co shri kamlakant gupta graminon ko kanti jalashay ke bare jankari dene ki koshi karte hue...pic. no.1 दूसरी ओर डैम नहीं बनाने की मांग को लेकर ग्रामीण लगातार लिखित मांगपत्र कर्रा प्रखंड विकास पदाधिकारी- 2 बार, उपायुक्त खूंटी को’ 2 बार, एसपी खूंटी-1 बार, आयुक्त दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल रांची -1 बार, गृह सचिव झारखंड सरकार -1 बार दिये हैं। डैम के विरोध में ग्रामीणों ने 25 जनवरी 11 को प्रखंड मुख्यालय में रैली और आम सभा कर मांग पत्र अधिकारियों को सौंपा। 22 फरवरी 11 को ग्रामीणों ने डैम प्रभावित संघर्ष समिति के बैनर से रांची में एक प्रेस वार्ता बुलाये। 25 फरवरी 11 ग्रामीणों ने डैम को रोकने की मांग को लेकर खूंटी जिला मूख्यालय में रैली-सभा कर उपायुक्त को मांग पत्र दिये।
इतना होने के बाद 17 मार्च 2011 को सरकार की ओर से इस योजना के संबंध में ग्रामीणों को जानकारी देने तथा ग्रामीणों का राय जानने के लिए 25 मार्च 2011 को मेरले में ग्राम सभा का बैठक बुलाया गया है। इसकी तैयारी के लिए सीओ ने जिला परिषद सदस्य उत्तरी- दक्षिणी, ग्राम पंचायत मुखिया, पंचायत सदस्य, महिला समिति-लरता, सुनगी, जुरदाग, ग्राम प्रधान-कोषाध्यक्ष जबड़ा को बुलाया गया था।
बैठक का उद्वे’य पर जैसे ही सीओ ने शुरू किया वहां उपस्थित नवनिर्वाचित पंचायत सदस्यों ने भी जिला अध्यक्षय को नहीं बुलाया गया है इसलिए बैठक का बहिष्कार करते हुए किसान भवन से बाहर निकल गये।
होल में जबड़ा, घोपिंड़ा, जोन्हे के ग्रामीण भी उपस्थित थे। इन्होंन एक स्वर में आवाज उठाये -यहां किसी तरह का डैम नहीं बनाने देगें। जान देगें-लेकिन जमीन नहीं देगें। डैम नहीं बनाने देगें कहते हुए सभी होल से बाहर निकल गये। पांच मिनट के भीतर होल खाली हो गया।