Thursday, September 21, 2017

Tuesday, September 19, 2017

परिवार में छह सदस्य थे-पांच जगह रहते थे

टिचरजी सबको बोल दी थी-26 जनवरी तक जिसके पास ड्रेस नहीं है, बनवा लो। मां को प्रति माह 25 रू0 तनखा मिलता था। मां इस पैसा को हमदोनों को, जोलेन दादा और बिजय दादा सबको बांट देती थी। पुलिस वाले हमदोनों को खाना के साथ 15 रू महिना देते थें। मां के मलकीन के घर के बगल वाले घर में फुलमनी आया का काम करती थी। फूलमनी बोली हमको एक परिवार वाले सुबह शाम वर्तन, कपड़ा, घर झाडू-पोछा करने के लिए आया खोजने के लिए बोले हैं। एक दिन फुलमनी मुझ को लेकर उस परिवार से बात करायी। मैं काम करने के लिए तैयार हो गयी। सुबह सुबह दादा के साथ दोनों मिलकर पुलिस चैकी का काम जल्दी से निपटा लेते थे। इसके बाद मैं उस नया घर में काम करने निकल जाती। इस परिवार में तीन बच्चे और पति-पत्नि रहते थे। यह बंगाली परिवार था। बीबीजी मेरा नाम-दयामुंई पुकारती था।
पुलिस चैकी में पहले वाले कुछ पुलिस दूसरा जगह चले गये। उनके जगह नये आये हैं। हवलदार तो वही है। एक लंबा सा आया -साधु सिंह नाम था। व्योहार से बहुत अच्छे थें। चैकी में पहुंचते ही आवाज देते थें-बरला.....
तब सब ठीक है नू...। जो भी नया आदमी आता, सबको बताते थे-ये हम लोगों की दाई हैं। दोनों भाई-बहन पढ़ते हैं। बरला जरा.....पानी पिलाओ....आया हुआ व्यत्कि मुस्कुराता हुआ चेहरा देखता। जितने पुलिस पुराने थ,े वो हमदोनों के खाने का ख्याल रखते थे। नया आते,ं ये पहले वालों की तरह नहीं होतें।
अब ज्यादातर दिन हमदोनों के लिए खाना नहीं बच रहा था। हमदोनों साधु सिंह को ही बोल पाते ं-आज खाना नहीं है। रविकांत दूसरा जगह चला गया। मरांडी भी गया। अब हमदोनों को अधिकांश दिन अपने ही डेरा में भात-रोटी बनाना पड़ रहा था, उसी डिबा और टिना में ।
जिस बंगाली परिवार में काम पकडी थी- उनकी बड़ी बेटी मेरी ही उम्र की थी। उनकी एक छोटी बहन और एक बड़ा भाई भी था। घर पोछने के समय उसका बडा बेटा मेरे पीछे पीछे घुमते रहता था। मुझको अजीब सा लगता -लेकिन चुप रहती। एक दिन उसकी मां बाजार गयी थी। उसकी बहन दोनों भी नहीं थे घर में। उनकी मां बोल कर गयी--वह बगल पडोसी के घर जा रही है, तंुरत आएगी। जब मैं घर पोछा करने लगी-बड़ा लडका मुझे पीठ तरफ से मेंरे दोनों कांख के नीचे से हाथ पार कर छाती तक हाथ पहुुुचाने की कोशिश करने लगा। मैं हड़बडा कर खड़ी हो गयी और विरोध करते बोली--देखो घर में सबको बता दुंगी। तब वह नहीं -नहीं मत बताना-दूबारा ऐसा नहीं करेगें कहते हुए दूसरे कमरा में गया। तब से पुरूषों को देखकर मन में असुरक्षित सा महसूस होने लगता था।
स्कूल में 26 जनवरी का परेट जारों से चल रहा था। क्लास में मुदित देमता से नयी मुलाकात थी। निलम कच्छप भी मुदित के साथ ही रहती थी, इसलिए मेरी दोस्ती दोनों से ही हो गयी। पिछला साल तो मैं एलो हाउस में थी। इस साल मुझे ग्रीण हाउस मिला । मुदित ब्लू हाउस और निलम मेरून हाउस में थी। याद है पिछले साल गणतंत्र दिवस बहुत धुमधाम से मनाया गया था।
 देखते देखते  26 जनवरी आ गया। सभी तरफ चहल-पहल था। आज पुलिस चैकी में भी दूसरे दिनों से अलग ही लग रहा है। और दिन कुछ सिपाही हमदोनों के आते तक सोते रहते थे। आज सभी उठ गये हैं। कोई नहाने की तैयारी में है, कोई मुंह साफ कर रहा है। दो सिपाही बैरक प्रंगण में लाल बिच्छी ईंटों पर फूलों से कुछ बना रहे हैं। एक-दो अपने बेड पर बैठ कर अपना ड्रेस ठीक कर रहे हैं। दादा के साथ हमदोनों जल्दी जल्दी चैकी का काम निपटाने की कोशिश में जुट गये। हम दोनों को सात बजे तक स्कूल पहुंचना है।
चैकी का काम निपटा कर डेरा लौटे और हड-बड तैयार हुए और स्कूल के लिए निकल गये। स्कूल आंगन में सभी क्लास की लड़कियां जमा हुई। तिरंगा झंण्डा के नीचे गुलाम फुल की लाल-गुलाब पंखूडियों से भारत बना हुआ था। सभी लड़कियां बहुत खूस नजर आ रही थीं। स्कूल की प्रिंसिपल से लेकर सभी शिक्षिकाएं आसमानी नीला रंग की साडी और सफेद ब्लाउज में थीं। संस्कृत सर हमेशा की तरह धोती कुरता में।ं, लेकिन आज सफेद कुरता के जगह हल्का ब्राउन रंग का कुरता में हैं। गणित सर दोनों हमेशा की तरह सफेद कमीज और सफेद पैंट पहने में।
 आठ बजे सभी झंण्डा के नीचे थे। स्कूल की लीडर -परेड सावधान, परेड-बिसराम, परेड........। स्कूल की प्रिंसिपल आगे आयी और झंण्डा का डोर पकडं ली ....देखते ही देखते फूलों की पंखुडियां और फूल आसामन से झरने लगा, तब....जन...गण....मन.....गान के साथ तिरंगा झंण्डा को गाइड की लडकियों ने बैंड बाजा के साथ सलामी दी।  8 बजे तिरंगा झंडा फहराने के बाद मैदान में कार्याक्रम शुरू हुआ। रिले रेस, नाटक, घडा फोड़, कुर्सी दौंड़, साई-धागा रेस, आदि दिन भर चला। जो प्रतियोगिता में जीते थे-उनको पुरस्कार दिया गया।
प्रतिदिन क्लास शुरू करने के पहले बाईबल क्लास होती थी। क्लास में सबके पास बाईबल थी, मेरे पास नहीं था। एक दिन मैंने क्लास रूम में रखे लकड़ी के अलमीरा से बाईबल चोरी करने की सोची। मैं आज हिम्मत नहीं जुटा सकी। दूसरे दिन मैं टिफिन के समय जब क्लास रूम में कोई नहीं था ,अलमीरा के पास गयी। अलमीरा खोलकर बाईबल को निकाल ली। थोड़ी देर अपने डेस्क में रखी, लेकिन मन बोला-नहीं चोरी मत करो। मैं बाईबल वापस रख दी।
जनवरी के बाद अब पढ़ाई टाईट से होने लगा। इस साल पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं हो रही थी, पिछले साल तो शहरी वातावरण में अपने को अडजस्ट करने मेे भी दिक्कत हो रहा था।
स्कूल से लौट कर बंगाली बीबीजी के घर काम करने जाती थीं तो आशा लगा रहता था, कि सब काम निपटाने के बाद चाय के साथ दो अंटा रोटी मिलेगा। इनके घर से दो घर पहले एक छोटा मकान था। इस घर में एक ही जवान रहता था। वह हमेशा बंगाली परिवार में आता जाता था। एक दिन बीबीजी बोली-दयामुंई ये न अकेला रहता है, तुम इसके घर का दो वर्तन धो देना और पोझा लगा देना, तुमको कुछ पैसा देगा...चलेगा? मैं ने हामीं भर दी।
 अब कल से इनका घर का काम भी देखना है। इसलिए भी काम करने को तैयार हो गयी, क्योंकि पैसों की जरूरत थी। स्कूल फीस के रूप में 3 रू प्रतिमाह देना था। पिछले साल जो किताब नहीं खरीद सके थे-सुशील दादा के साथ हमदोनों गुदड़ी के पास पुराना किताबों का दुकान था वहां से जाकर खरीद लिए। जोलेन दादा पिछले साल तक गांव में था। अब वो भी रांची आ गया। जोलेन दादा गांव के बगल कुदा स्कुल में 8वीं क्लास में पढ़ रहा था। अब बिजय दादा केवल घर में रह जाएगा। बिजय दादा गांव में ही दूसरों के खेत-टांड में मेहनत-मजदूरी कर अपना रोटी जुगाड़ कर ले रहा था। बाबा कोटबो छपर टोली में 8 साल से धांगर है। साल में एक-दो बार एक-दो दिन के लिए आते थे। हर साल पूस महिना में बाबा को साल भर का धंगराई का मेहनतना 3 काठ धान मिलता था। पहनने के लिए एक पढ़िया करेया और एक पेछाउडी। धान लाने बिजय दादा अपने साथ, एक -दो लड़कों को लेकर जाता । जिस दिन धान लेकर आते थें, सबको दाल-भात खिलाते थे।
स्कूल से लौट कर मैं बंगाली बीबीजी के घर काम करने के बाद बीबीजी उस दूसरे घर में वर्तन साफ करने ले जाती थी जहां अकेले एक युवक रहता था। एक दिन बीबीजी बाजार गयी, तब मुझे उनका घर अकेले काम करने जाना पड़ा। वर्तन धो ली, अब घर में झाडू मारना और पोछा लगाना था। मैं डरे सहमंे मन से अपना काम पूरा की और निकल कर सीधे बंगाली बीबीजी के घर आगयी। मेरा दो रोटी और चाय खा कर पुलिस चैकी काम करने निकल गयी। मेरे जाने के पहले सुशील दादा पहुंच कर मसाला पीस रहा था। जैसे मैं चैकी में पहुंची, बरला....इधर आओ, दरोगा ने आवाज दिया। मैं गयी, वहां चार-पांच सिपाही लाईन से खड़े थे। दरोगा पूछा....इसमें से तुम को कोई कुछ बोलता है? कुछ भी गलत बात बोलता है? एक बार के लिए मैं सकपका गयी। वहां रमानंदजी भी मौजूद थे, जो एक दिन मेरे उपर हाथ डाला था, लेकिन मैं....जी नहीं.....बोलते सिर झुका ली।
 हम लोगों को संस्कृत पंडित सर पढ़ाते थे। हम लोग 4-5 लड़कियां होम वर्क करके नहीं लाए, सर डंटते हुए बोले......दहीना हाथ बढ़ाओ.....हाथ बढ़ाते ही , तलहथी पर सरट-सरट तीन छडी पड़ा। शरम से सिर छुक गया। दो-तीन मिनट बाद सर बोले.....तुम लोगों को मां-बाप पढ़ने के लिए भेजते हैं, बढ़िया से पढ़ो.......आगे होम वर्क जो करके नहीं आएगा....मेरा क्लास में नहीं रहेगा....वो बाहर रहेगा। जिस दिन जिस विषय का होमवर्क पूरा नहीं कर पाती थी, क्लास में मुदित से उनका होमवर्क कापी लेकर जल्दी से उतार लेती थी। क्लास में दूसरे लड़कियों को देखते रहती थी-सोचती थी, ये सभी बड़े घर की बेटियां हैं, मैं इनके सामने तो कुछ भी नहीं हुं.......................।
क्लास सिलाई में हम लोगों को रूमाल का किनारा, उस पर फूल बनाना, थैला पर फूल बना कर थैला सिलाई करना था। मां से रूमाल कपड़ा के लिए मरकिन खरीदने के लिए पैसा लिये, उसी को क्लास सिलाई बना ली। हमारे क्लास को मैडम बेला तिग्गा भूगोल पढ़ाती थी, स्वथ्य विज्ञान मिस भेंगरा पढ़ाती थी। गांव से जितनी नयी लड़कियां आती हैं, सबकों समझाती हैं--गांव से पढ़ने आयी हो, अवसर मिला है मेहनत करो, रिजल्ट अच्छा करो.....तब आगें बढ़ोगे।
पीपी कमपाउंड में एक धोबी परिवार था। उसकी बेटी मेरा ही क्लास में पढ़ती थी। इसके साथ हम दोनों की बढ़िया दोस्ती थी। छुटी के दिन कभी वो मेरे पास आती थी, कभी मैं उनके डेरा में जाती। उनके मां-बाबा पीपी कमपाउंड के एक गली में टेबल लगा कर लोगों का कपड़ा अयरन करते थे। साथ ही जो लोग कपड़ा धाने के लिए देते थे, उनका कपड़ा भी धोते थे। ये लोग भी एक पंजाबी परिवार के छोटा सा कमरा में रहते थे। मां बोलती थी-तुम जो-सो के साथ जल्दी घुलमिल जाती हो, एैसा ठीक नहीं है। तब लगता था मां मना कर रही है। बोलती थी कौन कौसा आदमी क्या है-तुम नहीं जनती हो।
परिवार  में छह सदस्य थे-पांच जगह रहते थे
बाबा कमडरा प्रखंड के सुरवा गांव में लोखन पाहन के घर धांगर.....था। मां --जयफर स्टूडियों के मालिक के घर रांची के पीपी कमपांउड में आया का काम करती थी।...
जेलेन दोदा--(मुझ से बड़ा)--थड़पखना रांची के कबाड़ी दुकान मे दिहाडी मजदूरी का काम करता था। वहीं पुराना लोहा लकड के ढेर के बीच रात गुजारता था।.
स्ुाशील दादा और मैं- टहेलसिंह के बगान में एक आउट हाउस में रांची ...में असियाना मिला।.
बिजय दादा--(सबसे बड़ा भाई)--अपने घर अरहरा में, कमडारा, गुमला में किसानों के खेत में मजदूरी कर रोजी-रोटी चलाता था। .
हाथ में चुड़ी का दाग आज भी
परिवार में छह सदस्य थे। पर सभी अलग अलग जगहों पर। तीन बहनों की सबसे छोटी बहन, मेरे लंम्बे घने बाल थे। स्कूल में बाल बांधने के लिए काला फीता का प्रयोग किया जाता था। स्कूल के बाहर कभी कभी मैं लाल फीता से बाल बांधती थी। एक दिन मैं लाल फीता बांधकर मां के पास उनके मलकिन के घर गयी थीै। मेरा बाल देखकर मां बोली-तुम्हारा बाल एैसे ही बहुत सुंदर  है, तुम लाल फीता मत बांधना, अच्छा नहीं दिखता है।  मैं वहीं अपने बाल की चोटी से लाल फीता को खोल दी। साथियों को देख कर हाथ में चुडी पहनने का मन होता था। एक बार चुडी पहनकर गांव गयी थी। बिजय दादा काड़ा चराने गया हुआ था। मैं रात का खाना बनाने के लिए सिलोट पत्थर पर हलदी, धनिया पीस रही थी। मेरा हाथ की चुडियां झनर झनर आवाज कर रही थी। दादा काड़ा घर ला रहा था। कड़ा को गोहाल में भीतार कर घर घुसे। मैं तबतक दूसरा काम में व्यस्त थी। दादा अंदर आकर पींडा पर बैठते हुए बोला-हम तो सोच रहे थे-कौन तेलीन जनी आयी है, चुडी बज रहा है। हम दोनों खूब हंसे। लेकिन मैं समझ गयी कि-दादा को मेरा चुडी पहनना अच्छा नहीं लगता है। तब से चुडी नहीं पहनी। रमटहल का मकान----पीपी कमपाउंड-----
बड़ा सा होला का गेट। अंदर में एक छोटा कमरा। कमरा में एक टुटा पुराना लकड़ी का बंेच। फर्स पर कच्चा सिमेंट का पसल्टर। आंगननुमा छोटा सा ईंटा का घेरा। गेट के सामने जमीन से थोड़ा बाहर निकला पानी का नल। नल का मुंह को एक नटनुमा ढकन से बंद करते हैं। बगान का पूरा जमीन गरमी में भी गीला रहता है। बगान के चारों ओर उंचा घेरा है। बगान के पूरब पंजाबी परिवार का दो तल्ला मकान है। इसके यहां रिक्सा का बोडी बनता है। अरहारा का सिमोन दादा यहीं रिक्सा बोडी बनाता है। बगान के उत्तर ओर भी मकान है। कमान के बगल में एक छोटा मंदिर भी है। वहीं एक आम का पेंड भी हैं-जिसका डाली बगान की ओर झुका हुुआ है। बगान के पश्चिमी ओर हिंन्दपीडी जाने वाला रोड़ हैं। यहीं दिवाल से सटा एक बड़ा सतालू का पेड है।
पुलिस वालों के यहां रोज-रोज खाना नहीं बचता है। कभी कभी पुलिस चैकी में उनके दोस्त-यार आते हैं, तो खाना नहीं बचता है। जिस दिन खाना नहीं बचता है-पुलिस वाले 10-15 रूपया हम दोनों को धरा देते हैं। इसे चावल या आंटा खरीदते हैं। हम दोनों के पास रांेटी बनाने के लिए ताई नहीं था।
 बगान में ही एक बड़ा टिना का मुंह काट कर निकाला गया-टिन का टुकड़ा पड़ा मिला। इसको बढिया से धोये और इसी पर रोटी बनाने लगे। भात पकाने के लिए डेगची और कड़ाही भी नहीं था। बगान में ही एक छोटा दूध का पुराना जंग लगा डिबा मिला। उसको मिटी से रगड-रगड़ कर साफ किये। जब-जब हम दोनों के पुलिस वालों के पास भात-रोटी नहीं बचता था, तब-तब इसी डिबा में भात पकाते थे। खाना बनाने के लिए हम दोनों लकड़ी खरीद नहीं सकते थे। सुजाता सिनुेमा हाॅल के बगल एक पंजाबी परिवार भैंस पाल रखा था।
उनके यहां करीब 7-8 भैसें थी। हर सुबह हिंन्दपीडी की मिहलाएं भैंस का गोहाल से गोबर उठा कर ले जाती थी। मुझको भी शांति वहां ले गयी थी दिखाने कि तुम भी उपला बनाने के लिए उठा लाओ। मां अपने मलकिन से फटा टीना मांगी थी। जिसका पेंदी -नीचला भाग सही थी। इसी को काट कर टोकरी बना लिये। सुबह चार ही बजे उठते थे, देर होने पर सौच के लिए जगह नहीं मिलता थां, उजियाला होने पर। सौच से निपट कर सीधे टीना पकड़ कर सरदारजी के भैंस गोहाल जाती और गोबर उठा कर लाती थी। हाथ-मुंह धो कर रात को खाना लाया वर्तन लेकर सुजाता पुलिस चैकी जाती। बसन-वर्तन करन कर वापस डेरा में आकर पहले गोबर का उपला बगान के घांस में जहां खाली था डाल देती थी। इसके बाद स्कूल के लिए निकलती थी।
जब-जब भात बनाना होता था, ईंटा का चुल्हा बिलकुल छोटा -जिस पर डिबा बैठा सकते थें और नीचे गोबर का उपला डाल सकें, बना लिये थे। डिबा में तीन ही मुठी चावल पकता था। जब भात डबकता था, तो पूरा चुल्हा में पानी और चावल साथ गिरने लगता था। आंटा रोटी बनाने के लिए एक कांच का बोतल को साफ कर लिये थे। आंटा का गुंधा गुलिया को अलमुनियम का थाली को उलाट कर उस पर बोतल से बेल कर गोल करते थे। ताई तो टिना का टुकड़ा.........।
अक्टोबर महिना में स्कूल में नमाही परीक्षा था। लगातार आठ दिनों से झिमिर झिमिर पानी बरस रहा था। मेरे पास छाता नहीं था। पीपी कमपांड से बिना छाता के लिए अपना किताब-कोपी को एक प्लाटिक में डाल कर अपने छाती से चिपका कर, दुपटा का एक छोर से किताब को ढंक कर स्कल जाते थे। आते समय भी एैसा ही लपेट कर आती थी। परीक्षा करीब था इसलिए मैं स्कूल नागा नहीं करती थी। आज भी पानी पानी ही मैं घर जाने लगी। दूसरी लडकियों के पास छाता और बरसाती हैं, तो वे अपने साथियों के साथ निकल गयी। पानी ज्यादा गिराने लगा, मैं बचने के लिए स्कूल से थोड़ा दूर आकर छोटानागपुर किताब दुकान के पास रूक गयी। पानी कम किया तो मैं जाने लगी। थोडी दूर गयी थी, तभी एक बरसाती पहिना, सिर भी ढंका एक व्यक्ति मुझ को पार कर आगे निकला।
चर्च रोड़ छोड़ कर बरनाबस अस्पताल घेरा के बगल से होकर पिलगर्ल लाईन होकर आते थे। जैसे ही मैं पिलगर्ल लाईन पार की बरसाती वाला आदमी वहां रूका हुआ मिला। मैं बेथेसदा गल्र्स हाई स्कूल के पिछवाड़े जैसे ही पहुंची बरसाती पहना आदमी मेरे पास पहुंच गया। मैं कुछ समझती-तब तक वह मुझको दोनों हाथों से जकड़ के पोटर लिया और रोड के पार लीची बगीचा के बीच झाडियों के तरफ खींच कर ले जाने लगा। मैं जोर लगा रही थी-अपने को छुड़ाने के लिए...मेरा किताब जमीन पर गिर कर बिखर गया। पैर का चप्पल खुल गयां । मैं संभलने की कोशिश की। जमून पेड़ का छोटा सूखा लकड़ी टूटकर सामने जमीन पर पड़ा था। मैंने उसे उठा ली और उस आदमी को मारने के लिए दौड़ाने लगी। तब तक बेथेसदा स्कुल गेट के सामने कुंआ से कुछ लड़कियां पानी भर रही थी, वो मुझ को देख ली। उन लोगों को समझते देर नहीं लगी और दो-तीन लड़कियां मेरी तरफ दौड़ कर आने लगी। लड़कियों को देख कर वह सीधे गोस्सनर मिडिल स्कूल के पीछवाड़े से होते हुए खजूर तालाब वाले मिशन के खेत वाले रास्ते पर आगे जाने लगा, जिस रास्ते से मुझे घर जाना था।
लड़कियों को मैंने पूरी बात बतायी। लडकियां पूछी-तुम कहां रहती हो? मैं बतायी-पीपी कमपांड में। तब लड़कियां बोली-तब तुम को तो उसी रास्ता से जाना हैं-जिस रास्ता से वो बदमाश जा रहा है। तब उन लोगों ने तय की कि-वे मुझे मेन रोड़ तक पहुंचा देगें। मेन रोड़ के बाद तो बहुत लोग मिलेगें। तब लड़कियों ने मुझे मेन रोड़ तक पहुचा दी। मेन रोड़ पार कर अपना बाजार वाले रास्ते से पीपी कमपाउंड में मैं घुस गयी। सबसे पहले में मां के पास उनके बीबीजी के घर ही मिलने गयी। मां को पूरी घटना बता दी। मां बोली-आगे से ख्याल रखना-जब रास्ता में साथी सब मिलेगें तब उन्हीं के साथ आना-जाना करना 

Monday, July 17, 2017

झारखंड अलग राज्य की मांग, झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय ने अपने जल-जंगल-जमीन, भाषा-सास्कृति, पहचान को विकसित और संगक्षित करने के लिए की थी।

15 नवंबर 2000 में झारख्ंाड अलग राज्य का पूर्नगठन हुआ। यह सर्वविदित है कि झारखंड अलग राज्य की मांग, झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान समुदाय ने अपने जल-जंगल-जमीन, भाषा-सास्कृति, पहचान को विकसित और संगक्षित करने के लिए की थी। अलग राज्य का नींव अबुआ हातुरे-अबुआ राईज, हमर गांव में-हमर राईज छोटानागपुर और संताल परगना इलाके में अंगे्रज हुकूमत द्वारा थोपी जा रही भूमि बंदोस्ती कानून या लैंण्ड सेटेलमेंट के खिलाफ संघर्ष के साथ डाला गया। इस, हमारे गांव में हमारा राज के संघर्ष को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संताल हूल 1856, 1788-90 में पहाडिया विद्रोह, 1798 में चुआड विद्रोह, 1800 में चेरो विद्रोह, 1820-21 में हो विद्रोह, 1831-33 में कोल विद्रोह, सरदारी विद्रोह और 1895-1900 में बिरसा मुंडा उलगुलान के नाम से इतिहास में अंकित किया गया है। 
इस अलग राज्य की लड़ाई ने आजादी के बाद छोटानागपुर एवं सताल परगना के इलाके में आजादी के बाद संपन्न हुए राजनीतिक चुनाव को भी प्रभावित किया, और आदिवासी-मूलवासी समुदाय ने 1952 के पहला चुनाव में अलग राज्य के नाम पर 33 जनप्रतिनिधियों को चुन कर बिहार विधान सभा में भेजा। अलग राज्य की इस लड़ाई को राजनीतिक तौर पर जयपाल सिंह मुंडा, निरल ऐनेम होरो सहित हजारों आदिवासी मूलवासी अगुओं ने आगे बढ़ाया। इसके बाद का0 ऐके राय, बिहारी महतो और शिबू सोरेन ने भी नया दिशा दिया। समय के साथ आंदोलन ने हर तरह के उतार-चढ़ाव देखा। अलग राज्य के नाम पर आदिवासी-मूलवासियों के संगठित ताकत का अहसास भारतीय जनता पार्टी एवं संघ परिवार था, कि अलग राज्य के नाम पर आदिवासी-मूलवासी संगठित हैं। यदि आदिवासी समाज के बीच अपना जगह बनाना है-तो अलग राज्य पुर्नगठन के सवाल को पार्टी अजेंडा बनाना होगा। 
विदित हो कि 1996-57 में बीजेपी ने झारखंड अलग राज्य के नाम पर एक 32 पेज की पुस्तिका प्रकाशित किया-वनांचल ही क्यों?। इस पुरे पुस्तिका का एक ही सार था-राज्य में इसाई समुदाय और अल्पसंख्याक समुदाय ने अपनी गहरी पैठ बनायी है, इस पैठ को कौसे उखाडा जाए और स्वंय उस जगह को अपने अजेंडा के साथ पाटा जाए। इस पुस्तिका में आदिवासी समाज को वनवासी के नाम से संबोधित किया गया। आदिवासी समुदाय को वनवासी संबोधन किया गया-इसको लेकर सामाजिक संगठनों सहित लोकतंत्रिक राजनीतिक पार्टियों ने भी विरोध किया। आदिवासी-मूलवासी समुदाय तथा तमाम जनसंगठनों ने सवाल उठाया कि-आदिवासी समुदाय को वनवासी करार कर, आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन के परंपरागत अधिकारों से अलग करने की बड़ी साशिज रची गयी है। साथ ही झारखंड के जंगल-जमीन-पानी और खनिज को पूंजिपतियों के हाथों बेचने की तैयारी है। इस विरोध और सर्मथन के बीच आदिवासी समुदाय ने स्पस्ट नारा दिया था-कि भाजपा द्वारा झारखंड को वनांचल का दर्जा देने का मतलब-झारखंड को व्योपारियों/व्यवसायिक / पूजिंपतियों का अखाडा बनाना है। इस तर्क के साथ आदिवासी-मूलवासी समुदाय ने वनांचल शब्द का कड़ा विरोध किया। विरोध के परिणामस्वरूप भाजपा ने एक कदम पीछे हटा और वनांचल शब्द को छोडकर झारखंड के नाम पर ही अलग राज्य को पुर्नगठन करने इस अजेंडा के साथ बीजेपी ने अलग राज्य पूर्नगठन का काम को आगे बढ़ाया। क्योंकि इस समय केंन्द्र की सत्ता पर भाजपा थी। सत्ता की राजनीतिक गणित का जोड़-घटाव के बाद भाजपा ने देखा कि यही मौका है आदिवासी बहुल, खानिज संपदा से परिपूर्ण धरती पर अपना साम्रज्य स्थापित करने का। इस मौका को हाथ से जाने नहीं दिया, और अजेंडा को अमलीजामा पहनाने में बीजेपी सफल रहा।, और देश में एक साथ तीन आदिवासी बहुल राज्यों को अलग राज्य का दर्जा दिया गया। 
इस बात को नहीं भूलना चाहिए भाजपा को कि-झारखंड अलग राज्य के पुर्नगठन की तारीख 15 नवंबर को इसलिए चुना गया कि-झारंखड आदिवासियों का इतिहास, अस्तित्व और पहचान से जुड़ा है। इसके आदिवासी समुदाय ने लंबी लड़ाई लड़ी है। बिरसा मुडा आदिवासी समाज का पहचान है-इतिहास का हिस्सा हैं। भाजपा आदिवासी समाज को जताने चाहा-कि झारखंड आदिवासी समाज के सम्मान में बन रहा है। इसी उद्वेश्य से 15 नवंबर 2000 को राज्य को जन्म दिया गया। 
लेकिन राज्य बनने के बाद राज्य ने 16 साल की उम्र देखी। इस 16वें साल में 12 साल तक तो राज्य में भाजपा के नेतृत्व में राज्य का शासन व्यवस्था चला। इन 16वें साल में पहली बार भाजपा पूर्ण बहुमत में आकर अकेले झारखंड का शासन व्यवस्था पर कब्जा जमा ली है। कोई रोकने वाला नहीं-आज बीजेपी अपने असली ऐजेंडा को राज्य में लागू कर रही है। इसी अजेंडा के तहत फरवरी 2016 में स्थानीयता नीति लागू किया गया, जो पूरी तरह आदिवासी, मूलवासी, किसान, सहित राज्य के मेहनतकश आज जनता के विरोध में स्थानीयता नीति का रूपरेखा खींचा गया और कानून का रूप दिया गया। जबकि मूल आदिवासी-मूलवासी झारखंडी समुदाय ने, अपने भाषा-संकृति, रिति-रिवाज, खान-पान, जीवनशैली एवं 1932 के खतियान का आधार बना कर, स्थानीयता नीति बनाने की मांग की थी। लेकिन राज्य सरकार ने इसको खारिज कर, जो 30 सालों से झारखंड में रह रहा हो-सभी झारखंडी हैं, इसी के आधार पर स्थानीयता नीति को पास किया। जो पूरी तरह से आदिवासी-मूलवासी विरोधी है। इसका विरोध हुआ, लेकिन बहुमत का नाजायज लाभ उठाते हुए, अपना अजेंडा को कानून रूप दिया। यहां से शुरू होता है-झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, किसान, मेहनतकशों के संवैधानिक अधिकारों पर धारदार हमला। जनविरोधी स्थानीयता नीति के साथ ही सीएनटी-एसपीटी एक्ट जो आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज का सुराक्षा कवच है, को तोडना का प्रयास किया गया। 
जून 2016 के कैबिनेट में रघुवर सरकार ने सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश लाया, और संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति के पास हस्ता़क्षर के लिए भेज दिया। जब इस अध्यादेश का राज्य की जनता ने विरोध की, तब राष्ट्रपति भी उसे वापस का दिये। जबकि कैबिनेट के तीन-चार दिन बाद झारखंड विधानसभा सत्र शुरू होने वाला था, इसका भी रघुवर सरकार ने इंतजार नहीं किया कि, संशोधन पर विधान सभा में चर्चा के लिए रखा जाता। 
जब जुलाई में विधानसभा सत्र शुरू हुआ-विपक्षी पर्टी ने विधान सभा के भतीर तथा जनआंदोलनों, सामाजिक संगठनों ने मैदान में विरोध करना शुरू किये। परिणामस्वरूप विधान सभा सत्र स्थागित हो गया। 22 अगस्त को रांची के थेलोजिकल हाॅल में दो दिनों से हो रहे भारी बारिश के बावजूद 600 लोग एकत्र होकर संशोधन अध्यादेश पर चर्चा कर बाद एक स्वर में विरोध किया। इसके साथ ही पूरे राज्य में विरोध का स्वर गूंजने लगा। 23 अगस्त को विपक्षी पार्टियों ने संयुक्त घोषणा किया-कि किसी भी हाल में संशोधन अध्यादेश को पास करने नहीं देगें। 24 अगस्त को राज्य के 24 आदिवासी संगठनों ने राजभवन मार्च के साथ राजभवन के पास सभा के संशोधन के विरोध आवाज बुलंद किये। तथा 22 अक्टोबर को रांची के मोराबादी मैदान में विशाल रैली एवं सभा की घोषणा की। 
पूर्व तय कार्यक्रम के अनुसार 22 अक्टोबर को पूरे राज्य के आदिवासी-मूलवासी किसान सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन अध्यादेश के विरोध में मोराबादी में जमा होने के लिए गांवों से निकले। लेकिन रघुवर सरकार ने भारत के नागरिकों को भारतीय संविधान में प्रदत अभिव्यक्ति के अधिकार को हनन करते हुए गांव-गांव में पुलिस प्रशासन द्वारा बे्रेकेटिंग लगवा दिया गया, गांव के लोग रांची मोराबादी मैदान आ रहे थे, सबकी गाडी रोक दी गयी। यहां तक कि लोगों को पैदल भी नहीं आने दिया गया। रांची शहर को चारे ओर ब्रेकेटिंग से घेरा गया। ताकि जनता सभा तक न जा सके। इसी क्रम में खूंटी के सोयको में ग्रामीणों को रांची आने से रोका गया सोयको में। रैली में आने वालों तथा पुलिस प्रशासन के बीच विवाद बढ़ा, तक पुलिस ने फयरिंग की। इस फायरिंग में अब्रहम मुंडू मारा गया,  7 लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गये। जिनका इलाज रिम्स में हुआ। इस घटना में 10 लोगों पर नेमड एफआईआर किया गया, यहां तक कि मृतक अब्रहम मुडू सहित घायलों पर भी किया। 
केंन्द्र तथा राज्य की रघंुवर सरकार पूरी तरह आदिवासी-मूलवासी, किसानों के जल-जंगल-जमीन और खानिज को लूटने के लिए कई हथकंडे अपना ली है। याद दिलाना चाहती हुॅ कि 2014 में मोदी सरकार ने जिस जमीन अधिग्रहण अध्यादेश को लाया था-वह पूरी तरह से देश के किसानों को उखाड़ फेंकने की नीति थी। ताकि देश-विदेश के कारपोरेट घरानों को आसानी से जमीन हस्तांत्रित किया जा सके। इस अध्यादेश में 9 संशोधन तथा 2 उपनियम लाया गया था। रघुवर सरकार इसी संशोधन के आधार पर सीएनटी एक्ट के धारा-71(2) जिसमें आदिवासियों का जमीन यदि कोई गैर आदिवासी छल-बल से कब्जा किया है, और उस जमीन पर कोई निर्माण कार्य किया गया है-तो इस जमीन का मुआवजा देकर, उसे सेटेल करने का प्रावधान है-को समाप्त करने की बात कही गयी। इस तरह के केस को देखने के लिए हर जिला में जिला उपायुक्त को अधिकृत किया गया है-एसआरए कोर्ट (शिडूयल एरिया रेगुलेशन एक्ट) एैसे मामलों पर न्याय करे। लेकिन दुभग्य की बात है कि-इस तरह के जितने भी मामले आये हैं-सिर्फ 1-2 प्रतिशत में ही रैयतों-आदिवासी समाज को न्याय मिला है। 
विदित हो कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के मामले में सामाजिक संगठनों ने पहले भी आवाज उठाया कि-जो छेद है इस एक्ट में, जैसे मुआवजा देकर मामले को रफा-दफा किया जाता है, इसको बंद किया जाए। लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं किया। आज भी सरकार के कार्रवाई पर संदेह है। 
धारा-49 -इसमें पहले जनकल्याकारी कार्यों के लिए जमीन हस्तांत्रित करने का प्रावधान था। इसके तहत उद्योग और मांइस के लिए ही जमीन लेना था, लेकिन अब  इसमे संशोधन करके किसी तरह के काम के लिए जमीन लेने का प्रावधान कर दिया गया। याने यह कहा जाए-अब जमीन लेने के लिए पूरी तरह से बड़ा गेट को खोल दिया गया। धारा-21-में प्रावधान है कि-कृर्षि भूमि का नेचर-ननकृर्षि भूमि में बदला नहीं जा सकता है। लेकिन रघुवर सरकार ने इस कवच को तोड कर -कृर्षि भूमि का नेचर-ननकृर्षि भूमि में बदलने का कानून बनया। याने अब -कृर्षि भूमि में भी व्यवसायिक संस्थान खडा कर सकते है। यह सबसे खतरनाक साबित होने वाला है। एसपीटी एक्ट -का धारा 13 तथा सीएनटी एक्ट को धारा 21 दोनों एक है। इस कानून के पास होने के एक समय आएगा-झारखंड एक भी किसान नहीं बच पायेगें। 
विकास के मकडजाल में आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदाय फंसते जा रहा है। विकास का यह मकडजाल काॅरपोरेट घरानों, देश-विदेश के पूंजिपतियों के लिए जमीन की लूट के लिए केंन्द्र तथा राज्य के रघुवर सरकार द्वारा तैयार नीतियों का जाल है। जो आदिवासी-मूलवासी, किसान सामाज के उपर एक ष्ष्फेंका जालष्ष् की तरह  है। इस जाल के सहारे आदिवासी-मूलवासी, किसान एवं मेनतकश समुदाय को राज्यकीय व्यवस्था के सहारे काबू में ला कर इनके हाथ से जल-जंगल-जमीन एवं पर्यावरण को छीण कर काॅरपोरेट घरानों कों सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है। एक ओर भाजपानीत केंन्द्र एवं राज्य सरकार आदिवासी, किसानों के हक-अधिकारों के संगरक्षण की ढोल पीटती है, और दूसरी ओर इनके सुरक्षा कवच के रूप में भारतीय संविधान में प्रावधान अधिकारों को ध्वस्त करते हुए काॅरपोरेटी सम्राज्य स्थापित करने जा रही है। जिंदगी के तमाम पहलूओं-भोजन, पानी, स्वस्थ्य, शिक्षा, सहित हवा सभी को व्यवसायिक वस्तु के रूप में मुनाफा कमाने के लिए ग्लोबल पूंजि बाजार में सौदा करने के लिए डिस्पले-सजा कर के रख दिया है। 
देश जब अेग्रेज सम्रज्यवाद के गुलामी जंजीर से जकड़ा हुआ था -तब देश को अंग्रेज हुकूमत से आजाद करने के लिए झारखंड के आदिवासी -जनजाति व अनुसूचित जाति समुदाय ने शहादती संघर्ष कर स्वतत्रता संग्राम को मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। शहीद सिद्वू-कान्हू, ंिसदराय-बिंदराय, जतरा टाना  भगत, बीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हमारे गांव में हमारा राज-याने जल-जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत अधिकार बरकरार रखने, गांव-समाज को पर्यावरणीय मूल्यों के साथ विकसित करनेे, अपने क्षेत्र में में अपना प्रशासनिक व्यवस्था पुर्नस्थापित करने, कर अपना भाषा-संस्कृति के साथ संचालित-नियंत्रित एवं विकसित करने का सपना था। 
आजाद देश के राजनीतिज्ञों, बुधीजीवियों, एवं संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि-देश का विकास, शांति-व्यवस्था एक तरह के कानून से संभव नहीं हैं-इसीलिए देश में दो तरह के कानून बनाये गये। एक सामान्य कानून जो सामान्य क्षेत्र के लिए दूसरा विशेष कानून जो विशेष क्षेत्र के लिए बनाया गया। प्रकृतिकमूलक आदिवासी बहुल एरिया को विशेष क्षेत्र में रखा गया। इन क्षेत्रों पांचवी अनुसूचि तथा छठी अनुसूचि में बांटा गया। 
इसी अनुसूचि क्षेत्र में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना अधिनियम 1949, पेसा कानून 1996, वन अधिकार अधिनियम 2006 भी है। ये सभी कानून आदिवासी, मूलवासी, दलित, मच्छूवरा सहित 33 आदिम जनजाति समुदायों के अधिकारों रक्षा के लिए है। 
लेकिन- हर स्तर पर इन कानूनों को वयलेशन-हनन किया जा रहा है।
देश के विकास का इतिहास गवाह है-जबतक आदिवासी समाज अपना जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा रहता है-तबतक ही वह आदिवासी अस्तित्व के साथ जिंदा रह सकता है। आदिवासी सामाज को अपने धरोहर जल-जंगल-जमीन से जैसे ही अलग करेगें-पानी से मच्छली को बाहर निकालते ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देता है-आदिवासी सामाज भी इसी तरह अपनी धरोहर से अलग होते ही स्वतः दम तोड़ देता है। 
अपनी मिटटी के सुगंध तथा अपने झाड-जंगल के पुटुस, कोरेया, पलाश,  सराई, महुआ, आम मंजरी के खुशबू से सनी जीवनशैली के साथ विकास के रास्ते बढने के लिए संक्लपित परंपरागत आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज के उपर थोपी गयी विकास का मकडजाल स्थानीयता नीति 2016, सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन बिल 2017, महुआ नीति 2017, जनआंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया-क्षति पूर्ति कानून 2016, गो रक्षा कानून 2017, भूमि बैंक, डिजिटल झारखंड, लैंण्ड रिकार्ड आॅनलाइन करना, सिंगल विण्डोसिस्टम से आॅनलाइन जमीन हस्तांत्रण एवं म्यूटेशन जैसे नीति-कानूनों को लागू होना, निश्चित रूप से आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदायों के समझ के परे की व्यवस्था है। यह व्यवस्था राज्य के एक-एक इंच जमीन, एक-एक पेड-पौधों, एक-एक बूंद पानी को राज्य के ग्रामीण जनता के हाथ से छीनने का धारदार हथियार है। 
 गांव-आदिवासी गांव का मतलब -गांव सीमाना के भीतर एक-एक इंच जमीन, मिटी, गिटी, बालू, पत्थर, घांस-फूस, झाड- जंगल  मिलाकर  गांव बनता है-
इसी के आधार पर राज्य के आदिवासी बहुल गांवों का अपना परंपरिक मान्यता है। गांव घर को आबाद करने वाले आदिवासी समुदाय के पूर्वजों ने सामाजिक-पर्यावरणीय जीवनशैली के ताना बाना के आधार पर गांव बसाये हैं। 
सामाज के बुजूगों ने अपने गांव सीमा को खेती-किसानी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर व्यवस्थित किये हैं-क-घरो को एक तरफ बासाया गया-जहां हर जाति-धर्म समुदाय बास करता हैंै। ख-खेत-टांड एक तरफ गंाव सीमा भीतर के कुछ खेत-टांड को गैराही रखा, कुछ को परती रखे-ताकि गा्रमीण सामुदायिक उपयोग करे। जिसमें नदी-नाला, तालाब, कुंआ-आहर, सरना-मसना, खेल मैदान, खलिहान, अखड़ा बाजार, जतरा, मेला, चरागाह आदि के लिए। 
इसी के आधार पर राज्य में आदिवासी सामाज का जमीन को आबाद करने का अपना परंपरिक व्यास्था है यही नहीं इसका अपना विशिष्ट इतिहास भी है। आदिवासी परंपरागत व्यवस्था में जमीन को अपने तरह से परिभाषित किया गया है-रैयती जमीन, खूंटकटीदार मालिकाना, विलकिंगसन रूल क्षेत्र, गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, परती, जंगल-झाड़ी भूंमि। 
नोट-1932 में जो सर्वे सेटेलमेंट हुआ-इस रिकोर्ड के आधार पर जमीन को उपरोक्त वर्गों में बांटा गया। उस समय लोगों की आबादी कम थी। कम परिवार था। 84 साल पहले जमीन को चिन्हित किया गया था-कि ये परती है, जंगल-झाडी भूमिं है। 84 वर्ष में जो भी परती-झारती था, अब वो आबाद हो चूका है। अब उस जमीन पर बढ़ी आबादी खेती-बारी कर रही है। 
गैर मजरूआ आम भूंमि पर तो गांव के किसानों को पूरा अधिकार है ही, गैर मजरूआ खास जमीन पर भी ग्रामीणों का ही हक है। 
आज सरकार विकास के नाम पर लैंड बैंक---बना कर आदिवासी समुदाय के हाथ से उनका जमीन-जंगल छीन कर उद्योपतियों को देने का योजना बना रही हैं। केंन्द्र की मोदी सरकार तथा राज्य की रघुवर सरकार झारखंड से बाहर एवं देश के बाहर कई देशों में पूजिपतियों को झारखंड की धरती पर पूंजि निवेश के लिए आमंत्रित करने में व्यस्त हैं। 16-17 फरवरी 2017 को झारखंड की राजधानी रांची में ग्लोबल इनवेस्टर समिट को आयोजन कर 11 हजार देशी-विदेशी पूंजिपतियों को आमंत्रित किया गया था। इस दौरान 210 कंपनियों के साथ एमओयू किया गया। इस एमओयू में 121 उद्वोगों के लिए किया गया, जबकि कृर्षि के लिए सिर्फ एक एमओयू किया गया। इसके पहले 2000 से 2006 के बीच 104 बड़े बडे कंपनियों के साथ एमओयू किया गया हे। यदि सभी कंपनियों को अपने जरूरत के हिसाब से जमीन, जंगल, पानी, खनीज उपलब्ध किया जाए-तो आने वाले दस सालों के अंदर झारख्ंाड में एक इंज भी जमीन नहीं बचेगी, एक बूंद पानी नहीं बचेगा।  इसे सिर्फ आदिवासी मूलवासी, किसान ,मेहनतकश समुदाय केवल नहीं उजडेगें, परन्तु प्रकृति पर निर्भर सभी समुदाय स्वता ही उजड़ जाऐगें। जिनका कल का कोई भविष्य नहीं होगा। 
अपने इतिहास को याद करन का समय आया है। हमारा संघर्ष का इतिहास है-घुटना नहीं टेक सकते। जब आप के विरोधी ताकतें एक साथ खड़ा हैं-तब परिस्थिति की मांग है कि-राज्य और देश के आदिवासी-मूलवासी, किसान, मेहनतकश, शोषित-बंचित सबकों एक मंच में आना होगा, अपने इमानदारी संघर्ष  संगठित करके अपने धरोहर की सुरक्षा की गारंटी करनी होगीं 

Sunday, July 16, 2017

विकास का यह मकडजाल काॅरपोरेट घरानों, देश-विदेश के पूंजिपतियों के लिए जमीन की लूट के लिए केंन्द्र तथा राज्य के रघुवर सरकार द्वारा तैयार नीतियों का जाल है। जो आदिवासी-मूलवासी, किसान सामाज के उपर एक ष्ष्फेंका जाल की तरह

विकास के मकडजाल में आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदाय फंसते जा रहा है। विकास का यह मकडजाल काॅरपोरेट घरानों, देश-विदेश के पूंजिपतियों के लिए जमीन की लूट के लिए केंन्द्र तथा राज्य के रघुवर सरकार द्वारा तैयार नीतियों का जाल है। जो आदिवासी-मूलवासी, किसान सामाज के उपर एक ष्ष्फेंका जाल की तरह  है। इस जाल के सहारे आदिवासी-मूलवासी, किसान एवं मेनतकश समुदाय को राज्यकीय व्यवस्था के सहारे काबू में ला कर इनके हाथ से जल-जंगल-जमीन एवं पर्यावरण को छीण कर काॅरपोरेट घरानों कों सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है। एक ओर भाजपानीत केंन्द्र एवं राज्य सरकार आदिवासी, किसानों के हक-अधिकारों के संगरक्षण की ढोल पीटती है, और दूसरी ओर इनके सुरक्षा कवच के रूप में भारतीय संविधान में प्रावधान अधिकारों को ध्वस्त करते हुए काॅरपोरेटी सम्राज्य स्थापित करने जा रही है। जिंदगी के तमाम पहलूओं-भोजन, पानी, स्वस्थ्य, शिक्षा, सहित हवा सभी को व्यवसायिक वस्तु के रूप में मुनाफा कमाने के लिए ग्लोबल पूंजि बाजार में सौदा करने के लिए डिस्पले-सजा कर के रख दिया है। 
देश जब अेग्रेज सम्रज्यवाद के गुलामी जंजीर से जकड़ा हुआ था -तब देश को अंग्रेज हुकूमत से आजाद करने के लिए झारखंड के आदिवासी -जनजाति व अनुसूचित जाति समुदाय ने शहादती संघर्ष कर स्वतत्रता संग्राम को मुकाम तक पहुंचाने का काम किया। शहीद सिद्वू-कान्हू, ंसिंदराय -बिंदराय, जतरा टाना  भगत, बीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हमारे गांव में हमारा राज-याने जल-जंगल-जमीन पर अपना परंपरागत अधिकार बरकरार रखने, गांव-समाज को पर्यावरणीय मूल्यों के साथ विकसित करनेे, अपने क्षेत्र में में अपना प्रशासनिक व्यवस्था पुर्नस्थापित  कर अपना भाषा-संस्कृति के साथ संचालित-नियंत्रित एवं विकसित करने का सपना था। 
आजाद देश के राजनीतिज्ञों, बुधीजीवियों, एवं संविधान निर्माताओं ने यह अनुभव किया कि-देश का विकास, शांति-व्यवस्था एक तरह के कानून से संभव नहीं हैं-इसीलिए देश में दो तरह के कानून बनाये गये। एक सामान्य कानून जो सामान्य क्षेत्र के लिए दूसरा विशेष कानून जो विशेष क्षेत्र के लिए बनाया गया। प्रकृतिकमूलक आदिवासी बहुल एरिया को विशेष क्षेत्र में रखा गया। इन क्षेत्रों पांचवी अनुसूचि तथा छठी अनुसूचि में बांटा गया। 
इसी अनुसूचि क्षेत्र में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908, संताल परगना अधिनियम 1949, पेसा कानून 1996, वन अधिकार अधिनियम 2006 भी है। ये सभी कानून आदिवासी, मूलवासी, दलित, मच्छूवरा सहित 33 आदिम जनजाति समुदायों के अधिकारों रक्षा के लिए है। 
लेकिन- हर स्तर पर इन कानूनों को वयलेशन-हनन किया जा रहा है।
देश के विकास का इतिहास गवाह है-जबतक आदिवासी समाज अपना जल-जंगल-जमीन के साथ जुड़ा रहता है-तबतक ही वह आदिवासी अस्तित्व के साथ जिंदा रह सकता है। आदिवासी सामाज को अपने धरोहर जल-जंगल-जमीन से जैसे ही अलग करेगें-पानी से मच्छली को बाहर निकालते ही तड़प तड़पकर दम तोड़ देता है-आदिवासी सामाज भी इसी तरह अपनी धरोहर से अलग होते ही स्वतः दम तोड़ देता है। 
अपनी मिटटी के सुगंध तथा अपने झाड-जंगल के पुटुस, कोरेया, पलाश,  सराई, महुआ, आम मंजरी के खुशबू से सनी जीवनशैली के साथ विकास के रास्ते बढने के लिए संक्लपित परंपरागत आदिवासी-मूलवासी, किसान समाज के उपर थोपी गयी विकास का मकडजाल स्थानीयता नीति 2016, सीएनटी, एसपीटी एक्ट संशोधन बिल 2017, महुआ नीति 2017, जनआंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया-क्षति पूर्ति कानून 2016, गो रक्षा कानून 2017, भूमि बैंक, डिजिटल झारखंड, लैंण्ड रिकार्ड आॅनलाइन करना, सिंगल विण्डोसिस्टम से आॅनलाइन जमीन हस्तांत्रण एवं म्यूटेशन जैसे नीति-कानूनों को लागू होना, निश्चित रूप से आदिवासी-मूलवासी किसान, मेहनतकश समुदायों के समझ के परे की व्यवस्था है। यह व्यवस्था राज्य के एक-एक इंच जमीन, एक-एक पेड-पौधों, एक-एक बूंद पानी को राज्य के ग्रामीण जनता के हाथ से छीनने का धारदार हथियार है। 
 गांव-आदिवासी गांव का मतलब -गांव सीमाना के भीतर एक-एक इंच जमीन, मिटी, गिटी, बालू, पत्थर, घांस-फूस, झाड- जंगल  मिलाकर  गांव बनता है-
इसी के आधार पर राज्य के आदिवासी बहुल गांवों का अपना परंपरिक मान्यता है। गांव घर को आबाद करने वाले आदिवासी समुदाय के पूर्वजों ने सामाजिक-पर्यावरणीय जीवनशैली के ताना बाना के आधार पर गांव बसाये हैं। 
सामाज के बुजूगों ने अपने गांव सीमा को खेती-किसानी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर व्यवस्थित किये हैं-क-घरो को एक तरफ बासाया गया-जहां हर जाति-धर्म समुदाय बास करता हैंै। ख-खेत-टांड एक तरफ गंाव सीमा भीतर के कुछ खेत-टांड को गैराही रखा, कुछ को परती रखे-ताकि गा्रमीण सामुदायिक उपयोग करे। जिसमें नदी-नाला, तालाब, कुंआ-आहर, सरना-मसना, खेल मैदान, खलिहान, अखड़ा बाजार, जतरा, मेला, चरागाह आदि के लिए। 
इसी के आधार पर राज्य में आदिवासी सामाज का जमीन को आबाद करने का अपना परंपरिक व्यास्था है यही नहीं इसका अपना विशिष्ट इतिहास भी है। आदिवासी परंपरागत व्यवस्था में जमीन को अपने तरह से परिभाषित किया गया है-रैयती जमीन, खूंटकटीदार मालिकाना, विलकिंगसन रूल क्षेत्र, गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास, परती, जंगल-झाड़ी भूंमि। 
नोट-1932 में जो सर्वे सेटेलमेंट हुआ-इस रिकोर्ड के आधार पर जमीन को उपरोक्त वर्गों में बांटा गया। उस समय लोगों की आबादी कम थी। कम परिवार था। 84 साल पहले जमीन को चिन्हित किया गया था-कि ये परती है, जंगल-झाडी भूमिं है। 84 वर्ष में जो भी परती-झारती था, अब वो आबाद हो चूका है। अब उस जमीन पर बढ़ी आबादी खेती-बारी कर रही है। 
गैर मजरूआ आम भूंमि पर तो गांव के किसानों को पूरा अधिकार है ही, गैर मजरूआ खास जमीन पर भी ग्रामीणों का ही हक है। 
आज सरकार विकास के नाम पर लैंड बैंक---बना कर आदिवासी समुदाय के हाथ से उनका जमीन-जंगल छीन कर उद्योपतियों को देने का योजना बना रही हैं। केंन्द्र की मोदी सरकार तथा राज्य की रघुवर सरकार झारखंड से बाहर एवं देश के बाहर कई देशों में पूजिपतियों को झारखंड की धरती पर पूंजि निवेश के लिए आमंत्रित करने में व्यस्त हैं। 16-17 फरवरी 2017 को झारखंड की राजधानी रांची में ग्लोबल इनवेस्टर समिट को आयोजन कर 11 हजार देशी-विदेशी पूंजिपतियों को आमंत्रित किया गया था। इस दौरान 210 कंपनियों के साथ एमओयू किया गया। इस एमओयू में 121 उद्वोगों के लिए किया गया, जबकि कृर्षि के लिए सिर्फ एक एमओयू किया गया। इसके पहले 2000 से 2006 के बीच 104 बड़े बडे कंपनियों के साथ एमओयू किया गया हे। यदि सभी कंपनियों को अपने जरूरत के हिसाब से जमीन, जंगल, पानी, खनीज उपलब्ध किया जाए-तो आने वाले दस सालों के अंदर झारख्ंाड में एक इंज भी जमीन नहीं बचेगी, एक बूंद पानी नहीं बचेगा।  इसे सिर्फ आदिवासी मूलवासी, किसान ,मेहनतकश समुदाय केवल नहीं उजडेगें, परन्तु प्रकृति पर निर्भर सभी समुदाय स्वता ही उजड़ जाऐगें। जिनका कल का कोई भविष्य नहीं होगा।